दशलक्षण महापर्व दिगम्बर जैन परम्परा का प्रमुख आध्यात्मिक पर्व है। दस दिनों तक प्रतिदिन आत्मा के एक-एक धर्म — उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य एवं ब्रह्मचर्य — की आराधना की जाती है। ये धर्म किसी बाहरी वस्तु के नहीं, आत्मा के ही स्वभाव हैं; क्रोध, मान, माया, लोभ आदि विकारों के अभाव में वे प्रकट होते हैं।
दशलक्षण धर्म का शास्त्रीय आधार आचार्य उमास्वामी रचित तत्त्वार्थसूत्र का यह सूत्र है:
उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः ॥— तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय 9, सूत्र 6
‘उत्तम’ विशेषण यह बताता है कि ये धर्म सम्यग्दर्शन सहित हों, तभी वास्तविक धर्म हैं। पर्व के दिनों में साधक प्रतिदिन जिनेन्द्र पूजन, दशलक्षण धर्म की पूजा एवं विधान, तत्त्वार्थसूत्र का पाठ एवं उसके अर्थ का श्रवण, स्वाध्याय, सामायिक तथा शक्ति के अनुसार उपवास-एकाशन आदि करते हैं। अन्तिम दिन अनन्त चतुर्दशी होता है, और पर्व का समापन क्षमावाणी के साथ होता है — जब सब एक-दूसरे से मन, वचन, काय से क्षमा माँगते हैं।
In English
Dashlakshan Mahaparva is the principal spiritual festival of the Digambara Jain tradition. For ten days, one of the soul's ten virtues is contemplated each day — supreme forgiveness, humility, straightforwardness, purity, truth, self-restraint, austerity, renunciation, non-possessiveness and celibacy (dwelling in the Self). These are not outside things but the soul's own nature, revealed when anger, pride, deceit and greed fall away.
Their scriptural basis is Acharya Umaswami's Tattvartha Sutra (chapter 9, sutra 6). The word uttam (“supreme”) means these virtues are truly dharma only with right faith (samyak darshan). During the festival, devotees perform daily Jinendra puja, the Dashlakshan puja and vidhan, recite and hear the Tattvartha Sutra, study scripture, practise samayik and fast as they are able. The last day is Anant Chaturdashi, and the festival closes with Kshamavani — when everyone asks one another's forgiveness in thought, word and deed.
दस दिवस · The ten days
- 16 सितम्बरबुधवारशुक्ल पंचमीउत्तम क्षमाForgivenessक्रोध के अभाव में आत्मा में प्रकट होने वाली शान्ति
- 17 सितम्बरगुरुवारशुक्ल षष्ठीउत्तम मार्दवHumilityमान के अभाव से प्रकट होने वाली कोमलता और विनय
- 18 सितम्बरशुक्रवारशुक्ल सप्तमीउत्तम आर्जवStraightforwardnessछल-कपट के अभाव से प्रकट होने वाली सरलता
- 19 सितम्बरशनिवारशुक्ल अष्टमीउत्तम शौचPurity (freedom from greed)लोभ के अभाव से प्रकट होने वाली आन्तरिक पवित्रता
- 20 सितम्बररविवारशुक्ल नवमीउत्तम सत्यTruthसत्स्वभावी आत्मा के आश्रय से प्रकट वीतराग परिणति
- 21 सितम्बरसोमवारशुक्ल दशमीसुगंध दशमीउत्तम संयमSelf-restraintछह काय के जीवों की रक्षा और इन्द्रिय-मन का निग्रह
- 22 सितम्बरमंगलवारशुक्ल एकादशीउत्तम तपAusterityइच्छा-निरोधपूर्वक आत्मलीनता द्वारा विकारों पर विजय
- 23 सितम्बरबुधवारशुक्ल द्वादशीउत्तम त्यागRenunciationनिज शुद्धात्मा के ग्रहणपूर्वक बाह्य-अभ्यन्तर परिग्रह से निवृत्ति
- 24 सितम्बरगुरुवारशुक्ल त्रयोदशीउत्तम आकिंचन्यNon-possessivenessकिंचित्मात्र भी परपदार्थ मेरा नहीं — ऐसा जानना, मानना
- 25 सितम्बरशुक्रवारशुक्ल चतुर्दशीअनंत चतुर्दशीउत्तम ब्रह्मचर्यCelibacy (dwelling in the Self)ब्रह्म अर्थात् निज शुद्धात्मा में चरना, रमना
क्षमावाणी की तिथि अपने क्षेत्र के पंचांग एवं स्थानीय समाज की घोषणा के अनुसार मनाएँ।Observe Kshamavani on the date announced by your local community and calendar.
हमारे पर्व · Our festivals
आत्मा शुद्धि की प्रेरणा देते – वही हमारे पर्व हैं।सम्यक् आचरण जो सिखलाते – वही हमारे पर्व हैं।भेद विज्ञान का पोषण करते – वही हमारे पर्व हैं।वीतरागता प्राप्त कराते – वही हमारे पर्व हैं।निज स्वभाव की ओर ले चलते – वही हमारे पर्व हैं।मुक्तिपुरी मे जो पहुँचाते – वही हमारे पर्व हैं।
वस्तु के स्वरूप को यथार्थ समझ कर निराकुल सहज जीवन ही धर्म है।।
