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दशलक्षण महापर्व 2026सम्यग्ज्ञान प्रचार-प्रसार ट्रस्ट

परिचय

दशलक्षण महापर्व

भाद्रपद शुक्ल पंचमी से अनन्त चतुर्दशी तक · 16 – 25 सितम्बर 2026

दशलक्षण महापर्व दिगम्बर जैन परम्परा का प्रमुख आध्यात्मिक पर्व है। दस दिनों तक प्रतिदिन आत्मा के एक-एक धर्म — उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य एवं ब्रह्मचर्य — की आराधना की जाती है। ये धर्म किसी बाहरी वस्तु के नहीं, आत्मा के ही स्वभाव हैं; क्रोध, मान, माया, लोभ आदि विकारों के अभाव में वे प्रकट होते हैं।

इन दस धर्मों का शास्त्रीय आधार आचार्य उमास्वामी रचित तत्त्वार्थसूत्र का यह सूत्र है:

उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः ॥— तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय 9, सूत्र 6

‘उत्तम’ विशेषण यह बताता है कि ये धर्म सम्यग्दर्शन सहित हों, तभी वास्तविक धर्म हैं। पर्व के दिनों में साधक प्रतिदिन जिनेन्द्र पूजन, दशलक्षण धर्म की पूजा एवं विधान, तत्त्वार्थसूत्र का पाठ एवं उसके अर्थ का श्रवण, स्वाध्याय, सामायिक तथा शक्ति के अनुसार उपवास-एकाशन आदि करते हैं। अन्तिम दिन अनन्त चतुर्दशी होता है, और पर्व का समापन क्षमावाणी के साथ होता है — जब सब एक-दूसरे से मन, वचन, काय से क्षमा माँगते हैं।

दस दिवस

  1. 16 सितम्बरउत्तम क्षमाक्रोध के अभाव में आत्मा में प्रकट होने वाली शान्ति
  2. 17 सितम्बरउत्तम मार्दवमान के अभाव से प्रकट होने वाली कोमलता और विनय
  3. 18 सितम्बरउत्तम आर्जवछल-कपट के अभाव से प्रकट होने वाली सरलता
  4. 19 सितम्बरउत्तम शौचलोभ के अभाव से प्रकट होने वाली आन्तरिक पवित्रता
  5. 20 सितम्बरउत्तम सत्यसत्स्वभावी आत्मा के आश्रय से प्रकट वीतराग परिणति
  6. 21 सितम्बरउत्तम संयमछह काय के जीवों की रक्षा और इन्द्रिय-मन का निग्रह
  7. 22 सितम्बरउत्तम तपइच्छा-निरोधपूर्वक आत्मलीनता द्वारा विकारों पर विजय
  8. 23 सितम्बरउत्तम त्यागनिज शुद्धात्मा के ग्रहणपूर्वक बाह्य-अभ्यन्तर परिग्रह से निवृत्ति
  9. 24 सितम्बरउत्तम आकिंचन्यकिंचित्मात्र भी परपदार्थ मेरा नहीं — ऐसा जानना, मानना
  10. 25 सितम्बरउत्तम ब्रह्मचर्यब्रह्म अर्थात् निज शुद्धात्मा में चरना, रमना

क्षमावाणी की तिथि अपने क्षेत्र के पंचांग एवं स्थानीय समाज की घोषणा के अनुसार मनाएँ।

हमारे पर्व

आत्मा शुद्धि की प्रेरणा देते – वही हमारे पर्व हैं।सम्यक् आचरण जो सिखलाते – वही हमारे पर्व हैं।भेद विज्ञान का पोषण करते – वही हमारे पर्व हैं।वीतरागता प्राप्त कराते – वही हमारे पर्व हैं।निज स्वभाव की ओर ले चलते – वही हमारे पर्व हैं।मुक्तिपुरी मे जो पहुँचाते – वही हमारे पर्व हैं।

वस्तु के स्वरूप को यथार्थ समझ कर निराकुल सहज जीवन ही धर्म है।।

समकित शास्त्री