
दिवस 08 · 23 सितम्बर 2026
उत्तम त्याग धर्म
निज शुद्धात्मा के ग्रहणपूर्वक बाह्य-अभ्यन्तर परिग्रह से निवृत्ति
परिचय
निज शुद्धात्मा के ग्रहणपूर्वक बाह्य और अभ्यन्तर परिग्रह से निवृत्ति उत्तम त्याग है। त्याग धर्म है और दान पुण्य; वास्तविक त्याग परद्रव्यों के प्रति होने वाले मोह-राग-द्वेष का होता है। व्यवहार में आहार, औषध, शास्त्र और अभय — ये चार दान कहे गए हैं।
विरोधी भाव: अत्याग (रागादिवश पर-वस्तु का ग्रहण)
आज की साधना
- दशलक्षण पूजन के उत्तम त्याग अंश का अर्थ सहित पाठ
- आहार, औषध, शास्त्र और अभय — इनमें यथाशक्ति दान
- अपने किसी एक दोष को पहचानकर उसके त्याग का संकल्प
उत्तम त्याग धर्म
त्याग रूप ही आत्मधर्म है।राग–द्वेष तो भाव कर्म हैं।।कषाय भाव से मुख को मोड़ो।अभक्ष्य और पापों को छोड़ो।।भव-दुख के अभाव का कारण।भील पुरुरवा वीर गया बन।।
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आज की पूजन
दशलक्षण धर्म पूजन — कविवर पं. द्यानतरायजी
विधान एवं अर्घ्य
श्री दशलक्षण धर्म विधान — कविवर पं. राजमलजी पवैया
भक्ति एवं लय
पूजन-विधान के छन्द किस धुन में गाएँ, और भजन संग्रह
अध्ययन
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आज के चित्र
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आज आपने क्या सीखा?
उत्तम त्याग — 5 प्रश्नों की दैनिक Quiz
आज के धर्म पर 5 सरल प्रश्न — उत्तर के साथ व्याख्या भी।
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