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दशलक्षण महापर्व 2026Dashlakshan Mahaparv 2026

नाटक स्क्रिप्ट · Play script

वज्रदन्त चक्रवर्ती का वैराग्य

Vajradant Vairagya

रचयिता Author: अर्पित जैन (शास्त्री), भिंड · ~20 min पढ़ने में

Original PDF

यह पाठ मूल पुस्तक से टाइप किया गया है; मंचन से पहले मूल PDF से मिलान कर लें।Typed from the original book — please check against the original PDF before staging.

पूर्व विदेह की पुण्डरीकिनी नगरी के चक्रवर्ती सम्राट वज्रदन्त — छह खण्ड, नव निधि व चौदह रत्नों के स्वामी — अपने हजार पुत्रों सहित किस प्रकार वैराग्य को प्राप्त होकर मुनि अवस्था में विराजमान हुए, इसी प्रेरक कथा का मंचन योग्य नाटक। पिता-पुत्र संवाद से आरम्भ होकर वज्रदन्त चक्रवर्ती का दरबार, राजा-रानी श्रीमति, मंत्रीगण, द्वारपाल आदि पात्रों के पूरे संवाद, दृश्य व मंच निर्देश सहित। भोग की पराकाष्ठा में भी अनासक्ति व वैराग्य — दस लक्षण पर्व (उत्तम त्याग व वैराग्य भावना) के मंचन हेतु आदर्श।

Vajradant Chakravarti of Pundarikini (Purva Videha) — lord of six continents and the nine nidhis — who, along with his thousand sons, renounced everything and attained the path of vairagya (detachment). A ready-to-stage Jain drama with full characters (Raja, Rani Shrimati, ministers, gatekeeper, father-son), dialogues and stage directions. Ideal Dashlakshan vairagya / uttam tyag natak for pathshala and cultural programs.

प्रूफरीडिंग बाकी है

डाउनलोड / Download PDF: vajradant-vairagya-natak.pdf


पूरा नाटक / Full Script

नाटक वज्रदन्त वैराग्य

दृश्य - (संचालन)

पुत्र - पिता जी ! पिता जी ! ये दीन दीन नन अवस्था में कौन महानुभव समूह में विराजमान हैं - क्या इनको लज्जा नहीं आती ?..।

पिता जी - अरे ! नहीं पुत्र , ये कोई दीन दीन नहीं अपितु ये तो महावीरगी वज्रदन्त चक्रवर्ती अपने वैराग्यवन्त पुत्रों के साथ मुनि अवस्था में विराजमान हैं और रही बात लज्जा की तो ये मत तो महापुरुष हैं एवं परम वंदनीय हैं।

पुत्र - पिता जी ! मेरे मन में एक जिज्ञासा उत्पन्न हो रही है कि चक्रवर्ती को पुत्रों सहित वैराग्य किस कारण हुआ। कृपया आप मेरी शंका का समाधान करें।

पिता जी - पुत्र ! क्या तुम सच में जानना चाहते हो ?

पुत्र - हाँ पिता जी ! मुझे यह जानने की अत्यंत जिज्ञासा है।

पिता जी - तो चलिए चलते हैं इतिहास के उन पृष्ठों को खोलने और जानने कि कैसे एक चक्रवर्ती पिता और उनके हजार पुत्रों को वैराग्य की उत्पत्ति हुई। तो प्रस्तुत है आपके समक्ष प्रथम दृश्य…

दृश्य - 1 (वज्रदन्त चक्रवर्ती का दरबार)

द्वारपाल - सावधान !! पूर्व विदेह की पुष्टरीकिनी नगरी के चक्रवर्ती सम्राट वज्रदन्त अपनी पटरानी श्रीमति एवं मंत्री व सामंतो के साथ राज दरबार में पधार रहे हैं…

(चक्रवर्ती सम्राट महाराज वज्रदन्त की - जय - २)

राजा - बैठिये मंत्रीवर बैठिये ! अपना स्थान ग्रहण कीजिये। कहो मंत्रीवर राज्य में सब कुशल मंगल तो है ?

मंत्री 1 - हे महाराज ! प्रजा के हितैषी , धर्म पारायण , दुखियों के नाथ आपके पुण्य-प्रताप एवं मंगल आशीर्वाद से प्रजा धन-धान्य से पूरित है और सम्पूर्ण छह खंडो में प्रजा आपका ही विरद बखान करती है।

मंत्री 2 - हाँ महाराज ! सम्पूर्ण पृथ्वी पर कौन आपके तेज को पराभव कर सकता है। हे नाथ ! प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता है अर्थात ये नव निधियाँ आपके पुण्य प्रताप को घोषित करती हैं और प्रत्येक निधि 1000 यक्षों से अधिष्ठित है।

मंत्री 3 - इतना ही नहीं मंत्रीवर सम्पूर्ण जगत में महाराज के तेज को दबाता हुआ सूर्य के समान देदीप्यमान यह सुदर्शैन चक्र सदैव महाराज के शीर्ष का यशोगान करता है।

मंत्री 4 - हाँ महाराज ! ज्येष्ठ मंत्रीवर सत्य कहते हैं ये सुपूर्ण भोग सामग्री ,ये चौंदह रत्न और ये नव निधियाँ पुण्य की चेरी हैं महाराज और ये पुण्य आपके ही चरणों का दास है। महाराज ! ये नव निधियाँ आपके समक्ष अपना वैभव प्रस्तुत करना चाहती हैं यदि आप आज्ञा दे तो ये नव निधियाँ अपने वैभव को आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगी।

राजा - क्यों नहीं मंत्रीवर ! हमारी आज्ञा है।

मंत्री 4 - महाराज की आज्ञा से राज दरबार में नव निधियाँ अपने वैभव को प्रस्तुत करें।

द्वारपाल - राज दरबार में नव निधियाँ पधार रहीं हैं…।

नैसर्ग निधि - प्रणाम महाराज ! मैं नैसर्ग निधि , मेरा कार्य ग्राम , नगर , मंडप आदि का निर्माण कराना है और महाराज आप मेरा भली प्रकार से उपभोग करें।

पांडुक निधि - प्रणाम महाराज ! मैं पांडुक निधि , धान्य एवं बीजों की उत्पत्ति करने में सक्षम हूँ और महाराज आप मेरा भली प्रकार से उपभोग करें।

सिंगाल निधि - प्रणाम महाराज ! मैं सिंगाल निधि , स्वर्ण - रत्न जडित विभिन्न आभूषण देने में सक्षम हूँ और महाराज आप मेरा भली प्रकार से उपभोग करें।

महाप्रय निधि - प्रणाम महाराज ! मैं महाप्रय निधि , सुंदर - रंगीन वस्त्र प्रदान कराने में सक्षम हूँ और महाराज आप मेरा भली प्रकार से उपभोग करें।

काल निधि - प्रणाम महाराज ! मैं काल निधि , भूत , वर्तमान एवं भविष्य काल का ज्ञान कराने में सक्षम हूँ और महाराज आप मेरा भली प्रकार से उपभोग करें।

महाकाल निधि - प्रणाम महाराज ! मैं महाकाल निधि , सोना एवं चाँदी आदि रत्नों की खानें उत्पन्न कराने में सक्षम हूँ और महाराज आप मेरा भली प्रकार से उपभोग करें।

माणव निधि - प्रणाम महाराज ! मैं माणव निधि , मेरा कार्य युद्धनीति एवं दण्डनीति का परिज्ञान कराना है और महाराज आप मेरा भली प्रकार से उपभोग करें।

शंख निधि - प्रणाम महाराज ! मैं शंख निधि , अनेक प्रकार के वाद्य - नाट्य , नाटक आदि का ज्ञान कराने वाली हूँ और महाराज आप मेरा भली प्रकार से उपभोग करें।

नव निधियाँ - महाराज ! हम नव निधियाँ सदैव आपकी सेवा में तत्पर हैं।

राजा - हे प्रिय ! आज राज दरबार में प्रजा के हित में जो भी चर्चा हुई आपके उसमें क्या विचार है प्रिय ?

रानी - हे महाराज ! आपकी प्रसन्नता में ही तो मेरी प्रसन्नता है। हे नाथ ! इससे अधिक कहने को मेरे पास शब्द नहीं है। हे महाराज ! यदि आपकी कोई अन्य अभिलाषा है तो निश्चित ही हमें उससे अवगत कराएं महाराज।

राजा - हे देवी ! मुझे आज एक मनोहारी नृत्य देखने की इच्छा हो रही है।

रानी - अति उत्तम महाराज ! अति उत्तम।

राजा - मन्त्रीयों ! शीघ्र अति शीघ्र एक मनोहारी नृत्य का आयोजन किया जाए।

सभी मंत्री - जो आज्ञा महाराज !

द्वारपाल - महाराज की आज्ञा से राज दरबार में नृत्य प्रारम्भ किया जाए…

(नृत्य)

(दृश्य - संचालन)

पुत्र - पिता जी ! जिनको मैं दन्द्रित - पापर समझ रहा था वे गुरुस्थ अवस्था में इतने वैभवशाली थे तथा छह छह खंडों के अधिपति होते हुए भी उन्होंने देवों समान भोगो को क्यों त्यागा।

पिता जी - अरे ! हाँ पुत्र मैं तुम्हें उनके वैराग्य का कारण बताता हूँ जिसको सुनकर तुम्हारी समस्त शंकाओं का समाधान अवश्य हो जाएगा।

पुत्र - पिता जी ! मुझे यह जानने की अत्यंत जिज्ञासा उत्पन्न हो रही है कि चक्रवर्ती को पूर्णों सहित वैराग्य कैसे हुआ ?

पिता जी - तो ध्यान से सुनो कि कैसे एक जीव का मरण 100। महतों के वैराग्य का कारण बना। तो प्रस्तुत है आपके समक्ष वैराग्य का मनोहारी अगला दृश्य…

(दृश्य - राज दरबार (माली))

मंत्री 1 - महाराज ! आपकी सूक्ष्मबुद्धि से कुछ भी अदृश्य नहीं है। आपके तेज से शत्रुगण स्वयं नतमस्तक हो जाते हैं।

(माली का प्रवेश)

माली - महाराज की जय हो ! महाराज की जय हो ! जय हो …

द्वारपाल - रुको रुको , तुम्हें पता नहीं है क्या ? कि बिना अनुमति महल में प्रवेश वर्जित है।

माली - अरे सेनापति ! मै महाराज के लिए पद्म सरोवर का ये उत्कृष्ट कमल उनके लिए भेंट स्वरूप लाया हूँ। कृपया दरबार में जाने की मुझे अनुमति दें।

द्वारपाल - ठहरो यहाँ , मैं महाराज से आज्ञा लेकर आता हूँ। महाराज की जय हो ! महाराज ! आपसे मिलने एक माली आया है वाह आपको एक भेंट देना चाहता है यदि आपकी आज्ञा हो तो उसे महल में प्रवेश दिया जाए।

राजा - अरे क्यों नहीं ! उस माली को शीघ्र अति शीघ्र हमारे राज दरबार में प्रस्तुत किया जाए।

द्वारपाल - जो आज्ञा महाराज ! …

आप जा सकते हो।

माली - महाराज की जय हो ! महाराज को मेरा प्रणाम। महाराज मैं ये पद्म सरोवर का उत्कृष्ट कमल आपके चरणों में भेंट स्वरूप लाया हूँ। कृपया इसे स्वीकार करें और मुझे कृतार्थ करें।

राजा - अद्भुत ! अद्भुत ! अति उत्तम ! हम तुम्हारी इस भेंट से प्रसन्न हुए। लो तुम्हारा उपहार।

माली - धन्यवाद महाराज।

(महाराज कमल को देखकर)

ऐसी काल पद्म माली लायो एक डाली तामें,

देखो अलि अम्बुज मरण भयकार हैं।

नासिका के हेतु भयो भोग मैं अचेत सारी,

रेन के कलाप मैं बिलाप इन करे है।

अहो यह भोग महा पाप को संयोग देखो,

डाली मैं कमल तामैं भौरा प्राण हरे है।

नासिका के हेतु भयो भोग मैं अचेत सारी,

रेन के कलाप मैं बिलाप इन करे है।

राजा - एकांत…

राजा -

दुख का घर असार संसार ,

मुझे न रंच सुहाता है।

अरे मैं ससे छोड़ दूं अपनी,
मेरे मन यह आता है॥
जगत का ऐसा अद्भुत रूप,
देख मैं यही सोचता हूं।
मुझे इसमें रहना नहीं,
अरे अंतर्मुख होता हूं॥ - (3)

(दृश्य - संचालन)

पुत्र - पिता जी ! महाराज, माली द्वारा लाई गई भेंट को देखकर इतने चिंतित क्यों हो गए तथा उन्होंने अपने सहस्त्र पुत्रों को बुलाकर ऐसा क्या कहा कि मारे ही कुमार संसार से विरक्त हो गए। कृपया मेरी जिज्ञासा का समाधान करें।

पिता जी - सुनो पुत्र ! वह माली द्वारा लाया गया पंच सरोवर का कमल चक्रवर्ती महाराज के वैराग्य का कारण बना क्योंकि उस कमल में एक भंवरे ने प्राण इन्द्रिय के वशीभूत होकर अपने प्राण त्याग दिये और तत्क्षण चक्रवर्ती महाराज अपने अंतर्मन के भावों को अपने पुत्रों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं तो आइए देखतें हैं उन महावीरणी पिता - पुत्रों की परस्पर में क्या वार्ता होती है। तो प्रस्तुत है आपके समक्ष अगला दृश्य…

(दृश्य - पिता और उनके पुत्रों की वार्ता)

पुत्र अभिवतेज - पिता श्री ! आज चक्रवर्ती का मुखमंडल कुछ फीका सा प्रतीत हो रहा है। हे तात् ! आप किस कारण से चिंतित दिखाई दे रहे हैं।

राजा - हे अभिवतेज ! मुझे अब यह संसार कदली वृक्ष के समान निस्सार दिखाई दे रहा है, ये भोग रोग के समान प्रतीत होते हैं , अधिक क्या कहूं यह राज्य सम्पदा महंत फुफ्णों के द्वारा त्यागी गयी वमन के समान प्रतीत होती है। अतः हे पुत्र ! अब इस राज्य के निर्वाहन का कार्य तुम्हें सौंपकर वन की ओर जाना चाहता हूं, निर्ग्रन्थ दिगंबर भेष धारण करना चाहता हूं, वीतरागी मार्ग पर जाना चाहता हूं।

यथा कर का कोगना, सन्मुख प्रकट नजरों पेरो
त्यों ही पिता भीत निरखि, भव भोग से मन थररो
तुमने तो वन के वास ही को, सुखद अंगीकृत किया।
तुमरी समझ सोई समझ हमरी, हमें नृप पद क्यों दिया।।

पुत्र अभिवतेज - हे तात् ! धन्य हैं आप और धन्य हैं आपके उत्तम विचार परन्तु मैं इस राज्य सम्पदा को कदापि अंगीकार नहीं कर सकता भला कौन उत्तम पुरुष होगा जो वमन समान इस राज्य को अंगीकार करेगा अतः मैं इस पद को ग्रहण नहीं कर सकता अतः आप यह राज्य का भार अनुज को प्रदान करें…।

दूसरा पुत्र - नहीं तात् ! आपकी एवं भ्राता श्री की जो समझ है वही समझ मेरी भी है। क्षमा करिये परन्तु मैं भी इस वामन समान राज्य लक्ष्मी को अंगीकार नहीं कर सकता।

राजा - हे मुद्कुमारो ! यहां कोई चक्रवर्ती सम्राट नहीं अपितु तुम्हारो जनक तुमसे प्रश्न करते हैं कि यह जो तुम्हार विचार है वह वास्तव में अनुकरणीय है, भगवती जिनदीक्षा ही इस मनुष्य पर्याय की सार्थकता है इससे हि जीव पूर्ण सुख को प्राप्त करता है परन्तु…।

दूसरा पुत्र - परन्तु क्या तात् ! हमें आपके अभिप्राय से भली प्रकार अवगत कराएं।

राजा - हे पुत्रों ! मेरा मात्र बस इतना ही कहना है कि मात्र शब्द द्वारा अथवा निर्ग्रन्थ वेष द्वारा ही इस पद की शोभा नहीं, मुनिपद की शोभा तो आतरिक बल एवं शुद्ध परिणति से है और जो बल और परिणति आपकी सुकुमार देह देखकर प्रतीत नहीं होती कि आप इतनी अल्प वय में इस लोकोत्तम पद का निर्वाह कर पाओगे… और यह कार्य न होने से लोक में जिन मुनि का हास्य होगा एवं पवित्र जिनपुत्र कलंकित होगा। अतः हे कुमारो ! तुम अवश्य विचार करो और अपना यह हठ त्याग दो।

दूसरा पुत्र - हे तात् ! आपका यह कहना सर्वथा ही उचित है परन्तु हम कुमार यह कदापि नहीं होने देंगे, हम पवित्र जिनधर्म की कीर्ति को कदापि मलिन नहीं होने देंगे, आप श्री हमारे पौरुष पर निर्भिन्त ही विश्वास करें।

दूसरा पुत्र - हां तात् ! अग्रज ठीक कहते हैं। हम सबको उस बल की दरकार है जिस बल को पाकर आप इस भव से पार होना चाहते हैं।

तीसरा पुत्र- हे पिताजी! मेरा आपसे कुछ कहना तो ऐसा है जैसे सूर्य को दीपक दिखाना फिर भी आत्म संतोष के लिए कुछ कहना चाहता हूं…।यदि आप आज्ञा दें तो।

पिता- हां पुत्र तुम अपने विचार निःसंकोच प्रस्तुत करो…

पुत्र- हे पिताजी! मेरा वश आपसे कहना इतना ही है कि इस पवित्र जिनमार्ग में शारीरिक बल की नहीं।अपितु आतरिक बल ही चाहिए और वह आतरिक बल हम कुमारो मे निर्भित ही विद्यमान है।

पिता- हे कुमारो! आपने जो अनेको तर्क दिये वे सब निश्चित ही प्रशंसनीय है परन्तु तुम्हारे इस कोमल शरीर को देखकर मेरा मन तुम्हें वन गमन की स्वीकृति नहीं दे सकता।

पुत्र - हे तात! हम इन 10 दिशाओं में विचरण करने वाले देवगण,पक्षीगण और इस सभा में विराजमान सामंत हो नहीं अपितु परम परमात्मा अरिहंत,सिद्ध की साक्षी में आपको वचन देते हैं कि हम आपको निराश नहीं करेंगे।

पिता - हे पुत्रा! वर्ष के 12 मास की प्रतिकूलताएँ यह राजश्री अनुकूलताओं में वृद्धि को प्राप्त यह कौसल देह कैसे सहन करेगा।

पुत्र - पिताश्री कैसी प्रतिकूलता,कैसा उपसर्ग,कैसा परिषह,जहाँ आत्मा का तेज प्रकाशित होता है वहाँ सभी प्रतिकूलताएँ,उपसर्ग,परिषह त्रिलय को प्राप्त हो जाते हैं अथवा दिखाई ही नहीं देतीहैं तात!आप जैसे ज्ञानी पुरुष के अलावा अन्य कौन इस बात को भली प्रकार समझ सकता है।

पिता - प्रप्तं है पुत्र जब ज्येष्ठ मास में सूर्य की उष्मा से सरोवर का जल सूख जाता है एवं वर्षा ऋतु में भर्यंकर नाद करती हुई तेज बरसात से विशाल वट वृक्ष भी गिर जाता है तब यह कौसल देह क्या करेगी और जब शीत के सम्पूर्ण वन पाते से झुलस जाते हैं जहाँ बागरी का मद भी गल जाता है उस समय सरोवर किनारे धयान कैसे करोगे?..

पुत्र - पिताजी जब सूर्य की गर्मी से सरोवर का जल सूखेगा उस समय हम कृत्यची के समान इस देह को सुखाकर आत्मा रुपी बगीचे का सिंचन करेंगे और जब बारिस के वेग से विशाल वट वृक्ष गिरेंगे उस समय हम कर्मा रुपी शत्रुओं को गिरायेंगे एवं जब पारे से वन के वृक्ष एवं फल-फूल झुलसेंगे उस समय हम मोक्ष सुख के वाछक सुदवीर योद्दा समस्त संसार रुपी वन को जलाकर भष्म कर देंगे…।

पिताजी - हाँ पुत्रों, तुम्हारे उत्तरों को सुनकर मुझे संतोष है,अब तुम निर्भित होकर यौक्षमार्ग के लिए जा सकते हो ,यह भगवती जिन दीक्षा तुम्हारी प्रतीक्षा में आतुर है- जाओ पुत्र,हम तुम्हारे विचार की बहुत-बहुत अनुमोदना करते है

जाय तप के हेत वन को, भोग तज संजम धरे ।

तज प्रन्थ सब निग्रंथ हों, संसार सागर से तरे ।

ये ही हमारे मन बसी, तुम रहो धीरज धार के ।

कुल आपने की रीति चालो, राजनीति विचार के ।।

राजा - पुत्र पुण्डरीक!

पुत्र पुण्डरीक - जौं महाराज!

राजा - अब हम इस राज्य का भार तुम्हारे कंधो पर सौंप कर वन की ओर जा रहे हैं ।

पुत्र पुण्डरीक - महाराजमें इतनी सी उम्र में इतना बड़ा राज्य कैसे संभालूगा।

राजा - अरे पुत्रा! यह तो प्रत्येक राजकुमार का धर्म है कि जब राजा वैराग्य पथ की ओर अग्रेसर हो तब वह प्रजा का पुत्रवत पालन करे। पुत्र प्रजा का पुत्रवत पालन करना। और हमारी अंतिम शिक्षा यही है की शिष्य तुम भी इस मार्ग पर आना और मुक्ति का वरण करना…(2)।

(वज्रदन्त चक्रवर्ती बाकी पुत्रों के साथ वन की ओर)

भजन - ये मुनिवर कब मिली है उपगारी…

( संचालन )

पुत्र से पिता कहते हुए- इस प्रकार राज्य का भार अपने पोते पुण्डरीक को सौंप कर 1000 पुत्रों सहित वाज्रदन्त महाराज वन की ओर प्रस्तान करते है।

लेखक- अर्पित जैन(शास्त्री), भिंड

संशोधन कर्ता- पर्वुल राज जैन, माइबारा

•अविरल जैन, सागर

स्रोत · Source: forum.jinswara.com — अनुमति सहित, साभार · shared with permission and thanks.

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