श्री आदिनाथ जिनबिंब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव, सोनगढ़ (2024) हेतु तैयार मंचन-योग्य आध्यात्मिक जैन नाटिका ‘तत्क्षण योग्यता’ — श्री बाहुबली भगवान के अंतर्मंथन व बारह भावना के चिंतन पर आधारित मंचित लघु नाटिका। पूरे पात्र-संवाद व मंच-निर्देश सहित नीचे पूरी स्क्रिप्ट पढ़ें; पाठशाला व जैन सांस्कृतिक कार्यक्रम मंचन हेतु।
A ready-to-stage spiritual Jain natika ‘Tatkshan Yogyata’ (Songadh Panchkalyanak Pratishtha 2024) — the full script with characters, dialogue and stage directions is below.
नाटक: तत् क्षण योग्यता
श्री आदिनाथ जिनबिंब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा
महोत्सव, सोनगढ, २०२४
Title: तत् क्षण योग्यता
नाटिका परिचय
मंच संचालक: तो आइए अब श्री बाहुबली भगवान के जीवन की एक अनोखी क्षण की कथा सुनते हैं। वैसे तो श्री अदिपुराण आदि प्रथमानुयोग के ग्रंथों में श्री बाहुबली भगवान के जीवन के कुछ कथानक ही मिलते हैं। लेकिन लेखक ने यहां एक मनोरम कल्पना के माध्यम से, श्री बाहुबली भगवान के मन में चल रहे अंतर्मंथन को, उनके मन में चल रही बारह भावना के चिंतन को चित्रित किया है। इस नाटिका को अपने ज्ञानी धर्मदिता ओं के वचनामृत – १) पूज्य गुरुदेव श्री के वचनामृत, २) द्रष्टि ना निधान, ३) पूज्य बहेन श्री के वचनामृत और ४) द्रव्य दृष्टि प्रकाश के विविध बोलों के माध्यम से लिखा गया है।
नाटिका प्रारंभ
पार्श्व स्वर (Voice over):
ज्ञानी, ज्ञानी वे हैं जिन्हें स्व पर की एकल बुद्धि छूट गई है। ज्ञानानंद स्वभाव वह मैं हूं और राग मुझसे भीन्न चीज है वैसा वे जानते हैं। फिर भी उन्हें राग आता है, विकार भी होता है, परंतु ऐसा उन्हें स्व पर की एकल बुद्धि से नहीं होता और निमित्त के कारण से भी नहीं होता। राग तो होता है पर्यायमें अपने षटकारक की योग्यता से और परिणति की स्वतंत्रता से।
वैसी ही एक अनोखी अद्भुत अविस्मरणीय योग्यता की यह बात है।
श्री भरत चक्रवर्ति के साथ युद्ध के पश्चात और दीक्षा लेने से पूर्व श्री बाहुबली भगवान ने अद्भुत पुरुषार्थ जगाया था, 12 भावनाओं का चिंतन किया था ।
वह अनुपम क्षण जब श्री बाहुबलीजी विकारो से निर्विकारी होने की पगडंडी पर चल पड़े…
तो आइए देखते हैं नाटक ‘तत् क्षण योग्यता’
मंगलाचरण:
मंगलम सिद्ध परमेष्ठी, मंगलम तीर्थंकरम् ।
मंगलम शुद्ध चैतन्यं, आत्म धर्मोऽस्तु मंगलम् ॥
विषयाशावशातीतो निरारम्भोऽपरिग्रहः। ।
ज्ञान-ध्यान-तपोरक्तः तपस्वी स प्रशस्यते ॥
¹ श्री दसलक्षण धर्म विधान, कविवर पं. राजमलजी पवैया
² श्री रत्नकरंडक श्रावकाचार, गाथा १०
(३) द्रव्य?
कथावाचक: ॐ सहजचिदानंद! मैं तत समय की योग्यता हूँ। विभु के प्रत्येक द्रव्य अपनी पर्यायगत योग्यता से अपने समय में परिणमन करते हैं। कोई द्रव्य अन्य द्रव्य को परिणमित नहीं कर सकता, अरे द्रव्य स्वयं भी अपनी पर्याय में कुछ नहीं कर सकता। पर्याय स्वयं अपने षट् कारक से अपने समय में परिणमित होती है। मैं वह योग्यता हूँ जो इस परिणमन में कारणभूत हूँ। मैं कभी नहीं दिलने वाला वह खूटा हूँ जो अपने समय में अचलित रहता हूँ।⁴ और क्रमबद्ध स्वभावों हूँ। मुझे बदलने की क्षमता ईंद्र, नरेंद्र या जिनेंद्र में भी नहीं।
मेरे त्रिकाल प्रवाह में न कोई घटना अच्छी है और न बुरी। फिर भी कभी-कभी कोई विशेष पर्याय काल के प्रवाह में अमर हो जाती है। ऐसी ही एक अनोखी घटना तब हुई थी जब श्री बाहुबली भगवान ने भरत चक्रवर्ती को तीन युद्ध में पराजित किया और क्रोध आवेश में भरत चक्रवर्ती ने उन पर चक्र चला दिया।
(स्क्रीन पर भरत चक्रवर्ती ने बाहुबली पर चक्र चलाया ऐसा दृश्य)
श्री बाहुबलीजी सत्य हो गये और उनके लिए समय जैसे थम गया। मैं भी उस क्षण का स्वयं साक्षी हूँ। श्री बाहुबलीजी को संसार असार लगने लगा। उनका अंतर्मन उनको संसारी से सिद्ध, पामर से परमेश्वर, मानव से मुनि और कामदेव से केवली बनने के लिए प्रेरित करने लगा। एक ओर पुरुषार्थ की प्रेरणा थी और दूसरी ओर कर्मों की विडंबना …
बाहुबली: अरे… शिवकार है, शिवकार है यह असार संसार को शिवकार है। हाय हाय … इस पृथ्वी के राज्य के लिए भाई भरत ने मुझ पर चक्र चला दिया? है आदिप्रभु, क्या जीव इतना स्वार्थी होता है? मैंने भी तो सिर्फ अपने स्वाभिमान को पोषने के लिये भाई भरत को युद्ध में चुनौति दे दी। हे प्रभु! मेरा अंतर्मन दुःख से द्रवित हो उठा है। हे मेरे अंतर्मन, काश तुम कहीं से इस दुःख से समाधान करने का मार्ग ढ़ूंढ़ लाते। काश..
अंतर्मन: काश … काश, इस दुख से समाधान करने के लिए मैं सक्षम होता.
बाहुबली: अरे …तुम कौन हो?
अंतर्मन: हे महापराक्रमी बाहुबली. मैं आपका ही अंतर्मन हूँ। मुझे कहीं चैन नहीं पड़ रहा है। क्या यही संसार का स्वरूप है? मेरे इस भौतिक शारीरिक संबंधों में कब तक दुःख भोगूंगा? कब तक?
बाहुबली: हे अंतर्मन इस दुःख से कैसे निकले?
अंतर्मन: इस संसार की मायाजाल से मैं भी थक गया हूँ। अब तो केवल वैराग्य को उत्पन्न करनेवाली बारह भावनाओं का चिंतवन ही मुझे सुहा रहा है। बार-बार निज स्वरूप का, स्वभाव का या तत्त्व का चिंतवन करने से ही अपने वीतराग स्वरूप का दर्शन होगा.
³ गुरुदेवश्री के वचनामृत, बोल १
⁴ द्रव्य दृष्टि प्रकाश, बोल ४०
बाहुबली: हां! मैं तुम्हारी बात से सहमत हूँ।
अंतर्मन: चलो बाहुबली चलो आत्मभूमि की अनंत गुणों की गुफाओं में चलो, गुफाओं में चलो…
अशुवतमशरणमेकल्मन्य – संसारो – लोकमशुचितम्।
आसेव – संवर – निर्जर – धर्म – बोधीति चिन्तनीयम्॥
अंतर्मन: मैं बाहुबली का अंतर्मन। मुझे ज्ञात है की अनिस आदि बारह भावनाओं का निरंतर मंथन करने से कषाय रूपी अग्नि बुझ जाती है, राग गल जाता है और वैराग्य प्रज्वलित होता है। अज्ञान रूपी अंधकार विलीन होकर ज्ञान दीप प्रकाशित हो जाता है।
(२) द्रव्य?
अंतर्मन: अरे ये मेरे स्मरण में क्या आ रहा है ? लग रहा है कि ये मेरे पूर्व के सातवे भव की स्मृति है। हां! मैं जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह में वत्सकावती देश में था. वहां के राजा प्रतिबधर्न का सेनापति था.. यह हृष्य तो नजर के सामने जैसा अभी अभी हुआ हो ऐसा लग रहा है…हमने मुनिराज से आत्मबोधित संदेश सुना…और तब प्रतिबधर्न राजा ने मुझसे प्रथ्य किया।
(सातवां पूर्व भव)
राजा: सेनापतिजी, मुनिराज से अभी हमने सुना कै, ये जगत में सर्व प्रकार के संयोग अनित्य है, जैसा सभिका संयोगी शरीर, मरण काल आने पर जरूर ही छूटेगा, कोई भी संयोग नित्य नहीं है, आपका इस बारे में क्या मतव्य है?
सेनापति: महाराज, आत्मज्ञानी गुरुदेव ने फरमाया के यह संयोग रूपी संसार अनिस्य है… तो इसका अर्थ ये हुआ के नित्य जो वस्तु है वो तो मेरा आत्मा है।
नगर शेठ: हाँ सेनापतिजी! यह बात को न स्वीकारना ही संसार परिभ्रमण का कारण है।
सेनापति: तो चलो, जो हमारे आत्मा का स्वभाव है, वो सोचे बिना हमने अनंत दुख भोगे है, मगर अब हम सब अनित्य भावना को आत्म सात करने की, भावना भाये, आइये।
अंतर्मन: शरीर को अनित्यता कैसी है। यहां का आयुष्य पूर्ण होने के वक्त ये बात मेरे हृदय में वार कर गई, मगर ये भव तो पूरा हो ही गया।
कैसा है ये जीव… मृत्यु के समय भेदज्ञान किया, मगर फिर दुसरे भव में भावमरण करने चला गया। तत्क्षात के भव में मैं उत्तर कुरु भोग भूमि में आर्य हुआ
(छठा पूर्व भव)
आर्य-१: प्रणाम आर्य। बहुत सारे पुष्य के प्रताप से यहीं भोगभूमि में हमारा जन्म हुआ है।
⁵ वारसाणुवेक्खा, गाथा २
आर्या-२ - जन्म हुआ है? आपका यह तात्पर्य है कि पहले मैं कहीं था। और वहाँ से मेरी मृत्यु हो गई और यहाँ मेरा जन्म हो गया।
आर्या-३ - बंधु जन्म और मृत्यु तो शरीर के संयोग और वियोग की बात है। मगर आत्मा तो नित्य ही है, इसके लिए आप दुःखी ना हो।
आर्या-२ - अरे आर्या दुःखी क्यूँ हो रहे हो? देखो ये कल्पवृक्ष, ये सुंदर महल, ये यथा इच्छ भोग, और ये पत्य वर्षकों आयु।
आर्या-२ - पत्यवर्ष की आयु?? हे प्रभु… मैं ये असंख्य वर्षकों आयु में कैसे फँस गया।
आर्या-३ - बंधु क्या ये आयु नित्य है? नहीं ना… तो बीत ही जाएगी।
आर्या-२ - हाँ.. आपकी बात सत्य है.. शरीर की अनित्यता और आत्मा की नित्यता का क्या मेल?
आर्या-३ - हमें तो आत्माके नित्य स्वभावका स्वीकार करके, इस अनित्य अवस्थासे हृषि हटाके, अपने आत्मा का कल्याण करना चाहिए।
आर्या-२ - सत्य वचन आत्म प्रेमी, सत्य वचन
अंतर्मन - ऐसे आत्मा के नित्य स्वभाव का चिंतवन करते हुए अनित्य ऐसी भोग भूमि की आयु भी पूर्ण हुई. और संसार का चक्र फिरा और पुण्य के फल में अब मेरा प्रभा नामक विमान में प्रभाकर देव नाम से जन्म हुआ। और मुझे ज्ञात है कि मुझे समोशरण में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
(पाँचवा पूर्व भव)
प्रभाकर देव - ललितांग देव की जय हो।
ललितांग देव - आओ प्रभाकर देव, आओ। बड़े प्रसन्न लग रहे हो। कहाँ से आ रहे हो?
प्रभाकर देव - मैं अभी अभी तीर्थंकर परमात्मा के दर्शन करके और दिव्यध्वनी में आर्धर्मकारी बात सुन कर आ रहा हूँ।
ललितांग देव - अच्छा? हमें भी बताइए।
प्रभाकर देव - आप, आज से आठवें भवमें भरत क्षेत्र के प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ होने वाले है। और मैं उस भवमें आपका ही पुत्र बाहुबली बनकर मोक्ष प्राप्त करूँगा।
ललितांग देव - अहो! प्रभु के मुख से निकली हुई बात तो विधि का विधान है। इस नश्वर भोगों को त्याग करके मोक्ष प्राप्त करने के लिए मैं तत्पर हूँ।
प्रभाकर देव - किंतु… हे ललितांग देव, क्या यह ईद्र समान भोग, रोग रहित शरीर, अप्सराओं के समान देवांगनाएँ असीम पुरदव रत्न — क्या यह कोई भी नित्य नहीं है?
ललितांग देव - नहीं, सब अनित्य ही है। आयु पूर्ण होते ही इन सबका वियोग निश्चित है। परमार्थ से तो एक यह मेरा चैतन्य परमात्मा ही नित्य है। शाश्वत है। और ऐसे नित्यका चिंतन करना ही अनित्य भावना है ।
अंतर्मन - आयु के अंत समय की क्षण आने पर फूलों की माला भी करमाने लगी और सब वहीं का वहीं रह गया । हे अनित्य संसार…अनित्य संसार…
अब मैं फिर से मनुष्य पर्यांय पहुँच गया। लेकिन यह भव अन्य भव की तरह साधारण भव नहीं था। इस भवमें में राजा वज्रजंघ का अकंपन नामक सेनापति बना। …अरे मुझे क्या स्मरण आ रहा है! और यह कैसा विचलित करने वाला हस्य था।
(चौथा पूर्व भव)
दास - अकंपन सेनापति की जय हो। सेनापति, एक दुःखद समाचार है। राजन के कक्ष में रात को धूप जलाई थी उसके धूए से मूर्छित होकर निद्रा में ही राजा वज्रजंघ की मृत्यु हो गई। उनकी आयु पूर्ण हुई।
अकंपन सेनापति - क्या? ईद्र समान विभूति रखने वाले राजा वज्रजंघ का ऐसा अंत? हे प्रभु यह कैसी संसार की विचित्रता है। प्रजा तो राजा की शरण में रहती है, लेकिन मृत्यु के समय राजा स्वयं ही असरण हो गए? मेरा चैतन्य परमात्मा ही मुझे शरण है, बाकी सारा जगत असरण ही है।
अंतर्मन - इस संसारकों असरणता देखकर मैं तत्काल ही उत्कृष्ठ जिनेश्वरी दीक्षा धारण करने के उद्देश्य से जा पहुँचा श्री हृदधर्म आचार्य के समीप ।
अकंपन सेनापति - हे मुनिवर, कृपा करके मुझे इस असरण जगत से छुटने का उपाय बतादें।
श्री हृदधर्म आचार्य - जैसे मोती का पारखी सच्चे मोतियों को अलग कर लेता है, उसीप्रकार आत्मा को प्रज्ञा से ग्रहण करना । जो जाननेवाला है, जो देखनेवाला है सो मैं - इसप्रकार उपयोग सूक्ष्म कर के हे भव्य जीव आत्मा को और विभाव को पृथक करुँ ।
अकंपन सेनापति - प्रमाण वचन गुरुदेव।
अंतर्मन - निर्विकल्प ध्यान के पहले अनेक प्रकार का चिंतन घंटो तक चला था; मगर अब तो मुझे चिंतन भी भट्टी-सा लगने लगा था । चिंतन भी चिता है, आकुलता ही है?। पूर्णता के लक्ष से शुरूआत ही सच्ची शुरुआत है⁶। जब, मैने अवलम्बन अंदर चैतन्य परमात्मा का लिया, और उसमें ही उग्रता होनेपर निर्विकल्पता हो गई और मैं आत्मानंद में मग्न हो गया।
(सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति)
⁶ बहेनश्री के वचनामृत, बोल ९९७
⁷ द्रव्य दृष्टि प्रकाश, बोल १४४
⁸ गुरुदेवश्री के वचनामृत, बोल ६
⁹ द्रव्य दृष्टि प्रकाश, बोल १७८
अंतर्मन: अंतत: यह वह क्षणगत योग्यता थी जब मैने मेरे जीवनमें मंगल सुप्रभातरूप सम्यदर्शन प्राप्त किया; सम्यक रत्नय रूप संपदा को प्रकट कीया। अहो…सम्यदर्शन होने पर आत्मा के प्रदेश-प्रदेश में आनन्द का जन्म हो गया। असख्य प्रदेश आनन्द से उछल गये। सर्व गुणांश सो सम्यक्त्व। सम्यक्त्व में चोदह ब्रह्माण्ड के भाव आ गये।¹⁰ । “धन्य वह घडी, धन्य वह क्षण की योग्यता।”
मुनि दशामें उत्कृष्ठ आनंद का भोग करते करते समय कहां चला गया वह पता ही नहिं चला, और समाधि पूर्वक आयु पूर्ण हुई।
(तीसरा पूर्व भव)
अंतर्मन: अब मैं अर्थी ग्रळयेक में अहमिन्द्र हुआ। यह संसार दुखित भासित होने लगा। कहाँ मुनिदशाकी शोभामार आनंद की धारा… और कहां यहाँ चौथे गुणस्थानकी अल्प सुख रूप दशा। मगर ये सन को स्त्रीकारे बिना कोई उपाय नहीं था। तो त्रैवेयक में मैने चिरकाल तक अनिच्छनीय स्त्रीके भोगों को भोगते और तत्वचर्चा करने में अपना समय व्यतीत किया।
(दूसरा पूर्व भव)
तब संसार चक्र का चक्र फिरा और मैं फिरसे मनुष्य पर्याय में जा पहुँचा। वहाँ मैं श्री आदि प्रभुके तीसरे पूर्व भवमें वज्रनाभि चक्रवर्ती का भाई पीठ हुआ। और उस भवमें, भाई वज्रनाभि के साथ मैने भी दीक्षा प्राप्त की। उत्कृष्ठ आनंद भोगने का अवसर फिरसे मिला… मगर…यह सुखरूप दशा … यह भव तक ही सीमित रह गई।
(पहेला पूर्व भव)
यह क्षणिक सुखरूप दशा से जब जब मैं विचलित होता था तब तब शुभभाव तो होते थे… किंतु यह शुभ भावका फल ऐसा कठोर मिला के उसके बाद के भव में मैं स्वर्ग में ३३ सागर तक सर्वार्थसिद्धि रूपी जेल में कैद हो गया। वहाँ शुक्ल लेश्या और मंद कषायरूप परिणाममें निरंतर तत्वचर्चा की, लेकिन सुखकी अखंड धारा दूर दूर तक कहीं नहीं थी। मुनिदशा की अखंड धाराकी इच्छा में ही वो आयुष्य भी पूर्ण हुआ, और वहाँ से च्युत हो कर यह बाइबली के दुर्लभ मनुष्य भव को मैं प्राप्त हुआ हूँ।
प्रभु !!! प्रभु !!! एक बात बार बार मेरे अंत:स्थल में चल रही है.. की संसार!!! गतिओ के जनम मरण में थोडें ही है? वास्तवमें जीव की विकारी पर्याय ही संसार है, और सच्चा सुख तो अपने चैतन्य स्वरूप आत्मामें ही है। और यही तो संसार भावना है। बस अब बहुत हुआ… अन्य विचारों से…अन्य विकल्पों से बहुत हुआ.. बस बहुत हुआ…अलम अलम अलम
कथावाचक: इस तरह श्री बाहुबली भगवान के अंतर्मन ने उस क्षण में अग्निय, अशरण और संसार भावनाओं का चिंतन किया। वह सोच रहे हैं कि भव - भवांतरों में यह चैतन्य परमात्मा जीव अनेक प्रकार के संयोगों में
भी अकेला ही रहा है, और इन्द्रिय सुख - दु:ख अकेले ही भोगता रहा है। लेकिन जैसे स्वभाव से निर्मल स्फटिक में लाल-काले फूल के संयोग से रंग दिखते हैं तथापि वास्तव में स्फटिक रंग नहीं गया है, वैसे ही स्वभाव से निर्मल आत्मा में कौशमानादि दिखायी दे फिर भी वास्तव में आत्मद्रव्य उनसे भिन्न है । यहीं पर से एकत्व तोडने की और स्व से एकत्व जोडने की भावना श्री बाहुबली भगवान ने की¹¹।
(३) द्रव्य ३ – एकत्व भावना भक्ति – जीव तू है सब बात अकेला¹²
(४) द्रव्य ४
अंतर्मन : यह आत्मा अनंत काल से भवों भव में फिरता रहा है और थक चुका है; फिर भी यह अस्थिरता जन्म राग मेरे अंतरंग में क्यों चल रहे है? क्यों ये मुझे अपनी और आकर्षित कर रहे है? क्यों मेरी निमित आधीन दृष्टि छुटती नहीं है? मैं इनसे अन्य हूँ और अपने से अन्न्य हूँ ये बात क्यों मुझे आत्मसात नहीं हो रहीं है? ऐ मेरे वैराग्य भाव, मेरी सहायता करो… मेरे पुरुषार्थ को प्रेरित करो…मुझे अन्यत्व भावनाका स्वरूप स्वीकार करने में मदद करो… मदद करो…
वैराग्य: हे आत्मन, विषय के सभी पदार्थ अन्य-अन्य है; और यहां अन्यत्व भावना है। वह अन्यत्व का त्याग कर, अनंत गुणस्वरूप आत्मा, उसके एकरूप स्वरूप को दृष्टि में लेकर उसमें एकाग्रता का प्रयत्न करना वह ही पहले में पहेला शांति – सुख का मार्ग है।¹³
संयोग: अरे अरे अंतर्मन ठहरो। जरा मेरी भी तो बात सुनो।
अंतर्मन: तुम कौन हो?
संयोग: मैं आपके इस भव के संयोग हूँ। श्री बाहबली के पास मेरा पूर्ण वैभव प्रगट है। आप ऐसे कैसे पुण्यकर्मजनित इन संयोगों को ठुकरा सकते हो? इतनी सारी सुंदर सुंदर पत्नीयाँ। ऐसे आज्ञाकारी पुत्र, इतनी शुतुल्य अमाप संपत्ति। ये सब आपसे अन्य थोडें ना है? ये तो आपके अपने ही तो है।
अंतर्मन: हाँ आपकी बात सत्य तो लग रही है। मैं तो जीव हूँ, लेकिन इस भव में तो ये सारे संयोग मेरे ही है ना…
वैराग्य: अरे रे अंतर्मन सावधान… यह तो एषणी के मेले जैसा है। इकट्ठे हुए है वे सब अलग हो जायेंगे। आत्मा ही एक शाश्वत है, अन्य सब अशुध है, सो बिखर ही जाएंगे ।¹⁴ मनुष्य-जीवन में आत्मकल्याण कर लेना ही योग्य है।
संयोग: हे वैराग्य भाव … चलो एक बार आपकी बात मान भी लें… मगर भरत चक्रवर्ती इनके ही भाई हैं, शलाका पुरुष हैं, छह खंड को उन्होंने ही जीता है.. क्या यह बात गर्व करने योग्य नहीं है? क्या भरतजी इनसे अन्य है?
वैराग्य: अरे संयोग ! व्यर्थिक तर्क क्यों प्रतिपादित करता है ? समकिती चक्रवर्ती छह खण्ड को नहीं, अखण्ड को साधते हैं। जिनकी दृष्टि में ज्ञायक भाव की अखण्डता कभी नहीं छूटती वह तो अखण्ड को ही साधें न।¹⁵
अंतर्मन: वैराग्य, यह तो विदित सत्य है, और मैं इसे स्वीकार करता हूँ। मगर एक विचार तुम भी तो करो के मेरे बाहु के बल के सामने तो चक्रवर्ती भाई भी नहीं ठीक सके। मेरे यह शरीर के संहनन के सामने वो भी नत मस्तक हो गये।
शरीर: बिलकुल सही कहा। मेरा संहनन अतुल्य है। मेरा संहनन अतुल्य है। मेरे यह शरीर के संहननके सामने वो चक्रवर्ती भाई भी नत मस्तक हो गये। छह खंड को जीतने वाले मुझसे तीन मामूली युद्धमें हार गए। मेरी क्षमता तो अतुल्यही है।
अंतर्मन: कौन हो तुम?
शरीर: मैं बाहुबली का शरीर हूँ।
वैराग्य: हे शरीर तू तेरा कार्य करता है… आत्मा आत्मा का। शरीर और आत्मा दोनों भिन्न स्वतंत्र है। (अंतर्मनकी ओर देखकर) अंतर्मन: तू तो अपने को चैतन्य स्वभावी आत्मा ही मानता है, मिथ्यात्व भाव तो नहिं करता। फिर क्यों यह शरीर में आसक्ति करता है। देहके लिये अनंत भव व्यतीत किए… पर अब यह जीवन आत्मा के लिये अर्पित कर।¹⁶
संयोग: अरे अंतर्मन मेरी एक बात सुनो। बाकी सब बात एक तरफ। आप के पिता यह भरतक्षेत्र के अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर है। तो क्या यह तीर्थंकर प्रकृति और दिव्यधुनि अद्भुत संयोग नहीं है?
वैराग्य: संयोग संयोग … क्यों तुम अंतर्मन के लिए असमंजस खड़ी कर रहे हो। तुम्हें पता है, जो भाव से तीर्थंकर गोत्र बंधता है वो भाव भी नुकसान का ही कारण हैं।¹⁷ (अंतर्मन को देख के) - अरे भव्य, तीर्थंकर का योग मिला ऐसे उसमें लाभ मानता है, तो कैसे छोड़ेगा? ऐसे भाव से नुकसान ही है, लाभ नहीं।¹⁸
अंतर्मन: हां … अनंत काल से जीव को स्व से एकत्व और पर से अन्यत्व की बात रुची ही नहीं। पर से एकत्वबुद्धि तोड़कर भिन्न तत्त्व को – अबद्धस्पृष्ट, अनन्य, नियत, अविशेष एवं असंयुक्त देखें तो ही आत्मा का अनुभव कर सकता है।¹⁹
¹⁵ द्रव्य दृष्टि प्रकाश, बोल २७८
¹⁶ बहेनश्री के वचनामृत, बोल ५२
¹⁷ द्रव्य दृष्टि प्रकाश, बोल ४७
¹⁸ द्रव्य दृष्टि प्रकाश, बोल ६२
¹⁹ बहेनश्री के वचनामृत, बोल ७७७
शरीर: मेरे अधिष्ठाता जीव, रुको रुको; मेरी बात भी तो सुनो। आप कोई ऐसे वैसे व्यक्ति थोड़ी हो, आप तो साक्षात कामदेव हो। आपका सौंदर्य अतुल्य है। आपका सुवर्ण रंग मनमोहित करने वाला है। आप तो पुष्पबाण ऋद्धि के धारक हो। आपको संपूर्ण भरतक्षेत्र में कौन नहीं पहचानता?
वैराग्य: अरे! फल बाग में हो या जंगल में, उसे कोई संचे या न संचे, उसकी कीमत तो स्वयं से है; कोई संचे, तो उसकी कीमत बढ़ नहीं जाती, अथवा नहीं संचे, तो वह मरझा नहीं जाता। इसी तरह कोई अपने को जाने या न जाने उससे अपना मूल्य थोड़ा ही है? अपना मूल्य तो अपने से ही है।²⁰ हे भव्य ! तू शरीर को न देख । राग को न देख। यह सभी तो अशुद्धि से भरे हुए है। अरे…एक समय की पर्याय को न देख। तेरे पास पूर्णानन्द प्रभु स्थित है, उसे देख।²¹
शरीर: हे अंतर्मन तुम्हें ज्ञात है यह समग्र भरतक्षेत्रमें बाहुबली की देह सबसे उँच ५२५ धनुष की है, जब की भरत चक्रवर्ती जैसे महान जीवों की अवगाहना भी केवल ५०० धनुष ही है। तो क्या यह शरीर कि विशेषता प्रत्यक्ष दर्शित नहीं है?
वैराग्य: हे शरीर अब अपनी बड़ाई करना बस कर। क्या तुझे ज्ञात है के तुम्हारे अंदर पाँच करोड़ अड्सठ लाख निन्यानवें हजार पाँच सौ चौरासी रोग रहे हुए है। देह तो रोग की मूर्ति है। भगवान आत्मा आनन्द की मूर्ति है।²²
वैराग्य: अरे अंतर्मन बहार के अनिस संयोग और अशुद्धि से भरे हुए शरीर पर तुझे राग आता है? संयोगी या शरीर – दोनों पर है। स्वयं अशुद्धि है, इसलिए धर्म नहिं। इनसे तेथा इनके राग से भिन्न होने पर ही भीतर आत्मा में प्रवेश होता है। ऐसा ही वस्तु का स्वरूप है।²³ उस वस्तु स्वरूप में समा जाओ… समा जाओ…समा जाओ…!
अंतर्मन: अपने पूर्व भव के स्मरण और वैराग्य भाव से मेरे परिणाम भी विभाव से विमुख होकर स्वरूप की ओर बढ़ना चाहते हैं। कहाँ मैं भाई भरत के चक्र चलाने से उद्वेग कर रहा था, और कहाँ अपने स्वरूप में स्थिर होने के शांत परिणाम। पर्यायदृष्टि का फल संसार है, और द्रव्यदृष्टि का फल वीतरागता-मोक्ष है।²⁴ यह विभावभाव हमारा देश नहीं है। इस परदेश में हम कहाँ आ पहुँचे ? हमें यहाँ अच्छा नहीं लगना। जहां ज्ञान, श्रद्धा, चारित्र, आनन्द, वीर्यादि अनंतगुणरूप हमारा परिवार बसता है वह हमारा स्वदेश है। हमें भी उस स्वरूपस्वदेश की ओर जाना है। हमें त्वरासे अपने मूल वतनमें जाकर आरामसे बसना है जहाँ सब हमारे हैं।²⁵
हे वैराग्य, अभी भी मैं तो युद्ध भूमी में खड़ा है। मुझे ये द्वंद्व चल रहा है। वैराग्य से मेदबान की धारा तो चली, मेरी निज परिणति क्यूँ पुन: शुभ भाव के सम्मुख हो रही है? आख़िर भाव में प्रवृत हो रही है ?
²⁰ द्रव्य दृष्टि प्रकाश, बोल १७२
²¹ दृष्टि ना निधान, बोल ६
²² दृष्टि ना निधान, बोल १९९
²³ गुरुदेवश्री के वचनामृत, बोल २०५
²⁴ गुरुदेवश्री के वचनामृत, बोल १५
²⁵ बहेनश्री के वचनामृत, बोल ४७१
वैराग्य: वैराग्य भाव से इसका समाधान करने से ही आस्रव भावना साधेक होगी। वस्तु स्वरूप का विचार करना ही आत्मानुभूति का एकमात्र उपाय है. इसलिए ज्ञानी जीव निरंतर भेदविज्ञान की भावना और विचार करते हैं. यह स्त्री, पुत्र इत्यादि तो मुझसे प्रत्यक्ष भिन्न हैं और शरीर तो मेरा स्वरूप है ही नहीं. यह अचेतन है और मैं तो चेतन हूँ. पाँच इंद्रियों के विषयों की अग्नि में जलते हुए मेरा मनुष्यभव व्यर्थ जा रहा है।
(५) द्रव्य ५
अंतर्मन: हे वैराग्य! आत्मा आराधनाके ये परिणाम अंदर में जमते नहीं हैं, बाहर क्यों दौड़ते हैं ?
वैराग्य: जैसे बङ्ङई को बाँधें नहीं, तो बाहर चरने लगता है; यदि खूँटे में बाँध दे, तो फिरा तो करे, परंतु वहाँ से बाहर नहीं जा सकता है। ऐसे ध्रुव में पर्यायं को बाँध दे, तो पर्याय ध्रुव में ही फिरा करेंगी, बाहर नहीं जाएगीं; फिराना तो उसका स्वभाव है, लेकिन ध्रुव-खूँटे में ही फिरेगी तो सुख तो मिलता ही रहेगा।26
अंतर्मन: आस्रव को रोकने के लिए और सुख की प्राप्ति के लिए द्रव्य और पर्याय भित्र ही है ऐसा अनुभव निरंतर कैसे रहे?
वैराग्य: सूक्ष्म उपयोग करके स्वभाव-विभावके बीच प्रज्ञाछौनी द्वारा भेद कर। जिस क्षण विभावभाव वर्तता है उसी समय ज्ञानधारा से स्वभाव को भित्र जान ।
अंतर्मन: मगर मैं तो…
वैराग्य: बस अब अगर मगर में मत अटक, आत्मा पवित्रता से भरपूर है, उसके अन्दर उपयोग लगा । आत्मा के गुणों में सरोबार हो जा।27 आस्रव भाव का सर्वथा त्याग कर और आस्रव भावना को आत्मसात कर।
(भक्ति – ज्ञानी जीव नीवार भरमतम्28, प्रथम अंतरा)
अंतर्मन: अरे रे ! मैं तीन लोक का नाथ होंकर राग के आस्रव में रूक गया था। राग में तो दुःख की ज्वाला सुलगती थी, वहाँ से टष्टि छोड़ दी । और जहाँ सुख का सागर भरा है, वहाँ टष्टि जोड़ दी।29 तो संवर भावना प्राप्त हुई।
मेरे आत्मा के प्रदेश-प्रदेश में आनन्द का जन्म हो गया है। असंख्य प्रदेश आनन्द से उछल रहे हैं। आहाहा। पूरी दुनिया विस्मृत हो जाये, ऐसा मेरा परमात्मतत्त्व है। शुद्धौं, बुद्धौं, निर्विकल्पौं, चिद्रूपौं।
मेरी संवर भावना अब मुझे निर्जरा भावना की ओर अंगुली निर्देश कर रही है… मैं उसी मार्ग पर आगे बढ़ रहा हूँ आगे बढ़ रहा हूँ… । मुझे प्रत्यक्ष दिख रहा है की मेरे ज्ञान में जैसे-जैसे समझ द्वारा भावपासन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ज्ञान का सामग्र्य भी बढ़ रहा है और देखो यह ज्ञान भी जहाँ सम्यक् रूप परिणामा, वहाँ मोह
26 द्रव्य दष्टि प्रकाश, बोल १४५
27 बहेनश्री के वचनामृत, बोल १०९
28 भक्ति – ज्ञानी जीव नीवार भरमतम्, पं. दौलतरामजी
29 दृष्टि ना निधान, बोल ११
समूल नाश हो रहा है। ज्ञान के अतिरिक्त कोई दूसरा आत्मसिद्धि का साधन ही नहीं है। इसलिए ज्ञान से ही आत्मा की सिद्धि यह निर्जरा भावना है।30
(भक्ति – ज्ञानी जीव नीवार भरमतम्31, दूसरा अंतरा)
(६) द्रव्य ६
कथावाचक: मैने यह अद्भुत नजारा अपनी स्वर्य की आँखों से देखा था। जिस प्रकार नन्दनवन में अनेक वृक्षों के विविध प्रकार के पत्र-पुष्प-फलादि खिल उठते हैं, उसी प्रकार संवर और निर्जरा भावना से साधक आत्मा के चैतन्यरूपी नन्दनवन में अनेक गुणों की विविध प्रकार की पर्यायें खिल उठती हैं ।32 चैतन्य की स्वानुभूतिरूप खिले हुए नन्दनवन में साधक आत्मा आनन्दमय विहार करता है। बाहर आने पर कही रस नहीं आता ।33 मगर फिर भी, पूर्णता अभी हुई नहीं इसलिए भूतकाल में जहाँ परिभ्रमण किए ऐसे लोक भावना का विल्दन बाइबली भगवान ने किया।
अंतर्मन: षट् द्रव्यमई इस लोकमें आत्मा ही सार है। नर, नरक, स्वर्ग, तिर्यंच इन गतिओं में परिभ्रमण ही संसार है।
बालक: ये चार गतियों की बात तो बहुत स्थूल है।
बालक: यहाँ तो ध्रुवमें अपनापन करने की बात है।34
बालक: सब कुछ आत्मा में है, बाहर कुछ नहीं है ।
बालक: अगर कुछ भी जानने की इच्छा होती हो तो अपने आत्मा की साधना करनी होगी।
बालक: पूर्णता प्राप्त होनेपर. केवलज्ञान होने पर लोकालोक उससे त्रैयरूपसे ज्ञात हो जाएंगे ।35 इस तरह लोक भावना साधेक होगी।
अंतर्मन: मैं एक चैतन्य को ही ग्रहण करूँगा। सर्व विभावों से परिमुक्त होता हुआ अत्यन्त निर्मल निज परमात्मतत्व को ही ग्रहण करूंगा, उसीमें ही तीन होने की अभ्यर्थना रखता हूँ, मेरी पर्याय से लक्ष हटाके, एक परमाणु मात्र की भी आसक्ति छोड़के में अब मोक्ष मार्ग में आगे बढ़ने का निर्णय करता हूँ ।36
(७) द्रव्य ७
बालक: चैतन्य का ग्रहण करो।
बालक: चैतन्य का ग्रहण ही रत्नत्रय है, बोधि है।
30 दष्टि ना निधान, बोल ६८
31 भक्ति – ज्ञानी जीव नीवार भरमतम्, पं. दौलतरामजी
32 बहेनश्री के वचनामृत, बोल १७५
33 बहेनश्री के वचनामृत, बोल १७७
34 द्रव्य दष्टि प्रकाश, बोल ११६
35 बहेनश्री के वचनामृत, बोल ७०
36 बहेनश्री के वचनामृत, बोल १७०
बालक: यह रत्नत्रय प्रगट करना ही अति दुर्लभ है।
बालक: अनादि से प्रगट नहि किया, इस लिए बोधिदुर्लभ है।
बालक: लेकिन अपने ही स्वभाव को प्राप्त करना है और उसमें किसी की आवश्यकता नहिं इसलिए सुलभ भी है।
अंतर्मन: एक ऐसी भावना है जो …मुझे स्वरूप की लीला जहाँ जारंतर है वहाँ ले जाये। मैं मुनि वेश धारण कर चैतन्य के बाग में ही कीड़ा करते-करते कर्म के फल का नाश करूँ। बाहर में जो आसक्ति है उसे तोड़कर स्वरूप में लीन हो जाऊं। स्वरूप ही मेरा आसन, स्वरूप ही मेरी निद्रा, स्वरूप ही मेरा आहार हो।३७
धन्य वह निर्ग्रंथ मुनीदशा। मुनिदशा अर्थात् केवलज्ञान की तलहटी। मुझे तब अंतर में सिर्फ चैतन्य के अनंत गुण- पर्यायों का परिग्रह होगा; विभाव बहुत छूट गया होगा। बाहर में देहमात्र परिग्रह होगा। प्रतिबंधरहित सहज दशा होगी।३८
मैं भी अखण्ड द्रव्य को ग्रहण कर के प्रमत्त- अप्रमत्त स्थितिमें स्वरूप में निरंतर जागृत ही रहूँगा।३९
मैं स्वरूप में ही लीला करूँगा, मैं स्वरूप में ही विचरण करूँगा। और सम्पूर्ण श्रमण्य प्रगट करके मैं लीलामात्र में शेणी मोड़कर केवलज्ञान प्रगट करूँगा।४०
वहाँ, भावनाओं की पूर्णता के फल में अनंत चतुष्ट्य रूप अपनी गुणसत्ता का अनुभवन होगा निर्विकल्प रूप प्रत्यक्ष रूप स्वसंवेदन होगा। मैं अद्भुत ऐसी धर्म भावना का उदघोष करूँगा।।
मगर मैं वहाँ अरिहंत दशा में नहीं रुकूंगा। सिद्ध नगर में अनन्त सिद्ध विराजते हैं। उन्होंने पहले बाहर से नज़र समेटकर अन्दर का विस्तार किया था। मैं भी वहीं करूँगा। मैं तो पूर्ण अघेद परमात्मा ही हूँ, मुझ में और परमात्मा में कुछ अन्तर नहीं है।४१ मैं भी गुणस्थानातीत होकर मार्गणा स्थानातीत होकर लोकके अग्रभागमें जहाँ अनंत सिद्ध विराजते है ऐसे सिद्धलोकमें समयांतरमें पहुँच जाऊंगा।।
(८) द्रव्य८
कथावाचक: चैतन्य को चैतन्यमें से परिणमित भावना अर्थात् राग-द्वेषमें से उत्पन्न हुई भावना–ऐसी रायार्थे भावना ही तो वह भावना फलती ही है। यदि नहीं फले तो चौदह ब्रह्माण्ड को शून्य होना पड़े अथवा तो इस द्रव्य का नाश हो जाय। परन्तु ऐसा होता ही नहीं। चैतन्य के परिणाम के साथ कुदरत बँधी हुई है - ऐसा ही वस्तुका स्वभाव है।४२
३७ बहेनश्री के वचनामृत, बोल ७८
३८ बहेनश्री के वचनामृत, बोल ७९
३९ बहेनश्री के वचनामृत, बोल ७२
४० बहेनश्री के वचनामृत, बोल ७८
४१ दृष्टि ना निधान, बोल २४
४२ बहेनश्री के वचनामृत, बोल २१
अरे यह बात करते हुए तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते है। क्या अद्भुत मेरा सौभाग्य है। मैं इतिहास का एक ऐसा अवसर हूँ जहाँ एक ही समय में आत्मा का स्पंदन चला, बाह्मबली के अंतर्मन का मंथन चला, वैराग्य का घोलन चला और बारह भावना का अनुभवन भी चला। आखिर वह क्षण आ ही गई जिसने वैराग्य भावना का इतिहास रच दिया। मेरा अंत एक नया सवेरा लेके आया और तब…श्री बाहुबली ने फरमाया…
बाहुबली: हे भाताश्री मेरे यह दंडनिय अपराध को क्षमा करें। मुझे मेरे भाई की ओर ऐसा द्रोह नहीं करना चाहिए था बड़े भाई का विरोध करके मैने यह लोकापवाद खड़ा किया है।
भरत: अरे भाई आपका कोई अपराध नहीं। मैं ही क्रोधावेश में अपने होश खो बैठा था। आपकी कोई भी वृत्ति से मुझे असंतोष नहीं है।
बाहुबली: नहीं भाई, मैने युद्ध के रंग मे आपके तरफ विरोध दिखाने की क्षुद्रता की है। क्षणभंगुर कर्म के वशीभूत हो कर में ये कैसे निंदनीय परिणाम कर बेठा।
भरत: नहिं भाई इस में आपकी कोई गलती नहीं है। हुड़ा-अवसर्पिणी काल के कारण मेरी ऐसी हार होगी, ऐसा मुझे श्री आदि प्रभु ने पहले से बताया था।
बाहुबली: कालदोष से हुई यह घटना मेरे निमित्त से प्रगट हुई। यह बात मुझे खटक रही है।भाई मेरी परिणती इस संसार से विरक्त हुई है। अभी अभी मैने वैराग्य की जननी बारह भावनाओं का चिंतवन किया है। अब मैं कैलाश जाकर इस संसार का छेद करनेवाली जैनेश्वरी दीक्षा लेना चाहता हूँ, आप मेरी यह प्रार्धना का स्वीकार करे।
भरत: अरे नहीं नहीं तुम इसके अलावा कुछ भी मांगो मैं यह प्रार्थना स्वीकार नहीं कर सकता। आपके बिना यह संसार बहुत अधूरा है, बाकी भाई भी तो दीक्षा लेके चले गए… और अब तुम भी…दीक्षा लेना चाहते हो?
बाहुबली: बड़े भैया, मैं दीक्षा लेकर मोक्ष मंदिर में आपकी प्रतीक्षा करूँगा। अब संसार सुख की लालसा मेरे चित्त में रही नहीं। जिस देह ने युद्ध भूमि में आप के विरुद्ध खड़े रहने में साथ दिया, उसी देह का ममत्व त्याग कर मैं अखंड साधना करूँगा। मुझे तो अब आत्मा ही शरणरूप है। अरहन्त अर्थात् वीतरागी पर्याय, सिद्ध अर्थात् वीतरागी पर्याय, आचार्य, उपाध्याय और साधु अर्थात् वीतरागी पर्याय–यह सब वीतरागी पर्यायें मेरे आत्मा में ही पड़ी हुई है। ४३
भाताश्री, मुक्ति के लिए हमेशा योग नहीं बनता, मगर जब बनता है तब आत्मासाधन कर ही लेनी चाहिए। इस लिये आप अब मुझे दीक्षा लेने की आज्ञा दे…
भरत: भाई उठो … जाओ मुक्ति पथ पे आगे बढ़ो। ध्रुव के थाम की धधकती धूनी धगझसे धखा और धन्य हो जाओ।
वीतरागी जैन धर्म की जय हो!!!
विराजित होनेवाले बाहुबली मुनिंद्र भगवान की जय हो!!!
४३ दृष्टि ना निधान, बोल ६०
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