भगवान मुनिसुव्रतनाथ के काल की घटना — धोबी-धोबिन प्रसंग से उठे लोकापवाद, श्रीराम का दरबार, सीता का वन में परित्याग, सेनापति कृतांतवक्र को दिया सीता का संदेश (“लोगों के बहकाये तुम धर्म न तज देना”) और लव-कुश की न्याय-गुहार — पूरा संवाद, पात्र, दृश्य व मंच-निर्देश (Light off / Entry / Song) सहित मंचन योग्य नाटक। सती सीता के शील, धर्म-निष्ठा व क्षमा का प्रेरक संदेश, पाठशाला व दस लक्षण/सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु।
Sita Ka Sandesh — a ready-to-stage Jain drama (Jain Ramayan tradition): the washerman episode, Shri Ram’s court, Sita’s exile and her message to the commander, and Lav-Kush pleading for justice. Full script with characters, dialogues, songs and stage cues; ideal for pathshala and Dashlakshan cultural programs.
सूत्रधार(संवेग): तो आइए हम ले चलते है आपको भगवान मुनिसुवत्रनाथ के काल में जहाँ एक ऐसी घटना घटित हुई। जहाँ एक सती ने सारे जगत को एक ऐसा संदेश दिया जिसने मनुष्य को ही नहीं , तिर्यंच को ही नहीं अपितु सारी प्रकृति को झकझोर कर रख दिया| तो आइए हम देखते है एक ऐसा संदेश जो महा सती सीता दे रही हैं| प्रस्तुत है आप सभी के समक्ष सीता का संदेश|
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Dance(मंगलाचरण)
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अनुष: सावधान! अयोध्या नरेश,वचन पारायण,मर्यादा पुरुषोत्तम,सकल प्राणियों के नाथ ,महाराजा श्रीराम सभा में पधार रहे हैं!!!
Raja Entry(beat)
अनुष: मर्यादा पुरुषोत्तम महाराजा श्रीराम की…
सभी: जय हो!!!
द्वारपाल(अतिशय): अयोध्या नरेश की…
सभी: जय हो!!!
राम(नित्य): बैठिए मंत्रीवर्ग बैठिए!! अरे मंत्रिवर राज्य में चारों ओर खुशहाली का माहौल छाया हुआ है कि नहीं|
मंत्री(अंश): प्रणाम महाराज! आपकी कृपा से संपूर्ण अयोध्या नगरी धन-धान्य से सुशोभित है|ओर चारों तरफ खुशहाली का वातावरण है महाराज|
राम(नित्य): अति उत्तम,अति उत्तम अरे मंत्रिवर! राज्य में कोई धर्मात्मा संकट में तो नहीं है|
मंत्री(अक्षत): नहीं महाराज! आपकी कृपा से तो पूरी नगरी के धर्मायतनो में मंगल गान हो रहे है एवं कहीं ऋषि मुनियों का आहार तो कही उनका मंगल उपदेश हो रहा है|
राम(नित्य): अति उत्तम,अति उत्तम …….. अरे! आज राज्य चर्चा में इतने व्यस्त हो गए कि मुनियों की आहार बेला का पता ही नहीं चला| चलो मंत्रीवर्ग सर्वप्रथम मुनियों के द्वारप्रेक्षण की तैयारी की जाए|
द्वारपाल(अतिशय): अयोध्या नरेश की जय हो | ×3
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गाँव का दृश्य
अर्जव(मालनपुर): और भाईसाहब! जा बार तो गाँव में बहुत बड़िया खेती हुई है|
अर्हम(केसली): hmmm! हां ताऊ! इस बार तो नगर में कोई भी व्यक्ति भूखे पेट नहीं सोया| मुझे ही देखलो| यह सब तो महाराजा राम का प्रताप है|
वैदिक: कहे का पुण्य प्रताप
Entry(हार्दिक)
अंकित: देखो देखो कल्लू धोभी आ गया
सभी: हां हां यही है वो(× 3)
अर्जव(अमायन): अरे! ये तो वही है जिसने दूसरे पुरुष के घर रहकर आई अपनी धोबिन को स्वीकार कर लिया|
सभी: हां हां यही है वो(× 3)
रुशिल: चलो चलो जाके घर चले|
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हार्दिक(घूमते हुए): आज में उस नासकीमिटी को बताता हुँ| उसने मेरी पूरी इज्ज़त मिट्टी में मिला दी| आज तो में उसे घर से ही बाहर निकल दूंगा
अरे! कुलकलंकिनी थोड़ी बहुत तो मेरी इज्ज़त रखती|तूने तो मेरी पूरी इज्ज़त मिट्टी में मिला दी|
आयुष: है स्वामी! आप ये क्या खे रहे हैं? क्या कर दिया है मैंने|
हार्दिक: मेरी तो गलती हो गई कि मैंने तुझे पर पुरुष के यहां रहने के बाद भी स्वीकार कर लिया|
आयुष: नहीं नहीं स्व…
हार्दिक: चुप रहे तू|
आयुष: आपके द्वारा मुझ पर लगाए हुए सारे दोष मिथ्या हैं| रही बात पर पुरुष के यहां उस दिन रहने की तो उसमें मेरी एक नजीर हैं| अयोध्या नरेश श्रीराम की पटरानी,जनक नंदिनी सीता भी तो 6 मास तक रावण के घर रह कर आई हैं| पर राम ने उन्हें स्वीकार कर लिया,उनका बहिष्कार नहीं किया| तो आप मेरा बहिष्कार कैसे कर सकते हो|
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राज्य दरबार
सूत्रधार: इस प्रकार धोबिन द्वारा नजीर सुनकर धोभी स्तब्ध रह गया और धोभी-धोबिन के मन में बैठी हुई कल्पित कल्पनाओं ने अपना घर बना लिया और धोभी यह बात सीधे जाकर राजा राम के समक्ष जाकर बताता है| इस पर राजा राम की प्रतिक्रिया होती है| चलिए देखते है|
प्रस्तुत है आप सब के समक्ष राजा राम का दरबार…|
अर्जव(अमायन): चलो चलो आज तो इसकी खबर लेके रहेंगे| हमें महाराज से मिलने जाना है|
सभी: हां हां चलो चलो|
द्वारपाल(अतिशय): रुको! बिना अनुमति महल में प्रवेश निषेध हैं|
द्वारपाल(अतिशय): प्रणाम महाराज! आपसे मिलने के लिए कुछ लोग व्याकुल हो रहे हैं|वह सभी आपसे जल्दी ही मिलना चाहते है|
राम(नित्य): उनको अंदर आने दो|
द्वारपाल(अतिशय): आप लोग अंदर जा सकते है|
हार्दिक: प्रणाम महाराज!
राम(नित्य): कहो! क्या हुआ
हार्दिक: मुझे गरीब को न्याय चाहिए|
आयुष: हां हां महाराज मुझे भी न्याय चाहिए|
राम(नित्य): क्या हुआ??
अंकित: हे राजन! आपको मेरा प्रणाम| महाराज आपके राज्य में दुष्प्रवर्ती चल रही है तात्पर्य यह है कि कोई भी स्त्री पर घर रहकर आए और उसका पति उससे स्वीकार कर लेता है महाराज|
राम(नित्य): हमारे राज्य में यह कदापि मान्य नहीं है|
अंकित: लेकिन ऐसा ही है महाराज|
हार्दिक: क्षमा करे महाराज लेकिन आपकी पत्नी भी तो…
राम(नित्य): रुको। ज्येष्ठ मंत्री शीघ्र ही सेनापति कृतांतवक्र को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया जाए|इसके आगे हमें और कुछ नहीं सुनना है|
हमें एकांत चाहिए, एकांत चाहिए, एकांत चाहिए
विराज: जी महाराज
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Background(mahal ka room)
सूत्रधार(संवेग): अब हम देखते है राम के मन का अतंरद्वंद|
बुरा मन(अविरल): हे राम! तुम तीन लोक में हास्य के पात्र बनोगे| पर घर रही नारी को तुम अपने पास कैसे रख सकते हो| कहाँ गई मर्यादा पुरुषोत्तम की मर्यादा|धिक्कार है राम तुम पर धिक्कार है|
अच्छा मन( नभ): है राम तुम ये क्या विकल्प कर रहे हो सीता सद में शिरोमणि है,पतिव्रता है सीता पर कलंक कदापि नहीं राम कदापि नहीं| सीता ने कभी भी पर पुरुष पर दृष्टि नहीं डाली पर सिताके साथ समागम की बात कदापि नहीं राम असंभव राम असंभव|
राम(नित्य): बस…
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सूत्रधार(संवेग): तभी सेनापति कृतांतवक्र कक्ष में प्रवेश करते है|
सेनापति(अनुष): हे महाराज! अगर आपकी आज्ञा हो तो क्या यह सेनापति कक्ष में प्रवेश कर सकता है|
राम(नित्य): शीघ्र ही प्रवेश करो|
सेनापति(अनुष): प्रणाम महाराज! आज आप इतने व्यथित क्यों है|
राम(नित्य): हे प्रिय सेनापति आज यह राम बहुत अधीर हो रहा है मुझे तुम्हारी सबसे ज्यादा आवश्यकता है|
सेनापति(अनुष): अरे महाराज! आप तो आज्ञा कीजिए यह सेनापति आपके लिए सर्वस्य समर्पित है|
सूत्रधार(संवेग): राम उद्विग्न होकर करुण विलाप करते है | महाराज की यह स्थिति सेनापति कृतांतवक्र से देखी न गई और सेनापति कहते है महाराज किसका इतना दुस्साहस जिसने मर्यादा पुरुषोत्तम राम की अवज्ञा की| मैं उस दूत पापी का मस्तक आपके समक्ष प्रस्तुत करूं| इस पर राजा राम की क्या प्रतिक्रिया होती है चलिए देखते है|
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राम(नित्य): अगर वे आपका स्वजन ही हो तो|
सेनापति(अनुष): ये क्या महाराज |
राम(नित्य): हे प्रिय सेनापति शीघ्र ही महारानी सीता को तीर्थ वंदना के बहाने सीनाथ नमक भयंकर अटवी में छोड़ आओ|
सेनापति(अनुष): नहीं महाराज!
राम(नित्य): हमारी आज्ञा का पालन करो| इसके आगे हमें कुछ नहीं सुनना|
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सूत्रधार(संवेग): वन की ओर जाती हुई सीता का महान धर्मात्मा कृतांतवक्र के साथ गमन|
सीता: सुन सेनापति भैया …2
क्या तुम भूल गये, उस जंगल का रस्ता
सेना: नहीं भूला में रस्ता..2
हे प्रिय मात सिये, कहते हुए हिय फटता,
सीता: क्या बात है बतलाओ..2
शीघ्र मेरे भैया, मत देर तनक लाओ
सेना: मैं बात क्या बतलाऊं..2
नहीं कुछ कह सकता, कहते हुए दुख पाऊँ ।
सीता: क्या बात है शीघ्र कहो..2
मन में म सोच करो, सच सच तुम बतलाओ ।
सेना: ये राम की है आज्ञा..2
इस भीम विकर वन में तुम छोड चले आओ।
सीता: कुछ समझ नहीं आता..2
राम का मेरे प्रति कैसे ये हृदय पलटा
सेना: मैं रुदन किया भारी..2
नहीं मेरी एक सुनी होआई अन्त में लाचारी
सीता: भैया । किसने बहकाये..2
क्या कुछ दोष किया नहीं समझ में कुछ आये
सेना: हैं नौकरी काम बुरा
भूल नहीं कर्ता चाटें भूकों ही मर जाता
सीता: मेरा दोष बता देते..2
सब तो आ जाता, निर्णय तो करा देते।
सेना: कुछ दोष नहीं तुममें..2
तू है परम सती, कोई संशय नहीं इसमें
सीता: तुम छोड मुझे जाओ..2
तुम तनिक न खेद करो, पति आज्ञा बता जाओ।
सेना: यहाँ सिंह दहाडे है..2
कैसे में तजु तुमको गजराज चिंधाडे हैं।
सीता: जो कर्म लिखा मेरे..2
मैं खुद ही भोगूंगी, नहीं हाथ में है तेरे ।
सेना: मैं कैसे तेजूं तुमको..2
इस भीम विकर वन में, यह पाप लगे मुझको ।
सीता: तुम जाओ मेरे भैया..2
रहना ठीक नहीं, संदेह करे दुनिया |
सेना: दिल मेरा नहीं चाहता..2
कुछ संदेश कहो, ले जाता हूँ माता ।
सीता: श्री राम से ये कहना..2
लोगो के बहकाये, तुम धर्म न तज देना..3
सेना: धनी धन्य है सीता सती..2
धर्म नहीं भूली, ऐसी विपदा में भी..2
सूत्रधार(संवेग): अब हम देखेंगे कि किस प्रकार लव कुश अपनी माता को न्याय दिलाने के लिए प्रजा से गुहार लगाते हैं|
Light off
Song (हम वन के वासी नगर जगाने आए)
Entry(सभी साथ मे)
सूत्रधार(संवेग): स्वजन को दे देने से दंड नहीं हो जाता कोई महान,
अरिहंत नाम के परम भक्त हम आत्म राम के आराधक..
जिनवाणी सीता के सपूत भगवान आत्म के साधक..
निज आतम में ही रहे लीन..
है यही भावना भव नाशक …3
प्रूफरीडिंग बाकी है
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