उत्तम ब्रह्मचर्य / शील धर्म पर आधारित सेठ सुदर्शन की कथा का पूर्ण मंचन-योग्य नाटक — ग्वाला के पूर्व भव व णमोकार मंत्र प्राप्ति से लेकर कपिला व रानी द्वारा शील-परीक्षा, फाँसी का फंदा फूलों का हार बनने व मोक्ष तक; पूरे पात्र-संवाद व मंच निर्देश सहित। पाठशाला, बाल संस्कार शिविर व दस लक्षण पर्व मंचन हेतु आदर्श।
A complete ready-to-stage drama of Seth Sudarshan on Uttam Brahmacharya (sheel) — full characters, dialogue and stage directions. Jain Dashlakshan drama / jain natak script / brahmacharya katha for pathshala and children’s programs.
(A) सेठ सुदर्शन का पूर्व भव - सुगम नामक ग्वाला मुनि को तेज धूप में शिला पर बैठा देखता है तथा आश्चर्यचकित होता है।
ग्वाला: कौन बैठो है ये भाई इतनी धूप में। जा के लाने धूप नहीं लग रही का।
महिला ①: ये निर्ग्रंथ मुनिराज हैं आओ - इनके दर्शन करते हैं।
महिला ②: ये ऐसे मुनिराज हैं जो की दिन में एक बार भोजन - पानी आहार के रूप में गृहण करते हैं।
महिला ①: ये हमेशा २८ मूलगुणों का पालन करते हैं।
महिला ②: आओ इन्हें नमस्कार करो।
ग्वाला: जय हो मुनिराज की जय हो।
(भजन)
(B) ग्वाला घर जाता है
ग्वाला: सुनती हो कहा चली गई (दरवाज़ा खटखटाते हुए)
पत्नी: चिल्ला काये रहे हो बात बतायो का हो
पति: खोल तो रहे हैं दरवाज़ा रूक तो जाओ। चिल्ला काये रहे हो।
ग्वाला
समझ नहीं आ रही इतनी देर से चिल्ला रहे है। आवाज़ दव पाए हमाई। तो सब समझ में आ जाए तुमाई। दिमाक खराब करती हो।
पत्नि
चिल्ला काये रहे हो बात बतायो का हो गयो।
ग्वाला
बात - बताओ, बात- बताओ। बात बताने ही ले चिल्ला रहे है। मुनिराज बैठे है जंगल में, कपड़ा नहीं है उनके पास पहनवे।
पत्नि
तो हम का करे।
ग्वाला
कपड़ा दो - कपड़ा कई हम का करे।
पटिन
हमाये इते का, कपड़ा को पेड़ लगी है, जो कपड़ा मांग रहे हो हमशे।
म्वाला
तुमशे तो बात करवो बेकार है। जाओ निकलो। हम कह रहे है जाओ।
ग्वाला कपड़े से मुनि का पसिना पौछता है। (भजन)
ग्वाला
नमस्कार महाराज
मुनि
धर्मविद्धीही।
ग्वाला
है महाराज मैं आपके जैसा कब बन पाऊगा।
मुनि: हे भव्य जीव मैं तुम्हें महामंत्र देता हूँ जिसके बोलने तथा जाप देने से तुम स्वर्ग व मोक्ष को प्राप्त कर सकते हो। ये णमोकार महामंत्र मंत्र है। मेरे साथ बोलो।
(णमोकार मंत्र बोलता है।)
ग्वाला: धन्य हो महाराज धन्य हो। नमस्कार।
(A) ग्वाला घर जाता है।
ग्वाला: हम कह रहे हैं खोलो दरवाज़ा।
पत्नि: इतनी लेट काये आए हैं। पता नहीं सेठ के पास जाने हैं।
ग्वाला: का कह रही हो। जल्दी बांध रोटी जल्दी कर हम कह रहे जल्दी बांध समझ में नहीं आये कछू।
(ब) ग्वाला सेठ के यहाँ देरी से पहुँचता है।
सेठ: इतनी देर कैसे हो गई। रोज तो जल्दी आते थे।
ग्वाला: अरे सेठ जी जा मत पूछो भागत - भागत आए हैं अभी तक खाना भी नहीं खायो मैंने।
सेठ: पहला पेट पूजा फिर काम दूजा। चलो खाना खाते हैं।
(A) खाना खाते वक्त वह ग्वाला णमोकार मंत्र पढ़ता है। तभी सेठ सुन लेता है।
सेठ- अरे ये तो महामंत्र है। ये तुम्हे कहाँ से मिला।
ग्वाला- इशारे से सारी कथा सुनाता है।
सेठ- धन्य है तुम्हारे भाग्य। धन्य है वो शुभ घड़ी, जिसमे तुम्हें ऐसे मुनिराज का सानिध्य प्राप्त हुआ। जिनके दर्शन को देवता भी तरसते हैं। अहो भाग्य तुम्हारा।
ग्वाला- ठीक है सेठ जी मैं निकलता हूँ। अरे! उन मुनिराज का जीवन कैसा होगा जिनके दर्शन को देवता भी तरसते है मुझे भी उनके जैसा बनना है। णमो…
(A) उसी समय वहाँ भीषण बारिश होती है परंतु जब ग्वाला पुल पार करने लगता है तब तलाब के पानी में गिर जाता है और मर जाता है।
(A) अगले जन्म में वह सेठ वृषभदत्त के पुत्र के रूप में जन्म लेता है और जब वह बड़ा होता है तो देवी मनोरती से उसकी शादी हो जाती है।
(A) एक बार नगर में एक मुनिराज पधारते है उनके दर्शन हेतु सेठ वृषभदत्त जाते है तथा उन्हे वैराग्य आ जाता है और वे मुनि
बन कर बिहार कर जाते है।
(A) एक सारा भार सुदर्शन के ऊपर आ जाता है तथा वह सेठ सुदर्शन कह लाने लगते है। तथा धर्म की प्रभावना व भगवान की भक्ति में सेठ का खूब मन लगता है।
(म) एक दिन, सुदर्शन सेठ और उनका मित्र कपिल बाग में टहल रहे थे उनके बीच धार्मिक बात चल रही थी। तभी कपिल की पत्नि कपिला सेठ सुदर्शन पर मोहित हो जाती है।
कपिला
आ हा, हा हा कितना सुंदर पुरुष है इसने तो देवो को भी मात दे दी इसके बिना तो मेरा जीवन व्यर्थ है अतः अब मुझे इनसे मिलने का कुछ न कुछ उपाय सोचना चाहिए।
(A) इस प्रकार कपिला के दुष्परिणाम होते है और वे अपना शील व सुदर्शन का शील भंग करने के लिए आतुर होती है। कपिला दासी को बुलाती है।
कपिला
दासी इधर - आओ। दासी तुम इस नगरी के सेठ सुदर्शन के पास जाओ और कहो की आपके दोस्त तकलीक में है। अतः वह तुम्हारे साथ तुरंत आऐंगे।
दासी
जी सेठाणी जी।
(दासी सेठ के घर जाती है) (A)
दासी
प्रणाम सेठ जी आपको मेरे साथ चलना होगा आपके मित्र कपिल संकट मे है।
सेठ: अच्छा ऐसी बात है। चलो मैं चलता हूँ।
(सेठ कपिला के पास जाते हैं जब घर पहुँचते हैं तो कपिल घर पर नहीं होता है तो सेठ कपिल को बुल अवाज़ लगाते हैं।)
सेठ: कपिल - कपिल कहाँ हो तुम, क्या हुआ तुम्हें।
कपिला: कपिल अभी बाहर गया है कृपया कर तुम मेरी इच्छा पूर्ण करो। मैं तुम्हारे रूप और सुंदर्श पर मोहित हो गई हूँ।
सेठ: आप जैसा समझ रही हो मैं वैसा नहीं कर सकता। आपको पता नहीं है की मैं एक नपुन्सक हूँ।
कपिला: ये क्या कह रहे हो तुम चले जायो निकल जायो मेरे घर से। आज के बाद तुम कभी भी मेरे सामने मत आना।
(इस प्रकार से कपिला सेठ सुदर्शन के प्रति वासना भाव जोड़ देती है।)
(सेठ सुदर्शन और गजवाहन राजा एक दिन बगिन्ये में सैर कर रहे थे। तबदी राजा गजवाहन की पटिन सेठ सुदर्शन पर मोहित हो जाती है।)
रानी: अरे वाह। क्या सौदर्य है इसके सामने तो कामदेव भी कुछ नहीं। वाह-वाह - बहुत खुत।
कपिला: है रानी मैंने लोगो से सुना था की ये नपुंसक है।
रानी: अरे ये क्या कह रही हो। ये सब झूठ है तुम्हे शायद पता नहीं इनकी गिनती विशिष्ट सज्जनों तथा मूल रत्नों में होती है। तुम ये कैसे सोच सकती हो। की ये नपुंसक है और ये तो मैं मान ही नहीं सकती।
कपिला: रानी आपके जैसे ही मेरे मन में भी तीव्र विषय वासना जागी थी तब इनको मैंने अपने घर में बुलाया। और इन्होंने स्वयं ये बात मुझसे आकर कही की ये नपुंसक है।
रानी: हे विवेकहीन दासी शायद तुम्हे पता नहीं की वे इतने धार्मिक हैं कि इन्होंने अपने शील की रक्षा के लिए ऐसा किया होगा। इन्होंने अपने को बचाने के लिए तुमसे झूठ बोला होगा।
कपिला: (गुस्से में) हे रानी आप अगर इस नगर की रानी हो तो आप इस सेठ के साथ अपनी विषय वासना पूर्ण करके बतायो। तभी मैं मानूँगी की आप इस नगर की सच्ची रानी है।
(A) इस प्रकार कपिला के कटुक वचन रानी को चुभ जाते हैं और वह अपनी वासना को पूरी करने का प्रण लेती है।
(A) सेठ सुदर्शन हर अष्टमी - चौदस को शमशान में जाकर ध्यान करते थे। लम्पटी रानी को पता चलते ही वह सिपाहियों को बुलाती है।
रानी
सिपाहियों जाओ और सेठ सुदर्शन की ढूँढो और वह जहाँ भी हो उसे हमारे पास लेकर आयो।
सिपाही
जो आज्ञा महारानी जी।
(A)
सिपाही सेठ को ध्यान अवस्था में ही लेकर महल पहुंचते हैं।
रानी
हे सुदर्शन तुम नहीं जानते मैं तुम्हे ही अपना पति मानती है। ऐसा सुख तो देवों को भी नहीं मिला जो तुम्हारे पुण्य प्रताप से तुम्हें मिल रहा है। इस समय का लुप्त उठायों सेठ।
(A)
रानी नाँच कर अपना सौंदिर्य दिखाती है। इस प्रकार अनेकों प्रयास के बाद भी सेठ सुदर्शन अपने ध्यान से नहीं डिगें फिर सुबह होते ही जब वह अपनी आँख खोलते है तो बोलते है।
सेठ
क्षमा करे मघरानी मैं यहाँ कैसे आया।
रानी
मैं तुम पर मोहीत हो गई हूँ मैं चाहती हूँ की तुम मेरी काम वासनाओं को पूर्ण करो। हे सुदर्शन मान जायी नहीं तो में अपने प्राण त्याग दूगी। मुझे जीवनदान दो
मान जायो सुदर्शन - मान जाओ।
सेठ: मैं ऐसा नहीं कर सकता ये आप क्या कह रही हो। ये संसार असार है यहाँ एक वासना खत्म नहीं होती की दूसरी शुरू हो जाती है। यहा से निकलकर मैं सबसे पहले दीक्षा धारण करूंगा।
रानी: (गुस्से में) दीक्षा तो तब लोगे ना जब यहा से जिन्दा बचकर जा पाओगे। अब मैं तुम्हे बताती हूँ। बचाओ - बचाओ
(रानी अपने कपड़े फाड़ती है नाखून से अपने शरीर को नोंचती है तभी राजा और सिपाहियों का प्रवेश होता है।)
राजा: रानी आपकी यह दुर्दशा कैसे हुई।
रानी: आप जिसे शीलवान समझते थे। उसने इस राज्य की रानी पर हाथ डाला है। हे राजन ये काम पीड़ा का प्यासा है। इसे निकाल दो नहीं तो इसे कड़ी-से-कड़ी सज़ा दो।
राजा: तेरा ये दुस्साहस की तूने मेरी रानी पर हाथ डाला तुझे ऐसा दण्ड मिलेगा की आज के बाद कोई भी कभी भी किसी पर इस प्रकार का कुकृत्य नहीं करेगा।
डाल दो इसे काल कोठरी में।
दो दिन बाद इसे फाँसी पर चढ़ा देना।
(A) सेठ सुदर्शन को फांसी पर चढ़ाया जाता है देवों के द्वारा फाँसी का फंदा फूलों का हार बन जाता है। फिर सेठ वहीं से निकल कर दीक्षा धारण करते हैं और मोक्ष को प्राप्त होते हैं।
सि. ① - तुम्हें पता है कि 2 दिन पूरे हो चुके हैं।
सि. ② - अरे हाँ! चलो सेठ सुदर्शन को फाँसी देने ले चलें।
सि. ① - चलो सेठ जी। आपके फाँसी का वक्त हो गया है।
सेठ सु. - ठीक है चलो।
सि. ② - किसका इंतजार कर रहे हो, वक्त हो गया है फाँसी पर चढ़ा दो इनको.
देव - अरे ये मैं क्या देख रहा हूँ मध्यलोक में ऐसे महान पुरुष को फांसी दी जा रही है। धर्म की रक्षा के लिए इनकी जरूरत है, मैं ऐसा नहीं होने दूँगा.
(A) ——— फाँसी के बाद
राजा - अरे ये फाँसी का फंदा फूलों का हार कैसे बन गया। जरूर सेठ जी निर्दोष हैं और ये जैन धर्म का प्रताप है कि ऐसे महापुरुष की रक्षा तो स्वयं ही हो जाती है।
देव - मुझे लगता है ठीक हुआ। जरूर से इन महापुरुष का मोक्ष जाना निश्चित है तभी तो मेरी विद्या इनके काम आ सकी। बोलो जैन धर्म की जय !
(A)
स्रोत: दस लक्षण सांस्कृतिक कार्यक्रम संग्रह — मंचन-योग्य नाटक (जैन समुदाय पांडुलिपि, यूनिकोड देवनागरी में लिप्यंतरित)।
प्रूफरीडिंग बाकी है
