संस्कारों की पाठशाला — पाठशाला जाने से बच्चों को कैसे संस्कार मिलते हैं, इस पर गीत-संवाद शैली का लघु नुक्कड़ नाटक (लेखिका CA स्वाति रोहित पाटनी, श्री अकलंक बाल पाठशाला)। Short Jain street-play (nukkad natak) on why pathshala + sanskar matter
नुक्कड़ नाटक - संस्कारों की पाठशाला
लेखिका: CA स्वाति रोहित पाटनी (WRITTEN BY CA SWATI ROHIT PATNI)
शिक्षा वही जो रह दिखाए,
सदाचार का पाठ पढाये
विद्या वही जो विनय सिखाये,
मानव को सच्चा इंसान बनाये.
बुद्धि बड़ी हो, दिल भी बड़ा हो
संस्कार संग जब ज्ञान खड़ा हो.
संस्कारों से जब शिक्षा जुडती,
अंधियारे में दीपक बनती.
सिर्फ़ बुद्धिमान बनना काफ़ी नहीं,
अच्छा इंसान बनना भी जरुरी सही.
ज्ञान तब सार्थक होगा,
जब चरित्र उज्ज्वल होगा।
शिक्षा केवल डिग्री नहीं है
जीवन जीने की कला सही है।
इसीलिए भाइयो ज्ञान राशि से ऐसा मोती चुन चुन कर
लाना होगा संस्कारों के दीप जलाने होगे.
अरे भाइयो गीत ही गाते रहोगे या कुछ काम भी करोगे?
अरे भाइयो ज़रा सभा तो जमने दो,
सब को बुला लो, रंग जमा लो।
पाठशाला का असली महत्त्व सबको बता दो।
क्या पाठशाला जाने से हमें अच्छे संस्कार मिलते हैं?
बिल्कुल ! अगर बचपन में अच्छे संस्कार नहीं मिले, तो बड़े होकर सही-गलत का निर्णय करना मुश्किल हो जाता है।
तो इसका मतलब जो पाठशाला नहीं जाता, वह अच्छे संस्कारों से वंचित रह सकता है?
हाँ। जरा सोचो, अगर पेड़ की जड़ें मजबूत न हों, तो क्या वह तेज़ आँधी में खड़ा रह सकता है?
(सोचते हुए) नहीं, वह गिर जाएगा।
बिल्कुल सही! इसी तरह, यदि बचपन में संस्कार नहीं मिले, तो बड़े होकर इंसान अपने जीवन में स्थिरता और सफलता नहीं पा सकता।
सुनो सुनो सुनो (4-5 Times)
कदम से कदम मिलाना है
सबको सांचा बनाना है
पाठशाला का महत्त्व बतलाना है
सही राह का ज्ञान कराना है
संस्कारित जीवन के अधिकार को
हमें सबको बताना है।
बिना शिक्षा के जीवन कैसा?
और बिना संस्कारों के शिक्षा कैसी??
बिना संस्कारों के शिक्षा कैसी??
अम्बर बिना सितारे जैसी
बिना संस्कारों के शिक्षा कैसी??
वृक्ष बिना जड़े जैसी
बिना संस्कारों के शिक्षा कैसी??
सुर बिना सरगम जैसी
बिना संस्कारों के शिक्षा कैसी??
बगिया बिना फूलों जैसी
न ज्ञान का कोई मान रहेगा,
न जीवन में उत्थान रहेगा.
बहुत समय पहले की बात है, दो भाई थे - एक धर्मपरायण और दूसरा स्वार्थी। बड़े भाई ने बचपन से ही पाठशाला में शिक्षा ली और छोटे भाई ने कभी ध्यान नहीं दिया। जब वे बड़े हुए, तो बड़ा भाई विनम्र, सत्यवादी और परोपकारी बना, जबकि छोटा भाई लालची और असंयमी । एक दिन, छोटे भाई ने किसी को धोखा दिया और बड़ी मुसीबत में पड़ गया। लेकिन बड़े भाई के अच्छे संस्कारों के कारण, सभी ने उसकी मदद की।"
(कहानी खत्म होती है, और सब सोच में पड़ जाते है।)
क्या हम सकारात्मक जीवन जीना चाहते हैं?
क्या हम मुस्कुराते रहकर दूसरों के मुस्कुराने में कारण बन सकते हैं?
क्या हम अपनी संस्कृति को जीवन्त रखना चाहते हैं?
यदि हाँ - तो आप भी जुड़िए
- श्री अकलंक बाल पाठशाला से
क्या अभी तक आपने अपने पाठशाला से कुछ सिखा भी है???
हा हा … क्यों नहीं …
अरे गुलाब सिखाता हमको…
अरे! गुलाब सिखाता हमको काँटों में भी खिलना।
और कमल सिखलाता हमको सबसे भिन्न सु रहना।।
कौवे से भी अरे सीखना बुला-बुला कर खाना।
साथ नहीं जायेगा कुछ भी, सभी छोड़कर जाना।।
मीठे बोल बोलना सीखो कोयल से हे भाई !
थोड़ा लेकर ज्यादा देना गौ-शिक्षा सुखदाई।।
पत्थर खा कर भी फल देता देखो वृक्ष मनोहर।
पर उपकार सदा ही करता स्वयं कष्ट भी सहकर ।।
मेघ सभी को पानी देते, सूरज सहज उजाला।
सबकी प्यास बुझाते सरवर, क्या गोरा क्या काला।।
मिथ्या पक्षपात को छोड़ो, वस्तुस्वरूप पिछानो ।
निर्णय करके अनुभव करके सत्य सहज ही मानो ।।
(आदरणीय ब्र. रवीन्द्रजी “आत्मन”)
धन्य है वे माता पिता जो अपनी संतान को भौतिक धन वैभव के साथ साथ धर्म के संस्कार भी देते है
धन्यवाद
जय जिनेन्द्र
प्रूफरीडिंग बाकी है
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