संस्कारदाती मदालसा — रानी मदालसा अपनी पुत्रियों को धार्मिक संस्कारों से संस्कारित करती हैं, छहों पुत्रियाँ ब्रह्मचर्य व्रत लेती हैं, और सातवीं पुत्री युद्धभूमि में माँ का दिया पत्र (“अहमेक्को खलु सुद्धो”) पढ़कर वैराग्य पाती है — संचालन-सहित मंचन योग्य नाटक (11 पृष्ठ, हस्तलिखित)। Stage play on Queen Madalsa instilling dharmik sanskar in her daughters
संस्कारदाती मदालसा
संचालन : ये तो आपने सुना ही होगा “बेटी बिन जीवन ऐसा इन्द्रचतुष बिन रंगों जैसा।” पुराने समय में लोग बेटियों को बोक्त मानले थे, घर की देहलीज़ के बाहर कदम भी नहीं रखने देते थे। पर आज के इस युग में बेटियाँ हर उस काम को बढ़चढ़ कर करती हैं जिसकी आशा एक बेटे से रखी जाती है। बोरियों को दी जाने वाली स्वतंत्रता कुछ हद तक तो ठीक है। पर वही आज़ादी तब भारी पड़ती है जब वे गलत राह पर चल पड़ती हैं। उन्हें स्वतंत्रता देने से पहले उनके चरित्र को संस्कारों से भर दीजिए । उन्हें ये संस्कार गुरुजनों और विद्वानों से तो मिलते ही हैं पस्तु माता पिता का यह कर्तव्य है कि वो बच्चों को बचपन से ही संस्कारित करें। तो किस तरह दिये. जाऐं ये संस्कार । आइए देखते हैं इस नारिका के माध्यम से। विचार ⁌ सुनो साथियों एक कथानक तुमको आज सुनाते हैं, अच्छे संस्कारों की महिमा तुमको आज बताते हैं। माता पिता चाहें तो बालिका डॉक्टर इन्जीनियर बन सकती
माता : पिता चाहें तो बालिका ब्राहमी सुन्दरी बन सकती विद्यानिकेतन के अभाव में अच्छे संस्कार न आते हैं अच्छे संस्कारों की महिमा तुमको आज बताते हैं। संचालन ⁌ बहुत समय पहले की बात है, एक सुन्दर बसा नगर शितपुर, वहाँ का राजा विक्रमजीत और रानी मदालसा सुख पूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। उनकी दो पुतियाँ बगीचे में खेल रहीं थीं और राजा उन्हें दूर से ही निहारते हुए प्रसन्नचित्त मुद्रा में खड़े थे। तभी रानी मदालसा वहाँ आकर राजा से क्या. वार्तालाप करती हैं आइए देखते हैं।
रानी : महाराज । ऐसे सामान्य समय में आपकी प्रसन्नचित्त गुता को देखकर कुछ आश्चर्य सा होता है। राजा ⁌ प्रिये । अब अपनी पुत्रियों को स राज्य सम्बन्धी शिक्षाएं देने का समय आ गया है। आप देख रहीं हैं हमारी पुत्रियाँ कितने गौरख के साथ क्रीड़ा कर रहीं हैं। मुझे तो उस दिन की प्रतिक्षा है
मेरी पुत्रियाँ मेरा राज्य सम्भालेंगी।
रानी : महाराज | राज्य की शिक्षा देना तो जरूरी है। परन्तु संस्कार विना सुविधाएँ तो पतन का कारण है। अतः सर्वप्रथम हमें अपनी पुत्रियों को धार्मिक संस्कारों से सुशोभित करना चाहिए । आखिर आत्म कल्याण भी तो उन्हें इसी भव में करना है।
राजा : महारानी । (मुस्कुराते हुए) आत्म कल्याण करने के लिए तो वृद्धाव- ही पर्याप्त है पस्तु यदि उत्तराधिकारी नहीं हुआ तो शासन प्रशासन कैसे चलेगा ।
रानी : नहीं महाराज नहीं। ऐसा नहीं है। आयु का क्या भरोसा है, न जाने आयुध कर्म के निषेक कब सिर जाऐं । वृद्धावस्था तो समाधिगरआपकी, आज्ञा हो तो मैं आपसे कुछ चर्चा वार्ता करना चाहती हूँ। करने के लिए है और बचपन कानाभ्यास के लिए
राजा : हाँ, हाँ रानी तुमसे चर्चा करने के लिए तो हम सदैव तत्पर रहते है। कहो क्या बात है ?
रानी : महाराज ! जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश रात्रि के अंधकार को दूर नहीं करता अपितु सूर्य का उदय होने पर अंधकार तो स्वयं ही दूर हो जाता है। उसी प्रकार बालिकाओं को धार्मिक संस्कार देने पर उनके चहुमुखी विकास के लिए अन्य शिक्षाओं की आवश्यकता
नहीं होती। वे स्वत : ही सर्वगुण सम्पन्न बन जाती है।
राजा : परन्तु रानी जिस प्रकार चेतनत्व और अचेतनत्व एक जीव में एक साथ नहीं रह सकतें उसी प्रकार एक बालिका में धार्मिक
शिक्षा के साथ : साथ राजकीय शिक्षाएँ कैसे रह सकती हैं?
रानी : स्वभाव - विभाव के एक साथ रहने पर भी जब जीव को स्वभाव की रुचि होती है तब उसका उपयोग स्वभाव में ही रहता है। शास्त्र और शस्त्र दोनों की शिक्षा देने पर भी यदि उनकी रुचि शास्त्र की ओर है तो उपयोग नहीं अग्रसर हो जाएगा।
राजा : हे मदालसे। आपके विचार तो अति उत्तम हैं। अतः पुत्रियों को आप जैसे संस्कार देना चाहे दें। [और राणी मदालसा बेटियों की धार्मिक, शिक्षा की… उच्चकोटि के विद्वानों व्यवस्था करती है] इधर
संचालन : ^ एक बालिक एक फूल तोड़ने की कोशिश करती है इतने में मां उसे फूल तोड़ने से रोककर समझाने का प्रयत्न करती है। आइए देखते हैं माँ उससे क्या कहती है।
रानी : अरे । बेटी तुम यह क्या कर रही हो। २. बेटीन मां। यह देखो कितना सुन्दर फूल है। मेरे बालों में लगने के बाद तो और भी सुन्दरता को प्राप्त हो जाएगा। रानीच बेटी ये भी तुम्हारी तरह जीव है। बेटी । कल्पना करो, यदि तुम्हारे कोमल हाथों को कोई मोड़े तो तुम्हें पीड़ा होती है ना उसी तरह यह पुष्प भी पौधे का एक अंग है उसे तोड़ने से वहह भी दुख का अनुभव करता है। और जो दुख का अनुभव करे वह सुख जीव है। 2. बेटीन तो माँ किसी को दुख पहुँचाने से क्या होता है? रानीन बेटी किसी को दुख पहुँचाना उसका दिल दुखाना हिंसा होती है। और हिंसा एक पाप है। २. बेटीन अच्छा मां । कल तो मेरा जन्मदिवस है तो मैं सबको मिठाईयाँ खिलाकर खुश करूँगी। फिर तो नहीं होगी न हिंसा ।
रानी : पर बेटी जन्म तो मेरा होता ही नहीं। तो फिर जन्मदिन किसका? 2-बेटी- पर मां मेरा तो जन्म हुआ था तभी तो मैं कल 8 वर्ष की हो जाऊँगी। रानीन बेटी जन्म तो शरीर का होता है। और यह 8 वर्ष की उम्र भी शरीर
की ही है। आत्मा तो अजर : अमर है, अनादि अनंत है। इसलिए जन्मदिवस पर ऐसी सौगंध लेनी चाहिए कि जन्म मरण का अंत हो जाए और यही भावना भानी चाहिए। अजन्मी हूँ ये देखूँगी, जन्मी था ये भूलूँगी- जनम जिसका होता है, मरण उसका होता है न जन्मी थी व जन्मूँगी, अजन्मी हूँ ये देखूँगी।
२. बेटी- हाँ माँ आज से हम प्रतिज्ञा लेते हैं कि जन्म मरण का अंत करके ही दम लेंगे।
संचालक : इस प्रकार, रानी मदालसा ने अपनी पुत्रियों को संस्कारित किया। काल बीतता गया और रानी मदालसा ने अन्य चार पुत्रियों को जन्म दिया। और गर्भ से ही उसने उनके संस्कारों में कोई चूक न की। तकरीबन 10 वर्षों बाद रानी मदालसा अपनी बड़ी पुत्री के कक्ष में जाती है। और द्वार पर खड़े होकर क्या दृश्य देखती है आइए देखते हैं।
बेटी : (शीशे के सामने खड़ी होकर ) वाह! क्या रूप है मेरा ? मुझ जितना सुन्दर तो शायद ही इस धरा पर कोई होगा। कौन होगा वो भाग्य- शाली राजकुमार जिससे से विवाह करूँगी। (माता द्वार से ये दृश्य देख रही है और बेटी हार पहनकर दिखाती है।)
बेटी : (दिखाते हुए ) मां मैं कैसी लग रही हूँ ? ये हीरों का हार मेरे कण्ठ पर कितना शोभायमान हो रहा है। मां. मेरे कंगन भी कितने सुन्दर हैं न।
माँ : बेटी ये शरीर और आभूषण तो क्षणभंगुर-हैं। इससे क्या अपनत्व करना। अनादि से आज तक रूप दिखाने का ही भाव आया है अरूपी तत्व को देखने का भाव नहीं आया है; अब तो हम अपने
अरूपी तत्व को देखें। कहा भी है : “जिसके श्रृंगारों में मेरा यह महँ- महंगा जीवन घुल जाता, अत्यंत अशुचि जड़ काया से इस चेतन का कैसा नाता।” बेटी कण्ठ हीरों के हार से नहीं सुगुणों से सुशोभित होता है। क्योंकि “हीरों का हार तो व्यर्थ कण्ठ में सुगुणों की माला भूषण सु पात्र दान से शोभित हों, कंगन हथफूल तो हैं ‘दूषण।’”
बेटी : माँ आपकी बात तो सत्य है परन्तु मेरे सपनों का राजकुमार को आएणान
रानी : बेटी इतनी संस्कारित होकर भी राजकुमार की चाह क्यों ? हमें तो ब्रह्मचर्य की भावना भानी चाहिए।
बेटी : परन्तु मां अभी मेरा ब्रहमचर्य लेने का मन नहीं है। मुझे तो महलो की रानी बनकर राजसीक सुख भोगने की इच्छा है।
रानी : विवाह बंधन में बंध जाने के कारण में ब्रहमचर्य नहीं ले पाई। पर मैं तुम्हें ऐसे संस्कार दूँगी कि तुम विवाह बेधन में बँधने से पहले ही आर्यिका बन जाओ। मैं’ स्वयं तो इस मार्ग में नहीं लग सकी परन्तु अपनी पुत्रियों को तैयार कर दूं ताकि यह धर्म अनंत काल तक इस भारत भूमि एवं भारतवासियों को सुख शांति से जीना सिखाता रहे।
बेटी : मां बचपन से ही आपके इतने निर्मल परिणाम और मेरे इतने विकारी परिणाम, नहीं। कदापि नहीं! आज मैं प्रतिज्ञा लेती हूँ कि मैं ब्रह्मचर्य अवश्य लूँगी।
रानी वैसे भी जीवन में सारभूत तो एक मात्र शुद्धात्मा ही है। एक तो असारता से भरा यह संसार उसमें भी स्त्री पर्याय पग-पग पर पराधीनताओं को झेलना पड़ेगा। इसलिए, बेटी निर्भय-निशंक होकर स्वाधीनता का मार्ग अपना । संचालन अरे! इस कलयुग की दुर्दशा तो देखो - “पेट में पांच बेटे जिस को भारी नहीं लगे थे वो मां बेटों को पांच फ्लैटों में भी भारी लगने रही है।” बीते जमाने का यह श्रवण का देश — कौन मानेगा । यद्यपि माताएं तो पर्याय के साथ बदलती रहीं पर धन्य है वो मदालसा जैसी माता जिसने जन्म मरण से छूटकर स्वाधीनता के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। रानी मदालसा ने अपनी यहाँ पुत्रियों को धार्मिक संस्कारों से ओतप्रोत किया। और वे ब्रह्मचर्य व्रत के भावों के साथ यौवन अवस्था को प्राप्त हुई। एक दिन तो हम उनकी तत्वचचर्चा के माध्यम से ही उनके भावों को जान लेते हैं। 6 बेटी बहन । इस जगत में सबसे सुन्दर वस्तु कौन सी है? 3. बेटी क इस जगत में हमारे वृहम स्वरूपी आत्मा से अधिक सुन्दर अन्य कोई वस्तु नहीं । “सत्वत सुंदओ लोए” । 5-बेटी बहन । इस जगत में सबसे ज्यादा प्रतापवान कौन है?
२: बेटी इस जगत में सबसे ज्यादा प्रतापवान चैतन्य हीरा है। 4. बेटी हे भगिनी । इस जगत में सबसे चंचल क्या है? 1. बेटी इस जगत में सबसे चंचल इस जीव का उपयोग है। अपने उपयोग को स्थिर करने का सबसे सुगम उपाय है अपने ब्रहम स्वरुपी आत्मा में रमण करना । इसलिए मैंने निर्णय किया है कि मैं ब्रस्मचर्य व्रत अंगीकार कर आत्म कल्याण करूँगी । सभी बेटियाँ हाँ हम भी आपके साथ ब्रह्मचर्य धारण करेंगे। “तुमरी समझ सोई समझ हमरी हमें ब्रह्मचर्य लेना है।” 1-बेटी नहीं बहनों हमें अपने पिता श्री और राज्य के बारे में विचार करना चाहिए। यदि तुम सभी ने भी ब्रह्मचर्य लेलिया तो राज्य का उत्तराधिकारी कौम होगा। इसलिए तुम राज्य सम्भालो और मैं
ब्रह्मचर्य व्रत धारण करती हूँ।
बेटियाँ : नहीं।
आप बुरो जान छोड़ो हमे जगजाल मोड़ो तुमसे ही संग ब्रहमचर्य व्रत धरेंगें-2 । 1-बेटी → जैसी तुम्हारी इच्छा। 6-बेटी → चलो पिता श्री और माताश्री से आज्ञा लेते हैं।
संचालन : लगता है बेटियाँ जान चुकी हैं कि दूल्हा राजा तो सादि- शांत होता है परन्तु जीवराजा अनादि अनंत होता है। इसलिए तल्लीन पड़ीं हैं’ बेटियाँ जीवराजा की खोज में।
सभी बेटियां : प्रणाम पिताश्री, प्रणाम माताश्री। 2-बेटी → पिताश्री। हमारी भावना है कि हम अपना शेष जीवन ब्रह्मचर्य मय बिताएँ।
पिता : (आश्चर्य से) पुत्रियों में वृद्ध होता जा रहा हूँ यदि तुम सबने ब्रह्मचर्य ले लिया तो इस राज्य के कुल दीपक का क्या होगा। 3-बेटी → पिताश्री। यह राज्य, जिसके लिए हम अपना जीवन समर्पित कर रहे हैं, वह तो नश्वर है, क्षणभंगुर है, स्थायी रहने वाला नहीं है। 4-बेटी → हाँ पिताजी। देख रहे जो आँखों से वह होगा इक दिन नाश, अविनाशी निजरुप लख जो है तेरे पास। 5-बेटी → हे जनक। असंख्यात प्रदेशी आत्मा ही तो मेरा राज्य है, वही शाश्वत रहने वाला है। यह राजा अदि के पद तो अपद हैं।
भजन : मोक्ष के प्रेमी हमने, कर्मों से लड़ते देखे मखमल पर सोने वाले, भूमि पर पड़ते देखें। भोगों को त्याग चेतन, जीवन ये जाये बीता, -2. तृष्णा न पूरी हुई डोली पर चढ़ते देखे। मोक्ष के प्रेमी हमने कर्मों से लड़ते देखे ॥
संचालन : इस प्रकार छहों पुत्रियों ने ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर कुछ समय पश्चात् आर्यिका दीक्षा ली और वन में निवास करने लगी। वास्तव
में “वनवासी व्यवहार कहत है, निज में निवसन हारे हैं।” एक ओर पुत्रियाँ अपनी अस्ति की मस्ती में मस्त हैं। और दूसरी ओर राजा विक्रमजीत को अपनी प्रजा के प्रशासन की चिंता खाए जा रही है। आइए देखते है राजा अपनी चिंता, किस प्रकार व्यक्त करता है।
रानी : महाराज ! क्या मैं आपकी आकुलता का कारण जान सकती हूँ।
राजा : रानी तुम कितनी निर्दयी हो, क्या तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती। मैं वृद्ध होता जा रहा हूँ। मैं भी अपना कल्याण करना चाहता हूँ। और तुम हर पुत्री में ऐसे संस्कार भर देती हो, कि वह उत्तराधिकारी बनने की उम्र होते ही ब्रह्मचर्य-व्रत धारण कर लेती है।
रानी : यह मनुष्य की पर्याय और उसमें भी जैन कुल के साथ अच्छे संस्कार ये तो उत्तरोत्तर दुर्लभ है। पुत्रियों के ब्रह्मचर्य व्रत पर तो आपको प्रसन्न होना चाहिए। कहा भी है न- यह मानुष पर्याय, सुकुल सुनिवों जिनवाणी इह विधि गए न मिलै, सुमणि ज्यों उद्धि समानी।
राजा : परन्तु रानी। मैं एक न्याय प्रिय राजा हूँ मुझे अपने राज्य का प्रशासन भी तो चलाना है। इसलिए अब मैंने निर्णय कर लिया है कि अब जो संतान होगी उसका तुम्हें मुख भी न देखने दूँगा। पालन पोषण तुम नहीं करोगी। ताकि मेरे सर से राज्य का बोझ उतर सके।
रानी : हे स्वामी। मैं भी चाहती हूँ कि आपकी छः पुत्रियाँ जिस मार्ग में लगी हैं, आप भी उसी मार्ग का अनुसरण करें। मैं अब की बार संतान को ऐसे संस्कारों से संस्कारित करूँगी कि वह शीघ्र ही आपकी उत्तराधिकारी बनेगी। लेकिन कृपा कर मुझे संतान के पालन पोषण से ब वंचित न करें।
राजा : (रोष में) मेरा निर्णय अंतिम निर्णय है।
(इतना कहकर राजा वहाँ से प्रस्थान कर लेता है।)
रानी : (विचार करते हुए) ऐसी संतानों का पालन पोषण- तो अनादिका से किया’, यदि संतान मेरी है तो शाश्वत क्यों नहीं रहती। इस भव में एक बार आत्मा का पालन पोषण कर लिया तो अगले अनंत श्रवों में नहीं रुलना पड़ेगा।
संचालन : हम जब भी किसी महिला शासिका को देखते हैं तो हमारी
प्रतिक्रिया : आश्चर्यजनक क्यों हो जाती है। क्या हम ऐसा मानते हैं कि महिलाऐं शासन नहीं कर सकतीं। तो यह मान्यता गलत है। इतिहास के पन्नों को पलटा जाए तो ऐसी कई महिलाएं सामने आएंगी जिन्होंने भा शासन किया है। उदाहरण के तौर पर रजिया सुल्तान और देवी अहिल्या बाई। वर्तमान समय में भी हमारी इस मान्यता को प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने पांच साल शासन कर और किरण वेदी ने IPS अफसर बनकर गलत सिद्ध कर दिया है। कुछ ऐसी ही स्तथा राजा विक्रमजीत की है। आइए देखते हैं वह अपनी सातवीं पुत्री को शासिका बनाने के लिए कैसे चावमां से संस्कारित कराता है। [ राजा पुत्री को धाय माता को सौंप देता है ]
राजा : इस पुत्री को मैं तुम्हें सौंपता हूँ कि इसकी रग रग को न्याय नीति और प्रजाप्रेम से भर दो। इसे ऐसे संस्कार देना कि यह
कभी आर्यिका : व्रत धारण करने के बारे में विचार भी न करे।
धाय : जो आज्ञा महाराज! आपकी पुत्री अब आपके पदचिन्हों पर ही चलेगी।
(कुछ सालों बाद) धाय माता पुत्री को क्या संस्कार देती है देखते है।
धायमाँ : जानती हो राजकुमारी “बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी शिवपुर को ही रानी थी खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थीं।” राजकुमारी इसी तरह तुम्हें भी अपने पिता के राज्य को सम्भालना है।
संचालन : :: “धाय के सँग पढ़ती थी वह धाय के संग खेली थी बरछी ढाल कृपाण कटारी उसकी यही सहेली थी:” राज्य संस्कारों में पली बड़ी राजकुमारी अपने पिता से अस्त्र-शस्त्र चलाने की कलाओं में निपुण हो जाती है। एक दिन पिता अपनी पुत्री
से क्या वार्तालाप करता है आइए देखते हैं-
पिता : पुत्री। क्या तुम जानती हो मैंने तुम्हें तुम्हारी मां से दूर क्यों रखा है?
पुत्री : शायद इसलिए कि मेरी माँ बुरी है।
पिता : नहीं बेटी तुम्हारी मां तो अच्छी है परन्तु तुम जानती हो तुम्हारी
तुमसे पहले छ : बहनें और भी।
पुत्री : फिर क्या हुआ पिताजी?
पिता : तुम्हारी मां के धार्मिक संस्कारों से तुम्हारी छहों बहनों ने ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार कर लिया। किसी ने भी मेरे बारे में विचार न किया परन्तु पुत्री मुझे तुमपर पूर्ण विश्वास है तुम इस राज्य का कारोबार अवश्य सम्भालोगी।
पुत्री : हाँ पिताजी मैं आपको वचन देती हूँ कि मैं ही इस राज्य की उत्तराधिकारी बनकर आपके कुल का दीपक कभी बुझने नहीं दूँगी।
पिता : वाह! बेटी मुझे ऐसी ही पुत्री की आकांक्षा थी।
सचातन : ऐसी ही राज्य की शिक्षाएं ग्रहण करते - वह 18 वर्ष की आयु में पदार्पण करती है। एक बार राजा युद्ध की तैयारियाँ कर रहा था तभी पुत्री वहाँ आकर राजा से क्या कहती है -
पुत्री : पिता जी आप ये अस्त्र-शस्त्र कहाँ लेकर जा रहे हैं।
राजा : बेटी मुझे बहुत जरूरी युद्ध लड़ने जाना है। मुझे इस युद्ध में विजयी होना अनिवार्य है।
पुत्री : मेरे होते हुए आप इस युद्ध में क्यों जाएँगे, आखिर आपने मुझे युद्ध लड़ने की शिक्षाएँ इसी दिन के लिए तो दीं थीं।
राजा : परन्तु बेटी दुनिया क्या कहेगी कि पुत्र के न होने से राजा ने घर की बेटी को युद्ध करने भेज दिया।
पुत्री : नहीं पिताजी। सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग। पिताजी चाहे कुछ भी हो जाए मेरे होते मैं आपको इस उम्र में युद्ध लड़ने नहीं जाने दूँगी। मैं जाऊँगी और आपके आशीर्वाद से जीतकर भी आऊँगी।
राजा : ठीक है बेटी। विजयी भवः, परन्तु बेटी तुम प्रथम बारह युद्ध लड़ने जा रही हो तो एक बार अपनी माता से मिल लेना चाहिए। तुम्हें
पुत्री : जो आज्ञा पिता जी ।
पुत्री : मां, अरे मां आप कहां हैं?-
रानी : अरे वाह बेटी । तुम कितनी बड़ी हो गई हो। और तुम्हें पिताजी ने मुझसे मिलने की आसा दे दी।
पुत्री : हां मां । आप जानती हो पिता जी कह रहे थे कि तुम्हारी मां बहुत धार्मिक है तो तुम्हें उनका आशीर्वाद लेलेना चाहिए ।
रानी : अच्छा बेटी । पिता जी ने ऐसा कहा !!! पर अचानक -----
पुत्री : मां मैं प्रथम बार युद्ध लड़ने जा रही हूँ। इसलिए मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए कि मैं इसमें जीतकर आऊँ ।
रानी : हां पुत्री मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है। तुम भी. अपने पिता के समान शूरवीर बनो, प्रजा का पालन करो। लेकिन मेरी, बात याद रखना, मैं आशीर्वाद के रूप में तुम्हारे गले में यह पत्र बांध रही हूँ। यदि कोई विपत्ति आ जाए तो इसे खोलकर पढ़ लेना इसमें हर विपत्ति का समाधान लिखा है। J
बेटी : ठीक है मां । अब आर्शीर्वाद दीजिए में युद्ध के लिए प्रस्थान करती हूँ।
रानी : श्री विजयी भवः ।
संवालन : घोड़े पर सवार राजकुमारी अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित अपनी सेना के साथ रण भूमि में प्रस्थान करती है। और दूसरी ओर राजा माहेन्द्र अपनी सेना के साथ वहाँ उपस्थित है। राजा साहेन्द्र को अब एक स्त्री के साथ युध करना पड़ेगा यह देखकर वह अपने विचार व्यक्त करता है।
विपक्षी राजा : क्या हुआ. राजा विक्रमजीत को, क्या स्वयं महलों में चूड़ियाँ पहन कर बैठे हैं? जो एक पुत्री को युद्ध लड़ने भेज दिया।
पुत्री : महक्षणा महाराज - चूड़ियाँ पिता श्री ने पहनी है या आप पहनेंगे इस बात का निर्णय तो युद्ध के पश्चात् ही होगा।
वि : राजा: आखिर विक्रमजीत की ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि उन्हें अपने प्राणों से प्यारी बेटी को युद्ध करने भेजना पड़ा ।
पुत्री : महाराज । पिताजी ने विचार किया कि आपसे जीतने के लिए तो उनकी पुत्री ही पर्याप्त है इसलिए उन्होंने रण भूमि में आने का
कष्ट न किया । तो युद्ध प्रारंभ करें महाराज ।
संचालन : आकाश को गंजायमान करती हुई शंखनाद की ध्वनि के साथ युद्ध प्रारंभ हुआ । परन्तु जो च्छो देखी वीतराग ने, सो-सो होसि वीरा रे अनहोनी होसि नहिं कबहुँ काहे होत अधीरा रे ।
पुत्री : (विचार मग्न, चिन्तित) अब तो युद्ध जीतने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे । हे प्रभु । अब मैं क्या करूँ । अरे। माँ ने जो पत्र - गले में बांधा था उसे पढ़ लेती हूँ । हो सकता है उसमें कुछ युद्ध जीतने का उपाय मिल जाए । देखती हूँ उसमें क्या लिखा है। निश्चय से मैं एक हूँ, शुद्ध हूँ, "अहमेक्को खलु सुद्धो, दंसणणाणमय हूँ, सदा अरुपी हूँ, किंचित मात्र भी अन्य पर द्रव्य परमाणु मात्र भी मेरा नहीं है। ये निश्चय है। ओहो ।।। मैं ये क्या करने जा रही थी। इतनी हिंसा, इतनी लड़ाई मात्र उस राज्य के लिये जो मेरा है ही नहीं। मेरा तो बस एक जीवराजा ही है। (भजन: जब एक रतन अनमोल है तो - - - - - ) अगर युद्ध लड़ना ही है तो कर्मों से क्यों न लड़ा जाए। ताकि अंत में जो मिलेगा वह मेरा अपना होगा। और इसमें जीतने का आनंद भी अपार होगा। अब तो मैं भी ब्रह्मचर्य व्रत धारण करूँगी और अपनी ब्रह्म स्वरूपी आत्मा में रमण करूँगी। संचालन न इस प्रकार रानी मदालसा की सातवीं पुत्री भी गर्भ के संस्कारों के निमित्त से स्वाधीनता के पथ पर निकल पड़ती है।
भजन : सफक करी ले मानव नूँ अवतार, आलम तू थारो विचार करिले OR
जहाँ राग द्वेष की गँधा नहीं बस : - - - ।
प्रूफरीडिंग बाकी है
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