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समय : एक खोज रहस्य की

Samay: Ek Khoj Rahasya Ki

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नाटक : समय : एक खोज रहस्य की..!

नाटक -:समय: एक खोज रहस्य की..!!

यह खोज कोई आम खोज नहीं थी, यह वह इतिहास था जो आगे जाकर हमारा भविष्य तय करने वाला था। इसे सुरक्षित रखने में हमारे पूर्वजों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। पर उन्हें ज्ञात नहीं था; की समय के पड़ाव और इंसान के अज्ञान उस बलिदान की कीमत को ना की उपयोग कर वरन अलमारियों में सुरक्षित करके दी जाएगी!

पर वह अमृत ही क्या जो अमरता ना प्रदान कर सके। अब बस या तो विधाता या हमारे पूर्वज ही जानते थे उस रहस्य में किस सत्य का उद्घाटन किया गया है।

उस समय, 1910 का दशक चल रहा था एक तरफ भारत अंग्रेजों का गुलाम था वही दूसरी ओर इंसान अपने अज्ञान धर्म को अनेक संप्रदायों में बांट लिया गया था। इंसान में भेदभाव की समस्त सीमाओं का उल्लंघन कर दिया

अज्ञान का प्रकोप इतना तीव्र था जिसने जगत के समस्त प्राणियों को कोल्हू के बैल की भांति भार वहन कराता और घास के नाम पर भी मात्र सपने दिखाता था।

बचपन में सभी थे कोई अपने ज्ञान की शान में कुछ अपनी दीनता की दुकान में।

पर किसे क्या पता था प्रकृति बदलाव मांगती है, और हुआ भी वही क्यों की सत्य छुपाए नहीं छुपता…!

प्रथम दृश्य

(अभी उरूखन ताजे है..!)

01/4/1910

दोपहर गर्मी का समय था। तड़ष्क ती हुई धूप धरती के पानी को सुखा नहीं थी, वही दूसरी ओर इस परिवर्तन के कारण लोगों के हृदय का पानी सूख गया था।

बे बौखला उठे थे उन्हें यह परिवर्तन कतई स्वीकार नहीं था।

अतः इसे बदलने में उन्होंने एड़ी चोटी का जोर लगाया।

(कमरे दो सेठ एक मुनीम बैठे हुए थे, सभी के चेहरों पर एक शिकन थी, जो साफ तौर से किसी अनहोनी की अभिव्यक्ति कर रही थी।)

अंततः धन्ना सेठ ने अपना मौन तोड़कर कहा- यह गद्दारी का शंखनाद है!?

यह षड्यंत्र हमारे धर्म को विध्वंस करने के लिए रचा गया है। अभी कोई कठोर कदम नहीं उठाया गया यह छोटी सी चिंगारी भूचाल ला देगी।

अमीर चंद्र -:ऐसे कैसे कोई एक व्यक्ति हमारे पूरे संप्रदाय को नीला में हिला सकता है। आखिर क्यों? लोग उसकी बातों से इतना प्रभावित हो जाते है। कि जो कोई उसके पास आता है, उसका ही रह जाता है। खैर उसका क्या दोष, उस व्यक्ति को महात्मा भी तो हम ही ने बनाया था।

कबूल चंद -:हमने तो सुना है, उसके पास एक रहस्यमई पुस्तक है, जिसमें अमर होने के अमृत मंत्र लिखे हुए है। बस शर्त इतनी है, कि यदि उन मंत्रों को बिना किसी पक्षपात के सच्चे हृदय से पढ़ा जाए तो जीव अमर हो सकता है।

धन्ना सेठ -:अभी इन सब बातों का समय नहीं। पर गौर करने की बात यह है, कि वह हमारा मजहब को छोड़ अन्य मजहब को स्वीकार करने जा रहा है। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो वह हमारे मजहब, धर्म, को लांछन लगा रहा है। खुदा शिद्द करना चाहता है।

अमीरचंद - पर हम भर भी क्या सकते है, अंग्रेजी हुकूमत का स्पष्ट बयान भारत का प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र है, अपने व्यक्तिगत धर्म को चुनने में, उस रूप परिवर्तन करने में।

धन्ना सेठ - नहीं, नहीं!! शायद आप लोग उस भविष्य की कल्पना भी नहीं कर पा रहे है, जो वर्तमान के पहलुओं से जुड़ा हुआ। ध्यान रखिए गा जो आज होगा, वही कल दोहराया जाएगा।

कबूल चंद -: होगा तो वही जो सर्वज्ञ ने देखा होगा। बस अंत में पछतावा ना रह जाए कि हम कुछ कर ना सके। फिर चाहे छल से या बल से उस रहस्य को दफनाना ही होगा..!

दूसरा दृश्य-

(कभी, कभी अनहोनी जानते हुए भी चुप रहना पड़ता है..!)

गुलाब भाई - भैया, परिवर्तन जरूरी है, संप्रदाय में रहते हुए वह काम ही नहीं हो सकता? भइया आप तो जानते ही हमारे माता पिता ने तो बचपन में ही हमारा साथ छोड़ दिया था। अब हम और शांत बर्दाश्त नहीं कर सकते
(गुलाब भाई की आंखे भर आती है)

संतलाल -: गुरु, बात मात्र परिवर्तन की नहीं है, वरन बंधन की। मुझे वहां घुटन होती है, मैं खुल के सांस भी नहीं ले सकता। क्या इस वेश में बंधने के लिए मैं घर और तुम्हें छोड़ा था

लेकिन ||जब से मुझे अमुक, अमोघ, रामबाण शास्त्र मिला है मानो मुझे सारी ही निधियां प्राप्त हो गई हो
ओम नमः समय सारायः
अरे भाई मैं अमर हो गया हूं,

कमल भाई -:बड़े भैया ऐसी मुक्ति किस काम की जो आपके मृत्यु की घोषणा करे। आपको हमसे छीन ले

संतलाल -: कमल मैं क्या करूं! यह रहस्य, यह मंत्र मेरे हृदय में समाते नहीं, बार-बार बाहर निकल आता है। मैं चाहता हूं जिस आनंद उसको मैं पी रहा हूं सभी पिए

कमल भाई -:आप समझते क्यों नहीं, पूरे प्रदेश में षड्जत्र के बीज बोए जा रहे है, इंसान इतना नीचे गिर गया है, कि अपना प्रयोजन साधने के लिए दूसरे इंसान की हत्या तक कर सकता है। पूरे प्रदेश में हिंसा का माहौल सबके दिल और दिमाग पर छाया हुआ। ऐसे में आप इस संवेदनशील घटना को अंजाम कैसे दे सकते है !!

संतलाल -: वाह भाई वाह क्या खूब पहचान की तुमने हमारी, मैंने सोचा था मेरे अपने तो मेरी भावना की कदर करेंगे पर वे तो मुझे कायर समझते है।

बस ! सत्य के उद्घाटन के लिए शरीर का बली भी दी जाए तो मैं हंसते-हंसते दे दूंगा, ये वीरों मार्ग यहां कायरता की गुंजाइश नहीं..!

तो घोषणा करवा दो आज से 13 दिन पूर्व संतलाल अपना धर्म परिवर्तन करें गा…!!

07/04/1910
(ये शांति कैसी..!)

अगले 6 दिन बड़ी ही शांति से पूरे मानो कुछ हुआ ही नहीं हो। यह शांति कहीं ना कहीं एक बहुत भयंकर तूफान की घोषणा कर रही थी, इसकी भनक तक किसी को नहीं थी।

षड्जत्र काफिरों ने अपना षड्जत्र की योजना को अंजाम देने की ठान ली थी। उसके लिए उन्होंने अपना सबसे बढ़िया औजार बनाया अखबार.. उस समय दोषी से अनजान लोग अखबार की महत्ता को समझते थे।

दृश्य तीसरा

(12/04/1950)
(समझ या समझौता)

(धन्ना सेठ, अमीरचंद, कबूल चंद मुनीम संतलाल की कुटिया में प्रवेश करते हैं)

कमल भाई- (गुस्से से) आप तो अचंभित होगे !! कि अब तक हमारे भैया जिंदा कैसे है। खैर आपु का कब नष्ट हो या यह तुम्हारे और हमारे हाथ में नहीं यह कर्मों के हाथ में।

संतलाल- कमल..! यह कोई बात करने का तरीका है, हमारे बड़े बुजुर्ग है।

कबूल चंद मुनीम- नहीं, संत यह तुम्हारी मीठी, मीठी बातों से हम नहीं फिसलने वाले, यदि खैरियत चाहते हो, तो परिवर्तन की जिद छोड़ दो, तुम्हारा स्थान समाज में वैसा ही रहेगा जैसा पहले था।

संत लाल- मुनीम जी यह मेरा हठ नहीं है, यह मेरा जीवन है, मैं इसे त्याग नहीं कर सकता। अरे मेरी खोज का प्रथम बिंदु ही मुक्ति था, जो कि मुझे प्राप्त हो गई है अब मैं उस स्वतंत्रता किसी के भय आकार कैसे छोड़ दूं।

धन्ना सेठ- अरे यह कैसी स्वतंत्रता है, जो पुण्य को पाप के समान बताती है। पापी को पाप करने की आजादी देती है। जिसे पूरी दुनिया एकजूट हो कर असत्य कह रही हो और तुम अकेले उसे सत्य कैसे मान सकते हो।
कहा गया तुम्हारा विवेक, तुम्हारी बुद्धि की तीक्ष्णता जिस पर हमारे समाज के लोग फिदा हुआ करते थे।

संतलाल- शायद आप उस सत्य परखने में चूक कर गए।

मैं पाप करने की आजादी नहीं दे रहा था। बस इतना कह रहा था कि पुण्य में धर्म नहीं है। पाप से नरक का बंध होता है तो पुण्य से भी स्वर्ग बंधता है। आत्मा मुक्त नहीं होती।

अमीरचंद- हमने तुम्हारी सोच से इंकार नहीं है पर परिवर्तन क्यों…?

संतलाल- काका मैं इन आचार्यों का ऋणी हूं। जिन्होंने मुझे यह स्वतंत्रता प्रदान की है। मैं उनके साथ दगा नहीं कर सकता। मैं अपने संप्रदाय में रहकर उनकी बातों को अपने संप्रदाय की कहकर परोसू तो यह उनके साथ विश्वासघात होगा। ऐसा कर कर मैं अपने आप को इस पीने-पिने से अनंत काल में भी मुक्त नहीं कर पाऊंगा।

कबूल चंद मुनीम- लगता है, तुम इस समझौते से तैयार नहीं

संत लाल- सत्य को समझा दो जा सकता है, पर उसे समझौता नहीं किया जा सकता

(तभी अंग्रेजी सरकार के 4 सफाई बंदूक ले संतलाल की कुटिया में प्रवेश करते है)

आपको समाज में व्यभिचार फैलाने के अर्थ पुण्य को पाप के समान बताने के अर्थ समाज में आपराधिक गतिविधियों को प्रोत्साहन करने के अर्थ गिरफ्तार किया जाता है…

इधर सबसे अनजान 6 दिन बहुत ही शांति से व्यतीत होने के कारण गुलाब भाई और कमल भाई चैन की नींद सो रहे थे सुबह के 5:00 बजते है। गुलाब भाई अपने बिस्तर से खड़े होकर स्नान आदि से निवृत्त होते ही थे कि समय ने अपना नया पड़ाव प्रारम्भ कराता है।

तभी काले ढोरे से बना हुआ अखबार पत्र दरवाजे पर दस्तक देता है। कमल भाई दिनचर्या के तहत दरवाजे को खोलते है, अखबार को उठाते है, पर उनके मन में बेचैनी उत्पन्न हो जाती है, वह सोचते है कि यह काले धागे में कैसे..???

जैसे ही वे अखबार खोलते है। उनकी आंखे चकरा जाती है, चेहरा पानी पानी हो जाता है, उनको उम्मीद भी नहीं थी कि यह 6 दिन की शांति इस तरह से विपत्तियां लेकर हम पर बरसेगी,

गुलाब भाई- (जोर से चिल्लाते है) कमल, कमल…
कमल भाई- अचंभे से खड़े होकर भैया के पास जाते है और कहते है मजले भैया क्या हुआ ?..
क्या और क्यों प्रश्नों के उत्तर में रास्ते में दूंगा। अभी जल्दी तैयार हो ताकी बड़े भैया के पास जल्द से जल्द पहुंच सके।

(दोनों भाई संतलाल जी की कुटिया पर पहुंचते है)

उनके चरणों के पास जाते है, रूठे कंठ से बोलते है, भैया सब ठीक तो है ना! आप कुशल से तो हो ना!

संत लाल- (ओम नमः समय साराय) क्या हुआ इतने घबराये हुए क्यों हो, और भला अनादि से जिसमें कुछ ना हुआ हो, उसमें अब क्या नया होगा!

गुलाब भाई- भैया ! आप परिस्थिति की गंभीरता को समझो परिवर्तन की घोषणा को लगभग 6 दिन व्यतीत हो चुके है, हम समझ रहे थे, कि समाज ने हमें माफ कर दिया, वे सब कुछ भूल गई होंगे, पर यह हमारी गलतफहमी थी।

कमल भाई- यह शांति के 6 दिन उनकी बदले की भावना में क्रोध का घी डाल, डाल कर रहे तीव्र करने में व्यतीत हुए। उसी का परिणाम है यह आज के अखबार में दिया गया आलेख…

संत लाल- पर मुझे तुमसे एक अपेक्षा है। तुम्हारी वाणी में भी मुझे कषाय की गंध आ रही है, तुम भी उन्हें उन्हीं नजरों से देख रहे हो, जिन नजरों से वे तुम्हें।
मैं चाहता हूं ! कि तुम अपना दृष्टिकोण बदलो ..

पाप को बुरा समझो पापी को नहीं…!
अरे वह पर्याय तो नाश होने के लिए ही पैदा हुई थी उसके पीछे की वस्तु देखो ना..!

कमल भाई- भैया आपकी आज्ञा शिरोधार्य भले हम उन्हें अपना दुश्मन नहीं माने। पर अपनी सुरक्षा का इंतजाम तो पहले से कर ही सकते है!

संत लाल- अच्छा ठीक है अरे..! गुल्लू पढ़ना तो, क्या लिखा है, आखिर अखबार में..

गुलाब भाई- सावधान …! सावधान..!
नगर के नागरिको सावधान..! साधु का भेष धारण हुआ एक बहुरूपिया हमारी समाज में खुलेआम घूम रहा है। वह लोगो को वश में करना जानता है, उसे जादू टोना आता है। कही जाता है, उसके पास एक रहस्यमई पुस्तक है जिसके मंत्रों द्वारा लोग ‘भ्रष्ट’ हो जाते है, जो कोई उससे पास जाता है उसका ही हो जाता है।
हमेशा एक ही मंत्र का जाप करता रहता है नमः समय साराय
पुण्य को पाप के समान बताता है। बलात्कारी और ब्रह्मचारी में भेद नहीं करता। दो टूक शब्दों में कहा जाए वह हमारी समाज को व्यभिचारी बनाना चाहता है।
इसीलिए नागरिको जागो..! अभी अवसर है, इसे हाथ से मत जाने दो।
इस को अंजाम है हमारे समाज के बड़े प्रतिस्थापित अधिकारियों ने उसे समाज से बहिष्कृत करने की ठान ली है। पर इस मुहिम में वह आपका साथ मांगते है।
आप उसे अपने घर में प्रवेश करने ना दे। यदि वो आपके घर के सामने आए तो काले झंडे दिखाए जाए। अपने खिड़की दरवाजे बंद कर ले ताकि उसे एहसास हो की हमारा पूरा समाज एकजुट हो उसके विरोध में है..!

नाटक-संवाद

वे संत लाल को हथकड़ियां पहनाते हैं
गुलाब भाई: अपराध है, आप कैसे किसी निर्दोष को इतना बड़ा दंड दे सकते हैं, हमारे भैया निर्दोष हैं, उन्होंने किसी को कोई चोट नहीं पहुंचाई, यहां तक कि किसी को कोई अपशब्द भी नहीं कहा। आप किस आधार पर इतना गंभीर आरोप हमारे भैया पर लगा सकते। में ये नही होने दूंगा।
संतलाल: गुलाब हठ मत करो, इस देश के कानून का पालन करना हमारा सर्वप्रथम कर्तव्य है, उसी ना मानकर में कोई जुर्म नहीं करना चहता और जो मेरी नियति में लिखा होगा वह मुझे स्वीकार तुम क्यों उसके आड़े आते हैं

अंतिम दृश्यः- हृदय परिवर्तन

13/04/1910

संतलाल को अंग्रेजी सरकार द्वारा फांसी की सजा सुनाई जाती है उसके पहले उन्हें फांसी दी जाए उसके पूर्व उनकी अंतिम इच्छा पूछी जाती है। जिसे वह इस प्रकार से जाहिर करते हैं

संतलाल कहते में एक पत्र लिखना चहता हूं, और उसे में अपने भाई को देना चाहता हूं..।
संतलाल को पूरे बाजार के बीच फासी की सजा दी जाती है।

पत्र गुलाब भाई को दीया जाता जो समाज के सामने उसका वाचन करते है
मुझे बहुत दुःख हुआ यह जानकर की मेरे कारण आप लोगों को कितनी तकलीफ उठानी पड़ी, पीढ़ा सहन करनी पड़ी। पर में विवश था उस सत्य के प्रति, अपने प्रति, उस महान जैन धर्म के प्रति। में चाहकर भी उस सत्य से समझोता नही कर सकता था। वो ग्रंथ ही जिसने मुझे यह बल प्रदान किया, में चाहता तो यहां से भाग भी सकता था पर वह ग्रंथ मुझे यह कायरता करने की आज्ञा नहीं देता। खैर अब आपको कोई पीड़ा सहन नही करनी पड़ेगी, ये जो हुआ है वह हमारी नियति है, इससे हमे भागना नहीं इसे स्वीकार करना होगा ।
यह पत्र यदि आपको मिले तो इसे जन जन तक पहुंचा या जाए ।
उनसे कहा जाय अब आप की स्वतंत्रता कोई भी नही छिनेगा, क्यों की आपका धर्म, मंदिर में, भगवान की मूर्ति में नहीं पूजा में नही, वो आपकी अपनी आत्मा में जिसे आप जब जिस समय चाहे प्राप्त कर कर सकते है।
अंत में यहीं चाहूंगा कोई किसी दोषी न देखे सब वस्ताब में परम पवित्र बस उसे देखना आना चाहिए।
नमः समय साराय…।


स्रोत · Source: forum.jinswara.com — अनुमति सहित, साभार · shared with permission and thanks.

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