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दशलक्षण महापर्व 2026Dashlakshan Mahaparv 2026

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समाधि आत्म साधना

Samadhi Atma Sadhana

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समाधि आत्म साधना — 13 दृश्यों का सामाजिक-धार्मिक नाटक: एक संयुक्त परिवार में माँजी की बीमारी, संयम-नियम और समाधिपूर्वक मरण की ओर उनकी यात्रा; उत्तम क्षमा के संदेश के साथ। पूरा संवाद-पाठ नीचे, मूल PDF (23 पृष्ठ) संलग्न।
Samadhi Atma Sadhana — a 13-scene family drama on illness, self-restraint and a peaceful, samadhi-oriented end of life.


पात्र : धैर्या मिष्ठी बच्चे (सहज, ओम, अव्य, अर्विक, काव्य, अर्हम, शुभ, आरव, अयन बड़ा बेटा (अनेकांत) मजला बेटा (सम्यक) छोटा बेटा (स्वानुभव) दादी साधर्मी

प्रथम दृश्य

धैर्या : ये बच्चे अभी तक नहीं आए न जाने कहाँ रह गए?

मिष्ठी : तुम परेशान क्यों होती हो? तुम अच्छे से जानती हो कि वे कितने शरारती हैं! रास्ते में होंगे या फिर आते ही होंगे।

धैर्या : हां भाभी! वह तो है, लेकिन आज ना इनको आने दो, आज तो जरूर डांट लगाऊंगी इनको ।

मिष्ठी : (हंसकर) तुम भले ही अभी इतना गुस्सा हो रही हो लेकिन जब वे लोग आएंगे तो यह तुम्हारा गुस्सा उन लोगों को देखते ही छूमंतर हो जाएगा।

धैर्या : नहीं भाभी, नहीं आज चाहे कुछ भी हो जाए आज मैं ना जरूर डांट लगाऊंगी। तभी बच्चे आ जाते हैं।

धैर्या : ये देखो आ गए सारे आज तो आने दो इन्हें, पहले तो यह बताओ कहाँ थे अभी तक? इतनी लेट कैसे हो गए?

पहला बच्चा : मम्मी, इससे मुझे लेट कराया।

दूसरा : नहीं, इसकी वजह से लेट हुए।

तीसरा : औ रे झूठी… तूने ही मुझे लेट बोल नहीं दी थी?

(इस तरह तीनों में आपस में बहस होने लगती है)

धैर्या : चुप, बिलकुल चुप! तुम सब बच्चे बहुत शरारती हो गए हो, देखो! यह कैसे लड़ रहे हो? यही सिखाया हमने तुम्हें?

सारे बच्चे : - सॉरी मम्मी अब हम लड़ नहीं रहे हम तो बस…

मिष्ठी : अच्छा देखो ना अब तो इन लोगों को अपनी गलती का एहसास भी हो गया अब तो माफ कर दो।

बच्चे : हां छोटी मां प्लीज ना माफ कर दो ना।

दूसरा : मां! प्लीज पक्का अब आगे से कभी लेट नहीं होंगे।

तीसरा : हां मां, अब तो माफ कर दो मेरे पेट में चूहे कूद रहे हैं, बहुत जोरों की भूख लग रही है मां।

धैर्या : क्या भूख लग रही है? चलो तुम सब का भोजन तैयार है। जल्दी हाथ धो लो, फिर भोजन करना।

बच्चे : हां मा, बस हम अभी आते हैं।

मिष्ठी : अच्छा सुनो, अपने पापा और बड़े पापा से बोल देना भोजन के लिए।

अव्य : जी मां।

धैर्या : भाभी जब तक मैं मां को भोजन के लिए बुला लाती हूं।

दृश्य 2

बड़ा बेटा अनेकांत : आज तो मजा आ गया भोजन में, बहुत स्वादिष्ट भोजन था।

मजला बेटा सम्यक : बच्चों पता है,हमारे बचपन से ही यह फेवरेट रही है। बचपन में पिताजी को बहुत पसंद है तो मां रोज चूल्हे पर मक्की की रोटी बनाया करती थी।

सबसे छोटा बेटा स्वानुभव : और पता है फिर हम तीनों भाई और तुम्हारी बुआ भी मां के पास आकर खाने के लिए बैठ जाते थे।

बड़ा बेटा अनेकांत : - लेकिन जब तक हम नहा धोकर दिन मंदिर नहीं करते तब तक मां भोजन नहीं देती थी।

दादी : बेटा! बचपन में तुम्हारे पापा बहुत शरारती थे मैं उनका झूठ यूं पकड़ लेती थी। बेटा, तुम लोग तो अभी कम शरारती करते हो; बचपन में तुम लोगों के पापा इतने शरारती थे कि मंदिर का झूठा बहाना बना देते और आ के बोलते हम मंदिर से आ गए।

आव्य : लेकिन दादी फिर आपको कैसे पता चला कि वह मंदिर नहीं गए?

दादी : वह माली भैया से मैं पहले से ही कह कर रखती थी की इन लोगों को ध्यान से देखने आ रहे हैं या नहीं आ रहे हैं।

और फिर बस इनका झूठ पकड़ा जाता।

(सब हंसने लगते…)

दादी : बचपन से ही मैं बस यही चाहती थी कि मेरे सारे बच्चे जिन धर्म के मार्ग पर अग्रसर रहे। वे कभी भी जिन मार्ग से विचलित ना हो। हां, इसके लिए मुझे थोड़ा कठोर बनना पड़ा लेकिन उसका फल मुझे आज मिला। मेरे सारे बच्चे, बहु, पोता-पोती अब सब पहले दर्शन करते हैं और फिर भोजन ग्रहण करते हैं।

और जीवन में चाहिए क्या? प्रभु की कृपा से इतना सुंदर परिवार है सब साथ में जुड़कर प्रत्येक कार्य करते हैं आज मन ये देखकर बहुत प्रसन्न होता है। बेटा-बहू ने अपनी जिम्मेदारी संभाल ली है, बस अब तो आराम ही आराम है।

बड़ा बेटा अनेकांत : मां यह सब आपकी कृपा है। अगर आप बचपन में हमें डांट ना लगती तो आज ये संस्कार हमें ना मिल पाए होते।

ओम : मैं यह कैसे करना है मुझे नहीं आ रहा है।

मिष्ठी : बेटा देखो यह ना इधर आएगा

दृश्य 3

बच्चे : मां, मां हम पाठशाला जा रहे हैं।

धैर्या : बहुत अच्छा बच्चों आराम से जाना। सहज, अपने भाइयों का ध्यान रखना।

सहज : हां मां, जय जिनेन्द्र

दादी : बेटा मैं जिन मंदिर जा रही हूं प्रवचन सुनकर लौटूंगी।

(तभी उनकी तीनों बेटे दुकान से आ जाते हैं)

दादी : अरे बेटा तुम लोग आज जल्दी आ गए?

मजला बेटा सम्यक : हां मां आज काम जल्दी हो गया था आप कहां जा रहे हो?

दादी : मैं जिन मंदिर जा रही हूं।

बड़ा बेटा अनेकांत : चलो मां मैं भी चलता हूं।

दादी : अरे बेटा थोड़ा आराम तो कर लो।

बड़ा बेटा अनेकांत : नहीं मन नहीं, आराम तो होता रहेगा।

दादी : अच्छा ठीक है, बेटा चलो।

मजला बेटा सम्यक : अच्छा सुनो, मुझे पानी दे दो जल्दी से। फिर मुझे भी मंदिर जाना है।

छोटी बहू : हाँ, मैं लेकर आती हूँ।

दृश्य 4

प्रवचन

पंडित जी :

आज मैं रास्ते से जा रहा था। वहाँ मैंने देखा कि एक गाय का एक्सीडेंट हो गया था और उसकी सहायता करने वाला कोई नहीं था।

देखकर मन में एक विचार आया-हमारे जीवन का अंतिम समय कैसा होगा?

बहुत बार हम देखते हैं कि जब जीवन का अंतिम चरण आता है, तब न कोई णमोकार मंत्र सुनाने वाला होता है, न कोई समाधिपूर्वक मरण की साधना कराने वाला।

इसलिए हमें अभी से अपने जीवन को इतना सहज और सरल बनाना चाहिए कि किसी भी क्षण मृत्यु हमारे सामने आ जाए, तो हम घबराएँ नहीं।

हम अपनी जिम्मेदारियों के बोझ के नीचे दबे हुए न हों, बल्कि आधि, व्याधि और उपाधि को त्यागकर समाधिपूर्वक मरण की ओर बढ़ने की तैयारी रखें।

आशा है, आप सभी इस विषय पर अवश्य विचार करेंगे और अपने जीवन में समाधि साधना के महत्व को समझेंगे।

और आप सभी के लिए एक बहुत बड़ी खुशखबरी है।

स्रोत · Source: forum.jinswara.com — अनुमति सहित, साभार · shared with permission and thanks.

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