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दशलक्षण महापर्व 2026Dashlakshan Mahaparv 2026

नाटक स्क्रिप्ट · Play script

परिवर्तित कामना

Parivartit Kamna

रचयिता Author: प्रीति (रानी) पुजारी, खनियाधाना · ~45 min पढ़ने में

Original PDF

भौतिकवाद की चकाचौंध में पले दो सम्पन्न परिवारों की बेटियों — सुसंस्कारित माहौल में बड़ी हुई क्रांति और माता-पिता की व्यस्तता के कारण आया के लाड़-प्यार में पली कामना — के जीवन को आमने-सामने रखता एक जैन सामाजिक नाटक। माता-पिता की परवाह किए बिना स्वयं की पसंद से किया गया विवाह कामना के जीवन को किस मोड़ पर ले जाता है, यही कथा का विषय है। पूरा स्क्रिप्ट नीचे,
A Jain social stage play contrasting two daughters of well-off families — Kranti, raised with sanskar, and Kamna, raised amid the glitter of materialism — and where Kamna’s self-chosen marriage leads. Full script inline,


पुरुष पात्र

राजेश : रेणुका का पति

सुरेश : शांता का पति

पुनीत : कामना का पति डाकिया

कृष्णा : राजेश का पुत्र

रानू : कृष्णा का मित्र

अंकुश : कृष्णा का मित्र

राजा : कृष्णा का मित्र

सोमी, मोगली : कृष्णा का मित्र

नारी पात्र

रेणुका : राजेश की पत्नी

(अंग्रेजी पढ़ी लिखी महिला)

शांता : सुरेश की पत्नी

(सामान्य पढ़ी लिखी महिला)

कामना : राजेश की पुत्री

क्रांति : सुरेश की पुत्री

आकांक्षा : रेणुका की सहेली

अनामिका : रेणुका की सहेली

रामसखी : रानू की दीदी

कामिनी : राजेश की छोटी

- : पुत्री

सामग्री

कुर्सी 4 , टेबल 1, क्रिकेट किट, सूटकेस , गिलास 4, प्लेट 4, घंटी, खाली बोतल

परोक्ष

चार दिन की चाँदनी फिर अंधेरी रात। इस जगमगाहट में सिसकती हर अधूरी सांस। यदि रोशनी ही मांगते तो संस्कारों की मांग हो। वरना कटेगी किस तरह रोते हुए हर रात। भौतिकवाद की चकाचौंध से ग्रसित, पर सम्पन्न परिवारों से संबंध रखने वाले दो मित्र सुरेश एवं राजेश। दोनों की एक-एक बेटी जो लगभग एक ही उम्र की थी।

सुरेश एवं शांता की बेटी क्रांति जो सुसंस्कारित माहौल में पली व बड़ी हुई और उच्च शिक्षा प्राप्त करके पूना शहर में सर्विस करने लगी। राजेश एवं रेणुका की बेटी कामना माता पिता की व्यस्तता के कारण आया के लाड़ प्यार में पली एवं बड़ी हुई और वह भी पढ़ाई के बाद बैंगलोर चली गई।

ये परम सत्य है कि बेटी की समस्त जिम्मेदारियाँ माता पिता पर ही होती हैं पर कामना ने अपने माता पिता की किसी भी प्रकार की परवाह न करते हुए स्वयं की पसंद से विवाह कर लिया। विवाह की खबर जब माता पिता को मिलती है तो उनके पैरों तले जमीन खिसक जाती है, रोते हैं, बिलखते हैं, पागल से हो जाते हैं, क्या करें? कुछ समझ नहीं आता। बस बैठकर उन कारणों पर विचार करते हैं जिस कारण उनकी बेटी ने ऐसा कार्य किया। “अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत" पता नहीं हम क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि “संस्कार के बिना सुविधाएं पतन का कारण हैं"। बच्चों के सुंदर भविष्य के लिए सुविधाएं नहीं वरन संस्कार महत्वपूर्ण होते हैं। अन्यथा जोश में होश खो जाता है। और यदि बिना होश के काम हो तो जीवन भर पछताना ही शेष रह जाता है। हम बड़े बुजुर्गों से अधिक समझदार हैं इस भावना का फल न कभी अच्छा मिला है न मिलेगा।

आइए देखते हैं एकांकी परिवर्तित कामना का प्रथम दृश्य प्रथम दृश्य (खेल का मैदान, दोपहर का समय छुट्टी के दिन बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं पर्दा खुलते ही छक्का लगता है उसका शोर उभरता है, सभी दौड़कर रानू को बधाई देते हैं तभी कृष्णा आता है)

कृष्णा : (खेल रोककर बीच में ही) तुम सब यहाँ खेल रहे हो? मुझे क्यों नहीं बुलाया?

रानू : (कृष्णा से) हम तुम्हारे साथ नहीं खेलेंगे तुम अच्छे नहीं हो।

अंकुश : क्यों, क्या हुआ? यह तो कभी झगड़ा नहीं करता, सभी से अच्छे से बात करता है फिर क्यों नहीं खिलाओगे?

राजा : हाँ रानू ! कृष्णा अपना दोस्त है वह तो हमेशा साफ सुथरा भी रहता है तुम्हें ऐसा नहीं बोलना चाहिए।

रानू : अरे! इसकी बहन ने चोरी-चोरी छुपकर न जाने किससे शादी कर ली। मेरी मम्मी कह रही थी कि गंदे लोग ही ऐसा काम करते हैं।

मोगली : उसकी बहन ने शादी की है इसमें उसकी क्या गलती? चलो यार हम तो अब खेलते हैं।

कृष्णा : (उदास चित्त से) नहीं यार, मोगली, रानू सही कह रहा है। मैं तुम लोगों के साथ नहीं खेल सकता। मैं अपने घर जा रहा हूँ। (कृष्णा घर चला जाता है घर पर आकर गुस्से में दीवाल पर गेंद मार देता है मन ही मन चिल्लाने लगता है) मेरे साथ खेलने वाला कोई नहीं… मैं कहाँ जाऊँ.. इतने अच्छे दोस्तों ने भी मेरा साथ छोड़ दिया… दीदी तुम बहुत बुरी हो… तुम्हारे कारण सब हुआ… अब मैं तुमसे कभी बात नहीं करूंगा… (सिसकता है, आँसू पोंछता है) कभी देखूँगा भी नहीं… मम्मी पापा भी कितने दुखी हैं? बीमार हो रहे हैं… तुम क्यों गई दीदी… इस तरह क्यों गई? मैं तुम्हारी शादी में नाचता… जीजाजी से मिलता… मेरे सारे अरमान…तुम्हें मेरी याद नहीं आती क्या? (फूट फूट कर रोता है)

कृष्णा : (घर पर माँ से) माँ, एक बात बताओ, कामना दीदी आजकल कहाँ पर हैं?

रेणुका : (गुस्से में) मुझे नहीं पता।

कृष्णा : पर माँ, आप मुझसे तो कहती हो कि कहीं जाओ तो कहकर जाया करो, तो क्या कामना दीदी आपसे कहकर नहीं गई। जो आपको नहीं पता?

रेणुका : (तीव्र क्रोध में) पता है मुझे, मर गई है वह।

कृष्णा : (प्यार से) माँ आप ऐसा मत कहो, मेरे दोस्त कह रहे थे कि तुम्हारी दीदी ने घर में बिना बताए शादी कर ली। इसलिए पूछ रहा था।

रेणुका : (कृष्णा को गले लगाकर रोते हुए) बेटा, ये सब तुम्हारे काम की बातें नहीं हैं। तुम हाथ मुंह धोकर भोजन करो। (रेणुका कृष्णा को समझा रही थी तभी रानू की दादी माँ रामसखी या जाती है और वह रेणुका से कुछ कहने लगती है…)

रामसखी : रेणुका ! ओ रेणुका !

रेणुका : आई चाचीजी !

रामसखी :

रेणुका :

रामसखी :

रेणुका : रेणुका ! मेरो लाडलो रानू थारे कृष्णा से कछु कह दियो है तू बुरो न मानियो, राम दुहाई वैसे म्हारे मौड़ा ने गलत कछु न कई है तेरी मौड़ी ने कछु अच्छो काम तो करो न है, जो है केययो तो बोई की तेरी मौड़ी भग गई है (व्यंग्यात्मक स्वर में)

(उदास आँचल में चेहरा छुपाकर सिसकने लगती है) अरे ! अब तू रो काय रइ है बड़ी ने जो करयो सो करयो। अब तू छोटी को संभाल के रख कहीं छोटी भी… चाची! अब बस करो। मुझे माफ करो आपके पास कोई और बात हो तो बोलो, नहीं तो मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो।

रामसखी : (जाने की मुद्रा में) मैं तो जे ही कैने आई थी तेरे मौड़ा मौड़ी तेरी न सुनते हों तो मैं समझा दूँ। पर तुझे अच्छो नहीं लग रहो तो मैं घर जाय रही।

रेणुका : चाची! आजकल के बच्चे किसी की सुनते ही कहाँ हैं।

रामसखी : लाडो तुम का जानो बूढ़ों के अनुभव। जानती तो आज जे नौबत नहीं आती। जो न माने बढ़न की सीख ले खपरिया मांगे भीख। (रामसखी चली जाती है, रामसखी के जाने के बाद दरवाजे पर घंटी बजती है रेणुका की सहेली अनामिका और आकांक्षा आती हैं। कामिनी दरवाजा खोलती है।) (घंटी बजती है उसके पहिले कामिनी और उसकी माँ की बातचीत चलती है। माँ रसोई में काम कर रही है तभी कामिनी आती है और माँ से कहती है।)

कामिनी :

रेणुका :

कामिनी :

कामिनी : माँ मैं आपके साथ कुछ काम करवा लूँ। क्यों? तुम्हें कॉलेज नहीं जाना क्या? नहीं माँ। मैं कॉलेज नहीं जाऊँगी।

(तभी घंटी बजती है, कामिनी देखती है फिर माँ को बुलाती है) माँ SSSS … माँ SSSS … आंटी आई हैं।

रेणुका : (खुश होकर) अरे वाह! अनामिका, आकांक्षा तुम। इतने दिनों बाद मेरी याद कैसे आ गई?

आकांक्षा : तुमने इतने दिनों से हम लोगों की खबर नहीं ली। तो हमने सोचा, हम ही खबर ले लें। वैसे तुम इस बार मीटिंग में क्यों नहीं आई?

रेणुका : (फीकी हंसी हँसकर) बस ऐसे ही। आजकल हमारे दिन अच्छे नहीं चल रहे हैं।

अनामिका : (आश्चर्य से) क्या हुआ? ऐसा क्यों कह रही हो?

रेणुका : (दुःख भरे स्वर मैं) अब तुमसे क्या छिपाना? मैं और ये पिछले एक माह से घर से बाहर ही नहीं निकले हैं, घर से निकलो तो लोग ऐसे ऐसे प्रश्न करते हैं जिनके हमारे पास कोई उत्तर ही नहीं होते।

अनामिका : (आश्चर्य से) क्यों ऐसा क्या गुनाह कर दिया तुम लोगों ने।

रेणुका : (धीमे स्वर में) हमारी कामना ने शादी कर ली और हम लोगों को बताया भी नहीं।

आकांक्षा : अरे रे ! ये तो बड़ा बुरा हुआ। ये क्या किया कामना ने?

अनामिका : सच बहिन कैसा समय या गया। बच्चे ऐसा करने से पहले ये भी नहीं सोचते कि उनके माता पिता पर क्या गुजरेगी? (हाथ एवं आँख नचाकर) तुम्हें पता है आकांक्षा, अंशु की लड़की ने भी ऐसी शादी की थी तो अंशु पागल सी हो गई थी और उसके पति तो तब से ही कोमा में हैं। ऐसा सदमा लगा कि आज तक बोले ही नहीं।

आकांक्षा : (सहानुभूति देते हुए) जो माता पिता अपने बच्चों के लिया अपना सब कुछ समर्पित कर देते हैं फिर उनके बच्चे ऐसा कर लें तो दुःख तो होता ही है। रेणुका, लेकिन तुम इतनी उदास मत होओ। जो भाग्य में होता है वही होता है।

अनामिका : रेणुका तुम कह रही हो कि भाईसाहब भी कहीं नहीं जाते तो ऐसे कब तक चलेगा? तुम उन्हें भी समझाओ अभी तो दो बच्चे और हैं तुम्हारे। कामना की गलती की सजा वे दोनों क्यों भोगें?

रेणुका : (चिंतित स्वर में) अरे अब सही चिंता तो कामिनी की ही है। उसके रिश्ते के लिए किस मुँह से किसी के पास जाएंगे। कहीं बात बनेगी भी तो पड़ोस के लोग बातें बनाकर उनका मन बदल देंगे। अभी कृष्णा को उसके दोस्त अपने साथ खिलाना पसंद नहीं करते हैं। कामिनी के कॉलेज में कामिनी की सहेलियाँ तरह-तरह की बातें करते हैं। वह तो कह रही थी, मम्मी मैं अभी कुछ दिन कॉलेज नहीं जाऊँगी मेरे सभी दोस्त मिलकर कामना दीदी की बहुत हंसी करते हैं। मेरे से न सुनते बनता है न कुछ कहते बनता है।

आकांक्षा : (कठोरता पूर्वक समझाते हुए) रेणुका लोग तो कहेंगे ही हम उनका मुँह तो पकड़ नहीं सकते और तुम्हारी बेटी ने गलत किया है तो तुम्हें सुनना भी पड़ेगा। लड़कियां अच्छी संस्कारवान हों तो उनके माता- पिता बहुत भाग्यशाली कहे जाते हैं और यदि लड़कियां ऐसा कुछ कर लें तो वही माता-पिता बदनाम हो जाते हैं।

अनामिका : (गर्वीले स्वर में) ये बात तो सत्य है। मैं तो आजकल का जमाना देखकर सोचती हूँ कि अच्छा है, मेरी बेटी नहीं है, बेटा है वो जैसा निकलेगा तो निकल जाएगा।

आकांक्षा : (स्नेहपूर्ण स्वर में समझाते हुए) ऐसा नहीं है की लड़कों की चिंता नहीं रहती, संस्कार तो सबको देने पड़ते हैं। हम अपनी मौज-मस्ती में, काम-धंधे में व्यस्त बने रहें और बच्चों पर ध्यान ही न दें तो बच्चों को तो बिगड़ना ही है। मैं तो अपने बच्चों का पूरा ध्यान रखती हूँ। पौष्टिक खाना खिलाना, डिब्बे बंद बाजार का कुछ भी नहीं, समय की पाबंदी, नियमित दिनचर्या, थोड़ा व्यायाम कसरत भी और मंदिर पूजा भी। बस मुझे थोड़ा देखना पड़ता है। बाकी दादी, दादाजी उनके पापाजी सभी की ऐसी ही दिनचर्या है तो वे भी वैसा ही करते हैं। अरे ! अनामिका (घड़ी देखकर) समय बहुत हो गया चलो अब चलते हैं। रेणुका अपना ध्यान रखना। यदि सच में दुखों से मुक्त होना चाहती हो तो सत्संग अवश्य करो।

अनामिका : अच्छा अब हम चलते हैं। (रेणुका दोनों सहेलियों को विदा करती है तभी राजेश का मित्र सुरेश घर आता है, रेणुका उनका स्वागत करती है) (सहेलियों की विदा करके रेणुका अपने काम में लग जाती है कुछ दिन इसी प्रकार बीत जाते हैं। एक दिन राजेश का मित्र सुरेश उसके घर आता है) आइए देखते हैं अगला दृश्य…

(घंटी बजती है) दूसरा दृश्य

रेणुका : (स्वागत मुद्रा) भाईसाहब आप, आइए! आइए! बहुत दिन बाद याद किया आपने।

सुरेश : हाँ! भाभी जी बहुत दिनों से आप लोगों से मिलने की सोच रहा था आज आ पाया। राजेश कहाँ है?

रेणुका : हाँ ये अंदर हैं, आप आइए न, बैठिये, मैं अभी इनको बुलाकर लाती हूँ। (राजेश का प्रवेश)

सुरेश : हाँ भाई राजेश नमस्कार ! कहाँ हो आजकल दिखाई ही नहीं देते। सारा कामकाज बंद कर दिया क्या।

राजेश : (उदास मुद्रा में नमस्कार करते हुए) हाँ यार आजकल घर पर ही रहता हूँ। कहीं आने-जाने का मन ही नहीं करता।

सुरेश : क्यों क्या हुआ? तुम इतने उदास क्यों हो? परेशानी क्या है? कुछ मुझे तो बताया होता।

राजेश : (ठंडी श्वास छोड़ते हुए) कुछ नहीं! बस कामना को लेकर चिंतित हूँ।

सुरेश : क्या हुआ कामना बेटा को?

राजेश : (मुहँ फेरकर) क्या बताऊँ; क्या छुपाऊँ ? तुम्हें तो मैं सब कुछ बता ही सकता हूँ! कामना ने हमें मुहँ दिखाने लायक नहीं छोड़ा। उसने विवाह कर लिया।

(रेणुका पानी लेकर आती है। टेबल पर रखती है।)

सुरेश : (आश्चर्य से दुखित स्वर में ) अरे! ये तो बहुत बुरा हुआ। पर राजेश, याद करो मैं तुम्हें हमेशा कहता था कि बेटी का ध्यान रखना, कामना कुछ गलत दिशा न पकड़ ले, पर तुमने मेरी बात पर ध्यान ही नहीं दिया।

रेणुका : (आत्मग्लानि से भरकर) हाँ भाईसाहब हम लोगों की परवरिश में कहीं कमी तो रही है। मुझे अपनी सहेलियों, अपनी किटी पार्टियों से समय ही नहीं मिलता था कि मैं उसे कुछ संस्कार दे पाती।

सुरेश : (चेतावनी देते हुए) अब समझ में आई भाभी जी आपको संस्कारों की कीमत। हम अपने ऐशो आराम, प्रदर्शन, दिखावा आदि में इतने मस्त रहते हैं कि हमारे बच्चे क्या सीख रहे हैं ये जानने समझने की हमें फुरसत ही नहीं रहती। बच्चों के बिगड़ने में कहीं न कहीं तो माता पिता की ही चूक रहती है, बच्चे तो कच्ची मिट्टी के समान होते हैं। बच्चों को संस्कारित करने में माता पिता का आचरण ही सर्व प्रमुख होता है।

राजेश : हाँ भाई, हमें अपनी गलती अब समझ मैं आ रही है पर ये तो बताओ कि अब हमें क्या करना चाहिए? अब वह खुश कैसे रह पाएगी?

रेणुका : (झिड़ककर) आप भी खूब हो उसकी खुशी से हमें क्या लेना? जब हमारा उससे कोई संबंध ही नहीं है तो उसकी चिंता क्या करना? उसने हमें इतना दुःख दिया अब हम उसे कैसे अपना लें?

सुरेश : भाभी जी, अभी आप ही तो कह रही थीं कि गलती कामना की नहीं आपकी है फिर आप ऐसा क्यों कह रही हो कि हमें उससे कोई संबंध नहीं रखना। कहीं आप अपनी बदनामी से तो ऐसा नहीं कह रहीं।

रेणुका : (तीखे स्वर में) बदनाम करने में उसने कौन सी कसर छोड़ी है। मुहँ पर कालिख तो पोत ही दी है। नालायक कहीं की।

राजेश : अरे रेणुका। कामना अपनी बेटी है उसने ऐसा क्यों किया ये तो हमें समझना ही होगा, तुम नाराज क्यों होती हो?

रेणुका : आपके उसी लाड़ प्यार ने उसे बिगाड़ा है उसी कारण उसने इतना बड़ा कदम उठाया। (रोने लगती है)

सुरेश : भाभी जी ! राजेश भी सही कह रहे हैं। एक बार तो हमें कामना से पूछना चाहिए की आखिर उसने ऐसा क्यों किया?

राजेश : (रोते हुए) भाई मेरी तो हिम्मत नहीं है कि मैं उसका सामना कर सकूँ। तुम कुछ कर सकते हो तो कर लो। मुझे तो ऐसा लगने लगा जैसे मेरे हृदय में अब कुछ बचा ही नहीं।

(और तेज तेज रोने लगता है।)

सुरेश : (पास मैं बैठकर सांत्वना देते हुए) राजेश हिम्मत से काम लो। विपरीत परिस्थितियाँ हमारे भाग्य अनुसार ही बनती हैं। तुमने पूर्व में दूसरों के बच्चों का, बच्चियों का उपहास किया है उसी का ये फल है।

राजेश : (दुखित स्वर में) ऐसा मैंने क्या किया? मुझे तो कुछ भी याद नहीं है।

सुरेश : याद करो वह दिन जब कामना की सहेली निम्मी ने ऐसा ही किया था तो तुम लोग कैसे चटखारे लेकर सुन रहे थे, कामना के सामने ही उसको समझदार कह रहे थे, बोल्ड कह रहे थे, चलो अच्छा हुआ दहेज से बच गए। जब भी मैंने तुम्हें टोका था कि बच्चे अमर्यादित कार्य को श्रेष्ठ समझने लगते हैं, पर तुम कह रहे थे कि चलो अच्छा हुआ, भगवान ने दोनों को मिला दिया।

रेणुका : (बीच में ही) बस करो भाई साहब, बस करो।

(नीचे सिर किए उदास मुद्रा में लज्जित होकर सुन रहा है)

राजेश :

सुरेश : मैं तो ये ही कह रहा था कि हमने ही हँस-हँसकर कर्म बांधे हैं अब रोने की जगह समता रखोगे तो समझदार कहलाओगे। (दोनों जोर- जोर से रोने लगते हैं)

प्रारब्ध पहले बना, पीछे बना शरीर । कबीर अचंभा है यही, मन नहीं बांधे धीर ।।

सुरेश : चलो उठो, आराम करो मैं तुम्हारी स्थिति समझ रहा हूँ। मैं कामना से बात करूंगा, तुम चिंता मत करो। मैं अभी चलता हूँ।

( तीसरा दृश्य )

(सुरेश अपने मित्र की परेशानी समझ रहा है वह शीघ्र कामना से

मिलने की योजना बनाता है, कैसे मिलेगी, कब जाना उचित रहेगा? सब सोच विचारकर वह एक दिन कामना के घर पहुँच जाता है।) (सुरेश कामना के घर के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, कामना देख कर चौंक जाती है।)

कामना : (आश्चर्य से चौंककर) अरे! अंकल आप…!! नमस्ते अंकल ! आइए…आज…आप…। कैसे आना हुआ?

सुरेश : नमस्ते बेटा! कहाँ से आया? कैसे आया? सब कुछ बताता हूँ। पहले बैठ जाऊँ।

कामना : (घबराये स्वर में) हाँ हाँ बैठिये न…! सब कुछ ठीक तो है न अंकल।

सुरेश : (मुसकुराते हुए) हाँ, सब कुछ ठीक है। तुम कैसी हो?

कामना : (विषाद भरी मुस्कुराहट) हाँ अंकल मैं भी ठीक हूँ।

सुरेश : पर बेटा चेहरे से तो नहीं लग रहा, इतना उदास घबराया हुआ तुम्हें पहले तो कभी नहीं देखा।

(मौन रहती है।)

कामना :

सुरेश : बोलो बेटा क्या हुआ तुम्हें? संकोच मत करो, मैं तुम्हारे पापा जैसा ही हूँ। क्या तुम खुश नहीं हो यहाँ?

कामना : (घबराते हुए) जी अंकल…हाँ अंकल…नहीं…

सुरेश : डरो नहीं, बोलो कामना तुमने माता-पिता को बिना सूचना दिये विवाह कैसे कर लिया?

कामना : (आत्मग्लानि पूर्वक) हाँ अंकल ! मेरी मति मारी गई थी जो मैने माता- पिता के विरुद्ध कदम उठाया।

सुरेश : (समझाते हुए) बेटा तुमने विवाह से पूर्व एक बार तो अपने माता पिता से पूछा होता, कुछ बताया तो होता।

कामना : (रुद्ध कंठ से) हाँ मैने सोचा था पर मुझे लगा कि वह मुझे ऐसा कभी नहीं करने देंगे क्योंकि उनकी और मेरी सोच में अंतर लगता था मुझे ये भी लगता था कि क्या पता वह मेरी फीलिंग समझ पाएंगे या नहीं?

सुरेश : (रोषपूर्ण स्वर) बहुत समझदार समझती हो अपने आपको समझ पायेंगे या नहीं? माँ से अधिक बच्चे की फीलिंग और कौन समझ सकता है। इतने पढ़ लिखकर भी तुम इतनी नादान हो ये हम नहीं समझते थे। माता-पिता बच्चों के हितैषी होते हैं या दुश्मन, इस बात को नहीं समझती क्या तुम?

(नीचे पलकें कर सिसकियाँ भरकर रोने लगती हैं)

कामना :

सुरेश : (स्नेह पूर्वक समझाते हुए) बेटा! माता पिता अपने बच्चों की खुशी के लिए पूरा जीवन, सारी खुशियां न्योछावर कर देते हैं बच्चों की खुशी में ही माता पिता की खुशी होती है। ये तुम कैसे भूल गई? तुम्हारी पढ़ाई ने क्या यही सिखाया है तुम्हें?

कामना : (रोते हुए) (दृढ़ता पूर्वक) आप बिल्कुल सच कह रहे हैं मेरी पढ़ाई से मैने कुछ नहीं सीखा। मेरे माता पिता के स्नेह को मैने कलंकित कर दिया। मैं उनके सारे उपकार भूल गई। पुनीत के क्षणिक प्यार में मैं इतनी गाफिल हो गई कि अपनी ही सुध-बुध खो बैठी। उस समय तो ऐसा लगा कि जैसे स्वर्ग मिल गया हो। कितना आनंदित जीवन, कितना सहज जीवन। पर विवाह पश्चात पता चला कि हकीकत क्या है? पुनीत का चिड़चिड़ापन उसके व्यसन, घर का काम, ऑफिस का काम, घर का खर्च, रोग बीमारी सबको लेकर टेंशन और सबसे बड़ा टेंशन तो यह कि जीवन भर के लिए माता पिता के प्यार से वंचित हो गये। जिनकी मेहनत ने, लाड़ प्यार ने, मुझे इस मुकाम पर पहुंचाया उनको ही मैने इतना बड़ा दुःख दे दिया। सच अंकल ये बात तो मुझे बहुत अच्छे से समझ आ गई है कि बड़ों की आज्ञा बिना काम करने पर हासिल तो कुछ भी नहीं होता। हाँ जीवन भर पछताना अवश्य शेष रह जाता है।

सुरेश : बेटा तुम समझदार हो, पर अब तुम्हारे पछताने से क्या होगा? जैसे कांच टूटने पर पुनः नहीं जुड़ता। वैसे ही तुमने जो गलती की है उसकी सजा तो भोगनी ही होगी। व्यक्ति की सर्वोपरि संपदा उसका चरित्र होता है।

(व्यक्ति का चरित्र उसकी सच्ची पूंजी होती है।)

(इतने में पुनीत शराबी हालत में घर आता है और अंदर आकर)

पुनीत : कामना…कामना…कहाँ हो तुम…?

कामना : मैं यहाँ हूँ। इधर आ जाइए।

पुनीत : (सुरेश को देखकर) ये कौन हैं? अपने घर में क्या कर रहे हैं?

कामना : ये सुरेश अंकल हैं, पापा के दोस्त।

पुनीत : (बहकी हुई आवाज में) जब हमारे पापा से कोई संबंध नहीं हैं तो ये यहाँ क्यों आए हैं? इनको बोलो यहाँ से चले जायें।

कामना : (घबराते हुए) आप कैसी बातें कर रहे हैं? क्या घर आये मेहमान को ऐसा बोलते हैं?

पुनीत : (व्यंग्यात्मक स्वर एवं क्रोध में) हाँ तो ये बोल न कि इनसे तेरा कुछ स्वार्थ सिद्ध होता होगा, नहीं तो तू जब अपने पति को कुछ नहीं समझती तो किसी और को क्या समझेगी?

कामना : (हाथ जोड़कर) भगवान के लिए चुप हो जाओ, अंकल क्या सोचेंगे?

पुनीत : (क्रोध में) तू चुप रह! नहीं तो इतना मारूँगा कि जीवन में कभी बोल नहीं पाएगी।

सुरेश : बेटा मैं अभी चलता हूँ। तुम घर आना। (सुरेश चला जाता है कामना तेज-तेज रोने लगती है।)

कामना : (बैठकर, रोते हुए) हे भगवान ! ये मुझ पर कितने इल्जाम लगायेंगे। कितने ताने मारेंगे, मेरी सर्विस छुड़वा दी। हे भगवान ऐसा जीवन मैं नहीं जी सकती। मैने कैसे ये शादी कर ली? इससे अच्छा तो मैं जीवन भर कुंवारी बनी रहती।

पुनीत : (बाल पकड़कर) हाँ! कुंवारी बनी रहती फिर अपनी मर्जी से सबके साथ गुलछर्रे उड़ा सकती थी।

कामना : (तेज स्वर में) चुप रहो! जो मुँह में आया सो कह दिया।

पुनीत : (धक्का देकर) बहुत सती सावित्री बनती हो, इतनी ही संस्कार वाली थी तो अपने माँ-बाप से पूछकर शादी करती।

कामना :

पुनीत :

कामना :

पुनीत :

कामना :

पुनीत :

कामना : (दृढ़तापूर्वक) ये तो मेरे जीवन की सबसे बड़ी गलती है कि मैने अपने माता-पिता से नहीं पूछा। इसका पछतावा तो मुझे जीवन भर रहेगा। मुझे क्या पता था कि शादी के पहले तुमने जितने वादे किए थे वे सब झूठे थे। शराबी तो तुम कहती ही थी आज तुमने झूठा भी कह दिया, चोर ही कहना बाकी रहा तो वह भी कह दो। (व्यंग्यात्मक स्वर में) इसमें क्या शक है? सारी गंदी आदतें तो एक साथ ही आती हैं। शराब पीने वाला झूठ तो बोलता ही है और जब पैसे नहीं बचते तो वह चोरी भी करने लगता है। (जोर से चांटा मारता है) बहुत बोलती है। (रोते हुए) नहीं रहना मुझे यहाँ। मैं जा रही हूँ। हाँ! हाँ !! जाओ जाओ अपने पुराने यार दोस्तों के पास। उन्हें भी तुम्हारी याद सता रही होगी। हाँ! जहां मुझे जाना होगा मैं जा रही हूँ। (कामना चली जाती है पुनीत बोतल उठाकर और पी लेता है और बैठकर कुछ बुदबुदाने लगता है) (चली गई, चली जा, बहुत होशियार बनती है कहते कहते वहीं गिर जाता है)

भजन : साधना के रास्ते, आत्मा के वास्ते, चल रे राही चल (कामना चलती हुई सोचती जाती है (नैपथ्य से) कामना कहाँ जायेगी ? ये कामना को भी नहीं पता माता पिता के पास क्या मुँह लेकर जाए? तो फिर क्या करे? मर जाये? उसे कुछ समझ नहीं आ रहा। हाथ में पैसा भी नहीं। जाये तो जाये कहाँ जाये।) रास्ते में उसे एक जगह लिखा मिलता है “दुःखों से बचने का उपाय आत्मघात नहीं आत्म साधना है।” जैसे ही पढ़ती है उसके जीवन में ज्ञान सूर्य का उदय होता है और वह आत्मसाधना के मार्ग पर चल देती है पर अभी भी उसके अंतर एक प्रश्न है किससे पूछें? तभी… सुरेश अंकल ही मुझे दिशा दे सकते हैं वहीं जाना चाहिये।

(कोई सहारा है नहीं ये सोच मत लाना, चत्तारि शरणं पाठ पढ़ निज की शरण आना।)

चौथा दृश्य

(सुरेश का घर, सुरेश और शांता अपने कक्ष में बैठे बातें कर रहे हैं। सुरेश शांता को कामना के घर की सारी बातें बताता है, शांता सुनकर बहुत दुखी होती है और साथ में अपनी बेटी के लिए चिंतित भी हो जाती है।)

शांता : (सुरेश से घबराये हुए स्वर में) अजी सुनो। मेरा जी बहुत घबरा रहा रहा है कामना की तरह कहीं अपनी क्रांति भी तो ऐसा कुछ तो नहीं कर लेगी।

सुरेश : (चिंतित स्वर में) तुम भी कैसी बातें करती हो? मेरी बेटी ऐसी नहीं है, मुझे उस पर पूरा विश्वास है।

शांता : (ठंडी श्वास के साथ) विश्वास तो मुझे भी है पर अभी बच्ची ही तो है। वह किसी के बहकावे में न आ जाये।

सुरेश : (समझाते हुए) शांता मैं समझ सकता हूँ। तुम्हारा चिंतित होना स्वाभाविक है तुम उसकी माँ जो हो। पर हमारे दिये संस्कार खाली नहीं जाएंगे। तुम ये क्यों नहीं सोच रहीं।

शांता : सब कुछ सोच रही हूँ फिर भी डर लग रहा है।

सुरेश : घबराओ नहीं, अभी सो जाओ कल क्रांति आ रही है जो पूछना है उससे ही पूछ लेना। ठीक है।

(अगले दिन दरवाजे पर घंटी बजती है, ट्रिन… ट्रिन…)

सुरेश : कौन है?

डाकिया : साहब पोस्टमैन…! आपके लिए एक पत्र है। (पत्र देकर चल जाता है)

सुरेश : (पत्र खोलते हुये) ये तो क्रांति के ऑफिस का पत्र है। यहाँ क्यों आया होगा?

शांता : (मजाक में) क्यों जी! किसका पत्र आया है?

सुरेश : क्रांति के बॉस का लेटर है।

शांता : (आश्चर्य से) खोलकर तो देखो क्या लिखा है?

सुरेश : (पढ़कर) इसमें लिखा है क्रांति के बॉस हमारी बेटी को अपनी बहू बनाना चाहते हैं।

शांता : (खुशी से) हैं! क्या? कान्ति के बॉस, हमारी बेटी को बहू। वाह ! रिश्ता तो अच्छा है।

सुरेश : हाँ ! शांता रिश्ता तो मुझे भी पसंद आया उनके पास पद, प्रतिष्ठा, पैसा सभी कुछ तो है।

शांता : (स्नेहपूर्वक) इतने उतावले मत हो क्रांति आएगी तो हम उससे ही पूछ लेंगे उसका क्या विचार है? (अगले दिन क्रांति का उछलते कूदते प्रवेश, खुशी से दौड़कर माता पिता के पैर छूती है, समान वहीं रख देती है।)

क्रांति : पापा…मम्मी… (चरण छूकर) कितने दिनों बाद से चरण मिले। (माँ के गले लगकर) माँ ढेर सारा आशीर्वाद दीजिए। फिर मैं बहुत अच्छी खबर सुनाने वाली हूँ।

सुरेश : बेटा खबर तो हम सुनेंगे भी और सुनायेंगे भी। पहले मुँह हाथ धोकर कुछ खाओ पियो फिर आराम से बैठकर बातें करेंगे।

क्रांति : जी पापा! (सामान लेकर अंदर चली जाती है।)

सुरेश : (शांता से) शांता तुम्हें ऐसा नहीं लग रहा जैसे क्रांति को सारी बात पता हो।

शांता : क्या पता? वो तो जरा जरा सी बात पर यूं ही उछलने लगती है आप उसके साथ बैठना मैं उसे कुछ खाने के लिए लेकर आती हूँ। (शांता जाती है नाश्ता-पानी आदि लेकर आती है। तभी क्रांति हाथ मुँह धोकर आ जाती है। )

क्रांति : (पास में बैठकर) (तौलिया हाथ में लिये) पापा सुनो। मेरा प्रमोशन हो गया है। (पापा का हाथ अपने सिर पर रखकर) आपके आशीर्वाद से मैं उस ऑफिस में शिफ्ट हो गई हूँ जिसके दो कदम पर अपना मंदिर है अब मैं दोनों समय मंदिर जा सकती हूँ। मुझे वहाँ अब बहुत अच्छा लगने लगा है।

सुरेश : हाँ बेटा! मैं और तुम्हारी माँ भी यही सोच रहे थे कि तुम्हें वहाँ अच्छा लगने लगे तो हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएंगे।

क्रांति : (घबराये स्वर में) क्या पापा? क्या कह रहे हैं आप? मैं कुछ समझी नहीं।

शांता : (पास जाकर स्नेह से) सुनो मैं समझाती हूँ। बेटी कितनी ही लाड़ली क्यों न हो? उसे सदा के लिए घर में नहीं रखा जाता उसे तो पराए घर जाना ही होता है। तुम्हारे पापा तुम्हारे विवाह की बात कर रहे हैं क्रांति।

(पापा की तरफ इशारा करते हुए, कुछ परेशान मुद्रा में)

क्रांति : पापा…मम्मी…आज आपको क्या हो गया? मैं कितनी खुश होकर आई थी आपके पास और आप हैं कि मुझे भेजने की बातें करने लगे।

सुरेश : (क्रांति के सिर पर हाथ रखते हुए) बेटा कौन अपने दिल के टुकड़े को अपने से अलग करना चाहेगा, पर सामाजिक रीतियाँ ही ऐसी हैं कि बेटी का विवाह करना ही पड़ता है।

क्रांति : (रोष में) आपके पास कोई रिश्ता आया है क्या? जो आप मेरे आते ही मुझ पर बरस पड़े।

शांता : हाँ बेटा! तुम्हारे बॉस का रिश्ता आया है वह तुम्हें अपनी बहू बनाना चाहते हैं, क्या तुम तैयार हो।

क्रांति : (गंभीरता से) माँ…क्या… मेरे बॉस मुझे बहू। ये आप क्या कह रही हैं।

शांता : क्यों तुम्हें पसंद नहीं? हम लोग तो सोच रहे थे कि घर और वर दोनों ही श्रेष्ठ हैं यदि तुम तैयार हो तो हम भी तैयार हैं।

क्रांति : (रूठे स्वर में) माँ-पापा आप ठीक तो हैं! मुझे विश्वास नहीं हो रहा, आप लोग ऐसा कैसे सोच सकते हैं? माँ मैं उसे बहुत अच्छे से जानती हूँ। (दुखी स्वर में) वह संस्कारों से एकदम शून्य है माँ।

सुरेश : बेटा तुम दुखी न हो। हम तो तुम्हारी खुशी के लिये…

क्रांति : (बीच में ही) पापा मेरी खुशी के लिये…! (पकड़कर) पापा आपने तो मुझे सिखाया था कि खुश रहने के लिये सामग्री, पद, प्रतिष्ठा नहीं संतोष चाहिये। आप ही कहते थे न…

गोधन गजधन बाजधन और रतन धन खान । जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान ।। आज आपको क्या हो गया? आप बताइए क्या संस्कारों से शून्य घर में मैं खुश रह पाऊँगी?

शांता : (क्रांति को गले लगाकर) हमें तुम पर गर्व है, तुम जो चाहोगी हम वही करेंगे पर कहीं तुमने अपने जीवन के योग्य कोई लड़के का चुनाव तो नहीं कर रखा?

क्रांति : माँ आज आप कैसी बात कर रही हैं? लड़के का चुनाव। चुनाव तो 10-20 वस्तुओं में से किसी एक का किया जाता है। आप क्या सोचती हैं कि मैं पहले 10-20 पुरुषों को पति की दृष्टि से देखूँ फिर उनमें से किसी एक का चुनाव करूँ। माँ ये तो कुशील है, पाप है। माँ आपने मुझे ऐसे संस्कार तो नहीं दिये, माँ जब प्रकृति में माता-पिता, भाई-बहिन का चुनाव नहीं किया जाता तो फिर पति का चुनाव क्यों करना जो मेरे भाग्य में होगा उसे मैं सहर्ष स्वीकार करूंगी। ये ही अपनी संस्कृति है। माँ! सती मैना सुंदरी को कोढ़ी पति मिला उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया कि नहीं और सतियाँ मेरी आदर्श हैं तो मैं भी सहर्ष स्वीकार करूंगी। माँ मैं अपनी संस्कृति के विरुद्ध कदापि नहीं जा सकती…।

कामना : कामना भटकते-भटकते सुरेश के घर पहुँच जाती है जो बहुत देर से इनका वार्तालाप सुन रही थी। पर अब…) (क्रांति के पास जाकर) क्रांति तुम कितनी समझदार हो काश! तुम जैसे संस्कार मेरे भी होते।

क्रांति :

कामना :

सुरेश :

कामना :

क्रांति :

कामना :

क्रांति :

कामना :

क्रांति :

कामना :

क्रांति : अरे! कामना बहिन आप ! इधर कब आई? मैने आपको देख ही नहीं पाया। मैं तुम्हारी सारी बातों को बहुत ध्यान से सुन रही थी। मैं बीच में बोलती तो विघ्न होता, इसलिए चुपचाप सुनती रही। कामना बेटा इस प्रकार आज अचानक आने का कारण। अकेले आई हो तो परेशानी भी बहुत हुई होगी? आपसे क्या छिपा है अंकल। अब तो आज क्या पूरा जीवन ही अकेले गुजारना है और परेशानी उन्हें नहीं होती जिन्होंने अच्छे कार्य किए हों। जब मैने अच्छे कार्य नहीं किए तो उनका फल अच्छा कैसे मिलेगा? कामना बहिन ऐसा क्यों कह रही हो? ऐसा क्या हुआ तुम्हारे साथ? क्रांति ये पूछो क्या नहीं हुआ? पर तुमसे मिलकर तुम्हारे विचार सुनकर मन प्रसन्न हो गया। अब कुछ मत सुनो। फिर भी मैं तो सुनना चाहूँगी। तो सुनो। पति के साथ जीवन कष्टमय लगा तो क्रोधवश वहाँ से भाग गई, न पैसा, न भोजन, दीन दुखियारी सी जान एक वेश्या मेरे पीछे पड़ गई, मुझे अपने साथ ले जाने के लिये वह बेहोशी की दवा सुँघाने ही वाली थी कि मैं समझ गई और वहाँ से जान बचाकर भागी। तुम ये कैसे समझीं कि वह तुम्हें अपने साथ ले जाना चाहती थी और वह वेश्या थी। वह मेरे से बहुत देर से बातें कर रही थी मेरे बारे में जानने की कोशिश कर रही थी, पर मैने कुछ नहीं बताया तो कहने लगी तुम्हारे जैसी सुंदर लड़कियां मेरे पास रहती हैं खूब पैसा कमाती हैं। तुम भी कमाना। मेरे साथ चलो, मालामाल कर दूँगी। चेहरे से भले ही दुखियारी लग रही हो पर अंदर के साहस में कोई कमी नहीं दिख रही।

सुरेश : सच कामना तुम्हारी सूझबूझ ने बचा लिया नहीं तो तुझे कहाँ खोजते फिरते?

कामना : अंकल आप इतने में ही घबरा गये, कितने सारे लड़के मेरा पीछा कर रहे थे पर मैने उन्हें ऐसा चकमा दिया कि वे जीवन भर याद रखेंगे। ये सब बातें छोड़ो। अब मुझे ये बताओ कि मेरा आगामी जीवन सुखमय कैसे हो? (क्रांति से)

क्रांति : जीवन में हमेशा याद रखना धैर्य ही अवलंबन है, धर्म ही सहायक है और ज्ञान ही सर्व समाधानकारक है। कामना बहिन आप स्वयं बहुत समझदार हो पर आपकी थोड़ी सी चूक के कारण आपको ये दिन देखने पड़े। पर कोई बात नहीं देर आए दुरुस्त आये। अभी तक जो हुआ उसे भूल जाओ। नया जीवन प्रारंभ करो। हमारा जीवन, हमारा चरित्र, हमारी संगति विश्वसनीय हो तो हम भी विश्वसनीय हो जाते हैं। जब तुम आए जगत में, जग हँसे तुम रोय । कर चले ऐसी कारणी, जो तुम हंसो जग रोय ।।

कामना : (क्रांति से) मुझे तुम्हारे जैसी बहिनों पर गर्व है तुम्हारे जैसे विचार सभी बहिनों के हो जायें तो सभी के घर ही स्वर्ग हो जायें। अंकल, क्रांति मैं आज बहुत प्रसन्न हूँ मुझे सत्य का मार्ग मिल गया अब मैं पूरा जीवन धर्म आराधना में ही बिताऊँगी।

क्रांति : कामना बहिन ! गलतियाँ होना गलत नहीं है, सुबह का भूला शाम को घर आ जाये तो उसे भूला नहीं कहते। हमसे यदि कोई गलती हो उसे छुपायें नहीं बल्कि उसे मिटाने का उपाय करें, साहस से दूर करने का उपाय करेंगे तो गलती अवश्य दूर होगी। जैसे दर्पण पर धूल जमा हो तो प्रतिबिंब साफ नहीं दिखता इसी तरह जब तक विषय भोग की चकाचौंध बनी रहेगी तब तक हमें जीवन की सत्यता भाषित नहीं होगी।

कामना : (दुखित स्वर में) हे भगवान ! मुझे क्षमा करना मैं धर्म से दूर न हो पाऊँ। मैने भगवान का माता-पिता का तिरस्कार करके बहुत दुःख उठाये हैं आज मैं आप सभी के समक्ष अपने समस्त पापों का प्रायश्चित करती हूँ और साथ ही मेरे जैसी भटकने वाली उन सभी बहिनों से विनम्र अनुरोध करती (हाथ जोड़कर दुखित करुणा भरे स्वर) हूँ कि भौतिकवाद और विषयभोग की चकाचौंध जो तुम्हें बहुत आकर्षित करती है उसके पीछे अंधकार कितना है ये मुझसे पूछो। मैं बार-बार सभी से यही कहूँगी कि अपने संस्कार, अपनी संस्कृति ही सर्वश्रेष्ठ है इसको कभी न भूलना न कभी इससे दूर होना। अपने माता-पिता अपने लिए सर्वोपरि हैं ये हमेशा याद रखना।

(पीछे गाना चलता है) माँ-बाप से बढ़कर जग में कोई दूजा नहीं खजाना।। गाना चलते समय कामना के माता-पिता को सुरेश वहीं बुलवा लेता है वह आते हैं तो कामना उनके पैरों में गिर पड़ती है रोती है, बिलखती है, क्षमा मांगती है पर माँ उसे धक्का देकर गिरा देती है पर उसके पापा उसे उठाकर गले लगा लेते हैं फिर उसकी माँ भी उसे माफ कर देती है।

----------000-------- : अरिहंत पिताजी मेरे, जिनवाणी माता मेरी आत्मा ही मेरा घर है इसको न छोड़ के जाना प्रीति (रानी) पुजारी, खनियाधाना

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