राजा श्रेणिक व महारानी चेलना के प्रसंग पर आधारित मंचन-योग्य जैन नाटक — चित्रकार द्वारा दिए चित्र से श्रेणिक का चेलना के प्रति आकर्षण, महाराजा चेटक की जैन-श्रद्धा, व श्रेणिक के जीवन-परिवर्तन (मिथ्यात्व से सम्यग्दर्शन की ओर) का मर्म; पूरे पात्र-संवाद व मंच निर्देश सहित। पाठशाला, बाल संस्कार शिविर व सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु आदर्श।
A ready-to-stage Jain natak on the transformation (parivartan) of King Shrenik through Queen Chelna — full characters, dialogue and stage directions. Jain natak script / samyagdarshan katha for pathshala and children’s cultural programs.
(चित्रकार द्वारा श्रेणिक को चेलना का चित्र देने पर)
चित्रकार — प्रणाम राजन्! हे राजन् मैं आपको एक सुंदर उपहार लेकर आया हुं, जिसे देख कर आप प्रसन्न हो जायेंगे।
श्रेणिक — हे कला पुरूष ऐसा क्या उपहार लाए हो दिखाइए मुझे।
( कुछ क्षण चित्र को ही देखते रहते हैं)
श्रेणिक — मंत्रीवर शीघ्र ही इस सुन्दर कन्या के पिता को विवाह का प्रस्ताव भेजो यह सुंदरी मात्र मेरे वरण करने योग्य है।
मंत्री — हे राजन! यह कन्या महाराजा चेटक की छठी पूर्ति चेलना है महाराजा चेटक जैन धर्म के परम श्रद्धानी है एवं उनका यह
संकल्प है की वह अपनी पुत्रियों का संबंध मात्र जैन मतानुलंबी से ही करेगें, परन्तु आप बौद्ध धर्म को मानने बाले है
अतः कुमारी चेलना का वरण करना आपके लिए कठिन है।
श्रेणिक — आप जाइए एवं मेरे अलौकिक बुद्धि के धनी सर्व चातुर्य से युक्त पुत्र अभयकुमार को बुलाइए, वह निश्चित ही मेरा
मनोरथ सिद्ध करेगा।
मंत्री — अवश्य महाराज।
(अभयकुमार का आगमन)
अभयकुमार — प्रणाम पिता जी , हे तात! आप तो सभी की चिंता के निवारण कर्ता है, परन्तु आज आपके ही मुख मंडल पर मुझे
यह पिशाचनी क्यों दिख रही है, बताइए पिताजी क्या कारण है, मैं तुरंत ही आपकी इस चिंता का निवारण करता हुं।
श्रेणिक — मुझे तुझ पर पूर्ण विश्वास है पुत्र, मुझे ज्ञात है तुम निश्चित ही मेरी चिंता को क्षण मात्र में दूर कर दोगे,
हे सुत! यह चित्रांांकित कन्या बैशाली नरेश की पुत्री है में इससे विवाह करने का तीव्र अभिलाषी हूं, परन्तु समस्या यह है की इसके
पिता की प्रतिज्ञा है की वह अपनी पुत्री मात्र जैन धर्म के पालक को देंगे।
पुत्र तुम कैसे भी कर के मुझे इसका संयोग कराओ।
अभय — पिता जी आप क्षुब्द न हों आप मुझे तीन 2 मास का समय दीजीए मैं इसे आपके पास अवश्य ही लेकर आऊंगा।
(अभयकुमार के वचन सुन कर श्रेणिक प्रसन्न हो जाते हैं एवं अपने अंतःपुर में चले जाते हैं)
(अभयकुमार सेवक द्वारा जैन धनिकों को बुलाते हैं)
अभयकुमार — सेवक नगर के जैन व्यापारियों को मेरे समक्ष उपस्थित होने की आज्ञा दें।
सेवक — जी राजकुमार।
( अभय कुमार के पास समस्त व्यापारी उपस्थित हो जाते हैं)
अभयकुमार — आप सभी मेरे बुलाने पर वहां आए अतः आपका धन्यवाद।
मुझे आप लोगों के साथ वणिक बन कर राजा चेटक के राज्य मे व्यापार करने के लिए जाना है एवम् वही पर हम श्री जिनेन्द्र स्तुति
का भव्य कार्यक्रम रखेंगे । आप लोग शीघ्रता से अपनी उपयोग की वस्तु ले आइए हम तुरंत प्रस्थान करते हैं ।
दूसरा दृश्य
( चेटक के दरबार मे वणिक वेश धारी अभयकुमार )
अभयकुमार — हे राजन! हम दूर देश से आए हुए व्यापारी आपके राज्य में व्यापार के उद्देश्य से आए हैं , यहां हमे जैनाचरण के
अनुकूल व्यवस्था है अतः हे राजन आप कृपया हमे यहां रहने की अनुमति प्रदान करें।
चेटक — हे महोभाग कुल जाति व आचार परंपरा का हमे ज्ञान नहीं फिर में आपको आश्रय कैसे प्रदान करूंं।
महारानी — हे राजन् यह जिनेंद्र भगवान के सच्चे भक्त ही है अतः आप इन्हे आश्रय दे दीजीए।
चेटक — ठीक है आप यहां रह कर व्यापार कर सकते हैं।
[8/7, 9:26 PM] Nayak Amber Jain: (आज्ञा मिलते ही सर्वप्रथम अभयकुमार ने अपने निवास स्थान पर श्री जिनेंद्र भगवान
की स्तुति का अनुष्ठान प्रारंभ कर दिया) अभयकुमार द्वारा आयोजित भव्य कार्यक्रम की चर्चा सम्पूर्ण नगर में होने लगी जिससे
सभी का मन उसे देखने के लिए ललचाने लगा, वहीं महल में भी चेलना सहित अन्य राजकुमारियां भी उसे देखने के लिए उद्धत
हुईं।)
ज्येष्ठा — अरे वाह!कितना भव्य कार्यक्रम हो रहा हैं।
चंदनवाला — दीदी चलिए न हम भी वहां चलते हैं ।
सभी — हां हां चलो चलो हम भी देखें यह कार्यक्रम।
( अभयकुमार के पास पहुंच कर राजकुमारियां)
ज्येष्ठा — राजकुमार सद्रश्य वणिक कुमार इतनी सुन्दर जिनेंद्र भक्ति करना आपने कहां से सीखा कहां से आएं है आप क्या नाम है
आपका।
अभयकुमार — हे राजकुमारी में मगध राज्य का नागरिक हुं, हमारे राजा श्रेणिक यथा नाम तथा गुण के धारक हैं, उनके राज्य में श्री
जिनेंद्र की इस प्रकार की भक्ति साधारण बात है, श्रेणिक के राज्य में प्रायः श्री जिनेन्द्रोत्सव होते रहते हैं, राजा का रूप देवताओं
सदृष्य अत्यंत सुन्दर है, एवम् इंद्र की नगरी अलकापुरी सदृष्य हमारा राज्य मगध है, राजा को प्राप्त करना महाभाग्य का कार्य है।
(राजा की अत्यंत प्रशंसा सुन चेटक की पुत्रियां उन पर मोहित हो गई)
ज्येष्ठा — हे कुमार आपके राजा अवश्य ही महापुरुष हैं , हे भद्र पुरूष हम पर कृपा कर हमे राजा से मिलाने की कोई युक्ति सोचो।
(अभयकुमार की युक्ति सिद्ध होती देख वह प्रसन्न हो गया, उसने पूर्व में ही राजकुमारियों को गुप्त मार्ग से ले जाने का प्रबंध कर
लिया था)
अभयकुमार — आप लोग व्याकुल न हों में आपको सीघ्र ही मगधेश के पास ले चलता हुं, चलिए में आप लोगो को गुप्त मार्ग से ले
चलता हुं।
(अभयकुमार उन्हे अत्यंत अंधकार युक्त गुफा के समीप ले गया, इस काल मुख सदृश गुफा के भय ने राजकुमारियों के हृदय से
श्रेणिक के प्रति अनुराग समाप्त कर दिया, परन्तु चेलना ने उस भय पर ध्यान न देते हुए मात्र श्रेणिक से मिलने की ही ठान रखी
थीं)
चंदना — अरे इस कालगुफा से जीवित निकल पाना असम्भव है, में मगध नही जाना चाहती आप लोग ही जाएं श्रेणिक के पास।
ज्येष्ठा — यदि प्राण रहे तो श्रेणिक से भी उत्तम पुरूष मिलना संभव परन्तु श्रेणिक के लिए प्राण देना पड़े यह स्वीकार नहीं।
में तो महल में जा रही हूं मेरे साथ जिसे आना हो वह आ जाए।
चेलना — मैने हृदय से महाराज श्रेणिक को अपना पति स्वीकार लिया है अब में उनके अलावा अन्य पुरूष को स्वीकार नहीं करूंंगी,
मुझे वणिक कुमार पर पूर्ण विश्वास है ।
चलिए कुमार हम अभी मगध की ओर प्रस्थान करते हैं।
अभयकुमार — हां चलिए हम तुरंत यहां से पलायन करते हैं।
(अभय चेलना के साथ गुप्त मार्ग से सीघ्र ही मगध पहुंच गया, एवम् श्रेणिक को शुभ समाचार प्रदान किया)
विवाह उत्सव
अभयकुमार — पिताजी में कुमारी चेलना को आपके लिए ले आया हूं ।वह भी आपसे विवाह करने के लिए आतुर है, अब तुरंत ही मैं
आपके विवाह उत्सव की तैयारी करता हूं
( श्रेणिक का विवाह उत्सव)
(Fade out)
(चेलना का विषाद)
मैंने महाराज श्रेणिक का जैसा वर्णन सुना था वैसा ही पाया परंतु मुझे यहां पर जैन धर्म का अंश भी भाषित नहीं हो रहा है यहां
मात्र बौद्ध धर्म का ही वातावरण है मुझे ना तो यहां कोई जैन मतावलंबी दिखाई दे रहा है ना ही कोई जिनालय आदि।
अवश्य ही मेरे साथ छल हुआ है अभय कुमार के मायाजाल में फस कर मैने जिनधर्म को खो दिया, मेरा जीवन व्यर्थ है निरर्थक है
भला में इस स्वर्ग जैसे महल में विना जैन धर्म के कैसे रहूंगी मैं जैन धर्म के बिना चक्रवर्ती पद को भी नहीं चाहती फिर तो है राजा
श्रेणिक और उनके महल ।
मेरा प्राण देना श्रेष्ठ रहेगा यदि मुझे जैन धर्म ना मिला तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगी।
(श्रेणिक चेलना का विलाप सुन कर वहां आ गए)
श्रेणिक — हे भद्रे! तुम व्यर्थ ही क्रुुद्ध होती हो भला मिथ्या मार्ग को छोड़ कर सत्य बौद्ध धर्म की प्राप्ति में क्या खेद की बात है, तुम
जो चाहो वह करो रानी परन्तु तुम बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लो।
चेलना — हे राजन्! आप मिथ्या एकांतवादी बौद्ध कुधर्म को पाल कर अपना एह लोक एवं पर लोक दोनो को कष्ट में डाल रहे है, हे
राजन् इस मिथ्या मत से अनुसरण से आपका अनंत संसार प्रशस्त हो रहा है,
आपने मुझे छल से यहां बुलाया है एवम मुझे श्रेष्ठ जैन धर्म से दूर किया है।(रानी जोर जोर से रूदन करने लगी)
श्रेणिक — हे रानी में तुम्हे बिलकुल भी बाध्य नहीं करूंंगा तुम्हे जिस तरह रहना है रहो जैन धर्म का पालन करो मुझे कोई आपत्ति
नहीं।तुम मेरी प्रिय रानी हो भला में तुम्हे दुखी कैसे कर सकता हुं।
चेलना — हे स्वामि!मैं आपके इस पाखंडी धर्म का सच अवश्य ही उजागर करूंंगी, एवम् आपको जैन धर्म का निश्चित ही विश्वास
दिलाऊंगी।
श्रेणिक — प्रिय! मैं अपने बौद्ध गुरू को भोजन के लिए आमंत्रित करता हूं, तुम उनके समागम से निश्चित ही बौद्ध धर्म ग्रहण करोगी।
चेलना — जी अवश्य।
(चेलना मन में विचार करती है की में उन मिथ्यात्वियों का अवश्य ही मान खंडित करूंंगी)
: (महल में बौद्ध गुरुओं का आगमन)
(Funny entry)
चेला — क्यूं गुरु जी इस रानी ने आपको नमस्कार नहीं किया, लगता है इसने आपको देखा नहीं।
गुरु — ये चुप कर।
गुरु — हे महारानी तूने मेरा अपमान किया है निश्चित ही तुझे पाप बंध होगा।
चेलना — आप तो अंतर्यामी हैं अतः आपने तो मेरे अंतरंग के सम्मान को जान ही लिया होगा। बाह्य क्रिया से भला क्या प्रयोजन।
गुरु — हां हां वह तो में यूं ही कह रहा था।
चेलना — चलिए अब आप लोग भोजन कर लीजिए।
चेला — हां हां हम तो इसी के लिए आए हैं।
(सभी भोजन के लिए चले जाते हैं )
(जब भिक्षु भोजन करने लगते है तभी एकांत में चेलना एवं दासी का संवाद)
चेलना — दासी तूं जा और इन सभी की दाहिने पैर की पादुका ले आ ।
दासी — महारानी भला पादुका से क्या प्रयोजन,
चेलना — अरे तूं लेकर तो आ फिर में बताती हूं।
(दासी पादुका को लेकर आ जाती है एवम् उन्हें छुपा देती है)
गुरू — बहुत ही उत्तम प्रबंध किया है रानी तुमने हमारे सम्मान में कोई कमी नहीं रहने दी।
चेलना — में भला क्यूं कमी छोड़ती, आप मेरे पति के गुरु जो हैं।
चेला — मानना पड़ेगा महारानी जी आपकी पाकविद्या को बहुत ही स्वादिष्ट भोजन बनाया है आपने मजा ही आ गया ।
(चलते चलते वह पादुका के स्थान पर पहुंच जाते हैं)
गुरू — अरे हमारी दाहिने पैरों की पादुकाएं कहां चली गई।
चेलना — (हंसते हुए) अरे महाराज आपको भी इस तरह प्रश्न करने की क्या आवश्यकता आप तो अंतर्यामी हैं आपको तो पता होगा
न की कहां हैं आपकी पादुकाएं।
गुरू — (क्रोध में) हे मूर्ख रानी तू हमसे परिहास करती है, तुझे ज्ञात नही हम कौन हैं।
चेलना — जानती हुं न तभी तो बोल रहीं हूं कर लिजिए पता की कहां हैं आपकी पादुका।
गुरू — हमे ज्ञात होता तो हम तुझसे क्यूं पूछते, सीघ्र बता कहां हैं हमारी पादुका?
चेलना — आपकी पादुका तो आपके पास ही है।
चेला — मतलब???
चेलना — मतलब आपके पेट में , भोजन के रूप में आपने उन्हें ग्रहण कर लिया।
चेला — (वमन करते हुऐ) हाय हाय हाय ये तूने क्या किया रानी हमे हमारी ही पादुका खिला दी, और हमे पता भी नही चला।
गुरू — (क्रोध में) हे मुर्खा तुझे तेरी करनी का दंड अवश्य मिलेगा।
(Fade out)
(Fade in)
(यशोधर मुनीराज पर उपसर्ग )
(जंगल में श्रेणिक आखेट करने के लिए गया वहीं मुनीराज को देख कर उसे अपने गुरु के अपमान का स्मरण हो आया)
श्रेणिक — सैनिक यह नग्न वेश में कौन बैठा हुआ है, इसके इस स्वरूप का क्या रहस्य है।
सैनिक — महाराज यह नग्न वेश धारी रानी चेलना का गुरु है इसी के कारण उसने हमारे गुरु का अपमान किया था,
श्रेणिक — ( गुस्से में )ऐसे होते जैन साधु, इस के कारण ही चेलना सच्चे बौद्ध धर्म को नही मानती, मुझे अपने गुरु के ऊपर हुए
अपमान का बदला अवश्य लेना होगा अन्यथा वह मुझे क्षमा नहीं करेंगे। मैं इस साधु को अभी मजा चखाता हूं,
सैनिक अभी जाओ और जंगली कुत्तों को इस के ऊपर छोड़ दो,
सैनिक — जी महाराज
( साक्षात काल के समान बिकराल कुत्ते मुनि की साम्य मुद्रा देख शांत हो जाते है।
श्रेणिक — (क्रोध में) यह कोई मायावी है , तब ही इसके मायाजाल में यह कुत्ते शांत हो गए,अब में ही इसे दंडित करूंंगा।
(श्रेणिक वहीं समीप एक सांप को देख उसे मुनि के ऊपर डाल देता है)
(3 दिन व्यतीत होने के बाद श्रेणिक की चेलना से भेंट)
श्रेणिक — चेलना एक समय तुमने मेरे गुरु का परिहास उड़ाया था,उसी का बदला लेने के लिए मेने तीन दिन पूर्व एक जैन साधु के
ऊपर मृत सर्प डाल दिया था,
चेलना — (विलाप करते हुए) हे महाराजा आपने यह कैसा अनर्थ कर दिया, आपने श्री मुनीराज का अपमान किया है, निश्चित ही
आपको महा कष्ट झेलना पड़ेगा।
इस समय मुनीराज की क्या दशा हुई होगी , मुझे सीघ्र ही मुनीराज का उपसर्ग दूर करना होगा, राजन् आप कृपा कर मुझे उस
स्थान पर ले चलें जहां आपने यह कुकृत्य किया है।
श्रेणिक — अरे रानी तुम व्यर्थ ही क्रोध विलाप करती हो सभी तक तो उन्होंने सर्प हटा भी दिया होगा और कहीं अन्य चले गए होंगे।
चेलना — वह दिगम्बर मुनीराज है,अपने ऊपर हुए उपसर्ग को वह कभी दूर नही करते, बल्कि उपसर्ग होने पर और अधिक तप में
उग्र होते हैं।
चलिए अब बिलंब मत किजिए।
(दोनों जंगल की ओर प्रस्थान कर देते है)
( दोनों मुनीराज के समीप आ कर उनका उपसर्ग दूर करते है)
चेलना — हे वीतरागी मुनीराज! मेरे पति सच्चे देव शास्त्र गुरु के स्वरूप से अनभिज्ञ है, उन्होंने मूर्खता बस आपके ऊपर उपसर्ग
करने का कुक्रत्य किया। हे नाथ! कृपा कर आप हमे क्षमा करें।
[8/8, 4:00 PM] Nayak Amber Jain: मुनि का संबोधन
यशोधर मुनीराज — सद्धर्म व्रद्धिरस्तु।
श्रेणिक — हे महात्मा आप धन्य हैं मैने आपके ग्रीवा में मृत सर्प डाला मैने आपको इतना कष्ट पहुंचाया, एवम् चेलना ने आपकी
भक्ति स्तुति की फिर भी आपने दोनो को समान आशीर्वाद दिया। हाय हाय आपको तो मुझे दंडित करना चाहीए, मेरे सदृष्य इस
संसार में अन्य पापी नही है, मैं किस तरह अपने पापों का नाश करूंं मेरा उद्धार कैसे होगा, हे प्रभो! त्राहिमाम। मेरे अपराधों को
क्षमा किजिए। मैं महा पापी हूं।
मुनीराज — हे राजन्! यदि तुम शांति के इच्छुुक हो तो अपनी आत्मा का उद्धार करो, अपने पाप कार्य के लिए शास्त्रानुसार प्रायश्चित
कर शांति प्राप्त करने का उद्योग करो, तभी तुम्हारा कल्याण होगा।
श्रेणिक — हे नाथ मेने ऐसा पूर्व में क्या किया था जिसके कारण मैं इस पर्याय में आया और मेरा उद्धार कब होगा।
यशोधार मुनीराज — हे राजन्!यदि तुम अपने पूर्व भव का वर्णन सुनना चाहते हो तो सुनो तुम पूर्व में सूर्यकांत नामक देश में सुमित्र
नामक राजा थे तुम्हारा एक मित्र सुषेण था, तुम दोनो को आपसी वैर के कारण तुम दोनो मर कर व्यंतर देव हुए वहां से आकर तुम
श्रेणिक हुए हो एवं सुषेण का जीव तुम्हारे बेटे कुडिक के रूम में जन्म लेगा।
कुडिक जन्म
(रानी चेलना को कुछ काल पर्यंत गर्भ धारण हो जाता है गर्भ काल में उसे अनेक अशुभ लक्षण अनुभव होते है, गर्भ मास पूर्ण होने
पर रानी के कुडिक नामक पुत्र जन्म लेता है ,इसके बाद बारिशेन आदि चार पर पुत्रों को चेलना जन्म देती है इस प्रकार चेलना
पांच पुत्रों की मां बनती है)
(चेलना एक दिन कुडिक को गोद में लेकर विचार करती है)
चेलना — निश्चित की यह बालक महाराज का अनिष्ट करने बाला होगा तभी तो इसके जन्म से ही मुझे अनेक अनिष्ट संकेत मिल रहे
थे, मैं एक कार्य करती हूं इसे एकांत वन में छोड़ आती हूं ताकि यह महाराज के पास आ ही न सके, तब अनिस्ट की कोई शंका ही
नही रहेगी ।
(चेलना कुडिक को वन में छोड़ आती है परंतु श्रेणिक को जैसे ही इस बात का पता चलता है वह तुरंत उसे ले आता है)
महावीर वंदना
(एक दिन श्रेणिक सहित अभयकुमार बारिशेण चेलना आदि सभी महावीर स्वामी के समोशरण में दर्शनार्थ जाते हैं वहां वह जिनेंद्र
पूजन आती कर धर्मलाभ लेते हैं)
वैराग्य
(समय व्यतीत होने पर कालांतर में अभयकुमार एवम् बारिशेन को संसार की नश्वरता का भान होते हुए वैराग्य उत्पन्न हो जाता है
और वह श्रेणिक और अपनी अपनी माता से आज्ञा लेकर दीक्षा लेने चले जाते है)
वारीषेण — हे अग्रज! इस दुर्दांत लोक में चित लोक ही मुझे भासता है, नीराग है, निद्वेष है आलोक है, चिरलोक है, जिसमे छलकता
लोक सब वह आत्मा ही लोक है।
अभय कुमार — अनुज ! परम आह्लाद कारक ये वचन मेरे वैराग्य के निमित्त वन रहे हैं,
वारीसेन — हे पूज्यवर! यह वैराग्य ही मनुष्यत्व का सार है, हमे इस मनुष्य भव अत्यंत दुर्लभता से प्राप्त हुआ है, हमारे विचार इस
प्रकार होने चाहिए, अपूर्व अवसर ऐसा किस दिन आयेगा, कब होऊंगा वाह्य अंतर निर्ग्रंथ जब संबंधों का बंधन तीक्षण छेद कर,
विचरूंंगा कब महत पुरूष के पंथ जब।
अभयकुमार — अहो धन्य हैं ऐसे मुनीराज, जो स्वरूपाचरण के प्रतपन द्वारा अत्यंत तेजवंत हो रहे हैं। मेरी ऐसी दशा कब बनेगी।
(एकाकी विचरूँँगा कब शमशान में…)
श्रेणिक — हे मेरे कुल गौरवों!
दोनों — प्रणाम पिताजी
श्रेणिक — तुम्हारा यश दशों दिशाओं में उज्वल हो।
अभय — तात! जीव राग आदि की हीनता एवम ज्ञान की विशेषता से स्तुति योग्य होते हैं।
श्रेणिक — साधो!साधो!
दोनों — पिताजी! हम दुःख समूह विद्भंसश कारिणी जैनेश्वरी दीक्षा धारण करना चाहते है ।
श्रेणिक — पुत्रों तुम्हारा यह विचार उत्तम है, शीघ्र ही अनाथ मुक्ति सुंदरी के नाथ वनों।
दोनों — प्रणाम पिताजी।
कुडिक का राज्याभिषेक
(कुडिक को राज्य भार संभालने के योग्य देख श्रेणिक उत्साह पूर्वक उसका राज्य अभिषेक कर देता है, परन्तु इसका विनाशकारी
परिणाम का अनुमान श्रेणिक को नहीं था )
श्रेणिक — हे पुत्र अब तुम राज्य संभालने में सर्वथा योग्य हो इसीलिए अब में राज्य के कारों को तुम्हे देता हूं, अब इस मगध राज्य
का शासन तुम करो पुत्र।
मंत्रीगण राज्याभिषेक की तैयारी की जाएं
मंत्री — जो आज्ञा महाराजा
( राजाधिराज सॉन्ग)
( श्रेणिक द्वारा कुडिक को राजा बनाते ही उसका प्रथम आदेश)
कुडिक — मगधराजाधिराज मैं महाराजा कुडिक यह आदेश देता हुं, सैनिकों इस श्रेणिक को कारागृह में डाल दिया जाय।
जनता — दुर्दैवम दुर्दैवम…।
(सारे महल में हाहाकार मच जाता है, कुडिक के इस प्रकार के कृत्य से सभी उसे हीन भरी दृष्टि से देखने लगते हैं )
अन्तिम दृष्ट
(श्रेणिक की कारागृह में आकुलता)
श्रेणिक — हा कर्मोदय विचित्रता! मैं इस वसुंधरा का एक छत्र स्वामि था और अब यही भूमि विकराल रूप धारण कर मुझे काटने
को तत्पर है,
मेरा इस कष्ट को सहने से अच्छा प्राण त्याग देना है ।
प्रूफरीडिंग बाकी है
नाटक की ऑडियो रिकॉर्डिंग (अवधि लगभग ४१ मिनट)
यह इसी नाटक की मंचन/पाठ रिकॉर्डिंग है।
