नरभव पाना, जिनकुल पाना, जिनवाणी का पाना, नरभव पाना।
विषय भोग में, ही इस भव को, यूं ही ना गँवाना, चूक न जाना ॥
एक पहेली तुमसे पूछें, उत्तर सही बताना, ज्ञान बढ़ाना।
नरभव पाना…
(1) एक द्रव्य बस ऐसा - जिसमें ज्ञान हमेशा,
स्व-पर को वह जानता - बस जैसा का तैसा।
पर, पर-का कुछ; कर ना पाए, फिर भी वही सयाना…
कौन.? बताना.??
-“जीव” “जीव” “जीव”
(श्याबाश) नरभव पाना…
(2) पूर्णता से भरी थी, कर्म से पर अड़ी थी,
द्रव्य के स्वभाव में, अनादि से वो पड़ी थी।
जब-जब जिसको प्रगट हुई वह, नमता रहा जमाना
क्या.? बतलाना.??
- “सर्वज्ञता”
(बहुत खूब) नरभव पाना…
(3) इसके बिना किसी को, समकित ना हो पाता,
नब-ग्रीवक में जा के, भी वापस आ जाता ।
वो ही इक हितकारी कारण, कार्य तलक अपनाना
भूल न जाना… क्या बतलाना.?
-“भेद ज्ञान, भेद ज्ञान”
(क्या बात है) नरभव पाना…
(4) सम्यक-सन्मुख जीव को, इसका अनुदय वर्तता,
तब वो ज्ञानी जीव हो, निज स्वरूप को दर्शता ।
मिथ्या-मति के साथ में उसका, नाता बड़ा पुराना
क्या.? बतलाना.??
-“अनंतानुबंधी कषाय”…
(हो न पाए.!) नरभव पाना…
(5) कार्य कोई भी हो वहाँ - कारण निश्चित पाओगे,
जिन भगवन्तों के कहे, कारण तुम बतलाओगे ?
सारी दुनिया इक माने, पर;तुम दोनों बतलाना
क्या-क्या.? बतलाना.??
-“निमित्त और उपादान”
(हो गया न सम्यक ज्ञान) नरभव पाना…
(6) वो सब ही जब साथ हों, काम तभी हो पाता,
एक अगर रूठा रहे, काम पड़ा रह जाता ।
पाँचों को जो ना स्वीकारे, उसका नहीं ठिकाना
तुमने माना.?
- “पाँच समवाय”
(गुड बॉय) नरभव पाना…
(7) गत-आगत पर्याय में, वर्तमान की जाए ना,
इक पुद्गल पर्याय में - दूजे की घुस पाए ना
एक द्रव्य से रहता दूजा - सदाकाल बेगाना
सिद्धान्त बताना.?
- “चार अभाव”
(अब मत घबराओ) नरभव पाना…
(8) मोती-माला सी गुंथी, पर्यायें सब द्रव्य की,
फेरफार कर ना सकें - ‘जाने ही’, सर्वज्ञ भी।
होती रहतीं सहज-स्वतः त्यों - ज्यों जिनेन्द्र ने जाना
सिद्धान्त बताना ?
-“क्रमबध्द-पर्याय”
(वेरी गुड बॉय) नरभव पाना…
(9) एक कहा त्रयकाल में, परमारथ का पंथ वो,
उसके बिना कहाए ना ‘मुनि’, भले निर्ग्रन्थ हो।
कैसा भी हो मौका, लेते - उसका स्वाद सुहाना
स्वाद बताना.?
- “वीतरागता”
(यहि मुक्ति रास्ता) नर भव पाना…
