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निमित्तोपादान अदालत में

Nimitta-Upadan in Court

रचयिता Author: श्री टोडरमल दिग. जैन सिद्धान्त महाविद्यालय, जयपुर के छात्र विद्वान · ~49 min पढ़ने में

अदालत-शैली में रचित मंचन-योग्य जैन नाटक — ‘निर्विवाद तथ्य बना विवाद का विषय’। न्यायाधीश, निमित्त-कुमार व उपादान-कुमार, दोनों पक्ष के वकील एवं पण्डित-गवाहों के पूरे पात्र-संवाद के माध्यम से यह नाटक निमित्त व उपादान के सिद्धांत को नाट्य-रूप में स्पष्ट करता है — प्रत्येक द्रव्य अपने षट्कारकरूप स्वभाव से स्वयं अपना कार्य करता है, बाह्य निमित्त वास्तव में कुछ ‘करता’ नहीं। श्री टोडरमल दिग० जैन सिद्धान्त महाविद्यालय, जयपुर के छात्र-विद्वानों द्वारा प्रस्तुत। अध्यात्म-स्वाध्याय व सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु।

A courtroom-styled Jain natak that dramatizes the metaphysical principle of nimitta (instrumental cause) & upadana (substantial cause) — every dravya performs its own function through its own six-fold karakas, and external instruments do not actually ‘do’ the work. Full court cast (judge, lawyers, pandit-witnesses). Staged for adhyatma study.


नाटक
निर्विवाद तथ्य बना विवाद का विषय
निमित्तोपादान अदालत में

पात्र-परिचय
१. न्यायाधीश
२. निमित्त कुमार
३. उपादान कुमार
४. निमित्त वकील
५. उपादान वकील
६. कल्लू कुम्हार
७. संतरी
८. बाबू
९. पण्डित उपचारमल
१०. पण्डित व्यवहारचन्द
अन्य पाँच उपादान के प्रतिनिधि गवाह—
११. पण्डित अमितकुमार शास्त्री
१२. पण्डित प्रदीपकुमार शास्त्री
१३. पण्डित मनीषकुमार शास्त्री
१४. पण्डित सुशीलकुमार शास्त्री
१५. पण्डित अनुभवप्रकाश शास्त्री

(नेपथ्य से- प्रातःकाल का समय है, ९.३० बजे हुए हैं। गुलाबी नगरी जयपुर के पार्श्वनाथ चैत्यालय में बाहर से पधारे विद्वान का प्रवचन समाप्त होने के पश्चात् दो मित्र मन्दिर से निकलते हुये कुछ चर्चा कर रहे हैं।)

प्रथम दृश्य
निमित्त कुमार— वाह भाई! उपादान कुमार वाह!! आज पण्डितजी ने प्रवचन में क्या बात कही, गुरु के बिना ज्ञान नहीं होता। यदि हमें कोई अच्छा गुरु मिल जाये तो हमारा भी कल्याण हो जाये।
उपादान कुमार— नहीं भाई निमित्त कुमार! नहीं, गुरु तो निमित्त मात्र है, कार्य तो उपादान से ही होता है, निमित्त से नहीं। वास्तव में कार्य की उत्पत्ति में अनुकूल होने से निमित्त पर कर्तापने का आरोप तो अवश्य आता है, पर उपादान के बिना निमित्त को निमित्त

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/४३
भी नहीं कहा जा सकता। गुरु तो अनन्तबार मिले,
अपना उपादान नहीं सुधरा, इसलिए हम अभी
तक अज्ञानी है। छहढाला में तो पण्डित दौलतरामजी
ने यहाँ तक कहा है-
मुनिव्रत धार अनन्त बार ग्रीवक उपजायो।
पै निज आतम ज्ञान बिना सुख लेश न पायो।।
इसीलिए कहा है…।
निमित्त कुमार - (गुस्से से) अरे उपादान कुमार ! तू सोनगढ़ियों
के पन्द्रह दिन के शिविर में क्या गया, तेरे तो
सिद्धान्त ही बदल गये; तू तो मुझे कानजीस्वामी
का चेला लगता है। उसने तो धर्म की परिभाषा
ही बदल दी है, उसके यहाँ तो बिना पैट्रोल के
ही गाड़ी चलती है। ऐसी बातें तो मंदबुद्धि ही
करते हैं। उसने तो भोले-भाले लोगों को पथभ्रष्ट
कर दिया है, सारे सिद्धान्त ही बदल दिये हैं।
मैं तेरे और तेरे गुरु के खिलाफ स्याद्वाद हाईकोर्ट
जयपुर में सिद्धान्त हानि का मुकद्दमा दायर करूँगा।
उपादान कुमार - ठीक है, जैसी तुम्हारी इच्छा। कानजीस्वामी ने तो
हमें हमारे आचार्यों की ही बातें समझायी हैं। यदि
तुम चाहते हो तो फैसला कोर्ट में ही हो जाये।
निमित्त कुमार - (चलते हुए गुस्से में) ठीक है, देख लूँगा तुम्हें।
अब अपनी मुलाकात कोर्ट में ही होगी।
(दोनों गुस्से में विपरीत दिशा में जाते हैं।)
दूसरा दृश्य
(नेपथ्य से) तो आइये, आपको ले चलते हैं स्याद्वाद हाईकोर्ट,
जयपुर में, जहाँ ऐसे ही कई विादग्रस्त विषयों का निष्पक्ष

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/४४
निर्णय हुआ है। अरे! यहाँ तो निमित्त कुमार अपने वकील के
साथ पहले से ही तैयार बैठे हैं। उपादान कुमार भी तैयार हैं
और लगता है अदालत में जज महोदय भी आने वाले हैं। अरे
रे… वे तो आ भी गये। देखते हैं आज की बहस)

_ ( अदालत का दृश्य, न्यायाधीश महोदय अदालत में आते
हैं और उनके सम्मान में सभी लोग खड़े हो जाते हैं। )_

न्यायाधीश: अदालत की कार्यवाही प्रारम्भ की जाये।

निमित्त वकील: सम्माननीय जज साहब! मैं निमित्त कुमार की ओर
से आज के मुकद्दमें की पैरवी करूँगा। आज से
लगभग ६० वर्ष पहले की बात है, जब दिगम्बर
जैन समाज में कानजीस्वामी नामक व्यक्ति का
आगमन नहीं हुआ था, तब सारी समाज और
सभी विद्वानों में निमित्त का ही बोलबाला था।
निमित्त कार्य का कर्ता नहीं है, ये तो किसी ने
कल्पना भी नहीं की थी। बालक से वृद्ध तक,
मूर्ख से पण्डित तक सभी निमित्त का ही गुणगान
करते थे; लेकिन जब से कानजीस्वामी नामक
व्यक्ति इस समाज में आया है, तब से सारी हवा
ही बदल गयी है। जो व्यक्ति पहले निमित्त के
गीत गाते थे, वे ही आज उपादान के गीत गाने
लगे हैं। और तो और जज साहब! वे तो निमित्त
को कार्य के प्रति अकिंचित्कर ठहराने में लगे हैं।
जजसाहब! यदि यही हाल रहा तो निमित्त का
नाम ही इस दुनिया से उठ जायेगा। यही अभियोग
अभियुक्त उपादान कुमार पर लगाये गये हैं।

न्यायाधीश: उपादान कुमार! आपका कोई वकील है क्या?

उपादान वकील: जज साहब! मैं उपादान कुमार की ओर से इस

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/४५
मुकद्दमें की पैरवी करूँगा, भाई निमित्त कुमार के
वकील कह रहे थे कि कार्य निमित्त से ही होता
है और निमित्त कार्य के प्रति अकिंचित्कर है-
यह भ्रामक वातावरण कानजीस्वामी के आगमन
से हुआ है, ये मेरे दोस्त का असत्य एवं तर्कहीन
कथन हैं तथा लम्बे समय से चला आ रहा
झूठ है। कानजीस्वामी ने तो इसे प्रतिपादित किया
है, लेकिन जज साहब! यह बात तो भगवान
आदिनाथ से लेकर महावीर तक और कुन्दकुन्दाचार्य
से लेकर पण्डित टोडरमलजी तक सभी ने कही
है। निमित्त कार्य का कर्ता नहीं होता है। कानजीस्वामी
ने तो हमें हमारी भाषा में समझाया है। इसलिए
जज साहब! मैं अदालत से निवेदन करूँगा कि
सत्य-असत्य का निर्णय ऊल-जलूल बहस के
आधार पर न करके ठोस तथ्यों एवं आगम प्रमाणों
के आधार पर ही किया जाये। मैं इतना ही कहना
चाहता हूँ।
निमित्त वकील- आज की बहस का मुद्दा है कि कार्य निमित्त से
होता है या उपादान उसका कर्ता है। मेरे मुवक्किल
का कहना है कि कार्य तो उपादान से होता है,
निमित्त तो अकिंचित्कर है।
ठीक है, मैं आपकी बात मानता हूँ कि निमित्त कुछ
नहीं करता, लेकिन मैं आपसे पूछता हूँ कि आपने
चश्मा क्यों लगा रखा है? इसलिए न क्योंकि उसमें
से आपको साफ दिखाई देता है। ठीक इसी प्रकार
जज साहब! निमित्त कार्य का कर्ता है। क्या मेरे
काबिल दोस्त इस बात को झुठला सकते हैं?
उपादान वकील- यस मी लॉर्ड! क्या मेरे काबिल दोस्त इतना भी

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/४६
नहीं जानते ? ये तो कोई दूध पीता बच्चा भी
बता सकता है कि चश्मे से ज्ञान नहीं होता।
_ (चश्मा उतारते हुये)_ यदि चश्मे से ज्ञान होता है
तो, इसे दीवार पर लगा दीजिये, टेबिल पर लगा
दीजिये, अन्धे को लगा दीजिये; तो इनको भी
दिखना चाहिये, लेकिन योर ऑनर ! इन सबको
दिखाई नहीं देता। इससे सिद्ध होता है कि चश्मे
से ज्ञान नहीं होता, बल्कि ज्ञान से ज्ञान होता है।
दैट्स ऑल मी लॉर्ड।
निमित्त वकील— ठीक है ! चश्मे से ज्ञान नहीं होता, लेकिन गुरु
से तो ज्ञान होता है। क्यों वकील साहब! आप
अपने गुरु से वकालत पढ़ने के बाद वकील बने
या पैदाइशी वकील हैं। क्यों वकील साहब, है
कोई जबाव ?
उपादान वकील— जज साहब सवाल का जबाव देने से पहले मैं
अपने काबिल दोस्त से पूछना चाहता हूँ कि
उनकी लॉ की क्लास में कौन-कौन पढ़ते थे?
निमित्त वकील— जज साहब ! मेरे अजीज दोस्त इन फालतू की
बातों से अदालत का कीमती वक्त जाया कर रहे
हैं, इन प्रश्नों का इस मुकद्दमें से कोई ताल्लुक
नहीं है।
उपादान वकील(चिल्लाकर) ताल्लुक है जज साहब ! ताल्लुक
है। मैं अदालत से गुजारिश करूँगा कि मेरे इन
सवालों का जबाव दिया जाये।
न्यायाधीश— वकील साहब के सवालों का जबाव दिया जाये।
उपादान वकील— हाँ, तो मैं पूछ रहा था कि आपकी लॉ की कक्षा
में कौन-कौन पढ़ता था?

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/४७
निमित्त वकील(याद करने का अभिनय करते हुए।) मेरी लॉ की कक्षा में भोलू, जो आज चपरासी है, वीरू अरे वही वीरप्पन, जो आजकल चन्दन तस्कर है और लालू, जो चारा घोटाले के कारण जेल में है और भैरोसिंह, जो आजकल राजस्थान का मुख्यमंत्री है। फिलहाल मुझे इतना ही याद है।
उपादान वकील – वकील साहब ! मैं पूछता हूँ कि भोलू चपरासी क्यों रहा, वकील क्यों नहीं बना ? (निमित्तवकील की ओर इशारा करते हुए।) आप वकील ही क्यों रहें, जज क्यों नहीं बने ? और वीरप्पन डाकू क्यों बना, प्रधानमंत्री क्यों नहीं बना? क्या आपके गुरु ने पढ़ाने में कोई भेद किया था?
निमित्त वकील – नहीं, कोई भेद नहीं किया था।
उपादान वकील – तो फिर भोलू चपरासी क्यों बना, वकील क्यों नहीं?
निमित्त वकील – अपने ज्ञान के कारण।
उपादान वकील – आप जज क्यों नहीं बनें ? वकील क्यों रहे?
निमित्त वकील – वो क्या है कि मेरा एल. एल. बी. का रिजल्ट ग्राफ अच्छा नहीं था।
उपादान वकील – वीरप्पन डाकू क्यों बना, प्रधानमंत्री क्यों नहीं?
निमित्त वकील – अपनी मति के कारण।
उपादान वकील – हाँ, योर आनर ! मैं यही कहलवाना चाहता था कि ये सब अपनी योग्यता से इन कार्यों रूप परिणमित हुए। वकील साहब की तमाम बातें अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसी हैं। जैसा वकील साहब ने कहा कि ये अपने ज्ञान के कारण वकील बने,

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/४८
गुरु के कारण नहीं। इसलिए मैं अदालत से
दरख्वास्त करूँगा कि वकील साहब निमित्त के
समर्थन में ठोस तथ्य ही प्रस्तुत करें। अनावश्यक
बेकार की बातें नहीं करें।

न्यायाधीश- अदालत का समय बर्बाद न किया जाये, ठोस
तथ्य ही प्रस्तुत किये जायें।

निमित्त वकील- यस मी लॉर्ड! ठोस तथ्य के रूप में मैं आपके
सामने तीर्थंकरों के जीवन से सम्बन्धित कुछ सबूत
देना चाहूँगा।

बात उस समय की है, जब तीसरा काल समाप्ति
की ओर था। अयोध्या में राजा ऋषभदेव का
दरबार लगा हुआ था। दरबार में नीलांजना का
नृत्य चल रहा था, तभी अचानक नीलांजना की
मृत्यु हो जाती है और राजा ऋषभदेव को इस
घटना से वैराग्य हो जाता है और वे मुनिदीक्षा
धारण करके वन को चले जाते हैं।

और दूसरा तथ्य उस समय का है, जब नेमिकुमार
की बारात जूनागढ़ की ओर जा रही थी रास्ते
में अकस्मात निरीह पशुओं का करुण क्रन्दन
सुनकर उनको वैराग्य हो जाता है और वे मुनिदीक्षा
धारण करके वन में चले जाते हैं।

अब मैं अपने अजीज दोस्त से पूछता हूँ कि क्या
नीलांजना की मृत्यु ऋषभदेव के वैराग्य में कारण
नहीं थी? क्या निरीह पशुओं का करुण
क्रन्दन नेमिकुमार के वैराग्य में कारण नहीं था?
कारण था, जज साहब! कारण था; इसीलिए मैं
कहता हूँ कि निमित्त ही कार्य का कर्ता होता है। क्या
मेरे काबिल दोस्त इन प्रमाणों को झुठला सकते हैं?

जैनधर्म की कहानेयाँ भाग-११/४९
उपादान वकील- यस माइ लॉर्ड! वकील साहब द्वारा दिये गये इन तमाम तथ्यों से भी ये सिद्ध नहीं होता कि निमित्त से ही कार्य होता है, बल्कि ये तथ्य भी उपादान की ही विजय को साबित करने वाले हैं। यदि नीलांजना की मृत्यु से ऋषभदेव को वैराग्य हुआ, तो प्रश्न उठता है कि सभी सभासदों को वैराग्य क्यों नहीं हुआ तथा हम तो कितने ही लोगों को प्रतिदिन मरते देखते हैं, हमें वैराग्य क्यों नहीं होता? और जहाँ तक पशुओं के क्रन्दन की बात है, वह तो सभी बारातियों ने भी सुना था। वे सभी मुनि क्यों नहीं बन गये? इसका जबाव है, वकील साहब?
(निमित्त वकील रुमाल से पसीना पोछतें हैं और घबराहट के कारण चुप रह जाते हैं।)
उपादान वकील- आप देख रहे है जज साहब! इनकी चुप्पी ही इनकी पराजय का भान करा रही है।
निमित्त वकील-(थोड़े आत्मविश्वास के साथ) जज साहब! लगता है, मेरे काबिल दोस्त ने अभी जैन लॉ की पढ़ाई पूरी नहीं की है या फिर अन्तिम पेपर नकल से पास किया है; क्योंकि ये इतना भी नहीं जानते कि अदालत के अन्तिम निर्णय से पहले हार-जीत का फैसला नहीं होता और मैं अभी हारा नहीं हूँ। अभी तो मेरे पास और भी ऐसे पक्के सबूत और गवाह हैं, जो यह सिद्ध करके रहेंगे कि निमित्त ही कार्य का कर्ता है। उनमें से एक सबूत ये कैसेट है। मैं इसे अदालत को दिखाना चाहूँगा।
(कर्मचारियों द्वारा कैसट चलाई जाती है।)
कल्लू कुम्हार- (कैसेट में) हमार नाम है कल्लू कुम्हार, हम

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/५०
गोल-गोल, सुन्दर-सुन्दर घड़े बनात हैं, हमार
बनाये घड़े कबहूँ रिसत नाहीं हैं, हमार एक घड़ा
तुम भी ले लोना बाबूजी। एक घड़ा जाड़न के
चार महिने निकाल देत हैं। हमार घड़े की चर्चा
तो संसद में भी चलत हैं, अटल जी, पिछली
बार हमार घड़े का पानी पीकर ही जीते रहे।
अचानक कल्लू कुम्हार के पुत्र लल्लू के
द्वारा एक घड़ा फोड़ देने पर वह चिल्लाता
है।
अरे ! लल्लू की माँ! कहाँ मर गई, हम
एकदम नया बढ़िया घड़ा बनाये रहे, ई शैतान
ने तोड़ दौ। इसे पकड़ जरा।
निमित्त वकील: बस ! कर्मचारी कैसेट बंद करता है। देखा
जज साहब! कुम्हार को घड़ा बनाते हुए, कुम्हार
ने ही घड़ा बनाया है, कोई मिट्टी अपने आप ही
घड़ा नहीं बन जाती और रोटियाँ भी बाई ही
बनाती है, कोई गेहूँ अपने आप रोटी बनकर
हमारी थाली में नहीं आ जाता। मैं कुछ आगम
प्रमाणों को भी अदालत में पेश करना चाहूँगा।
न्यायाधीश: प्रमाण पेश करने की इजाजत है।
निमित्त वकील: जज की ओर कागज बढ़ाते हुये।
१. नरकों में वेदना और जातिस्मरण के कारण
सम्यग्दर्शन होता है।
२. क्षायिक सम्यक्त्व केवली या श्रुतकेवली के
पादमूल में ही होता है।
३. गौतम गणधर को मानस्तम्भ देखकर समवशरण
में प्रवेश करने से सम्यक्त्व हुआ।
४. कर्मों के उदय से जीव दुःखी है। ऐसे कई
उदाहरण करणानुयोग में पग-पग पर मिलेंगे।

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/५१

५. महावीर के जीव ने शेर की पर्याय में दो चारण ऋद्धिधारी मुनियों के उपदेश से सम्यक्त्व प्राप्त किया।

६. हमारे पण्डित, भैया भगवतीदासजी ने तो गजब की बात कही है कि-

देव जिनेश्वर गुरु यति, अरु जिन-आगम सार।
इह निमित्त तैं जीव सब, पावत हैं भव-पार।।
और पण्डित बनारसीदासजी ने भी कहा है-

गुरु उपदेश निमित्त बिन, उपादान बलहीन।
ज्यों नर दूजे पाँव बिन, चलवे को आधीन।।
क्या इन ठोस सबूतों को भी ठुकराया जा सकता है? इनको ठुकराना तो अनन्त तीर्थंकरों को ठुकराना होगा, क्योंकि ये सभी उनकी वाणी अर्थात् जिनवाणी में आये हुए तथ्यात्मक वाक्य हैं। क्या मेरे काबिल दोस्त के पास अब भी कुछ कहने को शेष है?

न्यायाधीश: क्या उपादान वकील अपनी सफाई में अब भी कुछ कहना चाहेंगे?

उपादान वकील (हँसकर) जज साहब! मेरे काबिल दोस्त ने बड़ी मेहनत से ताश का महल खड़ा किया है, लेकिन अफसोस, यह महल मेरे कुछ तर्क-युक्तियों के झोंके से ही ढह जायेगा। इस कड़ी में मैं सबसे पहले कल्लू कुम्हार को अदालत में बुलाने की इजाजत चाहूँगा।

न्यायाधीश: इजाजत है।

बाबू: कल्लू कुम्हार, अदालत में हाजिर हों… (कल्लू कुम्हार अदालत में आता है और कटघरे में खड़ा

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/५२
हो जाता है और बाबू कल्लू कुम्हार के सामने
जाकर जिनवाणी की शपथ दिलवाता है।)
बाबू: बोलो! मैं जो कुछ कहूँगा, सच कहूँगा, सच के
सिवा कुछ नहीं कहूँगा।
कल्लू कुम्हार: (दोहराता है) मैं जो कुछ कहूँगा, सच कहूँगा,
सच के सिवा कुछ नहीं कहूँगा।
उपादान वकील: (कल्लू कुम्हार के पास जाकर) तो आप घड़ा
बनाते हैं।
कल्लू कुम्हार: जी साब, हम ही घड़ा बनाउत हैं।
उपादान वकील: आप न हों, तो घड़ा बन ही नहीं सकता।
कल्लू कुम्हार: जी हाँ! कतइ नहीं बन सकत।
उपादान वकील: तो यहीं पर मेरे काबिल दोस्त के लिये एक
बढ़िया सा घड़ा बना दीजिये।
कल्लू कुम्हार: अरे साब! गरीब सें मजाक करत हो, बिना मिट्टी
के भी कोनउ घड़ा बन सकत है। इते मिट्टी तो
है नाहीं, आप कहै तो आपई के घरै पहुँचा दूँ
बनाकर।
उपादान वकील: (वहीं से थोड़ी धूल उठाते हुये) लो, ये लो
मिट्टी, अब बना दो एक घड़ा।
कल्लू कुम्हार: (थोड़ा हड़बड़ाकर) अरे साब! घड़ा तो योग्य
मिट्टी से ही बनत है, कोनऊँ रेत-कंकड़ से थोड़ी
ही बनत है।
उपादान वकील: (जज की तरफ) पॉइन्ट नोट किया जाये, योर
ऑनर! मिट्टी ही घड़े रूप परिणमित होती है,
बिना योग्य मिट्टी के घड़ा कभी नहीं बन सकता
और कुम्हार तो निमित्त मात्र है, जो घड़े रूप स्वयं

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/५३
परिणमित नहीं होता और जज साहब ! बाई रोटी
बनाती है, तो सभी रोटी एक समान गोल-गोल
स्वादिष्ट क्यों नहीं बनती ? कोई जल जाती है,
कोई कच्ची रह जाती है, क्या बाई जान-बूझकर
बनाती है? इसका जबाव यह है जज साहब !
कि आटे की योग्यता ही उस समय वैसी थी,
अतः आटा ही रोटी में कारण है, बाई नहीं।
१. मेरे काबिल दोस्त ने कहा कि- “नरकों में
वेदना और जातिस्मरण के कारण सम्यग्दर्शन
होता है।” तो मैं पूछता हूँ कि क्या सभी
नारकियों को वेदना नहीं होती? और होती है,
तो सभी सम्यग्दृष्टि क्यों नहीं बन जाते ?
२. दूसरा सबूत उन्होंने यह दिया कि- “क्षायिक
सम्यक्त्व, केवली या श्रुतकेवली के पादमूल में
ही होता है।” तो मैं पूछता हूँ कि उनके
पादमूल में रहने वाले सभी जीव क्षायिक
सम्यग्दृष्टि क्यों नहीं हो जाते ?
३. फिर उन्होंने यह कहा कि गौतम गणधर को
मानस्तम्भ देखकर, समवशरण में प्रवेश करने
से सम्यक्त्व हुआ; तो मंखलि गोशाल जो
६६ दिन समोशरण में रहा, फिर भी उसे
सम्यक्त्व क्यों नहीं हुआ?
४. और फिर ये प्रमाण दिया कि कर्मों के कारण
जीव दुःखी है; तो फिर कोई जीव कभी सुखी
न हो, क्योंकि कर्मों का उदय तो अनादिकाल
से चला आ रहा है। करणानुयोग में तो निमित्त
की मुख्यता से कथन आते हैं।
५. जहाँ तक भगवान महावीर के जीव की बात

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/५४
है, तो उन्हें मारीचि के भव में सम्यक्त्व क्यों
नहीं हुआ? वहाँ तो भगवान आदिनाथ जैसा
समर्थ निमित्त मिला था।
६. जहाँ तक भैया भगवतीदासजी की बात है,
तो पण्डित अमितकुमारजी शास्त्री, जिन्होंने भैया
भगवतीदास के निमित्तोपादान दोहों का सूक्ष्मता से
अध्ययन किया है। ये श्री टोडरमल दिगम्बर जैन
सिद्धान्त महाविद्यालय, जयपुर के विद्वान हैं। मैं
अदालत से दरख्वास्त करूँगा कि उन्हें यहाँ
बुलाने की इजाजत दी जाये।
न्यायाधीश: इजाजत है।
बाबू: धर्मविशारद्, पण्डित अमितकुमार शास्त्री हाजिर हों।
(भैया भगवतीदासजी के भजन गुनगुनाते हुये पण्डित अमितजी
अदालत में प्रवेश करते हैं और बाबू शपथ दिलवाता है।)

उपादान वकील: पण्डितजी! आप उपादान को कार्य का कर्ता मानते
हैं या निमित्त को ?
पं. अमित: (थोड़ा हँसकर) मैंने जहाँ तक भैया भगवतीदासजी
को समझा है, उनका मन्तव्य तो यह है कि- कार्य
की उत्पत्ति का कर्ता तो उपादान ही है, निमित्त
नहीं और उन्होंने अपने दोहों में कहा भी है कि-
उपादान बिन निमित्त तू, कर न सके इक काज।
कहा भयो जग ना लखै, जानत है जिनराज।।
अरे ! इस जीव को निमित्त तो अनन्तबार मिला
है, पर उपादान में योग्यता नहीं थी, इसीलिये
संसार में भटक रहा है।
यह निमित्त इस जीव को, मिल्यो अनन्तीबार।
उपादान पल्टयौ नहीं, तो भटक्यौ संसार।।

उपादान वकील – बस माइ लॉर्ड! मुझे केवल इतना ही पूछना था।
मेरे अजीज दोस्त को कुछ पूछना हो, तो वे भी
अपनी संतुष्टि कर लें।
निमित्त वकील – यस योर आनर ! मैं इनसे कुछ पूछना चाहता हूँ।
न्यायाधीश– इजाजत है।
निमित्त वकील– तो अमितजी आपने भैया भगवतीदासजी को बहुत
गहराई से पढ़ा है, लेकिन शायद आप वह दोहा
छोड़ गये जिसमें भैया भगवतीदासजी ने स्वयं
कहा है कि–

देव जिनेश्वर गुरु यति, अरु जिन आगम सार।
इह निमित्त तैं जीव सब, पावत है भव पार।।

पं. अमित– नहीं, वकील साहब! ऐसी कोई बात नहीं है। ये
दोहा भी पढ़ने में आया है, लेकिन वहाँ तो प्रश्न
के रूप में वह दोहा कहा गया है, वहाँ पण्डितजी
के शिष्य ने शंका व्यक्त की थी और उसी के
उत्तर में पण्डितजी ने समझाया है कि– जीव को
ऐसे निमित्त तो अनन्तबार मिले, किन्तु उपादान
की योग्यता न होने के कारण यह संसार में ही
भटक रहा है।
उपादान वकील – शायद मेरे काबिल दोस्त की शंका निर्मूल हो
चुकी होगी। ठीक है, पण्डितजी आप पधारें। योर
ऑनर ! मैं इसी बात की पुष्टि के लिये पण्डित
प्रदीपकुमारजी शास्त्री को भी अदालत में बुलाने
की इजाजत चाहूँगा, जिन्होंने बनारसीदासजी की
कृतियों को बहुत गम्भीरता से पढ़ा है। ये श्री
दिगम्बर जैन आचार्य संस्कृत महाविद्यालय, जयपुर
के विद्वान हैं।

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/५६
न्यायाधीश- इजाजत है।
बाबू- धर्मरत्न, पण्डित प्रदीपकुमार शास्त्री हाजिर हों…।
(बाबू शपथ दिलवाता है।)
उपादान वकील- आप कार्य के होने में उपादान का अधिक महत्त्व समझते हैं या निमित्त का?
पं. प्रदीप- अरे बन्धुवर ! बनारसीदासजी तो कहते हैं कि-
कार्य के होने में तो उपादान ही अधिक महत्त्वपूर्ण है, निमित्त वहाँ उपस्थिति अवश्य रहता है, किन्तु उसका कोई महत्त्व नहीं है, कहा भी है-
उपादान को बल जहाँ, तहाँ न निमित्त को दाव।
एक चक्र सो रथ चले, रवि कौ यही स्वभाव ।।
निमित्त वकील- ऑब्जेक्शन योर ऑनर।
न्यायाधीश- ऑब्जेक्शन सस्टेन्ड।
निमित्त वकील- पण्डितजी ! बनारसीदासजी ने यह भी तो कहा है कि-
गुरु उपदेश निमित्त बिन, उपादान बलहीन।
ज्यों नर दूजै पाँव बिन, चलवे को आधीन ।।
कहा है, कि नहीं कहा है?
पं. प्रदीप- अरे भव्य ! यहीं तो तुम लोग मात खा जाते हो।
आधा-अधूरा अध्ययन करते हो और विपरीत अर्थ धरकर, अर्थ का अनर्थ ग्रहण करते हो और बाद में विसंवाद करते हो। उसके बाद ही तो पण्डितजी साहब कहते है कि-
उपादान निज गुण जहाँ, तहाँ निमित्त पर होय।
भेदज्ञान परिणाम विध, विरला बूझे कोय।।

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/५७

उपादान वकील — जज साहब! अब यह बात स्पष्ट है कि निमित्त अकिंचित्कर है और उपादान ही कार्य का कर्ता है। अब भी कोई सबूत है आपके पास, वकील साहब!

निमित्त वकील(झल्लाकर) हाँ है, लेकिन मैं पूछना चाहता हूँ कि अगर निमित्त कार्य का कर्ता नहीं है, तो गाड़ी बिना ड्राइवर और पैट्रोल के चलनी चाहिये। लगता है, मेरे काबिल दोस्त की गाड़ी बिना ड्राइवर और बिना पेट्रोल के ही चलती है।

उपादान वकील — ठीक है, यदि गाड़ी ड्राइवर ही चलाता है, तो जब तक ड्राइवर गाड़ी में बैठा हो और पैट्रोल भी भरी हो, तब तक गाड़ी चलनी चाहिये; यदि ऐसा हो गया तो आपका और हमारा क्या होगा? क्योंकि फिर तो सब चलते ही रहेंगे, कभी न रुकेंगे। बोलिये, वकील साहब! बोलिये।

निमित्त वकील — कोई बात नहीं माइ लॉर्ड। मेरे काबिल दोस्त से पूछिये ये भोजन क्यों करते हैं? इनको अपनी श्रीमतीजी के हाथ के बने हुये गरम-गरम, पतले-पतले फुलके क्यों चाहिये? इनको सुबह-शाम भरपेट भोजन क्यों चाहिये? इसलिये ना, क्योंकि इनका जीवन आहार और पानी के बिना नहीं चल सकता। यदि एक दिन भोजन न मिले तो दुर्बलता महसूस क्यों करते हैं?

उपादान वकील — योर ऑनर! मेरे काबिल दोस्त न जाने क्यों भूल जाते हैं कि जिनके पास आहार-पानी की समुचित व्यवस्था है, वे लोग भी मौत की नींद सो जाते हैं, और तो और, नरकों में तो खाने को एक कण और पीने को पानी की एक बूँद भी नहीं

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/५८
मिलती, फिर भी नारकी जीवित कैसे रहते हैं?
डॉ. हुकमचन्दजी भारिल्ल ने पूजन की पंक्तियों
में कहा है कि-
मैं समझ रहा था अब तक प्रभु, भोजन से जीवन चलता है।
भोजन बिन नरकों में जीवन, भरपेट मनुज क्यों मरता है।।
शायद अब मेरे काबिल दोस्त के पास कुछ कहने
को न बचा होगा, दैट्स ऑल।
निमित्त वकील - नहीं माइ लॉर्ड! मेरे पास अभी ऐसे गवाह मौजूद
हैं, जिनके बयान ये चीख-चीख कर कहेंगे कि
निमित्त ही कार्य का कर्ता है। मैं गवाह के तौर
पर सबसे पहले पण्डित उपचारमलजी को अदालत
में बुलाने की इजाजत चाहूँगा।
न्यायाधीश- इजाजत है।
बाबू- श्रावकोत्तम पण्डित उपचारमल शास्त्री हाजिर हों..!
(पं. उपचारमलजी भजन गुनगुनाते हुए प्रवेश करते है।)
(बाबू शपथ दिलवाता है)
निमित्त वकील - पण्डितजी! बता दो, इन वकील साहब को कि
निमित्त में कितना जोर है।
पं. उपचारमल - अरे क्या बताऊँ वकील साहब ! एक घंटे से
फालतू बातें सुन-सुन कर मेरा तो सर ही चकरा
गया। अरे! तुम्हें इतना भी नहीं पता कि बिना
देव-शास्त्र-गुरु के मोक्ष क्या, मोक्षमार्ग भी नहीं
मिल सकता। अगर इनकी उपयोगिता नहीं है, तो
शास्त्र में ऐसा क्यों आता है कि-
देवपूजागुरुपास्ति स्वाध्यायसंयमस्तपः ।
दानञ्चेतिग्रहस्थानां षट्‌कर्माणि दिने दिने ।।
यहाँ तो फालतू की बातें हो रही हैं, बेचारा निमित्त

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/५९

भैया कितनी अच्छी-अच्छी बातें कह रहा है पर इन
वकील साहब की तो समझ में ही नहीं आ रही है।

निमित्त वकील(व्यंग्य करते हुए) क्यों वकील साहब! अब भी
कुछ ख्वाहिश है।

उपादान वकील – हाँ! जज साहब मैं भी कुछ सवालात करने की
इजाजत चाहता हूँ।

न्यायाधीश– इजाजत है।

उपादान वकील – हाँ तो पण्डितजी! आपकी उम्र क्या होगी?

पं. उपचारमल – अजीब सवाल है जी! पूरे ५१ वर्ष के हो गये, हम।

उपादान वकील – तो आपको देव-शास्त्र-गुरु का सानिध्य कब से
प्राप्त है?

पं. उपचारमल – वकील साहब! मुझे तो मेरे पिताजी और माताजी
ने बचपन से धार्मिक संस्कार दिये हैं और मैं दो
साल का तब हुआ था, जब णमोकारमंत्र शुद्ध
पढ़ने लगा था। मेरी उम्र तो देव-शास्त्र-गुरु के
सानिध्य में ही गुजरी है।

उपादान वकील – पण्डितजी आप अभी कह रहे थे कि देव-शास्त्र-
गुरु हमें मोक्षमार्ग व मोक्ष देते हैं और आप
लगभग ५० वर्ष से उनके चरणों में हैं, तो फिर
आपको मोक्ष में होना चाहिए था। यहाँ अदालत
में आप क्या कर रहे हैं? क्यों पण्डितजी! कहीं
आप सिद्धालय से तो यहाँ नहीं पधारे हैं?

(लोग आपस में कानाफूसी करते हुए हँसने लगते हैं।)
(पण्डितजी विस्मयपूर्वक सिर खुजाने लगते हैं।)

उपादान वकील – देखा जज साहब! बेचारे पण्डितजी के पास
इसका कोई जवाब नहीं है।

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/६०

निमित्त वकील - कोई बात नहीं पण्डितजी! आप पधारें। मैं अदालत
में अपने दूसरे गवाह पण्डित व्यवहारचंदजी को
बुलाने की इजाजत चाहूँगा।

न्यायाधीश- इजाजत है।

बाबू- श्रावकश्रेष्ठ पण्डित व्यवहारचंद शास्त्री हाजिर हों..।

(बाबू शपथ दिलवाता है।)

निमित्त वकील - पण्डितजी साहब! आप अदालत को बता दीजिये
कि निमित्त कार्य का कर्ता है या नहीं?

पं. व्यवहारचंद- हाँ, वह कर्ता है, क्योंकि नग्न-दिगम्बरपना महाव्रत
आदिक ही तो मुक्ति प्राप्त कराते हैं। भला आज
तक इनके बिना कोई मुक्त हुआ है। ये सब
निमित्त ही तो भव से पार ले जाते हैं। वकील
साहब! आप तो व्यर्थ ही निमित्त की गरिमा को
ठेस पहुँचा रहे हैं।

निमित्त वकील- पॉइन्ट नोट किया जाय, योर ऑनर! पण्डितजी
की दलीलें चीख-चीख कर कह रही है कि निमित्त
ही कार्य का कर्ता है। लगता है, मेरे काबिल
दोस्त कुछ पूछना चाहते हैं। पूछ लीजिए, पूछ
लीजिए, जो पूछना चाहें।

उपादान वकील - पण्डितजी साहब मैं निमित्त के अस्तित्व से इन्कार
नहीं कर रहा हूँ, अपितु मैं तो यह कह रहा हूँ
कि निमित्त कार्य का कर्ता नहीं है। और यही बात
आपकी दलील पर लागू होती है। जब कोई जीव
मुक्ति प्राप्त करता है, तब तो नग्नत्व और
महाव्रत को निमित्त कहा जाता है, वह भी
असद्भूत व्यवहारनय से और इनको बाहर में
धारण करके कई जीव संसार ही में भटकते रहते
हैं। क्या आप इस बात से इन्कार करते हैं?

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/६१
पं. व्यवहारचंद- (थोड़े असमंजस में) बात तो आप ठीक कह रहे हैं।
उपादान वकील- देखा, जज साहब! पण्डितजी भी मान गये। इसलिए इस बात के निर्णय में देर नही लगनी चाहिए कि निमित्त कार्य का कर्ता नहीं है। बस मैं इतना ही पूछना चाहता था।
निमित्त वकील- (हताश होते हुए) अच्छा पण्डितजी, आप पधारें।
उपादान वकील- अगर अब भी कुछ गुंजाइश हो, तो मैं अदालत में गवाह के तौर पर कुछ महानुभावों को बुलाने की इजाजत चाहता हूँ।
न्यायाधीश- इजाजत है।
उपादान वकील- इस श्रृंखला में मैं सबसे पहले, श्री टोडरमल दिगम्बर जैन सिद्धान्त महाविद्यालय, जयपुर के विद्वान, पण्डित मनीष कुमारजी शास्त्री को, जिन्होंने पण्डित टोडरमलजी द्वारा प्ररूपित निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्धी तथ्यों में विशेषज्ञता हासिल की है। उन्हें अदालत में बुलाना चाहूँगा।
न्यायाधीश- इजाजत है।
बाबू- साहित्यरत्न पण्डित मनीषकुमार शास्त्री हाजिर हों..। (बाबू शपथ दिलवाता है।)
उपादान वकील- पण्डितजी साहब! क्या कोई वस्तु निमित्ताधीन परिणमित होती है?
पं. मनीष- नहीं भाई! पण्डितजी तो कहते हैं कि अनादि निधन वस्तुएँ भिन्न-भिन्न, अपनी-अपनी मर्यादा सहित परिणमित होती है, कोई किसी के आधीन नहीं है, कोई वस्तु किसी के परिणमन कराने से परिणमित नहीं होती और किसी द्रव्य का परिणमन किसी के आधीन नहीं है।

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/६२
उपादान वकील- फिर जगत को निमित्त की आधीनता दिखाई क्यों
देती है?

पं. मनीष-
भाई! बात तो ऐसी है कि जगत की दृष्टि ही
निमित्ताधीन है और निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध भी
घने दिखाई देते हैं। जैसे- सूर्य के उदयकाल में
चकवा-चकवी का संयोग होता है और रात्रि में
वियोग हो जाता है। यह सब निमित्त-नैमित्तिक
सम्बन्ध ही तो है, लेकिन इनके बीच में कर्ता-
कर्म सम्बन्ध नहीं है। पण्डित टोडरमलजी का इस
सम्बन्ध में यही मत है।

उपादान वकील- योर ऑनर! यह पॉइन्ट नोट किया जाये। मैं इतना
ही पूछना चाहता था। पण्डितजी साहब, आप
पधारें। मैं अपने दूसरे गवाह के रूप में तार्किक
विद्वान पण्डित सुशीलकुमारजी शास्त्री को बुलाना
चाहूँगा, जिन्होंने डॉ. हुकमचन्दजी भारिल्ल की
निमित्तोपादन कृति का गहराई से अध्ययन किया है।

न्यायाधीश-
इजाजत है।

बाबू-
तार्किक विद्वान पण्डित सुशीलकुमार शास्त्री हाजिर हों..।
(बाबू शपथ दिलवाता है।)

उपादान वकील- पण्डितजी! यदि निमित्त को ही कर्ता मान लिया
जाये, तो क्या परेशानी है?

पं. सुशील-
क्या बात करते हो वकील साहब? परेशानी अरे,
महा परेशानी खड़ी हो जायेगी। निमित्त को कर्ता
मानने पर एक द्रव्य को दूसरे द्रव्य का कर्ता
मानने का प्रसंग आयेगा और द्रव्यों की स्वतंत्र
सत्ता का व्याघात ही हो जायेगा, इसलिए निमित्त
को कर्ता मानना महापाप है।

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/६३

उपादान वकील - जज साहब, यह पॉइन्ट नोट किया जाये। डॉ. भरिल्लजी के अनुसार तो वस्तुव्यवस्था के लोप का प्रसंग आयेगा, इसलिए निमित्त को कर्ता नही मानना चाहिये। क्या मेरे काबिल दोस्त भी कुछ पूछना चाहेंगे?

निमित्त वकील - यस माइ लॉर्ड! मैं भी कुछ सवालात करने की इजाजत चाहूँगा।

न्यायाधीश - इजाजत है।

निमित्त वकील - पण्डितजी ! मैं पूछना चाहता हूँ कि उपादान को कार्य का कर्ता मा’ने पर, उपादान से प्रतिसमय अनेक कार्य उत्पन्न होने का प्रसंग नहीं आयेगा?

पं. सुशील - प्रश्न तो बहुत गहरा किया है, वकील साहब ने, लेकिन समझने के लिये गहराई में उतरना पड़ेगा। पर कुछ तथाकथित, आत्मकल्याण चाहने वाले लोग इन सिद्धान्तों की गहराई में उतरने से कतराते हैं। लेकिन भाई साहब! इन सिद्धान्तों की गहराई में उतरे बिना कल्याण सम्भव नहीं है। बात ऐसी है, वकील साहब ! उपादान के दो भेद होते हैं- एक त्रिकाली उपादान और दूसरा क्षणिक उपादान, जिसे तत्समय की योग्यता भी कहा जाता है और वही क्षणिक उपादान कार्य का नियामक कारण होता है, इसलिए उपादान को ही साधकतम या कर्ता मानने पर प्रतिसमय अनेक कार्य उत्पन्न होने का दोष नहीं।

निमित्त वकील - ठीक है, मैं इतना ही पूछना चाहता था।

उपादान वकील - पण्डितजी, आप पधारें। अब भी कोई शंका की गुंजाइश है, वकील साहब !

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/६४
निमित्त वकील – जज साहब! मेरे काबिल दोस्त ने अब तक जितने भी गवाह पेश किये हैं, उन सबने गृहस्थ पण्डितों के ही प्रमाण पेश किये हैं। मैं चाहता हूँ कि कुछ आचार्यों के प्रमाण भी पेश किये जायें।
(सभी लोग आपस में कानाफूसी करने लगते हैं)
न्यायाधीश– आर्डर, आर्डर।
उपादान वकील – जज साहब! मेरे काबिल दोस्त सम्माननीय पण्डितों को अप्रामाणिक कहकर तीर्थंकरों की वाणी और आचार्यों की वाणी को ही गलत बताना चाहते हैं; जब कि ये सभी जिनवाणी का ही प्रतिपादन करने वाले हैं।
न्यायाधीश– अदालत में सम्माननीय पण्डितों की प्रामाणिकता को ठेस न पहुँचायी जाये, फिर भी उपादान वकील आचार्यों के प्रमाण भी प्रस्तुत करें।
उपादान वकील – ठीक है, जज साहब! मैं अदालत में जैनों के सर्वमान्य आचार्य उमास्वामी के ग्रन्थ से कुछ प्रमाण प्रस्तुत कर रहा हूँ। उन्होंने तत्त्वार्थसूत्र के पाँचवे अध्याय में कहा है कि ‘सत् द्रव्यलक्षणम्’ ‘उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्’। मैं वकील साहब से पूछना चाहता हूँ कि इन सूत्रों का अर्थ क्या है?
निमित्त वकील – इसका सीधा-साधा अर्थ यह है कि द्रव्य का लक्षण सत् है और सत् उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य युक्त होता है।
उपादान वकील – मैं पूछता हूँ, कौन-सा द्रव्य सत् नहीं है?
निमित्त वकील – प्रत्येक द्रव्य सत् है।
उपादान वकील – ऐसा कौन-सा द्रव्य है, जो ध्रौव्य रहकर उत्पाद-व्यय सहित है?

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/६५

निमित्त वकील— प्रत्येक द्रव्य।

उपादान वकील— अब क्या आप यह बता सकते हैं कि निमित्त और उपादान भिन्न-भिन्न पदार्थ है या एक ही?

निमित्त वकील— भिन्न-भिन्न।

उपादान वकील— दोनों का स्व-चतुष्टय एक ही है या अलग-अलग है?

निमित्त वकील— अलग-अलग।

उपादान वकील— दोनों पदार्थों में उत्पाद-व्यय एक ही समय में होता है या भिन्न-भिन्न समयों में?

निमित्त वकील— एक ही समय में।

उपादान वकील— पॉइन्ट नोट किया जाये, जज साहब! मेरे काबिल दोस्त ने स्वीकार किया है कि निमित्त और उपादान दोनों का द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव भिन्न-भिन्न है तथा दोनों के कार्य का समय एक ही है। अतः इस बात के लिये गुंजाइश ही नहीं रहती कि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कुछ कर सकता है। दूसरा प्रमाण आचार्य अमृतचंद्र का जैन धर्म के अनुच्छेद समयसार पर लोकप्रिय आत्मख्याति नामक टीका का देना चाहूँगा। उन्होंने गाथा नं.३ की टीका में साफ-साफ लिखा है। वे सब पदार्थ अपने द्रव्य में अन्तर्मग्न रहने वाले अपने अनन्त धर्मों के चक्र को— समूह को चुंबन करते हैं— स्पर्श करते हैं; पर वे अनन्त द्रव्य एक-दूसरे को स्पर्श नहीं करते। तो जज साहब! जब वे एक-दूसरे का स्पर्श ही नहीं करते, तब वे एक-दूसरे का कार्य क्या खाक करेंगे?

तीसरे प्रमाण के रूप में मैं आचार्य समन्तभद्र को

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/६६
याद करना चाहूँगा। उन्होंने आप्तमीमांसा में साफ-
साफ कहा है कि प्रत्येक द्रव्य का एक-दूसरे में
अत्यन्त अभाव है, इसलिए उपादान ही कार्य का
सच्चा कर्ता है। क्या मेरे काबिल दोस्त अब भी
कुछ कहना चाहेंगे?

निमित्त वकील– जज साहब मेरे काबिल दोस्त कहना चाहते हैं
कि कार्य के समय निमित्त होता ही नहीं है।

उपादान वकील– नहीं मैंने यह कब कहा? मैं तो यह कह रहा
हूँ कि निमित्त कार्य के प्रति अकिंचित्कर है।
जिनागम में उद्धृत इस बात को पूज्य श्री कानजीस्वामी
ने अत्यन्त सरलता पूर्वक स्पष्ट किया है। कुछ
लोगों का यह भ्रम है कि पूज्य श्री कानजी स्वामी
एकान्तवादी थे, उन्होंने निमित्त को ही उड़ा दिया
किन्तु उन्होने निमित्त को उड़ाया नहीं, अपितु
जिनागम में जिसप्रकार वस्तुव्यवस्था का निरूपण
किया गया है उसे उसीप्रकार अनेकान्त का सन्तुलन
रखते हुए उसके मर्म को खोला है। मैं इस बात
की पुष्टि के लिये पण्डित अनुभवप्रकाश शास्त्री
को बुलाना चाहूँगा, जिन्होंने आध्यात्मिक सत्पुरुष
श्री कानजीस्वामी के निमित्तोपादान प्रवचन, मूल में
भूल का गहराई से अध्ययन किया है तथा टेप
प्रवचन भी सुनें है।

जज– इजाजत है।

बाबू– अध्यात्मरसिक पण्डित अनुभवप्रकाश शास्त्री हाजिर हों..!
(पण्डित अनुभवप्रकाशजी गम्भीर मुद्रा में अदालत में प्रवेश
करते है और बाबू शपथ दिलवाता है।
)

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/६७
उपादान वकील - पण्डितजी कार्योत्पत्ति में निमित्त और उपादान का
क्या स्थान है?
पं. अनुभवप्रकाश-अरे भाई! स्वामीजी तो कहते हैं कि जानने
में तो दोनों ही आते हैं, किन्तु निमित्त के कारण
उपादान में कोई कार्य नहीं होता। अथवा निमित्त
उपादान का कुछ कर सकता है - ऐसा भी नहीं
है और भाई ये भी नहीं मानना चाहिये कि कार्य
मात्र उपादान से ही होता है, निमित्त होता ही नहीं
है - ऐसा मानना तो मिथ्यात्व है। लेकिन भाई
दृष्टि में उपादान ही रहना चाहिये। निमित्ताधीन
दृष्टि ही संसार का कारण है।
उपादान वकील - जज साहब! अदालत में स्पष्ट हो चुका है कि
सत्पुरुष श्रीकानजीस्वामी निमित्त को मानते हैं,
लेकिन वह कार्य का कर्ता नहीं है, इसलिए कर्ता
नहीं मानते। क्या मेरे काबिल दोस्त भी पण्डितजी
से कुछ पूछना चाहते हैं?
निमित्त वकील- पण्डितजी, हमने तो सुना है कि स्वामीजी कार्य
में निमित्त की उपस्थिति अनिवार्य नहीं मानते थे।
पं. अनुभवप्रकाश-कौन मूर्ख कहता है कि स्वामीजी निमित्त को
स्वीकार नहीं करते थे। स्वामीजी तो कहते थे कि
कार्य जब भी होता है, तो बाह्य में उपस्थित किसी
न किसी पदार्थ पर निमित्त का आरोप आता है,
लेकिन निमित्त की उपस्थिति से ही कार्य होना
माने, तो मिथ्यात्व होगा।
निमित्त वकील - ठीक है, मैं इतना ही पूछना चाहता था।
उपादान वकील - ठीक है, पण्डितजी! आप जा सकते है। देखा,

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/६८
जज साहब! निमित्त मुवक्किल द्वारा लगाया गया
यह इल्जाम कि सत्पुरुष श्रीकानजीस्वामी निमित्त
को नहीं मानते, सरासर बेबुनियाद है; क्योंकि
उन्होंने स्वयं इस बात की पुष्टि की है कि कार्य
के समय निमित्त देखने में आता है, लेकिन कार्य
नही करता। कार्य का कर्ता तो उपादान ही रहता
है। यदि मेरे काबिल दोस्त अपनी सफाई में अब
भी कुछ कहना चाहें, तो कहें।
जज: क्या आप अपनी सफाई में कुछ कहना चाहेंगे?
निमित्त वकील: (निराशापूर्वक) नो सर। दैट्स ऑल।
जज: (कुछ लिखकर फैसला सुनाते हुये) तमाम
ठोस तथ्यों अथाह आगम प्रमाणों और प्रामाणिक
गवाहों के बयानों को मद्देनजर रखते हुये अदालत
इस नतीजे पर पहुँची है कि निमित्त कुमार का
पक्ष कि निमित्त से कार्य होता है और श्रीकानजीस्वामी
निमित्त को नहीं मानते, सरासर बेबुनियाद है और
यह अदालत उपादान कुमार के पक्ष से सहमत
है कि कार्य का वास्तविक कर्ता उपादान ही होता
है और जिन लोगों ने श्रीकानजीस्वामी पर निमित्त
के लोप का आरोप लगाया है, वह सरासर गलत
है। बे-बुनियाद है।
कुछ तथाकथित स्वार्थी लोगों ने सत्य को गहराई
से समझे बिना मात्र विवाद का बिन्दु बनाकर
समाज में उत्तेजना पैदा की है। यह अदालत उन
तमाम लोगों को चेतावनी देती है कि वे इसप्रकार
से किसी ज्ञानी पुरुष के ऊपर आक्षेप न करें,
अन्यथा उन्हें चार गति और चौरासी लाख योनियों
की जेल में अनन्तकाल के लिये जाना पड़ेगा।

जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/६९

जिनागम में निमित्त को कर्ता कहने वाले कई कथन आते हैं, ये उपचार कथन मात्र हैं। इनको एकान्त से ग्रहण करने पर मिथ्यात्व का पोषण होता है, इसलिए जिनागम में प्रवेश के लिए प्रमाण और नय का अध्ययन भी करें।

यह अदालत निमित्त कुमार को हिदायत देती है कि वे ‘समयसार का कर्ता-कर्म अधिकार’ सत्पुरुष श्रीकानजीस्वामी के ‘निमित्तोपादान पर प्रवचन’ डॉ. हुकमचन्दजी भारिल्ल द्वारा लिखित ‘निमित्तोपादान’ पुस्तक और पण्डित रतनचन्दजी भारिल्ल की कृति ‘पर से कुछ सम्बन्ध नहीं’ - इन सबको पढ़कर अपनी भ्रमित बुद्धि को सुधारें, अन्यथा उन्हें भी अनन्त काल के लिये संसाररूपी जेल में बंदी होना पड़ेगा। आज की अदालत इसी फैसले के साथ बर्खास्त की जाती है।

_ (जज उठकर कोर्ट से बाहर जाते हैं। सभी लोग आपस में चर्चा करने लगते हैं। पर्दा गिरता है।) _

प्रस्तुतकर्ता : श्री टोडरमल दिग० जैन सिद्धान्त महाविद्यालय, जयपुर के छात्र विद्वान- सोनू जैन पोरसा, अभयकुमार जैन खैरागढ़, संजय जैन बड़ामलहरा, धर्मेन्द्र सिंघई बण्डा, अविरल सिंघई विदिशा, संदीप जैन गोहद, ललित सिंघई बण्डा, अभिनव मोदी मैनपुरी आदि।

द्रव्य स्वयं ही अपनी अनन्तशक्तिरूप सम्पदा से परिपूर्ण है, इसलिये स्वयं ही छहकारकरूप होकर अपना कार्य करने के लिये समर्थ है, उसे बाह्यसामग्री कोई सहायता नहीं कर सकती। इसलिये केवलज्ञान के इच्छुक आत्मा को बाह्यसामग्री की अपेक्षा रखकर परतंत्र होना निरर्थक है।
– प्रवचनसार गाथा १६ का भावार्थ पृष्ठ २८

परद्रव्य कोई जबरन तो बिगाड़ता नहीं है, अपने भाव बिगड़ें तब वह भी बाह्यनिमित्त है। तथा इसके निमित्त बिना भी भाव बिगड़ते हैं, इसलिये नियमरूप से निमित्त भी नहीं है।
– इसप्रकार परद्रव्य का तो दोष देखना मिथ्याभाव है।
– मोक्षमार्ग प्रकाशक, पृष्ठ २४४


स्रोत: दस लक्षण सांस्कृतिक कार्यक्रम संग्रह — मंचन-योग्य नाटक (जैन समुदाय पांडुलिपि)

प्रूफरीडिंग बाकी है

स्रोत · Source: forum.jinswara.com — अनुमति सहित, साभार · shared with permission and thanks.

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