(background music तालियों की आवाज)
(तत्वों की आवाज)
कवि — आया बसंत का पर्व महान, 2 कोयल Song
(background music)
राजा — आओ कविराज मैं भी कविता ने तो पुस्त में जाकर बसंत ऋतु का आनंद प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न कर दी है।
हम चाहते है के हम सब वन-2 में घूमें और उद्यान में जल क्रीड़ा करें। बसंत ऋतु के उत्सव की सूचना सेवास में भी दे दी जाए।
मंत्री — जो आज्ञा महाराज।
(background music सुनकर यह आदेश सेवास में भी तुरंत पहुंच गया संदेश)
(गृह सभा समाप्त होती है राजा सहित सभी सभाकक्ष से चले जाते है।)
(तालियों की आवाज)
आया बसंत का पर्व music राजा सहित सभी नंदन वन में-
राजा — हे वीर। नंदन वन की शोभा को देखकर तो ऐसा प्रतीत होता है। जैसे इन्द्रराज और बसंती वाला का प्यार हुआ, पक्षियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे बाग में स्वागत गीत बज रहे हो देखो। इसने हमे पुकार रहे है। आओ जल क्रीड़ा करे
(play background music)
आया बसंत का पर्व
(राजा मंत्री सभी आनंदित होते हुए आगे बढ़ते हैतभी सत्यभामा आदि नेमीकुमार की दासियों की आवाज)
सभी की आवाज — गाना होता है।
(Music सत्यभामा और पटरानिया तैयार हुई फिर हुलसाय सब कुछ रही संग में वाद्य यंत्रों की आवाज)
सत्यभामा — अरे देवरानी। यहाँ तो आओ हम रंग मटी लगाएंगे।
दूसरी दासी — अरे आओ री हम आपरे कुछ कहना चाहते है।
नेमी कुमार — हा हा भाभी हमीस हास्य)
Music — कृष्ण देखत रह जाते … music
भाभी — आप शादी कब करोगी ?
नेमीकुमार — जब मेरी इतनी सारी भाभियाँ हैं तो मैं शादी क्यों करूँ?
भाभी — देवरे जी हमें यूँ न बहकाइए। आज तो हम रस जाकर रहेंगे।
नेमीनाथ — भाभी मुझे विवाह की इच्छा ही नहीं है।
(Music)
भाभी — ओ देवर जी यदि सब रूखसर करने लगे तो हम गृहस्थी का क्या होगा? हम कन्याएँ कुँवारी ही रह जाएँगी।
नेमीकुमार — भाभी! सागारिया अथवा थोड़ी ही छूती है नागम्या स्वतंत्र रूप है।
चाहे तो नागम्या भी आत्मानुभूति करके सफल हो सकती है।
Music — साजी पा-
रुकमणी — खापा जीवन तो रुकी ही है।
भाभी — देवर जी ये योग ज्ञान की बातें अपने तक ही रखियेगा।
सत्यभामा — सारे संसार को मर क्या दूँगी मैं।
नेमी — नहीं तो नर नारी के जीवन का अंत हो जाएगा।
(Music = श्रीकृष्ण सह रुकमणी खेलें संग में
होली - होली — खेलो संग में होली
(दूसरा Part = खत्म
व तीसरा Part — B
नेमीकुमार — भाभी लो मेरी होली हो दो
सत्यभामा — न देवकी आपकी होली में न होली हो सकती।
नेमीकुमार — भाभी होली झुकने को ही तो कह रहा हूँ।
सत्यभामा
रुकमणी — आपकी होली में नहीं, हो ऊँगी मैं, तो अली होली होती है। जो नागसैया पर सोते हैं।
धनुष धारण करते हैं। शंख बजाते हैं।
नेमीकुमार — अब ये कौन सी बड़ी बात है भाभी।
पृष्ठभूमि तो धाधिर कर दिखाओ। नेमीश्वर भी सब नेमीकुमार के अच्छा तो देखा है। ठीक है।
(दोनों का सम्मान होता है।)
(back ground में बिजली बादलों की आवाज)
(भयानक पार्श्व संगीत)
(तीव्र से शंख का स्वर चारों ओर हड़कंप)
श्रीकृष्ण (धीमे स्वर में)
सेवक में कौन है? काल ने किसको बुलाया है? भा वो
दास — महाराज! मैं नेमीश्वर हूँ। जो सतभामा की आँखों के तारे हैं। आप शांत हो जाओ।
कृष्ण — हे वरे! तुमने ऐसा क्यों किया?
दास — अब क्या कहूँ महाराज जब आप सूखे वस्त्र बदलकर निकले तो आपके पीछे-२ नेमीश्वर भी अपने गीले वस्त्र पटराणी सतभामा को यह कहते हुए दे दिये कि इन्हें धो डाले और बदले में तो चोट मांग ली।
इस प्रकार पटराणी सतभामा के अपमान जन्म अपशब्द से रुष्ट होकर नेमीश्वर ने अपनी शक्ति शक्ति का प्रदर्शन किया है।
श्रीकृष्ण ओह! मुझे तुरंत ही नेमी के पास जाना होगा।
(Background music तलवारों का आवाज)
बस से तोष्ण निकल जाते हैं।
सेना — अरे यह क्या हो रहा है? धरती क्यों हिल रही है।
बच्चे भयभीत हो रहे हैं, इसे बंद करो।
(तीव्र भयानक पार्श्व संगीत)
(तीव्र संगीत व शंख नाद सभी की भयानक भय)
(पूजा का कोलाहल)
श्रीकृष्ण का आगमन
(महार पार्श्व संगीत)
श्रीकृष्ण — प्रिय अर्जुन! ये तुमने क्या किया?
तुम तो धिक्कर हो। जगत् पूज्य हो। आप्त ही प्रात:स्मरणीय हो। इस समय इस जगत् में सर्व श्रेष्ठ स्व अद्भुत बलशाली हो।
मैं तुम्हें समझाता हूँ हमारी जन तुमको त्यागने में होती है स्वयं पतिभक्ता। वे तुम्हारी महिमा क्या जाने
(मधुर पार्श्व संगीत)
सतभामा — हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई।
देवर जी! अपराध की क्षमा कर दीजिये। क्षमा कर दीजिये देवर जी
(संगीत)
Back ground Music…
2 min.
श्रीकृष्ण : — नेमी के रहते हुए मेरा राज्य निष्कंटक, नहीं जान पड़ता।
सत्यभामा : — सत्यभामा के मुँह से मेरी इतनी-सी प्रशंसा उसे सहन नहीं हुई। वो मेरी नियुक्ति को द्वेष समझने लगता है। (मन में सोचते हुए…)
उद्धव : — (आज उसने इतना तांडव मचा डाला तो किसी दिन मुझसे मतभेद होने पर युद्ध के लिए भी तैयार हो जायेगा। और वह मुझसे बलशाली है और अपने आगे मुझे कुछ नहीं समझता है। पर… ये क्या बात हुई यदि सत्यभामा ने अपमान किया था तो मुझसे आकर कहता।)
नेमीकुमार : — स्वामी के छोटे से मजाक पर मैंने आज जो व्यवहार किया। क्या वो उचित था? और स्वामी ने मुझे बलहीन कहीं कहा था वो तो खाली अपने पति की प्रशंसा कर रही थी।
सत्यभामा : — मेरे जीवन को धिक्कार है। मैंने कुछ भी नहीं सोचा और जो मन से आया कह दिया।
श्रीकृष्ण : — और फिर पटरानी को कोई छोटी होने का काम देता है क्या? क्यों किया उसने ऐसा जब वो हमारी सेवक रही। अरे-उद्धव की पटरानी को कोई बोवन का काम बताता है क्या?
श्रीकृष्ण : — अरे नहीं। मैं क्या कभी ये सब क्या सोच रहा हूँ। नेमी तो मेरा प्रिय अनुज है। हम दोनों में भेद ही क्या है।
सत्यभामा : — यदि युवराज के मन में मेरा कोई सम्मान नहीं रहा तो न जाने प्रजा भी मेरे बारे क्या सोचती होगी। कुब्जा राज भी तब से कितने चिंतित दिखाई देते हैं।
तब न तब
नेमीकुमार : — अन्याय (रुक्कर) ने अन्याय नहीं तो और क्या है? अपनी वीरता दिखाने के लिए, खुद को महावीर कहलाने के लिए आज मैंने व्यर्थ ही कितना तांडव किया। जनता, पशु-पक्षी सभी के मन में भय उत्पन्न कर दिया।
श्रीकृष्ण : — युवराज भी क्या सोचते होंगे। लेकिन मैं क्या करूँ राजनीति कहती है कि कभी किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए। चाहे वो पुत्र हो या भाई। अवश्य ही एक दिन मुझे स्थान में नेमी से लड़ना होगा। क्यों न एक बार ही असावधानी में अपने और नेमी के मजबूत का नाश लगाऊँ। हाँ ऐसा ही करूँगा।
Back ground Music… वाद्य यंत्रों के साथ।
(2, द्वारका का दृश्य)
श्रीकृष्ण : — ऐसा अहसास होता है। कि हमारे शासन में कोई शांति है। इसलिए अब कोई सुकरमा और परेशानी नहीं।
वैदिक मंत्री : — उचित कह रहे हैं महाराज।
श्रीकृष्ण : — अरे नेमी तुम इतने उदास क्यों हो? तुम्हें उदास देख मेरा मन भी उदास हो जाता है। हम चाहते हैं कि हम सब पुनः कुवन में चले आज जब क्रीड़ा नहीं करेंगे। सुकर घुमायेंगे, उपवनकर करें और …
संवाद
श्री कृष्ण : — ऐसा अहसास होता है। कि हमारे शासन में सुख और शांति है।
इसलिए अब कोई मुकदमा और पेशी नहीं।
वैदिक मंत्री : — उचित कह रहे हैं महाराज।
श्री कृष्ण : — अरे! नेमी तुम इतने उदास क्यों हो। तुम्हें उदास देखकर मेरा मन भी उदास हो जाता है। हम चाहते हैं कि हम सब पुनः उपवन में चलें। आज जब छोड़ो नहीं करेंगे। घूमकर घुमाएंगे, उछल कूद कर और कुश्ती लड़ेंगे।
(सोचते हुए)
नेमीकुमार : — भ्राताश्री मुझे आज तक समझ ही नहीं पाया। उसे सुख रहे अपना राज्य। कब तक नहीं जान पड़ता।
अतः मुझसे लड़कर अपनी शक्ति आजमाना चाहते हैं।
नेमीकुमार, श्री कृष्ण से कहते हुए :- नहीं भ्राता! भाई-भाई में कुश्ती हो ये शोभा नहीं देता।
श्री कृष्ण हँसते हुए :- अरे नेमी हम सगे भाई हैं। हम तो बस मनोरंजन के लिए ही कुश्ती लड़ेंगे।
नेमीकुमार : — नहीं भ्राता, भाई-भाई में लड़ाई कैसी भी हो शोभा नहीं देती।
वैसे भी मैं सदा शांत निराकुल रहना चाहता हूँ। मुझे जाति-घर देखों एक देवी हो, प्रतीत होती है। आप तो मेरे बड़े भाई शासन के अनुभव हैं। ये राज्य आपका है और आपका ही रहेगा।
मंत्री : — नेमीश्वर सही कह रहे हैं महाराज भाई-भाई में लड़ाई कैसी भी हो हम को प्रसन्न नहीं करती।
मंत्री : — जी। आप लोग न लड़ें।
मंत्री : — पर नेमीश्वर पूरी सभा यहाँ उपस्थित है। हम सभी अपनी कला का प्रदर्शन करना चाहते हैं।
मंत्री :- भाई — भाई न लड़ें ये तो ठीक ही पर हमें तो अवसर दें।
(सभी सभा में उपस्थित :- हाँ-२ हमें तो अवसर दें।)
नेमीकुमार : — यदि आप लोगों की ऐसी ही इच्छा है तो फिर मैं जाने की सहमति आवश्यकता है। इसलिए मेरा इस पैर को हिलाकर दिखा दीजिए।
(सभी हँसते हैं)
विधाना और समस्त राजा मिलकर भी उसे हरा नहीं पाए। लेकिन उसने अपनी जीत पर घमंड नहीं किया, अपनी विजय पर हर्षित नहीं हुआ। फिर भी पता नहीं क्यों मुझे अपना अपमान महसूस हो रहा है। प्राण भी बाहर सति उसने मुझे सिंहासन पर बिठाया था। अरे! मेरा भाई बलवान है ये तो सौभाग्य की बात है। क्या मैं तुम्हारी उन्नति देखता हूँ। क्यों मुझे उसकी उन्नति बरदाश्त नहीं होती। बलदेव मेरे भ्राता है मैं उसे बलजीत हूँ। (हँसने) हूँ लेकिन मैंने ये अभी नहीं सोचा कि मैं अपने छोटे भाई से सलह क्यों लूँ। मैं ये सब क्या सोच रहा हूँ। लेकिन मैं क्या करूँ, जब भी मुझे अपना अपमान महसूस होता है। मेरा खून खौल उठता है, मेरी जीभ कटता है, मैं पागल सा हो जाता हूँ मुझे ही कुछ करना होगा - (स्वर) शरीर से तो बातें ही मुझसे करवाती है। पर बुद्धि में तो मेरे समझ नहीं दिखता। क्या वही बनता है जो राजनीति जानता है मुझे कोई ऐसी चाल चलनी होगी जिससे कोई समझ न पाए। मैं ऐसा ही करूँगा। (निश्चित होकर) मेरा मनोरथ पूरा होगा। वैरागी नेमि हिंसा को देखकर निश्चित ही वैराग्य की धारण कर लेंगे।
नेमिकुमार — भला बात —
श्रीकृष्ण — आओ नेमि आओ। यदुकुल भानव आवरी लीला व धीरता को देखकर मन प्रसन्न हो गया। अचानक मैं भान हुआ कि आप युवा हो गये है। अतः आपके विवाह के सन्दर्भ में सोचना चाहिए। (थोड़े-थोड़े शर्माने, पोड़ थोड़े? हँसते - जाना (नेमि शर्माते हुए) मुझे आपका उत्तर मिल गया है नेमि, अब आप जा सकते है। (शादी करेंगे) (राजुल देविका का दरबार, कृष्ण कहते हुए)
श्रीकृष्ण — महाराज (हँस होकर)
प्रश्न प्रणाम स्वीकार करें वासुदेव।
कृष्ण महाराज आपने हमारे अग्रज नेमीश्वर के बारे में तो सुना ही होगा, वह हमसे भी बलवान, बुद्धिमान, पराक्रमी और सबसे मोक्ष साधने वाले तीर्थंकर होने जा रहे हैं। वह अभी भी अविवाहित हैं। आपकी पुत्री राजमती के लिए सब कुछ योग्य है। आपकी पुत्री राजमती भी उनके योग्य है। अतः यदि आपकी सहमति हो तो — (बात काटते हुए)
पिता
यदुराज — ये हमारा सौभाग्य है नेमीश्वर का श्रेष्ठ वर राजुल के लिए वर रूप में प्राप्त हो रहा है। राजुल का अहो भाग्य, हम अभी राजुल से पूछें तो जानते हैं। और उसकी राय भी जान लेते हैं, ये वीणा (इशारे से) राजुल की यही आ भरी है।
श्री कृष्ण राजकुमारी राजमती, हम राजकुमार नेमीश्वर के लिए आपके पिता से सम्बन्ध हाथ मांगने आये हैं। क्या आपको यह संबंध स्वीकार है (घर में खुशियां जगमगाती हैं)
राजुल कुलगुरु चरण अभी नेमीश्वर मेरे अपने में पर तो दिन आयेगा जब स्वामी (शारदा) … शारदा देखो तो, तुम्हें नहीं लगता कि स्वयं बहुत धीरे-धीरे चल रहा है।
(हंसी) नहीं तो तो राजुल अब तो फिर मुझे ये दिन दो-दो दिन ऐसे क्यों लगते हैं।
दासी कुछ खाओ राजुल राजुल …
राजुल तारा मेरा नवयौवन विस्मृत, सब कुछ और मन क्यों मैं … लगा हुआ है। प्राणनाथ, क्यों ये घिरा अब मैं जो न अस्फुटो। देवों ये बात किसी से कह मत देना क्या तुम इसे बता सकती हो? मैं मैं तो भूल ही गई तुम उसे कैसे बुलाओगी क्योंकि वो तो मेरे मन में ही छुपकर बैठ गए हो।
दासी कैसी होगी राजुल, सेवा है बहुत शान्त, गम्भीर और बहुत बुद्धिमानी है। तब तो हमारा मिलन कितना सुन्दर और जीवन कितना सुखमय हुआ होगा।
(MUSIC…)
राजुल मैं उस दिन को तरसता करता, जब बाला का संगम होगा मत शीतल, शान्त, सहना होगा - कितना आनन्दित बन होगा।
राजुल किस प्रकार विवश होऊंगा मैं, जीवन की रफ्तार प्रमाणभूत से भरी हुई आंखें, तभी तो रोऊंगी।
काव्य
नेमी — स्नेहमयी हम दोनों को आरहे जब प-प होगी, बातें होगी, हाव-भाव होगी, किनारे बातें होगी
राजुल — स्वामी तुम मेरे मन में छुपकर क्यों बैठ गये हो सामने आओ, मैं तुम्हें कैसे देख पाऊँगी?
music बजने से — ---- (तबले की Voice)
(बीता) समय बीता आखिरकार वह दिन आ ही गया
बजने से ---- — music (B.G. Voice…)
(पशु की आवाज *)
नेमी — मेरे भाई जरा देखो तो ये पशुओं की करुणा आवाज कहा से आ रही है, ये तो पशुओं के वध होने का समय है।
प्रभु — युवराज, आपकी बारात निकल रही है। अतः यद्यपि क्षण के अनुसार इन सारे पशुओं को रोककर रखवादे
नेमी — लेकिन भ्राता श्री ने ऐसा क्यों किया है, वो जानते थे ये उचित नहीं है फिर भी…
मन सोचता है
नेमी — ओ तेरे रहते भ्राताश्री को अपराध युक्त नहीं जाने पड़ता। इसलिए उन्होंने मेरे सामने वध का निषेध उपस्थित किया।
विस्तृत नेमी — जो भी हो। इनके बंधन और बंधन का कारण एक मात्र मैं नहीं। इसका उत्तरदायी भी कुछ मात्र मैं ही हूँ। देखो। कितनी व्याकुलता लग रही है, उन व्याकुल पशुओं की आँखों में।
क्या सुख होगा? सोचो तो ऐसा के इन व्याहों में।
और क्या फर्क पड़ता है कि निषेध बना है या बनाया गया है। यह संसार स्वार्थमयी है। ये बात तो सत्य ही है। इन पशुओं के बंधने और बंधन, पशु तो सत्य हीन है। बोधित्व के वश होकर हम संसार में सुख मानते हैं। पर संसार में सुख है कहाँ?
(Music…)
नेमी — आज मैं इसी समय अविचल सुख को खोजूंगा।
होगी, सदियों, आँधी ओलों की ओर मैं कंपित देखूंगा।
दास — महाराज! महाराज की जय हो!
क्या हुआ?
प्रश्नोत्तर
श्रावक — पापीयों का हृदय उपकार, धर्मोपदेश व वैराग्य भाव का ग्रहण। और अपनी राग द्वेषामयी की ओर मोड़ लिया।
सद्गुरु — नहीं ऐसा नहीं। पापी जितना भी हो, कोई न कोई संस्कार उसका शुभ होता ही है। संस्कार को कोई न कोई तो सही मोड़कर चलेगा।
(सद्गुरु गिर जाती है।)
राजुल की माँ — सद्गुरु - राजुल - मेरी पुत्री भी कोमल हृदय इस आघात को कैसे सहन करेगी। सब जानते है कि मेरी पुत्री सुखी और शांति से ही मेरी राजुल को मोह से विरक्त करना होगा यह असंभव।
राजुल — मुझे इस विवाह स्वीकृत नहीं था। लोगों के सामने जबरदस्ती की थी। मुझे पता ही था कि मुझे इस विवाह स्वीकृत नहीं होगा। अब आप सब मेरे श्री को छोड़कर कि, राजुल का क्या होगा।
राजुल की माँ — व्याकुल मत हो बेटी। वैराग्य ही हमारी श्रद्धा है। पर कभी-2 मेरी दुर्दशा भी प्रश्नोत्तर प्रेरणाअर्थ भी उपकारमय बन जाती है। नेमीनाथ का कैसा कठोर दिल दुखाया ही होगा।
राजुल — नहीं माता वो ऐसा नहीं कर सकते।
वो तो पुरुषार्थ के जन्म-जन्म के लिये स्वभाव की ओर खींचने के लिये अपना का क्या होगा।
मेरा क्या होगा?
नेमीनाथ (स्वप्न में)
राजुल — इस तरह आहत होना, आहतहित का सदमा दिखाना, रोना, धोना, व्याकुल होना है समस्त कार्य का काम नहीं।
जब मैं बारात लेकर आया तब रागी था। क्षण में अनुराग द्वारा और आप वैरागी हूँ मैं। मैंने न कोई घोड़ा दिया साथी की मैंने ही की थी सब बात उद्गम पकड़ी थी मन से पूरी तैयारी थी। मगर इस रागभाव का मर जाना ये कोई असंभव काम नहीं। रागी से वैरागी होना यह तो कोई अपराध नहीं। न धोखा है न छलप्रपंच इसमें है कोई पाप नहीं। अब क्या होगा कैसे होगा इसका जिसको मान है।
तो ठीक है मैं भी दीक्षा धारण करूँगी आप के पद चिन्हों पर चलकर आपके आत्मालय बनूँगी।
नेमीकुमार — दीक्षा ही वैराग्य का फल है राजुल ये सच्चा वैराग्य नहीं है तुम मुझे पति समझकर मेरी अनुगामी बनना चाहती हो ये तुम्हारा मेरे प्रति तीव्र मोह है इस बात को समझो मैं तुम्हारा कुछ भी नहीं मैं एक दिगम्बर सन्यासी हूँ।
पर हम तो पिछले नौ भवों के साथी है न।
नेमीनाथ — सम्बन्धित होना, भव से इसमें गौरव की बात नहीं भव का नव संवाद
माँ — राजुल बसना देवी से है। गौणक की बात सही। (ताली)
ये राग भाव तोड़ी राजुल भाव की चर्चा का। अब उसे में अधिक उद्ध किया है। राजुल इस भाव का अंत करो।
मैं अधिक
नाथ — में भी
राजुल — डी माँ -
राजुल — क्या हुआ बेटी।
राजुल — माँ मुझे नेमीश्वर दिखाई दिये। नेमीश्वर।
माँ — नेमीश्वर दिखाई दिये।
राजुल — हाँ वो कह रहे थे मैं अपने में पूर्ण हूँ। हम भी अपने में पूर्ण है। तुम किसी की कुछ नहीं हो शुद्ध आत्मा ही अविकारी हो। पर डी आशा छोड़ दो अपने आप डी अपनाओ बस अपना ही ध्यान करो।
माँ — सत्य ही कह रहे थे।
राजुल — हो सत्य ही कह रहे में मुझे भी समय संतुष्टी का अनुभव हो रहा है। पर पर क्या में उनके बिना रह पाऊँगी।
आना — सपने में
माँ — बेटी जो होना था सो हो गया। अब तो धैर्य धरो धैर्य धरो बेटी।
आना — जो होगा
माँ — राजुल जिस समय जिस कारण जिस विधी से जो होना होता है वैसा ही होता है। अनहोनी कभी नहीं होती होता वही है जो पहले से सुनिश्चित हो बस हम ही नहीं जानते। तुम्हें इस महाव्रत को स्वीकार करना ही होगा। डी जो कुछ हुआ है वो पहले से ही सुनिश्चित था।
राजुल — हाँ माँ। मैंने इस महाव्रत को स्वीकार कर लिया कि जो होना है वही हुआ है। पर क्या करूँ मैं में भी तो सत्य है कि जब नेमी की याद आती है। तब आपदी सब बातें विस्मृत हो जाती है। मेरा हृदय करने लगता है। चादर भी में उन्हें अब नहीं पाती।
माँ — मन को तो समझाना ही होगा। नेमी की परमती शुद्ध हो रही है वो अपने आप में ही लीन है और विकृत आती ही चुके है। अब उन्हें अपने बारे में विचार करना होगा। डी जब भगवान के ज्ञान में एक क्षण वैराग्य की बात आई तो तुम्हारा विवाह कैसे होगा। ये भी तो तुम्हें पता होगा।
राजुल — नहीं माता आप ये कैसी बात कर रही है मैं अब से कभी शादी नहीं करूंगी उसी -
माँ — नहीं में पहली शादी की बात कर रही हूँ बेटी अभी तक तुम्हारी पहली शादी हुई ही नहीं है। पति पत्न के साथ करे पूरे हो जाने पर माने जाते हैं।
कुंवारा तो बेटी तुम्हारी रहती है यदि किसी पुरुष का विवाह नहीं हो तो किसी योग्य वर से विवाह किया जा सकता है।
मैं तो सर्व मान परंपरा है
शगुन — परंपरा कुछ भी हो पर अब मैं विवाह नहीं करना
---- — चाहती हूँ
माँ — विवाह नहीं करना चाहती हो ये तो तुम कहती हो परंतु सदा तो ये है कि अभी तेरी ही उम्र है तो माँ को व्याकुल हो जाते हो बेटी तुम में अभी वैराग्य के योग सयम नहीं है ऐसे में विवाह करना ही उचित है
शगुन — नहीं माँ मुझे विवाह करना निश्चित नहीं मैं संयम धारण कर सकती हूँ इसके योग में अपने आप को वनवासीणी
माँ — शगुन ये इतना सरल नहीं है बेटी तुम शांति से सोचो विचारो किसी भी निर्णय पर पहुँचने की जल्दी मत करो अपने चित्त को स्वस्थ होने दो फिर भविष्य का निर्णय करो
शगुन — बस …
(शगुन पिता के पास जाती है)
शगुन — पिता जी प्रणाम
पिताजी — आओ बेटी आओ
शगुन — पिता जी मैंने बहुत विचार किया कि मैं अब विवाह नहीं करूँगी मैंने निश्चय कर लिया है कि मैं संयम धारण कर गिरनार जाऊँगी
माताजी — बेटी तुम गिरनार ही क्यों जाना चाहती हो इसी लिये ना कि नेमीश्वर भी वहाँ गए हें ना शगुन बेटी ने तो राग है वैराग्य नहीं शगुन आज 4. काव्य
सीता — हे स्वामिन् यदि आपको मुझे छोड़ना ही था तो किसी आर्थिकाओ के संघ में छोड़ देते अथवा किसी धार्मिक स्थल या तीर्थक्षेत्र पर ही छोड़ देते। वहाँ मैं समध्यान तो करती।
(सीता का गमन) { - } राम मूर्छित हो जाते हैं।
सीता की दीक्षा →
पृथ्वीमति दीक्षा — > अध्यात्मिक अपलाग राम का पश्चाताप आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। आत्मबल एवं सत्व सीता (विनती) मुझे स्वीकार है। विराग्य भाव क्या ये दो शब्द मेरे लिए पर्याप्त नहीं थे जो मुझे आपने दे दो। इसका दो रूप हो सकता है। पहला- दुःख तो मुझे आपने दे दिया तो दूसरा रूप- यह भी सत्य नहीं। कायर कायरता नहीं है स्वामी इसमें कोई आश्चर्य नहीं। यह भी सत्य नहीं है। पर नारी का नर से मोह यदि छूट जाए तो वह मोक्ष को प्राप्त कर सकती है और मैं धर्म के मार्ग में सर्वांग घट जाती तो धर्म से विरक्त हो जाती।
(तभी वहाँ से लए मेरुखेचर नाम का संदेह था तो देव प्रकट हुए। मुनि का केवलज्ञान ततस्त ही महासत्व मानने के लिए महेन्द्र नाम के अधिदेवता ने उद्यान में जा रहा था। तभी उसने अपने देवों से अंतर्विज्ञ से जाना कि सीता निर्दोष है। तीर में भी और उसने अग्नि को कमल में परिवर्तित कर अपनी कर दिया। और अपने परीक्षा संपन्न हुई)
प्रणाम के बाद
राम — हे सीते! फलाने से अब तुम्हारे ऊपर पूर्ण विश्वास हो चुका है। शाखा प्रतिशाख से तुमने निर्णय प्रगति को पाने के बाद में उसे त्याग देने का निर्णय लिया है।
सीता ७ नहीं अब मैं जैन जाकर आगे इस राज्य में नहीं रह सकती।
वाम — मुझे क्षमा कर दो सीते। मैंने तुम्हारे साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है। इस मेरे साथ महल में प्रवेश करो।
सीता — समीर, आगे आपका नहीं (उसमें) कोई आकांक्षा नहीं है। यह तो मेरे पूर्व में उदय कर्म का ही फल है। जो मैंने कर्म बांधे थे मैं आज उसे भोगना पड़ रहा है।
आपकी आज्ञा शिरोधार्य है।
सीता अग्नि परीक्षा राम हे सीते! प्रजाजन से समझा तुम्हें पवित्रता के लिए अग्नि परीक्षा देनी होगी।
राम का भी परिषद से सलाह वार्तालाप राम → कहिए सेनापति श्री मंत्री जी अब क्या किया जाए।
सेनापति → हे राजन! एक राजा का यह कर्तव्य है कि वह प्रजा के हित में न्याय करे। राजा का यह दायित्व है कि वह एक निष्पक्ष निर्णय ले।
मंत्री → बिल्कुल सही।
राम → ठीक है। सीता व सेनापति का एक-एक वार्तालाप।
सीता → हे सेनापति! अवधेश ने कैसा यह पुरस्कार लोकापवाद के कारण आपने मुझे छोड़ दिया। उसी प्रकार आप व धर्म को न छोड़ दें।
सेनापति का वापिस गमन सीता का दुःखद संगीत सीता व लवकुश का मिलन सीता → (लवकुश को बताते हुए) यह तो मुझे अयोध्या की महारानी जानकी सी प्रतीत हो रही है।
लवकुश → (पास जाकर इस वृतांत सुनकर) हे भगनी तुम तो काव्य धारा अनावृत → (राम के मन की विडम्बना)
काव्य राम: मंत्री — राम: मंत्री: राम: गुप्तचर: राजा के समक्ष कहने की क्या पृष्ठता करें?
शब्दार्थ अथवा राम के सिंहासन पर बैठे हुए तथा दरबारियों से वार्ता)
राम — मंगल हो। प्रजा में सब कुशल मंगल है।
मंत्री ( हिवहिवाते हुए ) महाराज में तो सब कुशल मंगल ही होना चाहिए।
अन्यत्र में बहुत संकट आ चुके युक्त में और आपके आगमन से प्रजा में आनन्द का वातावरण है।
राम — और आप सभी को किसी भी प्रकार की समस्या।
मंत्री ( बीच में टोकते हुए ) नहीं महाराज आपके राज्य में किसी चीज की कमी नहीं।
दरबार ( राम मन में विचारते हुए )
हो रही बात है, जो मेरे मन में घुसपैठ जा रही है। अथवा मंत्रीगण चिंतित नहीं दिखाई पड़ते।
(दरबार समाप्ति की घोषणा)
(गुप्तचर का प्रवेश)
राम — कहो क्या समाचार है।
गुप्तचर ( हिवहिवाते हुए ) में क्या कहूँ महाराज? कहना उचित नहीं है।
परन्तु आपके समक्ष अपने दायित्व को निभाते हुए, वृतान्त कहा है।
सुना हुआ सूत्रधार लंका पर विजय प्राप्त कर राम-लक्ष्मण सीता के साथ लंका में प्रवेश कर रहे हैं तथा उनके आगमन की खुशी के उत्साह में प्रजाजन उत्सव मना रहे हैं।
राम — लक्ष्मण सीता का प्रवेश स्वागत कार्यक्रम।
बाजार का दृश्य
धोबी — धोबिन का वार्तालाप लोग पराये घर से कड़ कर आई स्त्री को हसरें अपने घर में रखना उचित नहीं है।
धोबी सत्य ही कहते है लोग! (क्रोध में) मैं तुम्हें शरण अपने घर में शरण नहीं दूंगा।
धोबिन मैं जो चार दिन रह-कर क्या आई? आप सभी चार बात सुना रहे है और जो वो अवधकुमारी छह माह लंका में रहकर आई उन्हें सब माफ है। उन्हें कोई कुछ नहीं कहता। जो उनके पाती ने कुछ नहीं कहा।
सूत्रधार
(प्रजा में बात आग की तरह फैलउर)
प्रजा वोलीराजा है, अरायो घर से भाई उन्हें कैसे रख लिया।
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें — मूल दस्तावेज़ (PDF): 2429.pdf
स्रोत — Gyata संग्रह।
