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दशलक्षण महापर्व 2026Dashlakshan Mahaparv 2026

नाटक स्क्रिप्ट · Play script

नाटक हो तो ऐसे

Natak Ho To Aise

रचयिता Author: डॉ. योगेश चन्द्र जैन (मुक्ति कॉमिक्स) · ~29 min पढ़ने में

Original PDF

यह पुस्तक के स्कैन से लिया गया अंश है, अभी प्रूफ़ नहीं हुआ — कुछ शब्द अशुद्ध हो सकते हैं। पूरा नाटक मूल PDF में पढ़ें।An excerpt taken from a scan of the book, not yet proof-read — some words may be wrong. Read the full play in the original PDF.

ब्रह्मगुलाल

आलेख — डॉ. योगेश चन्द्र जैन.

चित्रांकन — बिस्मल सिंह यादव

सहयोग — सरोज डी. एम. जैन बात बहुत पुरानी है।

एक राजकुमार था, उसका मित्र ब्रह्मगुलाल बहुत कुशलबहुरूपिया था।

राजकुमार अपने मित्र की प्राय: प्रशंसा करता ही रहता था।

राजकुमार मेरा दोस्त ब्रह्मगुलाल तो लाखों में एक है, उसका अभिनय तो बस पूछो ही मत…

जिस रूप को धारण करता है, वही लगता है।

पहला व्यक्ति जब देखो तब उसकी ही प्रशंसा…

दूसरा व्यक्ति हम सब तो जैसे हैं ही नहीं।

भक्ति कॉमिक्स एक दिन ब्रह्मगुलाल ने सीता का नाटक किया।

सीता हे राम! हे राम…

मंत्री वाह… वाह… सचमुच सीता जैसा।

और फिर तो ब्रह्मगुलाल का यश बाजरबार में भी चारों तरफ फैल-गया। इससे जल-भुनकर मन्त्री ने एक भयंकर षड्यंत्र रचा, उसने- राजकुमार को भड़काया।

राजकुमार कल तुमने ब्रह्मगुलाल का नाटक देखा।

मंत्री अरे! ऐसा स्वाँग करने में क्या हम तो तब जाने कि.. वह अपनी परीक्षा दे।

राजकुमार हाँ, भाई हाँ। ठीक कहते हैं।

राजकुमार को तो मित्र की योग्यता पर पूर्ण विश्वास था ही, अतः उसने कहा…

राजकुमार ते ठीक है, उसकी परीक्षा अभी कर लो।

मंत्री क्रोध हम भी।

मंत्री ऐसा है, तो हम सब उसको सिंह के रूप में देखना चाहते हैं।

राजकुमार परन्तु हम सिंह का रूप ही नहीं, उसका तेज व पराक्रम भी देखना चाहते हैं।

राजकुमार मंत्री की बात को दृढ़ता से स्वीकार करके गुलाल के पास पहुँचा।

यह सुन ब्रह्मगुलाल सोचने लगा।

राजकुमार प्रिय मित्र, आज तुम्हें अपनी कला से दुश्मनों के दांत खट्टे करने ही होंगे।

ब्रह्मगुलाल अब यह परीक्षा क्यों? हमारी कला का प्रदर्शन तो कई बार हो चुका, अवश्य ही कोई रहस्य है।

भक्ति कॉमिक्स

काफी सोच — विचारकर ब्रह्मगुलाल ने राजकुमार से कहाब्रह्मगुलाल पर सिंह का ही स्वाँग क्यों? और फिर उसका- पराक्रम भी… व्यर्थ… मैं कहूँगा, परन्तु…

राजकुमार परन्तु क्या? मैं इसके लिए सब कुछ करने को तैयार हूँ, तुम स्पष्ट करो।

ब्रह्मगुलाल यदि उस समय हमसे कोई अपराध हो जावे तो क्षमा किया जावे।

राजकुमार राजा के पास गया, और सारा वृत्तान्त कहा।

राजा तुमने यह ठीक-नहीं किया पुत्र, फिर भी मैं एक प्राणीवध के अपराध को माफ कर दूँगा।

राजकुमार ठीक है, मैं अभी पिताजी से वचन लेकर आता हूँ।

दूसरे दिन राजा की नाट्यशाला खचाखच भरी हुई थी।

एक व्यक्ति वाह! नाट्यशाला देखो.. सजावट कितनी सुंदर…

दूसरा व्यक्ति अरे! वह देखो, सिंहासन के पास बकरा? पर वह क्यों बंधा है?

उपस्थित जनता बेखूबी से प्रतीक्षा कर रही थी… तभी…

एक खूँखार शेर ने दुर्लंग मारकर सभा मंडप में प्रवेश किया।

एक व्यक्ति अरे! वे डरपोक बेहाल ही कर बैठा।

सिंह का विकराल रूप देखकर कुछ दर्शक तो भयभीत होकर भागने लगे। तभी…

राजकुमार सिंह की भयानक गर्जना कबनें पर भी नहीं बैठा रहा, और दहाड़ते सिंह को ललकारते हुए कहा कि - राजकुमार सिंह ऐ सिंहा! तेरा कैसा पराक्रम? देख सामने बकरा खड़ा और तू गधे की तरह डें-डें कर रहा, धिक्कार है तेरी माँ के दूध को.. इतना सुनते ही सिंह की आँखें गर्वकर क्रोध से लाल हो गयीं, और अपमानित सिंह गरज उठा — एक व्यक्ति कमाल है, ब्रह्मगुलाल बिल्कुल शेर जैसा लग रहा है; किसी को सच्चाई पता न होती तो शायद किसी की हृदयगति रुक जाती.. दूसरा व्यक्ति अहिंसक है, किसी को मार तो सकता नहीं, फिर सिंह कैसा? (आईयेत रूप से अनुकृति होना परीक्षा में.. तीसरा व्यक्ति देखें अब क्या करता है. प्रतिनय से प्रभावित होकर राजकुमार व दरबारी सोच रहे थे कि तभी — एक व्यक्ति एक ही झटके में राजकुमार का काम तमाम हो गया। दूसरा व्यक्ति हाय! ये कैसा है संसार.. संग्रामंच को शोकमंच में बदलते देर न लगी। सारा दरबार भय व कुंतल के वातावरण में बदल गया। और फिर ब्रह्मगुलाल अपने मानव रूप में आ गया। ब्रह्मगुलाल आह! अपने मित्र के प्रति ये कैसा अपराध? धिक्कार है मुझे.. और मेरे इस नाटक को जैसे ब्रह्मगुलाल मनुष्य होकर भी सिंह का प्रतिनय करने से ही ऐसा जैसा क्रोध प्र-साद कर बैठा, उसी तरह यह आत्मा स्वभाव से भगवान आत्मा होकर भी मनुष्यदि शरीफ का पाकर उसमें मोह करके घोर अपराध करते हुए चार-गति में घूम रहा है। हाय! कैसी हुई इस भगवान-आत्मा की दुर्दशा. राजा इकलौते पुत्र की मृत्यु से राजा बेहद दुःखी थे, निष्प्राय भी। ब्रह्मगुलाल हाय! मैं बरबाद हो गया, अपनी गलती से ही अपने प्यारे पुत्र को खो बैठा। ब्रह्मगुलाल शान्त होइये राजन! जो होना था वह हो गया। परन्तु ब्रह्मगुलाल ने यह अच्छा नहीं किया, यदि … राजा क्या? तुम्हारा मतलब है उसने जानबूझकर किया है। नहीं.. नहीं वह तो सच्चा कलाकार है, निर्दोष है, जो रूप धरता है, उसमें तन्मय हो जाता है। राजा परन्तु राजन! इसके लिए मेरा मन नहीं मानता अनजाने में यह सब सम्भव भी तो नहीं… राजा राजा को भड़काते हुए मंत्री ने कहा :- मंत्री यदि आपकी बात सत्य ही है तो फिर उससे दिखाकर मुनि का नाटक कराके वैराग्य व शांति का उपदेश देने को कहो… फिर देवर्षि सच्चाई क्या थी? राजा अच्छा! हम उससे यह कहेंगे, इससे हमारे पुत्र वियोग का दुःख भी दूर होगा और उसकी परीक्षा भी। नाटक तो दो ऐसे. दूसरे दिन राजा ने ब्रह्मगुलाल को बुलाया। राजा प्रिय कलाकार! अब हम शाश्वत व वैराग्य रूप का दर्शन करना चाहते हैं। अतः तुम दिगम्बर मुनि… ब्रह्मगुलाल राजन! आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। परन्तु हमें कुछ समय चाहिए। राजा को वचन देकर ब्रह्मगुलाल जैन साधुओं की सूक्ष्म-दिनचर्या देखने जंगल जा पहुँचा। ब्रह्मगुलाल अहो! इनका कितना कठिनतम परन्तु सहज-आनन्ददायक जीवन। वहाँ से थकाहारा वह घर आकर देर रात तक सोचता रहा.. ब्रह्मगुलाल रे मूर्ख! दिगम्बर जैन साधु का जीवन कोई नाटक नहीं जो खेला जा सके वह तो विवेक व वैराग्य भावना का फल है। प्रातः ब्रह्मगुलाल ने माँ से अपनी समस्या कही, तो माँ रोने लगी। माँ अरे बेटे! क्या अपने दूध से पाले-पोसे पुत्र की योग्यता का ज्ञान नहीं? रे मूर्ख! तेरी योग्यता पर विश्वास होने से ही रो रही हूँ। ब्रह्मगुलाल अरी माँ! तू इतनी क्यों है? क्या तुझे अपने पुत्र की योग्यता पर विश्वास नहीं? ब्रह्मगुलाल पर आखिर क्यों? माँ माँ ठीक ही तो कहती है। माँ मेरे लाल! हाँ अब कुछ कर सकती हूँ; पर पुत्र वियोग नहीं, और दिगम्बर वेश धारण करके पुनः इस वेश में नहीं रह सकता जाता, अतः वियोग निश्चित है। मुनि बनने का निर्णय करके वह अपने घर वालों की आज्ञा लेने आता है। मुनि हे माँ! मैंने पाप के नाटक तो बहुत किये, और तूने तो उसकी प्रशंसा तक की। अब धर्म का नाटक करने का अवसर आया है माँ! तू इसकी सहर्ष आज्ञा देना! माँ मुनि की बात सुनकर हाँ! हाँ! क्यों नहीं! पर बेटे यह नाटक तो तुमने करने के बाद का नाटक है; इसके बाद दूसरा नाटक नहीं किया जाता, और तुझे अपने पिता देना है, तेरी अभी शादी हुई है। मुनि प्रिय भाई! माँ सच कहती है, मुझे कागजी नाटक, और बना सरल भी नहीं है, तथा यह प्रदर्शन की वस्तु तो है ही नहीं, लोक रंजन का विषय भी नहीं है, अतः अपना विचार छोड़ दो। भाई मित्र! जानता हूँ। साधु जीवन जीना एक विशेष कला है, जिसके लिए ब्रह्म की सच्चाई व अभ्यास चाहिए। मैंने इस चुनौती को विवेकपूर्वक स्वीकारा है। और यह खबर चारों तरफ फैल गई लोग बातें करने लगेपहला व्यक्ति अरे भोलू! उठ, देख शहर में क्या हो रहा है! कुछ सुना तुमने अपना गुलाल… दूसरा व्यक्ति चल भाग यहाँ से! बड़ा आया यहाँ गुलाल लगाने, पागल, मुझे जगा दिया आकर… अरे मूर्ख! अभी क्या होली है? मैं मीठे-मीठे स्वप्न देख रहा था। पहला व्यक्ति भई! मैं तो मित्र गुलाल की बात कर रहा था। सुना है वह अब साधु… दूसरा व्यक्ति ठीक है ठीक है… मैं अब जानता हूँ। वह भी अब मेरे जैसा मोटा-ताजा होना चाहता है भाई… भाई वाह! बढ़िया-बढ़िया स्वादिष्ट भोजन, खूब सेवा-प्रशंसा और मजे में सोते रहो। पहला व्यक्ति नहीं भाई! नहीं, ऐसा नहीं, वह नग्न दिगम्बर जैन साधु बन रहा है… इसमें गम्भीर ज्ञान व तपश्चरण दूसरा व्यक्ति अच्छा! तो ये बात भी अब समझा कि… पहला व्यक्ति अरे पेट! अब पता चला कि तेरे पास समझदारी भी है। बोल तू क्या कह रहा था। दूसरा व्यक्ति मैं अभी कुछ दिनों से ब्रह्मगुलाल को जंगल में कुछ नग्न साधुओं के पास पढ़ता-लिखता देख रहा है। पहला व्यक्ति कमाल है, साधु ऐसे के लिए इतने दिनों से कठोर अभ्यास — साधु है, साधु बनने के पहले साधु का जीवन समझना आवश्यक है। दूसरा व्यक्ति पर मेरी तो कुछ और ही समझ में आ रहा है। राजा ने साधु का नाटक करने का कहकर पुत्र की मृत्यु का बदला तो नहीं लिया है? पहला व्यक्ति ताकि नंगा साधु होकर भूख-प्यास तथा अन्य तकलीफें सह-सहकर मर जाये। कॉमिक्स वाह ! लल्लू, छोटे वाह ! खूब तुमने सोची. क्या ख़ाक सोची | हमारा गुलाल बहुत बड़ा कलाकार है, और अच्छा व बड़ा कलाकार वही हो सकता है, जिसे अपनी कला में आनन्द आये | देख लेना हमारे मित्र को भी अपने इस कार्य में आनन्द ही आयेगा. मैं करता हूँ कि वह ऐसा नाटक करे की क्यों ? इससे क्या लाभ ? राजा का क्रोध तो दूर होने से रहा. मुनि होने के बाद राजा के खुश होने में कोई दम नहीं, और नाराजगी में कोई गड़बड़ी क्यों कि, गुलाल वीतरागी हो जायेगा | हाँ भाई ! ज्ञान रूपी कला जिनके हृदय में प्रकट हो जाती है, वे तो संसार में सहज ही वीतरागी हो जाते हैं | अब तो मैं समझ गया भाई ! कि आत्मा और शरीर का भेद ज्ञान प्रकट होना भी एक कला की है | नाटक तो हो ऐसे: ब्रह्मगुलाल दीक्षा हेतु जंगल में आचार्य के पक्ष जाता है. ब्रह्मगुलाल हे आचार्य श्रेष्ठ ! आप अपने समान हमें भी परम सुखी होने की कला सिखाइये | जन्म-मरण के दुःख को दूर करने की कला समझाइये नाथ | आचार्य वीतरागी दशा अंगीकार करने वाले हे भव्य ! ऐसा अविनाशी कल्याण हो | मुनि बनने के बाद वाह ! इस कलाकार का जीवन भी कितना प्रेरक है | इसने तो सारे संसार को रंगमंच बनाकर अब सुप्त रूपी ललनाओं के साथ मद्यपान के बाद के दृश्य प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है. तीसरा व्यक्ति तुम ठीक कहते हो इसकी गृहस्थावस्था नाटक की शुरुआत थी, जिसमें दुःख ही दुःख थे. चौथा व्यक्ति और जब दीक्षा की अनुमति माँगने परिवारजनों के पास गया था, वह नाटक का मध्यान्तर था. परमसुख करते हैं ये मुनिजन; क्यों कि मुनिधर्म से ही मोक्ष रूप परमसुख प्राप्त होने के कारण यह नाटक के नियमानुसार सुखान्त हो है. वाह भाई पण्डित जी वाह ! खूब कही– तीसरा व्यक्ति बहुत अच्छा– और एक दिन भाव-परिवर्तन का जादूगर ब्रह्मगुलाल राजदरबार की ओर चल दिया. राजन् ! सुना है ब्रह्मगुलाल मुनि बन गये हैं… राजदरबार में मुनिराज ब्रह्मगुलाल के प्रवेश करते ही पूरी सभा सम्मान में उठ खड़ी हुई। सिंहासनों के बैठने पर राजा ने मुनिराज को उच्चासन पर विराजमान कर उपदेश देने का आग्रह किया। मुनिराज राजन! इस आत्मा में अनंत शक्तियाँ हैं। पशु से परमात्मा बनने की सामर्थ्य है। अतः शोकभाव छोड़कर शांतिभाव धारण करो। राजा धन्य है! तुम्हारी कला, कलाकार हो तो ऐसा… मुनिराज के उपदेश को सुनकर सभासद वार्तालाप करते हैं कि… पहला सभासद दिगम्बर वेष धारण कर वैराग्य का नाटक करके तो मानो इन्होंने क्षणिक नाटकों पर विजय ही प्राप्त की है। दूसरा सभासद हमें तो ऐसा लग रहा है कि मानो साक्षात्कारी हम धारण करके आये हों। तीसरा सभासद इस कलाकार ने अभी तक जितने भी नाटक किये थे, वे तो वास्तव में उत्कृष्ट ही थे। सही अर्थों में तो अब इन्होंने भूस्थान नाटक किया। चौथा सभासद सच कहती हो रानी, इस कला को देखकर व इनका करने मात्र से ही कितनी शीतलता व शांति मिलती है। पांचवा सभासद भाई! जीवन जीना भी एक कला है। मनुष्य एक कलाकार है, और उसकी कला का सच्चा व अच्छा प्रयोग तो मुनिधर्म ही है। छठा सभासद वाह भाई वाह क्या गजब बात कही, तुम्हें भी मान गये। तभी राजा को ब्रह्मगुलाल के मुनि वेष की परीक्षा करने का विचार आता है, वह कहता है - राजा तुम तुम्हारे इस साधु-वेष से बहुत प्रसन्न हो। कहो तुम्हें क्या वरदान दूं? मुनिराज हे राजन्! साधु के प्रति ऐसा अनुचित विचार शोभादायक नहीं है। राजा मैं तो कह रहा हूँ कि यहाँ आकर अपने साधु बनने का जो नाटक दिखाया है, उससे हम प्रभावित हुए, अब तुम अपने मूल वेष में आ जाओ। मुनिराज राजन! यह जीव तीन लोक के मंच पर अनादि काल से पशु, नारकी, पेड़-पौधे, देव, मनुष्यादि का शरीर धारण कर नाटक ही तो खेल रहा है परन्तु… राजा परन्तु क्या? मुनिराज नाटक खेलते खेलते उसमें इतना रम गया कि अपने असली स्वरूप को भूल गया। “मैं कौन हूँ” इसकी इसे अभी पहचान की नहीं कोई। राजा क्या मैं इतना भी नहीं जानता हूँ? मैं राजा हूँ राजा, समझे! इस पृथ्वी का स्वामी… सबका मालिक। मुनि अरे, मूर्ख! जरा सोचो, जब तुम्हारे पास राज्य नहीं था, तब कहाँ के राजा थे, और जब न तुम नहीं हो! मुनि राजन! पृथ्वी का स्वामी कोई नहीं, कोई किसी का मालिक नहीं, यहाँ सभी अपनी २ भत्ता के स्वामी हैं, उसको पहचानना इस आत्मा का पहला कर्तव्य है। अतः तुम सब मृत्यु आने के पहले चेतो। राजा आप कुछ और स्पष्ट करें। यह कहकर मुनिराज जंगल में चले गये। राजा यह बात तो मैंने अभी तक सुनी ही नहीं, अजब बात है वाह! नाटक हो तो ऐसा। रानी अबुधलाल ने तो शिक्षा दी कि मोक्षधर्म ही शान्ति व सुख प्राप्ति का सच्चा साधन है। राजा को सम्बोधन के बाद मुनिराज जंगल में ध्यानमग्न हैं। तभी अचानक - तभी सिंह को अतिभ्रमण हुआ। परन्तु आश्चर्य! सिंह कुत्ते की तरह पूँछ हिलाकर सोचने लगा - सिंह अरे मेरा मित्र पर क्यों वह क्रूर भाव और अब कितना परम शान्त भाव। इस तरह के मानव को पहले कभी नहीं देखा। सिंह की मनोदशा को जानकर मुनिराज बोले - मुनि हे वनराज! जिस महान मुनिधर्म को प्रदर्शन की वस्तु समझा था वे जन्म उसी का प्रतिफल है, इस जीव ने काम-क्रोध भावों के संग बहुत किये परन्तु शान्त भाव का रूप कभी नहीं देखा। सिंह आहा! एक अपराध का इतना बड़ा पुंज। पर अब इतने अपराधी का… तभी अचानक राजा आ गया। राजा हे मुनिराज! ये कैसा आश्चर्य? और तो आपको मैंने आ रहा था, परन्तु… और आप मुनिधर्म को ही नाटक कह रहे थे। मुनि हाँ राजन! नित्य नये नये वेश धारण करते हुए अपना मूल स्वरूप अव्यक्त रखना ही नाटक है, और मुनि-धर्म भी नाटक का अंत तथा सिंह दशा नाटक का अंत। सारा वृत्तान्त जानकर राजा को संसार से वैराग्य हो गया और - राजा हे मुनि पुंगव! मुझे मुनिदीक्षा-दान दीजिये। मुनि 'अरे! मैं दुर्भेजन का राजकुमार, इस राजा का पुत्र और अब ये सिंह की देह…। कब तक होगी देह की दलाली? परन्तु मैं तो शुद्धात्म… राजा वाह! नाटक हो तो ऐसे…

समाप्त

अंगारक

चित्रकन — त्रिभुवन सिंह

सहयोग — सरोज डी. एम.०

आलेख — डॉ० योगेश जैन० आज सेठानी ईर्ष्या से जली-भुनी जा रही थी और पड़ोसिन को नीचा दिखाने की सोच रही थी, तभी उसके पति ने प्रवेश किया।

सेठानी अरे भगवान ! सुनो अभी तक भोजन नहीं.. सेठ मुझे भूख लगी है तुम्हारी बकवास से पेट नहीं भरता है।

चंडमुराली से ज्वालामुखी बनी पत्नी की खुशामद करते हुए भोलू बोला - सेठ अरे बावली ! कैसी बातें करती हो ! नारी के गले की शोभा तो मधुर वाणी, व्यवहार और उसका शील है।

सेठ रानी कुछ कहो भी, बात क्या हुई है? कोई बिना दम फुँके पता चले ?

सेठानी क्या कहूँ ? मुहल्ले की सारी औरतें तो राजू, नये-नये गहने पहनेंऔर मैं बस वही सालों पुराना हार, चूड़ियाँ -।

सेठ तुम कुछ समझते हो?

बिना सुंदर गहने पहने समाज के सम्मान नहीं मिलता।

सेठ तुम्हें क्या हो गया है?

जैसे के गले में बंधी साँकल की तरह गले में हर बात लेने से समाज में इज्जत होती है।

सेठानी मुझे उपदेश नहीं

हार — चाहिये हारफलस्वरूप पत्नी पीड़ित भोलूराम सराफ की दुकान पर जा पहुँचा।

सेठ सेठ जी ! कोई ऐसा, सुन्दर हार दिखाओ जो किसी के पास न हो।

सराफ अच्छा ! बैठो, लाता हूँ।

ऐसा हार जो संसार में कोई

न बना सके — ।

सेठ ये लो बस एक ही है अंगारक ने बनाया था, जो राजा का विशेष कुमार था, पर अब वह कभी नहीं

बनायेगा - — ।

सेठानी पर ऐसा क्यों?

पूरी बात कहो।

अंगारक. और अंगारक की कथा सुनकर भोलू अपने घर आया।

सेठ वो प्यारी, संसार का सबसे सुन्दर हार…

सेठानी वाह ! सचमुच कितना सुन्दर…

तुम बहुत अच्छे हो।

दूसरे दिन जब हार पहनकर उत्सव में गई।

सेठानी ये कितनी निर्दयी दुष्ट औरतें ! मेरे हार कंगन को कोई देख ही नहीं रही…

ना कोई पूछ रही…

दुःखी सेठानी ने गहने दिखाने की एक तरकीब निकाली।

अपने घर में स्वयं ही आग लगाकर-

सेठानी आग — आग…

बचाओ — बचाओ!

स्त्री तभी एक महिला ने पूछा. महिला वाह सेठानी! ये कंगन हार बहुत सुन्दर हैं, कब खरीदे? किसने बनाया?

सेठानी अरे मुई! अब तक कहाँ थी? जब सारा घर जल-कर राख हो गया, तब हार कंगन की तारीफ़ कर रही है!

महिला पर बताओ तो सही… ऐसे गहने तो मैंने अब तक नहीं देखे. सेठानी आह! जिन गहनों के शौक ने मेरे सुख-चैन छीने, यहाँ तक कि घर में भी आग लगवा दी और तो और इसकी बनाने वाला अंगारक भी…

महिला अंगारक कौन है? जरा मैं भी तो सुनूँ. सेठानी इस देश के राजा के यहाँ अत्यन्त बुद्धिमान व चतुर अंगारक नाम का एक सुनार था। एक दिन राजा ने आदेश दिया— अंगारक राजा प्रिय अंगारक! अच्छी बात ऐसे आभूषण बनाओ, जो अब तक किसी ने न बनाये हों।

अंगारक जैसी आपकी इच्छा. और राजा ने सोना व अमूल्य नगीना देकर विदा किया।

इस तरह अंगारक सोना व नगीना लेकर अपने घर गहने बनाने लगा।

पत्नी अजी उठो! सुबह से काम कर रहे हो, दस बज गये, भोजन कर लो।

अंगारक हाँ — हाँ! अभी आता हूँ।

वह भोजन के लिये हाथ-मुँह धोने घर के बाहर आता है।

अंगारक पर जैसे ही घर के बाहर आता है तो वह देखता है कि…

अंगारक अरे वाह! धन्य भाग हमारे! अतिथि-पूजा-सत्कार का महान अवसर! मुनिराज! लगता है साक्षात् वैराग्य ही हमारे द्वार पर चलकर आ रहा हो!

अंगारक सुखोदय से अंगारक पत्नी सहित मुनिराज का पड़गाहन कर आहार देता है।

तभी घर के आँगन में वृक्ष पर बैठा भूखा मोर नीचे उतर आता है।

अंगारक

नंदवा — भक्त पूर्वक आहारदान के बाद अंगारक स्वयं भोजन करता है।

अंगारक — और फिर जब गहने बनाने आता है तो –

अंगारक — हाय! मैं लुट गया – अब क्या होगा – अभी तो यहीं था।

अंगारक — अरे! क्या हो गया? इतनी सर्दी में भी पसीना – क्या ढूँढ रहे हो?

अंगारक — चुप रह | मैं तो मर जाऊँगा, क्या मुँह दिखाऊँगा – | अभी तो यहीं रखकर गया था,

अंगारक — राजा का बेशकीमती नगीना, मैं यहीं रखकर गया था; नहीं मिला तो मर जाऊँगा …

नंदवा — क्या कह रहे हो? अब क्या होगा?

शक्ति — कॉमिक्स

अंगारक — मुनिराज के अलावा तो अभी तक यहाँ कोई नहीं आया, लगता है वही –

नंदवा — अरे! तुम्हें पता है कि तुम क्या कह रहे हो? हज़ारों महाव्रत के धारी मुनिराज क्या कभी ऐसा अधम कार्य कर सकते हैं?

अंगारक - नहीं — नहीं वही पापी अधम धूर्त – जो मेरे नगीने को –

नंदवा — आह! मैं क्या सुन रही हूँ? अरी धरती! तू फट क्यों नहीं – | काश! आज मैं बहरी होती।

और अत्यंत क्रुद्ध होकर अंगारक मुनिराज को मारने जंगल की ओर चल दिया।

अंगारक — अरे! वह देखो! वही है धूर्त – चोर – देखता हूँ – अंगारक पास आने पर जब अंगारक गाली-गलौच करने लगा, तो उपशमश्रेणी-मुनिराज ने आत्मशुद्धि मौन धारण कर लिया।

अंगारक — अरे चुप क्यों हो गया? बता मेरा नगीना कहाँ है? नहीं तो – छोडूँगा नहीं।

परन्तु डंडा पेड़ पर बैठे मोर के जा लगा।

अंगारक — अरे वाह! ये नगीना ऊपर पेड़ से गिरा..

अंगारक — परन्तु मुनि – बिल्कुल सही – मेरा नगीना – और मोर भी वही जो मेरे आँगन पर आकर बैठता है – सारी बात समझकर अंगारक को बहुत पश्चाताप हुआ।

अंगारक — क्षमा करें भगवन! मुझसे भारी अपराध हुआ।

शुक्ति-कॉमिक्स — आत्मज्ञानि से भरा अँगारक नगीना लेकर राजा के पास गया।

अँगारक अपराध क्षमा करें राजन! मैं तो अपना नगीना और स्वर्गो- …इस जड़-रत्न को लगाने में ही अमूल्य नर-जन्म यूँ ही गँवाया।

राजा अरे क्या हुआ? क्या तुमने रत्न लगाना बन्द कर दिया?

अँगारक नहीं राजन! रत्न लगाने का काम तो अब शुरू कर रहा हूँ। अपने शुद्धात्मद्रव्य में अचिंत्य-रत्न … जिसके लिए ये दुर्लभ मनुष्यजन्म मिला है।

राजा हमारा पूरा राज्य धन्य है, तुझ पर विचारों पर।

राजा धन्य है अँगारक।

सम्पादकीय भारतीय कथा साहित्य में जैन कथा साहित्य काफी समृद्धि लिये हुए तो है ही; साथ ही वह अपना अलग से वैशिष्ट्य लिए हुए भी है। जिसके कारण भले ही उसके कुछ पात्र अन्य कथाओं के साक्ष्य लिये हुए हों; परन्तु उनके उद्देश्य एकदम पृथक व अपने दार्शनिक व नैतिक गरिमा के अंदाज लिये हुए हैं। यदि जैन कथाकारों से यह प्रश्न किया जावे कि तुम्हारे नायक में ऐसी क्या विशेषता है कि, जो अन्य कथाकारों से पृथक करके अपनी स्वतन्त्र पहचान बनाने में सरलतमरूप से सक्षम हो, सहज ग्राह्य हो। तो जैन कथाकारों का एकमेव उत्तर होगा कि उनके नायक न तो ईश्वरीय रूप है, और न ईश्वर ही; अपितु अपनी प्रभुता को प्रगट करने की महत्त्वाकांक्षा वाले वे सामान्य-पात्र हैं, कि जिनका लक्ष्य वीतरागता है, और अपने प्रतीक्षित-क्षण में उस वीतरागी नग्न दिगम्बर दशा को प्रगट करते हुए कथा का समापन करते हैं। जो कि सही अर्थों में इस संसार रूपी मंच में खेले जाने योग्य नाटक है। जैसा कि आप इस कॉमिक्स में पायेंगे ही।

इस कॉमिक्स का प्रिय पात्र ब्रह्मगुलाल फिरोजाबाद के समीप चन्द्रवार नामक स्थान का लगभग 16-17 वीं शताब्दी में पद्मावती-पुरवाल जाति को सुशोभित करने वाले एक अग्निवरल पुरुष है। इनका इस कॉमिक्स में कुछ पौराणिक व कुछ कल्पनालोक से लिए मोतियों को चुन-चुनकर यहाँ माला के रूप में पिरोया है; जो संस्कार-विहीन पीढ़ी का कण्ठहार बनी, तो मेरे लिए यह गर्व की बात होगी; और मुक्ति-कॉमिक्स परिवार का सही वक्त पर सही कदम भी …!

डॉ. योगेशचन्द्र जैन इक्कीस कॉमिक्सों के संग बड़े इक्कीसवीं सदी को कदम संरक्षक सदस्य 5001)

सम्मानित सदस्य 1001)

सदस्य 151)

क्या आप अपने बच्चों के तन ढकने को अच्छे कपड़े लाकर नहीं देते?

हाँ! भाई! हाँ! …!

और आप उन्हें सभी सुख सुविधाएँ नहीं देते जिनकी उन्हें आवश्यकता है?

हाँ! हाँ! क्यों नहीं; हमें उनकी पूरी चिन्ता है।

पर क्या आप उनमें सदाचार विचार निर्माण के लिए कुछ देते हैं?

??

हाँ! हाँ! बोलिये बोलिये चुप क्यों है?

परन्तु …!

परन्तु परन्तु कुछ कुछ नहीं; हमने आपकी चिन्ता समझी है, अब ज्यादा देर ठीक नहीं …!

आज ही ‘मुक्ति कॉमिक्स’ परिवार के सदस्य बनकर श्रेष्ठ आचार-विचार के अलंकरणों से अपने नन्हें-मुन्ने बच्चों को सजाकर इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कराइये। आज ही ‘मुक्ति-प्रकाशन, अलीरगंज’ के नाम ड्राफ्ट बनाइये मुक्ति कॉमिक्स पढ़िये … इक्कीसवीं सदी में चलिये …।

मुक्ति प्रकाशन, अलीरगंज (एटा), उ.प्र., 207247 मूल दस्तावेज़ (PDF): 2441.pdf

स्रोत — Gyata संग्रह।

स्रोत · Source: forum.jinswara.com — अनुमति सहित, साभार · shared with permission and thanks.

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