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दशलक्षण महापर्व 2026Dashlakshan Mahaparv 2026

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नल-दमयन्ती

Nal-Damayanti

~53 min पढ़ने में

प्रसिद्ध जैन कथा नल-दमयन्ती पर आधारित मंचन-योग्य नाटक — कुण्डलपुर नगरी में राजा भीमरथ व रानी की धर्मपरायणा, ६४ कलाओं में निपुण पुत्री दमयन्ती का भव्य स्वयंवर, नल के साथ विवाह, व जीवन में धर्म-धैर्य की महिमा को नाट्य-रूप में प्रस्तुत करता है। संचालन, राजा, रानी, मंत्री, दासी आदि पात्रों के पूरे संवाद व मंच-निर्देश सहित। पाठशाला व सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु आदर्श।

A staged Jain natak based on the well-known Nal-Damayanti story — the grand svayamvara of Damayanti (accomplished in 64 arts) in Kundalpur, her marriage to Nal, and the glory of dharma & fortitude in life’s trials. Full characters (narrator, king, queen, minister, maids), dialogue & stage directions. Ideal for pathshala & cultural programs.


नल दमयन्ति

संचालन – (कुण्डलपर नगरी में बहुत जोर शोर से तैयारियां चल रही हैं। आईये हम सब देखते है कि आखिर ये तैयारियां किस चीज की चल रही हैं।)

दासी – अरे! सुनो वरमाला आ गई क्या, लगता है पुजा लाने गई है।

(महाराज का प्रवेश)

राजा – मंत्री जी, मुख्य प्रवेश द्वार पर सारी तैयारियां हो गई क्या

मंत्री – जी हां राजन सारी तैयारियां हो गई हैं। आप निष्चिकर रहें।

संचालन – (यह तैयारियां कुण्डलपुर नगरी में दमयन्ती के स्वयंवर की चल रहीं हैं जहां के राजा महापराक्रमी, भीमस्थ तथा उनकी पुण्यवती रानी है। उनकी बेटी दमयन्ती जो 64 कलाओं में निपुण, धार्मिक तथा शास्त्रों की पाठी है। ऐसी महान पुत्री के लिये आज भव्य स्वंयवर रचा गया है।)

राजा – अरे पुण्यवती दमयन्ती कहां है।

रानी – महाराज वह अपनी सखियों के साथ जिनालय में पूजा करने गई है।

महाराज मुझे तो दमयन्ती की बहुत चिन्ता होती है कि वह अपने ससुराल में कैसे रहेगी।

राजा – आप चिन्ता क्यों करती हैं अपनी बेटी तो बहुत ही विवेकवान और धार्मिक है। वह हर कार्य को बहुत ही अच्छे से निभा पाएगी।

रानी – आप सही कह रहे हैं राजन, जिसके जीवन में धर्म है उसे कोई भी परिस्थिति बाधा नहीं पहुंचा सकती। मैं व्यर्थ ही इतनी चिन्ता कर रही थी।

मंत्री – महाराज, महाराज अनेक राजा अपने राजकुमारों के साथ यहाँ पधार चुके हैं ।

(राजाओं का प्रवेश)

राजा – आप सभी का इस भव्य स्वयंवर में स्वागत हैं आप सभी को मेरा जय जिनेन्द्र।

(सारे जय जिनेन्द्र)

राजा – आप सभी अपना आसन ग्रहण करें।

(सभी राजकुमार बोलेंगे जी महाराज)

राजा – दमयन्ती आओ बेटा।

संचालन – (दमयन्ती सोचते हुए) हे वीतरागी प्रभु आप जैसा बनना ही मेरा ध्येय है परंतु मैं आपका राजमार्ग प्राप्त कर सकूँ… सर्व परित्याग कर सकूँ ऐसी अभी मेरी सामर्थ्य नहीं है। मुझे कामदेव जैसे सुंदर पति की आकांक्षा नहीं है परंतु हाँ मेरा जीवनसाथी सरलता के सौंदर्य से भरा हो। वह राजाओं का राजा न हो, परंतु आपके चरणों का भक्त अवश्य हो। ऐसी कामना करते हुए मैं इस मंडप में प्रवेश करती हूँ।

राजा – मंत्री जी सभी राजकुमारों का परिचय करवायें।

मंत्री – धनवन्ती देश के राजा, राजा ऋतुपर हैं। जो वेद, पुराण, न्याय में पारंगत हैं एवं जिनेश्वर देव के परम भक्त हैं।

दासी – ऐसे गुणवान राजा क्या आपको आकर्षित करते हैं।

मंत्री – जहां मुनि भगवन विहार करते हैं ऐसे राज्य के राजा नील हैं जो निशद राजा के पुत्र एवं नल के छोटे भाई हैं।

दासी – ऐसे सुंदर भुजाओं वाले राजा क्या आपको मोहित करते हैं।

मंत्री – महाराज की जय हो, राजकुमार नल प्रवेश की अनुमति चाहते हैं।

राजा – अनुमति है।

नल – प्रणाम राजा।

राजा – इक्ष्वाकु वंशी, सूर्यसमान निषद राजा के बड़े पुत्र आपका स्वयंवर में स्वागत है।

नील – अरे भ्राताश्री ऐसे सभा में देर से आना आपको शोभा नहीं देता।

नल – क्षमा चाहता हूँ। मैं तो जल्दी ही प्रस्थान किया था परंतु रास्ते में एक वृद्ध मिला जो बहुत पीड़ीत था मैं उसी की सेवा में लगा हुआ था।

नील – भ्राताश्री मैंने ही आपसे सीखा है कि भावनाओं पर विवेक की लगाम लगाना चाहिए।

नल – मैं स्वयं जिनेश्वर का भक्त हूँ, अगर मैं बिना वैयवृत्य के वहाँ से आ जाता तो यह जिनेश्वर देव का साक्षात् अपमान होता।

राजा – मंत्रीश्वर दमयन्ती को राजकुमार नल का विशेष परिचय करवायें।

मंत्री – युद्ध नीति में प्रवीण तथा सदा अहिंसा के चाहक ऐसे महाराज नल हैं। जिनेश्वर देव की पूजा तथा जो नियमित शास्त्र स्वाध्याय करते हैं। अतिसुंदर जिनालयों का निर्माण करवाया है तथा अनेक दानशालाएं खोली हैं। शिकार खेलना, क्षत्रियों का शौक होता है पर राजकुमार ने कभी भी शिकार नहीं खेला तथा नगरी में शिकार खेलने पर प्रतिबंध लगाया है।

(दमयन्ती मुड़ते हुए दासी के कान में कुछ कहती है।)

दासी – आप सभी से दमयन्ती कुछ प्रश्नों के समाधान चाहती है।

सारे – अवश्य

दमयन्ती – दुनिया में देव तो बहुत हैं पर आप जिनेश्वर देव को ही क्यों पूजते हैं।

नील – यह तो कोई प्रश्न ही नहीं हुआ। मेरे बिता जिनेश्वर देव के भक्त थे इसलिये मैं भी परम्परा अनुसार जिनेश्वर का परम भक्त हूँ।

ऋतुपर – जिनकी स्तुति सारे करते हैं इन्द्र जिनको शीष झुकाते हैं जिनका भव्य समवसरण है ऐसे जिनेन्द्र देव को कौन नहीं पूजेगा।

नल – वीतरागता एवं सर्वज्ञता से सुशोभित, सर्वज्ञाति कर्मों का क्षय किया है, मोह राजा को परास्त किया इसलिये वह मेरे लिये पूज्य हैं।

दमयन्ती – विश्व में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है।

नील – देवी आश्चर्य तो यह है कि इस स्वयंवर सभा में रूप श्रृंगार की चर्चा की जगह जिनेश्वर देव की चर्चा चल रही है।

ऋतुपर – 1008 लक्षणों से युक्त तीर्थंकर भगवान समवशरण आदि विभूतियों से मुक्त है। यही सबसे बड़ा आश्चर्य है। उनका रक्त लाल की जगह श्वेत होता है।

नल – अनंत ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य से युक्त अपना आत्मा ही सबसे बड़ा आश्चर्य है।

दमयन्ती – मेरा तीसरा प्रश्न इस जगत में सबसे सुंदर कौन है।

नील – हे मृगनयनी तुम्हारा सौंदर्य ही विश्व सौंदर्य है ऐसी सुंदरता और कहीं नहीं मिलेगी।

ऋतुपर – इस जगत में जिनेन्द्र भगवान ही सबसे सुंदर हैं तथा भगवान का समवशरण भी सुंदर है।

नल – समवशरण की सुंदरता से भगवान भव्य नहीं होते अपितु भगवान की भव्यता से समवशरण सुंदर होता है तथा जिनेन्द्र देव द्वारा बताया गया अपना आत्मा ही सबसे सुंदर है।।

दमयन्ती – पुदगल कि नहीं अपितु अपनी आत्मा की अद्भुतता जिसे भाती है ऐसे महाराजा नल को मैं आपकी अनुमति से स्वीकार करती हूँ।

(वरमाला) TUNE

दमयन्ती – आज से मेरे मन, वचन तथा काया के स्वामी आप हो।

नल – अपना स्वामी तो सदैव आत्मा ही है।

दमयन्ती – आज से मेरा जीवन आपकी इच्छा के आधीन रहेगा।

नल – परंतु अपना जीवन तो सदैव जिनेन्द्र देव की आज्ञा में रहना चाहिए।

दमयन्ती – सुख-दुख में मैं हमेशा आपके साथ हूँ।

नल – एक-दूसरे के सुख की नहीं परंतु हमें अपने आत्मा के सुख की कामना करनी चाहिए।

पर्दा

SCENE -2

संचालन – जिनके सात फेरे भी संसार में बंधने के लिये नहीं अपितु वीतरागता का मार्ग दिखाते हैं ऐसी उत्तम भावना के लक्ष्य से दो धार्मिक रूचिवन्त जीवों का विवाह सम्पन्न हुआ। बहुत ही धूमधाम से उनका स्वागत किया गया। मंदिरों में दान दिया गया वात्सल्य भोज हुआ। इस प्रकार वे अपना जीवन सुख संतोषपूर्वक बिताने लगे। सभी सुखी थे सिवाय एक के।

नील – मुझे तो नल की यह भक्ति पूजा चाल लगती है चाल।

मंत्री 2 – चाल ये आप क्या कह रहे हैं आप तो उनसे बहुत प्रेम करते हैं ।

नील – प्रेम, प्रेम नहीं यह तो मेरी मजबूरी है अंतर तो ईर्ष्या की अग्नि से जल रहा है। जो जो मुझे प्रिय था वह सब कुछ नल को मिला। राज्यमुकुट, राज्यसंपत्ति और दमयन्ती इसकी तो मैं ऐसी दशा करूंगा कि ये सभी सुखपूर्वक नहीं रह पाएंगे।

मंत्री2 – राजा नल में तो ऐसा कोई भी दोष नहीं है जिससे हम उनका अपयश कर सकें।

नील – दोष नहीं है तो क्या हुआ दोष उत्पन्न करा देंगे।

मंत्री 2 – परंतु कैसे।

नील – लत लगाऊँगा मैं राजा को, उन्हें जीतने का बहुत शौक है न देखना आज मैं उसे कैसे जिताऊँगा।

(पीछे से )

नल – मंत्रीश्वर पूजा की तैयारियां करो।

नील – अरे भ्राताश्री प्रणाम ।

नल – अरे अनुज तुम यहां

नील – भ्राताश्री आप यहाँ अकेले भाभी श्री कहाँ हैं।

नल – वह तो जिनालय गई है, पूजा अर्चना करने। आज से दशलक्षण पर्व जो प्रारंभ हो गए हैं।

नील – बहुत अच्छा, परंतु भ्राताश्री मुझे आपकी बहुत चिन्ता होती है। आप हमेशा राज पाट में लगे रहते हो। आपके स्वास्थ के लिए इतनी मेहनत अच्छी नहीं है।

नील – मैंने आपके मनोरंजन के लिये एक अदभुत नुस्खा सोच रखा है।

नल – वह क्या है ?

नील – आओ मैं आपको बताता हूँ, ये देखो भ्राताश्री।

नल – अरे यह क्या … यह तो जुआ है, व्यसन है!

नील – अरे नहीं नहीं व्यसन नहीं, यह तो घडी दो घडी का आनंद मात्र है। थोडी देर बैठकर देखिए, आपको बहुत आनंद आएगा।

मंत्री विक्रम सिंह

(हाथी दाँत की पेटी और मोतियों की माला लेकर आते है।)

नील – भ्राताश्री एक दाव फेक कर तो देखिए, जो जीतेगा उसका यह सब कुछ हो जाएगा।

नल – परंतु मुझे पूजन में जाना है।

मंत्री2 – अरे राजन पूजन तो रोज ही करते हो …

नील – चलो भ्राताश्री एक आंकड़ा फेको अरे एक आंकड़ा बोलो

अरे बोलो ना

संचालक – इस प्रकार वे खेल में रम जाते हैं …

नील – अरे भ्राताश्री आप तो पहली बारी से ही अच्छा खेल रहे हो।

मंत्री 2 – वाह वाह! महाराज

(दमयन्ती का प्रवेश)

दमयन्ती – स्वामी आप जिनेश्वर देव की पूजा में नहीं आये। ऐसा पहली बार हुआ जब आपने पूजन छोड़ी हो।

नल – अरे खेलते खेलते समय कब बीत गया पता ही नहीं चला। देखो मैंने यह सब जीता है
दमयन्ती – परंतु जिनेश्वर देव की भक्ति के सामने इन काँच के टुकड़ों का कोई मूल्य नहीं है क्या पता कि आज की जीत कब हार में बदल जाये।
दमयन्ती – चलो आज खेला तो खेला परंतु कल से नहीं खेलना ऐसा मुझे वचन दो।
नल – (भाई से ) मैं तुम्हें वचन देता हूँ अब से मैं यह जुआ नहीं खेलूंगा। यह बहुत बुरा कार्य है, पाप का कार्य है।
नील – भ्राताश्री, आप ही बताइये क्या इसमें कोई हिंसा है, कोई झूठ है तो फिर क्या इसमें कोई अधर्म है, नहीं ना … यह तो बस एक निर्दोष आनंद है।
नल – पर दमयन्ती को यह पसंद नहीं है।
नील – ओ… क्या एक वीर पुरुष एक स्त्री की इच्छानुसार चलेगा। भ्राताश्री मुझे आपसे यह अपेक्षा नहीं थी। मैं आपका भाई हूँ, हितैषी हूँ, मैं थोड़ी ना आपका कुछ बुरा करूंगा।
नल – तुम्हारी बात सत्य है, इस खेल में कोई अधर्म नहीं है। चलो खेलते हैं।
मंत्री 2 – राजा शत्रु सेना, हमारे विरोध में योजना बना रही है हमें भी कुछ सोच विचार कर लेना चाहिए।
नल – मेरे पास समय नहीं है आपको जो योग्य लगे आप करिये।
मंत्री 2 – राजन यह क्या! आपकी निर्मल मति पर व्यसन का ग्रहण लग गया है।
नल – (गुस्से में) मुझे कब क्या करना है यह मेरी मर्जी है। इसमें मुझे मजा आ रहा है, तुम रंग में भंग मत करो। जाओ यहां से।
मंत्री 2 – क्षमा कर दो महाराज।
नील – मैं 25 सोने की थाल दाव पर लगाता हूँ।
नल – कौन-सा आंकड़ा
नील – 7

नल – ये लो …
मंत्री – (पीछे से) वाह वाह आप तो जीत गये। दाद देनी पड़ेगी पासा तो आपका गुलाम हो गया है।
मंत्री – महाराज आप कोई मोटी रकम दाव पर लगाओ ना…
नल – मैं 25 लाख गाँव दांव पर लगाता हूँ।
मंत्री – वाह वाह …
नल – मैं पाँच का आंकड़ा देता हूँ।
नील – हा हा हा मैं जीत गया।
मंत्री – ओ वाह वाह …
नल – मैं 20 करोड़ अश्व, दस लाख हाथी दांव पर लगाता हूँ।
(दमयन्ती का प्रवेश)
मंत्री – महाराज महारानी दमयन्ती पधार रही हैं।
नल – तुम रुक क्यों गये। आगे खेल बढ़ाओ।
दमयन्ती – स्वामी यह क्या विनाश का खेल बंद करने के लिये मैं आपसे विनती करती हूँ।
नल – जब पुरुष बोल रहे हों तो स्त्रियों को नहीं बोलना चाहिए।
दमयन्ती – आप विद्वान हो, विवेकवान हो, आपको यह कार्य शोभा नहीं देता।
नल – परंतु अगर मैं हार गया तो मुझे यह हार शोभा नहीं देगी।
नील – अरे भाभीश्री अगर भ्राताश्री हार को जीत में न पलट दे तो वह महाराज नल नहीं।
तो भ्राताश्री पांसा फेंकूं,
हां हां, तो आपने क्या दांव पर लगाया था, 20 करोड़ अश्व 10 लाख हाथी और 1 आयुधशाला।
ये लो मेरा पांसा

मंत्री – (पीछे से) अरे बधाई हो आप जीत गये।
(नील से) ज्यादा खुश ना हो क्या पता कब पांसा पलट जाये, महाराज नल के पास राजमुकुट है, राजसंपत्ति है, राजधानी है सब कुछ है …
(नल से) क्यों ना महाराज इस बार इन सब को दांव पर लगा दें। हार को जीत में पलटो महाराज जीत आपकी ही होगी। लगा दो…
नल – ठीक है…
दमयन्ती – नहीं स्वामी …
मंत्री – सावधान रहिये महाराज नल अभी का चक्र आपके पक्ष में है।
नल – मैं राजमुकुट, राजसंपत्ति, राजधानी सब कुछ दांव पर लगाता हूँ।
मंत्री – ये होती है मर्दानगी, आपकी हिम्मत की तो दाद देनी चाहिये।
दमयन्ती – नहीं नहीं, आपके पिता ने यह सब आपको बहुत प्रेम से दिया था इन सबको जुए में हार जाना, यह इक्ष्वाकु वंश पर कलंक होगा…
नील – 8 का आंकड़ा
मंत्री – अफसोस यह तो 5 का आंकड़ा है।
नल – मैं हार गया। मैं फिर से हार गया। (उठकर…)
नील – हा हा हा भ्राताश्री कहीं जा रहे हो अभी खेल खत्म नहीं हुआ।
नल – पर मैं तो सब कुछ हार गया मेरे पास कुछ भी नहीं है।
नील – है … एक आशा की किरण
नल – क्या ?
नील – है एक चीज … सबसे कीमती और सबसे मूल्यवान।
नल – क्या है मेरे पास बोलो कुंवर ?
नील –(हाथ दिखाकर) दमयन्सी
नल – यह क्या बोल रहे हो।

नील – मैं आपको आपकी सम्पत्ति से अवगत करा रहा हूँ।

नल – मैं आपको एक और मौका देता हूँ अगर आप जीत गये तो सब कुछ आपका।

दमयन्ति – ठीक है मै दमयन्ती को दांव पर लगाता हूँ।

नल – यह क्या आप मुझे दांव पर लगा रहे हो! अपनी अर्धांगिनी दमयन्ती को दांव पर लगा रहे हो। आज मैं आपके लिये सिर्फ एक वस्तु बनकर रह गई हूँ। आपने अपने मान के लिये अपनी प्रिय को दांव पर लगा दिया, हे भगवान ऐसा क्या अपराध हो गया मुझसे।

(पीछे पलट जाएगी)

संचालक – दमयन्ती से मत इतनी व्याकुलता क्यों अपने आप को संभालो। शान्तिनाथ भगवान की शान्त मुद्रा को हृदय में निहारो। जिस प्रकार सूर्य की किरणों को कोई रोक नहीं सकता वैसे ही अशुभ कर्मो को आने से कोई नहीं रोक सकता

दमयन्ति – संभालो खुद को दमयन्ति व्यर्थ क्लेश भाव करके क्यों कर्म बाँध रही हो।

नील – आँकड़ा है 5

जीत गया हा हा हा …

यह विशाल राज्य, राजमुकुट, राजसम्पत्ति और दमयन्ति मैं सब कुछ जीत गया।

मंत्री – महाराज की जय हो महाराज की जय हो।

नील – देखा भ्राताश्री जो पिताजी ने सिर्फ आपको दिया था वह मैने सबकुछ अपनी होशियारी से जीत लिया।

मंत्री – ये होशियारी नही कपट है कपट। जिन्होंने आपको इतना प्यार दिया, इतना सम्मान दिया उनके साथ ऐसा आपने ठीक नहीं किया।

नील – कपट मैने कपट किया ? पांसा फेंका किसने, भ्राताश्री ने, हारा कौन ? भ्राताश्री। और तुम सार दोष मुझ पर डाल रहे हो। जुआ खेलना या ना खेलना इसमें भ्राताश्री स्वतंत्र थे इसमें मेरी कोई गलती नहीं।

मैं राजा नल को 12 साल का वनवास जाने का हुक्म देता हूँ।

मंत्री – महाराज नल से कैसी बात करनी है इसका विवेक तुम भूल गये हो क्या।

नील – महाराज हा हा हा कौन महाराज ? यह तो जुआरी है जुआरी

नल – कुंवर मैं यह जुआ हार गया हूं इसकी मुझ खबर है, तुम्हें याद दिलाने की जरूरत नही ।

(दमयन्ती जाते हुए )

नील – अरे देवी दमयन्ति तुम कहाँ जा रही हो तुम्हारे बिना तो राजमहल में अंधकार हो जाएगा। अब तो तुम्हारा स्वामी मैं हूँ नल नहीं । यह यौवन वनवास काटने के लिये नहीं अपितु मेरे साथ राजसिक भोग भोगने में है मेरे पास सब कुछ है, नल के पास क्या है ?

दमयन्ति – हे निर्दय हृदय जो तुम्हारे पास नहीं है।

नील – अरे जो स्वयं की रक्षा नहीं कर सका वह तुम्हारी क्या करेगा।

दमयन्ति – मेरी रक्षा तो वीतराग धर्म करेगा। तुम्हें इसकी चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं। तुम्हारा स्वर्गीय सुख तुम्हें मुबारक हो।

नील – पर देवी भूलो मत कि मैंने तुम्हें जीता है। तुम मेरी संपत्ति हो। तुम पर मेरा अधिकार है ।

दमयन्ति – (हाथ जोड़कर) मुझे आपने कोई रूचि नहीं है। मुझे कृपा कर अपने स्वामी के साथ जाने दो।

नल – दमयन्ति, तू मेरे साथ वन में आएगी, वन का अर्थ तू समझती है, इससे अच्छा तू अपने पिता के घर कुण्डलपुर चली जा।

दमयन्ति – मैं तो बस इतना जानती हूँ जहाँ आप हैं वहीं मैं हूँ। जहां काया वहां छाया।

नल – पर वहां बहुत दुःख है ।

दमयन्ति – आपके चरणो की सेवा में मैं दूर रहूँगी, यही मेरे लिये सबसे बड़ा दुःख है।

नील – ओ … मैं तुम्हें जाने दूंगा तभी तो जा पाओगी देवी मेरे प्रेम को स्वीकारो तो उत्तम नही तो मुझे कोई और रास्ता अपनाना होगा।

दमयन्ति – तुम्हें जो करना है कर लो। पर मैं तो अपने शील की रक्षा के लिये अपने प्राण भी दे दूंगी। मेरा स्वामी मेरी देह हारा है पति परायण भक्ति नहीं ।

मंत्री – युवराज नील आप बहुत बड़ा अपराध कर रहे हो, बड़े भाई की पत्नि तो माता समान होती है। अगर तुमने दमयन्ति को कुछ भी किया तो तुम्हारा सिंहासन डगमगा जाएगा अगर तुम अपनी खैर चाहते हो तो सति को अपने स्वामी के साथ जाने दो।

नील – ठीक है जाने दो। नगर में डिंडोरा पिटवा दो कि जो कोई भी इन दोनों की मदद करेगा उसको नील द्वारा मृत्युदण्ड मिलेगा।

नल – मेरा सगा भाई होकर तुम ऐसा करते हो।

नील – तो क्या तुम्हारी पूजा करूँ। तुम तो कायर हो कायर, जिसने अपनी स्त्री को ही दांव पर लगा दिया।

नल – बस कर नील ।

दमयन्ति – स्वामी जीवन तो एक खेल है, जय पराजय तो इसमें होती ही रहती है।

नील – अरे हां भाभी जी, बिल्कुल सत्य कह रहीं हैं आप। आप तो धर्मराज हो –2 आपको तो ये वनवास पापोदय नहीं पुण्योदय मानना चाहिए। आप वन में जाकर संयम से रहो हा हा हा …

दमयन्ति – ऐसा विचारने के लिये आपका बहुत बहुत आभार आप तो सुख पूर्वक राज्य करो हम वनवास में रहकर आत्मवासी रहेंगे।

(नील मुकुट पहनता है) Tune

पर्दा

SCENE - 3

वन का दृश्य

संचालन - इस प्रकार आप सभी ने देखा कि कैसे नल राजा को व्यसन की लत लग गई थी। कहां इतने धर्म का पालन करने वाले जिनशासन अनुयायी और कहां जुआ खेलकर अपना मान-सम्मान तथा अपनी सारी सम्पत्ति खो बैठे।

देखो कर्मों की विचित्रता कहां इतना धार्मिक जीव जुआरी बन गया। परंतु आत्म बल के सामने कर्म बल कुछ भी नहीं। जिस समय हो आत्मबुद्धि कर्म थर-थर कांपते। राजा नल ने भी अपनी भूल सुधारने की पूरी कोशिश की तो आइए हम देखते हैं।

नल: राजमहल छोड़े हुए बहुत वक्त हो गया है अब तक अन्न का एक दाना भी पेट में नहीं गया, न जल की एक भी बूँद।

दमयन्ति: व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति कोई भी हो सबके दो पहलू होते हैं एक अच्छा तो दूसरा बुरा, हमें किसको मुख्य करना है ये हम पर निर्भर करता है। बुरा वक्त तो सबके जीवन में आता है, पर उसके मुख्य न करके हमें तो अपने आत्मा के आनंद को मुख्य करना है।

हे स्वामी वहां पेड़ के पीछे वो पत्थर दिखाई दे रहा है। (लरे)

नल: अच्छा वो पत्थर जिसमें दार रार पड़ गई है।

दमयन्ति: हां वही, देखो ना वहां उसके ऊपर एक सुंदर पक्षी बैठा हुआ है।

नल: पर नदी के प्रवाह तो बहुत तेज है, वह उस पक्षी को नुकसान पहुँचा सकता है।

दमयन्ति: फिर भी देखिए ना वह पक्षी कितना शांत और निश्चिन्त है।

स्वामी देखिए ना वह पक्षी हमें कितनी बड़ी शिक्षा दे गया है, शांति बाहर की परिस्थिति से नहीं अपितु मन की समता से आती है। हमें धर्म तथा आत्म ज्ञान के पानी से इतना मजबूत बनना है कि कोई भी अशुभ परिस्थिति हमें डिगा न सके।

नल: दमयन्ति आज मुझे ऐसा हुआ कि संसार अनंत है, अपार है, असार है।

दमयन्ति: परंतु जिनेश्वर की भक्ति अभी भी सारभूत है।

नल: संसार दावानल जैसा है।

दमयन्ति: परंतु वैराग्य रूपी अमृत इस दावानल को शांत करने वाला है।

नल: संसार भयंकर अंधकार है।

दमयन्ति: परंतु आत्म ज्ञान रूपी सूर्य तो हमें शा प्रकाशवान है।

(रात का दृश्य)

दमयन्ति: अच्छा स्वामी रात बहुत हो गई है बातों बातों में तो हमें खबर ही नहीं पड़ी।

(सब सो रहे होते हैं और नल जाग जाता है)

नल: भूल मैंने की और मेरी भूल को एक पवित्र विचार करने वाली नारी भोगे। जुए में रमा मैं, और मेरी घोर अपराध की सजा मेरी निःअपराधी स्त्री भोगे… क्या करूं मैं कहां जाऊं … हां एक उपाय है … अगर मैं दमयन्ति को यहां अकेला छोड़ के चला जाऊं तो यह अवश्य अपने पिता के घर चली जाएगी। दमयन्ति तेरी मलाई के लिये मुझे यह सब करना ही पड़ेगा।

(पत्थर मारते हुए)

नल: (कपड़े पर) प्रिये यहां से पश्चिम का रास्ता तुम्हें अपने पिता के घर कुण्डलपुर पहुंचा देगा। मुझे अभी जाना होगा… धर्म तुम्हारी रक्षा करे। मुझे माफ करना तुम्हारे हित के लिये मुझे सब कुछ करना ही होगा ताकि तुम अपना जीवन सुख शांति से यापन कर सको।

(नल दमयन्ति को छोड़ने के बाद)

संचालक - इस प्रकार राजा नल कोमल सी दमयन्ति को वन में अकेला छोड़कर चले गए। अब आइए देखते हैं कि उस निर्जन वन में दमयन्ति क्या विचार करती है।

दमयन्ति: ओह कितना भयानक स्वप्न था अरे स्वामी कहां गए। आज तो बहुत जल्दी उठ गए… लगता है स्नान करने गए होंगे।

SCENE - 4

संचालन - दमयन्ति धैर्यतापूर्वक वन में अकेले रहने लगी तथा आत्मा का ध्यान करती रही अब देखते हैं कि आखिर नल राजा कहां हैं और उनके साथ क्या-क्या हुआ।

(अग्नि की ज्वाला दिखती है)

नल: अरे यह क्या यह तो अग्नि की ज्वाला है।

(अंदर से आवाज आयेगी)

ब्वाओ बचाओ मुझे कोई बचाओ नल राजा आप बचाओ

नल: लगता है कोई जीव इस भयंकर अग्नि में फंस गया है। लो यह मेरा कपड़ा पकड़ लो। (अंदर जाता है)

(कूबड़ बन जाएगा)

कूबड़: आह आह ये क्या हो गया ‘मेरा शरीर तो पूरा विकृत हो गया मेरा चेहरा भी खराब हो गया’।

देव – शांत हो जाओ वत्स

कूष्वड़ – आप कौन हैं।

देव – बेटा मैं तेरा पिता हूँ, दीक्षा के प्रभाव से मैं स्वर्ग में देव हुआ, अवधि ज्ञान से मैंने तेरी सारी परिस्थिति जान ली। अब मैंने तेरी रक्षा के लिये ही तेरा रूप विकृत किया है।

कूष्वड़ – मैं कुछ समझा नहीं आपके कहने का आशय

देव – बेटा तुम्हारे वनवास जाने के बाद तुम्हारे अनेक शत्रु बन गए जो कि तुम्हें हानि पहुंचाना चाहते हैं तुम्हारी रक्षा के लिये ही मैंने ही यह सब किया है।

कूष्वड़ – तो मेरी पुरानी जैसी काया अब कब होगी।

देव – आज से 12 वर्ष के बाद तुम यह कंचन कपड़ा ओढ़ लेना, तुम पहले की तरह वापस अपने रूप में आ जाओगे।

कूष्वड़ – आपके पास तो दिव्य शक्तियां हैं आप मुझ पर से यह विपत्ति क्यों नहीं हटा देते।

देव – जब कर्म का उदय होता है तो इन्द्र, जिनेन्द्र भी कुछ करने में समर्थ नहीं है। यह तुम भी अच्छे से जानते हो ।

कूष्वड़ – हां आपकी बात बिल्कुल सत्य है कर्म के उदय में कोई कुछ भी नहीं कर सकता सिवाय धैर्य धारण करने के।

देव – सुनो वत्स इस आम्र वृक्ष के पीछे से जो रास्ता जाता है वह तुम्हें ऋतुपर राजा की राजधानी तक पहुंचाएगा। तुम अपना नाम वहां बाहुक रख लेना वहीं पर ही तेरा हित होगा।

कूष्वड़ – पर मुझसे इस काया का कष्ट नहीं सहा जाएगा।

देव – तुम तो जिनेश्वर देव के भक्त हो, जो कष्टों से कम्पायमान हो वह जिनेन्द्र भक्त नहीं अपितु जो कष्टों को कम्पावे वही जिनेन्द्र भक्त है।

पर्दा

SCENE-5

संचालक – इस प्रकार नल राजा तो कहीं दूर जाकर अपना जीवन बिताने लगे परंतु अब देखते है कि दमयन्ति वन में सुखपूर्वक रह रही है या नहीं।

यहां पर तो उसे वन में एक भयंकर अजगर ने उपसर्ग किया हुआ है।

आईये देखते हैं।

दमयन्ति – बचाओ बचाओ मेरी श्वास रुक रही है।

(हे प्रभु आपकी साक्षी में मैं सर्व जीवो को क्षमा करती हूं, सभी जीव मुझपर क्षमा करें , मेरा सभी से प्रेमभाव है वैर नहीं … अरिहन्ते सरणं… )

भील – अरे यह क्या (अजगर निकालते हुए)

मैं आपके लिये अभी पानी लेकर आता हूं।

यह लो पानी पिओ।

मन में (क्या अद्भुत रूप है यह लंबे लंबे केश, ये मृगनैनी नैन, कंचन सी काया वाह आज तो इस स्त्री को देखकर मैं धन्य ही हो गया)

(हाथ पकड़ते हुए)

दमयन्ति – यह क्या कर रहे हो

भील – तेरे रूप को निहार रहा हूं, सुंदरी

दमयन्ति – मैं शादीशुदा स्त्री हूं, पति की त्यागी हुई हूं परंतु पतिव्रता हूं।

भील – पति की त्यागी हुई… कौन मूर्ख है जिसने इतनी सुंदर स्त्री को त्याग दिया।

दमयन्ति – मेरे पति के विरोध में मैं एक शब्द भी नहीं सुनुंगी, वो मेरे देव हैं।

भील – देव हैं … जिसने तुम्हें इतनी भयानक अटवी में छोड़ दिया तुम उसको देव कहती हो।

दमयन्ति – हां, मुझे उन पर पूरा विश्वास है उन्होंने मुझे मेरे हित के लिये ही छोड़ा है। कृपा कर तुम यहां से चले जाओ।

भील – चला जाऊं हा हा हा… कहां जाएं सुंदरी तेरे रूप ने तो मुझे पागल कर दिया है मैं तुम्हें अपनी बनाकर ही रहूंगा।

दमयन्ति – तुम यह क्या कह रहे हो, तुम्हें इसका भान भी है

भील – ऐ सुंदरी मैं तुम पर उपकार कर रहा हूं, उपकार

दमयन्ति – पर स्त्री गमन तुम्हें नरक के घोर दुख देगा।

भील – तुम जैसी सुंदर स्त्री के लिये मैं एक बार क्या अनंत बार नरक मंजूर है। (हाथ पकड़ लेगा)

दमयन्ति – ठीक है मैं तैयार हूं,

भील – तैयार है वाह …

दमयन्ति – पर मेरी एक शर्त है

भील – मुझे तेरी हर शर्त मंजूर है।

दमयन्ति – मुझे फलाहार करने की इच्छा है।

भील – अभी लाता हूं, सुंदरी।

लो सुंदरी

दमयन्ति – (जूठन निकालते हुए) लो यह खाओ मैं तुम्हें बहुत प्रेम से दे रही हूं, खाओ ना ।

भील – ऐ सुंदरी मैं भले ही नीच जाति हूं, पर यहां भीलों का राजा हूं, राजा। एक राजा भूखा मर जाएगा पर किसी की जूठन नहीं खाएगा।

दमयन्ति – उसी प्रकार मैं भी नल राजा की जूठन हूं।

भील – सुदंरता कभी जूठन नहीं होती।

दमयन्ति – अच्छा तो यह बताओ कि कोई सरोवर में मल, मूत्र पड़ा हो तो क्या आप उसमें स्नान करना पंसद करोगे।

भील– यह कैसी बात कर रही हो स्नान तो दूर मैं उसकी तरफ देखूंगा भी नहीं ।

दमयन्ति – उसी प्रकार शरीर भी मल, मूत्र, मांस से भरा हुआ है क्या तुम इसे भोगना पसंद करोगे। मुझे भोगना उस सरोवर में स्नान करने के बराबर है।

भील - मुझे माफ़ कर दो क्षमा कर दो, देवी मैंने तो बस तुम्हें अजगर के मुख से बचाया था, परंतु तुमने तो मुझे संसार के अंनत दुखो से बचा लिया। मैं तुम्हारा बहुत बहुत उपकारी हूं क्षमा कर दो मुझे। धर्म तेरी रक्षा करे।

संचालन - ऐसे ही संयम के साथ दमयंति ने कई वर्ष व्यतीत किये। शुद्ध आत्मा में अपना मन लगाया और वही गुफा में बैठकर ध्यान किया। पर अचानक तेज वर्षा के कारण गुफा में पानी भर गया, वहां से जाने के सिवाय उसके पास कोई और उपाय नहीं था। एक दिन नदी पार करके वह अपने मौसा मौसी के राज्य में पहुंची जहां पर उसे कोई नहीं जानता था। वहां पर बहुत ही धुमधाम से उत्सव मनाया जा रहा था। आईये हम सब मिलकर देखते है।

मौसी-मौसा का दृश्य

मौसी - तुम कौन हो तेरा नाम क्या है।

दासी - महारानी नदी के किनारे मुझे यह असहाय स्त्री दिखी।

मौसी - आपको वैसे भी एक दासी की जरूरत थी मुझे यह सुशील लगी इसलिये इसे मैं यहां ले आई।

मौसी - ये चेहरा तो बहुत पहचाना हुआ लगता है ऐसा लगता है जैसे यह पुष्पवती की बेटी दमयन्ति है।

बहन - अरे मां आप भी, बहन दमयन्ति तो राजरानी है राजरानी इसका तो वेश का भी ठिकाना नहीं है।

मौसी - जो भी हो, परंतु इसको देखकर मुझे तो अन्तर में बहुत वात्सल्य आता है, ऐसा लगता है जैसे ये मेरी कोई सगी हो।

दमयन्ति - महारानी जी कोई सेवा है क्या

मौसी - क्या तुम जिन मंदिर की देख रेख कर सकती हो।

दमयन्ति - हां हां क्यों नही, आपका बहुत बहुत उपकार मैं तो आज धन्य ही हो गई।

बहन - तुम्हें मेरी भी सेवा करनी होगी।

दमयन्ति - जी हां क्यों नही

बहन - जाओ मुझे स्नान करना है, मेरे लिये सुगंधित द्रव्य वाला जल तैयार करो।

दमयन्ति - जी

बहन - मां एक अपरिचित को आप जिन मंदिर का कार्य कैसे सौंप सकती हैं

मौसी - बेटा इसकी आंखों में मैंने निर्दोषता देखी है और देखना यह बहुत अच्छे से जिन मंदिर की सेवा करेगी।

बहन - पर मां …

मौसी - पर वर छोडो, अब जल्दी जाओ और स्नान कर लो, तेरे मौसा मौसी यहां पधारने वाले है।

(भीमरथ तथा पुष्पवती का प्रवेश)

मौसा - अरे चंद्रेशा देखो कौन आया है।

मौसी - अरे … पधारो पधारो, और बताइये नल दमयन्ति कैसे हैं।

राजा - एक दुखद समाचार है, राजा नल जुए में सारा राज पाठ हार गए। उन्हें 12 साल वनवास भेज दिया गया। पता नहीं वे कहां हैं कैसे हैं, आशंकाओं से मेरा चित्त व्याकुल हो गया है।

मौसी - दीदी व्यर्थ आकुलता ना करो वे जहां भी होगे अच्छे ही होंगे, धर्म ने अवश्य उनकी रक्षा की होगी।

दासी - महारानी जी जिन मंदिर में से स्वर्ण छत्र गायब हो गया है।

मौसी - अरे रे यह क्या हो गया।

मौसा - जाओ जाकर सेनापति को बुलाओ

बहन - माताजी मेरा नवलख्खा हार चोरी हो गया, जब मैं नहाकर तो देखा के हार गायब है।

मौसा - तेरी सेवा में कौन था उस वक्त

बहन - अरे मां वही नई दासी, मुझे तो पहले से ही शक था उस पर

मौसी - बुलाओ उस दासी को

बहन - सूर्यकांता …

मौसी - बता बेटा क्या तुने चोरी की है।

दमयन्ति - मैने कुछ नहीं किया राजमाता

बहन - झूठ बोल रही है झूठ, मुझे सब पता है कि इस भोलेपन के पीछे षडयंत्री चेहरा छुपा हुआ है।

मौसा - शांत रहो चंद्रमति शांत

बहन - शांत कैसे रहूं मैं शांत इतना बड़ा अपराध किया है फिर मैं शांत क्यों रहूं। इसको तो मृत्युदण्ड मिलना चाहिए।

मौसी – कषाय परिणाम करके कर्म बन्ध क्यों कर रही है। दासी जिन मन्दिर में चोरी करने से बहुत पाप का बन्ध होता है अपयश होता है।

दमयन्ति – जो अपराध मैंने किया ही नहीं उसको मैं क्यों स्वीकारूं

बहन – तूने चोरी की है इसलिये तुझे इन बेड़ियों से बांध दिया है।

संचालक – मुझे तो ये बेड़ी और रेशमी धागे में कोई भेद नहीं दिखता

बहन – ओ हो हो हो चेहरे से तो कितनी भोली लग रही है, परंतु इसकी करतूत तो देखो। अपना दोष कबूल करो, बोलो कि तुमने ही चोरी की है।

दमयन्ति – मैंने कोई चोरी नहीं की

(माता पिता के चरणों में गिरा दिया)

राजा – दमयन्ति, मेरी बेटी, मेरा खोया हुआ रत्न, बेटा तुम कहां थी।

रानी – तुम्हें हमने कहां कहां नहीं ढूंढा। हम कितने चिंतित थे तुम्हारे लिये

मौसी – अरे ये दमयन्ति है! मैं तो इसे पहचान ही नहीं पाई, मुझे माफ कर दो पुत्री

बहन – मैंने तुम्हारे ऊपर झूठा दोष लगाया मुझे माफ कर दो।

दमयन्ति – अपराध तो मैंने किया है किसी पूर्व भव में। कहा जाता है जो जैसा करता है उसे वैसा ही फल मिलता है। तुम्हारा इसमें कोई भी दोष नहीं। मैंने कर्म बांधा था इसलिये मुझे ही भोगना पड़ा।

रानी – तुझे जीता जागता देख कर मेरे प्राण में प्राण आ गये। ये तेरे साथ क्या हो गया।

दमयन्ति – आपको मेरे शरीर की फिक्र है। मेरा शरीर हो न रहे मैं ऐसी भावना भाती हूं

पिता – नल कहां हैं

(दमयन्ति चुपचाप)

माता – बोलो ना बेटा राजा नल कहां हैं

दमयन्ति – वो मुझे वन में अकेला छोड़कर चले गये।

पिता – वो चले गये कहां चले गये तुझे वन में अकेला छोड़कर

दमयन्ति – नहीं पिताजी इसमें उनका कोई दोष नहीं है मेरे पुण्य के उदय ने मेरा साथ छोड़ दिया।

मौसी – वहा तेरी हिम्मत नहीं टूटी

दमयन्ति – जहां वीतरागता जैसा धर्म हो वहां हिम्मत कौन तोड़ सकता हैं

मंत्री – महाराज महाराज चोर पकड़ा गया।

राजा – जाओ सिपाहियों

मौसी – जाओ दमयन्ति को तैयार करो।

दासी – जी महारानी

मंत्री – महाराज जीवन में पहली बार अपनी नगरी में सूर्यपाक व्यंजन बनाने वाला रसोइया आया है।

दमयन्ति – सूर्यपाक व्यंजन बनाने वाला रसोइया आया है। यह तो केवल महाराज नल को ही विद्या प्राप्त है अन्य कोई नहीं जानता।

मंत्री – क्या सुंदर रूप वाला महापराक्रमी नल राजा और कहां एक कुबड़ी रसोइया। इसके तो सारे अंग विकृत हैं ये राजा नल कैसे हो सकते हैं

दमयन्ति – कुछ तो खास होगा उनमें

मंत्री – हां एक बार एक पागल हाथी को उन्होंने अपने वश में किया था। अनेक अनेक राजा भी उस हाथी से हार गये परंतु उन्होंने विजय प्राप्त की। राजा ने उसे ईनाम में एक लाख स्वर्ण मुद्राएं दीं, पांच सो गांव दिये परंतु जानती है रानी सबसे आश्चर्य की बात क्या है… उन्होंने वह सारी मुद्रा गरीबों में दान कर दी पांच सौ गांव में मदिरापान बंद करवा दिया। महाराज ऐसा व्यक्ति मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा। अरे मैं तो भूल ही गया मुझे पूजा के बहुत काम हैं मैं चलता हूं।

दमयन्ति – ऐसा विशाल हृदय, ऐसे उच्च विचार गजदमनी की अद्भुत विद्या यह सब तो नल राजा के सिवाय अन्य किसी के पास नहीं हो सकती। पिताजी कृपया इस बाहुक को आप बुलवाइये।

रानी – पर उसका अंदर का भेद जानने के लिये एक युक्ति विचार करनी होगी।

राजा – एक युक्ति है… दमयन्ति का स्वयंवर

रानी – स्वयंवर

राजा – हां दमयन्ति का खोटा स्वयंवर, ऋतुपर राजा को यहां आमंत्रित करेंगे वह तो पहले से ही दमयन्ति पर मोहित था।

माता – हां हां स्वयंवर की बात सुनकर तो वह उत्सुक होकर यहां आ जायेगा।

दमयन्ति – पिताजी एक और सूचना है चित्रशाला में दो चित्र बनवाकर रखिये। एक में शांत सरोवर तथा दुसरे चित्र में झरना बह रहा हो परंतु वहां एक पत्थर पर एक पक्षी इतनी अशांति होने पर भी शांति से बैठा हुआ हो। अगर वो नल महाराज होंगे तो वे अवश्य दूसरा चित्र पसंद करेंगे।

([ऋतुपर राजा का प्रवेश])

राजा – पधारो पधारो कुण्डलपुर में आपका स्वागत है आप तो बड़े ही सही समय पर आ गये।

ऋतुपर – अरे यह तो बाहुक की अश्वविद्या का कमाल है।

राजा – परंतु यह तो महाराज नल ही जानते है।

बाहुक – मैं पूर्व में नल राजा का सारथी था। उन्हीं ने मुझे यह कला सिखाई है।

ऋतुपर – मुझे बहुत ही अफसोस हुआ कि इतने धर्मवान धैर्यवान नल राजा एक जुए की लत में आ गये और अपना सब कुछ गंवा दिया। उन्होंने ऐसा खेल खेला कि उन्हें वनवास तक जाना पड़ा।

राजा – अरे खेल तो उन्होंने मेरी पुत्री के साथ खेला है।

रानी – पति के विश्वास में उसने उनके साथ वन का मार्ग अपनाया। पति की सेवा में अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया ऐसी निष्ठावान पत्नि को उन्होंने मध्य रात्रि में वन में अकेला छोड़ दिया। नल राजा ने ऐसा कार्य करने से पहले एक बार भी नहीं सोचा।

राजा – क्या उन्हें दमयन्ति जैसी सुकोमल नारी भार लग रही थी, क्या उन्हें दया नहीं आई। वे तो कायर हैं, निष्ठुर हैं, विश्वासघाती हैं।

बाहुक – नहीं नहीं यह बात सत्य नहीं है। वे कायर नहीं वे निष्ठुर नहीं। अरे उनकी मजबूरी का तुम्हें अंदाजा नहीं अपनी पत्नि को ऐसा अकेला छोड़ने पर उनके हृदय पर क्या बीती है आपको इसका अंदाजा नहीं। अरे एक पल भी ऐसा नहीं हुआ जब उन्हें दमयंति की याद न आई हो।

राजा – पर नल राजा की बातें सुनकर तुम क्यों खेद खिन्न हो रहे हो। ऐसा लग रहा है कि मानो तुम सब घटना के साक्षी थे।

बाहुक – ऐसा नहीं है पर …

ऋतुपर – अरे ये बाहुक महाराज की सेवा में रह चुका है वो उनके स्वभाव से सुपरिचित है ।

बाहुक – हां हां उन दोनों के प्रेम का मैं साक्षी रह चुका हूं।

ऋतुपर – अब कोई भला अपने स्वामी के विरूद्ध सुन सकता है क्या।

राजा – क्षमा करो महाराज। वातावरण थोड़ा गंभीर हो गया है चलो मैं आपको अपनी चित्रशाला में ले चलता हूं ।

ऋतुपर – आओ राजा बताईये इन दोनों चित्र में से शांति किस चित्र में है।

राजा – अरे इसमें विचार क्या करना दिख ही रहा है कि पहले चित्र में अपार शांति भरी हुई है। आकाश का वातावरण साफ है, पहाड़ की परछाईं शांत सरोवर में स्पष्ट दिख रही है।

राजा – तुम्हारे अनुसार क्या है बाहुक।

बाहुक – मुझे तो यह दूसरा चित्र पसंद है क्योंकि भले ही यहां का वातावरण अशांत हो परंतु इस छोर में बैठा हुआ पंछी अशांत वातावरण में भी बिना किसी कष्ट के है इसी चित्र में स्पष्ट है सच्ची शांति।

ऋतुपर – वाह वाह इसका तो मैंने विचार ही नहीं किया।

राजा – महाराज राजपाठ के लिये एक निर्णय लेना है आपकी सलाह की हमे जरूरत है

ऋतुपर – हां हां ! क्यों नहीं, चलिए ।

राजा – अरे बाहुक तू तो चित्र कला का प्रेमी है ना तू यहीं रह कोई सेवा की आवश्यकता हो तो सेवक को बुला लेना।

(दमयन्ति का प्रवेश)

दमयन्ति – महाराज नल … आप चौंक क्यों गये, क्या आप महाराज नल हैं।

बाहुक – ना ना, मैं तो उनका दास हूं मैं तो उनका नाम सुनकर चौंक गया था। मेरा नाम तो बाहुक है देवी।

दमयन्ति – सत्यवादी नल असत्य कब से बोलने लगे। क्या नाम रूप बदलने से आपका भूतकाल थोड़ी बदलेगा। आप रूप बदल सकते हैं, नाम बदल सकते हैं परंतु आपकी आंखो में बह रहे मेरे प्रति इस प्रेम को नहीं बदल सकते।

नजर नहीं फेरो महाराज मेरे ऊपर हाथ रखकर बोलो के आप मेरे स्वामी नहीं।

बाहुक – आप भ्रमित हो रही हो देवी। इस असत्य मान्यता का त्याग करो। मुझमें तथा नल राजा में कोई भी समानता नहीं । वे तो साक्षात कामदेव हैं। और मैं विकलांग बाहुक हूं।

दमयन्ति – मैं तो आपके गुणों पर मोहित थी, आपके रूप पर नहीं। दमयन्ति के हृदय में सिर्फ एक ही व्यक्ति है और वे है राजा नल। आपकी आखों में मैंने सिर्फ एक ही सवाल देखा है, कि दमयन्ति का दूसरा स्वयंवर क्यों?

राजा – अरे बेटा दमयन्ति महाराज के लिये फलाहार की व्यवस्था करो।

दमयन्ति – जी पिताजी। (बाहुक से अपना हाथ काट लेती है)
आह … मेरी तकलीफ देखकर आपको इतना कष्ट क्यों हो रहा है मुझे स्वीकारो नाथ ।

(बाहुक चादर ओढ़ता है और नल प्रकट हो जाता है)

राजा – पुष्पवती अरे ओ पुष्पवती देखो चमत्कार हो गया

रानी – राजा नल आपको देखने के लिये तो मेरी आंखे तरस गईं।

(दमयन्ति नल के चरणों पर गिर जाती है)

नल – दमयन्ति तुम्हारा स्थान मेरे चरणों में नहीं मेरे हृदय में है। तुम्हारा शील देखकर मैं प्रभावित हुआ।

संचालक – इस प्रकार नल और दमयन्ति का मिलन हुआ। नल ने अपनी गलती का प्रायश्चित किया। वह दोनो अपने घर वापिस लौट गये । वहां नल राजा ने नील को जुआ खेलने के लिये फिर से एक चुनौती दी। वहां नील राजा को परास्त कर उन्होने विजय प्राप्त की। नील को भी अपनी गलती का एहसास हुआ और अब उसने माफी मांगी।

धीरे-धीरे सब कुछ ठीक होता गया। नगरी में सब खुशी पूर्वक अपना जीवन यापन करने लगे । फिर कुछ समय पश्चात नल दमयन्ति को एक पुत्र इन्द्रसेन एवं एवं पुत्री इन्द्रसेना की प्राप्ति हुई।

इन्द्रसेन – जय जिनेन्द्र माता

इन्द्रसेना – जय जिनेन्द्र माता

दमयन्ति – आओ बेटा मुझे आप दोनो णमोकार मंत्र सुनाओ

(दोनों सुनाते हैं)

इन्द्रसेन – मां अब हम खेलने जाएं

दमयन्ति – जाओ।

नल – अरे वाह तुम तो अभी से ही दोनों को धार्मिक शिक्षा दे रही हो।

दमयन्ति – सही कहा आखिर इन्हें भी तो आगे मोक्ष मार्ग में प्रशस्त होना है। अभी से धार्मिक संस्कार देंगे तभी तो धर्म रूपी वृक्ष फलित होगा।

स्वामी अब वक्त आ गया है कि हम भी मोह माया को छोड़कर जिन दीक्षा ले लें। अब तो यह संसार असार लगने लगा है कुछ रुचता ही नही अब इस मोही और झूठे जगत में मुझे नही फंसना

नल – पर इतना सारा राजपाठ, राजवैभव मैं कैसे छोड़कर जाऊं। अभी तो मेरा सुखपूर्वक जीवन शुरू हुआ है। दमयन्ति तुम ऐसी बाते क्यों कर रही हो।

संचालक – संभालो महाराज नल तुम्हारी बुद्धि को क्या हो गया है। यह नर भव तो जीवन सार्थक करने के लिये मिला हे, और इसे तू तुच्छ राजसंपत्ति एवं भोग के लिये गंवा रहा है चेतो नल चेतो …

नल – ओह ! यह मुझे क्या हो गया था। दमयन्ति सही कहती है, अब हमें दीक्षा ले लेनी चाहिए आत्मा का आनंद ही सच्चा आनंद है। बाहय विषय तो मात्र सुखाभास है आत्म वैभव के आगे तो सब फीका हैं।

पर्दा


स्रोत: दस लक्षण सांस्कृतिक कार्यक्रम संग्रह — मंचन-योग्य नाटक (जैन समुदाय पांडुलिपि)

प्रूफरीडिंग बाकी है

स्रोत · Source: forum.jinswara.com — अनुमति सहित, साभार · shared with permission and thanks.

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