मंगल नाम महिमा
मेरा जैन धर्म अनमोल
दृश्य - 1
सेठ ऋषभजी का घर है जिनकी दो पुत्रियाँ हैं अभी नहीं के विवाह के लिये परेशान आनन्द है
सेठ ऋषभजी - फाँटो और बाबोरा देखकर लड़का तो बन गया है, मालवी अरहट बात तो यह है कि यह इसमें जैन धर्म के संस्कार है और इसको पाठशाला और विद्यालय में जाना अच्छा लगता है।
(तेजस्वी) सिंहेश्वरी - आप किस चिंता में खोए हो? आपके चेहरे पर प्रसन्नता देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आपको कोहिनूर हीरा मिल गया है।
ऋषभजी - सिंहेश्वरी तुमने जो अभी बात कही, मुझे तो कोहिनूर हीरे जैसा दामाद मिल गया है। आजकल का मंदिर जाना स्वाध्याय करना अच्छा लगता है और परिवार भी जाना पहचाना है। हमारी बेटी यही सब करेगी ना।
सिंहेश्वरी - नहीं नहीं। क्या सब करेगी? यह देखो कमला का बेटा M.R.S. है और ये वाला Engineer
ऋषभजी - नहीं सिंह! तुम्हें बाह्य वैभव की महिमा आ रही है। मैं तो लड़के की अचल संपत्ति की दृष्टि से देख रहा हूँ चल संपत्ति तो कभी भी नष्ट हो सकती है, किंतु उत्पन्न का वैभव जिसके पास हो उसको कोई नहीं कर सकता। लेकिन तुम देवी बातें क्यों कर रही हो?
सिंहेश्वरी - मगर सारी देवी बातें ज्यादा पढ़ी लिखी हैं। लोग क्या कहेंगे?
ऋषभजी - अरे भागवान। लोगों को कहने की आदत है। छोटे सिक्के हमेशा ही ऐसे बात है। मैं तो लड़के की इस बात पर फिदा हो गया हूँ कि वह (सुकाणु ०८ महीने) है। सारी बेटी को तो मैं समान विवरण का से भेजूंगा।
सिंहेश्वरी - आपके निर्णय पर मुझे पूरा विश्वास है। फिर भी कभी-कभी मैं एक बार दिनभर विचार विमर्श कर लेती हूँ। वह राहुल। जरा उधर तो आना।
राहुल - हाँ माँ, पिताजी, आज्ञा जिनेन्द्र। क्या बात है आप दोनों बड़े प्रसन्न दिखाई दे रहे हैं।
सिंहेश्वरी - बेटा नहीं। तुम्हारे लिये कुछ विवाह प्रस्ताव आये हैं। इनमें से तुम्हें कौनसा पसंद है?
राहुल - अच्छा तो यह बात है। यह तो आप ही निर्णय करें। मुझे आपके निर्णय पर विश्वास है। बस मेरी तो यही इच्छा है कि जिससे मेरा विवाह हो वह सच्चे देव-शास्त्र-गुरु का उपासक हो। वाणी पुण्यशाली हो जिन धर्मस्थान से रक्त प्राप्त हो। मैं जैन धर्म को खोना नहीं चाहती।
ऋषभजी - अति उत्तम बेटा! हम तुम जैसी बेटी पाकर धन्य हो गए।
संचालक -
दृश्य - 2
अब देखेंगे दूसरी बेटी सिंह के लिये कैसा वर मिलेगा? यह है अभिनंदन कश्यपजी का घर – आइये आगे देखते हैं
अभिनंदन जी - (चिंता में) हे भगवान। हमारी समाज में लड़कियों की कितनी कमी हो गई है। और हमारे तीन-तीन बेटों के लिये अच्छी बहुएँ कहाँ से लाएँगे?
आकांक्षा - कहीं से क्या लाएँगे? हमारे समाज में लड़कियों की कमी है तो क्या हुआ। जैनों की लड़कियाँ ले लेते हैं? उनकी लड़कियाँ तो सर्व गुण संपन्न होती हैं।
अभिनंदनजी - हाँ भाग्यवती, पहली बार तुमने बड़े पते की बात कही है। किंतु यह कैसे संभव है? होगा?
अभिमन्यु - अरे पिताजी! इस संसार में कुछ भी असंभव नहीं है। मेरे college में एक लड़की है (सिंह जैन) वह मुझे पसंद भी है। बस आप उससे ही मेरा विवाह करवा दीजिए।
अभिनंदनजी - कौन सिंह? कहीं वह ऋषभजी की बेटी तो नहीं?
अभिमन्यु - हाँ-हाँ वही।
अभिनंदनजी - पर वह तो हमें अपनी बेटी नहीं देंगे। उनके जिन धर्म हैं और सुना है उन्होंने अपनी बड़ी बेटी के लिये तो कई अच्छे-अच्छे जैनों के रिश्ते भी स्वीकारे और एक साधारण परिवार में बेटी का विवाह कर दिया। क्योंकि वह बेटा जिनधर्म का दृढ़ ज्ञानी था। और हम तो दिगंबरी हैं, फिर
आकांक्षा - अरे हो। वह तो बहुत अच्छी लड़की है। आप चिंता न करें। मैं सब संभाल लूँगी। जब तक विवाह नहीं हो जाता तब तक हम सब जैन होने का नाटक करेंगे और बेटा तुम उनकी बेटी को बैंक संभाल लेना। किसी भी तरह एक बार विवाह हो जाने तो बाकी मैं सब देख लूँगी।
अभिमन्यु - हाँ यह तो बहुत अच्छा उपाय है –
संचालक -
दृश्य - 3
(ऋषभ के परिवार का दृश्य)
ऋषभजी - सिंहेश्वरी। राहुल के ससुराल से कोई समाचार आया नहीं।
सिंहेश्वरी - हाँ, कुछ समय पहले ही बात हुई है, वह बड़ी प्रसन्न लग रही थी। कह रही थी बड़े ही पुण्यदय से मुझे बड़ा अच्छा परिवार मिला है। हम दोनों मिलकर फिर मंदिर जाते हैं, स्वाध्याय करते हैं। परिवार के सभी धार्मिक, संयमित हैं। सदस्य धार्मिक हैं।
ऋषभजी - अरे! यह जिनधर्म ही है अनमोल। क्या अब सिंह के लिये भी ऐसा ही परिवार मिल जाये, तो शीघ्र ही उसका विवाह कर देंगे।
संवाद
सिद्धि → पिताजी! जय जिनेन्द्र!
दोनों → जय-जिनेन्द्र बेटी! सदा खुश रहो।
अग्रभजी → आओ बैठो बेटी, [अस्पष्ट शब्द] हम तुम्हारे विवाह की ही सोच रहे थे। तुम्हारी बड़ी बहन की तरह तुम्हारे लिए भी सुयोग्य वर की खोज कर रहे हैं। अच्छा बताओ तुम्हें कैसा लड़का पसंद है?
सिद्धि → किंतु पापाजी मैं इस संबंध में कुछ करना चाहती हूँ।
अग्रभजी → हाँ, बेटी कहो क्या, संकोच कैसा? कहो क्या कहना है?
सिद्धि → क्षमा कीजिये पिताजी! मैंने अपने लिए जीवन साथी खोज लिया है।
दोनों → आश्चर्य है! क्या? तुमने अपने जीवन साथी खोज लिया है?
सिद्धि → हाँ पिताजी।
अग्रभजी → कौन है लड़का? कहां रहता है? क्या करता है? किस परिवार का है?
सिद्धि → अरे! शांति शांति - एक साथ इतने प्रश्न। [अस्पष्ट शब्द] पापा तुमसे कुछ पूछ रही हैं।
सिद्धि → माँ उसका नाम अभिमन्यु है।
अग्रभजी → पूरा नाम बताओ?
सिद्धि → अभिमन्यु कश्यप।
दोनों → कश्यप !!!
सिद्धि → यह कैसा नाम है? मैंने तो कभी जैनों में ऐसा नाम नहीं सुना।
अग्रभजी → और सुनोगी भी नहीं क्योंकि कश्यप तो विधर्मियों का सरनेम होता है। तुम्हारी बड़ी नियमी से विवाह करना चाहती हूँ।
सिद्धि → नहीं हम ऐसा नहीं होने देंगे। हम उसे समझाएँगे तो वह समझ जाएगी। देखो बेटा, हम तुम्हारे माता पिता होने के साथ सच्चे हितैषी भी हैं। वह लड़का तुम्हारे योग्य नहीं है, तुम उसे भूल जाओ।
सिद्धि → कैसे भूल जाऊँ माँ? हमने सारा जीवन बिताने का वादा किया है। और वह मेरे योग्य क्यों नहीं है? मैं उसे अच्छे से जानती हूँ। मैं उसी से विवाह करूँगी।
प्रसंग
अग्रभजी → ठीक है, यदि तुम अपनी हर नहीं छोड़ना चाहती हो तो मत सही, किंतु हमारा भी अंतिम निर्णय सुन लो। पूजा दिन तुम्हारा विवाह एक विधर्मी से होगा, तुम उसी दिन से, अनाथ कहलाओगी। जाओ हमारी नजरों से दूर हो जाओ। - अब हमारी एक ही पुत्री है - चाची यशोदा।
संवाद
सिद्धि → हे स्वामी! यह क्या कह रहे हो। यह तो भारी ठगी है।
अग्रभजी → हम निर्णय कर चुके हैं। हम कुछ नहीं सुनना चाहते।
सिद्धि → हे प्रभु! यह कैसी दुविधा है एक और पानी धर्म है, तो हमारी और मातृत्व का मोह।
अग्रभजी → मोह लो मेरा जिनवाणी, [अस्पष्ट शब्द] इसका स्वाध्याय करती रहना, [अस्पष्ट शब्द] शंकर में, सुख दुख में इसमें ही सरल है। करा, एक बात और, जिन धर्म का मार्ग कभी न छोड़ना।
घटनाक्रम
भजन -
विवाह के चार दिन हो चुके हैं, अब सिद्धि जैन, सिद्धि कश्यप बन चुकी है।
[सिद्धि के ससुराल का दृश्य]
आशाजी - (यह पूजा की थाली ला रही है) लो आ गई महाराणीजी आइये। बड़ी जल्दी आ गई।
सिद्धि → जय जिनेन्द्र मम्मीजी।
संवाद
आशाजी → यहाँ जयजिनेन्द्र नहीं चलेगा। तुम्हारा विवाह मेरे बेटे के साथ हुआ है। अब तुम [अस्पष्ट शब्द] की बहू हो यहाँ जय श्री कृष्णा बोलते हैं। और हाँ प्रतिदिन यहाँ की कुल देवी की पूजा करके भोग लगाती हैं, व्रत रखती हैं। ये सभी भोग लगाती।
संवाद
सिद्धि → कुल देवी की पूजा? मम्मीजी मैं तो जिनेन्द्र भगवान की ही पूजा करने की प्रतिज्ञा कर चुकी हूँ। अब अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकती। मैंने तो बचपन से ही जिन दर्शन बिना कभी भोजन नहीं किया।
संवाद
आशा → अरे कभी नहीं किया तो अब कर लो। हमारी तो सदियों से कुल परम्परा चली आ रही है, बहुएँ तो कुल देवी को भोग लगाकर ही अन्न जल ग्रहण करती हैं।
संवाद
सिद्धि → (हैरान परेशान होकर) ओह! यह कैसी परीक्षा की घड़ी है प्रभु? जिन दर्शन बिना भोजन कैसे करूँ। और बिना भोजन के कबतक जीवित रह सकूँगी। परन्तु प्रतिज्ञा भी कैसे तोडूँ। अभिमन्यु ने विवाह पूर्व तो ढेर सारे वादे किये लेकिन वे सब झूठे निकले। कहते थे हम साथ जिनधर्म में चलेंगे। पर ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा। हे भगवान! यह मैंने कैसा अक्षम्य अपराध कर डाला। आप ही कोई राह दिखाएँ। मैं विधर्मी के साथ विवाह करके कैसा पाप कर डाला। अब तो मैं अपने पिता के घर भी नहीं जा सकती।
संवाद
अभिमन्यु → अरे! मैं यह क्या सुन रहा हूँ। माँ कह रही थी कि तुमने चार दिन से कुछ नहीं खाया। क्या हो गया है तुम्हें।
संवाद
सिद्धि → मेरा तो जो होना था हो गया। जो हुआ सो हुआ, कैसे मेरी करनी का फल मिला? आपने जो हमसे वादे किये थे उनका क्या? अब आप ही बताएँ हम जैन धर्म की आराधना कैसे करें।
सिंह
छोड़ कर धर्माई कमावे? तुम जिन धर्म गुरु भी जानी हैं। सत्वर कर लो। हमारे गुरु भी जानी हैं। सत्वर है।
सिंह
तो सर्वज्ञ। कदापि नहीं हो सकते। वीतरागी और सर्वज्ञ सकते, और ये ही होते हैं। अन्य हो ही नहीं सकते। हमारे जैन गुरु किसी से झगड़े नहीं करते हैं।
पिताश्री
आप तो हमारे परम पूज्य आदरणीय हैं। आप ही बताइये कि हम हमारा पंथ कैसे छोड़ें?
(ससुर)
अरे तुम तो हमारी बेटी समान हो। हम तुमसे तुम्हारा धर्म त्यागने के लिए थोड़े ही कहते हैं। हम तो बस इतना चाहते हैं कि तुम्हारे धर्म के साथ-साथ हमारे कुल धर्म का भी सम्मान करो।
झुनीन
सेठजी - सेठजी। दुकान में मार्केटिंग होने से बहुत सारा माल जल गया - आप जल्दी चलो।
ससुर
ओह! मेरा धन कैसे नष्ट हो गया? मैं तो कब देनी अभिकर्मन की रोज प्रसन्न करता हूँ - फिर भी। चलो मैं चला हूँ।
अभिकर्मन
पिताश्री आप क्यों परेशान होते हैं? मैं चला जाता हूँ। यदि जलूम हुई तो आपको बुला लूँगा। हे कुलदेवी माँ, हमारी रक्षा करना।
आशाजी
यह सब वह के कारण ही हुआ है? कुलदेवी माँ इससे रुष्ट हो गई, ये भगवान् ने क्या हो गया।
सिंह
माताजी, पिताश्री। आप धर्म धारण करो। सब ठीक हो जायेगा। यदि आपको लगता है कि यह सब कुलदेवी ने किया तो आप ही सोचिये क्या यह ठीक है? आप लोग तो उनकी पूजा करते हैं तो फिर उन्होंने आपका नुकसान क्यों किया? मैं उनकी पूजा नहीं करती हूँ तो अरे मुझे कुछ नुकसान पहुँचाना चाहिये था। सुनिये माँ लो भी।
देवनागरी
देवता भक्तो के प्रति राग-द्वेष कर देवत्व नहीं छिनता होता है। जिन्हें सबसे प्रति समानता का भाव होता है। वह सच्चे देव अर्थात वीतरागी देव होते हैं। हे माँ परमाणुओ शास्त्र। मैं ऐसी अनेक कथाएँ हैं जिनमें बताया गया है कि जिन मुनियों पर अनेक उपसर्ग आने पर वे किसी से भी द्वेष नहीं करते। अपितु सभी को धर्म वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
(ससुर) अभिकर्मन
जी देखो भाग्यवान। बहू तो हमारी कितनी गुणी है, परिवार के सभी सदस्यों का कितना ख्याल रखती है। क्यों न हम उसे जिन मंदिर जाने की आज्ञा दे दें।
आशाजी
ठीक है। आप कहते हैं तो मैं मान लेती हूँ, किन्तु बाकी सब हठ छोड़नी पड़ेगी। सुनो बहू! तुम्हें तो हमारी परवाह है नहीं, किन्तु हम तो तुम्हारे स्वास्थ्य की चिन्ता है। आखिर तुम जिनमंदिर जा सकती हो लेकिन ध्यान रखना हमारे घर जबीकंद भी बनेंगे और रात्रि भोजन भी तेजा जी तुम्हें। मैं करना पड़ेगा।
सिंह
धन्यवाद माताजी (मन में) यह कैसी विडंबना है भगवान। और - प्रथम तो जिन मंदिर जाकर जिनेंद्र भगवान के दर्शन करके आती हूँ। फिर नया कोई उपाय सोचूँगी।
भजन
(वीतरागी देव तुम्हारे जग में - - -)
दृश्य - 4
(रात्रि भोजन का समय है। चला है। सभी परिवार जन भोजन के लिए एकत्रित हो गये हैं।)
अभिकर्मन
माँ और कितनी समय लगेगा, मुझे बड़ी जोरों की भूख लगी है।
आशाजी
बस तैयार है। भोजन। आज तो मैंने अपने हाथ से स्वादिष्ट भोजन तैयार किया है। लो बहू सबकी थाली लगा दी।
सिंह
जी माँ जी।
अभिकर्मन
जी माँ जी।
आशाजी
(थाली में देखकर) हे भगवान् यह क्या। थाली में तो जीव है।
अभिकर्मन
जी माँ जी।
आशाजी
हाँ माँ इसमें कोई जीव है। माँ, यह कैसे हो गया? मैंने तो लाडर जलकर देव-गोथ भोजन बनाया था। फिर इसमें कोई जीव कैसे आ गया।
अभिकर्मन
अब तो हम भूख ही नहीं लग रही। इस आखो देखा देव लिया तो कैसे खाये।
सिंह
कोई बात नहीं पिताश्री। आज के दिन में फलाहार और इस में लीजिए। कल में आरम्भ से शोधकर भोजन बनायेंगे।
अभिकर्मन
सिंह। क्या तुम इसलिये ही रात्रि में भोजन नहीं करती हो?
सिंह
हाँ समस्त पूर्व को भोजन करने से हिंसा का होती है। क्योंकि सूर्य के प्रकाश में सूक्ष्म जीव जनप नहीं पाते। अब तो Doctor भी कहते हैं कि शाम का भोजन समय में कर लेना चाहिये अन्यथा हृदयरोग आदि अनेक रोग होने की आशंका रहती है।
अभिकर्मन
जी बेटी यह तो तुम ठीक कहती हो। मैंने तो कभी Doctor ने भी मुझे सलाह दी थी पर मैं ध्यान नहीं रहा था। अब से मैं तुम्हारे साथ में ही भोजन करता हूँ।
आशाजी
ठीक है। अब आप दिन में भोजन करेंगे तो मैं दिन में ही बनाया करूँगी।
संचालक
बहरानी की
अभिकर्मन जी
(अखबार पढ़ते हुए) अरे सुनती हो। देखो अखबार में प्राकृतिक चिकित्सा के बारे में आया है। उसका पैराग्राफ है कि बिना side effects के इलाज कर रहे हैं। तुम चलोगी?
संचालक
हाँ।
आशाजी
हाँ मैं तो कब से इस शिविर में जाना चाहती थी।
संवाद
संचालक:- दोनों योगा विशिष्ट तत्त्वार्थ करते आते। देखते हैं योगा प्रशिक्षु ने उन्हें क्या सलाह दी है?
आशा जी:- आज से हमारे घर में भी जमीकंद नहीं बनेगा।
अभिनन्मु:- क्यों माँ? लेकिन आलू के बिना कैसे बनेगा?
आशा जी:- जमीकंद
बेटा! इस से सदा करता है। रसोई में बताया कि ये सब जमीकंद इत्यादि खाने के लिये कितने हानिकारक है क्योंकि इनमें अन्न की गुंजाइश नहीं पहुँचती तो भोजन की उचित मात्रा नहीं मिल पाती।
सिद्धि:- मम्मी! जमीकंद खाने से स्वास्थ्य तो खराब होता ही है इसके अलावा जमीकंद खाने से अनन्त जीवों की हिंसा का पाप भी लगता है। जमीकंद में एक जीव के आश्रय से अनन्त-अनन्त निगोदिया जीव रहते हैं। तो जरा विचार करो एक आलू की टिक्की खाने से कितने अनन्त जीवों को खाया जा फिर यूँ करें कितने भावी सिंहों को चबा चबा कर खा लिया।
अभिनन्मु:- ओह! नहीं नहीं। हम तो हर चीज में ही आलू खाते हैं ये सारे जीव मर जाते होंगे।
सिद्धि:- और सुना, ये बहुत सूक्ष्म होते हैं फिर भी उनमें भी शक्तिमान से समान शक्ति ही शक्ति है। अभी आत्मा और हमारी आत्मा में कोई अन्तर नहीं है।
अभिनन्मु:- बेटा! हमारी बहू तो बड़ी होशियार है। हम व्यर्थ ही इसका विरोध कर रहे थे। इसके सभी नियम प्रतिमास की रक्षा के लिये है। हम भी जैन धर्म की अलौकिकता पर बड़ा गर्व हो रहा है। यह धर्म तो हमारा कल्याण करने वाला है जिसका हित देव शास्त्र, गुरु तो उपल नाव के समान है। स्वयं डूबेंगे ही और साथ में उनको मानने वालों को भव-भव में डुबायेंगे।
अभिनन्मु:- सत्य कहा पिताजी आपने। आलू ने हमें बड़ा अंधा कर डाला। धर्म के नाम पर कितना पाप किया जिस धर्म में हिंसा का पोषण ही वह धर्म नहीं है। अहिंसामय जैन
आशा जी:- धर्म ही सच्चा धर्म है। अब से मैं रोज प्रतिदिन जिनमंदिर जाने की प्रतिज्ञा करता हूँ।
आशा जी:- मैं भी प्रतिदिन स्वाध्याय करने की प्रतिज्ञा लेती हूँ।
बहु:- यह लो सरस्वती की चाबियाँ। तुम्हें ही इस घर को स्वर्ग तुल्य बनाना है।
सिद्धि:- हाँ हाँ माताजी धन्यवाद। मैं पूरी कोशिश करूँगी कि जैन धर्म के संस्कार सभी में रोपित हो जाये। ये जैन धर्म ही है अनमोला।
संचालक:- सही जन्म सार्थक है, जिसमें जिन धर्म का अनुसरण, जिन धर्म बिना जीवन व्यर्थ है।
स्रोत: Gyata संग्रह।
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