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दशलक्षण महापर्व 2026Dashlakshan Mahaparv 2026

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मथुरा नगरी — सूरसेन का वैराग्य

Mathura Nagari

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मथुरा मगरी

(सभी जन चोरी करने चले गए और छोटा भाई वहीं श्मशान में रुक जाता है।)

दृश्य - 2

हम पहुँच गए हैं उज्जैन नगरी - राजा वृषभध्वज की नगरी। इस नगरी में दुष्टमुष्टि नामक बलवान योद्धा रहता था। उसके पुत्र वज्रमुष्टि का विवाह मंत्री से हुआ। मंत्री और उसके पति में बहुत प्रेम था, परन्तु वह अपनी सास की सेवा नहीं करती थी।

(घर का दृश्य)

सास - हे भगवान ! मेरी तो किस्मत मारी गई, जो मेरे पुत्र की शादी उस मंत्री से हो गई। जब से आई है मेरा तो जीना हराम कर दिया है। कोई तो ऐसा उपाय हो जिससे मंत्री मर जाये जिससे मेरा पुत्र उस कुलटा से दूर हो जाये।

(वह एक सर्प को घड़े में रख देती है। थोड़ी देर बाद मंत्री का प्रवेश होता है।)

मंत्री - प्रणाम सासू माँ…

सास - हाँ प्रणाम… प्रणाम… सुन मंत्री तेरे लिए मैंने एक हार बनवाया है जो उस घड़े में रखा है। उसे निकाल कर पहन ले।

(मंत्री प्रसन्न हो कर हार निकालने लगी और उसे सर्प ने डस लिया और वह चिल्लाते हुए मूर्छित हो गई।)

सास - सेवकों…

(सेवकों का प्रवेश)

सास - सुनो… ये मंत्री सर्प के काटने से मर गई, इसलिए इसे उठा कर श्मशान में डाल आओ।

सेवक - जो आज्ञा।

(सेवक मूर्छित मंत्री को उठाकर श्मशान में डाल देते हैं। थोड़ी देर बाद वज्रमुष्टि घर आया, उसकी माँ दुखी चेहरा बना कर बैठ गई।)

दुष्टमुष्टि - कहाँ है मेरी प्रिये… (कोई उत्तर नहीं आता) क्या बात है कहाँ छुप गई? (फिर भी कोई उत्तर नहीं आता)

सास - (रोने की आवाज) अब वो कभी लौट के नहीं आएगी बेटा…

दुष्टमुष्टि - ये क्या बोलती हो माँ… ऐसा क्या हुआ?

सास - बेटा उसे सर्प ने डस लिया इससे उसने प्राण त्याग दिए और मैंने उसे श्मशान में भेज दिया।

दुष्टमुष्टि - नहीं माँ नहीं… ये नहीं हो सकता… मेरी मंत्री नहीं मर सकती। मैं उसे अभी लेकर आता हूँ…

(दुष्टमुष्टि श्मशान की तरफ दौड़ता हुआ गया)

(कैसी है रागियों की दशा..)

(श्मशान के रास्ते में उसे एक मुनिराज मिले, उन्हें वंदना करते हुए उसने कहा..)

दुष्टमुष्टि - हे मुनिराज… यदि मेरी प्राणप्रिया… मेरी मंत्री जीवित मिल जाती है तो मैं आपकी भव्य पूजा करूँगा।
(ऐसा कहकर वह मंत्री को ढूंढने चला गया)

(अहो रागियों की दशा, वे विरागियों से भी योग - सामग्री की ही इच्छा करते हैं। थोड़ा आगे जाकर उसे मंत्री मिल गई, मूर्छित मंत्री को उठाकर वह मुनिराज के समीप ले आया और ऋद्धिधारी मुनिराज के प्रभाव से मंत्री का विष दूर हो गया।)

दुष्टमुष्टि - मंत्री… तुम ठीक हो…

मंत्री - हाँ… अब मैं ठीक हूँ।

दुष्टमुष्टि - हे मुनिवर, आप धन्य है… आपके प्रभाव से मेरी पत्नी जीवित हो गई। सुनो मंत्री मैं मुनिराज के पूजन के लिए सामग्री लेकर आता हूँ। जब तक मैं न आऊँ, तब तक तुम यहीं मुनिराज के चरणों के समीप ही रहना।

मंत्री - ठीक है… जैसा आप कहें।

(दुष्टमुष्टि चला गया। उसी श्मशान में एक कोने में बैठा हुआ सातवाँ भाई - सूरसेन ने सब देख रहा था। उसके मन में क्या विकल्प आते हैं… देखते हैं..)

सूरसेन - अद्भुत प्रेम है, इस दुष्टमुष्टि का अपनी पत्नी के प्रति। लेकिन क्या इसकी पत्नी भी इसको इतना ही प्रेम करती है? चलो देखा जाए…

(ऐसा विचार कर वह अपने स्थान से उठकर मंत्री के समीप चला गया। प्रथम तो मंत्री उसे देखकर चौंक गई, फिर दोनों सहन होकर बात करने लगे)

मंत्री - आप कौन हैं?

सूरसेन - मैं मथुरा के सेठ भानु का पुत्र सूरसेन हूँ। यहाँ से गुजरते हुए मैंने आपको यहाँ अकेले देखा इसलिए आपसे मिलने चला आया।

मंत्री - (मन ही मन में) कितना सुन्दर रूप है इसका… काश मेरा पति ऐसा सुन्दर रूप वाला होता।

सूरसेन - क्या सोच रही हो…

मंत्री - (मुस्कुराकर) सोच रही हूँ की मुझे तुम्हारे जैसा सुन्दर पति मिलता तो मेरी किस्मत ही और होती?

सूरसेन - (हँसते हुए) मेरे मन में कुछ यही विकल्प आ रहा था, परन्तु तुम्हारे पति के बल को देख कर मेरी इतनी हिम्मत नहीं हुई की तुमसे प्रेमभाव व्यक्त करूँ।

मंत्री - हे देव कृपा कर मुझे अंगीकार करो…

सूरसेन - हे देवी… तेरा पति बलवान थोड़ा है, इस कारण मैं उससे डरता हूँ।

मंत्री - हे नाथ… तुम भय मत करो… मैं अपनी तलवार से उसे मार दूँगी…

सूरसेन - ठीक है… यदि तुम अपने पति को मार दोगी तो मैं तुम्हें स्वीकार कर लूँगा।

(ऐसा कहकर सूरसेन छुप गया और दुष्टमुष्टि के आने का इन्तजार करने लगे। थोड़ी देर में दुष्टमुष्टि लौट आया और आकर पूजन सामग्री लगाने लगा। तभी पीछे से मंत्री तलवार उठाकर उसे मारने को तैयार हुई और उसी समय छिपे हुए सूरसेन ने मंत्री का हाथ पकड़ कर दुष्टमुष्टि को बचा लिया और वापिस छिप गया। मंत्री अपना दोष छिपाने के लिए जोषित बुद्धिमता का नाटक करने लगी।)

दुष्टमुष्टि - मंत्री… मंत्री… क्या हुआ तुम्हें…

(वह मंगी को उठाकर घर की ओर ले गया। सूरसेन सामने आया)
सूरसेन - अरे रे… विचित्र है जगत के प्राणियों की दशा…
(उसी समय बाकी भाई जो चोरी करने गए थे, वे लौट आये ।)
पहला भाई – आज तो बहुत माल हाथ लगा…
दूसरा भाई – हाँ भाई.. आज तो मजा आ गया..
तीसरा भाई - अरे अपना छोटा भाई कहाँ है?
सूरसेन – मैं यहीं हूँ भाई…
चौथा भाई – क्या बात है तु इतना उदास क्यों है?
सूरसेन – भाई… मैंने आज संसार का सही स्वरुप देख लिया है।
पाँचवा भाई – अरे भाई… तुम्हे ये अचानक क्या हो गया… सही से बताओ क्या हुआ?
(सूरसेन ने सारी घटना अपने भाइयों को बताई)
छठा भाई - अरे रे… धिक्कार है इस जगत की स्वार्थ वृत्ति को… भाई तुम अब क्या करने वाले हो?
सूरसेन – भाई मैं तो अब इस संसार को छोड़ कर मुनिदशा लेने वाला हूँ…
पहला भाई - भाई… तुम्हारा निर्णय बहुत उत्तम है… मैं भी तुम्हारे साथ ही इस मार्ग पर चलूँगा।
सभी जन - हाँ हाँ मैं भी… हम भी…
(और सभी ने सारा सामान वही छोड़कर मुनिराज के सम्मुख मुनिदीक्षा देने का निवेदन किया)


स्रोत · Source: forum.jinswara.com — अनुमति सहित, साभार · shared with permission and thanks.

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