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नाटक स्क्रिप्ट · Play script

मणिभद्र नाटक

Manibhadra Natak

रचयिता Author: पंडित कुंजबिहारीलाल जैन शास्त्री “वत्सल” · ~54 min पढ़ने में

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यह पुस्तक के स्कैन से लिया गया अंश है, अभी प्रूफ़ नहीं हुआ — कुछ शब्द अशुद्ध हो सकते हैं। पूरा नाटक मूल PDF में पढ़ें।An excerpt taken from a scan of the book, not yet proof-read — some words may be wrong. Read the full play in the original PDF.

नाटकके पात्र !

प्रभाचन्द्र … सुभद्र सेठका पुत्र कर्मकार … मणिभद्रका मुनीम दिनेश … मणिभद्रका मित्र यमदंड … अनूह हिलकाका नोकर ज्ञानचंद … ब्रह्मचारी कालिया … मिस्तर (म०)

कुरा … निहत्तर अठ, वकील, पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट, तिवारी, दारोगा और मुकादमदार आदि।

नाटककी पात्रायें !

चन्द्रप्रभा … मणिभद्रकी स्त्री अनंततिलका … चेष्टा रूपतिलका … अन’नतिलकाकी लडडी शुभाभद्रा … मणिभद्रकी मा निपुणा … बुढी और परियां प्रथमांक

( पार्विका मंगल गान करके लिये जाना )

परियां — श्री अजित जिनवरा, सन कृप लयकरा, आज काज साधि विघ्न नाशि मनहरा ॥ टेक ॥

आज खुशीका समय तुमह दु’दर सुखदपदके जिनराज ।

मोद बढाऊँ हर्ष मनाऊँ गाऊँ गुण रूप हे महाराज ॥

मोद मन भरा ॥ श्री, अजित जिनवरा० ॥

शील शिरोमणि हे दुनिमामें अबतो यशपाया तुम भाल ।

छ्यसन सभी दुखवाई जगाऊँ, उन्हें भगा साधा निजकाल ॥

स्वच्छ गुणधरा ॥ श्री अजित जिनवरा० ॥

सम्यग्ज्ञान चारित्र पूज्य उनको तुम पाय हुये सिरताज ।

मिथ्या चारित्रादि हेय लखि छोडि दिये वैभाविक साज ॥

श्रलि धनधरा ॥ श्री अजित जिनवरा० ॥

कुशील नाशक नाटक खेलों हम्म तुमह द’र दु’रबधाय ।

सुनकर नर नारी तुम छोडो 'कु’जन भारी कुस दाष ॥

ज्ञान उजधरा ॥ श्री अजित जिनवरा० ॥

( गाते गाते परियोंका चला जाना )

शृंगारिक नाटक।

अंक पहिला-सीन पहिला।

स्थान — सेठ सघिभद्रका महल।

( सघिभद्र स्वाध्याय कर रहा है, सामने उसकी स्त्री चन्द्रप्रभा शृंगार किये हाथमें ताम्बूलारि सामग्री लिये खड़ी है )

चन्द्रप्रभा(स्वगत) क्या करूँ ? साधी तो कुछ देखते ही नहीं, रात्रि दिन शास्त्रस्वाध्यायमें ही लगे रहते हैं। सिवाय पुस्तकके यापर पलटनेके दूसरा तो ज्ञान ही नहीं है। (प्रगट स्वामीकी तरफ) हे स्वामिन् ! कहिये। क्या आज्ञा है ? दासी आपके सामने खड़ी है।

सघिभद्र(ऊपरको निगाह उठाकर) अये। तुझे क्या चाहिये ?

चन्द्रप्रभा(शरीरको आकृति दिखाकर)

प्राण [ मैं क्या चाहती हूँ, आप क्या नहिं जानते।

कपरी रंग. ढंगसे बधा बदन वर्द्धि पहिचानले ॥

पिया कभी कोर्से 'पता सखी दरद दिलका फनी।

हो रहा की कह मोरी मदन-मर्मनका अभी ॥

क्या मेरी शरीरकी वेखा आप नहीं देख रहे हो ?

सघिभद्र — क्या तेरे शरीरमें कुछ वेदना है ?

चन्द्रप्रभा — हाँ नाथ ! वेदना है। क्या आप मेरी इस वेदनाको नहीं मिटावेंगे ?

सघिभद्र — सारे जीवोंको सतत्‌ली वेदना दुःखदायिनी।

क्या कमोखी बात ये है प्रगट दीखे कामिनी ॥

शास्त्रके सुनने — सुनानेसे सभी सुख नाश हो।

वेदना रहित होकर सिद्धपदका प्राप्त हो ॥

तुम शास्त्रअध्ययन करो, इसी शास्त्रस्वाध्यायसे तुम्हारी सारी वेदना दूर हो जायगी।

चन्द्रप्रभा — नाथ ! तुम्हारी बातका उत्तर मुझे सूझै नहीं।

किस कर्मका है बंध यह समझमें आता नहीं ॥

है पहा आश्चर्य यह सबसे कहा जाता नहीं।

क्या करू कुछ कर्ममें जो मन मेरा लगता नहीं।

क्या करू ! कर्मोदय अनिवार्य है।

सघिभद्र — किस कर्मका उदय कहती यश तुझे मालूम नहीं।

कर्म क्षयोदय उदय है, ये तुझे मालूम नहीं ॥

शास्त्रकी बाता नहीं तू इसीसे मालूम नहीं ॥

शास्त्रका स्वाध्याय करके दुःख क्यों मेटे नहीं।

आज कई दिनोंसे ही क्यों, अनादिकालसे ही इस जीवकी ऐसी दशा को नहीं है। क्या तू नहीं जानती ? यदि तेरी इच्छा हो तो बताऊँ कि इस कर्मोदयने संसारी जीवकी क्या दशा होती है।

चन्द्रप्रभा — क्या नाथ ! शास्त्रस्वाध्यायके अतिरिक्त मेरी वेदना मिटानेका कोई दूसरा उपाय नहीं ? क्या आप समयकाल -दशर भी मेरी वेदनाकी नहीं मेट सकते ? क्या मुझ यह दुख 'आजन्म सहन करना होगा ? क्या मुझ, दुखियाकी तरफ मणिश्रेष्ठ नारद ।

कायरता चित्त में आयेगा ? सावधान ! मेरा दुख देखनेकी आपको सामर्थ्य है ।

मणिश्रेष्ठ — यद्यपि स्त्री है, सुन्दर, यह दण्ड देने योग्य है; मैं, सम्बोधन से नहीं हँ, मगर किसी धर्मका समर्थन भी माननेसे कोई विशेष आपत्ति नहीं है । अच्छा, तू बैठ, मैं ऐसे बेखबर बैठनेका उपाय करता हूँ ।

चन्द्रप्रभा — सामने बैठ जाती है और अनेक हाथ भाव प्रगट आदि दिखाती है । प्राणनाथ ! …

मणिश्रेष्ठ — बात काट कर । यह क्या ! तू शरीर ऐसा बेकाबू क्यों कर रही है ? मेरे नेत्र ऐसे चलायमान क्यों दीख पड़ते हैं ? क्या इस तरह अपशब्दोंसे क्यों रोती है ?

चन्द्रप्रभा — शरीरको ठीक करके । नहीं स्वामी ! यह शरीर ऐसे ही तो चला रहेगा, वैद्यकका प्रयोग अनिवार्य है । कीजिये, एक बारमें ! पागलका पीड़ा देती है ।

मणिश्रेष्ठ — शास्त्र स्वाध्यायके समय क्या यह चीज स्वामी चाहिये ।

चन्द्रप्रभा — लज्जा । क्या इसका स्वरूप हँस दे । रुचिके दल भेदाका समय है, इस वक्त तुमिरमें आनन्द एक रही है । अपभ्रंश ! काम मुझे समयसे १ बहुत दिन हो गये लेकिन इनका व्यवहार इससे अभी तक नहीं घटाया ! क्या कहूँ मेरा साथ अगर विफल जाता है । अवश्य ही मेरे कोई प्रबलधर्मका उदय है, अन्यथा ऐसी दशा आज क्यों होती, न मालूम इसका ऐसा वेग मणिश्रेष्ठ ।

कब सफल रहेगा । प्रगट तेजकी तरफ इशारा करके । आहा-हा ! बलिये, अन्दर तेज सवार है, आराम कीजिये और मेरी प्रतीक्षाप्रभाको भी पूरी कीजिये मुझे आप कितने दिनोंसे भुजंग रहे हैं । नाथ ! मेरी तरफ नहीं देखते कि आपकी आत्मीयताकी क्या दशा हो रही है । मैं अपने निजी दुःखकी कहाँ तक कहूँ । आप डाँटिये और जलिये, मुझे क्यों विशेष तरसाते हो ?

मणिश्रेष्ठ — क्यों ? आजो तो संन्यासी हुई है ? देखो, जरा स्वाध्याय छोड़कर मैं वाद सुनने चलूँगा । फिर स्वाध्याय करने लगता है ।

चन्द्रप्रभा — लज्जित । अर्द्ध रात्रिके समय भी साँझ इनका आलसी हाथ रहे । दुष्कर्म ! तब गति समयमें नहीं सादती । दुख प्रिया, सुखकी तुझे कुछ खबर भी आता नहीं । निद्रित होते हुए किसीने दुःख क्या पाया नहीं ।

क्या कहूँ ? स्वामी तो मेरी चेष्टाओंमें असली बात समझते नहीं और मैं भी इससे साफ २ किन शब्दोंमें कहूँ, किन शब्दोंमें मैं कहती हूँ तब शब्दोंका ये अर्थ भी दूसरा लगा लेते हैं । मैं बड़ी दरिद्रजान हूँ । देखो, स्त्रीकी लज्जा भी कितनी बलिष्ठ है, जो अपने पतिसे साफ साफ कहनेमें हिचकती है । तो क्या अब मैं निर्लज्ज होकर ही सब बातें इनसे कह दूँ मगर इन्होंने फिर भी कहीं “छो भवाधि” लगाकर उसका अर्थ बहुत दिन तब मैं क्या कहूँगी । तथापि कहूँ तो सही, देखूँ । तब अन्तिम उपायका भी क्या असर होता है ? प्रकट–लाजमोडे । धिक्कार !, शक्ति बहुत हो गई है । इस समय सारी दुनियामें आराम कर रही है, सनिग्रह नाटक ।

मृगिभट्ट — आप भी चलें और मुझ संतप्तहृदयको अपने अपूर्व प्रेमामृतसे शीतल करें। नाथ ! यह आरम्भ करमेका समय है।

मृगिभट्ट — तो यहाँ चलकर ही क्या होगा। मैं तुम्हें यहाँपर पेना उपदेशामृत पिलाऊँगा जिससे तेरा जलता हुआ हृदय शीतल हो जायगा। उसके सुननेसे तुझे यह आनन्द प्राप्त होगा जो वचनोंके अगोचर है। कदा समुख शांति अधिक हो गई है। महीमे क्या दशा है?

चन्द्रप्रभा(स्वगत) मैं तो प्रथम ही जानती थी कि इसका भी ये व्यर्थ बदल देंगे, वही हुआ। अबतु ! तीन कलोड़यके समान सारे प्रयत्न निष्फल हो जाते हैं। (प्रगट, स्वामीसे) हाँ नाथ ! रात्रि बहुत हो गई है, पक्षीभी ग्वरदले ऊपर सो गया है, देखिये (घड़ी दिखाती है)

मृगिभट्ट — क्याकहने ऊपर हो गया ! तब चलो, आखिर तो तुम्हारी बात माननी ही पड़ी (दोनों उठकर चल देते हैं, मृगि- भट्ट सेज पर सो जाता है और चन्द्रप्रभा सामने खड़ी रहती है)

मृगिभट्ट(सेजपर पड़ा पड़ा) तुम भी आराम करो और यदि इच्छा हो तो धर्मोपदेश सुनो। क्या शास्त्र सुननेकी अभिलाषा है?

चन्द्रप्रभा — नहीं नाथ ! नींद नहीं आती?

मृगिभट्ट — क्यों?

चन्द्रप्रभा — मालूम नहीं। जो उठ रहा है, मनमें कई प्रकारके संतर जाल पड़ रहे हैं, मेरा चित्त उचट गया है। नाथ !

प्रबोध मेरा चित्त कोई काम करनेमें नहीं लगता। क्या करूँ? जिसका बहुत समावती है मगर हाथसे निकल ही जाता है।

मृगिभट्ट(देखकर) क्या कहा? जी डर रहा है, सो तो ठीक ही है, जो सभी संसारी जीवोंका उड़ता रहता है। इस मनका चल विचल होना ही तो दुःख है। तथापि यह संछठ मन क्षणिकभी लाखोंसे बंधा ना सकता है। क्या स्वाध्याय करूँ? सुनूँ और उपदेश सुनाऊँ। मैं ठीक कहता हूँ कि तेरा चित्त शांत शांत्भाव करने या सुननेके ठीक दिशामें पर जा जायगा और शास्त्रतत्त्वसे इतनी रुचि बढ़ जायगी कि चित्त फिर कहीं भी चलायमान न होगा। यदि उपदेश सुनवा हो तो बैठ आ और सुन।

चन्द्रप्रभा — सुखिया उपदेश, स्वामी। अब नहीं डरकार है।

करो तुम आराम मेरा कर्म ही करतार है।

प्राण मेरा है नहीं कुछ गर्द मेरा अधिकार है।

कर्म अजबक डरावये है तब ललक ग्वार है।

मेरा ऐसा भाग्य कहाँ है जो आत्मतत्त्वका विचार कर सकूँ? आप लेट आवें।

मृगिभट्ट — तब तू क्यों खड़ी है? तू भी लेट जा और आराम कर, इस तरह खड़े रहनेमें क्या लाभ होगा?

चन्द्रप्रभा — प्राणेश्वर ! मैं भी पड़ रहूँगी, आप आराम कीजिये (मृगिभट्ट लेट जाता है। चन्द्रप्रभा बैठकर मृगिभट्टके पग दावती है और यह थोड़ी ही देरमें सो जाता है मगर चन्द्रप्रभा को नींद नहीं आती यह बात पहिले ही बोला है)

मञ्जिमद नाटक।

माना चंद्रप्रभाका।

मेरा सइयाँ बिरस रस मयाँ जुवन हुलसयाँ तरस रहों जान।

काहे सइयाँ सुके तरसयों मैं बहु कलहयाँ न उठती जवान ॥टिका॥

शर — अधम देरे से ये दुःख सहा ही नहिं जावा।

मेरा दिल उमग उमग कोपन से भर आता ॥

किसको दिखाऊँ दरद कहने में नहिं आता।

क्यों दुख दिखाय मुझे कर्म आज तरसावा ॥

हाय ! सइयाँ पड़ी दुख पइयाँ मैं बहु तड़फइयाँ तुमड़ नहिं ध्यान ॥

मेरा सइयाँ० ॥ १ ॥

बैर — तड़फ तड़फ रात्रि दिन को सु बिताती हूं मैं।

बहुत दिनसे अब बळफ मेंय दिखाती हूं मैं ॥

विरह आगि में निज दिलको जलाती हूं मैं।

अध — सेरी से कुछ नहिं पेस पाती हूं मैं ॥

क्या करू सइयाँ पड़ी विपत्तियाँ जुवन मुरझयाँ निकन रही जान ॥ मेरा सइयाँ० ॥ २ ॥

( चन्द्रप्रभा काहूट पाकर गाना बंध कर देती है, अपने सामने बाहु गुणभद्रको बेल लज्जित हो मुख नीचा कर लेती है )

गुणभद्रा( देखे तु लखे ) क्या वह आज आज्ञा नहीं करती ?

राजिके, बारह वर्ष तक तू यो ही बेठो रहती है। सो जा मेरी, रात बहुत हो गई है।

प्रथमंक।

रंगमंच

चन्द्रप्रभा( नप्रतासे ) ओ सासू जी। सो रहूँगी, आप क्यों तकलीफ उठाती हैं ! मुझे नींद नहीं आती ऐसी बाते पेडो ह।

गुणभद्रा( क्रोध खो-कर )

क्या कहूँ बेटी तेरी मैं है दशा बहु दुख भरी।

देखकर तेरी कपला अस्वती छाती भरी ॥

कांखसे बाळू बरसते दुख सहा आता नहीं।

क्या कहूँ बेटी मेरी कुछ अब मेरा चलता नहीं ॥

ना जा बेटी। तू समझदार होकर ऐसा क्या करती है

( स्वगत ) क्या करे व भी विचारी दुःख भारी सह रही।

पांच वर्षोसे कभी एक दिन सुखारी नहीं रही ॥

दुःख जो हमको सतावे ज्ञान का खटका उडे।

वेदना है भीतरी उसको दिखावे ये किसे।

क्या कहूँ, मैं खुद परेशान हूं, मगर इसे कोई भी शिक्षा नहीं देतादी। ( प्रगट ) मैं कल एक और उपाय करूंगी। देखूं उसका इसके ऊपर क्या असर पडता है। देख मत करे, क्या दुःखके दिन हमेशा थोडे ही रहते हैं।

चन्द्रप्रभा — आओ सासू जी ! आराम करो, मैं सो रहती हूं’।

थोडी कमी २ तक देती हूं’ मेरे इस वचने पर आप खयाल न किया करे’। कमी फल भोज्य है उसे कौन निवारण कर सकता है। ( सुनकर गुणभद्रा विशेष नहीं ठहरती वह बांओसे अंधेरेपात करती चली जाती है। चन्द्रप्रभा भी पल तरफ सो रहती है )

( यवनिका पतन )

गणिका नाटक ।

( नाचने या गानेवालीश। प्रवेश करके बाहर स्टेज पर )

( तेरी उछलत है श्री नृसिंह )

जो बड़ी व्यवहार माने घर की रीती न जाने उसको करदूत सारी हया हो जाय ॥

याते कर्तव्य जानो अपनों न न तालो देखो दुनियां को हाजत यहां तुम साथ ॥ टेक ॥

हंसत सागर की धीर रखले मच्छों से बेर कैसे होंगी सुखारी अगनारी बु भाव ॥ १ ॥ पहिले सबको पिछानी पीछे प्राम में आनी चाहो तो होंगे दुखारी समय को पाय ॥ २ ॥ घर को चिढ़वा न भाई तप की रोवो न जाई ऐसे लोगों की फिरता न स्थिरता अधाय ॥ ३ ॥ यारो जैसा नी रंग करो जैसा ही ढंग कही यारो कहै ‘कुंज’ मौका मिलाय ॥ ४ ॥

( गानेवालीका गति १ चले जाना । )

अंक पहिला-सीन दूसरा ।

स्थान — अनंगतिलका वेश्याका मकान ।

अनंगतिलका अपनी परम सुंदरी कुपत्तिलका कहलेंको पाला जोर वशीकरण आदि प्रयोग सिखा रही है ।

अनंगतिलका( कुपत्तिलका से ) बेटी ! सीधे बैठ और अपना । पेषा है सबको शिक्षा प्राप्त कर ( बतलादेवे ) अजी उस्ताद प्रसंगक ।

जी ! इसे अच्छी तरह विद्यादेना, गानमें हावभाव और नखशिखामें कमी न रखियेगा ।

उस्ताद — देखा हो होगा आपकी इस लड़कीको मैं हरएक विषयमें अद्वितीय कर दू गा, किसी भी प्रकार कसर न रखूंगा ।

अनंग० — मैं यावत् विद्या करा कहूँ, यह आप हीकी लड़की है आप जैसा आप सिखादेंगेगा ।

उस्ताद — आप क्यों फिक्र करती है । मैं इस आपकी लड़कीको चउर रोगोंमें ही पेला दंगा जिसर समान दूसरी न मिलेंगी ।

अनंग० — मुझे भी ऐसी ही उम्मीद है ( कुपत्तिलकासे ) सीधे बैठ और उस्तादको संगी करके विद्या सीख ।

उस्ताद( कुपत्तिलकाके ठीक बैठ जाने पर ) मेरे सामने देख और मैं जैसे बोलू तू भी वैसे ही बोल । हाँ फड़, सा, रे, ग, म, प, ध, नी, सा ( कुपत्तिलका देखा ही कहती है )

नि, ध, प, म, ग, रे, सा ( कुपत्तिलका भी यही कहती है )

सारेग, रेगम, गमप, मपध, पधनी, धनीसा ।

( कुपत्तिलका भी यही बोलती है )

सातिध, निधप, धपम, पमग, मगरे, गरेसा,

( कुछ० भी कहती है )

वारी जाऊं रे सांवरिया तुम पर वारना रे ॥

( कुछ० भी इसी प्रकार कहती है )

झारना रे, तुम पर वारना रे, वारी जाऊं रे सांवरिया तुम पर वारना रे । ( लड़की भी० )

भूमिका नाटक।

तन मन धन सब तुम पर वारूँ। (लड़की भी०)

घर घर अब सब तुम पर जाऊँ। (लड़की यही बोलती है)

कब तक लालित अबकर बसर मारमा रे, खसर मारमा रे, अंतर मारमा रे, वारी जाऊँ रे सांवरिया तुम पर वारमा रे ५

(लड़की भी यही बोलती है)

उस्ताद(अलग तिलमिलाते ) लीजिये सुनाब। आपको लड़की चन्द्रप्रभेने ही गाना आदि सब सीख गई, आप परीक्षा करके देख लीजिये।

अंगप्रवि० — (आश्चर्य में चमचमाव देवी ह और आपकी बुद्धि एवं कार्यकुशलता पर कुरबान होती है, क्योंकि आपने इसे अल्पसमय में ही इतना होशियार कर दिया। अच्छा एकाद गाना और इससे गवाइये।

उस्ताद(पुष्पमिलाते ) एक अच्छा गाना गाओ और अपने हुनरका दिखाओ।

पुष्पवि०(दोह बैठकर) गाना गाता है।

प्रभु तुम्हारी भक्ति में दिल आज मेरा लग गया।

मेरी सूरत देखते ही अब अँधेरा मिट गया ॥ टेक ॥

ज्ञान का दीपक जला अब मोह सारा मिट गया।

सुन तेरा उपदेश स्वामी मन निर्दोष होगया ॥ १ ॥

ज्यों ज्यों पंख खींचती ज्यों मेरा चित त्यों खिंचगया।

जब की ये सारी दशा लखि मन हमारा फट गया ॥२॥

प्रेम तेरा ही अटूट है जिसके दिल में लग गया।

वह हमेशा के लिये तुम रूप शंकर होगया ॥ ३ ॥

भूमिका।

अंगप्रवि०(उस्तादसे) बहुत खूब, मैं आपके हुनरकी बहुत तारीफ करती हूँ, लीजिये इस तुच्छ भेंटको स्वीकार कीजिये

(उस्तादके हाथमें नोट देती है और वह उसे अन्दर कर दबा जाता है)

अंगप्रवि०(उस्तादके जाने बाद पुष्पमिलासे ) माता तो तू सोलह गई अब मनुष्यको जन्ममें कर्मोंकी विद्या और सीख ले।

देख। चाहे हुए मनुष्य पर ऐसा ज्ञान दिखाना चाहिये और उससे इस प्रकार बर्ताव करना चाहिये कि वह हँस जाय याभी प्रेममें फँस जाय।

पुष्पवि० — हां मां। मैं ये सब जानती हूं, मैंने रोज वही देखा है।

“भूखोंके आगे वित्त ही खोदते हैं” हमको विशेष शिक्षा देने की जरूरत नहीं है।

अंगप्रवि०(गुस्सा होकर) शाबाश बेटी! ऐसा ही चाहिये…

(आंखें फाड़कर कहना सब कर देती है। कर्मकारका प्रवेश)

कर्मकार(गुणभद्रका भेजा हुआ, भद्रकके बाद) ये वेश्याओंमें श्रेष्ठ धर्मविज्ञिका! आप हम तेरे हाथमें एक सोनेकी मुद्रिका देने आये हैं। अब देखना चाहिये कि तू उसे अपने हाथों से इस प्रकार रंग लेती है।

अंगप्रवि० — बैठी भाई। क्या बात है? जरा साफ साफ कह आजो जिससे मुझे यथार्थ घटना मालूम हो।

कर्मकार(बैठकर) यहां एक सेठ मन्दिभद्र। बड़ा धनवान है मगर ग्राम्यभावस विशेष होनेसे विषयोंसे सर्वथा विरक्त है।

उसकी माँ का उद्देश्य उसे चिपवाकुरानी बनाना है, सो उसे फैलाओ और अपना काम भी चलाओ। घर बैठे ही अमीर हो जाओगे।

प्रसंगगतिः — क्या यह सेठ हमारे घर पर आ सकेगा या वहाँ आकर कुछ करना प्रबंध करना पड़ेगा।

कर्मकारः — जो हो यह क्या चलेगा मगर छानेकी तरकीब की जायगी। हम उसे आरंमद्वार पर कर आयेंगे, बादु ठीक ठाक करना आपका काम है।

प्रसंगगतिः — अच्छा आदरे, उसको यहाँ आने पर ही सब ठीक कर लिया रूचगा।

कर्मकारः — हम उसको आपसे पास ले आते हैं।

( कहकर कर्मकार चला जाता है )

दवनिका पतन।

अंक पहिला-सीन तीसरा।

स्थान — सेठ मणिभद्रका मकान।

मणिभद्र और कर्मकारका सदा विलाप पहला।

कर्मकार( मणिभद्रसे ) शहरमें एक बड़े भारी महात्मा आये हुए हैं, वे अनेक शास्त्रोंके जानकार हैं, उनके दर्शनके लिये सभी लोग जा रहे हैं, आपको भी उनके दर्शनार्थ अवश्य चलना चाहिये।

प्रसंगगतिः

मणिभद्रः — वे महात्मा कहाँ पर ठहरे हुए हैं ? क्या तुमने सब देखा है ?

कर्मकारः — हाँ तो पास ही की धर्मशालामें ठहरे हुये हैं उनके ज्ञानकी प्रशंसा सब लोग कर रहे हैं। जिससे सुनिये वही तारीफ करता है। ऐसा कोई भी पुरुष नहीं जो उनके दर्शनकर अपनेको धन्य नहीं समझता हो।

मणिभद्रः — तब तो उस ऐसे महात्माका दर्शन करना चाहिये और उनके उपदेशामृतका पान करना चाहिये। क्या अभी चले ?

कर्मकारः — हाँ. यही समय उपयुक्त है। बादमें जानेसे उनसे मुलाकात न हो सकेगी।

मणिभद्रः — चलो मैं अभी अनेकों तयार हूँ ( ज्योड़ी मजिस्ट्रात जाता है ज्योड़ी उसका मित्र दिनेश आ जाता है )

दिनेशः( मणिभद्रको कहीं जाता हुआ देखकर ) मित्र ! इस समय आप कहाँ जा रहे हैं, आपको घरसे बाहर कभी निकलने की न थी, अब क्या बात है ?

मणिभद्रः — अरे मैं एक बड़े भारी योगमें आये हुए हैं, मैं उन्हींके दर्शन करने जा रहा हूँ। अच्छा हुआ तुम भी ठीक मौके पर आ गये, नहीं तो मुझे खुद खुड़के यहाँ जाना पड़ता। चलिये आप भी साथ साथ चलिये।

दिनेशः — तुमने तो किसी महात्माके आनेकी नहीं सुनी है, अब क्या यह बात कैसे मालूम हुई।

मणिसिद्ध नाटक प्रस्तावना

मणिसिद्ध — ये हो कर्मकार कह रहे हैं कि वे यहाँ पास ही की धर्मशालाममें ठहरे हुए हैं, बड़े सन्त पर्व विद्वान् हैं।

कर्मकार(विशेषले इशारेय कर) अजी आपको यही मालूम है, वे जल्दी देही आते हैं (पास जाकर दिनेयके कुछ कानमें कह देता है)

दिनेय(यथार्थ बात जानकर) अभी आये होंगे; मैं आज कार्यवश बाहर चला गया था, इसीसे वे समाचार सुननेमें नहीं आया। अच्छा; चलिये, मित्र मैं आपके साथ साथ ही चलता हूँ। (मणिसिद्ध अपने मित्र दिनेय और कर्मकारके साथ बात देता है। [वचनिका पतन]

अंक पहिला-सीन चौथा।

अनंगतिलका का महल।

अनंगतिलका पुष्पवाटिकासे बात चीत कर रही है। प्राचारमें दो भद्र हाथी उत्पन्न बचा रहे हैं।

कर्मकार(दोनों हाथियोंको दो तरफसे जाते देख कर) दिनेय! दिनेय! देखो सामनेसे यह हाथी हाथी सबको मारता कुदना आ रहा है। चलो, कहीं बचकर जान बचावें।

दिनेय(पीछे देख कर) हैं, देखो न, पीछेसे भी एक मदोन्मत्त गज फैला चौड़ा आ रहा है। आज क्या बात है, आन बनेगी कि “!” दोनों तरफके रास्ते बन्द हैं।

प्रस्तावना

कर्मकार — अहा संकटका समय उपस्थित है, चलो भाई! इस सामनेवाले धर्ममें चलें और अपनी जान बचावें, बाद साधुके दर्शन करेंगे।

दिनेय — ठीक है, ठीक है, बस जल्दी चलो और कोई बचनेका दूसरा उपाय नहीं है। कर्मकार और दिनेय मणिसिद्धको सामनेवाले अनंगतिलकाके मकानमें लेजाते हैं। कर्मकार अनंगतिलकाको दशहरेसे सज्जाज समाचार दिनेयसहित मणिसिद्धको नहीं छोड़ आप मौका पाकर नीचे उतर आता है।

अनंगतिलका(पुष्पमिलकासे) हगे, देवी। क्या देखती है? सामने सोनेकी सिड़िया देखा है, एकड़ती क्यों नहीं? मैं जल पीने जाती हूँ, तू इन चातुओंकी जरा खातिरदारी करना। (कहकर अनंगतिलका भी चली जाती है)

मणिसिद्ध(कुछ देर बाद कुपित० से) तुम कौन हो? क्या यही मदनाका मकान है? देखो तो सही क्या हाथियोंका उपद्रव शांत हो गया?

दिनेय(स्वगत) हा, तुमको रास्ते पर आनेवाले महात्मा ये वो हैं, जरा बेटा तो सही, मालूम हो जायगा कि—ये गुरु तुम्हारी कैसी अज्ञानमें हाथ करें।

पुष्पमति — [हाथ जोड़ कर] कृपाकर आप विराजिये, मैं अभी तुरत देख आती हूँ [जाकर थोड़ी ही देरमें फिर लौट आती है] लागी तब वे दोनों हाथी खून खराबी कर रहे हैं, न किसीको आने देते हैं और न किसीको जाने देते हैं। बड़ा भारी कोलाहल हो रहा है।

नाटक

मणिभद्र — [ उदास होकर ] मित्र दिनेश! कर्मकार कहाँ चला गया! उससे न होवे तो महात्माके दर्शन कौन करावेगा।

दिनेश — [ सस्नेह ] महात्माके दर्शन तो हो गये, अब उपदेश की बाकी है सो धीरे धीरे सुना करना [ प्रमाद, मित्रत ] क्या मैं जाकर कर्मकारको बुला लाऊँ? [ जाता है ]

मणिभद्र — [ रुककर ] नहीं मित्र, तुम मत जाओ, कर्मकार भी चला गया और तुम भी चले जाओगे तो मेरा यहाँ दिल ही कैसे लगेगा?

दिनेश — नहीं मित्र! मैं अभी आता हूँ, कर्मकार अवश्य उन्हीं महात्माके पास सूचना देने गया होगा। मैं भी उन हाथियोंका उपद्रव मिटाने जाता हूँ। मैं अभी लौट आता हूँ आप चिन्ता न करें। [ कहकर दिनेश भी चला जाता है। ]

मणिभद्र — ये मालूम पड़ा पर कब तक बैठना होगा?

पुष्पभूति — [ मणिभद्रसे ] चलिये और लक्ष हाथियोंवाले कमरेमें देखिये। मैं आपको हाथियोंका उपद्रव शांत होते ही पहुॅचा दूँगा। [ बड़ा प्रेम दिखाता है ]

मणिभद्र — अच्छा चलो, यहीं पर जब तक बैठे ये तब तक कि हाथियोंका उपद्रव शांत न होगा। पुष्पभूतिरूप मणिभद्रकी कमरेमें छिपा जाती है। मणिभद्रको सच्चे सिंहासन पर बैठाती है और आप नीचे बैठ जाती है ]

मणिभद्र — ऐसा तो सही, क्या अभी तक उन हाथियोंका उपद्रव शांत हुआ या नहीं?

प्रथमांक!

नाटक

पुष्पभूति — नहीं, जब उपद्रव शांत हो जायगा तब आपके पास खबर आ जायगी। मैंने अपने आदमियोंको यहाँ खबर लानेके लिये नियत कर दिया है कि वे उपद्रव दूर होते ही यहाँ तुरंत खबर दें।

मणिभद्र — तब ऐसे बाजी बैठनेसे चित्त नहीं लगता। देखो किस कामके लिये तो आये थे और वीचमें किस झंझटमें फँस गये।

पुष्पभूति — आप जिस कार्यके लिये आये थे, यदि उसका बताना उचित हो तो मुझके कहिये, शायद मैं उसे कर सकूँ।

मणिभद्र — क्यों नहीं! मैं अपने मित्र दिनेशके साथ तक धर्मरत्नाके दर्शन करने और उनसे तत्त्वचर्चा सुनने आया था। मगर क्या किया जाय “श्रेयसि बहु विघ्नानि” वाली नीति चरितार्थ हो ही जाती है।

पुष्पभूति — क्या हर्ज है, वह भी कार्य हो जायगा। अभी तो, जो सेवायोग्य सेवा हो उसे कहिये, मैं उसे करनेको सर्वथा तयार हूँ। क्या आपको प्यास लगी है? लीजिये और इस अमृत-समान जलको पीजिये। [ तुलसीके गिलासमें पानी देती है ]

मणिभद्र — नहीं, प्यास नहीं लगी है और यदि लगे भी तो दवा से जितना बुझेगी थोड़ी ही जल पी सकता हूँ?

पुष्पभूति — हम कोई नीच जाति नहीं हैं, आप फिक्र न करें। आपको यहाँ सभी चीजें शुद्ध मिल सकती हैं।

प्रबोध नाटक।

प्रज्ञामित्र — यथा दुष्टजनके पास शास्त्र नहीं है, मैं स्वाध्याय करना चाहता हूँ बिना शास्त्रस्वाध्यायके मेरा मन नहीं रमता है।

पुण्यमति — शास्त्र तो बहुत हैं। मगर वे मेरे दूसरे घर पर हैं, इन हाथियोंकी वजहसे रास्ता बंद है। कहिये तो मैं कुछ मुसाफ़ मातें कहूँ। बाद जैसी आपकी आज्ञा होगी शास्त्र वगैरह ला दिये जायेंगे।

प्रज्ञामित्र — क्या तुम पढ़े हुए हो ?

पुण्यमति — हाँ, मैं पढ़ी हुई हूँ और शास्त्र पढ़ने सुननेका मुझे बड़ा शौक है। यदि आपकी आज्ञा हो तो कुछ धार्मिक बातें सुनाऊँ।

प्रज्ञामित्र — कहो, तब तक तत्त्वचर्चा ही सही। कुछ समय ज्ञानचर्चा में करनेसे ही ठीक होगा।

पुण्यमति — संसारमें दो पदार्थ हैं।

प्रज्ञामित्र — कौनसे ?

पुण्यमति — एक जीव और दूसरा अजीब।

प्रज्ञामित्र — तुम कौन हो ?

पुण्यमति — हम संसारी जीव हैं।

प्रज्ञामित्र — संसारी जीव किसे कहते हैं?

पुण्यमति — जो संसारमें उत्पन्न हुये हैं, पंचेंद्रियसंज्ञी विभिन्न देहें हुए हैं, उन्हें ही संसारी जीव कहते हैं।

प्रज्ञामित्र — विषय क्या चीज है।

प्रबोध नाटक।

पुण्यमति — जो हम और आप दिन रात सेवन करते हैं उन्हींको विषय कहते हैं।

प्रज्ञामित्र — हम और आप दिन रात क्या सेवन करते रहते हैं ? खुलासा समझाओ।

पुण्यमति — अनेक जीवोंका स्वाद लेना, अनेक प्रकार सुगंधित वस्तुओंकी खुशबू लेना, मनोशावलोक श्रीकी अवलोकन करवा कर्णप्रिय मृदु। गान और मनोहर शब्दोंका सुनना तथा सरोजनेन्द्रियजनित स्त्री पुरुष द्वारा निषद्यजनित सुखकर आनन्द लेना, बस, इन्हीं सब विषयोंको हम और आप रात्रि दिवस सेवन करते हैं। बस और भी विशेष खुलासा क्या ?

प्रज्ञामित्र — ठीक है, मगर कोई २ बात हमारी समझमें नहीं पड़ती।

पुण्यमति — किये कौन सी बात आपकी समझमें नहीं आती ?

प्रज्ञामित्र — जो तुमने पीछेले कही है।

पुण्यमति — मुसिका कर अच्छा, अब भी समझमें आवेगी येषा आपको। और भी कुछ बातें सुनाऊँ ? मैं बड़ी कहना चाहती हूँ जो आपको रुचिकर हो। मैं प०प०को बड़ी लोगपायंती समझती हूँ जो आपका मुझे संबंध प्राप्त हुआ है। सच कहती हूँ मुझे आपके पेलनेहीसे इतना प्रेम हो गया है कि जिसका बयान किया नहीं कर सकती।

प्रज्ञामित्र — और वही दशा मेरी भी हो रही है। न मालूम तुम्हारी वचनावलीसे मेरा मन ऐसा स्थिर क्यों कर दिया है कि दशमस्कन्ध नाटक।

बढ़ कर दूसरी जगह आता ही नहीं। मैं कुछ नहीं कह सकता हूं कि यह किसका चमत्कार है।

दिनेश — एक तरफ़ हुरा ६, स्वगत ] क्या करूँ , यहाँ तो चतुर्दिकरणके समान जल्दी जल्दी कुछ प्रकाशसे देखा परेगा ! और यहाँ पर ये सुजनुखें बढ़ रहे हैं ! ठीक है यदि यह पड़ापर फँस जाय तो मैं भी उधर लगे रहूँ। इससे मुझे कुछ और इस अलौकिक घटनाकी खोज।

पुष्पगति — इसमें अवश्य कोई न कोई पराक्रमका सम्बन्ध है, बिना बलके किसीका भी हृदय ऐसे विचलित नहीं हो सकता।

मृशिभद्र — ठीक कहती हो, शास्त्रमें भी ऐसे कर्म इच्छासे देखतेमें आते हैं जो पूर्व भवके मेनाधिपत्यसे रहते हैं ! यही वजह है कि मेरा दिल तुम्हारेमें अनुरक्त हो गया है।

पुष्पगति — ठीक है। क्या आप अकाद गाथा सुनेंगे ?

मृशिभद्र — [ मैं मयूर्ख ] सुनाओ न, तुम्हारा वचन मुझे बहुत प्यारा लगता है।

पुष्पगति — अच्छा, सुनिये। [ गाथा गाती है ] जामो की लागी मुझ नादानको घुलसने आगे ॥ टेकना।

झुकेको बहकाने आगे, दिलको चुराने आगे, नैननसे नैन मिलाये, सैननमें सैन चलाये।

मुरे नादान, निनकी नादानी दिलजले आगे ॥ गाथा० ॥ १ ॥

मृशिभद्र — तुमने मेरा दिल लीना, अपना मुझको नहि दीना।

मुझ पर वो जादू कीना मैं बन मन अर्पण कीना।

हमतो करचैन तुमपर हमको क्या समझावे जाये ॥ गाथा० ॥ २ ॥

मृशिभद्र — अहा, क्या अच्छा गाया है। मालूम पड़ता है यह बाँसुर मेरे ऊपर ही पड़ रही है।

पुष्पगति — क्या मैंने कुछ कहा है ? मैंने जो भी कहा है वह सब सच ही है। क्या आपको मेरा कहना असत्य मालूम पड़ता है ?

मृशिभद्र — तो क्या मेरा दिल तुमने नहीं ले लिया है ? क्या मैं तुम पर दिलोजानसे आशक नहीं हूँ ? प्रिये ! तुम्हारा गाना मुझे बहुत भला मालूम होता है।

दिनेश — [ क्रिया हुअ ] अँ , अब यह ठीक काका उल्लू बन गया। सच है जो हम खुडेको हाथमें फँस जाते है वे सूखे घोड़े ही निकलते है, अपक्षय उन्हें दीक्षित होना ही पड़ता है।

[ मृशिभद्रसे पार्श्वम आकर ] क्यों मित्रो ! चलेने या कुछ देर और यहाँ पर रहूँ ? यदि आप थोड़ी देर तक यहाँ पर विश्राम तो मैं एक और जरूरी काम कर आऊँ।

पुष्पगति — [ दिनेशसे परदा करके ] तुमसे कह दीजिये न कि चले जायँ । करना जरूरी काम कर आवें , मैं थोड़ी देर बाद खुद आ जाऊँगा ।

मृशिभद्र — [ दिनेशसे ] अच्छा . आप अपना जरूरी काम कर आवें , मैं थोड़ी देरबाद आ जाऊँगा ।

प्रविष्ठक।

दिनेश — [स्वगत] देखा कैसा फँसा। ठीक है, ये राई तिल का’ उतना भाड़ा है। क्या मालूम था कि वेश्याके मणिभद्रकी इतनी जल्दी इन दुष्टोंको हालत हो जायगी! खैर, मेरे लिये तो अच्छा ही हुआ कारण कि इसके रहने मेंरा काम यात सामने आवेगा। अब आता हूँ और इस नागरीके लिखने एवं छापने का भरतकी तसवीर खोजता हूँ। (प्रगट मणिभद्र) अच्छा मित्र। सो मैं आता हूँ, आप यहीं पर रहिये, मैं फिर आ जाऊँगा।

मणिभद्र(बदहवासीसे) साये। दिनेश जाता है किन्तु उसे रास्ते में ही अनंगतिलक रोक लेती है।

अनंगतिलक(दिनेशसे) आप मिहरबानी करके अभी उसके पास न आया करें नहीं तो बना बनाया खेल बिगड़ जायगा। आप जानते हैं हमको इस में कितना परिश्रम करना पड़ा है। यदि आपको पिछले आदिकी यथाज्ञा हो तो मुझसे मिल लिया करें।

दिनेश — ठीक। मैं तो यही देखने गया था कि देखूँ इसका मन रेलायमान हुआ था नहीं?

अनंगतिलक — अभी रंग रचने दीजिये बिना रंगे अधले बात न कीजिये कई रंग परिश्रम व्यर्थ होगा, हमें फिर सरखुद सहना होगा। हमें रंग उच्च फिर पक्का होगा, हमारा अभी काम पक्का न होगा।

पक्के सम्बन्ध होने पर आप आ सकते हैं।

दिनेश(स्वगत) तू रंग गहरा क्या खुदी है, काफी उसे तू फूला चुकी है।

प्रविष्ठक।

अवश्यमेवैक पक्ष को लेगा, भला ठीक वस्तु को दूर रहेगा।

दिनेश — मेरा फलोमें फूल दबे, लिरा खीस भी अब वेश बु मैं।

(प्रगट अनंगति० से) अच्छा देखा ही होगा, आपने आप हीसे मुलाकात किया करेंगे।

अनंगतिलक — और जरा हाथों वर्षा मिलवा दीजिये। आप जानते हैं कि अब तक आपके मित्र यहाँ घर में तब तक हम दूसरी रोली नहीं लगा सकते, यहाँ पर हमारा सारा खर्च समझिये।

दिनेश — सो तो ठीक है, क्या यह बात हम नहीं जानते, अवश्य आपके पास, रक्त खेत ही आया करेगा। मगर तब रक्तमें तुम्हें मेरा हिस्सा भी रखना होगा।

अनंगतिलक — क्यों नहीं? आप हमारा कार्य करेंगे तो क्या हम आपका ख्याल न करेंगे?

दिनेश — बस! यही एक बातमें रहने लायक बात है। अच्छा, मैं आता हूँ और रक्त मिलवाता हूँ (कहकर दिनेशके जाते जाते कर्मकारका प्रवेश)

अनंगतिलक(कर्मकारको रोककर) अभी आप यहाँ न आवें नहीं तो सब गुड़ गोबर हो जायगा। (दिनेशकी तरफ इशारा कर) ये भी मेरे बिना पूछे उनके पास चले गये थे। इनके आते ही हमारा भाव बदल गया था अगर मैंने इन्हें जल्दी हमारेसे छुड़ा लिया। मैंने इन्हें सारी बातें समझा दी हैं अगर मैं इनके बितेच्छु हूँ तो जब तक कुछ काम न बन जावे तब तक मेरे, दिवा सुबोध शतक पुद्गल आप धार्मिक कृत्यके पास न आवें नहीं तो हमारी सारी जिन्दगी व्यर्थ जायगी।

कर्मकार — आप मेरे ऐसा ही होगा, हम आपलोगोंके मित्रत्व सब शाश्वत दशायुक्त कर लिया करें। आपकी बिना आज्ञाके न आवेंगे।

अनुवृत्ति — अब आपका कार्य भी जल्दी हो जायगा। आप कुछ ऐसे वाक्य में कहें, इसका क्या कारण है? आप स्वयंने कह दिया है और संक्षेपमें आपने भी करदी है। कि अब एक आपके पीछे ही हमनें यहाँ पर रहने तक हम हम अपनी दूसरी आदिशक्ति नहीं लगा सकती है सहज आपका स्थान अमर शाश्वत आवश्यक है।

दिग्भ्रान्त — हाँ, आपका कहना ठीक है। (कर्मकारसे) देखा-देखीसे बढ़कर आप हमको आप अक्षर अर्थ भेद दीखता।

कर्मकार — अब हम आगे ही न जायँगे जिस स्थान पर हूँ या। हमारी आप चिन्ता न करें।

अनुवृत्ति — क्यों नहीं? आप लोगोंसे कुछ कुछ नहीं है कि हमारी सही आदिशक्ति है। कभी कभी आप दोनों महाशय सब गतियोंको पाकर पवित्र किया करें और हम सब अक्षर पद सिद्धार्थी होवें।

कर्मकार — ऐसा ही होगा। जो हम सब लोगोंको आप जानेकी इच्छासे देखेंगे, वह आपपर लिए गुणयुक्त करेंगे (हम सब दोनों बड़े सन्त हैं और हम अवस्थितिका भी बदले जाते है)

प्रश्नोत्तर

पुष्पवति(मक्खिमद्रसे) तो क्या आप गाना सुनेंगे या नाच देखेंगे?

मक्खिमद्र — क्यों नहीं! गाना भी नाचो और साथमें नाच भी दिखाओ।

पुष्पवति — सुनो (गाना गाती है और नाचती है)

जादू आसरेको विलंबें सगाय गयो रे।

सुभाव गयो, सभाव गयो, सभाव गयो रे।

जादू आसरेको विलंबें सभाव गयो रे ॥ टेक ॥

मेरा मन से गया, अपना नहिं दे गया। मेरे बिरहादिन तन-में सगाय गयो रे ॥ जादू० ॥ १ ॥ ‘मैं’ वो बिरहिणी हो, कहती हूँ 'सब जो ॥ मेरे आज्ञाकी फाँसी सगाय गयो रे ॥ जादू आसरे० ॥ २ ॥ ‘प्यारेकी यादमें पागल हुई हूँ मैं’ ।

मेरे दिशामें तह कहो सुनाय गयो रे ॥ जादू० ॥ ३ ॥

मक्खिमद्र — हा! क्या अच्छा रूप और नाच है। प्यारे तुम्हारे साथ हम भी नाचेंगे।

पुष्पवति — आओ न प्यारे। (दोनों उछलकर गाते हैं)

हम दोनोंका आज मन भाव गयो रे ॥ भाव गयो भाव गयो भाव गयो रे, हम दोनोंका आज मन भाव गयो रे ॥ टेक ॥

आज मिलकर गावो, प्रेम रस बरसावो। ठोक जीवन जवानी पे आय गयो रे ॥ हम दोनों० ॥

कैसी जुअल जोड़ी, मेरो हुक्म तेरी। ऐसी हलचलकी हमरो बनाय गयो रे ॥ बनाय गयो बनाय गयो फँसाय गयो।

हम दोनोंका आज मन भाव गयो रे ॥ २ ॥

नन्दिश्रेष्ठ नाटक।

दिनेश(एक तरफ़ खुरा खड़ा है) और कौन ऐसी हालत बनायेगा, मैंने ही तुझ रुल्लू को यों फैलाया लोग बड़ा अपना काम बनाया, तू तो यहीं पर सहरा हुआ ढूँढ़ता कि धन में तेरे क्या दशा होती है, देवमूर्ख ! कहाँ वेश्या भी किसीकी होती है ? यह उनके साथ माय जान भी ले लेती है । मर साले । मैं भी तुम्हें ये बातें क्यों सुझाऊँ?

अनंदूति(शरीरसे दुलत्ती हुई धीरे २) क्यों बाप फिर वहाँ पहुँच गये ! यह क्या बात है ?

दिनेश(पासमें जाकर) नहीं जो । मैं इनके अपनी सूरत थाँई ही दिलाता हूं । जो किये न, उस हाथ लागे बढ़ाये । (हाथमें रुपयोंकी एक थैली देकर) इसे आप फैला फैलाओ कि वर्षों तक आपके मुँहवाले पाखिर न होने पावे, अभी तो इसका धन जो कराडो दीनारोका है, आप के सकेगी ।

अनंदूति — चेला ही होगा, क्यों बाप आ रहे हैं ?

दिनेश — एक रूखरे काम होनेसे मैं अधिक नहीं ठहर सकता ।

अनंदूति — तो क्या कुछ देरके लिये भी न बैठेंगे ?

दिनेश — अभी नहीं बैठ सकता, माफ़ कीजियेगा । देखा मेरा भी ब्याज रहना, पैसा न हो कि आप सेरे पाछ ही न धरै । येरी रकम मुड़ी गई दिखा करना (कहकर जाता है )

अनंदूति(दिनेशके जाते २ ) अरे हरामजादे । कहीं वेश्याओंसे भी कितने धन वापिस लिया है, सो तू ये शैतानप्रमांक १ नाटक।

शरीरी सरे कर रहा है । जा, तुमको बदलू मेरे यहाँ रात आते है (कहकर वह भी चल देती है )

पुष्पमित्र — अरे ! रात्रि बहुत हो गई है, चलिये आराम करें ।

मणिभद्र — अच्छा, चलिये (दोनों चले जाते हैं)

[पञ्चमिक्ष पतन]

अंक पहिला सीन पांचवां ।

दिनेशका मकान ।

दिनेश अकेला उछल रहा है ।

दिनेश(उछलता हुआ) “संसार व्यवहारस्तु यदि माया विवर्जितः” इस नीतिके अनुसार अपना काम बनावेके किसी इस जीवको कुछ-कपट अवश्य करना ही पड़ता है । बिना पैसा किये वह अपने कार्य को पूरा कर ही नहीं सकता । देखो ! आज मैं ऐसी नीतिकी वजहसे धनवंत कर रहा हूँ । मेरे पास इसके पहिले मामूली पूँजी थी मगर आज मैं मणिभद्रक नाम वाली झूठी चिट्ठी लिख २ कर लाखों रुपयों का प्राप्त ले धनवान बन गया हूँ । मकिभद्र भी बुरी तरह फँस गया है यह इस वेश्याके मुँहसे नहीं निकल सकता । सब तक वाली निर्लोभा तब तक मैं अपना सब काम बनाकर कहीं दूर देशान्तर चला जाऊँगा और मौज करूँगा । यह तो सब हुआ मगर मेरी अभी एक और मुराद बाकी है, देख मेरी मन्त्रिप्रद नाटक।

तृतीयक चतुर बूढी उसकी सो क्या खबर लाती है। अहा! यह शुभ-लोचनौ अपने मनोहर प्रभावाली वदनसे लज्जाकी सुनतिकी फीका करनेवाली चन्द्रप्रभा मेरे दिलमें ऐसी धँस कर गई है कि उसकी जुदाई मुझे बेताब किये देती है। [ कुनीका प्रवेश होते ही जल्दीसे ] कहो। क्या तुमारे उसने आज नेकूर किया था नहीं ?

निपुणा — यह औरत बड़ी छँट है, किसीका भी नाम तक नहीं सुनना चाहती।

दिनेश — तो क्या मुझे उसके वियोगमें कुण्ठता कर प्राण दे देना होगा !

निपुणा — काम तो बहुत कठिन है।

दिनेश — क्या कोई है काम पैसा जो मेरेसे भी न हो।

सैकड़ों करि काम ऐसे फिर भी क्यों यशहीन हो।

मिले हैं सर्टीफिकेट ! तुमको बहुत इस काम के।

फिर भी हिम्मत हारती क्यों हो बड़े समझायक ॥

देखो ! तुम्हें मरजानाका कर दूँगा ! मुँहमांगा इनाम दूँगा। तुम एकबार उस नाजनीसे अवश्य मुलाकात करा दो।

निपुणा — करूँगी कोशिश, अजीने आप क्यों घबराते।

आपना खाती न मेरा घर क्या समझायते ॥

मैं वायदा करती हूँ कि उस पीतवनीसे तुम्हारी शीघ्र ही मुलाकात कराऊँगी।

प्रथमअंक।

चतुर्थक

दिनेश — अभी तक तुमने क्या कार्रवाई की है जरा उनसंक्षेपमें बयान कर दीजिये ताकि मेरे दिलमें कुछ तो तसल्ली आ जाय।

निपुणा — मैंने प्रथम उसे बहुत समझाया, अनेक प्रकार लुभाया, उसके दिलमें अनेक भाव पैदा करनेकी कोशिशें की मगर उसके दिमागमें एक भी बात न बैठी जिससे मैं अपना कार्य किसी तरह निकालती।

दिनेश — तो क्या तुम्हारी बातोंमें वह नहीं आई ?

निपुणा — अगर मैंने उसका पीछा नहीं छोड़ा और इसी विचारमें लगी कि कोमली तरकीब करनेसे यह कार्य बन सकता है।

मैं कुछ दो दिनोंमें उसकी सासु शुभचन्द्राके पास गई और कह सुनकर दाँईका काम हाथमें लिया, धीरे धीरे विश्वास जमाकर मैं रात्रमें भी आम कल वहीं रहने लगी हूँ।

दिनेश — तब तो तुमने बहुत अच्छा काम किया, अब मुझे भी उम्मीद बँधती है कि यह कार्य बन जायगा। तो क्या वहाँ पर अनेका यतिने मोक्ष नहीं लगा सकती ? क्या वह शुभभद्राके साथ सोती है या तुम्हारे साथ ?

निपुणा — प्रथम तो सासु बहू एकही कमरेमें सोती थीं मगर आजकल मैंने विशेष सेल बोल बढ़ा दिया है, इससे कभी कभी हम दोनों भी एक कमरेमें सो रहती हैं।

दिनेश( प्रसन्न कर ) शाबाश ! अब तो तुम्हें आपैसे भी अधिक काम कर लिया। अब मेरेसे मुलाकात होनेकी तुमने क्या तरकीब सोची है ?

द्वितीय अंक

अंक दूसरा-सीन पहिला।

अनंगतिलकाका मकान।

मंजिभट्ट और पुष्पतिलकाका बैठा देखना।

पुष्प० — कढ़िये प्यारे ! अब आपका क्या विचार है ?

मंजिभट्ट — मुझे तो तुमने देखा कब्जेमें कर लिया है कि कहाँ भी दूसरी जगह एक घड़ीतक चाहते भी जानेकी इच्छा नहीं होती। वास्तवमें तुम्हारा प्रेम एक अलौकिक प्रेम है।

पुष्प० — और क्या तुमने मेरा चित्त अपनी ओर आकृषित नहीं किया है ? जो स्वप्नमें भी दूसरी तरफ नहीं आता।

मंजिभट्ट — इसमें कुछ संदेह है कि तुम्हारा और चित्त दूसरी तरफ न जाय ! यह प्रकृति-विरुद्ध बात है !

पुष्प० — नाथ ! मुझको कथम देहका भी फनी जावो नहीं।

जन्म पालेसे कभी वेश्या मैं हो सकती नहीं ॥

प्राणप्यारे ! आपका यह नेत्र दिलमें छप गया।

इसको दिलसे दूर होना अब असम्भव हो गया ॥

क्या मिट्टीमें पड़ा हुआ लांवा मिट्टी हो जाता है ?

मंजिभट्ट — जानता हूं मैं तेरा निश्छपट सच्चा प्रेम है।

यगर वश आजन्म उद्वेगता यही संदेह है ॥

मुझे यह नेत्र चञ्चलसुर हो दीखता है।

दण्डिनट नाटक।

कलंक

निपुणा — बस, आज शक्तिको तुम ठीक शायद कहो येरा बदल घर खाना, मैं जानती रहती। तुम चोरि किवाड थपथापाना, मैं यह इशारा सुनते ही भीतरसे किवाड खोल दूंगी। लेकिन खिड़कीकी राह आना। देखो ! आजकल कर्मकर बड़ी लोक्खी रहता है। इसमें हमेषा बचते रहना। यह रहस्य उसे न बताना !

दिनेश — “नहीं”, इसे मेरे और तेरे सिवाय कोई भी नहीं जान सकता। ‘मैं क्या मैं’ आज ही रात्रिमें ठीक चाह बजे यहाँ आ जाऊँ।

निपुणा — हाँ, आज ही ठीक समय पर अवश्य आइये !

देखिये कोई पत्नी न हो।

दिनेश — क्या आप कभी जा रहे हैं ?

निपुणा — हाँ, जा रही हूं। इसी होनेसे मालकिनको संदेह हो जायगा कि इतनी देर सिने कहाँ पर लगाती। इससे मेरा अजी जाना सुभाषित है।

दिनेश( शर्ममें नोट देकर ) लीजिये और अपने बापरेपर बड़ा रहिये, ये कार्य होने पर तुमक मालामाल कर दूंगा।

( निपुणा छुट्टी चली जाती है। )

दिनेश( स्वगत ) अब चन्द्रमाको भी अपने हाथ लगी ही समझो। फिर क्या है। कहाँ’ राय प्रदेशमें जाकर दोनों

प्रेमी-प्रमोद — प्रमोद करेंगे। बहू’ और अपनी पोशाक एवं वेष बदलनेकी फिक्र करूं ! ( कहकर दिनेश भी चला जाता है )

[ अर्थमिका पतन ] रूप

धर्मक — समाप्त।

भृगिभट्ट नाटक ।

तृतीय अंक

पृष्पति — नहीं स्वामी! प्रेम ये मेरा चिरस्थायी रहे।

इस वदनको और कोई दूसरा क्या छू सके ॥

यद्यपि आप जानते हैं कि मेरे इन शरीरोंको कोई अन्य स्पर्श करेगा ? हरगिज नहीं, यह स्वप्नमें भी न होगा। मेरे जीवना-धार आप ही रहेंगे। मुझे पक्षिगणसे उद्दीप्त होने लगे तो आप साथ, मुझे ६ लाख ललनायान हो आप, मगर मेरा प्रेम विच्-छिन्न नहीं हो सकता।

भृगिभट्ट — सखा क्या प्रमाण है ? यदि हम हमारे प्रेममें कोई बाधक हो गया और छलने हमारे दिलोंमें केचीनाथ पेश कर दिया तब क्या होगा ? क्या उस समय तुम मेरेले अपना प्रेम शायद निभाओगी ?

पृष्पति — एक तो ऐसा होना नहीं, और यदि कदा-चित् ऐसा निमित्त मिल भी गया तो मैं अपने इस शरीरको आप पर न्योछावर करूंगी। आपके कुछ विरहमें मैं धोती न बैठी रहूँगी। मैं सपने दिलसे कहती हूँ कि आपको छोड़ मुझे स्वप्नमें भी कोई स्पर्श न कर सकेगा। क्या आपको मेरी इन बातों पर विश्वास नहीं है ?

भृगिभट्ट — क्यों नहीं ? मुझे विश्वास अवश्य है, मगर किसी काव्यापारा यह बात निकल पड़ी थी। तुम कुछ संशय न करो।

पृष्पति — कौनसा कारण ? क्या वह मुझे नहीं बता सकते ?

भृगिभट्ट — क्यों नहीं। आजकल तुम्हारी माता कुछ विचार अवश्य करती होती है। बस। इसीसे शक है कि कहीं कोई विघ्न न उपस्थित हो जाय।

द्वितीय अंक।

तृतीय अंक।

पृष्पति — नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता। आप फिक्र न करें, इस दासीको जल्दी आत्म लेविका समझेंगे।

भृगिभट्ट — अब तुम्हारा प्रेम मेरे पर जटिल अनिवार्य है।

तब किसीके विघ्न करनेका नहीं अधिकार है ॥

दिनेश(स्वगत, छिपा हुआ)

है नहीं अधिकार इस दुर्बुद्धिको मालूम नहीं।

आ नहीं सिरपर चिन्ती ये इसे मालूम नहीं ॥

मुझे भी क्या गरज जो इसको भुकाऊँ मैं लगी।

जहन्नुममें जाय ये, मैं तो न ये जाऊँ फसी ॥

(प्रगट, भृगिभट्टके पास आकर) कहिये मित्र ! क्या हाल-चाल है ? तबियत तो प्रसन्न है न, मेरे लायक कोई काम हो तो कहियेगा (पुष्पनिफा मुँह फेर लेती है)

भृगिभट्ट — सच आनन्द है। मुझे यहाँ किसी प्रकारकी तक-लीफ नहीं है। अब तुम्हारे लायक कोई काम होगा तब हम खुद तुम्हारे पास समाचार भेज देंगे।

दिनेश(स्वगत) देखा ढँग ! अब तो इन्हें हमारा यहाँ आना भी खटकने लगा ! चलो एक प्रकार अच्छा ही हुआ, मैं तो ऐसा चाहता ही था। (प्रगट) अच्छा मित्र ! जैसी आपकी आज्ञा होगी वैसा ही किया जायगा। आप किसी बातकी फिक्र न करें। क्या घर पर चलनेका इरादा है ?

भृगिभट्ट — अभी घर पर नहीं जाऊंगा। वहाँ जाकर ही क्या करूँगा ! जरा एकबार कर्मकारको यहाँ पर भेज देना।

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें — मूल दस्तावेज़ (PDF): 2434.pdf

स्रोत — Gyata संग्रह।

स्रोत · Source: forum.jinswara.com — अनुमति सहित, साभार · shared with permission and thanks.

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