नाटक कक्ष
अर्पित जैन, खानियाँधाना (शास्त्री तृतीय वर्ष)
क्या खोया क्या पाया?
(प्रथम दृश्य)
(सोनू का अपनी दुकान से थका-हारा झुंझलाते हुए आना)
सोनू:- (अपने पिता से):- रोटियाँ खाते बनते है न नहीं मिलती। ख़ून-पसीना एक करना पड़ता है, खैर आप क्या समझोगे, जिन्होंने अपना सारा जीवन सुनने-सुनाने में ही गँवा दिया, वो भला! मेहनत की कीमत क्या समझो?
पिता:- बेटा शांत रहो, धैर्य रखो परिणाम क्यों बिगाड़ते हो; होगा तो वही जो केवली ने देखा है।
सोनू:- क्या केवली हमारा बुरा ही बुरा देखते है? 20 साल हो गए कहते-कहते होगा तो वही जो केवली ने देखा है…
पिता:- उनके हाथ में भी कहाँ है बेटा! वे तो मात्र जानते है, कर तो वे भी नहीं सकते।
सोनू:- आपसे तो बात करना पत्थर पे सर मारने जैसा है।
(तभी पीछे से छोटू आता है)
छोटू:- जय जिनेंद्र सभी को और क्या चल रहा है?
सोनू:- कुछ नहीं! वही रोज की किट-पिट; मेरी बात इन्हें समझ में नहीं आती, इनकी बात तो वैसे ही किसी को समझ नहीं आती!!!
छोटू:- तुम इनकी छोड़ो, तुम अपने हाल बताओ।
सोनू:- सब ठीक है भैया! मुझे आप दोनों से एक जरूरी बात करनी है।
सोनू:- बोलो!
छोटू:- भैया मेरे बोर्ड में 93% बने है, अब आगे क्या करना है?
सोनू:- (छोटू से) अरे! अब आगे क्या? तुम्हारे तो इतने अच्छे मार्क्स आए है, तुम्हारी इच्छा जो करना हो करो, पर तुम्हारे पास चार ऑप्शन है; C.A., इंजीनियर, डॉक्टर, I.A.S.
(पिता अत्यंत मद्ध स्वर में बोले बेटा शास्त्री भी कर सकते हो।)
सोनू:- (पिता से) (बहुत गुस्से से) क्या इरादा है आपका? अपने साथ इसकी जिंदगी भी बर्बाद करना चाहते हो क्या?
पिता:- क्या कमी है हमारे पास? सब कुछ तो है, सुख है, शांति है और दो वक्त की रोटी मिल जाती है।
सोनू:- दो वक्त की रोटी तो जानवरों को भी मिल जाती है। समाज में इज्जत हो, चार लोग जाने तब वो कोई बात है।
(छोटू मन ही मन विचार करता है कि ये दोनों अपनी-अपनी जगह सही है, अब मुझे निर्णय करना है कि मुझे आगे क्या करना है)
(द्वितीय दृश्य - इंद्र की सभा)
इंद्र-चित्रगुप्त संवाद
न्यूज एंकर:- आज की ताजा खबर स्वर्ग लोक में जनसंख्या में हुई चौथी वृद्धि, नारकीयो को नारकी न मिलने की वजह से हुआ सुख का अनुभव। वे महाभाग की जगह यक्षवैभव मनाते पर उतर आए है। इंद्र यहीं सदर में जनसंख्या में वृद्धि होती रही तो स्वर्गलोक में अकाल की आशंका। जल्द ही अशुभ के कृषा नहीं खत्म गए तो सूखा पड़ने की पूरी-पूरी आशंका…। नमस्कार! मिलते है ब्रेक के बाद।
विश्वकर्मा:- भगवन्! अब हमारा क्या होगा अमृत के बिना? (विश्वकर्मा अपनी पत्नि को फोन करता है) अरे! भगवान भरोसे हो हमारे कुए से अमृत मत लेने देना, स्वर्ग लोक पर अकाल पड़ने वाला है। भगवान कुओं की निगरानी के लिए 4 एरावत हाथी छोड़ दिए जाएंगे।
कुबेर:- महाराज हमारे राज-कोश में जन-संख्या के बढ़ने से आवास व्यवस्था में 1 लाख करोड़ dollar की कमी आई है, जो पिछले साल से चार गुणा ज्यादा जल्दी कुछ करना पड़ेगा।
इंद्र:- “Why are you so tense give them some fans.” चित्रगुप्त! यम ब्रो को फोन लगाया जाए।
आप जिनसे संपर्क करना चाहते है, वे अभी पिकनिक में जलसा करने में व्यस्त है, कृपया दुबारा प्रयास न करो।
इंद्र:- पता लगाया जाए स्वर्ग में population growth का कारण क्या है?
चित्रगुप्त:- My lord you don’t believe me.
इंद्र:- But what!
चित्रगुप्त:- ये सभी एक ही जगह से आ रहे है, जयपुर…।
इंद्र:- How this is possible? हमने visa तो पूरे World को दिया था। Don’t worry, all सबासीस! Just chill, हम मनुष्यों के स्वभाव को जानते है, लालच, स्वार्थ, ऐश्वर्य, मान ये इसे सरहद्द तक ले रहा है, जिसके कारण उसकी आत्मा कहाँ भर रही है, उसे भान ही नहीं।
इंद्र:- चित्रगुप्त! हमारे कुशल गुप्तचरो को मनुष्य-लोक में भेजा जाए और जन-संख्या वृद्धि का कारण पता लगाया जाए।
(तृतीय दृश्य)
संचालक:- भविष्यत्व का योग ऐसा बना कि छोटू भी पिता से सहमत होकर बड़े-भाई का विरोध कर शास्त्री करने श्री टोडरमल दिगम्बर जैन सिद्धांत महाविद्यालय में चला गया।
पाँच साल बाद…
(छोटू रास्ते से गुजरता हुआ तभी)
छोटू:- (वृद्ध से) जय जिनेंद्र दादा जी…
समाज का एक वृद्ध:- बेटा! तुम्हारी शास्त्री तो हो गयी, अब आगे क्या विचार है?
छोटू:- जैन दर्शन में पठन-पाठन, शोध आदि का कार्य करना है।
समाज का वृद्ध:- वो सब तो ठीक है, पर तुम्हें अपनी आजीविका, अपने परिवार के बारे में भी सोचना होगा।
छोटू:- परिवार वालों को क्या? वो तो अपनी स्वयं की इच्छा लेकर आए है।
छोटू:- दादा! देखो पंडित जी! बुरी मत मानियो, जे सब तो शासन की बातें बताए, असल में तो जॉन के पास पैसा-जोई को हर्षेगा।
छोटू:- बाप कहदे है, इसलिए ज्यादा कुछ तो नहीं, पर जैन शास्त्रों की बातें ठीक भी है और सही भी और मुझे उन पर पूरा विश्वास है।
(छोटू एकांत में जाकर विचार करता है…)
(मुझे यह नहीं पता की मैं सही कर रहा हूँ या कुछ और। क्या यह मेरे अहंकार पर चोट थी? या फिर तत्त्वज्ञान की अवधारणा सुनकर ऐसा हुआ?)
जगत प्रसिद्ध सुधा हो, या सिंहासन का त्याग
दो रोटी हो भूख मिटाने, नो पीने को छाँक।
(दोस्त और छोटू का संवाद)
दोस्त:- हां! भाई छोटू कैसे कट रही है, जॉब-वोब है, कभी-कभी तो मुझे तुमपे दया आती है।
न होटल में खाना, ना सिनेमा जाना।
ना लड़की घुमाना, बस बातें बघराना।।
क्या यार! पता नहीं। कौन-सी मनहूस घड़ी थी, जब तुमसे दोस्ती करी, तुम्हारे कारण मेरी जिंदगी नीरस हो गई।
छोटू:- दया! दया तुम्हें मुझ पर नहीं, मुझे तुम पर आनी चाहिए। तुम्हारी सोच से आनी चाहिए, तुम्हें तो अभी दोस्ती की परिभाषा नहीं है।
(छोटू एकांत में विचार करता है…)
छोटू:- क्या मैं सही हूँ? आप भी भाग तो नहीं रहा? आज ऐसा क्यों कहा? क्या इच्छा की मुझे अपने गुरु की बातें गलत-सी लगनी ही आज क्यों मुझे guilt feel हो रहा? इतनी ग्लानि महसूस हो रही, जैसे मैंने कोई अपराध किया हो। ऐसा आखिर! क्या हुआ की आज मैं दया का पात्र बन गया? क्यों मुझे भी शास्त्रों की बातें खाली खोखली प्रतीत हुई…?
(पापा की गोद में सिर रखकर)
पिता:- क्या हुआ बेटा! आज इस बूढ़े की याद कैसे आ गई? (ख़ामोश मनुष्य)
छोटू:- पता नहीं! आज बहुत अकेला महसूस कर रहा हूँ। ऐसा लगा रहा है, मानो कुछ तो गलत हो रहा है।
पिता! नहीं दुनिया आखिर चाहती क्या है?
पिता:- देखो बेटा! दुनिया तो गोल है, उसकान कोई मोल है, मतलब बेटा! यही तो जो दिखेगा वही तो बिकेगा, लोक में तो यही ही अमल है कि सच को झूठ, झूठ को सच कहा जाता है।
बेटा! अब तुम पर निर्भर करता है कि तुम्हें दुनिया को क्या कहना है कि तुम क्या खुश करना है…
छोटू:- पिता जी! क्या जैन धर्म को मैं निराशा और बोझ के तले बहुत धुन महसूस कर रहा हूँ। मानो जैसे आसमान आज मुझसे नीचे-नीचे खींच कर पूछ रहा हो कि मेरा अस्तित्व क्या है? मेरी जीवन की सार्थकता क्या है? मैं आज आपसे पूछना चाहता हूँ कि मुझे स्मारक भेजने का निर्णय, क्या परिस्थिति जन्य था या आपके धैर्य व संतोष का परिणाम…?
पिता:- बेटा! तुम ऐसा मत समझना कि मैं तुम्हें इंजीनियर, C.A., डॉक्टर या प्रशासनिक सेवक बनाने में समर्थ नहीं था, परतु मैं जानता था कि यह भौतिकवाद तुम्हारी आंतरिक शांति को हर लेता, तुझे मैं आध्यात्मिक
बेटा! आज तुमने तो समाज वालों को, अपने दोस्तों को उत्तर दिये, वो तुमने करवाया नहीं था। रहा था वो तुम्हारे अतरांश की आवाज थी तुम्हारे तत्त्वज्ञान का ही बल था।
(इंद्र सभा का दृश्य)
इंद्र:- चित्रगुप्त मैं देखा चित्रगुप्त! ये कोई समस्या ही नहीं थी,
ये ही स्वर्गलोक में आने का एकमात्र उपाय है। यदि ये लोग स्वर्ग में नहीं आएँगे तो क्या सम्भव नहीं?
चित्रगुप्त:- महाराजा! इतना ही नहीं, ये लोग स्वर्ग भी आएँगे और मोक्ष भी जाएँगे।
चित्रगुप्त:- ये सभी एक ही जगह से आ रहे है, जयपुर…।
संचालक:- इस लघु-नाटिका में यह दिखाना हमारा उद्देश्य नहीं है कि एक शास्त्री विज्ञान आगे कार्यक्षेत्र के क्या और सफल है या क्या नहीं कर सकते? इस लघु नाटिका से भाव यह भी दिखाना चाहते है कि उत्तर-बड़ो को जानना जीवन का प्राथमिक अंग है। परतु तत्त्वज्ञान का बल उसे निराशा से नहीं गिरने देगा। सच्चे चहरे को शक्ल की रेखा नहीं खीचेगे देगा। इसी का परिणाम है कि छोटू सब कुछ खोकर भी कुछ नहीं खोएगा।
संचालक:- इस लघु-नाटिका में पिता का धैर्य और आत्मसंतोष हम सभी के लिए आदर्श और अनुकरणीय है।
