किलोलकदरी
वात्सल्य पूर्ण स्मृति
विगत वर्ष दोनों भाइयों का वियोग हमारे परिवार से हुआ, मृत्यु के अंतिम क्षण तक तत्वज्ञान के संस्कारों का बल इनके पास था। साथ ही तत्त्वज्ञान ने ही समस्त परिवार को इस निष्ठुर वियोग को सहन करने की क्षमता प्रदान की। सभी बालक-बालिकाएँ आत्माहित करें - ऐसी भावना है।
शुभैच्छु
ऋषभकुमार, संतोषकुमार, अजित शास्त्री अलवर, सुनीलकुमार जैन एवं समस्त परिवार, रहली, जिला सागर (म.प्र)
परिवार की ओर से साहित्य प्रकाशन हेतु ‘समर्पण’ को 11 हजार की राशि प्राप्त हुई। (हस्ते डॉ. मनोज जैन, रहली)
शाश्वतधाम प्रगति की ओर…
श्री रामनन्दिनी ग्रंथमाला का 10वाँ पुष्प
समर्पण चेरिटेबल ट्रस्ट का 18वाँ पुष्प
किलकारी
रचनाकार
राजकुमार, द्रोणगिरि
संपादक
अजित शास्त्री, अलवर
प्रकाशक
समर्पण
18, आदिनाथ कॉलोनी, केशवनगर, उदयपुर (राज.)
मो. 91 9414103492
प्रथम संस्करण : 2000 प्रतियाँ
(वैशाख शुक्ल द्वितीया, संवत् 2543, दिनांक : 28.4.2017
आध्यात्मिकसत्पुरुष श्री कानजीस्वामी की 128वीं जन्म-
जयन्ती के अवसर पर)
प्राप्ति स्थान : शाश्वतधाम, उदयपुर (राज.),
मो. 91-9414103492
: श्री अमित जैन डीटीडीसी, दिल्ली
मो. 91-9811393356
: श्री दिनेश शास्त्री, जयपुर
मो. 91-9928517346
साहित्य प्रकाशन हेतु सहयोग राशि : 20/-
मुद्रक : देशना (दिनेश) कम्प्यूटर्स
मालवीया इण्डस्ट्रियल एरिया, जयपुर,
मो. 9928517346
प्रस्तुत प्रकाशन में सहयोग करने वाले महानुभाव
- श्री अर्पण जबेरी/निकेत जबेरी, अमेरिका 2100/-
- श्री विद्या-सागर जैन, उदयपुर 2000/-
- श्री अमित जैन, डीटीडीसी, दिल्ली 1100/-
- श्री नेमिचन्द्र चंपालाल भारावत चेरिटेबल ट्रस्ट, उदयपुर 1100/-
- श्री राजेन्द्र बैनाड़ा, उदयपुर 1000/-
- श्री अमित अरिहन्त, मड़ावरा 500/-
किलकारी 2
प्रकाशकीय
अभी तक ‘समर्पण’ द्वारा प्रकाशित साहित्य पाठकों के बीच
भरपूर पसन्द किया गया। एतदर्थ लेखकों/पाठकों/अर्थ सहयोगियों को
हार्दिक धन्यवाद।
‘समर्पण’ के 18वें पुष्प के रूप में राजकुमार शास्त्री द्वारा रचित
कविताओं का संकलन ‘किलकारी’ प्रस्तुत है। आशा है पाठक इस
संकलन में भी साहित्य और अध्यात्म का आनन्द लेंगे।
‘समर्पण’ द्वारा प्रकाशित साहित्य के प्रकाशन सहयोग हेतु पाठकों
द्वारा अधिकांश अर्थ सहयोग पहले ही प्राप्त हो जाता है, अतः अधिकतर
साहित्य ‘जो चाहो ले जाओ, जो चाहो दे जाओ’ के आधार पर
जाता है। अनेक साधर्मी अधिक संख्या में साहित्य लेते हैं तो सहयोग
राशि भी प्रदान करते हैं, वह राशि जिन प्रकाशनों में सहयोग कम आता
है, उनके प्रकाशन में व्यय हो जाता है।
दो वर्ष की अल्पावधि में 18 पुष्प प्रकाशित होना एवं उनका समाप्त
होना हमारे लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।
पुस्तक को प्रकाशन के पूर्व डॉ. संजीवजी गोधा एवं पं. पीयूषजी
शास्त्री ने भी अवलोकन कर महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये, जिनका यथासंभव
उपयोग किया गया है, तदर्थ उन्हें धन्यवाद। पण्डित अजितजी शास्त्री
ने भी व्यस्तता रहते हुए भी इसका संपादन कार्य किया है, इसके लिए
ट्रस्ट उन्हें भी धन्यवाद ज्ञापित करता है।
इस पुस्तक के प्रकाशन में जिन्होंने अर्थ सहयोग प्रदान किया है,
उन्हें धन्यवाद। पुस्तक के आकर्षक मुद्रण हेतु श्री दिनेश जैन-देशना
कम्प्यूटर्स जयपुर को भी साधुवाद देते हैं, जो कम समय में हमारी
इच्छानुसार प्रकाशन में सहयोग प्रदान करते हैं।
आप पुस्तक पढ़कर जो भी आपके भाव हों, वह 9414103492
पर अवश्य ही सूचित करें। धन्यवाद।
निवेदक : ‘समर्पण’ चेरिटेबल ट्रस्ट, उदयपुर
मोबा. 9414103492
किलकारी 3
अन्तर्मन
घर में बालक की प्रथम किलकारी माता-पिता, दादा-दादी आदि
समस्त परिजनों को प्रमुदित कर देती है, वह किलकारी उस बालक का
स्वस्थ व प्रसन्न होने का संदेश होती है। वह किलकारी उस बालक का
प्रथम गीत/कविता होती है।
आबालवृद्ध सभी प्रसन्नता हो या कष्ट सभी प्रसंगों पर कोई न कोई
काव्य गाकर या गुनगुना कर ही अपनी भावाभिव्यक्ति करते हैं। आचार्यों/
कवियों ने भी पद्य को अपनी भावनाओं को सशक्त रूप से प्रस्तुत करने
का माध्यम मानकर प्राकृत/संस्कृत/हिन्दी का प्रारम्भिक साहित्य पद्य में
ही सृजित किया है।
बालकों को तो आज प्ले ग्रुप में हिन्दी/अंग्रेजी भाषा में कविताओं
द्वारा ही सिखाया जाता है और बच्चे भी हँसते-हँसते, मस्ती से गीत
गाते बहुत कुछ सीख जाते हैं।
बाल संस्कार शिविर शिविरों में भी हमारे साथियों द्वारा गीतों के
माध्यम से शिविरों में उत्साह या संचार करते हुए शिक्षण करते हुए
देखा, अतः जबसे कुछ लिखना प्रारम्भ किया तब से बच्चों के लिए भी
कुछ लिखें, यह भावना होती और छोटी-छोटी कवितायें लिखीं। भाई
अजित अलवर की प्रेरणा से कुछ नये गीत/कविताओं को लिखा, जिन्हें
परिमार्जित भी उन्होंने ही किया। कविताओं को वाट्सअप पर प्रेषित
किया जिन्हें पढ़ कर कुछ पाठकों ने प्रोत्साहित किया, फलस्वरूप यह
किलकारी घर-घर में गूँजे की भावना से प्रकाशित कराने की भावना हुई।
सादर निवेदन है कि इन रचनाओं को बाल साहित्य की दृष्टि से ही
देखा जावे और कुछ सुधार अपेक्षित हों तो कृपया अवश्य सूचित करें।
वैशाख शुक्ल द्वितीया राजकुमार शास्त्री, दोणागिरि
28.4.2017 मो. 09414103492
किलकारी 4
संपादकीय
प्रिय बालको! समर्पण का 18वाँ पुष्प ‘किलकारी’ केवल और केवल आपके लिए समर्पित है। पूज्य गुरुदेवश्री की 128वीं जन्म-जयन्ती पर प्रकाशित भाई राजकुमार शास्त्री द्वारा रचित 11वीं कृति है। माँ उजमबा द्वारा कान्हा (कानू) को दिये गये सद्संस्कारों ने कानू को महान गुरु और गुरुदेव तक ले जाने में महती भूमिका निभायी। बालकों में संस्कार सिंचन महती आवश्यकता है। पूर्व में वीतराग-विज्ञान पाठशालाओं के माध्यम से बालकों को नियमित तत्त्वज्ञान कराया जाता था, किन्तु लौकिक अध्ययन के अतिभार ने बालकों को नियमित पाठशाला से दूर किया। आज बाल संस्कार शिविरों तथा ग्रुप शिविरों ने तो मानो क्रान्ति जैसा कार्य किया। ग्रीष्मावकाश में सहस्राधिक स्थानों पर ग्रुप शिविर तथा लगभग 50 स्थानों पर संस्कार शिविर मिथ्यात्व, अज्ञान तथा असंयम के विरुद्ध रण हेतु बारूद का काम कर रहे हैं। यह कृति ‘किलकारी’ उक्त शिविरों में तत्त्वज्ञान को न केवल रोचकता से परोसेगी, अपितु उसे सुपाठ्य भी बनायेगी। उन शिविरों हेतु अनवरत अहर्निश संलग्न युवा विद्वानों हेतु यह कृति संबल बनेगी। इस कृति में ‘शिविर लगाओ’ गीत जहाँ शिविरों की आवश्यकता तथा उपयोगिता सिद्ध करता है ‘वही मंदिर आना, प्रभु गुण गाना’ तथा ‘सारे जहाँ में अच्छा’ जैसी आकर्षक धुनो पर बनाये गये प्रेरक गीत बालकों को घर से निकाल कर पाठशाला की ओर दौड़ने को मजबूर देंगे। ‘छह द्रव्यों का स्वरूप’, ‘देव-शास्त्र-गुरु का स्वरूप’, ‘आओ बच्चों आओ’ में अरहंत का स्वरूप आदि रचनाओं से बालबोध पाठमाला भाग-1,2,3 के कतिपय विषयों को रोचक शैली में कविता के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है। इसके अलावा संस्कारों से सराबोर लगभग 15 कविताएँ हैं, दशलक्षण पर्व पूजा को आधार बनाकर कर लिखी गयी रचनायें भी सरल सुबोध हैं। भाई राजकुमार ने कुछ रचनायें मेरी भावना के अनुरूप लिखीं, जो विषयगत गंभीरता से ओतप्रोत हैं तथा मुझे काम पर लगाने के लिए उनके द्वारा जान-बूझकर बिखेरे गये शब्दों को व्यवस्थित करने रूप परिशोधन का लघुत्तर कार्य का अभिमान तो मैं पाल ही सकता हूँ। इस उपयोगी कृति के लिए कृतिकार को बधाई। आशा है यह कृति बालकों में उत्साह भरने का कार्य करेगी।
- अजित शास्त्री, अलवर
समर्पण चेरिटेबल ट्रस्ट
एक परिचय
देव-धर्म-गुरु के चरणों में तन-मन-धन सब अर्पण।
आत्महित व तत्त्वज्ञान का, है सर्वस्व समर्पण।।
ट्रस्ट का नाम - समर्पण चेरिटेबल ट्रस्ट
स्थापना तिथि - 20 सितम्बर 2014
ट्रस्ट मण्डल
संरक्षक - 1. श्री अजित जैन बड़ौदा, 2. श्री कन्हैयालाल दलावत, 3. श्री ताराचन्द जैन उदयपुर, 4. श्री प्रकाशचन्द छाबड़ा सूरत, 5. श्री ललितकुमार किकावत लूणदा, 6. श्रीमती स्वाति जैन उदयपुर।
अध्यक्ष - राजकुमार शास्त्री उदयपुर, उपाध्यक्ष - अजितकुमार शास्त्री अलवर, कोषाध्यक्ष - रमेशचन्द वालावत उदयपुर, मंत्री - डॉ. ममता जैन उदयपुर, सहमंत्री - पीयूष शास्त्री जयपुर, ट्रस्टी - पण्डित अशोककुमार लुहाड़िया तीर्थधाम मंगलायतन अलीगढ़, ऋषभकुमार शास्त्री लिन्दवाड़ा, डॉ. महेश जैन भोपाल, रतनचन्द शास्त्री कोटा।
ट्रस्ट की सामान्य रूपरेखा
उद्देश्य - 1. तत्त्वज्ञान, अहिंसा, शाकाहार, सदाचार का प्रचार करना। 2. सामाजिक विकृतियों के विरुद्ध जागरूकता पैदा करना। 3. अनुपलब्ध, आवश्यक व नये लेखकों का श्रेष्ठ साहित्य प्रकाशित करना। 4. सर्वोपयोगी पत्रिका प्रकाशित करना। 5. चिकित्सा व शिक्षा के क्षेत्र में प्राप्त सहयोग को वितरित करना।
कार्य पद्धति - 1. सबसे सहयोग-सबको सहयोग की भावना से साधर्मियों से प्राप्त सहयोग साहित्य/चिकित्सा/शिक्षा पर आवश्यकतानुसार वितरित करना। हमारा प्रयास होगा कि फण्ड बनाने की अपेक्षा प्रतिवर्ष प्राप्त सहयोग को उसी वर्ष वितरित कर दिया जाये। 2. व्यक्ति या संस्था के नाम के लिए नहीं, पर काम के लिए काम। 3. सर्वोपयोगी (अपनी समझ के अनुसार) योजना को सबके समक्ष रखना, यदि सहयोग प्राप्त हुआ हो तो उस योजना/कार्य को करना, नहीं तो…? 3. अच्छी बातें-सच्ची बातें (अर्थात् शाश्वत सत्य) ज़्यादातर लोगों तक पहुँचे, ऐसा प्रयास करना।
गतिविधि
- साहित्य प्रकाशन, 2. संस्कार सुधा मासिक पत्रिका का प्रकाशन, 3. स्नातकों द्वारा स्नातकों के लिए शिक्षा चिकित्सा सहायता योजना, 4. साधर्मी वात्सल्य योजना - साधर्मियों से स्वैच्छिक सहयोग लेकर योग्य साधर्मियों को शिक्षा/चिकित्सा सहयोग पहुँचाना।
निवेदन
यह छोटी संस्था आपके सहयोग से समाज में कुछ कार्य करना चाहती है, यदि आप हमारे विचारों से सहमत हों, तो आप भी आर्थिक सहयोग प्रदान कर या अपनी सहमति देकर हमारा उत्साहवर्धन कर सकते हैं।
हमारा उद्देश्य कुछ अलग ढंग से समाज में जागरूकता लाना व सहयोग करना है। आपके सुझाव व सहयोग सदैव अपेक्षित हैं। आप जब, जो, जैसे कर सकते हैं, आत्महित व समाजहित में ज़रूर कीजिए। बस यही अनुरोध है।
निवेदक
समस्त ट्रस्ट मण्डल, समर्पण चेरिटेबल ट्रस्ट,
उदयपुर (राजस्थान)
विषयानुक्रमणिका
शिक्षण शिविर लगाओ
(तर्ज : दो घड़ी निज नाथ के नजदीक…)
आओऽऽ आओ, सब मिल करके आओ,
अपने-अपने गाँव में तुम शिविर लगाओ।
शिक्षण शिविर लगाओ।।1।।
बालकों को तत्वज्ञान देना जरूरी,
देव-धर्म-गुरु-आतम से मिट जाएगी दूरी।
बस इसलिए सब मिल कर सन्मार्ग दिखाओ,
अपने-अपने गाँव में तुम शिविर लगाओ।।2।।
फैला हुआ चारों तरफ अज्ञान अंधेरा,
इन पापों और कषायों ने हम सबको है घेरा।
जिनवाणी का साथ हो तब ही इनसे बच पाओ,
अपने-अपने गाँव में तुम शिविर लगाओ।।3।।
छह द्रव्यों अरु सात तत्व का लक्षण तुम जानो,
सदाचार हित भक्ष्य-अभक्ष्य स्वरूप पहचानो।
बच्चों को संस्कार से सच्चा जैनी बनाओ,
अपने-अपने गाँव में तुम शिविर लगाओ।।4।।
जिनधर्म में हुए हैं ऋषभ आदि तीर्थंकर,
मुनियों ने समता से सहे उपसर्ग भयंकर।
अपना वैभव पहचानो, बाहर न भ्रमाओ,
अपने-अपने गाँव में तुम शिविर लगाओ।।5।।
मंदिर आना, प्रभु गुण गाना
(तर्ज - ईचक दाना बीचक दाना…)
मंदिर आना, प्रभु गुण गाना।
और कहीं न जाना, मंदिर आना।।
राग-द्वेष जो न हैं करते।
न जनमे जो न हैं मरते।
तीन लोक के हैं जो ज्ञाता।
सारा जग जिनको है ध्याता।
ऐसे प्रभु गुण गाना।
भक्ष्याभक्ष्य में भेद बताती।
षट् द्रव्यों का ज्ञान कराती।
सस तत्व का ज्ञान कराती।
निज आतम से प्रीति लगाती।
जिनवाणी सुन जाना।
नग्न दिगम्बर हैं गुरुराज।
दया के सागर हैं मुनिराज।
अढाई स मूलगुण पाले।
निज आतम को सदा सम्हाले।
मुनिवर को नम जाना।
सारे जहाँ में अच्छा
(तर्ज - सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ…)
सारे जहाँ में अच्छा, है आत्मा हमारा-हमारा
सारे जहाँ में अच्छा।
सारे हैं ज्ञेय जग में, इक मैं ही जाननहारा
सारे जहाँ में अच्छा।
जो गोरा-काला दिखता, उसको शरीर कहते।
है सब शरीर विरहित, यह आत्मा हमारा-हमारा।।
सारे जहाँ में अच्छा।
मैं जानता हूँ केवल, ज्ञायक है नाम मेरा।
रंग-रूप से रहित जो, वह आत्मा हमारा-हमारा।।
सारे जहाँ में अच्छा।
मैं जन्मता न मरता, मोटा न पतला होता।
जो ज्ञान-सुख का सागर, वह आत्मा हमारा-हमारा।।
सारे जहाँ में अच्छा।
भगवान वीर के पथ
(नोट : इंसाफ की डगर पर बच्चो दिखाओ चलके…)
भगवान वीर के पथ, बच्चो दिखाओ चलके।
उनका ही पथ है प्यारा, भगवन दिखाओ बनके।।
अन्याय से तुम डरना, नीति के पथ पर चलना।
भोजन अभक्ष्य तजना, जिनदेव दर्श करके।।1।।
पाये हैं दुख अनन्तों, चारों ही गति में भ्रम के।
अब सुख क्षार चलो तुम, मिथ्यात्व पाप तज के।।2।।
पापों में तुम फंसे हो, जकड़े कषाय से हो।
तोड़ो ये सारे बंधन, निज आत्मा में रमके।।3।।
छोटे-छोटे बच्चे
छोटे-छोटे बच्चे, मन के होते सच्चे।
झूठ कभी न कसते, रहें बात के पक्के।।
गुरुजन का आदर करते, देवभ्राल कर जो चलते।
जिनदर्शन प्रतिदिन करते, रात्रि भोजन न करते।।1।।
ऐसे प्यारे बच्चे, लगते सबको अच्छे।।
मुँह पर न आये गाली, व्यर्थ बजायें न ताली।
भोजन करते ले थाली, अन्न बर्बाद न नाली।।
ऐसे प्यारे बच्चे, लगते सबको अच्छे।।2।।
नहीं किसी की चीज चुराते, पर वस्तु पर न ललचाते।
अतिथि देखकर जो हरषाते, सबका मन जो हैं बहलाते।।
ऐसे प्यारे बच्चे, लगते सबको अच्छे।।3।।
अच्छे बच्चे होते हैं
प्रातः सोकर जल्दी उठते, अच्छे बच्चे होते हैं।
दंतधावन करते स्नान, अच्छे बच्चे होते हैं।
प्रतिदिन जो जिनमंदिर जाते, अच्छे बच्चे होते हैं।
मात-पिता की सुनते बात, अच्छे बच्चे होते हैं।
बड़े जनों का आदर करते, अच्छे बच्चे होते हैं।
रात्रि भोजन कभी न करते, अच्छे बच्चे होते हैं।
जीवों पर जो करुणा करते, अच्छे बच्चे होते हैं।
सत्य वचन ही सदा बोलते, अच्छे बच्चे होते हैं।
निंदा चुगली कभी न करते, अच्छे बच्चे होते हैं।
प्रेम भाव जो सबसे रखते, अच्छे बच्चे होते हैं।
झगड़ा टंटा कभी न करते, अच्छे बच्चे होते हैं।
आदर से जो जिनवच सुनते, अच्छे बच्चे होते हैं।
जो सहयोग सदा ही करते, अच्छे बच्चे होते हैं।
भेदभाव जो कभी न करते, अच्छे बच्चे होते हैं।
चोरी बेईमानी न करते, अच्छे बच्चे होते हैं।
अच्छे काम सदा ही करते, अच्छे बच्चे होते हैं।
सीखो
नित प्रति जल्दी उठना सीखो,
नहाके मंदिर जाना सीखो।
मंदिर जाकर रवाना सीखो,
पानी छानकर पीना सीखो।।
अपना काम समय पर करना,
अपना काम स्वयं ही करना।
देख-देख कर चलना सीखो,
सत्य वचन ही कहना सीखो।।
दिन में भोजन करना सीखो,
बड़ों का आदर करना सीखो।
झगड़ा टंटा कभी न करना,
सबसे हिलमिल रहना सीखो।।
प्यारे बच्चो
प्यारे बच्चो जागो, नहाके मंदिर भागो।
मंदिर जाकर भोजन करना, भोजन करके शाला जाना।।
पानी पीना छानकर, जीव न मारो जानकर।
रात होते असंख्य जीव, भोजन करते मरते जीव।।
मरते जीव लगता पाप, नरकों में दुख भोगें आप।
देव के दर्शन दिन में भोजन, पिओ छानकर पानी।।
तब ही सच्चे जैन बनोगे, कहती माँ जिनवाणी।।
अच्छे बच्चे
अच्छे बच्चे प्यारे बच्चे, अकल के अच्छे मन के सच्चे।
काम आपका आप ही करते, काम आज का आज ही करते।
आलस में न समय गंवाते, मंदिर जाते शाला जाते।
चोरी चुगली कभी न करते, जीवों को न कभी सताते।
ऐसे प्यारे बच्चे, सबको लगते अच्छे।
गुड़िया रानी
गुड़िया रानी बड़ी सयानी।
पीती सदा छानकर पानी।
रात्रि भोजन कभी न करती।
प्रतिदिन ही जिनदर्शन करती।
अपना काम समय पर करती।
अपना काम स्वयं ही करती।
बड़े प्रेम से बातें करती।
सदा बड़ों का आदर करती।
दादी कहती, कहती नानी।
गुड़िया रानी, बड़ी सयानी।
कभी न कोई जीव सताती।
नहीं किसी का भेद बताती।
नहीं किसी की चीज चुराती।
परवस्तु पर न ललचाती।
साधर्मी लख जो हर्षाती।
घर-घर में है जानी-मानी।
गुड़िया रानी बड़ी सयानी।
भावना
चाय नहीं चाहिए, दूध भी नहीं चाहिए।
हमें मात्र पीने, जिन वचनामृत चाहिए।।
गाना नहीं चाहिए, गजल नहीं चाहिए।
सुनने को हमें बस, जिनवच चाहिए।।
नाटक नहीं चाहिए, फिल्म नहीं चाहिए।
नजरों से देखने, जिन मुद्रा ही चाहिए।।
धन नहीं चाहिए, पद नहीं चाहिए।
शान्ति सुखदाता ऐसा जिनधर्म चाहिए।।
महल नहीं चाहिए, नगर नहीं चाहिए।
सुख का निधान ऐसा शाश्वतधाम चाहिए।।
आसमान में
अनगिन तारे
आसमान में अनगिन तारे, जैसे भूपर बच्चे प्यारे।
लौकी खाओ टमाटर खाओ, आलू-प्याज कभी न खाओ।
मद्य-मांस न हाथ लगाओ, महा अशुद्ध शहद न खाओ।
पिज्जा जंकफुड है घातक, तन के नाशक मन के नाशक।
कोल्डड्रिंक भी कभी न पीना, छान-छान कर पानी पीना।
कर्मबंध नहीं होंगे प्यारे, आसमान में अनगिन तारे।
देव-शास्त्र-गुरु
रिंकु आओ, पिंकु आओ,
पिंकी आओ, पिंकी आओ।
आओ तुमको इक बात बतावें,
देव गुरु का ज्ञान करावें।
वीतराग हैं राग रहित जो,
हैं सर्वज्ञ सर्व जाने जो।
हैं सर्वज्ञ किन्तु निज ध्याते,
करें न कुछ वह देव कहाते।
वीतरागतामय जिनवाणी,
हम सबकी है जो कल्याणी।
सात तत्व छह द्रव्य बतावे,
शुद्धात्म है भिन्न दिखावे।
ज्ञान करे अज्ञान मिटावे,
समकित दे मिथ्यात्व भगावे।
नग्न दिगम्बर श्री मुनिवर हैं,
यही महान पूज्य गुरुवर हैं।
अट्ठाईस मूलगुण पालें,
सिद्धों सम निजरूप सम्हारें।
भैया आओ बहिन न आओ,
इनको सादर शीश नवाओ।
देव हमारे हैं अरहन्त
आओ बच्चो आओ, सब मिल कर के गाओ।
देव हमारे हैं अरहन्त, गुण अनंनमय महिमावन्त॥
राग-द्वेष न करते, नहीं किसी से डरते।
भूख-प्यास न लगती, मृत्यु जिनसे डरती॥
नींद क भी न आवे, नहीं पसीना आये।
रोग-शोक-मद से हैं दूर, सुख सरोवर से भरपूर॥
लोकलोक के ज्ञाता हैं, दिसमय कभी न आता है।
जन्म कभी न होता, दूर बुढ़ापा रोता॥
पर की चाह न चिन्ता है, खेद रहित भगवन्ता है।
दुःख जिन्हें न छूता, शोक कभी न होता॥
भक्तों से न करते प्यार, लेन-देन का न व्यापार।
चार कर्म का कीना अन्त, ऐसे होते हैं अरहन्त॥
गाँव में एक मदारी आया
गाँव में एक मदारी आया, साथ में अपने बंदर लाया।
डम-डम डमरू लगा बजाने, बंदर को भी लगा नचाने॥
तब तक ज्ञायक भैया आये, लगे मदारी को समझाने।
भैया बंदर भी इक जीव, सुख-दुःख भोगे जाने जीव॥
नाच नाचना, गाना गाना, बंदर का है नहीं स्वभाव।
मार-मार कर और सताकर, तुम दिखलाते अपना ताव॥
बंदर को जब नाच नचाते, सभी बजाते हैं ताली।
पर बंदर तो बंधन में है, मन ही मन देता गाली॥
बंदर को तुम मुक्त करो, जिनज्ञान में मस्त रहो॥
छह द्रव्य
गोलू बोला मम्मी से,
जल्दी से इक बात बताओ।
इस दुनिया को किसने बनाया,
फौरन हमको समझाओ।।१।।
मम्मी बोली बेटा - यह दुनिया तो बनी बनाई।
कोई ईश्वर नहीं बनाता, न ही किसी ने मिटा पाई।।२।।
रहते हैं छह द्रव्य जहाँ पर, उसको दुनिया कहते हैं।
मिले-जुले रहते दिखते पर, सदा भिन्न ही रहते हैं।।३।।
जाने देखे सुख को भोगे, जीव उसी को कहते हैं।
वर्ण-गंध-स्पर्श सहित जो, पुद्गल उसको कहते हैं।।४।।
जीव अरु पुद्गल निजशक्ति से चलते-फिरते दिखते हैं।
चलने में जो होय सहायक धर्म उसी को कहते हैं।।५।।
रुकने में जो होय सहायक, वह अधर्म है कहलाता।
है आकाश जगह जो देता, मानों सबको हो छाता।।६।।
सब द्रव्यों के परिवर्तन में, काल निमित्त सदा होता।
हैं अनादि से द्रव्य सभी, जो न माने फिरता रोता।।७।।
छह द्रव्यों के हैं समूह को, दुनिया लोक विशेष कहते।
सभी द्रव्य निज गुण पर्याय में, सदा मस्त होकर रहते।।८।।
गोलू बोला मम्मी से, बस माँ दुनिया मैं समझ गया।
है अनादि अविनाशी दुनिया, मैं भी ऐसा समझ गया।।९।।
महाभाग्य है मेरा मम्मी, जो तुझसी माता पाई।
सबके तुमसी मात मिले तो जीवन होवे सुखदायी।।१०।।
सिंह से सिद्ध
महाभयंकर शेर था वन में।
मिले शिकार सोचता मन में।।
हिरण तभी दीना दिखलाई।
जोर से उसने छलांग लगाई।।
पंजा मारा बड़े जोर से।
गिरा हिरण, सिंह देखे गौर से।।
पुण्योदय उस सिंह का आया।
महाभाग्य मुनि दर्शन पाया।।
आँख फाड़ देखे मुनिवर को।
धीर-वीर निर्भय मुनिवर को।।
संजय-विजय खड़े मुनिराज।
बोले सुनो भव्य वनराज।।
नहीं शेर तुम हो शुद्धात्म।
राग-द्वेष तज बनो परमात्म।।
शुद्धात्म की कथनी सुनकर।
परमात्म दिखलाया मुनिवर।।
पर्यटा-बुद्धि सिंह ने छोड़ी।
तन मन से है ममता तोड़ी।।
सम्यग्दर्शन ज्ञान है पाया।
दुःखमय पथ तज शिवपथ धाया।।
दसवें भव में महावीर बनेगा।
वही सिंह अब सिद्ध बनेगा।।
परिणामों का फल
इक जंगल में इक मुनिराज, वहाँ पै आया इक वनराज।
वनराज ने मुनिराज पर, करना चाहा था उपसर्ग।।
तभी सुअर आ गया वहाँ पर, बोला कौन करे उपसर्ग?
दोनों में झगड़ा हो आया, मुनिराज ने ध्यान लगाया।।
किया एक सी सिंह-सुअर की, परिणामों में किन्तु फेर।
सुअर गया है स्वर्ग में देखो, और नरक में पापी शेर।।
मुनिराज तो ध्यान लगाकर, सिद्धालय में चले गये।
निजपरिणामों का फल मिलता, तीनों ही यह सिखलाये।।
हम भी निज परिणाम सुधारें, सब सिद्धालय जाय पधारें।
रक्षाबंधन
रक्षाबंधन का त्योहार,
देता हमको शिक्षा चार।।
भले किसी के संग रहना,
पर विवाद में न पड़ना।
चाहे यदि दुःख से बचना,
गुरु की आज्ञा में रहना।।
चाहे जैसा बने प्रसंग,
साधर्मी का देना संग।
पूर्वापर सब करके विचार,
देना वचन किसी को यार।।
रक्षाबंधन पर्व महान,
वात्सल्य गुण महा प्रधान।।
बोलो महावीर, बोलो वर्धमान
बोलो महावीर, बोलो वर्धमान,
जय-जय महावीर, जय-जय वर्धमान।
सन्मति-वीर के पथ चलना, राग-द्वेष में नहीं फँसना।।
चैत्र शुक्ल तेरस सुखदायी, कुण्डलपूर में खुशियाँ छाई।
सिद्धराय के राजदुलारे, त्रिशला की आँखों के तारे।
अंतिम तीर्थंकर गुणखान, खुशियाँ मनायें सकल जहान।।1।।
वीर ने शादी नहीं रचाई, युव वय में ही दीक्षा धारी।
सती चंदना कीना दान, जिससे वह भी हुई महान।
वर्ष बयालीस केवलज्ञान, दर्शन सुख अरु वीरजवान।।2।।
षट् द्रव्यों का ज्ञान कराया, सप्त तत्व का भान कराया।
विषय-कषाय कहे दुःखदायी, निज आतम से प्रीति लगाई।
स्वाध्याय तप है महिमावान, जिससे मिलता केवलज्ञान।।3।।
कार्तिक मावस मुक्ति पाई, सिद्ध शिला पर बैठे जाई।
हुए वीर अब सिद्ध भगवान, नहीं जन्म लेंगे दुःख खान।।4।।
वो हैं मेरे आदिनाथ
नाभिराय हैं पिता जिनके -
वो हैं मेरे आदिनाथ।
मरुदेवी हैं माता जिनकी -
वो हैं मेरे आदिनाथ।
ऋषभदेव है जिनका नाम -
वो हैं मेरे आदिनाथ।
नन्दा-सुनन्दा रानी जिनकी -
वो हैं मेरे आदिनाथ।
ब्राह्मी-सुन्दरी बेटी जिनकी -
वो हैं मेरे आदिनाथ।
भरत-बाहुबली बेटे जिनके -
वो हैं मेरे आदिनाथ।
असि-मसि-कृषि की शिक्षा दीनी -
वो हैं मेरे आदिनाथ।
राज त्याग कर दीक्षा धारी -
वो हैं मेरे आदिनाथ।
राजा श्रेयांस ने दिया आहार -
वो हैं मेरे आदिनाथ।
इक्षुरस का किया पारणा -
वो हैं मेरे आदिनाथ।
अष्टापद से मोक्ष पधारे -
वो हैं मेरे आदिनाथ।
( बच्चों से वो हैं मेरे आदिनाथ बुलवावें )
भारत का भारत देश महान
भारत का भारत देश महान, भारत का भारत देश महान।
आदिनाथ से महावीर तक, जन्में श्री भगवान।
दीक्षा घर कर करी तपस्या, पायो केवलज्ञान।।१।।
राम-कृष्ण अरु पाँवों पाण्डव, हुए हैं महिमावन्त।
धीर-वीर अरु कामदेव भी, हुए हैं श्री हनुमान।।२।।
सीता-द्रौपदी सती अंजना, जाने जिन्हें जहान।
मैना-सोमा-राजुल-चेलना, करता जग गुणगान।।३।।
कुन्दकुन्द-घरसेन-नेमिचन्द, राही हमारी शान।
धन्य-धन्य राजुल चेलना, करता जग गुणगान।।४।।
पाप है
जीव सताना…पाप है।
दिल दुखाना…पाप है।
झूठ बोलना…पाप है।
गाली देना…पाप है।
चोरी करना…पाप है।
निन्दा करना…पाप है।
चुगली करना…पाप है।
पानी बहाना…पाप है।
फूल तोड़ना…पाप है।
रात्रि भोजन…पाप है।
बहिनों को छेड़ना…पाप है।
बहु सामग्री जोड़ना…पाप है।
दशलक्षण
हैं पर्व हमारे दशलक्षण। दर्शाते हैं निज लक्षण।
प्रकटें जीवन में दशलक्षण। विनशेगा जन्म-मरण तक्षण।
क्षमा-मार्दव-आर्जव धन। शौच-सत्य-संयम जीवन।
तप अरु त्याग से मिलता चैन। आकिंचन-ब्रह्मचर्य सुखदेन।
अमृतमय यह दशलक्षण। हमको प्यारे दशलक्षण।।
क्षमा
जड़ चेतन के सारे काम। स्वयं ही होते आठों याम।
अपने में अपने से होते। जो न माने फिरते रोते।
प्रतिकूल जब कार्य है होता। करता गुस्सा आपा खोता।
जो भी हमको गाली देता। पाप कमा अनहित कर लेता।
वस्तु का संयोग वियोग। पापोदय में ऐसा योग।
मैं तो ज्ञानानंदमयी हूँ। क्रोधी नहीं क्षमाभावी हूँ।
सब ही तो हैं मेरे जैसे। गुस्सा हो फिर क्यों और कैसे?
क्षमा भाव वीरों का लक्षण। क्षमा शान्ति से होती तत्क्षण।।
मार्दव
धन-पद से जो बड़ा मानते,
तन बल से बलवान जानते।
जड़ शरीर को सुन्दर जाने,
निज सुन्दरता न पहचाने।
मात-पिता या मामा-मामी,
उनसे निज को माने नामी।
तप-ऋद्धि या हो अधिकार,
मानी करता इनसे प्यारे।
जड़ धन देकर माने दानी,
नाम चाहने वाला मानी।
मानी सबको नीचा जाने,
खुद को सबसे ऊँचा माने।
यह छोटा ये निजरे,
मार्दव धर्म कभी न धारे।
कोमलता सारी मिट जाए,
जब होती है मान कषाय।
निज को ज्ञान दर्श मय जानो,
अरस-अरूप अमर पहचानो।
तन-मन-धनपद पर ही जानो,
समताभाव सदा मन आनौ।
मान कषाय महा विषरूप,
मैं तो हूँ चैतन्य स्वरूप।
अहंकार अरु मान जशाय,
मार्दव धर्म तभी कहलाय।
आर्जव
गोलू, भोलू आए, खेल खिलौने लाए।
खेल-खिलौने देख-देखकर दोस्त दौड़ते आए।
गोलू बोला भोलू से, हम नहीं खेलें रामू संग।
भोलू पूछे गोलू से, क्यों न खेलो रामू संग।
रामू दिखता है भोला, पर भीतर से है भाला।
गोरा इसका चेहरा है, पर मन से है अति काला।
यह कहता, करता कुछ और, रहे सोचता यह कुछ और।
तन से रहता अपने संग, मन में चलती है और ही दौड़।
इसी को कहते मायाचार, इसके संग कैसा व्यवहार?
रामू बोला हाथ जोड़कर, क्षमा करो मेरा व्यवहार।
भोलू बोला हम सब मित्र, हम सबका हो उच्च चरित्र।
छल प्रपंच को अभी छोड़कर, आर्जव से हम होय पवित्र।।
शौच
लोभ पाप का बाप है। देता बहु संताप।
धन-पद-यश अरु नाम का लोभ। पैदा करता मन में लोभ।
लोभ के वश हो करता पाप। न देवे न खर्चे आप।
लालच-तृष्णा इसके नाम। करते जो हमको बदनाम।
लोभ से बंधते निश दिन कर्म। लोभ तजो धारो शुचि धर्म।।
सत्य
वे ही अच्छे होते बालक।
सत्य धर्म के जो हों पालक।
सजा मिले पर झूठ न बोलें।
सत्य और जो प्रिय ही बोलें।
सत्यवादी का हो विश्वास।
उसे रहे न पर की आस।
सत स्वभाव अपना पहचानो।
निश्चय धर्म तभी हे मानो।
सत स्वभाव को जानो भाई।
सत्य वचन बोलो सुखदाई।
उत्तम संयम
बिना ब्रेक की गाड़ी, कोई चलावे अनाड़ी।
टक्कर होगी पक्की, अस्पताल में नक्की।
भक्ष्य-अभक्ष्य विवेक बिना, पानी पीता बिना छना।
निश दिन खाये जैसे आँस, मुँह खोले ज्यों लेटर बॉक्स।
बिन देखे दौड़े भागे, कभी न देखे पीछे आगे।
हिंसा करके बांधे पाप, चार गति में भ्रमंता आप।
चेतन चाहे आतम हित, खाना-चलना हो परिमित।
संयम सहित जिओ जीवन, यह जीवन बन जाये उपवन।
उत्तम तप
प्यारे बच्चो आओ, जिनमंदिर में आओ।
जिनवाणी को पढ़कर, ज्ञान का दीप जलाओ।
स्वाध्याय से भेदविज्ञान, भेदज्ञान से आत्मज्ञान।
आत्मज्ञान संग तप करना, तप के द्वारा सुख लखना।
स्वाध्याय से होता ज्ञान, स्वाध्याय हरता अज्ञान।
स्वाध्याय से मिटता दुःख, स्वाध्याय से मिलता सुख।
स्वाध्याय से कटते कर्म, स्वाध्याय से होता धर्म।
तप के होते बारह भेद, धारण करो होय नहीं खेद।
उत्तम त्याग
राग को छोड़ो द्वेष को छोड़ो। लड़ना और झगड़ना छोड़ो।
क्रोध मान अरु माया छोड़ो। लोभ पाप का बाप है छोड़ो।
पंच पाप से अब मुँह मोड़ो। निशि भोजन से नाता तोड़ो।
जिन मंदिर से नाता जोड़ो। गंदी आदत सारी छोड़ो।
मित्रों को दो विद्या दान। साधर्मी को भोजन दान।
जीव मात्र पर करुणा करना। रोगी को शुद्ध औषधि देना।
दाह हैं भेद दान के चार। समझो इनको भली प्रकार।
दान भाव होता शुभ राग। निश्चय दान में इसका त्याग।
उत्तम आकिंचन्य
धन, मकान अरु नौकर चाकर।
सोना-चाँदी अरु रत्नाकर।।
माता-पिता अरु परिजन-पुरजन।
मैं नहीं रह सकता हूँ इन बिन।।
इन सबको ही अपना कहना।
यही परिग्रह भाई-बहिन।।
परिग्रह के हैं चौबिस भेद।
इनकी ममता से हो खेद।।
पर परमाणु रंच न मेरा।
है ममत्व दुःख रूप घनेरा।।
मैं हूँ दर्शन-ज्ञानस्वरूपी।
चिदानंद चैतन्य स्वरूपी।।
आकिंचन्य धर्म को धारो।
निज स्वरूप परिपूर्ण निहारो।।
परिग्रह भार होय जब दूर।
सुख पाता चेतन भर पूर।।
उत्तम ब्रह्मचर्य
प्रिंस बोला प्रिंसी से, आओ मेरे पास।
दशलक्षणमय धर्म की, बात बताऊँ खास।।
धर्म एक वीतराग है, दश तो हैं बस नाम।
आकुलता को दूर कर, पहुँच जाते सुख धाम।।
पंचेंद्रिय के विषय सब, हैं अब्रह्म स्वरूप।
विषयों की यह चाह ही, है महान दुःख रूप।।
हँसी-ठिठोली राग रंग, जिनानंद का करते घात।
पर स्त्री या पुरुष हो, उनके प्रेम से होता पाप।।
विषयों की अभिलाष तज, रहो जिनानंद मस्त।
शील स्वभाव को जानकर, करकुशील को पस्त।।
ब्रह्मस्वरूपी आत्मा, में ही रम जाओ।
ब्रह्मचर्य को धार कर, अनुपम आनंद पाओ।।
हम चाहते हैं
हम चाहते हैं ऐसे युवा वर्ग का निर्माण
जिनका जीवन हो तत्वज्ञान से सुरभित,
शरीर हो,
जिनवाणी के प्रचार-प्रसार में समर्पित
मन में हो
देव-शास्त्र-गुरु के प्रति भक्ति
आचरण में हो
संयम, सदाचार और जैनाचार यथाशक्ति
हृदय में हो महापुरुषों की स्मृतियाँ
जो हों विवेकी, स्वाभिमानी
पर
विनयशील अरु निरभिमानी।
हे प्रभुवर ! हे गुरुवर ! सामर्थ्य दो,
स्याद्वादमयी वाणी से
वात्सल्य एवं प्रभावना की भावना लेकर
मार्ग में बढ़ सकूँ
अपने से अच्छा इन छात्रों को पढ़ा सकूँ
जिनका लक्ष्य हो केवल निर्वाण
हम चाहते हैं ऐसे युवा वर्ग का निर्माण।
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दिनांक 2 दिसंबर से 7 दिसंबर 2017
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स्रोत: Gyata संग्रह।
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