कवि सम्मेलन
कवि सम्मेलन
प्रस्तुति - तपिश शर्मा, उदयपुर
- संवात्क- सभी रसिकजनों को जय जिनेन्द्र। आप सभी का इस सुन्दर कवि सम्मेलन में भावभीना स्वागत है। सर्वप्रथम मैं आज के कार्यक्रम की शोभा को बढ़ाने के लिए देश-विदेश से पधारे हुए समस्त कविगणों का यहाँ मंच पर आमंत्रित करता हूँ और सभी जोरदार तालियों से इन कवियों का यहाँ स्वागत करें…
बहुत-बहुत धन्यवाद पधारे हुए सभी कवियों का… ये हम सभी के लिए हर्ष की बात है आज इस नगर की महान धरा पर हमारे बीच बहुत निवेदन के बाद ये सभी कविगण यहाँ पधारे हैं। कुछ पंक्तियों से सभी का यहाँ स्वागत करते हैं-
खुशियों की झोली भर-भरवा सवेरा आये,
आत्म की महिमा का मंत्र दुनिया में लहराये।
सुन्दर है वर्तमान और अतिसुन्दर हो आगत,
कविगणों का अभिनन्दन है आप सभी का स्वागत।।
प्रत्येक शुभ कार्य का निर्विघ्न समापन हो जावे इसलिए मंगलाचरण करने की परम्परा रही है। इस आध्यात्मिक कवि सम्मेलन का प्रारम्भ करते हुए मैं सर्वप्रथम हमारे बीच आमंत्रित करना चाहता हूँ कवि मंगलमय जी को, जो की मंगल धाम, मंगल मार्ग, मंगलपुर से हमारे बीच उपस्थित हुए हैं, जोरदार तालियों से आपका यहाँ स्वागत है-
- कवि मंगलमय- (कुरजा-पावजाना)
मंगलमय है मंगल करते पाँचों परमेष्ठी भगवान,
मंगलमय वे मानें हमको इनको देवे मुक्ति की खान।
इसीलिए हम मंगल करते जिससे हो मंगलमय काम,
जय हो मंगलमय जिनवर की, होवे मंगल आठों याम।।
- संवात्क- धन्यवाद कवि मंगलमय जी, इस मंगलमय मंगलाचरण के उपरान्त अब मैं भगवान महावीर को नमस्कार करते वाले एक सुन्दर कविता सुनाने के लिए बुला रहा हूँ कवि वर्धमान जी को, वे आएं और कविता सुनाएं…
- कवि वर्धमान- (नामित कपड़े)
मेरे नयनों की ज्योति भरसक का चन्दन, मेरा अलंकार मेरे कर्मों का बंधन।
महावीर स्वामी शिक्षा के वन्दन, तुमको हो मेरा शत शत वन्दन।।
धागों को जोड़ा तो वीर बन गया, इन्द्रियों को जोया तो शरीर बन गया।
नाम तो प्रभु का सिर्फ वर्धमान था, कर्मों को तोड़ा तो महावीर बन गया।।
- संवात्क- बहुत सुन्दर, कवि वर्धमान ने भगवान महावीर का स्मरण कर इस कार्यक्रम को और भी सुन्दर बना दिया है। अब मैं आह्वान करना चाहता हूँ चेतनपुरी से पधारे कवि चेतनराज जी को, उनके स्वागत में कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं-
बहुत सुखों का अवसर आया आओ सफल समाज
कविता सुनाने यहाँ पधारे कविवर चेतनराज।।
- कवि चेतनराज- (कुरती-पावजाना)
आप सभी अध्यात्म प्रेमी जनों को मेरा सादर शुद्धातमा वंदन, मैं दो पंक्तियों में आप सभी को अध्यात्म का सार बता रहा हूँ, ध्यान से सुनिए-
देवालय में देव नहीं है, अपने अन्दर देव है।
अन्तर्मुख तू देख स्वयं ही महादेव स्वयमेव है।।
इसी तरह कुछ और पंक्तियाँ सुनाना चाहता हूँ-
पर विषय की नहीं कलिमा जहाँ न हाहाकार सखे,
जन्म-मरण का तोड़ के बंधन चलो चले उसपार सखे।
है अनंत सौन्दर्य अनुपम हो जहाँ नहीं दन्तवल,
निज वैभव से गुणभरपूर है सुनिर्मित दासी सौम्य तरला।
श्रद्धा-ज्ञान-चारित्र त्रिवेणी निजपुर को हितकार सखे,
जन्म-मरण का तो के बंधन चलो चले उस पर सखे।।
- संवात्क- कवि चेतनराज की सुनकर मुझे भी इसी तरह की पंक्तियाँ याद आ रही हैं-
कोई किसी को दे सकता क्या कर तो जरा विचार सखे,
अपने-अपने भावों में है, सबका ही संसार सखे।
सहज-शुद्ध चेतन्य आत्मब्रह्मवती अन्दर घर सखे,
अपने को ही कर समर्पित मैं अपना यह प्यार सखे।।
अब मैं आपके बीच पंजाब से पधारे कवि को बुला रहा हूँ-
जिनकी कविता को सुनने से मिलता सरस अपार।
ऐसी प्यारी कविता लेकर आये कवि करतार।।
- कवि करतार- (पंजाबी तुंगी, कुरता-झंगड़ा करते हुए प्रवेश)
आज के प्रत्येक मानव की बात को दो पंक्तियों में बताने का प्रयास करूँगा, पसंद आये तो ताली जरूर बजाना-
साईं इतना दीजिये, जामें बैंक समाया कोठी शीशे न रहे, पेटी भी भर जाए।।
- संवात्क- ठहरो-ठहरो कवि महोदय, आपकी कविता के बारे में मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ-
तुम पेट भरे पैरी न भरे, तुम सेठ न बनो समेटी न बनो।
तुम पुण्यदेव से धनी बनो, पर औरन को धन तो न हरो।।
हाँ, अब आप अपनी आगे की कविता सुनाने के लिए स्वतंत्र हैं-
- कवि करतार- जी बिल्कुल-
कोई कहता है मैं सोने के महल बनाऊंगा,
कोई कहता है मैं प्रधानमंत्री बन जाऊंगा।
पर तुझे ये तो सोचा होता की तेरे जीवन की क्या औकात है?
चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात है।।
- संवात्क- समझ में आया आप लोगों को कि कवि क्या कहना चाहते हैं, मैं समझाता हूँ-
वक्त पर जो वक्त की जो कदर नहीं करता है
वक्त भी उस पर उसे कमबख्त बना देता है।
अब मैं आमंत्रित कर रहा हूँ कवयित्री भागनायके जी को, जो पधारी हैं रावण के देश लंका से अर्थात् श्रीलंका से उनके सम्मान में दो पंक्तियां प्रस्तुत हैं-
रावण की नगरी से आई जो अच्छी कवयित्री
वे भागनायके आकर खोलें अपनी प्रीति।।
- कवयित्री भागनायके- (साड़ी)
महाप्रतापी रावण के संग में भी वैभव नहीं गया,
वज्रदत्त समान सिकंदर हाथ पसारे चला गया।
बड़े-बड़े राजा-महाराजा जिसे संग न ले जा पाए,
तुम किस खेत की मूली हो जो इसे साथ लेये आये।।
अब कुछ पंक्तियों में मैं परमाके गुण को प्राप्त करने का तरीका बता रही हूँ, जरा ध्यान से सुनिए-
भावों है तो जानने सरस अप्सर मयेट्टो,
किसी को हार्ट प्रत्येक तो किसी का एवर्सिट्टा।
अगर चाहते हैं सुखम परमाकेट्टो,
तो कुन्दकुन्द के वचनों एकएट्टो, तब मुक्ति मिलेगी परमाकेट्टो।
- संवात्क- सच ही कहा है-
मीठा नीम की तरह आती है, जिंदगी फिर भी बिखर जाती है।
तुमसे तो आदत है जीने मरने की, मौत बदनाम हुई जाती है।
अब मैं बुला रहा हूँ, तमिलनाडु से पधारे कवि ए. नामिराजन् को, जो की तमिलभाषी है, उन्हें हिन्दी नहीं आती है फिरभी इन्होने हमारे विशेष आग्रह पर हमारे कवि सम्मेलन में आने के लिए हिन्दी सीखी है। हाँ तो आइये कवि ए. नामिराजन् जी…
- कवि ए. नामिराजन्- (सफ़ेद तुंगी, सफ़ेद हाफ शर्ट, सफ़ेद तिलक)
वणाक्कम जी… वणाक्कम जी…
अय्य वो जी, हमको इन्दी नई आता जी, हमारी बासा तमिल, फिर बी आप लोग का
कारण इन्दी लिखा है जी-
काव्य
जो भूल कर मुस्कुराये उसे शैतान कहते हैं जी,
जो भूल पर न पछताये उसे नादान कहते हैं जी।
जो भूल से कुछ सीख जाये उसे बुद्धिमान कहते हैं जी।
और जो कभी भूल न करे उसे भगवान कहते हैं जी।।
अय वय वो जी, मैं चार पंक्तियाँ और बोलना चाहता हूँ जी, तो सुनिए जी-
माली शैतान को मुरीस्तान बनाता है जी,
आचरण हैवान को इंसान बनाता है जी।
मैं महावीर की बात करता हूँ किसी दूसरे की नहीं,
धर्म इंसान को भगवान बनाता है जी।।
- संवात्क- इसीलिए तो मैं आप सभी से धर्म करने के लिए कहता हूँ, क्योंकि
बीतने वाली घड़ी को कौन लौटा पायेगा,
इस काया का इस धर्म पर सब क्षय रह जाएगा।
जिंदगी भर का कमाया साथ में क्या जाएगा,
यह सुअवसर खो दिया तो अन्त में पछतायेगा।।
अब मैं आवाज़ दे रहा हूँ बनारस से पधारे कवि शराफत को, उनके लिए दो पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं-
लिखने में हैं मीठे सादे- गरिमा है पूरी यह आफ़त।
बनारस से पधारे हैं, हमारे कवि मियाँ शराफत।।
कवि शराफत- (ऊर्जा, पुरजा परवाना, एक घोष)
मैं आप जैसे अश्रावकों और मुमुक्षुओं की सभा में क्या बोलू, चलो, मंगत, उत्तम और शरण कौन-कौन से होते हैं यह ही बता देता हूँ-
चार मंगत- सोना मंगत, चांदी मंगत,
रुपया मंगत, पत्नी मंगत।
चार उत्तम- पुत्र लोत्तम, धंधा लोत्तम,
बिजोड़ी लोत्तम, ग्राहक लोत्तम।
चार शरण- सासू शरणं पव्वज्जामी, ससुर शरणं पव्वज्जामी।
मोहावत शरणं पव्वज्जामी टीवी शरणं पव्वज्जामी।
- संवात्क- भारत के सर्वाधिक वर्षा वाले स्थान मेघपुंजी से पधारे वचकचायमान कवि किकिकिकचंड को, वे वकवते हुए आये और इस कवच को चमकाएँ।
अपने-अपने घर की बातें सब कर ले अब बंदा
जिनवाणी का सार बताने आवे कवि किकिकिकचंदा।
कवि किकिकिकचंड- (तेज कंठ, छोटा भाषा)
जब कलकत्ता में अमिताभ बच्चन का मंदिर बनने की बात सुनी तो मुझसे रहा न गया और मैंने एक कविता लिख डाली, जो इस प्रकार है-
फूलों से भरे गुलशन वीरान हो गए,
अपवित्र उपन्यास ही पुराण हो गए।
मंदिरों के शास्त्रों में तुम पाजीने ही गया,
जब फिल्मी देवता ही तुम्हारे भगवान हो गए।
अब मैं कलकत्ता की नारियों के बारे में चंद पंक्तियाँ पेश करना चाहता हूँ-
बहुए बिटिए साजे जनदे सब कलतुन की नारी,
मंदिर जी में आकर करती कर की वारी सारी।
यही बनाती दात-साग और करती तू तू मैं मैं,
करके श्रृंगार के पूजती कैसी लगती हूँ मैं।
- संवात्क- अब मैं आप लोगों के समक्ष पेश कर रहा हूँ सुमतीलेया से पधारी कवयित्री सुमरकली जी को, वे झुमते-झुमते आये और अपनी झुमने वाली कविता से हम सभी को झुमायें…
कवयित्री सुमरकली- (तन्हा-तुनकी)
पहले मैं नारियों का मजाक बनाने वाले कवि किकिकिकचंड की किकिकिक बंद कर देना चाहती हूँ सुनो किकिकिकचंड-
तुम नारी नारी मत कहो, नारी नर को खाना
नारी से पैदा हुए चौबीसों भगवाना।
अब सुनाती हूँ मैं आपको अपनी कविता में आप लोगों को पापा की परिभाषा बताना चाहती हूँ और हाँ नारियों की गलतियाँ देखने वाले पुरुष सुन ले की वे कितने पानी में हैं-
पहला पाप स्वयं को भूलें, दूजा पाप विवाह कर भूलें।
तीजा पाप सुता-सुत जाए, तब चौथा पाप कहाये।।
- संवात्क- वाह, कवि सुमरकली ने अपनी कविताओं से कवि किकिकिकचंड को जो मुँहतोड़ जवाब दिया है, उसके लिए जोरदार तालियाँ…
जिनके एक-एक मुक्तक में भरा हुआ है आगमा
ऐसे मुक्तक हमें सुनाने आय कवि परमागम।।
कवि परमागम- (सफेद कुरता-पायजामा)
मैं आप लोगों को अतींद्रिय आनंद के सरोवर में सरोबार होने की विधि संक्षेप में बताना चाहता हूँ ध्यान से सुनिए-
पर से स्व, स्व में बस
आएगा आत्मा में अतींद्रिय रस
यह ही है अध्यात्म का कस
इनमे करो बस।।
- संवात्क- वाह, कविराज ने तो अध्यात्म रूपी फल का रस हमें दर्शाया, वास्तव में हमारा कर्तव्य है ही इतना। इतनी सारी हिन्दी कविताओं के बीच में अब मैं बुलाना चाहता हूँ मैडम एलिजाबेथ को जो अमेरिका से की राजधानी वाशिंगटन से हमारे बीच पधारी हैं।
मैडम एलिजाबेथ-
Please listen to my poem very quietly…
There is nothing good or bad, but our thinking makes it so.
If you don’t want to be sad, so don’t go there but here go.
- संवात्क- लगता है आप लोगों को मैडम की पोएम समझ में नहीं आई कोई बात नहीं मैं आपको हिन्दी में समझा देता हूँ उनका कहना था-
जगत में कोई इष्ट नहीं होता,
जगत में कोई अनिष्ट नहीं।
उधर मत देख इधर देख ओ भव्य,
आत्मा को जाने बिना कोई संतुष्ट नहीं होता।।
मैं मैडम एलिजाबेथ से रिक्वेस्ट करता हूँ वो थोड़ा सा अपनी पोएम को हिन्दी में ही सुनाने की कोशिश करें जिससे हम लोगों को समझ में आ सके।
मैडम एलिजाबेथ-
संवात्क सर के आर्डर को एक्सेप्ट कर मैं आपको हिन्दी में कुछ सुनाने की कोशिश करती हूँ
अमेरिका में फोन कभी डेड होते नहीं, टेंशन में आदमी भले ही मर जाते हैं,
बिजली नहीं भागती भले बीवी भाग जाये, नौकर और नौकरानी कार में ही आते हैं।
आप जो नहाये तो और बात है मगर, पानी बाथरूम में चौबीस घंटे आता है,
सारी सुख सुविधाएँ हैं तन के लिए मगर, अपनी आत्मा का नहीं फालतू उड़ जाता है।
- संवात्क- क्या बात है, जो अमेरिका जैसे विदेशों में जाने के सपने देखते हो वे सभी इस बात को ध्यान से सुनो। अब आपके सामने प्रकट हो रहे हैं बाटाजनगर से पधारे कवि वृता-
जिनकी कविताओं में सबके हृदय जैन को तूला
अब मैं आवाज़ दे रहा हूँ, आवे कवि वृता।।
कवि वृता- (हाफ पैंट, हाफ शर्ट)
प्यासे को पानी चाहिए, नवाबों को रानी चाहिए
तीर्थों को दानी चाहिए, राजाओं को रानी चाहिए
दुनिया को दुनिया जाने
19. संवादाता-
बूटा जी ने जो कविता सुनाई उसमें जिनवाणी का सार हमारे सामने रख दिया है और अब मैं आपके सामने सुना रहा हूँ वीर रस के ताप में समयागमराज भगवान कवि तांडव जी को,
जिनका तांडव देख देखकर डर जाते थे पांडव
ऐसा तांडव हमें दिखाने आये कवि तांडवा।
20. कवि तांडव- (लात कुर्ता, लाल तिलक)
हे महावीर भगवान हम आपके आदर्शों पर जी रहे हैं,
पाली तो पाली शराब भी छान कर पी रहे हैं।
मैं आप लोगों के सामने बहुत दिनों से पेट में पल रहे गुस्से को उगले देना चाहता हूँ-
मैं उनको तपाऊँगा जिन्होंने मुझे तपाया है,
मैं उनको रुलाऊँगा जिन्होंने मुझे रुलाया है,
वीर महावीर का बेटा हूँ किसी कायर का नहीं,
मैं उन कर्मों को भगाऊँगा जिन्हें महावीर ने भगाया है।
21. संवादाता-
कवि तांडव को ज्यादा देर हम नहीं बोलने दे सकते क्योंकि उनकी भर्जना में यहाँ आग भी लग सकती है। तांडव जी ने सही ही कहा-
अग्नि बुझाने के लिए वीर चाहिए,
दुःख दर्द मिटाने के लिए पीर चाहिए
एका ब्रह्म को जोर से मिरदी नहीं हिंसा,
हिंसा मिटाने के लिए महावीर चाहिए।
तांडव जी के इस तांडव को देखने के बाद अब जरूरत है रस परिवर्तन की। अब हम बुला रहे हैं गुजरात से पधारे कवि रसिकभाई मेहता को, जो की सोमनगढ़ से हमारे बीच पधारे हैं।
22. रसिकभाई मेहता- (गुजराती कुर्ता-पायजामा, जैकेट और पगड़ी)
हूँ गुजरातमा काव्यिवाद थी आवो हूँ, हवे हूँ मारी कविता वाचु छु, वधा त्यान श्री मामभंडजी-
जहाँ-जहाँ भी आप जाएगे ऐसा जादू कर जाता,
जड़ तक को चेतन के दिमाग्य रंग में रंग जाता।
तेरा सोमनगढ़ महावीर मंदिर को दर्शक कहता है,
मंदिर की दीवारों को भी समयसारगमय कर जाता।
23. संवादाता-
अब मैं आपके सामने आमंत्रित कर रहा हूँ मद्रास से पधारे कवयित्री सेवतीबाई गणपत राव गोडबोले को,
हम सबके इस बंद हृदय के ताले को जो खोले।
ऐसी कविता हमें सुनाये सेवतीबाई गोडबोले
24. सेवतीबाई गणपतराव गोडबोले- (नाट्यदृष्टी साड़ी)
वीर प्रभु कह गए सभी से जैनी वह कहलाएगा,
दिन में भोजन छान के पानी, नित्य जिनलय जाएगा।
लेकिन आजकल इन तीनों नियमों का निर्दोष पालन करने वाले जैन तो ढूँढने से भी नहीं मिलेंगे। आज के जैनी की दशा को कुछ पंक्तियों में प्रस्तुत कर रही हूँ-
न दिन में चैन न रात में चैन कैसा है यह जैन,
विदित ही इसके फूट गए हैं हिये के जैन।
इसलिए यह नहीं सूझता है जिनवाणी के बैन,
क्योंकि इसके तम से हैं पुद्गल के नैन,
इसलिए बेचारे को न दिन में चैन न रात में चैन,
अतः रहता है बेचैन इसलिए है यह झूठा जैन।
25. संवादाता-
अब हमारे बीच हमारे राजस्थान के धौलपुर से पधारे महान कवि धोतीमल जी को मैं आमंत्रित करना चाहता हूँ, उनके सम्मुख मैं दो पंक्तियाँ प्रस्तुत है-
आज करेंगे खूब ऐश और धर्म करेंगे कम।
ऐसा मत तू सोच कभी कहते कवि धोतीमल।
26. कवि धोतीमल- (धोती-कुर्ता, माला, पगड़ी, चमकता दुपट्टा)
हे महावीर भगवान हम आपका कितना ध्यान रखते हैं,
सुबह पांच बजे से लगाकर रात्रि 10 बजे तक आपकी जयजयकर करते हैं
पूजन विधान आदि कोई न कोई प्रोग्राम चलता ही रहता है
पञ्चकल्याणक में आप तो बाप आप के बाप भी बन जाते हैं,
पर आप जैसे बनने के भाव कभी नहीं आते हैं।
थोड़ा अपनी भाषा में भी कुछ सुनाना चाहता हूँ-
गोधन गजधन बाजधन और रतन धन खाज,
जब आवे संतोष धन, सब धन धूलि समान।
और सुनिए-
मन मेरा तन रूजरा या तनुता को टेकन
सातैं तो कोऊ आता, भीतर बाहर एका।
