‘जिनेन्द्र भक्त’ — सम्यग्दर्शन के पंचम अंग ‘उपगूहन’ की कथा पर आधारित एकांकी: पादलिप्त नगर के सेठ जिनभक्त, नीलमणि चुराने आया सूर्य चोर, और धर्म की निंदा बचाने वाला सेठ का विवेक। ७ पृष्ठ, ३ दृश्य, शिक्षा सहित।
Jinendra Bhakt — a one-act Jain natak on the Upguhan (5th) limb of Samyagdarshan: Seth Jinbhakt, the thief Surya and how a true dharmatma shields Jain dharma from slander. Dashlakshan / pathshala stage script.
स्रोत: एकांकी मञ्जूषा (भाग-२) — पाठशाला व दशलक्षण पर्व के सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु मंचन-योग्य एकांकी। पूरी स्क्रिप्ट (पात्र-परिचय, संवाद, मंच-निर्देश) नीचे; मूल PDF सबसे नीचे।
जिनेन्द्र भक्त
आवश्यक सामग्री
१. मंदिर - मूर्ति, मणि से सजी हुई ३. चौकीदार का डंडा, सीटी २. पूजन सामग्री
पात्र - परिचय
१. सेठ - जिनभक्त ३. राजकुमार
५. अन्य - ३-४ चोर ७. सेवकराम २. सुवीर चोर ४. सूर्यचोर
६. पहरेदार - बलराम
भूमिका
संचालक : स्वयं शुद्ध जो सत्यमार्ग है, उत्तम सुख देने वाला। अज्ञानी असमर्थ मनुज-कृत, उसकी हो निन्दा माला।। उसे तोड़कर दूर फेंकना, ‘उपगूहन’ है पंचम अंग। इसे पाल निर्मल यश पाया, सेठ ‘जिनेन्द्रभक्त’ सुख अंग।। आइए…आज हम आपको ले चलते हैं पादलिप्त नगर में। यहाँ जिनभक्त नामक महान् सेठ रहते हैं, वह सम्यक्त्व के धारक हैं और धर्मात्माओं के गुणों की वृद्धि तथा दोषों का उपगूहन करने के लिए प्रसिद्ध हैं। पुण्य-प्रताप से वह बहुत वैभव-सम्पन्न हैं, उनका सात मंजिला महल है, जिसके ऊपरी भाग में एक अद्भुत चैत्यालय बनाया है, उसमें बहुमूल्य रत्न से बनाई गई भगवान की मनोहर प्रतिमा है, उसके ऊपर रत्न जड़ित तीन छत्र हैं, जिसमें कीमती रत्न नीलम जड़ा है, जो अन्धेरे में भी जगमगा रहा है।
और अब इधर देखिए ये है सौराष्ट्र के पाटलीपुत्र नगर का राजकुमार ‘सुवीर’ कुसंगति में दुराचारी तथा चोर हो गया है। आज वह सेठ के जिनमंदिर में आया है।
दृश्य - १
(सेठजी पूजा-पाठ में मग्न हैं…)
सुवीर : अरे वाह ! कितना कीमती नीलम रत्न लगा है ऐसा अद्भुत रत्न तो मेरे खजाने में भी नहीं है।
(राजकुमार का मन ललचा रहा है - भगवान की भक्ति के लिए नहीं, बल्कि कीमती रत्न की चोरी करने के भाव पूर्वक व्याकुल हो रहा है।)
(सेठजी से) सेठजी आपने जिनमंदिर तो बहुत अच्छा बनाया है।
सेठ : हाँ ! यह सब जिनेन्द्रदेव का प्रताप है।
सुवीर : यहाँ से जाने का मन ही नहीं कर रहा है। पर मैं कल फिर आऊँगा। अच्छा, मैं चलता हूँ। इतना कीमती नीलम, इसका मूल्य तो बहुत होगा ? ऐसा रत्न राजश्री खजाने में भी नहीं है।
दृश्य - २
(चोरों की सभा)
सुवीर : सुनो-सुनो, साथियो सुनो। मैं अभी जिनेन्द्रभक्त सेठ के महल से आ रहा हूँ उन्होंने अपने जिनमंदिर में कीमती रत्न नीलम लगाया हुआ है। अब तुम सब में से जो कोई उस रत्न को चुराकर लाएगा मैं उसे बहुत धनराशि दूँगा।
सूर्य चोर : सरदार मैं लाऊँगा वह रत्न। अरे ! इन्द्र के मुकुट में लगा हुआ रत्न भी मैं क्षणभर में लाकर दे सकता हूँ। तो यह कौनसी बड़ी बात है ? मैं जाता हूँ।
सुवीर : अच्छा ! लेकिन ध्यान रहे महल में जाना इतना सरल नहीं है। सावधानी से जाना।
संचालक : चोर निकल पड़ता है, महल की ओर देखिए तो चोर कितने प्रयत्न कर रहा है, अन्दर जाने के किन्तु पहरेदारों का पहरा तगड़ा है, ऐसे तो अन्दर नहीं जा सकता, अन्दर जाने के लिए तो छल-कपट का सहारा लेना ही पड़ेगा।
सूर्य चोर : सच कहा था पर अन्दर कैसे जाऊँ… ? क्यों न मैं त्यागी- व्रती, ब्रह्मचारी का वेश धारण करूँ, मुझे कोई रोकेगा भी नहीं ? हाँ, यही सही है… (धोती-दुपट्टा ऊपर से पहनकर)
संचालक : (सूर्य चोर वक्तृत्व-कला में निपुण है, वह किसी को भी आकर्षित कर सकता है।) सूर्य चोर (पहरेदार से) अरे! भाई यहाँ कोई जिनमंदिर है क्या ? मेरा प्रतिदिन जिनेन्द्र-दर्शन-पूजन का नियम है ! अभी मैं उपवास कर रहा हूँ, मुझे किसी जिनमंदिर का पता बता दो, मैं जिनदर्शन करने आया हूँ।
पहरेदार : जाओ…ऊपर चले जाओ।
सूर्य चोर : धन्यवाद।
दृश्य - ३
(मंदिर में सेठजी)
सूर्य चोर : जय-जिनेन्द्र सेठजी ! मैं यात्रा पर निकला था तो मैं दर्शनार्थ यहाँ रुक गया।
संचालक : (इसी तरह व्रत-उपवासी का ढोंग कर सूर्य चोर वहाँ रहने लगा, उसकी लगन व भक्ति से प्रभावित होकर एक दिन सेठ ने स्वयं ही मंदिर की देख-रेख की जिम्मेदारी सूर्य चोर को सौंप दी।)
सेठ : मुझे व्यापारादि के लिए बाहर जाना है, तब सूर्य तुम ही जरा मंदिर की देख-रेख करना, ये लो चाबियाँ।
सूर्य चोर : (चाबी लेकर) जैसा आप उचित समझें सेठजी, किन्तु आप जल्दी लौटना मैं कैसे सम्हाल सकूँगा ? इतने विशाल जिनमंदिर को।
सेठ : हाँ ! हाँ ! आ जाऊँगा। अच्छा ! मैं चलता हूँ ! जय-जिनेन्द्र !
सूर्य चोर : जय-जिनेन्द्र !
(जाइए सेठजी जाइए इस घड़ी का तो मैं कब से इंतजार कर रहा था “कब मौका मिले और मैं रत्न लेकर भागूँ”)
संचालक : (इधर सूर्य चोर योजना बनाने में लग गया। कैसे चुराऊँ रत्न ? उधर सेठजी गाँव के बाहर रात्रि होने से अपना पड़ाव डाल रहे हैं। सूर्य चोर तो आधी रात होने की राह देख रहा था, अब हो गई अर्धरात्रि और उठ गए चोर महाराज ! इधर-उधर देखकर नीलम रत्न निकाला और जेब में रखकर नौ दो ग्यारह हो गया) अरे ! यह क्या ? ये प्रकाश तो नीलम मणि का है ना?
सूर्य चोर : हे भगवान ! अब क्या करूँ ? इसका प्रकाश तो तेज हो रहा है (घबराकर) किसी ने देख लिया तो…) 1. पहरेदार - अरे सेवकराम ! देखो तो उसकी जेब में कुछ चमक रहा है। 2. सेवकराम - हाँ हाँ… अरे यह चमक तो मंदिरजी में लगे नीलम-मणि की है। 1. पहरेदार - अरे ! नीलम-मणि चुराकर भाग रहा है।
पकड़ो : पकड़ो - पकड़ो…
सेवकराम : चोर - चोर - चोर…
दृश्य - ४
संचालक : सूर्य ! चोर के पीछे चौकीदार लग गये। वह घबराकर भागा। भागते-भागते वह वहीं पहुँच गया, जहाँ जिनभक्त सेठ का पड़ाव डला था, कोलाहल सुनकर सेठजी अपने तम्बू से बाहर आये।
पहरेदार : अरे ! सेठजी ये तो चोर निकले, ये कोई त्यागी-व्रती नहीं हैं।
सेवकराम : ढोंगी, पाखण्डी है ! आपके गमन करते ही मंदिरजी से नीलम-मणि चुराकर भाग रहा था।
संचालक : (लेकिन त्यागी के रूप में प्रसिद्ध यह मनुष्य चोर है, जब यह बात लोगों को पता चलेगी तो धर्म की बहुत निंदा होगी। लोग क्या कहेंगे ? जैनव्रती, श्रावक, ब्रह्मचारी ढोंग भी करते हैं, मौका पाकर चोरी करते हैं और बुद्धिमान सेठ ने पहरेदारों को रोका।)
सेठ : अरे ! ठहरो ! तुम लोग यह क्या कर रहे हो ? यह कोई चोर नहीं है, यह तो धर्मात्मा ही है। 1. पहरेदार - लेकिन सेठजी… वो… नीलम-मणि…
सेठ : नीलममणि लाने के लिए तो मैंने कहा था और तुम लोग गलती से उसे चोर समझकर शोर मचा रहे हो। 2. पहरेदार - सेठजी, आप कह रहे हैं तो यही सत्य होगा।
सेवकराम : क्षमा करना, हमने समझने में भूल कर दी।
संचालक : सेठजी के वचन सुनकर पहरेदार वापिस लौट गए। इस तरह एक मूर्ख मनुष्य की भूल के कारण होने वाली धम् की निंदा बच गयी। इसे ही कहते हैं "उपगूहन अंग’ जैसे एक मेंढक दूषित होने से सम्पूर्ण समुद्र दूषित न
होता, उसीप्रकार कोई असमर्थ निर्बल मनुष्य के द्वारा छोटी-सी भूल हो जाने पर पवित्र जिनधर्म मलिन नहीं हो जाता। जिसतरह माता इच्छा करती है कि मेरा पुत्र उत्तम गुणवाला हो, फिर भी यदि पुत्र कोई गलती कर दे तो वह उसे जगजाहिर नहीं करती, बल्कि किसी उपाय से दोष दूर करती है, उसीप्रकार धर्मात्मा भी धर्म
में कोई अपवाद हो - ऐसा कार्य नहीं करते, परन्तु धर्म की प्रभावना ही करते हैं। जब कोई गुणवान धर्मात्मा में कदाचित् दोष आ जाए तो उसे गौण करते हैं तथा उसके गुणों को मुख्य करते हैं और एकान्त में बुलाकर प्रेम से समझाते हैं। जिससे उसका दोष दूर हो जाए और धर्म की शोभा बढ़े। तो आइए देखें जिनभक्त सेठ क्या करते हैं ? -
सेठ : सूर्य-सूर्य ! बाहर आ जाओ। भाई ! ऐसा पापकार्य तुम्हें शोभा नहीं देता। विचार तो करो कि यदि तुम पकड़े जाते तो तुम्हें कितना दुःख भोगना पड़ता ? काराग्रह की यातना सहना पड़ती और जैनधर्म की कितनी निन्दा होती। लोग कहते… कि जैनधर्म के त्यागी- ब्रह्मचारी भी चोरी करते हैं। अरे ! भाई क्या सुख है ? ऐसे पापकार्य में ! इसका फल तो नरक-निगोद है, तुम अपना मनुष्यभव क्यों गँवा रहे हो ? तुम्हारा तो यह जन्म इस नीलमणि से भी कीमती है, चिन्तामणि रत्न के समान है, जो लोहे को भी स्पर्श करने से सोना बना देता है। अभी
समय है कि इस पाप कार्य को छोड़कर जिनेन्द्र-भगवान की उपासना में लग जाओ यही सच्चा धन है और इसी से सच्चा सुख मिलेगा।
सूर्य : सेठजी! आप धन्य हैं। आपके उत्तम व्यवहार से मेरी आँखें खुल गईं। आपने मुझे बचाया है, मैं आपका सदा आभारी रहूँगा। अब मेरी समझ में आया आप जैनधर्म के सच्चे भक्त हो, लोगों के सामने आपने मुझे सज्जन, धर्मात्मा कहकर मुझे बचाया, मेरा मान बढ़ाया है। मैं आपको वचन देता हूँ कि मैं फिर कभी चोरी नहीं करूँगा। सच्चा धर्मात्मा बनने का प्रयत्न करूँगा। सच में जैनधर्म महान् है और यह आपके जैसे सम्यग्दृष्टि जीवों से ही शोभा देता है।
संचालक : जैनधर्म की जय हो - और इसप्रकार जिनभक्त सेठ के उपगूहन गुण से धर्म की प्रभावना हुई।
शिक्षा : यह कहानी हमें यह सिखाती है कि साधर्मी के किसी दोष के कारण धर्म की निन्दा हो - ऐसा नहीं करना चाहिए, अपितु प्रेम पूर्वक समझाकर, उसे उस दोष से छुड़वाकर, धर्मात्माओं के गुणों को मुख्य करके, उसकी प्रशंसा द्वारा धर्म की वृद्धि हो - ऐसा कार्य करना चाहिए। यही उपगूहन अंग की महिमा है।
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