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नाटक स्क्रिप्ट · Play script

जिन मंदिर भिक्षालय नहीं, शिक्षालय है (तीन नाटक)

Jin Mandir Is a School, Not a Place to Beg (3 Plays)

रचयिता Author: पं. राजकुमार जी शास्त्री (भेद विज्ञान); ब्र. डॉ. आरती जैन (जीव है सो मैं ही हूँ) · ~25 min पढ़ने में

Original PDF

तीन मंचन-योग्य जैन नाटकों का संग्रह — (१) जिन मंदिर भिक्षालय नहीं, शिक्षालय है (विद्यार्थी, व्यापारी, बेरोजगार, रिश्वतखोर आदि पात्रों द्वारा भगवान से सांसारिक मांगें मांगने पर व्यंग्य — जिन मंदिर व देवदर्शन का सच्चा प्रयोजन), (२) नेक विशन (प. राजकुमार जी ‘शास्त्री’ — धनिया धोबी आदि पात्रों द्वारा सद्भाव का बोध), व (३) जीव है सो मैं ही हूँ (दस मित्रों के ‘स्वयं को गिनना भूल जाने’ के प्रसिद्ध दृष्टांत से भेदज्ञान — जीव के सब भेद रट लेने पर भी ‘जीव मैं स्वयं हूँ’ की प्रतीति बिना संसार-परिभ्रमण)। पूरे पात्र-संवाद व मंच-निर्देश सहित; पाठशाला व सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु।

A collection of three staged Jain natak — (1) ‘The Jina temple is a school, not a begging-house’ (satire on asking God for worldly favours; the true purpose of dev-darshan), (2) ‘Nek Vision’ (by Pt. Rajkumar ‘Shastri’), and (3) ‘The soul is what I myself am’ (bhedgyan through the famous parable of ten friends who forget to count themselves). Full characters, dialogue & stage directions for pathshala & cultural programs.


नाटक

जिन मंदिर शिक्षालय नहीं शिक्षालय है।

पात्र:- (i) विद्यार्थी, (iv) बेरोजगार, (ii) व्यापारी, (v) रिश्वतखोर, (iii) युवा, (vi) लायक।

1. विद्यार्थी:-
O MY God! good morning
हे प्रभो! आनन्ददाता, ज्ञान हमको दीजिए।
मुझको कुछ आता नहीं, फिर भी पास कीजिये।
हे भगवान! देखो, आपको पता ही है कि मैं क्रिकेट का फैन हूँ और अभी भारत-पाकिस्तान की श्रृंखला चल रही है, तो समझलो कि भारत की इज्जत दांव पर लगी है। अतः मैच देखना बहुत ही जरूरी है और आपको तो पता ही है कि बोर्ड की परीक्षा सिर पर है। पढ़ाई तो हो नहीं पा रही है। पढूँ कं कि मैच देखूं। तो हे भगवान! सम्हाल लेना। मेरी इज्जत आपके ही हाथों में है। मैं अपनी पॉकेट मनी में से 21 रू. दानपात्र में जरूर डालूँगा। याद रहे भगवान। भूल मत जाना।
Good by!

2. व्यापारी:-
अति पुण्य उदय मम, आया।
सौ-सौ की गड्डी पाया।
नगर मंगलं, सोना मंगलं, चांदी मंगलं।
रूपया मंगलं, डालर मंगलं।
हे भगवान! आप नाराज क्यों हो गये थे। इस बार बिल्कुल भी सीजन नहीं चल रहा है। अरे! आपको चोबीस घन्टा सबू इकनी भी कमाई नहीं हो पा रही है। अरे! जब आप हमें खाना-खर्चे को नहीं मिलेंगे तो हम आपको क्या चढ़ायें? भगवान जब दया करें। आप दया निधान हो। हमारी दुकान अच्छी चलने लग जाये और उसके मजे हो जाये। भगवान अभी वह बात पक्की रही कि अगले गल्ले से आपके होंगे। भक्त जो रखें विश्वास करायेंगे। धन तो अनिलेश पार्श्वनाथ हम तुम्हारे ही भरोसे हैं।

3. रिश्वतखोर:-
हे भगवान! आप तो सर्वज्ञ हैं। मैंने जो अर्जी लगाई है। आप तो समझ ही गये होंगे। समझे न हो तो भगवान मैं फिर से बता रहा हूँ कि मैं तो श्वेतशालीनगिरी के चक्कर में पकड़ा गया हूँ। लोगों ने कह दिया है कि मैंने एक लाख रुपये की रिश्वत ली है मगर

4. बेरोजगार:-
इधर-उधर देखते हुये…
वाहः भगवन वाह! आपके मंदिर में फर्श मार्बल का, दीवालों पर ऑयलपेंट, वेदी पर सोने का पेंट हम चढादि चाँदी के क्या कहना भगवान…? उपरसेही भगवान के पास इतना परिषद और एक में आपका भक्त बेरोजगार घूम रहा हूँ। किसी से मत करना भगवान ये ड्रेस भी मैंने इसी की पहन रखी है। अरे भगवान! कुछ तो सोचो हमारे बारे में, हम जैसे बेरोजगारों पर कृपा करो। बस देख दोहे - सौ लौटाते दिखा दो भगवान! पहली वेतन आपको ही चढाऊँगा। ज्यादा क्या कहूँ भगवान और तो आप समझ से गये लेंगे।

5. युवा:-
तुमसे लागी लगन, ले लो अपनी शरण।
पारस प्यारा, तुम तो करना वो अपना स्मरण।
हे पारसनाथ भगवान! मैं कल से रविवार का व्रत कर रहा हूँ। पर बाप से ये सुनते से नही हो। अरे मैं एक शादी ही तो कर रहा हूँ। भगवान आपकी ही कृपा से पच्चीसयों की तो ३८-३९ शादियाँ हो गई मेरे एक भी रुक नही करवा सकते? अरे! मेरे पता हैं आपकी शादी नही हुई तो क्या हुआ? भक्तो पर दया तो करनी चाहिये। हे चिंतामणि पार्श्वनाथ! दया करो। किसी कन्या को मेरे ऊपर प्रसन्न करवा दो।

6. लायक:-
अभी आपने देखा कि कितने भक्त आये और वे सभी भगवान से अपने-अपने मन की बातें करके चले गये। रो से मेंह गेहूँ घर-घर ली करनी है। सभी कहते आये हैं जेऊ कहलाते हैं। भगवान के नाम पर सौ और जेऊ सो कितना भण्डार, दर्जन भण्डार, बस भण्डार चढाने के उपर देवदर्शन की विधि क्या है यह भी देख ढंग से नहीं जानते हैं।

कोई एक:- तो आप ही बता दो देवदर्शन की विधि क्या है?

लायक:- देवदर्शन की विधि बताता हूँ।

कोई एक:- स्वाध्याय करने से क्या लाभ है?

लायक:- स्वाध्याय करने से हिताहित, भक्ष्याभक्ष्य, पुण्यापुण्य का ज्ञान होता है। यह दृश्य प्रभाव नत्य का ज्ञान क्षेत्रक श्रेयांश से सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है।

सभी एक साथ:- भैंया आपने तो हमारी आखें खोल दी।

लायक:- भैंया आप सब लोग भी रोज मंदिर भगवान के पास जाते हैं लेकिन भगवान कहने के और ना देने के। हम लेन से रहे लेन कर अय्या हरखा नहीं। सम्यक विश्वासी मिलो, लाभ कुछ मिला फिर तो धर्म से दूषित हो रहे हैं। धर्मसे पक्षांध कौन है? अर्थात् कोई नहीं।

यथारूप पर्यायः-

जय जिनेन्द्र

नेक विशन

प. राज कुमार जी ‘शास्त्री’

पात्र परिचय
धनिया - धोबी
अगम - शान्त प्रकृति का युवक
ज्ञानेश - पण्डित जी
दिव्यांश - किंचित, उद्दंड प्रकृति वाला युवक
चिन्मय - विद्वान् मित्र

(धोबी की दुकान-धनिया गुनगुना रहा है)
धनिया: धनिया धोबी मेरा नाम,
कपड़े धोना मेरा काम।
मैले को भगाऊं, जग को निखराऊं, जगमग-जगमग हो…हो…हो… धनिया धोबी…
(प्रवेश करते हुये) – ये तक लोग कितने गंदे कपड़े कर लेते हैं। इतने धोते - धोते मेरे पप्पू की अम्मा आधी घिस गई है।
दिव्यांश: (आते हुए) ओरे भइया धनिया।
धनिया: कहिए भाई साहब क्या सेवा करूँ ?
दिव्यांश: अरे भई, मैं परसों एक चादर धोने को दे गया था। वह तैयार कर दिया क्या?
धनिया: अरे बिल्कुल तैयार है साहब, एकदम झकाझक यह रही।
दिव्यांश: ठीक है लाओ इधर, मेरे बैग में पहुँचा दूँगा।
धनिया: कोई बात नहीं भाई साहब पैसे तो खाते रहेंगे।
(पियास व्यक्त कर रुक जाती है)
धनिया: (प्रेक्षक पर रस का स्प्रे गुनगुना रहा है।)
धनिया धोबी मेरा नाम,
कपड़े धोना मेरा काम।
मैले को भगाऊँ(परीकर-गीत लेना)
(अगम को आता देखकर)
धनिया: जय जिनेन्द्र अगम भाई साहब। आप तो बहुत दिनों बाद नजर आरहे हैं कहीं बाहर गए थे क्या?
अगम: हां भाई धनियाराम बाहर ही गया था और आज फिर जयपुर जाना है। धनियाराम मैं एक चादर धोकर गया था, वह तैयार कर दिया।
धनिया: भाई साहब, धनिया समय का पाबन्द है। आपकी चादर तो कब से तैयार है, यह लीजिए। (चादर उठाकर देता है।)
अगम: (अच्छी तरह चादर देखते हुए।)
अरे धनियाराम! यह चादर मेरा नहीं है। इसका डिजाइन चट और बिल्ली का था।
धनिया: अरे बाप रे भूल तो गई, अभी-अभी दिव्यांश भाई साहब यह चादर ले गये हैं उनका भी बिल्कुल ऐसा ही था। बस मैं चादर बदल कर दे दूँगा।
अगम: अरे नहीं भइया, मुझे तो अभी रात नौ बजे घर जाना है। मुझे चादर बहुत जरूरी है।
धनिया: तो भाई साहब आप ही पता कर लीजिए अगर कहीं से मिल जाये तो ले जाइये।
अगम: हां यह ठीक है।

(दिव्यांश के घर जाकर)
अगम: अरे कोई है… दिव्यांश भी दिव्यांश।
(कोई आहट नहीं आती तो अंदर जाता है)
अच्छा तो भाई साहब चादर ओढ़कर सो रहे हैं। (दिव्यांश को झिझोड़ता) (चादर खींचता है)
दिव्यांश: (गुस्से में दोनों लड़ते हुए)
कौन बेवकूफ मेरी नींद खराब कर रहा है?
अगम: अरे भइया नाराज मत होओ, मैं तो अपनी चादर लेने आया हूँ।
दिव्यांश: दिमाग तो खराब नहीं हो गया। एक तो मेरी नींद खराब कर दी आकर, आ हा… क्या मजा आ रहा था। दूसरे कह रहे हो कि अपनी चादर लेने आया हूँ, यह कोई कपड़े की या धोबी की दुकान है क्या?
अगम: अरे नहीं भइया, ये जो चादर तुमने ओढ़ी है, तो मेरी चादर मेरी है।
दिव्यांश: तो कर लो बात। जब साहब धोबी चादर भी अपनी बताने लगे, हद हो गई, फिर कैसा ये घर भी मेरा है। अरे भइया, ये चादर तो चौधरी धनिया के यहाँ से धुलकर लाया हूँ।
अगम: देखो धनिया ने ही कहा है कि मेरा चादर तुम्हारे पास है।
दिव्यांश: देखो एक बार में ही समझा लो कि यह चादर मेरा है।
अगम: तुम भी अच्छी तरह समझा लो कि यह चादर मेरा है। (चादर खींचता है)
दिव्यांश: नहीं मेरा है देखो लड़ाई हो जायेगी मैं कह रहा हूँ चादर मेरा है। (आपस में चादर खींचते हैं)
(इतने में चिन्मय व ज्ञानेश का प्रवेश)
चिन्मय: अरे यह क्या महाभारत मचा रखी है।
अगम: देखो भाई साहब यह मेरा चादर नहीं दे रहा है।
दिव्यांश: बड़ा ढीठ है भाई मेरे घर पर आकर मुझे ही चोर बना रहा है। गुस्सा तो मेरा आ रहा कि सिर फोड़ कर रख दूँ।
चिन्मय: चुप रहो फालतू की बातें मत करो। अच्छा अगम ये बताओं कि तुम्हारी चादर यहाँ कैसे आई?
अगम: मैंने अपनी चादर धनिया के यहाँ धुलने डाली थी। मैं वहां चादर लेने गया तो भैया चादर गलती से इनके यहां आ गया।
दिव्यांश: अच्छा तो तुम्हारी चादर की क्या पहचान है।
अगम: हां यह देखो चादर पर मेरा नाम लिखा है।
(सभी चादर देखते हैं)
चिन्मय: अरे। इस पर तो अगम का सही लिखा हुआ है।
दिव्यांश: यह तो सच में इसका ही है, तो फिर मेरा चादर कहाँ है?
अगम:

अगम: तुम्हारा चादर यह रहा। तुम तो मेरी बात सुन ही नहीं रहे थे। मैं तुम्हारा चादर धनिया के यहाँ से लेकर आया हूँ।
दिव्यांश: मुझसे बड़ी भूल हो गई। मैं अपनी चादर को अपनी मानकर व्यर्थ ही झगड़ा कर रहा था। आप कृपया मुझे क्षमा कर दें।
चिन्मय: अरे भाईयो। ऐसी ही भूल हम सब अनादि से कर रहे हैं। पर पदार्थों को अपना मान-मान कर।
अगम: क्या बात कर रहे हो। मैं तो किसी की चीज को हाथ भी नहीं लगाता।
चिन्मय: भइया अगम, यह बात इतनी जल्दी समझ में नहीं आ जायगी। इसे तो गंभीरता से समझना पड़ेगा।
चिन्मय: देखो हमारे साथ एक जो अतिथि महोदय साहब आये हुए हैं इनका नाम ज्ञानेश कुमार है, यह छद्म नाम से आये हैं, इस संबंध में यही हमें समझायेंगे।
ज्ञानेश: जय जिनेन्द्र ! मैंने आपकी सभी बातें सुनी हैं जिस तरह दिव्यांश आपकी चादर को अपनी मानकर सो रहा था, उसी तरह हम सब भी दूसरी वस्तुओं को अपना मानकर सो रहे हैं।
दिव्यांश: क्या बात कर रहे हो भाई साहब, सो तो मैं पहले रहा था, अभी तो मैं जाग रहा हूँ।
ज्ञानेश: नहीं दिव्यांश! अभी तो आपकी समझ बिगड़ी हुई है भाव निद्रा विशेष मोह नींद करने में पर बनी हुई है।
अगम: इस मोह नींद से क्या होता है?
ज्ञानेश: अरे दिव्यांश स्वमित्र! तुम्हारे चादर को अपनी मानकर सो रहा था। वैसे ही हम सब मोह नींद में शरीर, धन इत्यादि, पर पदार्थों को अपना मानकर सो रहे हैं।
चिन्मय: यह बात पूरी तरह समझ में नहीं आई, आप अच्छी तरह समझाओ ना।
ज्ञानेश: अच्छा सुनो! आप सब अपना नाम तो जानते ही होगे।
दिव्यांश: हां हां क्यों नहीं मेरा नाम दिव्यांश है।
धनिया: और तुम्हारा?
अगम: मेरा नाम अगम है।
ज्ञानेश: मैं तो अपने इस शरीर के नाम बताये हैं, आप अपना नाम बताइए ना।
दिव्यांश: लो कर लो बात किया मैं और मेरा शरीर अलग-अलग थोड़े ही हैं। हम दोनों एक ही तो हैं।
ज्ञानेश: नहीं दिव्यांश यही तो हमारी भूल है जो अनादिकाल से चली आ रही है और इस भूल के कारण ही हमें सब निर्णय आदि गतियों के दुःख उठाने पड़ रहे हैं।
दिव्यांश: ये बात तो समझ में नहीं आई। ठीक है चादर में तो आपने चिंह् देखकर समझ लिया कि वह चादर मेरा नहीं है। पर शरीर तो मैं ही हूँ, इस पर तो मेरा ही अधिकार है।

ज्ञानेश- देखो समझने से समझ में जाता है समझने से नही। आप समझने की कोशिश करोगे तो जरूर समझ में जायगा। अच्छा यह बताओ कि जीव किसे कहते हैं?

उपागम- अरे जो जानता-देखता और सुख-दुख का अनुभव करता है वही तो जीव है।

शानिध्य- और पुदगल?

दिग्यांश- जिसमें वर्ण, रस, गंध और स्पर्श पाया जाए उस पुदगल कहते हैं।

ज्ञानेश- बहुत बढ़िया, आप सबको तो सब याद है। अच्छा दिव्यांश तुम बताओ; तुम्हारा रंग कैसा है?

दिव्यांश- मेरा रंग गोरा है।

ज्ञानेश- और वजन कितना है?

दिव्यांश- पंद्रह किलो।

ज्ञानेश- अब बताओ कि गोरा, काला रंग, हल्का भारी वजन, सुगंध-दुर्गंध, यह सब किसमे पाये जाते हैं?

दिग्यांश- अभी अभी तो विनय ने बताया था कि स्पर्श, रस, गंध ये सब पुद्गल में पाए जाते हैं तुमने इतना भी याद नही रखा क्या?

ज्ञानेश- तो फिर यह मुझे कह रहे हो कि गोरा रंग और पंद्रह किलो का वजन पुद्गल का है, जीव का नहीं।

विशुद्धि- अरे हाँ तो फिर ये बाल भी तो मैं ही हूँ यह कह कर उपागम के पुदगल का। तो फिर मैं कौन हूँ?

वाणेश- जैसे शरीर की अपनी पहेचान है और तरह जीव की भी अपनी पहिचान है जैसे जानता देखता हम सब जानते देखते हैं इसलिए हम जीव हैं-शरीर नहीं।

दिव्यांश- दूजा बात है ज्ञानेश भाईसाहब। आपने तो हमको धोखे में हमें जगा दिया। हम तो अभी तक शरीर और जीव दोनों के गुणों को अपना ही मान कर सो रहे थे।

वाणेश- शरीर, धन परिवार को तो हम ही हमारे भीतर को राग-द्वेष गुस्सा के भाव होते थे वो भी तो हम नहीं हैं, जीव का स्वभाव नही है।

निर्मय- पर उन सब भावों को तो हम ही कर रहे थे। जन्म-प्रेम का भाव हो या क्रोध का या मान का या लोभ का या दया दान का यह सब जैसा संयोग होता है वैसे होते हैं और हमारी बन्धनता में होते हैं। अतः शरीरादि पर पदार्थों के कारण होने वाले लेने से और दुख के कारण होने से वह भी जीव नहीं है।

किमय- पर भाई साहब पुण्य भाव तो मुनिराज में भी होते हैं। तनरक-सुरगति के पुण्य भाव होता जरूर है पर उनमे वह अपना नहीं मानते उन भावो पर भावों पर बहते नहीं है। वह उसे अपना दोष मानकर आत्मा में ही लीन होते हैं।

उपागम- आज ने आपने भेदज्ञान का बहुत ही सुन्दर स्वरूप समझाया है पर यह भेदज्ञान होगा कैसे?

ज्ञानेश- जब हम प्रतिदिन स्वाध्याय करेंगे, चिंतन करेंगे, मनन करेंगे, तत्व का अभ्यास करेंगे तो यह भेदज्ञान अवश्य एवं जल्दी ही होगा।

दिव्यांश- क्यों उपागम भैया तुम समझ में आया जब तो आप निश्चय के साथ ज्ञानामा स्वाध्याय आयेगा।

उपागम- मैं तो जाऊंगा ही और तुझे भी साथ में ले चलूँगा। प्रियंतन क्यों नहीं मैं भी जरूर चलूँगा।

ज्ञानेश- ये हम करे बात। आओ हम सब भेदज्ञान प्राप्त करके मोक्षमार्ग में बढ़े। बीच में पुण्य-पाप के भाव आते तो उन्हें अपने ज्ञानभाव से नष्ट कर मुक्ति मार्ग में बढे चलेंगे।

शानिध्य- (देवाल माथे हुए) अरे भाइयो। हम सभी संसार में ही छोड़ दोगे क्या? हमें भी तो साथ में ले चलो।

ज्ञानेश- अरे भइया! जिनवाणी तो हम सबको मुक्तिमार्ग में चलने का आमंत्रण देती है।
(सब एक साथ मिलकर गाते हैं)
मुक्तिमार्ग प्राप्त कर बड़े चलो बड़े चलो।
देखो न एक क्षण कभी बड़े चलो बड़े चलो।
थे विवर मार्ग में बढ़ते-बढ़ते रुक जायेंगे।
मेष पुण्य का बना, इसे सदा दिखायेंगे।
बिंब अनु जम कर रहे चलो रहो चले चलो–।।
मुक्तिमार्ग प्राप्त कर बड़े चलो बड़े चलो।।
एक - महावीर भगवान की जय हो।

नारक : जीव है सो मैं ही हूँ।

पहला मित्र - चलो भाई! कहीं तीर्थ वंदना को चलते हैं।

दूसरा मित्र - हां हां भाई! विचार तो बहुत अच्छा है, चलो चलते हैं।

तीसरा मित्र- पर मित्र! ये तो बताओ कौन-से तीर्थ-चलन का विचार है?

चौथा मित्र- मेरा तो विचार है कि पार्श्वनाथ भगवान के दर्शन करने बनारस नगरी चलते हैं।

हूँ सामी मित्र रुक साथ… हाँ-हाँ बनारस नगरी ही चलते हैं।

पाँचवा मित्र- (दृष्टि चित्र से) - चेतन सुरेश करना तुम आज ही नाव कुल से बात कर लेना, रात्रि-07 बजे हम सब निकल जायेंगे।

छटवा मित्र- ठीक है मित्र। मैं नाव वाले से बात कर लूंगा।

सातवा मित्र- तो मित्रो आज शाम हम सभी गंगा के घाट पर मिलते हैं-जय जिनेन्द्र।
(प्रत्युत्तर-सबके स्वर में जयजिनेन्द्र)
(सब एक चक्कर लगाकर)
(सभी मित्र नाव में एक के पीछे एक बैठे)

आठवाँ मित्र- (चारों मित्रों के हाथ में डंडा रेखा जिसे वे एकत्रित कर चलायेंगे।) यात्रा प्रारंभ करते समय - बोलो पारसनाथ, भगवान की जय।

आठवाँ मित्र- मित्रो! बनारस पहुँचने में बहुत समय लगेगा। … रास्ता करते हैं- समय बिताने के लिए कुछ करते हैं।

नौवा मित्र- ठीक है भाई (अत्याक्षरी खेलते हैं)

दसवा मित्र- शुरू करो। चलो तैयारी लेकर मधुबन नाम समय बिताने के लिए करना है कुछ काम।-म से बोलो।

पहला मित्र- मीठे रस से भरी जिनवाणी बाणी, जिनवाणी लगे। मनमें आत्मा की बात सच्ची प्यारी लागे।।

दूसरा मित्र- गा रे भैया गा रे भैया, गा रे भैया। प्रभु गुण गा तू समय न गवा।।

तीसरा मित्र- बनारस वाले रे पार्श्वनाथ हमरे बनारस वाले।
तुम्हारी घर जन्म लियो है, मालाकी कोस्तु को धन्य कियो है
अश्वसेन की आंखों के तारे 2
पद्मनाथ प्यारे- बनारस वाले …

चौथा मित्र- बाल कृष्णपुर में व्रषह जी न्यारी
में वीर जन्मे-2 महावीर जी

पांचवा मित्र- जीवरा हो हो जीवरा, ए जीवराज उड़ के आओ सम्मेद शिखर में। माव सहित वंदन करो पार्श्वचरण में।। जीवरा हो हो जीवरा..

छटवा मित्र- रंगमा-रंगमा-रंगमा रे। प्रभु तारा टी रंग मा रंग गयो रे।।

सातवा मित्र- रोम-रोम से निकले प्रभुवर, नाम तुम्हारा हा नाम तुम्हारा।।

आठवा मित्र- रोम-रोम पुलकित हो जाय। जब जिनेंद्र के दर्शन पाय।।

नौवा मित्र- ये धर्म है आत्मज्ञानी का, सौधर्म महावीर स्वामी का इस धर्म का भैया क्या करना.. ये धर्म है वारो का गहना.. जय हो..

दसवा मित्र- हँसी खेली मुनिराज शिखरवन में, रे अनेकों वन में, मधुवन में…

पहला मित्र- (इशारा करते हुए) अरे! अरे!, मित्रो! देखो बनारस नगरी आ गई। बोलो! पारसनाथ भगवान की जय। (नाव में इतर कर खड़े हो जाते है)

दूसरा मित्र- चलो मित्रो! नगर में जाने से पहले एक बार जिनेंद्र को करें, पूरे जिनेंद्र को।

तीसरा मित्र- चलो मैं मिलता हूँ… (भीगा)

ऋषि फिजन

एक-दो–तीन — नौ।
अरे ! अरे ! रे ये क्या हुआ, जब हम गांव से निकले थे तो पूरे दस थे, लेकिन अब नौ ही बचे…।

चौथा मित्र: अरे भाई ! तुमने अच्छे से नहीं गिना, मैं गिनता हूँ।
एक-दो … नौ, अरे नौ ही हैं।

पाँचवा मित्र: अरे, अरे ! लगता है तुम दोनों को ही गिनना नहीं आता- मैं अंग्रेजी में गिनता हूँ, वन-टू — नाइन। अरे क्या बात है, नाइन ही हैं।

छटवा मित्र: अरे लगता है, वास्ते में अपना एक मित्र डूब गया। … ऊं उं उं.
(सब मित्र रोने लगते हैं।)

(तभी वहां से एक पंडितजी निकलते हैं।)

पण्डितजी: क्यों भाई क्या बात है? तुम सब रो क्यों रहे हो?

सातवां मित्र: क्या बताये! हमारा एक मित्र गंगा में डूब गया।

पण्डित जी: क्या? गंगा में डूब गया, कब डूबा?

आठवा मित्र: ये तो हमें नहीं मालूम लेकिन- हम अपने गाँव से दस मित्र आये थे, अब नौ ही बचे।

पण्डितजी: अच्छा-अच्छा मैं समझ गया, चलो कोई बात नहीं, मैं गिनता हूँ। देखो एक-दो – दस। देखो तुम लोग तो पूरे दस हो। तुम दूसरों को तो गिन रहे थे, लेकिन स्वयं को गिनना भूल जा रहे थे, इसलिए दुखी हो रहे थे।

सिद्धान्त: इसी प्रकार यह जीव, जीव को जानने के नाम पर जीव द्रव्य, जीव तत्व, जीव पदार्थ, जीवास्तिकाय आदि सभी को जानता है। जीव के सभी भेद - संसारी-मुक्त, त्रस-स्थावर, गुणस्थान, मार्गणास्थान, जीवसमास, सभी कुछ सीख लेता है, जीव की परिभाषा भी रट लेता है, लेकिन वह ज्ञान-दर्शन को धारण करती हुई वस्तु मैं स्वयं हूँ, जीव है सो मैं ही हूँ, ऐसी प्रतीति नहीं करता, ऐसा भाव भासन नहीं करता, इसलिए संसार में परिभ्रमण कर दुःखी होता है यदि स्वयं को जान ले तो, परम सुखी हो जावे।


स्रोत: दस लक्षण सांस्कृतिक कार्यक्रम संग्रह — मंचन-योग्य नाटक (जैन समुदाय पांडुलिपि)

प्रूफरीडिंग बाकी है

स्रोत · Source: forum.jinswara.com — अनुमति सहित, साभार · shared with permission and thanks.

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