कैकसी — नहीं बेटी तू नहीं मैंही बनूंगी मेरी लाड़ो, (उसे उठाकर उसका मुँह चूमती है ) मेरी प्यारी चन्द्रनला ।
कुम्भकर्ण — वाह जी वाह तुम तो उसे ही गोदी चढ़ाओ ।
हमभी गोदी चढ़ेंगे ।
रावण — तो मैं भी गोदी चढूंगा ।
विभीषण — देखो भाई साहब आप सबसे बड़े हो । आप गोदी मत चढ़ो । माताजी को कष्ट होगा ।
रावण — ( विभीषण को गोदी लेकर ) मेरे प्यारे विभीषण तुम बड़े धर्मात्मा हो । ( कुम्भकर्ण को मां से लेकर ) आओ कुम्भकर्ण तुम भी मेरी गोदी आ जाओ, माताजी को कष्ट मतदो ।
( इतने ही में ऊपर से बाजों की आवाजें आती हैं बहुत बड़ा सुनाई देता है, आकाश मार्ग से सेना जा रही है रावण के सिवाय तीनों माता से चिपट जाते हैं । रावण दृढ़ता से ऊपर को देखता रहता है, वह अभी केवल बच्चा ही है । धीरे धीरे सब शब्दः बोझता है । )
रावण — माताजी, यह आकाश मार्ग से किसकी सेना जा रही है ।
कैकसी — बेटा यह वैश्रवण की सेना है । जो तेरी मौसी का बेटा है ।
रावण — माता, यह मालूम होता है अभिमान से पूर्ण हो रही है ।
कैकसी — हां पुत्र यह बहुत पराक्रमी है । सब विद्यायें इसको सिद्ध हैं यह सब पृथ्वी पर श्रेष्ठ है । राजा इन्द्र का लोक पाल है । इन्द्र ने तुम्हारे दादा के बड़े भाई का युद्ध में हरा कर उन्हें कुल परम्परा से चली आई राजधानी लंका से निकाला और इसको वहां रक्खा है । इसी लंका के लिये तुम्हारे पिता अनेक उपाय करते हैं किन्तु वह प्राप्त नहीं कर सके । हम लोग अपने स्थान से भ्रष्ट हैं और अनेक प्रकार का चिन्तायें सहते हुये इधर उधर फिरते हैं । पुत्र हमें वह दिन देखने की अभिलाषा है जब तुम अपने दोनों भाइयों सहित अपना यश जग में फैला कर वैश्रवण को और अभिमानी राजा इन्द्र को हरा कर लंकापुरी में फिर से सुख पूर्वक राज्य करोगे । अपने बड़ों की सम्पत्ति को प्राप्त करोगे ।
विभीषण — माता आप इतने दुख भरे वचन क्यों बोलती हो आपने वीर पुत्रों को जन्म दिया है । हमारे बड़े भाई साहब रावण का पराक्रम कुछ कम नहीं है । इनकी एक ही फटकार से वह लंका को छोड़ कर भाग जायगा ।
रावण — हैं माता मैं गर्व के वचन नहीं बोलता, किंतु तो भी इतना अवश्य करूंगा कि पृथ्वी पर के सारे विद्याधर भी आदि एकत्र होकर मुक़ाबले युद्ध करें तो हार ही मान कर जायेंगे। किन्तु हमारे कुल में पहले विद्या साधने की रीति चली आई है। इस लिये पहले मैं विद्या साधने के लिये दोनों भाइयों को साथ लेकर वन में जाता हूँ।
केसर्स — जाओ, पुत्र तुम सबसे पहले अपने कुल की रीत निभाओ।
( तीनों पुत्र माता को नमस्कार करके जाते हैं )
आओ बेटी चन्द्रनखा तुम्हारे पिता के पास चलें।
( दोनों चली जाती हैं। )
दृश्य समाप्त।
अंक प्रथम–दृश्य छठा
( भयानक वन में तीनों भाई ध्यान में लीन हैं। नाना प्रकार के डरावने शब्द हो रहे हैं। भूत पिशाच आदि आ आ कर नाचते हैं। उनका ध्यान नहीं डिगता। फिर एक देव अपनी दो स्त्रियों सहित आता है। )
१ स्त्री — अहा ! ये क्या ही सुन्दर युवक हैं। इनकी ये अवस्था खेल कूद के योग्य है। वन में बैठकर तप करने योग्य नहीं है।
२ स्त्री — इनके माता पिता कैसे निर्दई हैं जो उन्होंने ऐसे युवकों को वन में जाकर तप करने की आज्ञा दी।
१ स्त्री — ( पास में जाकर ) हे युवकों ! ये अवस्था तुम्हारे लिये तप करने की नहीं है। उठो ! अभी कुछ नहीं बिगड़ा है, तुम लोग अपने घर जाओ।
२ स्त्री — क्यों तुम लोग अपने इन कोमल शरीरों को कष्ट दे रहे हो, बोलो ?
१ स्त्री — अरे, यह तो बिल्कुल पत्थर की शिला के समान अचल हैं।
२ स्त्री — क्या किसी कारीगर ने लकड़ी के खिलौने बना कर तो नहीं रख दिये जिससे स्त्रियां आयें और इन्हें पर मुग्ध हों।
देव — नहीं ये रत्नश्रवा के तीनों पुत्र हैं। यहां पर विद्या साधने के लिये आये हुये हैं। ये मूर्ख हैं। इनकी बालक बुद्धि है। मैं अभी अपने सेवकों को बुलाकर इन्हीं का ध्यान डिगाता हूँ।
( ताली बजाता है, कुछ दैत्य आकर उपस्थित होते हैं। )
देखो जिस प्रकार भी बने तुम इन्हीं का ध्यान डिगाओ।
राक्षस — जो आज्ञा महाराज।
( देव अपनी दोनों स्त्रियों सहित एक ओर खड़ा होजाता है। वह तीनों निश्चल बैठे हैं। दैत्य लोग नाना प्रकार की क्रीड़ा करते हैं। उनके कानों में बहुत भयावने
बाप — लेकिन राजमल तो बहुत छोटा है वह तो अभी चौदह का ही है । और उसके पास जाते भी शर्माता है ।
माँ — वह एकही बात पकडली, आज कल के छोरे आसमान से बातें करते हैं । आपके सामने वह ऐसा ढोंग बनाता है जिससे आप उसे सीधा समझें । वैसे वह बड़ा गुल्ला है । तुम्हारे हमारे सब के कान काटले ।
बाप — काटता होगा, मुझे तो ताज्जुब होता है कि गर्भ कैसे रह गया । अरे याद आया, गर्भ नहीं होगा । वैसे ही पेट में खराबी होगई होगी सो महावारी बन्द होगई है । किसी को दिखाया भी ?
माँ — तुम्हें तो सिवाय वहम के और ताज्जुब के दूसरा काम ही नहीं, दिखाया कैसे नहीं, दाईने तीन महीने का बताया है ।
बाप — अच्छा जाओ ( इतने लोगों के सामने मत कहो वरना ये हँसी उड़ायेंगे )
( चली जाती है )
राजमल — ( आकर ) पिताजी, क्या सोच रहे हो, खुशी मनाओ । अबतो बहू के छोरा होगा ! मैं उसे खूब खिलाया करूँगा ।
बाप — ( चपत मार कर ) छोरा होगा २ लगाई, चौदह वरस का बैल हो गया अभी तक खाक की भी अकल नहीं आई ।
भाग प्रथम ।
( राजमल रोता है । बाप मनाता है । राजमल उठ जाता है । चुप हो जाता है )
राजमल — आपने मुझे क्यों मारा ?
बाप — बेटा मैंने कोई दूसरा समझा था । अच्छा तुम अब गेंद नहीं खेलते ? खूब खेला करो खाया करो, तुम्हें यहां किस बात की कमी है ।
राजमल — आप मुझे नई गेंद लिवा देना, तब मैं म्युनिसिपल्टी के ग्राउन्ड में खेलने जाया करूँगा ।
बाप — वहां जाने की क्या जरूरत है, तुम्हारे बैल खाने की जमीन ही गेंद खेलने को काफी है ।
राजमल — नहीं पिताजी यहां नहीं । यहां तो मेरी गेंद उड़न छू होजाती है ।
बाप — बेटा, उड़न छू किसे कहते हैं ।
राजमल — वाह, पिताजी आप उड़न छू का भी मतलब नहीं समझते ।
बाप — नहीं बेटा तू बतलादे क्या बात है ।
राजमल — देखो पिताजी सुनो, एक दिन मैं गेंद खेल रहा था सो, वह दूसरी तरफ जाकर मुस की कोठरी में जा पड़ी, जब मैं वहां पर लेने गया तो बहूजी और कल्लू वहां पड़े हुये थे । मैंने कल्लू से पूछा कि यहां, गेंद आई है ? उसने कहा कि यहाँ गेंद नहीं आई । अगर आती भी है तो उड़न छू हो जाती है । इस लिये अब कभी भी यहाँ गेंद लेने न आना । इस लिये पिताजी यहाँ पर खेलकर कौन अपना नुकसान करे ।
पिताजी — ( आश्चर्य से ) कौन कल्लू !
राजमल — वही काला कल्लू जो बैलोंको खुस खिलाता है ।
पिताजी — अच्छी बात है । मैं अभी जाकर उसे अपने घर से निकालता हूँ ।
( चला जाता है, राजमल रह जाता है )
राजमल — महाराज अब तो गेंद आयगी ।
बहू — ( आकर ) प्राणनाथ !
राजमल — जाजा, फिर गेंद का नाम सुनकर उड़न छू करने आगई ।
बहू — नहीं मैं गेंद उड़न छू नहीं करूँगी । मैं तुमसे प्यार करूँगी ।
राजमल — अच्छा प्यार करेगी तो पहले मुझे गोदी चढ़ाले ।
बहू — अब तुम बड़े हो गये । अब मैं गोदी नहीं चढ़ाती,
राजमल — बड़ा मैं ही थोड़े ही हो गया तू भी तो हो गई । और तेरे तो अब छोरा होगा, मुझे खिलाने को दिया करेगी ?
बहू — खिलाने को क्या वह तो तुम्हारा ही होगा ।
राजमल — कहीं लड़कों के भी छोरे होते हैं ? बावली कहीं की ।
बहू — प्राणनाथ, आप नाराज न हों, मैं तो आपकी सती स्त्री हूँ ।
राजमल — जैसी सीता सती थी वैसी ही है ?
बहू — इसमें क्या कुछ संदेह है ?
राजमल — ठीक रामचन्द्रजी कहते । उनकी स्त्री सीता सती थी । लक्ष्मण उनका सेवा किया करते थे । ऐसे ही हमारे यहाँ कल्लू है उसकी स्त्री तुम हो । और तुम अपने को सती कहती हो, तब तो मुझे तुम्हारी पूजा करनी चाहिये । क्यों कि किताबों में लिखा है कि सती की सेवा करना परम धर्म है ।
बहू — तुम तो मेरी हँसी उड़ाते हो ! कैसा कल्लू ! कल्लू को मैं क्या जानूँ ।
राजमल — पिताजी कल्लू को घर से निकाल रहे हैं तुम्हें भी उनका वन के लिये साथ करना चाहिये । मैं तो उसी के साथ जाऊँगा ।
( चला जाता है । बहू को सोच हो जाता है )
बहू — हाय मेरे माता पिता ने मुझे इससे ब्याह कर मेरी तकदीर फोड़ दी । मेरी बहन शान्ती की सगाई की थी, उसका दुःखा उससे चार बरस बड़ा था। वह सुख से अपने पती के साथ प्रेम पूर्वक रहती है। यहां पर आकर बेचारे कल्लू का सहारा था। उसको भी अब ये निकाल रहे हैं। अब मैं अपनी बाली उमर किसके संग बिताऊंगी।
गाना बाली उमर नादान, छोटासा मेरा बालमा।
रंग नहीं जानत, ढंग नहीं जानत, ठंग नहीं जानत।
प्रेम का है अनजान, नन्हा सा मेरा बालभा ॥बा०॥
जोवन मेरा छल छल छलके, छल छल छलके।
पीया मिलनको जीया ललके, जीया ललके।
तड़फत हूं हैरान, थावे ना मेरा बालमा ॥बाली०॥
( सामने से रामू को आते देख कर )
बहू — रामू आरहा है, ( रोने लगती है )
रामू — बहूजी क्या बात है? कहिये तबीयत तो ठीक है।
बहू — हां जरा पैर में दर्द है।
रामू — अगर सरकार का हुकम हो तो पैर दबा दूँ?
बहू — हां जरा वरद जाता रहेगा।
( रामू पैर दबाता है। वो फिर रोने लगती है )
रामू — क्यों बहूजी अब कहां दर्द है।
गाना श्री इन्द्र देव महाराजा, बज रहा खुशी का बाजा।
हां गायो, हां गायो, हर्षित होकर यश गायो।
जिनकी महिमा अगणित है, समही में जिनका हित है।
हां गायो, हां गायो, हर्षित होकर यश गायो।
( पटाक्षेप ) दृश्य समाप्त
अंक द्वितीय—दृश्य छठा
( वानर वंशी महाराज सूर्यराज। किष्किन्धा में दरबार। )
( पास में ही उनके दोनों पुत्र बाली और सुग्रीव बैठे हैं )
सूर्यराज — पुत्र बाली, तुम राज कार्य में सर्वथा योग्य हो।
मैं अब वृद्ध होगया हूं। यह संसार महा दुखदाई है। नहीं मालूम मैं कितनी बार चौरासी लाख योनियों में आया हूं। मैंने यह मनुष्य जन्म पाया है। इसको सफल करना चाहिये। तुम इस राज्य सिंहासन के स्वामी बनो मैं बन में जाकर तपस्या करूंगा। और कर्मों को काटने का उपाय करूंगा।
बाली — महाराज, मैं यद्यपि इस कार्य के लिये सर्वथा अयोग्य हूं किन्तु आपकी आज्ञा का उल्लंघन करने में सर्वथा असमर्थ हूं।
सूर्यराज — पुत्र ! तुम्हारी पितृभक्ति से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ । लो मैं तुम्हें राज्य तिलक करता हूँ । ( राज्याभिषेक करता है ) बेटा, सुग्रीव ! तुम्हें मैं युवराज पद देता हूँ । बाली, इस बात का सदा ध्यान रखना कि प्रजा किसी प्रकार दुःख न देवे । तुम्हारे चाचा खड्गरज के पुत्र नल और नील उनको भी तुम अपना भाई समझ कर ही उनसे व्यवहार करना ।
सुग्रीव — पिताजी आप हम लोगों को अकेला छोड़ कर जाते हैं इससे मुझे बड़ा दुःख होता है ।
सूर्यराज — पुत्र इसमें दुःख की क्या बात है । यह तो हमारी परम्परा से चली आई नीति है । मैं तो अपना भला करने जा रहा हूँ । संसार में रहते २ मैं थक गया हूँ सो उससे विश्राम पाने के लिये बन में जारहा हूँ । तुम अपने बड़े भाई बाली को अपना सब कुछ समझो । वह किसी प्रकार तुम्हारे ऊपर आपत्ति नहीं आने देगा ।
बाली — पिताजी ! आप हमें छोड़ कर बन में जा रहे हैं । इस समय हमें दुःख और आनन्द बराबर होते हैं ।
बाली और सुग्रीव का गाना ।
जा रहे छोड़ कर हो बन को, कुछ दुःख भी है आनन्द भी है ।
हम पिता कहेंगे अब किसको, इसका बस हमको रंज भी है ॥
अब तक आनन्द उड़ाते थे, चिन्ता हमको कुछ भी ना थी ।
रह गये अकेले हम दोनों, अंधेर भी है और चन्द भी है ॥
जाकर तुम बन में तप द्वारा, कर्मों की सेना जीतोगे ।
अधिकार राज्य को पाओगे, बस इस ही से आनन्द भी है ॥
सूर्यराज — पुत्र, तुम दोनों बड़े ही बुद्धिमान हो । इस समय संसार की दशा मेरी आँखों के सामने चित्र पट बना रही है । वह देखो नरकों के प्राणी, दुःख उठा रहे कैसे कैसे । वह रही रक्त की नदियाँ हैं, गिर रहे अंग कट कर कैसे ॥ १ ॥ हा, भूख प्यास चिल्लाते हैं, दाना पानी नहीं पाते हैं । निज धनी के फन्द पाते हैं, नहीं कह सकता हूँ किन जैसे ॥ २ ॥ तिर्यंचगति में भी देखो, सब प्राणी दुःख उठाते हैं ।
(५०.)
हैं बोफ खाँजते — अश्रु पिटते, भूले प्यासे-दुखिया-जैसे ॥ ३ जो बंधे कसाई के घर में, भय खाते खैर मनाते हैं।
किन्तु कटते हैं बेचारे, उसके हाथों खुदे जैसे ॥ ४ जंगल में भी जो रहते हैं, वो एक एक से डरते हैं।
भारलेट स्लेछने जो जाते, निर्देही होकर मारे जैसे ॥ ५ ॥
कोई कहे देव सुख पाते हैं, तो भी ईर्षा से जलते हैं।
जब आयु थोड़ी रहजाती, रोते-विषना नारी जैसे ॥ ६ ॥
मनुजों में भी ये ऊँच नीच, का भाव सदा दुख देता है।
इक राजा बनकर बैठा है, एक माँग रहा जैसे पैसे ॥ ७ ॥
पर्दा गिरता है। दृश्य समाप्त
अंक द्वितीय-दृश्य सातवाँ
कुम्भकरण — ( भागा आकर ) कहाँ गया, कहाँ गया वह दुष्ट खर दूषण ?
विभीषण — ( दूसरी ओर से आकर ) वह निकल गया।
हमारी बहन चन्द्रनखा को हर कर ले गया।
कुम्भकरण — मैं उससे इसका फल दूँगा। अभी उसके नगर पर धावा बोल कर उसे हराऊँगा और बहन को वापिस लगाऊँगा।
विभीषण — जाने दीजिये भाई साहब। वह बहुत बलवान है हमारे से नहीं जीता जायगा। उसे चौदह हजार विचायें सिद्ध हैं। दूसरे इस समय बड़े भाई साहब भी उपस्थितनहीं हैं।
कुम्भकरण — क्या हुआ, यदि मैं युद्ध में लड़कर मर भी जाऊँ तो कोई बात नहीं, किन्तु उससे युद्ध अवश्य करूँगा।
रावण — ( आकर आश्चर्य से ) क्या बात है। तुम लोग क्यों घबरा रहे हो ?
विभीषण — महाराज राक्षस वंशी महापराक्रमी राजा खरदूषण हमारी बहन चन्द्रनखा को छल से उठा ले गया।
रावण — क्या कहा बहन को उठा ले गया ? उसने इतना बड़ा काम किसके बूते पर किया। क्या उसे मेरे बलका पता नहीं है। मैं अभी जाकर उसे छुड़ाकर लाता हूँ।
विभीषण — भाई साहब की आज्ञा हो तो सेना सजाई जाये।
रावण — नहीं मैं अकेला ही उसके लिये काफी हूँ। तुम दोनों यहां रहकर नगर की रक्षा करना।
( जाने लगता है। पीछे से मन्दोदरी आकर पैर पकड़ लेती है )
रावण — क्यों मन्दोदरी तुम मुझे क्यों रोकती हो। क्या एक क्षत्राणी का यही धर्म है कि वह रण में जाते हुये पतीको रोके।
मन्दोदरी — नहीं पतिदेव, मेरा यह धर्म नहीं है कि मैं आपको रण में जाने से रोकूं ।
रावण — तो फिर ?
मन्दोदरी — एक पतिवृता नारीका यह धर्म है कि वह आपत्ति में पड़ने से अपने पती की रक्षा करे ।
रावण — कैसी आपत्ति । रावण के लिये क्या किसी ने आपत्ति का नाम सुना है ?
मन्दोदरी — यह सच है प्राणनाथ, किन्तु वह चौदह हजार विद्याओं का स्वामी है । आप उससे कदापि नहीं जीत सकते ।
रावण — मन्दोदरी तुम पतिवृता स्त्री होकर अपने पती को हतोत्साहित करती हो ।
मन्दोदरी — नहीं इसमें एक और भी रहस्य है ।
रावण — वह क्या ?
मन्दोदरी — वह यह कि यदि आप उससे पराजित होवये तो आपका मान भंग होगा, और यदि युद्धमें हार गया तो आपकी बहन विधवा होजायगी । वह दूषित हो चुकी है । यदि आप उसे ले भी आयेंगे तो कोई दूसरा नृपति स्वीकार नहीं करेगा । इस प्रकार आपका घोर अपयश फैलेगा । इस लिये आप मेरा कहना स्वीकार कीजिये और उसके प्रति अपना वात्सल्य भाव दर्शाइये । क्यों कि आपकी बहन के लिये बिना खोजे ही वह बहुत योग्य वर मिल गया है । आपके धन्य भाग्य हैं । जो ऐसे पृथ्वी पर श्रेष्ठपुरुष से आपकी बहिन का गंधर्व विवाह हुआ ।
रावण — प्रिये तुम सत्य कहती हो । मैं तुम्हारी बात को स्वीकार करता हूं तुम्हारे जैसी विचार वान शुभ मंत्रणा देने वाली नारी संसार में बहुत कम जन्म लेती है ।
( सब चले जाते हैं )
अंक द्वितीय—दृश्य आठवां
( बाली का दरबार )
दूत — ( प्रवेश करके ) महाराज की जय हो । लंकापुरी से रावण का दूत आया है । आपसे भेंट करना चाहता है ।
बाली — उसे आदर पूर्वक यहां बुला लाओ ।
( दूत जाता है रावण का दूत आता है )
रावण का दूत — महाराज बाली की जय हो ।
बाली — कहो महाराजा रावण सकुटुम्ब सुखी है ? वहां से क्या समाचार लाये हो ?
दूत — महाराज की कृपा से सब प्रसन्न चित्त हैं । महाराजा धिराज रावण ने आपके पास समाचार भेजे हैं कि आपके पिताजी जिनको हमने संकट से बचा कर राज्य दिया था अब वह बन में दीक्षा ले गये हैं । हम आपके प्रति सहानुभूति प्रगट करते हैं और आज्ञा करते हैं कि आप हमें यहां आकर हमें प्रणाम करो हमारा प्रेम आपके प्रति आपके पिता से भी अधिक है। आप हमें अपनी बहिन श्रीप्रभा ब्याहो और नमस्कार करो जिससे परम्परा से चली आई मित्रता चलती जाय ।
ब्राह्मी — तुमने जो कहा सो मैंने सुना । मैं और सब बातें स्वीकार करता हूं किन्तु मेरी यह प्रतिज्ञा है कि सिवाय देव शास्त्र और गुरु के किसी को मस्तक नहीं नवाऊंगा मैं तुम्हारे साथ लंकापुरी को चल सकता हूं अपनी बहन श्रीप्रभा का विवाह रावण से कर सकता हूं । किन्तु प्राण जाने पर भी अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकता ।
दूत — हे वानर वंश में श्रेष्ठ, तुम रावण के वचनों का पालन करो । राज्य पाकर गर्व न करो । या तो दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम करो या आयुध पकड़ो । या तो रावण को शीश नवाओ या खिंचकर धनुष चढ़ाओ । या तो रावण को आज्ञा को कर्ण आभूषण करो नहीं तो धनुष का पिंचर खींचकर कानों तक लाओ, या तो रावण के चरणों के नखों में मुख देखो । या खड्ग रूपी दर्पण में मुंह देखो । अर्थात् या तो जाकर उन्हें शीश नवाओ, या युद्ध के लिये तैयार होजाओ ।
योद्धा — अरे दुष्ट दूत क्यों ऐसे कठोर वचन स्वामी के लिये बोलता है । मालूम होता है तेरी मृत्यु निकट है । ले मरने को तैयार होजा ।
प्रथम भाग । ( ५५ )
बाली — नहीं, इसे मत मारो । इसमें इसका कोई अपराध नहीं है । जिसका अपराध है, जिसके बूते पर यह बोल रहा है, मैं उसे ही जाकर मजा चखाता हूं ।
मंत्री — महाराज शान्त होइये । रावण की समानता आप नहीं कर सकते । वह इस समय बहुत बलवान है । सारे पृथ्वी मण्डल पर श्रेष्ठ है । आप उससे युद्ध करके पराजय को प्राप्त होंगे ।
बाली — मंत्री तुम यह क्या शब्द कह रहे हो । मनुष्य एक वस्तु को तभी तक सबसे सुन्दर गिनता है जब तक वह उससे सुन्दर वस्तु नहीं देख लेता । मेरा बल पराक्रम तुम्हें ज्ञात नहीं है । ( तलवार खींचकर ) मैं अभी उसका सारा अभिमान चूर करूंगा । ( तलवार छूटकर गिरती है ) यह क्या, मेरे हाथ में से खड्ग क्यों छूट पड़ा ? बस बस हो चुका, मैंने जितना राज्य करना था कर लिया । मेरे हाथ इस बात के लिये राजी नहीं होते कि जिनसे मैं नित्य प्रति मन्दिर में जाकर पूजन प्रक्षाल करता हूं । उनसे लाखों जीवों की हत्या करूं । इस कारण मैं अब राज्य कार्य के योग्य नहीं ।
सुग्रीव — भाई साहब आपके विचार एक दम कैसे बदल गये ? रणधीर होकर आप धर्मवीर क्यों बने जारहे हैं ? आपके बिना इस राज्य भार को कौन सम्हालेगा ।
बाली — भाई सुग्रीव, मैं तुम्हें राज्यतिलक करता हूँ। तुम जैसा उचित समझो वैसा करना। चाहे युद्ध करना, चाहे जाकर उसको प्रणाम करना। मैं ऐसे संसार में जिसमें मैं एक मनुष्य दूसरे का विरोधी है, रहना नहीं चाहता। मैं मैं भी पिताजी की तरह दिगम्बरी दीक्षा धारण करूँगा।
सुग्रीव — नहीं भाई साहब, यह नहीं हो सकता। आपके आसरे पर मुझे पिताजी ने छोड़ा। अब आपभी मुझे अकेला छोड़ कर जा रहे हैं। पिताजी तो वृद्ध होगये थे इस लिये वह बन में गये आप तो अभी युवक ही हैं।
बाली — सुग्रीव तुम चिन्ता न करो। मुझे इस सत्कार्य में जाने से न रोको मुझे संसार भयावना दिख रहा है। वो मैं तुम्हें राज्यतिलक करता हूँ। सुख पूर्वक राज्य करना। (राज्य तिलक करते हैं।)
सुग्रीव — आप मुझे अकेला छोड़ कर जा रहे हैं मुझे दुःख होता है।
गाना आज मैं संसार में हूँ, हा! अकेला रह गया।
आत के जाने से मेरे, चित्त में दुख बह गया॥
इक तो वियोग पिताका था, फिर आप भी जाने लगे।
आपही बतलाईये अब, किससे नाता रह गया॥
पर्दा गिरता है। इस्य खतम होता है। द्वितीय अंक समाप्त।
अंक तृतीय
दृश्य प्रथम
स्थान — कैलाश पर्वत की तलहटी
(कैलाश के ऊपर बहुत से जिन चैत्यालय बने हुये हैं। बाली मुनि तपस्या कर रहे हैं। रावण अपनी स्त्री और मंत्री सहित आता है।)
रावण — चलते चलते मेरा विमान क्यों रुक गया? मंत्रीजी क्या आप इसका कारण बता सकते हैं?
मंत्री — महाराजाधिराज, यह कैलाश पर्वत है। यहाँ पर अनेक जिन चैत्यालय हैं। महा मुनि बैठे हुये तपस्या कर रहे हैं इनमें यह शक्ति है कि कोई भी विमान बिना वन्दना किये हुये उलांघ कर नहीं निकल सकता।
रावण — अच्छा। मैं समझा, जिन धर्म का बहुत उच्च महत्व है। (पर्वत की ओर देख कर) यह सामने कौनसे मुनि तपस्या कर रहे हैं? मालूम होता है यह बाली इसने मुझसे वैर निकालने के लिये ही मेरा विमान रोका है।
बाली! तू क्यों यह झूठी दिखावटी तपस्या कर रहा है। तू कषायों से प्रज्वलित हो रहा है और वीतरागता का ढोंग रचता है। तूने मुझसे वैर निकालने के लिये मेरा विमान रोका है।
अच्छा देख मैं तुझे अभी इसका फल देता हूँ।
( कैलाश पर्वत को खोदता है । उसके अन्दर घुस कर पर्वत को उठाता है । सारी पृथ्वी पर भूकम्प आजाता है । )
बाली — मालूम होता है यह सब रावण का कर्तव्य है ।
मुझे अपनी कोई चिन्ता नहीं । चिन्ता इन जिन चैत्यालयों की है पर्वत को हानि पहुँचने से इन्हें हानि पहुँचेगी ।
( पैर के अँगूठे को दबाते हैं । रावण पर्वत के नीचे दब जाता है । बिल्कुल कछुआ बन कर हा हा कार करता है । देव मुनि के ऊपर फूल बरसते हैं । रावण की रानी बाली से प्रार्थना करती है । )
रानी — छोड़िये छोड़िये भगवान ! आप परम कृपालु हैं ।
पति के मरण से मैं विधवा कहलाऊँगी । दया कीजिये ।
( बाली पैर के अँगूठे को ढीला छोड़ते हैं । रावण बाहर निकल कर आता है । )
रावण — क्षमा, क्षमा भगवान क्षमा, मैंने जो यह घोर अपराध किया इसके लिये मुझे क्षमा कीजिये । आप परम तपस्वी हैं आपने जो यह व्रत धारण किया था कि मैं सिवाय देव शास्त्र और गुरु के किसी को नमस्कार नहीं करूंगा सो वह आपका व्रत अटल है । आपका नाम भी बाली है और आपके गुण भी बली हैं । मेरी मूर्खता थी कि मैंने आपके सच्चे स्वरूप को न समझा । आपने मुझे प्राण दान दिया । उसके लिये मैं कहाँ तक आपकी स्तुति कर सकता हूँ ।
बाली — यदि तुम इस घोर अपराध का प्रायश्चित लेना चाहते हो तो भगवान की भक्ति में मन लगाओ जिससे यह जीव उनके पदको प्राप्त करता है !
रावण — धन्य है आपको, आपके लिये शत्रु और मित्र एक समान हैं ।
धन्य धन्य गुरु देव आपको, करते हो सबका कल्याणा ।
वीतरागता है दृढ तुमको, शत्रु मित्र सब एक समाना ।।
अनहित करता के हित करता, शत्रु के हो मित्र तुम्हीं ।
परिषह विजयी, हित उपदेशी, शान्ति के हो चित्र तुम्हीं ।।
निज पर के हित साधन में तुम, निश दिन तत्पर रहते हो ।
ऐसे ज्ञानी साधु तुम्हीं हो, दुख समूह को हरते हो ।।
आया गुरु शरण में तेरी, अपराधी अन्यायी हूँ ।
दूर होंय सब दुष्कृत मेरे, तुम पर्वत में राई हूँ ।।
घरगोन्द्र — ( प्रगट होकर ) रावण, मैं भगवान का भक्त हूँ । और इन श्री १०८ मुनिराज बाली महाराज का शिष्य हूँ ।
मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न हूँ । तुझे भाई समझकर यह अमोघ विजया नामक शक्ति देता हूँ । यह संकट में तेरे कम आयेगी । इस का बारकभी खाली नहीं जायगा। तेरे मारने वाले पर भी यह अवश्य अपना असर दिलायेगी।
रावण — मैंने अपने अपराध क्षमा कराने के लिये गुरु देव की प्रार्थना की थी, इस लिये नहीं, कि तुमसे शक्ती ग्रहण करूँ, यदि तुम मुझे भगवान की शक्ती के उपलक्ष में यह देते तो मैं कभी इसे ग्रहण नहीं करता। क्यों कि जिसकी शक्ती से मोक्ष के सुख मिलते हैं तो मैं ऐसी छोटी वस्तु को लेकर क्या करता। किन्तु तुम भाई के नाते से दे रहे हो। इस लिये इसे सहर्ष स्वीकार करता हूँ।
सब मिलकर गाते हैं।
जय जिनेन्द्र, जय जिनेन्द्र, जय जिनेन्द्र, जय जिनेन्द्र जय जिनेन्द्र, जय जिनेन्द्र, जय जिनेन्द्र, जय जिनेन्द्र, जय जिनेन्द्र, जय जिनेन्द्र, जय जिनेन्द्र, जय जिनेन्द्र पर्दा गिरता है।
अंक तृतीय—दृश्य द्वितीय
(बिल्कुल फटे सेष में राजमहल की बहू आती है।)
बहु — अन्धकार, अन्धकार, आज मेरे लिये चारों ओर प्रथम भाग। (६१)
अन्धकार है। पक्षियों, तुम्हें, शरण है। पशुओं, तुम्हारे लिये भी शरण है। जरासी चाँदी के लिये इस संसार में शरण है। किन्तु मैं अशरण हूँ। मैं कुलटा हूँ। पापिनी हूँ!! कलंकिणी हूँ!! पतिदेव, मैंने तुम्हें काम के आवेश में आकर त्याग दिया। आह आज मुझे सारा संसार त्यागने हुने है। कहां गये, कहां गये? मेरे धन और यौवन के साथी कालू और रामू! जिन्होंने मुझे इस अवस्था तक पहुंचाया। मेरे विनाश कर्ता कहां हैं? रामू! तुने मुझे सारी उमर निभाने का वचन दिया था। अब तू क्यों मुझे छोड़ बैठा है? नहीं, नहीं, तेरा कोई अपराध नहीं है। तो फिर मैं किसका अपराध कहूँ? ये सब मेरा ही अपराध है। नहीं, नहीं, ये अपराध दुष्ट माता पिता का है। मेरे साथ की सहेलियां अपने पतियों के संग चैन से रहती हैं। और पतिव्रता कहलाती हैं। मेरा बेजोड़ विवाह करके माता पिताने मुझे कलंकिणी बना डाला। हे ईश्वर मैं तुमसे यही वर मांगती हूँ कि ऐसे निर्बुद्धि अन्धे माता पिता को कभी भी संतान न हो। मेरा अन्तःकरण कहता है मुझे दुलहिन बनाने वाले माता पिता का नाश हो। मेरा जोड़ा मिलाने वाले नाई का नाश हो मेरे फेरे डालने वाले पुरोहित के घर में यही दशा हो जो मेरी हो रही है। वो अन्धे पुरोहित! सब के सब निर्बुद्धी थे तो क्या हुआ। तू तो पढ़ा लिखा था। नीति का जानकार था वेदों का ज्ञाता था।
श्री जैन नारकीय रामायण क्या तुम्हे यह नहीं सूझा कि मैं यह क्या करा रहा हूँ। हे भारत माता तू ऐसे लोभी स्वार्थ में अन्धे पुरोहितों को क्यों जन्म देती है? ओ समाज के पंचो, तुम लोगों ने मेरे विवाह में लड्डू कचौड़ी खाये और अपनी धोंधों पर हाथ फेरा। किन्तु किसी ने मेरे भविष्य की ओर ध्यान नहीं दिया। तुम लोगों को मेरा यही श्राप है कि तुम्हारी इन धोंधों में कीड़े पड़ें। जो दशा आज मेरी हो रही है वैसे ही तुम्हें भी कोई आश्रय देने वाला न मिले। आज भारत वर्ष में अबलाओं की यह क्या दुर्दशा हो रही है? समाज हमें पशु समझती है, जिधर चाहती है ढकेल देती है। धन के लालच में माँ बाप हमें बूढ़ों से ब्याह देते हैं। हमारे विधवा होने पर समाज हम से दुराचार करती है। बाद में ठुकराती है और हमें कलंकिणी बना कर हमारे ऊपर थूकती है। क्या कहीं हम अबलाओं का न्याय नहीं है?
गाना आज निर आश्रय हूँ मैं, यह क्या मेरी तकदीर है।
पेट खाली उधड़ा तन, यह क्या मेरी तकसीर है॥
ब्याह किया छोटे पती से, मात पित ने हाय मम।
थी जवानी मुझमें जब, कैसे बंधे मेरे धीर है॥
छोड़ कर मैंने पती रामू के संग शादी करी।
होगया जेवर खतम, तब कौन किसका मीर है॥
(कुछ लोग उधर से होकर निकलते हैं वह पैसा मांगती है। उसके पीछे में थूक देते हैं। लड़के आते हैं वह उसे ढेले मारते हैं। नारियां आती हैं वह नाक पर कपड़ा रख कर बच कर निकलती हैं।)
सब लोग मुझ पर थूकते, लड़के हैं ढेले मारते।
नारी सिकुड़ती नाक हैं, यह क्या मेरी तकदीर है॥
(उसके पिता और ससुर उस रास्ते से आते हैं)
ससुर — आजकल कहीं चैन नहीं।
पिता — घर से चले कि हरिद्वार में जाकर शान्ति मिलेगी यहां पर यह मिलेंगे जाने खाये जाते हैं।
अबला — अरे दुष्टों तुम्हें हरिद्वार में नहीं तुम्हें सातवें नरक में शान्ति मिलेगी।
ससुर — ओ. स्त्री, क्या बकती है चुप रह।
पिता — आजकल इन भिखमंगों के दिमाग चढ़ गये हैं। समझते हैं कि हमें गरीब जान कर हरएक कोई छोड़ देता है। इससे मन चाही बक देते हैं।
अबला — तुम लोग अन्धे हो। तुम्हारी आंखें नहीं हैं।
यह केवल दो सुरास है जो तुम हमें भिखमंगा समझते हो । हम तुम्हारे अत्याचारों के शिकार हैं ।
समफो न भिखमंगी हूं मैं, मैं आग की पुतली हूं वो ।
करदे भसम एक छाह से, मैं प्रलय की कारी हूं वो ।।
नमूना अत्याचारों का, तुम्हारे सामने हूं मैं ।
तुम आंखें खोल कर देखो, तुम्हारी कामनी हूं मैं ।।
पिता — हैं, कौन ? क्या तू सचमुच मेरी पुत्री कामनी है । बता बेटी इस तेरे भाग्य में मेरा क्या अपराध जो तू मुझे कोसती है ।
ससुर — और देखो तो कैसी बेशर्म है, दूसरे के सामने ऐसे मुंह खोले हुए पटापट बोल रही है ।
अवला — अपराध ? मुझसे अपराध पूछते हो ? तुम्हीं ने तो मुझे इस अवस्था तक पहुंचाया है ।
ससुर — अरे कुछ तो शरम कर ।
अवला — बस, बस, चुप रहो, जो लोभ के पुतले, अन्याय के बाप । बता मैं तुमसे क्या शरम करूं । माता-पिता से शरम करी तो मेरी यह अवस्था हुई । तुमसे शरम करी तो मेरा धर्म नष्ट हुआ ।
पिता — बेटी, बता मैंने तेरे लिये क्या नहीं किया । मैंने प्रथम भाग । ( ६५ )
तुझे बड़े लाड़ से पाली । इतना रुपया खरच करके तेरा विवाह किया ।
अवला — तुमने सब कुछ किया । किन्तु कुछ भी नहीं किया । तुमने अपना घनिष्ठ कर्तव्य जो मेरे लिये योग्य पती ढूंढने का था उसे पूरा नहीं किया । उसी का यह परिणाम है कि मेरी आज यह अवस्था है ।
ससुर — यदि तू घर पर रहती तो यह अवस्था कैसे होती, यह सब रामू के साथ भागने का फल है अब तू भुगत ।
पिता — देखो सामने से आदमी आ रहे हैं । वह अगर यह बात जान जायेंगे तो हमारी हंसी होगी ।
ससुर — चलो वह सामने से सुधारक का बच्चा भी आ रहा है ।
पिता — पुत्री तेरा कल्याण हो ।
अवला — पिताजी तुम्हारा नाश हो ( दोनों चले जाते हैं ।
सुधारक — ( आकर ) भाइयों देखा सुधार का फल ।
यह बड़े बूढ़े हम युवकों को पागल बताते हैं । आप लोग सोचिये । पागल हम हैं या ये ?
अवला — भाई तुम कौन हो ?
सुधारक — अपनी टूटी मैं समाज सेवक । शिक्षित समाज की दृष्टि में सुधारक और बूढ़ों की दृष्टि में बेवकूफ़ हूँ।
धवला — तुम जाते जाते क्यों रुक गये ?
सुधारक — तुम्हारा दुख सुनने के लिये।
धवला — इससे क्या लाभ ?
सुधारक — लाभ यही कि तुम्हें शान्ति मिले।
धवला — तुम मुझे कैसे जानते हो ?
सुधारक — जिस दिन तुम ब्याह कर लाई गई थी, तभी से मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम्हारे ब्याह को रोकने का मैंने बहुत प्रयत्न किया था किन्तु मेरी एक न सुनी गई। तुम्हारे ससुर ने कहा कि मैंने यह कार्य सुधार का किया है।
धवला — भाई क्या मैं तुमसे अब कुछ आशा कर सकती हूँ।
सुधारक — बहन, आप मेरे घर चलें। मैं आपको अपनी धर्म बहन बना कर रखूँगा। जो कुछ मुझसे उपकार बन पड़ेगा वो भी यथा शक्ती करूँगा।
धवला — भारत माता ! तुम धन्य है। आज भी तेरे पुत्र ऐसे परोपकारी हैं। (सुधारक से) चलो भाई मैं तुम्हारे साथ चलती हूँ।
(दोनों जाते हैं।)
दृश्य समाप्त.
अंक तृतीय—दृश्य तीसरा
(साधु और ब्रह्मचारी दोनों आते हैं।)
ब्र० — कहिये साधुजी कुछ देखा ?
सा० — तुम लोग महा झूठे हो।
ब्र० — वो कैसे ?
सा० — तुमने रावण की एकदम इतनी तारीफ़ कर डाली। उसे तुम जैनी बताते हो। जैनी होकर भी कोई रावण के जैसे दुष्कर्म कर सकता है ?
ब्र० — महाराज यह आपका कहना सत्य है कि जैनी होकर दुष्कर्म नहीं कर सकता। किन्तु पांचो अंगुलियों का नाम अंगुलियां ही है। एक ही हाथ के आश्रय हैं। किन्तु कोई छोटी है कोई बड़ी है। उसी प्रकार जिन धर्मके अनुयाई पुरुष भी बहुत से, इन्द्रियों के वशीभूत होकर बुरे काम तो करते हैं और बहुत से अच्छे काम भी करते हैं। जिन धर्म का काम मनुष्य को रास्ता बताने का है उस पर चलाने का नहीं है। यह मनुष्य को स्वयं अधिकार है कि वह चले या न चले।
साधु — लेकिन तुमने उसकी इतनी तारीफ़ क्यों की ?
ब्र० — सर्वज्ञ भगवान वीतरागी होते हैं। वह नि:प्रयोजन होते हैं। उनमें यह बात नहीं होती कि द्वेष वश किसी मनुष्य की बुराई ही बुराई करें। या प्रेम वश किसी की प्रशंसा ही द्वितीय भाग ।
श्री वीराय नमः ।
जैन नाटकीय रामायण ।
द्वितीय भाग ।
अंक प्रथम
दृश्य प्रथम
स्थान
( क्षीरकदम्व की खी की कुटिया । अपने गमलों में पानी दे रही है । )
गाना नहीं थाये पिया, मोर फाटे हिया ।
( इतने में ही मैं उलका पुत्र पर्वत आ जाता है )
माता — क्यों पर्वत तू अपने पिता को कहाँ छोड़ आया ?
पर्वत — माता ! मैं, वधू और नारद तीनों पिताजी के साथ गये थे सो रास्ते में पिताजी ने दिगम्बर मुनियों को बैठे देखा । उन्हें प्रणाम किया ।
माता — फिर क्या हुआ ?
प्रशंसा करें । उनके ज्ञान में जैसा झलकता है उसी के अनुसार वह कथन कहते हैं ।
साधू — खैर यह भी सही । मैंने माना । किन्तु तुमने बाली को यहाँ तपस्या करते दिखाया है । वहाँ हमारे यहाँ तुलसीदासजी ने उसे रामचन्द्रजी के हाथ से मारा गया बताया है । कहिये कि कितना आसमान का फरक है ।
वृ० — साधूजी, हमारे जितने पुरुष भी हुये हैं । वह सदा अपने धर्म पर कायम रहे हैं । और आजकल भी हिन्दुस्तानमें पुरुष अपने धर्म पर कायम है । वह मैं नहीं कहता कि पुरुष दुराचारी नहीं थे या नहीं हैं । वह सब कुछ थे और सब कुछ हैं । वह सर्व जैसे बाहर टेढ़ा मेढ़ा फिरता है । और अपने दिल में सीधा घुसता है उसी प्रकार ये । बाहर भले ही उन लोगों ने अत्याचार किये किन्तु घर में सदाचार पूर्वक रहे । सुग्रीव की रानी सुतारा को वह अपनी बेटी समझते थे ।
साधू — तो फिर राम ने बाली को मारा, क्या यह झूठ है ।
वृ० — नहीं झूठ नहीं है किन्तु उलट फेर है ।
साधू — वह क्या ?
वृ० — वह आपको अभी मालूम पड़ जायगा । आज हम केवल इतनी ही लीला दिलाकर समाप्त करेंगे । आज हम यह दिखलायेंगे कि वास्तव में यह क्या मामला है ।
पर्वत — इनमें से एक मुनी ने कहा कि यह चार जीव हैं । एक गुरु और तीन शिष्य । जिन में से एक गुरु और एक शिष्य तो भव्य हैं ये जग में अपना और पराया उपकार करेंगे ।
रे शिष्य जगत में महा मिथ्यात्व फैलाने वाले हैं । ये नरक गामी होंगे ।
माता — वह दो कौन कौन ?
पर्वत — पिताजी ने पूछा किन्तु मुझे पता नहीं कि उन्हों ने बताया या नहीं बताया ।
माता — किन्तु यह तो बताओ कि तुम्हारे पिताजी कहाँ रह गये ?
पर्वत — उन्होंने हम तीनों को उपदेश देकर बिदा कर दिया । और स्वयं …
माता — स्वयं क्या ?
पर्वत — स्वयं दिगम्बर मुनी …
माता — हाय, मेरा तो भाग्य फूट गया । अब मैं बिना पती के कैसे रहूंगी । ( रोती है ) हे पती देव तुमने मेरे यौवन पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया । अब मैं कहाँ जाऊँ क्या करूँ ?
दुष्ट मुनियों ने मेरे पती को मोह लिया । क्या मैं वहाँ जाकर उनसे घर लौटने के लिये प्रार्थना करूँ ? किन्तु वह कभी भी मुझे दिलासा देकर मेरे साथ नहीं आयेंगे ! हे पती देव, कुछ द्वितीय भाग । ( ८३ )
नहीं तो इस घर की दीन अवस्था पर तो विचार किया होता ।
पर्वत — माता धैर्य धरो । पिताजी कल्याण के मार्ग पर लग गये हैं ।
माता — दुष्ट तू यही चाहता होगा कि मैं अकेला रहकर मन माने ढोल बजाऊँगा । मुझे कहता है धैर्य धरो पिता को वहाँ छोड़ कर यहाँ आ बैठा । हाय पतिदेव । ( रोती है )
नारद — ( आकर ) गुरु माता आप इतनी व्याकुल क्यों हो रही हैं ? हमारे गुरु सर्व शास्त्र पारंगत थे । वह संसार की बुरी भली अवस्था को पहचानते थे । उन्होंने अपना कल्याण करने के लिये वैराग्य को धारण किया है । कोई ऐसा कार्य नहीं है जिसे वह छोड़ गये हों । हमें तीनों को उन्होंने, पूर्ण विद्वान बना दिया ।
अपने बाद अपने प्रतिनिधी पर्वत को छोड़ गये हैं । जो कि इस समय हर प्रकार का भार सम्हाल सकता है । आपको तो उनका कल्याण सुन कर प्रसन्न होना चाहिये ।
हाँ, भगवन हमारे लिये वह समय कब आयेगा कि हम भी मुनि पद ग्रहण करके अपनी आत्मा की उन्नति करेंगे ।
माता — पुत्र नारद, तुम्हारे वचन सुन कर मुझे हर्ष होता है किन्तु जब पती का बियोग विचारती हूँ तो
( आँखों में आँसू लेकर ) मेरा कलेजा फटता है । उन्होंने — अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें — मूल दस्तावेज़ (PDF): 2415.pdf
स्रोत — Gyata संग्रह।
