ज्ञान पहेली
जिनम् ज्ञानशाला द्वारा आयोजित
ज्ञान पहेली
एक अक्षर का मेरा नाम, मैं हूं पंच प्रभु का धाम।
सब जन करते मेरा ध्यान, बताओ तुम मेरा नाम।।
ऊँ
- तीन अक्षर का मेरा नाम अन्त कटे तो मैं ही सब हूँ।
मुझमें लोकालोक झलकते मैं हूँ अनन्त सुखों की खान॥
सर्वज्ञ
- दुनिया में है मेरा तांडव , सबसे बड़ा अधर्म कहलाती, जीव दुखी है मेरे द्वारा,जल्दी बताओ क्या कहलाती।।
हिंसा
- मननशील कहलाता हूँ चारों गति में जाता हूँ
संयम धारण करके मैं, मुक्तिपुरी भी जाता हूँ॥
मनुष्य
- जिसके सिर पर मैं हूँ आता, उसके होंठ भुजा फडकाता।
जो मुझमें अंधा हो जाता, छोटा बडा न उसे सुहाता॥
क्रोध
- एक नागिन की ऐसी करनी, सब कुछ चट कर जाती है।
तृष्णा के वह बस में रहती, धर्म भ्रष्ट करवाती है॥
रसना इन्द्रिय
- एक पर्वत इतना बड़ा,मध्य लोक नाभि में खड़ा । तीर्थंकर का नह्वन भी होता, बतलाओ में क्या कहलाता।।
सुमेरू पर्वत
- मुनि संघ का मुखिया हूँ, दीक्षा शिक्षा देता हूँ। संघ का संचालन करता ,निज आत्म में रहता हूँ।
आचार्य परमेष्ठी
- नीचे सात चोर हैं काले, ऊपर बैठे सुन्दर चाँद।
बीच सुमेरू द्वीप समन्दर, बीच बनी है नदियाँ बाँध॥
तीन लोक
- मुक्ति वधु जो दर्पण देखे, वचन सुनावे अमृत जैसे।
रत्नत्रय का मुकुट सजाये, भेद ज्ञान परिणति करवाये॥
जिनवाणी
- चार अक्षर का मेरा नाम, मेरा नाम है बडा महान।
प्रथम ग्रंथ के कर्ता को, मैंने ही बस दिया ज्ञान॥
धरसेन आचार्य
- नौ नाली जिस नगर में सदा रहें बरसात।
गली गली में रोग है, सडा करे दिनरात॥
शरीर
- सीमंधर के पास गये जो, उत्तम अनुभव शास्त्र रचे ज्यों।
पंचम युग के देव कहाये, उनका नाम आप बताये॥
कुन्दकुन्द आचार्य
- चार अक्षर का मेरा नाम, चार छोडकर आया हूँ।
चार साथ में लाया हूँ, फिर भी पूज्य कहलाया हूँ॥
अरहंत
- मेरा मस्तक है सबसे ऊँचा, बोलो क्या है मेरा नाम।
मैं रावण को नरक ले गया, सब संसारी में मेरा धाम॥
मान कषाय
- मोक्षपुरी एक ने पाई, एक को हुया परिपूर्ण ज्ञान।
उस दिन का तुम नाम बताओ, नहीं रहेगा तुम्हें अज्ञान॥
दीपावली
- छह अक्षर का मेरा नाम, समवशरण में मेरा काम।
सबको मुक्तिमार्ग बताना, कितना सुन्दर मेरा काम॥
दिव्यध्वनि
- सब पापी मेरे घर आते, सात घरों में दुख पाते।
तिल तिल करें देह के खण्ड, भूख प्यास भी लगे प्रचण्ड॥
नरक
- सब लोगों का माल हडपना, सबको में पहुँचाती जेल।
सबकी बदनामी करवाती, बतलाओ ये है कैसा खेल॥
चोरी
- सत्य अहिंसा के अनुरागी, वीतरागता जिनकी नामी।
तीस वर्ष में मुनि पद पाया, देवों तक ने उनको गाया॥
महावीर भगवान
जय जिनेन्द्र
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