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दशलक्षण महापर्व 2026Dashlakshan Mahaparv 2026

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ग्रन्थ की खोज

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1- काल से भिन्न पाँचों द्रव्य कायवान है
और सभी की स्व चतुष्टय से अस्ति
भी है।


पंचास्तिकाय


2- जिसने एक शुद्धात्मा रूप तत्त्व को जान लिया है उसके ही सर्व अर्थ सिद्ध हो जाते हैं, तथा आचार्यों द्वारा सूत्र रूप में सम्बद्ध किये जाते हैं|


तत्त्वार्थसूत्र


3- सम्यक् रत्नों का पिटारा जिसे प्राप्त हो ऐसे श्रावक की पहचान उसका आचार और विचार भी है।


रत्नकरण्ड श्रावकाचार


4- जगत को परम इष्ट कारक (कल्याणकारी) तीर्थंकर परमात्मा का उपदेश ही है|


इष्टोपदेश


5- तीन भुवन में सार वीतराग विज्ञानता।


त्रिलोकसार /
छढाला


6- द्रव्य दृष्टि से देखो तो प्रत्येक आत्मा में परमात्मा ही प्रकाशित हो रहा है।


परमात्म प्रकाश


7- सभी तीर्थंकर परमात्मा के प्रवचन का सार त्रिकाली ध्रुव भगवान आत्मा है।


8-जिसने मोह - राग - द्वेष, जन्म - जरा - मरण; इन छह खण्डों को जीता वही चक्रवर्ती सम्राट है; यही आगम का कथन है।


षट्खण्डागम


9- एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का रंचमात्र भी कर्ता - धर्ता नहीं है। यही समस्त वृहद् सिद्धांतों का संग्रह है।


10- मैं ज्ञानी हूँ कर्ता नहीं इस श्रद्धान का नाम ही सम्यक् पुरुषार्थ है और सिद्ध होने का उपाय है।


पुरुषार्थ सिद्धि उपाय


11- धन - लक्ष्मी की आराधना तो सारा जगत करता है, किन्तु भगवती प्रज्ञा सरस्वती देवी की आराधना ज्ञानी जीव ही करते हैं।


12- हे मानवो! धन्य है आपकी मनुष्य पर्याय जो संयम धर्म से प्रकाशित है; अतः आप प्रभु की पालकी उठाने के प्रथम हकदार हैं।


संयम प्रकाश


  1. आदिनाथ तीर्थंकर की कथा सुनाते हैं…
    सुनो जी मंगल जैन पुराण, यासों जीवन बने महान…

आदिपुराण


14- केवली भगवान ने जिस मार्ग पर चल कर मोक्ष रुपी लक्ष्मी को प्राप्त किया है वही हमारे लिए प्रकाशित हो रहा है|


मोक्ष मार्ग प्रकाशक


15- जिन वाणी कहती है कि नियम लेना सरल है, परन्तु यदि नियम का उल्लंघन किया जाये तो घोर पाप का बंध होता है, यह चरणानुयोग का सार है|


16- आचार्य सम्बोधित करते हैं, हे गोम्मट! स्वयं के परिणाम अनुसार ही कर्मों का बंध होता है, यही कर्म बंध की प्रक्रिया का सार है|


गोम्मटसार


17- राम का दूसरा नाम पद्म भी था, वन में उन्होंने नन्दी आदि गायों को रक्षण भी प्रदान किया तथा 25 प्रकार की कषायों का निरोध करने के लिए उत्तम तप भी किया |


पद्मनन्दी पंचविंशतिका


18- जिनेन्द्र भगवान की वाणी भव्यों के निमित्त से ही खिरती है ऐसे भव्य भक्त ही मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त कर अमरता को सिद्ध करते हैं |


भक्तामर


19- जिन धर्म परीक्षा प्रधानी कहलाता है, आचार्य समन्तभद्र जैसे गुरूऔं ने तो अपने परम गुरू आप्त तक की भी परीक्षा की है..


20- पाँच लब्धियों में करण लब्धि ही सारभूत है, क्योंकि शेष लब्धि तो अभव्य के भी सम्भव है।


लब्धिसार

प्रूफरीडिंग बाकी है

स्रोत · Source: forum.jinswara.com — अनुमति सहित, साभार · shared with permission and thanks.

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