दशव्रत नाटक मंगला चरण
दोहा — ऋषभ आदि दे वीरयुत श्रीजिन जे चौवीस।
हृदयाभूषण धारणकरुं पद युगनाऊं शीश ।।
चोवोला — पद युग नाऊं शीश कर्मरिपु तुमभे सभी निवारै, दोष अठारह रहित किये उपदेश देय भवतारै।
तारो प्रभु इहिवार पतित (हर) पावन तुमहिं उचारै।
भवातापमें तपा रहे हैं ये अरि शत्रु हमारे।
दोड़ — परम पद पाचौं ध्याऊं दशव्रत नाटक गाऊं।
सुनो सज्जन चित्त धरके करना दोषाभाव होय जो सेवक बुद्धि करके।
रङ्ग
दोहा — याही जम्बू दीपमें भरत क्षेत्र शुभसार।
हृथनापुर नगरी बसै स्वर्ग पुरी उनहार ।।
चौ० — स्वर्ग पुरी उनहार महल आकाशा झुमते भारी।
बाग बगीचे सुन्दर सोहैं ललित लता अति प्यारी ।।
श्रीजिन भवन अनेक बसै श्रावक कुलीन सुखकारी।
वित्तादिक. सम्पन्न तहां नृपनाम यशोधर धारी ।।
[ २ ]
क० — नगर ताहींमें अतिधन युत महारथ सेठ रहता था।
महासना प्रिया बाकी वाहि सह धर्म गहता था॥
ध्वजा बावन लखैताघर दिनारें कोट थी वावन।
मनोवति श्री सुता बाकी रूप युत और गुण गावन॥
अई जब अष्ट वारषकी गई सुनि दिग करन पाठन।
पड़ी षड़मासके अन्दर सुनाऊँ और विज्ञापन॥
दौ० — याहि विष कुछ दिनवीते, वरष पोड़श अवतीते।
सोच पितुमन कछु आयो पुत्री शादी योग हुई॥
तब प्रोहितको बुलवायो।
महारथ सेठ।
दो० — सुनोबात मम विप्रवर कहूँ भेद समझाय।
सुताव्याहके योग हुई चिंता व्यापी आय॥
चौ० — चिंता व्यापी आय होय जो मेरे सम धनवाना।
सुन्दर रूप होय वर जोई परणों जाय निद्राना॥
देश दशमें जाय लौटके भी जल्दीसे आना।
देजूं बहुत इनाम यही मैंने अपने दिल ठाना॥
दौ० — नहीं टुक ढीलकरीजे वरष सम दिवस व्यतीते।
द्रव्य टीकाकर आना जाधर चांढ़ानहो उनसे हाल मेरा कह आना॥
कवि।
दोहा — सेठ हुकुम हृद धारकर विप्र चलौ तब सोय।
बीते अमते मास छह मित्त्वो न वर तब कोय॥
[ ३ ]
चौ० — मिल्यो न वर तब कोय भटकता वल्लभपुरमें आया, देख २ नगरीकी शोभा फूला नहीं समाया॥
इसरी पुरमें लगे ठिकाना यही हृदयमें ध्याया।
इस उससे पूछता हुआ यह हेम सेठका पाया॥
दौ० — हृदयमें अति हुलसाकर, पहुंच हिमदत्त सेठ घर लगा यों कहने हाला।
और महारथ सेठका उसने दीना पत्र निकाला॥
विप्रका महारथ सेठसे।
चहरतबील — हस्तिनापुर नगरमें बसे सेठ इक, कहो नाम महारथ महालक्ष युत। ध्वजा बावन दिपै सत कहूँ तुमसे मैं सुता ताकि जोहै रूपवंती अधिक।
दीनी तब पुत्र बुधसेनको है वही। मेजोता सेठने मोकूं कहता हूँ सत। कीजे मंजूर जाउं मो सेठी नगर अपने सेठीको दूहां खबरये सुफत॥
महारथ सेठ।
चहरतबील — अच्छा मंजूर मुझकोजो कहतेहो तुम विप्रवर कुशलबरचे सुनाना उन्हें। पत्र लेजाइये काम जल्दी करें ब्याहकी लग्र जाकर बताना उन्हें। शुभ कुशलकी खबर बोलिये जायकर हाल मेरा वो सबही जताना उन्हें। आप खुद ही समझ दार हैं प्रेमयुत शुभ विनय जाय मेरी सुनाना उन्हें।
कवि
दोहा — घड़ी द्रव्य सुधवायके लीनों कुंवर वलाय।
घनी द्रव्य निजकरग्रही टीका दियो चढ़ाय।।
चौ० — टीका दियो चढ़ाय उसीदम चलन हुआ तैयरा।
हेम सेठसे विप्र विदा में दिया द्रव्य अति भारा।।
होकर विदा विप्रने उसने हयनापुर मग धारा।
चलते चलते कुछ दिन बीते सबमग किया पिछारा।।
दो० — आय वह अपनी नगरी। छोड़कर रास्ता सगरी।
सेठघर पहुंचा जाकर निज सब वाग्दानकी चर्चा। कहने लगा मुसकाकर विप्र।
दो० — इहिं विधवरहैं मिलौ मो सुनौ सेठघर कान।
वल्लभपुर शुभ नगर है हेमसेठ है जान।।
चौ० — हेमसेठ है जान पुत्र बुधसेन रूप गुणकारी।
विद्या बुद्धि अनूप कहूं सत मानो बात हमारी।।
कहा बयान करूं ज्यादाइह घटना सारी।
दो० — महलमें लटकै मोती। चमचमती जिनकी जोती।
कहूं सच सच सुन लीजै।
सुधवाओ शुभलग्न सेठ सुनजल्द ढील नहीं कीजै।।
रक्षा।
दो० — विप्र वचन सुन इस तरह हर्षे लिया उरधार।
तवही सुन्दरी आयकर बोली वचन सम्हार।।
दो० — सुनपितु लीजे बातलग गई शुनिश्वर पास।
दरभिमतिज्ञा मैंलई है शुनिश्वर की साख।।
चौ० — दे शुनिश्वर की साख पंज गजमोती जबहिं चढ़ाऊं।
लई प्रतिज्ञा यह भी तबही ओजन करूं बनाऊं।।
प्राण जांय तोजांय नहीं पर अपने व्रतको छुड़ाऊं।
सच हुअ क्षार २ करवैया जिन चरनन शिर नाऊं।।
दो० — चन्द्र अरु सूर्य टरैंगर। नहीं व्रतटरै यह मगर।
यही निश्चय हृदधारौ।
श्रीशुनिश्वरकी शपथकरी अरु चरननहिं शिरधारौ।
सेठ महाराज ।
दो० — दर्श प्रतिज्ञा लैई, भली करी अवसोय।
किंतु बात दूजी कठिन, यह दीखत है मोय।।
चौ० — यह दीखत है मोय कठिन दूजी जो गजमोतिनकी रहु मम घर जबतलक चढ़ैयो हेरी गजमोतिनकी।।
सासुरा घर जबजेहगु कहुक कठिनाई होय ना दिनकी।
मिलैना मिलै पुत्री यह अकुलाई मेरे मनकी।।
दो० — रही जब लग मेरे घर। चढ़ैयो गज मोतिनलर होयतादिन कठिनाई।
जादिन सासुर गेहजेहगु यह बात अधिक दुखदाई।।
[ ६ ] सुन्दरी।
रू० — लैई जो जो प्रतिज्ञा है नहीं टालूंगी मैं हरगिज।
टालै रवि चांदजी गरचे नहीं टालूंगी मैं हरगिज ॥
धरै आकाशा धरणीमें धरणि औलौट जाये यह।
दई श्रीश्रुति शपथ मैं तो नहीं टालूंगी मैं हरगिज ॥
रंगा।
लावनी — दोनों तरफोसे हुई ब्याह तैयारी, आनन्द बधाये लगीं गावने नारी। हिमदत्त सेठने निवते भेजे भारी आये सबजन जित २ श्री रिश्तेदारी। गजरथ तुरंग साडिया पालकी साजी। तम्मू मंडप अरसी सुनरी छवि छाजी ॥ वीणा तम्बूरा आदि बाजने बाजे।
किल बांसुरियाकी बोली मीठी छाजे ॥ मिरदंग धुनी होरही कहीं पर न्यारी ॥ आनन्द० ॥ कितहोल नगाड़े बोल रही सहनाई, सबही वर शोभा सुखसे कही न जाई। सब जन साजे सुन्दर गहनोसे भारी।
मोतीकी चमकसे मिटती थी अंधियारी। इस विध बरात चाली मन मोहनहारी ॥ आनन्द० ॥ सब भांती ब्याहु “हरि” पूरन हुआ खुशीसे। आ गये लौटकर बिदा करा खुश ही से। जिनपूजा दान दिया दीनोको भारी भोजन कीना रहगई अकेली नारी। बोली सासु बहु भोजन करो पियारी ॥
आनन्द बधाये लगे गावने नारी ॥
[ ७ ]
दोहा — नहीं दिया उत्तर जबी, बहू मौन उरधार।
बोली सासू फिर तभी, करके बहुत पियार ॥
सासू ।
दो० — चल बहूअर भोजन करो, हुई है बहुत अबेर।
जीम चुके सब नगरजन, करो नैक नहिं देर ॥
चौ० — करोनेकनहिंदेर बुलावण आई हूँ तुमको।
काहे लेयो मौन खड़े इस जगह देर हुई हमको ॥
बर्षाओ आनन्द सब जनन निजदिल त्याग शरमको भोजन कीजे बहू इस समय छोड़ो मौन भरमको ॥
दो० — देखलो खड़े यहांपर, व्यतीता एक पहर भर।
जल्द उठ करो न देरी।
तज दे निज सकुचाई मान बहुअर ये शिक्षा मेरी ॥
अच्छा मैं तुम्हारे ससुरसे कहती हूँ सेठ ॥
चौबोला — सुन प्राणाधार पिया प्यारे लघु बहू मौन गहलीना है। बीता यह दोघ पहर दिन है अबलग भोजन नहीं कीना है ॥ मैं खड़ी रही उत चार घड़ी बिल्कुल उत्तर नहिं दीना है। कीजे प्राणेश उपाय कछुक उस हो भोजन जल पीना है ॥
हिमदत्त सेठ ।
दुबोला — अद्धाजी सुनले बात मेरी हठ करना. उससे ठीक नहीं। लड़की भोली दिल सकुचत है हठ करना उससे ठीक नहीं ॥ धीरे २ जब सकुच मिटे अरु [ ८ ] हृदय विचार होय जबही। मत घबड़ाओ मत घबड़ाओ भोजन भी कर लेगी तबही ॥
रक्षा।
दोहा — मिलै न गजसोती हुमै, कहा कह अब जोय।
हृदय जपै नवकार वह, तजो अन्न जल सोय ॥
दूजो दिन लाग्यो जबै, तब उठ धाई सास।
पहुंची सुन्दरीके कनै, आगे सुनौ हवास ॥
साहू।
ग० — भोजन करो वह अब दिन दूसरा लगा।
तज मौनको तू इस दम सकुचाईको भगा ॥
उत्तर न देना — ॥ सेठ ॥
ग० — बहुने किया न भोजन दिन बीत दो चुके हैं।
कीजे उपाय कोई बस हम तो थक चुके हैं ॥
सेठ ग० — घरबार त्याग भोजन मम मानलो कही।
संकटको देख करके भोजन करै वही ॥
कवि।
दो० — चौथो दिन लागो जबै, खबर करी तिहि तात।
सुन हवाल यह उसी क्षण, आयो सुन्दरी भ्रात ॥
दोहा — सुनौ सजन यह बात मम, घर अति अपना ध्यान।
पहले पूछे बात यह, बाद करै सन्मान ॥
चौ० — बाद करै सन्मान हाल हमको बतलादो सारा।
[ ६ ] शोक तेजका फैल रहा परवार मांझि अझारा ॥
इसी लिये हे सजन मैंने भेजा तुमको हलकारा।
बीते हैं दिन तीन मौन तब भगनीने हद्द धारा ॥
दौ० — अन्नजल त्याग दिया है, मौन हद्द धार लिया है।
संकट है दिल भारी।
सुनिये सजन बात मेरी यह अपने श्रवण मझारी।
भ्राता — अच्छा अभी बहिनके पास जाता हूँ और सब हाल आपको सुनाता हूँ।
भ्राताका सुन्दरीसे।
भ्रा० — सुनले भगनी सद्बु वचन मैं कहूँ सुना दुःखका हवाला ज्ञात है। काहे मौन लियो छोड़के अन्न जल बीते तीन दिवस दिलमें अकुलात है ॥
पड़ा आनन्दमें है ये संकट अती शोक ही शोक दीखे कहा बात है। दीजे जल्दी बता अपनी सारी विथा मारे दुःखके हृदय ये जला जात है ॥
सुन्दरी।
व० — भ्रात सुन मैंने लीनी प्रतिज्ञा दश दुख निवारण मुनीश्वरकी लेके शरण। पंजे मोती चढ़ाऊँ मैं कहती हूँ सत्करूँ भोजन तभी चाहे होवै मरण।
मुझको मोती नहीं दिखते क्या करूँ बस इसीसे [ १० ] सैने मोन कीना गुहण । करके जल्दी विदा हस्थिना पुर चलो हस्थिनापुर पहुंचके हो मेरा मरण ।
( सुन्दरी भ्रातका ) सेठसे ।
व० — शोक करना तुम्हारा है वेफायदा शोकयुत बात कोई जी पाई नहीं । लड़की की नासमझ खाती दिलमें शरम छोड़ निज गृह बाहर भी आई नहीं । लाज जो कुछ भी था सत सुनाया तुम्हें कोई भी बात तुमसे छिपाई नहीं ॥ कीजे जल्दी विदाकरें भोजन वही और भी कोई दिखाता उपाई नहीं ।
सेठ ।
दोहा — वाह वाह साजन तुमहेंना, कहते होकछ भेद ।
यह तो हम माने नहीं, सत्य कहो परि छेद ॥
चौ० — सत्य कहो परि छेद कछुक नहीं इसमें सोच विचारा, इस घरमें भोजन नहीं करनेका उत्तर दो भट सारा ।
बिन भोजन कैसे भेजूं मैं कित है ख्याल तुम्हारा ।
सच सच सुझे बतलाना अब तुमको है कौल हमारा ।
दौ० — हुआ सम्बन्ध हमारा । बहू आवे हरवारा ॥
होय हरदम कठिनाई ।
याहीसे उस कारणको नहीं रक्खो हृदय छिपाई ॥
लीनी प्रतिज्ञा इसने सत सत तुम्हें सुनाऊं ।
जिन दर्श जब करूं मैं भोजन करूं बनाऊं ॥
[ ११ ] अरु पुंजले गजमोती चमकेगी जिनकी जोती ।
दीखें मुझसे न मोती कहतीमें कैसे खाऊं ॥
सेठ ।
वाती — अह पुत्री तुने व्यर्थमें क्यों इतना अपार दुःख सहा, मुझसे क्यों नहीं कहला भेजा जबतक तुम्हारा जीवन रहेगा तबतक हमारे यहाँ बहुतसे मोती हैं ।
सुन्दरीका विदा होना और मालिनका आश्चर्य युक्त आना ।
मालीसे ।
पिया जिनगेहका आश्चर्य अधिकहै दिलमें ।
आज आया कोई धनवान है जिन मन्दिरमें ॥
देखो गजमोती बढ़ाये हैं घनी कीमतके ।
जन्म दारिद्र नशा जानिये अपने दिलमें ॥
माली ।
म० — बड़ मूल्यहै ये मोती सुन नारि बात लीजे भूपाल छिनालेगा घरमें नहीं रखीजे ॥
मालिन ।
म० — बतलाइये उचितहै करना क्या इनका फिर अब ।
जैसा कहेंगी मैंतो करूंगी बस अब ॥
म० — जाओ स्वाटिकाकामें बहु भांति सुमन लाओ ।
अरु ग्रंथके में माला मन मोहनी बनाओ ॥
[ १२ ] रानी गलेमें डालो वह देय पारितोषिक ॥
अरु नहिं उपाय दूजा जाओले अभी जाओ ।
मालिन ।
ग० — जाती हूं लो इसीक्षण लाती सुमन चवेली ।
अरु गृथके इसी दम जाती हूँ मैं हवेली ॥
चला जाना ( स्वागत ) मालिन ।
दोहा — नृपके रानी दोय हैं, किसगल डालूं हार ।
हांनृपको लघुपर अती दीखत है मो प्यार ॥
वार्ता — राजाका छोटी रानीपर अधिक प्यार मालूम होता है, इससे छोटी रानीके गलेमें ही डालना चाहिये ॥
( हार डालदेना ) रानी ।
थियेटर — मालिन अच्छा हार बनाया है यह मेरे हृदय समाया अबतक और नहीं कोई आया तेरे हाथ हाथ हाथ ।
ले मैं देती तुझे इनाम इसको अपने करमें थाम बैठो थोड़ा करो विराम मानों बात बात बात ॥
रंगा ।
दोहा — बड़ी महलकी दासियां खड़ी हुती तरह कोय ।
जाय कही रनिवासमें, रानीसे फिर जोय ॥
दुबोला — रानीने त्यागकिया भोजन मारे गुस्सेके चूर हुई ।
राजा आये करने भोजन दौड़ी चांदी अति शूरुई ॥
चांदी ।
दु० — महाराज जोरकर खड़ी हुई फरयाद मेरी इक सुनलीजे [ १३ ] जेठी रानीने क्रोध किया वादीका कहना चित दीजे ।
नहिं सुख प्रक्षाल किया उसने आसूकी नदी बहाती है, त्यागोजलपान सभी राजन शोकाग्रिसहृदय दहाती है राजाका जेठी रानीसे ।
दु० — ऐ प्यारी क्यों तू क्रोध किया वितरात वो सभी सुनादीजे जलपान भी तूने त्याग किया दिलविलखतभटखटलादीजे रानी ।
दु० — क्या बात पूछते अब हमसे मैं निज कर्मोंकी मारी हूँ, मैं देखके अपनी निंदाको खुदहीसे क्षुद्रधिकारी हूँ ॥
दु० — आखिर क्या बात बतादीजे मेरे दिलमें अकुलाई है ।
निंदा किसनेककी है तुमरी अद्भुत यह बात सुनाई है ॥
रानी ।
ला० — क्या कहूँ काम कुछ भी नहिं है अवनीसे । मेरा आदर टुक क्षुद्र न अब तो दीसे ॥ छोटी रानी है प्राणोंसे प्यारी आपहि अरु सबके निचाबड़ी हमारी ।
मालिन भी निंदा आज लाई इकहरा । दीना । छोटी मोहि नहिं दीना भूषारा । तज दूंगी अपने प्राण तरह इसहीसे ॥ मेरा० ॥
ब० — शोक इतना करो हो जरा बातपर मेरी प्यारी तुम्हारी है जुदी कदाँ । मैं कभी नीचता क्या [ १४ ] कहोतो तुम्हें धरले धीरज मेरे मनमें दुखहै महों ॥
वाको भालिन है लाई विचारी सही, हार फूलों सहित इसमें निंदा कहा । मैं गहाजंगा मोतिनहार खुदरी तुम्हें चाहे होवेगी कीसत अहासे अहा ॥
दोहा — सुनरानी हर्षित हुई राजाकी यह बात ।
खुल प्रक्षाल भोजन कियौ और सुनै विख्यात ॥
राजाका कोतवालसे ।
वार्ता — आय कोतवाल तू अभी जा और नगरके तमाम जौहरियोंको बुलाला ।
कोतवाल ।
अच्छा महाराजा जाताहूँ — (बुलालाना)
राजाका जौहरियोंसे ।
क० — सुनो अय नग्रके जौहरि मेरा इककाम है तुमसे ।
मुझे लादो वो गजमोती तुरत सब दामलो हमसे ॥
जौहरी ।
क० — प्रजा रक्षक सुनो राजन नहीं उत्पन्न हो मोती ।
कहो देवें कहांसे हम नहीं है एक मोती ॥
दोहा — अच्छा निजघर जाइये और नहीं कछु काम ।
नहीं चिंता इस बातकी छोड़ो इसका नाम ॥
चौ० — छोड़ो इसका नाम बात दूजी भी इक सुनलीजे ।
[ १५ ] दोय चार दशवीस दिना छह महिना वरष व्यतीते ।
कहता सत सत बात अगर इकभी गजमोती दीखे देऊं दण्ड अपार कि उसका वही मजा वह चीखे ॥
दो० — अगर गजमोती पाऊं । सुनौ कह सत्य सुनाऊं खेंच खुप खाल भराऊं देश निकाला देऊं और गृह लक्ष्मी सभी लुटाऊं ॥
लावनी० — आगे यह सज्जन दृष्य अपूर्व सुनीजे । जो जो व्याख्या होवे सो चित धरलीजे । जब हुई सभा वरखास्त सभ्य भूपतीकी । सुन लेओ कथा हिमदत्त सेठकी मतीकी । हिमदत्त पहुंच घर मनमें करै विचारा । जिंदगानी अस्पष्टु नाहिं निवारा । लघु पुत्र वधू हर बार मेरे घर आवे । जिनमन्दिर मोती रुकवै नाहिं चढावै ॥ सुनकर राजा ले मेरी द्रव्य लुटावै । नाहिं बहु है यहतो अच्छी आफत आई ॥
कहका उसने यह प्राणवान व्रत लीना । इस धर्ममें निश्चयसे लाग्यो अव अति सीना ।
हिमदत्त सेठका पुत्रोंको बुलाकर
दोहा — सुनो पुत्र अब क्या करें बहू जब आवे सार ।
मोतिन पुंज चढायगी लदि लुट्टै भरमार ॥
ज्येष्ठ पुत्रका ।
पिता सुन लीजिये इक बात हमको सदमी है !
…
[ १६ ] पुत्र लघु काढ़िये नहिं और बात दूजी है।
पिताका।
दौर — पिताको पुत्र जनम प्राणसे भी प्यारा है।
कैसे कर काढ़ू दूँ किसका छुटे सहारा है।
ज्येष्ठ पुत्रका।
दौर — अगर वह प्यारा है तो उसको घर ही रखिये पिता जाते हैं हम छोड़ो रहने के नहीं हैं हा पिता।
कविका।
दोहा — सुन यह पुत्रोंके वचन हिमदत्त सेठ सुजान।
नैनन नीर बहावता भूल गया सब ज्ञान।
दौर — भूल गया सब ज्ञान बिलखता कहा किया कछु मनको लेकर कागज हाथ रोवता बैठा वहाँ लिखनको लिख बुधसेनका देश निकाला खुशी हुई पुत्रनको।
उसी समय भेजा घर बुधको क्या जाने उन मनको।
दौर — दिया कागज दासीको। सुनाया यह दासीको।
बुद्धसेन जब आवे।
पहले कागज वांच बादमें पत्र देना भीतरको वह जावे।
बुद्धसेनका आना (दासीका)
दोहा — पहले कागज वांचिये कोमल वदन कुमार।
वांच पत्रिका बादमें अन्दरको पग धार।
सुकुमारका (स्व०) ग० कहो कहाँ जाऊँरे, कुछ भी तो मुझे सुहायना। कहो।
[ १७ ] कहो आत छह कमाऊ हुये हमको निकाला (तात)
हमको निकाला। दीखें नहीं ठाऊँ रे। पितु आज्ञा भी निभावना ॥१॥ तात मात भूठे हैं, थे लक्ष्मी धिकारी रे हाय किसे आऊँरे। आसू ही मुझमें वहा बना ॥२॥
जाऊँ जो विदेशाहि तिय सुन पैंहे (मेरी) तिय सुन पैंहे घासे मिल आऊँ रे। नहिं उस हो प्राण गमावना ॥३॥
कविका।
दोहा — भ्रुकुटी टेढ़ी कर्मकी, रोक सके नहीं कोय।
जो हरि सुतका आज यह, देश निकाला होय।
छंद — वांचत ही कागजको कुधर उलटेही पैरों चल दिया।
नहिं अश्वसे उतरा कभी वह हाय पैदल चल दिया।
हो धूप देख शरीर कोमल आम फल श्रुत हो पका।
भूलोंके मारे हम निकलती पास नहिं एकहु टका।
करता जो भोजन छह रसोंके आज भूखा चित्र है।
धनका भरोसा है नहीं कर्मों की चाल विचित्र है।
उपादृष्ट काहें क्या चलते २ पहुंचा हस्तिनापुर नगर।
सोता था बागोंमें कि मालिनकी पड़ी उनपर नजर।
माली सुना यह बात पहुंचा। सेठ डिग आनद पगा।
सब हालको निज सेठसे वह इस तरह कहने लगा।
मालीका।
दौर — पुत्रवधू कोदिका भवदीय जमाई आया।
… मैंने पहचान लिया आपको है जतलाया।
…
[ १८ ] सेठका ।
चौर — कहाँ है संगमें कितना सभी लश्कर आया ।
हमें बतलाओ सही डेरा कहाँ डलवाया ॥
मालिका ।
चौर — सो रहा बागमें कोई नहीं चञ्चार संगमें ।
नहीं है अश्व सी जोरोंसे थका है मगमें ॥
( दूसरे जौहरीका )
चौर — करके सन्मान अधिक अपने मकाँ लाओ तुम ।
हुक्म न अरसा करो जाओ लो अभी जाओ तुम ॥
'दोहा — भट पट पहुंचा बाटिका किया न तनिक बिलम्ब ।
लाकर घर जा मातुकको स्त्रियसे कही अलम्ब ॥
व० — स्त्रियसे कही अलम्ब बात पूछन नहीं चहिये प्यारी अति ही चंचल जात स्त्रियाकी अवगुण रूप कुठारी ॥
बोली चंचल नारि बात इक शून्य विचार अपारी ।
पूछो कारण क्या भट कहने लगी दूसरी नारी ॥
व० — मिला सुन्दरिसे दीजे । और कुछ भी नहीं कीजे ।
पहर भर निशि जब बीती ।
कंथ स्त्रिया जब मिले सुन्दरि बोली बाणी शीती ।
सुन्दरिका कुमारसे ।
व० — मैं हूँ नारि तुम्हारी हजारी चालम हाल प्यारीसे [ १९ ] कुछ भी छिपाओ नहीं । बिन बुलाये जो आये हो ससुरालमें सच बताओ दारम दिलमें खाओ नहीं ॥
कुमारका ।
व० — चन्द्रवदनी करमकी गतीको कोई टाल सकता नहीं, चाहे अति शूर हो । बस तनिकमें ही जानो बहुत घातको करमसे फिरना होता है मजबूर हो ॥
सुन्दरिका ।
व० — हे करमकी गती दुःखदाई पत्नी लक्ष्मिपुत दीन हो हो दरिद्र धनी । इस समय तो करमने है क्या लौट ली दिलजला जात पिपु दुःख भरी सुन धुनी कुमारका ।
व० — तात अब मत अरु बातकी कल्पना है यथारथमें कोई किसका नहीं । भ्रात छहही कमाऊ हुए बस हमें मंद भागी कल्हन तुमसे आधे यहीं ।
सुन्दरिका ।
व० — अब सभी शोकोको नाशकर प्राण पिपु हस्तिनापुर नगरमें ठिकाना करो । तुमको मेरी कसम १ अब कहीं भी नहीं तुम पयाना करो ॥
सुकुमारका ।
दोहा — अगर जसाई जा बसे, सुन जो कह ससुरार ।
कुल दोषी उन मनुजको, बार २ धिक्कार ॥
चौर — मानूं हरगिज नहीं परदेशको मैं जाऊँगा [ २० ] द्रव्य पैदा करू पुरुषार्थ कर दिखाऊँगा ॥
रहनेके पीहरमें करो भोग आदि मनमाना ।
सत्य सुन स्त्रीचू ही वापिस मैं लौट आऊँगा
चौर — गर इरादा है यही संग मुझे ले लीजे सर झुकाती हूँ कदम हुक्म मुझे दे दीजे नारि सुख भोगे सहै दुःख पति विदेशनमें धिक वो पतिविरता नहीं शुभको न दोषी कीजे जायँगे आप अगर शुभको अकेली तज कर प्राण तत्काल तजूँ जान ये दिलमें लीजे
दोहा — पतिने निश्चय कर लिया यह रहनेकी नाय गहने सब उतरायके लीनी संग लिवाय
छंद — दिन चारके उपरान्त पहुँचे रत्नपुरमें दम्पती जलपान उन कीना नहीं अतिही दुःखित है दम्पती जिन दशों गजमोती बिना जिन नाम उरमें लावती हूँ नारि पति उद्यान बैठे पास नहिं एकहू रती जब केश देखे नारि तो वह हर हरा कहने लगी झूले हुए इन मोतियोंसे भोज्य कुछ लाओ पती ।
पतिको जिमा भोजन अपन भूखी रही दिन सात जिन दशों गजमोती बिना अरहंतको ध्यावे सती ।
[ २१ ]
ला० — कंपा जब आसन इन्द्र अवधिसे जाना । है धन्य पतिविरताके सब दुःक्खो अनुमाना । है धन्य त्रिया यह दृढ़ व्रत पालनहारी । रह गये कण्ठमें प्राण न चिगै विचारी । झट करी सहाय इन्द्र यह हुक्म सुनाया । सुन करके झट इक देव रत्नपुर आया । खुहरा रच मोती ढेर बनाये अपारा । ले पुंज दशरक्षक सुख दिल अन्दर धारा । बाहर नर मादी मोती जोड़ा पायो । पुलकित हो उसने अपने हाथ उठायो । अष्टम दिन भोजनकर निज नाम जगायो, नर मोती दे पतिको यों वचन सुनायो ॥
दोहा — यह मोती ले जाइये, प्रीतम प्राण अधार ।
गहनेसे मोहर उठा, जइयो नृप दरबार ॥
चौ० — जाकर नृप दरबार, सुहर वह द्वारपालको देना ।
जहाँ करें भूपाल कचहरी, वहाँ चले ही जाना ॥
अधका नाम निशान पिया, नहिं अपने दिलमें लाना जय जिनेश्वरकरका मोती सेठ नृपहिं कर आना ॥
दौ० — मान पिच मेरी लीजे । न अब कुछ देरी कीजे ॥
जाथ लाओ इक मोहर ।
फिर देखो व्यापार तनिक सा करता है चे क्या नर ।
[ २२ ] रंभा।
दोहा — सुनत बचन निज नारिके, ले आया दीनार।
गहनेसे मोहर उठा, पहुंचा नृप दरबार ॥
सुकुमारका राजासे।
दोहा — जय जिनेश स्वीकार हो, प्रतिपालक महाराज।
न्याय नीति पूरित महा, विकट सुधारन काज ॥
चौ० — विकट सुधारन काज शत्रु-दल दूरहिं देस दरावै दीन होय धनवान दुखीजन दुःख निवृत्ता पावैं ॥
अन्यायी अन्याय चोर नहीं लूट मचाने पावैं।
थर हर कांपैं अत्याचारी नाम अगर सुन पावैं ॥
दौ० — भेंट यह निज कर लीजे। कृतारथ मुझको कीजे।
जाऊं मैं अपने डेरे।
दीजे आज्ञा हे नृपाल प्रति पालक धन अब मेरे ॥
राजा।
दोहा — कित ठहरे सुकुमार तुम, लीजे पान चबाय।
यह मकान लख लीजिये, रहो यहांपर आय ॥
चौ० — रहो यहांपर आय धन्य जौहरि हो तुम्हीं कुमारा।
जो ऐसे २ मोतीका करते हो व्यापारा ॥
ऐसा सुन्दर मोती हमने अब तक नहिं निहारा।
चटकीला चमकीला सुन्दर रूपवान अति प्यारा ॥
दौ० — जितने जन तुम्हें चाहिये। यहांसे लिवा जाइये।
आयकर यहीं ठहरिये।
मनमाना व्यापार नगरमें जी चाहे सो करिये ॥
( चला जाना )—राजाका भण्डारीसे।
चौ० — भण्डारीजी लाल यह, रखो जल्द हो जाय।
खोल खजानेमें इसे, कोई न लेय चुराय ॥
कवि।
ला० — दूसरे दिन फिर सुकुमार कचहरी आया। वह ही मोती भूपाल भेंटको लाया। राजा जब देखा फूला नहीं समाया। दिलमें विचारता अच्छा जोड़ा पाया। फिर भण्डारी बुलवाय हुक्म यों दीना। ले आओ जो भण्डार मांहि रख दीना।
भण्डारीने जब देखा दृष्टि पसारी। पाया नहीं जब सब सुध बुध तुरत बिसारी। देवें जवाब क्या दिल अन्दर घबड़ाया। फिर थर हराय भूपतिको वचन सुनाया ॥
भण्डारी।
दोहा — चिरंजीवी गद्दी रहे, अन्नदाता सरकार।
निकट चोर आया कोई, नृप तुमरे दरबार ॥
चौ० — आया है दरबार माहिं नहिं खौफ़ जरा भी खाया।
थर हर कांपै देह मेरी कहते हे नर-पति राया ॥
निधड़कतासे तस्कर वह बस उसी खजाने भाया।
बेश कीमती कान्तिमान रूप मोती वही चुराया ॥
दो० — लगा वैसा ही ताला। अरज सुनिये भूपाला।
गजबका तारा चमका।
मेरे दिलका तेज हुआ बस वही खजाना गमका ॥
राजा।
दोहा — रे पापी जाना मैंने, आया तेरा काल।
चोरी हुई दरबारसे, वृथा बजाता गाल ॥
चौ० — वृथा बजाता गाल कालके मुँह जावे हत्यारे।
कर दे साफ बयान दण्ड नहिं पावेगा बटमारे ॥
क्या मजाल तस्करकी आवे चोरी करन यहां रे।
बसै मनुष्य आकाश मांहि धरणी पै आवै तारे ॥
दो० — चुराया तूने लाल है। चोरकी क्या मजाल है है क्या कोई खल्लासी।
ले जाओ जल्लाद पास लगवा दो इसकी फाँसी ॥
शुक्रमार।
दोहा — गुस्सा शीतल कीजिये, धीरज धाम नरेश।
कल फिर जोड़ मिलाय दूँ रखियो पास हमेश ॥
छंद — माफ इसकी चूकको अब झूप करना चाहिये।
लागकर गुस्सेको दिल धैर्य धरना चाहिये ॥
वार्ता ( अच्छा जय जिनेश ) ( चला जाना )
कवि।
दोहा० — उसी तरह दिन दूसरे, चला कुँवर दरबार।
भेजं दिया मोती तुरत, खुलवाया सण्डार ॥
[ २४ ]
क० — नहीं निकला जबी मोती हुयी दिलमें हुआ भारी।
बना जस चित्रपट होवै हुआ स्थिर वो भण्डारी ॥
किया सिद्धान्त दृढ़ उसने निकली जान अब मेरी।
नृपति खुली चढ़ायेगा कुदी शमशान है जारी ॥
रहा विह्वल पहुंच नृपति निकट चुपचाप घवराता उसे अवलोक इस विधिसें नृपति गुस्सा किया भारी ॥
क० — बहाना दृढ़ दृढ़ पाया है अब ओ चोर ओ पापी।
समझता था अभी सभा निरखली तेरी गुस्ताकी ॥
अरे आओरे जल्लादो निकालो नैन झट इसके।
चढ़ादो दारपर इसको लगादो जल्द या फाँसी ॥
शुक्रमार।
क० — नहीं कुछ दोष है इसका कहूँ सुन लीजिये राजन् ये नर मादा है ऐसे ही थकी कर लीजिये राजन् ॥
हजारों कोससे उड़नपर पहुंचता पास मांदाके।
रखो दोनों ही निज घरमें रहेंगे पास अब राजन् ॥
( परी गायन )
क० — हो धनसुकुमार दुनियामें प्रभाकर हो तो ऐसा हो, बचाई जाँ कुठारीकी दयाकर हो तो ऐसा हो ॥
गया परदेश बेखटके निशानेको हुक्कम पितु का।
न रहे ससुराल कुल लज्जा बचाकर हो तो ऐसा हो ॥
प्रियाको साथ ले करके करमको आजमाया है सतीव्रतसे मिटा दुख सब पियावर हो तो ऐसा हो ॥
[ २६ ]
थियेटर — तुम हो धन २ धन सुकुमार, तुमपर जाता हूँ बलिहार। पुत्रीवरो हमारी सार, मानों बात २ बात ॥
सुकुमार।
थियेटर — अच्छा स्वीकृत है महराज, कीजे अपने सबही काज, सामग्री भी लीजे साज हुक्मको टार २ टार ॥
ब्याह होना (परियोका सुचारुवाद गाना)
क० — खुवारिक वाद गाओरी बधाई है। बधाई है।
दुलारीकी निरख जोड़ी उमग अति दिलमें छाई है ॥
खिले जस, चांदनी निशिमें बढ़े अति चन्द्रकी शोभा काम रतिकी तरह जैसी सुहाई है सुहाई है ॥
प्रभू जोड़ी ये चिरजीव रहे यह कामना मेरी।
फले फूले जहाँमें अय जिनेश्वर तू सहाई है ॥
रङ्ग।
दोहा — साज बाजके साथमें, ब्याह हुआ सुकुमार।
विदा आदिमें भूप धन, दीना अपरम्पार ॥
चौ० — दीना अपरम्पार राज्य भी सौंप दिया चौथाई।
पाकरके ऐश्वर्य मान आवै सब ही को भाई ॥
इसदी नीति अनुसार कुंवरको भी कुछ मदता आई राजकुमारी महल रहै सुन्दरीकी सुधि बिसराई ॥
दो० — बहुत दिन बीत गये जब। निकट आई सुन्दरी तब ध्यान दे सुनिये प्राणी ॥
उसी समय प्रीतमसे सुन्दरी ऐसे बोली बानी ॥
सुन्दरी
कवित्त — बात मेरी प्राणनाथ हृदय विचार करो भूल सुधि गये हस्तिनागपुर नगरकी। बाहुलने काही संग मैंने तब धारै नाथ भूल सुधि। गये याही रत्नपुर डगरकी ॥ राज मद आप कीनी सुझको भुलाय। हूँ भूली या तड़फती कछू नाहि ये स्वयरकी ॥ चिन्ता नहीं इसकी पर चिन्ता यह विकट मोय भूलना नहीं सुधि उस पर ब्रह्म ‘हर’ की ॥
सुकुमार।
कवित्त — चक्र मृगनैनी सब माफ करदीजे मोर तेरे ही प्रतापसे ये दुःख बेड़ी कटी है। मेरी ही खता प्यारी मेरे ही जिगर माहिं लजाके रूपमें ही कील जैसी अड़ी है ॥ तेरे उपकारको मैं भूल नहीं सकता प्यारी तेरे उपकारकी अनीव तुहत उड़ी है। कीजे हुक्म जैसा मैं। कहूँ फटही वैसा प्यारी चूक नहीं सकता बुद्धसेन एक घड़ी है।
सुन्दरी।
क० — धरमकी नाव दुनियामें करैगी पार ये नैया।
धरम ही है कुमारगले पिया सतपथका दरसैया ॥
रचाओ जिन भवन ऐ सामने आदर्श दुनियाँसे।
बैठो अति कीर्ति इसभवमें सुगम उस भवकी हो नैया [ २८ ] धरमके काज अय प्रीतम न कुछ देरी करीजे अब ।
धरम ही सारहै जगमें दुखोंका क्षार करवैया ॥
शौर — हुक्म हो प्राण प्रिया उसको कर दिखाऊँ मैं ।
कोसके गिर्दका जिन चैत्य शुभ रचाऊँ मैं ॥
अच्छा जाताहूँ अभी बिप्रको बुलाता हूँ ।
घड़ी शुभ होगी जबी नीवधरा आजमें ॥
देश देशोंमें ढिंढोरा पिटाऊँ जल्दीसे ।
हर जगहके प्रिया मजदूर भी बुलाऊँ मैं ॥
रंभा ।
ला० — जाकरके झट सुकुमार विप्र बुलवाया । शुभ दिवस और शुभ ही मुहूर्त सुधवाया ॥ अरु देश देशके माहिं खबर पठवाई । मजदूर जुडे बहु संख्या में अधिकाई ॥ बस इसी तरह उत हुआ कार्य प्रारम्भ । बहु शिल्प कलासे बने’ सुशोभित खम्भ ॥
देखा भालीको कोतवाल बैठाया । सुकुमार दरोगासे यों बचन सुनाया ॥
सुकुमारका दरोगासे ।
दोहा — जितने आवें मिहनती, फेर न जावें कोय ।
नितप्रति सबके वास्ते पैसा देना दोय ॥
करमगती है अति दुखदाई न तुम अभिमान करो भाई [ २९ ] कथा वल्लभपुरकी सुनना कभी निंदा न धरम करना ॥
दोहा — की निंदा हिमदत्त सेठने, सुतको दिया निकार ।
छै महीनामें छ्यानव कोडी, रही न इक दीनार ॥
सदा नहीं लछि रहे भाई ॥ न तुम० ॥
सिरपर आर धरें ईं धनको बेचत जाय बजार ।
उदर पूरति तबहु नहिं होवै मिलैन साझसकार ॥
भीख उन मांग मांग खाई ॥ न तुम० ॥
मागत मागत आये रतनपुर ये सब चौदह जीव ।
मजदूरीको उसी कुंवर ढिग पहुंचे दुखित अतीव ॥
अर्ज फिर यों उनने गाई ॥
चौदह जीवोंका कुमारसे ।
ग० — कीजै दया हो राजन् कदमोंमें सर झुकाऊँ ।
मजदूर बनालीजै उपकार बहु मनाऊँ ॥
परदेशों तड़फते हैं उत्तम कुलीन जानों ।
कमोंकी लौढ ये सब सत सत तुम्हें सुनाऊँ ॥
जो गर हमें लगाओ अति पुण्य तुम्हें होगा ।
तन मनसे करें मिहनत हा हा तुम्हारे खाऊँ ॥
कुमार ।
ग० — अच्छा यहां ही बैठो आताहूँ अभीमें झट ।
सबको लगाऊँ सबही फिर काम करीजो झट ॥
देय दिलासा इस तरह सुन्दरी निकट कुमार ।
[ ३० ] बोला वाणी इस तरह लीजे जरा निहार ॥
कुमार।
ब० — तात अरु मात अरु भ्रात आवज सभी आये हूँ तिनको कोई सहारा नहीं। मांगते भीख फिरते हूँ, नारी सुनो सांकृतकभी होता गुजारा नहीं ॥
मैं मजूरी लगा आर अति ही घरूँ मो निकारा था कुछ भी विचारा नहीं। दावहै आज मेरा करूँ क्यों कभी फिर मिलैगा समय वे दुवारा नहीं ॥
सुन्दरी।
ब० — जन्म जिनसे हुआ इन उचारों वचन धिक तुम्हें कहते आती नहीं कुछ शरम। कर्म अपनेको भोगा किया पूर्वमें दोषी देके किसीको न छोड़ो धरम ॥ कोट भी जो गर्व उपकार तुम ऋण नहीं पूर्ण तब कर सकोगे परम। मेलकीजे न मालूम होवे कहीं जानपावे न कोई जी इसका मरम ॥
सुकुमार।
ब० — इन किया गर्व भारी मेरे संगमें, बात कुछ भी मेरी इन विचारी नहीं। बार इकही मंजुरी लगाऊँ इन्हें ताप जबतक मिटेगी हमारी नहीं ॥ भार भारी धराऊँ करूँ न कसर तब तलक मेरे कोई वो प्यारी नहीं। फिर करो हुक्म जैसा करूँगा वहीं इस समय दीलधारूँ तुम्हारी नहीं ॥
[ ३१ ] सुन्दरी।
ब० — चालमा बात सुनिये न करिये शुभा, राज ठसकामें कुछ भी विचारो नहीं। कोदि ध्वज मांगते भीख फिरने लगे कौन गणना तुम्हारी निहारो नहीं ॥
लक्ष चंचल पिया शुम करमसे मिलैहो अशुभ तथा तो कोई सहारो नहीं। जान परछाई इस लक्ष्मी को गरच प्राणपियु अपने दिलमें घे धारो नहीं ॥
सुकुमार।
ब० — राजठसका कहो या कहो कुछ भी तुम इक दफे तो मजूरी लगाऊँ प्रिया। वादमें जो कहोगी करूँगा वही इस समय दिलमें कुछ भी न लाया पिया ॥
फिर करूँगा मिलन निज कुटुम्बसे सभी गर्व इनका वो सबही मिटाऊँ प्रिया। उस मेरे देश बाहर किये की वजह आर इन पर मैं मार धराऊँ प्रिया ॥
सुन्दरी।
मान शिक्षा गरव दिलमें लाओ अती ॥
नहीं मानोगे अगर आप ये रचाओगे; हाय. इस पापसे पियु भुक्ख बहुत पाओगे। जन्म जिनसे हुआ नीचा करम कराओगे, जान पावेगा कोई नाम बहु धराओगे ॥ तो कभी दिलमें सुक्ख न पाओ पती ॥ मान०॥
करना ऐसाही है तो यह बात मेरी सुन लीजे। तात अरु मातको बैठे ही मंजुरी दीजे। काम. कुछ दिन करा [ ३२ ] कुटुम्बसे मिलाप करो । आत भावज पै पिधा बोरू अधिक कम ही धरो । और कुछ बात दिल्लमें भी लाओ अती ॥ मान० ॥
दो० — नारी ने जब इस तरह, समझाया हरचंद ।
इस विधि मानी सीख यह, सुनिये सज्जन वृन्द ॥
चौ० — सुनिये सज्जन वृन्द दरोगासे यों बोला बानी ।
इनसे काम न होवे ये बूढ़े हैं दोनों प्राणी ॥
इनको बैठे देहु मंजूरी बाकीसे मन मानी ।
मिहनत लेना कार्य समयमें नहिं करें आनापानी ॥
दो० — बहुत दिन बीत गये जब । बुलाई सुन्दरिने तब अपनी सासु हवेली ।
काइनको पहिचान सुन्दरी ऐसे वानी बोली ॥
दोहा — माता आय समीपमें, देखो मेरे केश ।
डरो नहीं मनमें तनिक, चिंता करो न लेश ॥
दोहा — तुमकोटी ध्वजकी बहू, हैं हम दीन अपार ।
कीजे माफ कसूर मम, लीजे जरा निहार ॥
चौ० — लीजे जरा निहार रंक अति हैं हम राज दुलारी ।
भरें उदर तुमरे हिग हम कर करके खिदमतगारी मेरे अङ्ग शुद्ध वस्त्र एकहु भी दीखे प्यारी ।
इसी लिये तुम हिग आनेको चलै न शक्ति हमारी ॥
[ ३३ ]
दो० — बस यही है मजबूरी । रहूँगी तुमसे दूरी ॥
हुक्कम हठसे हो खासी ।
तो सेवा करनेको भी तैयार सदा चे दासी ॥
क० — फिर दिलासा ताको दई अब मनमें चिंत करी मतकोई । तबही ताके पास गई अरु रेशम डोरी खोलई जोई ॥ गृथको चिन्ह लख्यो शिरमें तब ताको देख वृद्धा पुन रोई । रोवत देखजो सुन्दरीने अति कोमल बैन कहे इमजोई ॥
ग० — माता हुआ क्या दुख तुम्हें क्या तुमको कोई पीर है ।
कीना रुदन जो इस तरह नयनों बहाया नीर है ॥
ग० — हायमें अगली बातकी अपनी कथा सुनाऊँ क्या ।
मानन कोई भी महबुब ऐसी विथा सुनाऊँ क्या ॥
ग० — चिंता करो न कोई भी दिलमें तो धरले धीर तू ।
हो जो यथार्थमें वही अपनी सुनादे पीर तू ॥
ग० — हा ! हम न पहिले रंक थे कोटि ध्वज महाधनी ।
थे पुत्र मेरे सात वो वनमें निठुर ही जाँय क्या ॥
पूरब करम उदय हुआ लहुरेको हम भगा दिया ।
श्री नारि उसकी सद्वृत्ता तुमसे मैं अब छिपाऊँ क्या।
जाने पै पुत्रके ही तो सारा ही धन विलय हुआ ॥
था चिन्ह जैसा उस बहूके वसमैं अब बताऊँ क्या ॥
ग० — मैं हूँ कहांकी बहू तेरी कितनी तू मेरी सासु है।
इसको निकालो दासियो है दास बनती सासु है ॥
दोहा — ऊपर बनसे सुन्दरी, करी डाट ललकार ।
अन्तरमें सासू यही, था यह शुद्ध विचार ॥
चौ० — था यह शुद्ध विचार दासियोंसे गँही भगवाई।
कंकड़ पत्थर आदि मार ऊपरी दिखवाइ लाई ॥
अग बुढ़ियाने पति पुत्रनको सारी कथा सुनाई।
थरथर कांप उठे सबही दिल छाय रही अकुलाई ॥
दो० — न जाने क्या कह आई, कहांकी बहू बनाई दुःख प्रगटो यह जाई।
उसी समय सुन्दरीने भी निज सीतम लियो बुलाई ॥
दोहा — घरमें बैठे सुख तुम, भोग रहे भरतार ।
ऐसे निंद्य कुलकर्मको, है शतशः धिक्कार ॥
चौ० — है शतशः धिक्कार बैठघर तुम आराम उठाओ।
सात पिता सम सबज भ्राता पर अति भार धराओ ॥
करके निंद्य कुकर्म पिया कुछतो दिलमें शरमाओ ॥
[ २५ ] गई बातको जान देहु अब मेल मिलाप कराओ।
दो० — हुआ हठ तुम्हारा पूरा। न बाकी रहा अधूरा ॥
नहीं अब भी मानोगे।
करु बुराई सभी जगह बस तुम्हीं सभी जानोगे।
दोहा — थी कुछ मेरे जिगरमें, तू कहती कुछ और ।
काम कराऊँ और भी, थी दिलमें इस तौर ॥
चौ० — थी दिलमें इस तौर मगर हरवार रोकती तू है।
कुटुम मिलाप करो येही हरवार टोकती तू है ॥
भरती मुझसे आह जिस घड़ी उन्हे टोकती तू है।
करु बुराई तुम्हारी यह भनकार टोकती तू है ॥
दो० — कहा अब तेरा मानूं। और नहिं दिलमें ठानूं जायकर उन्हें बुलाऊँ।
मन मुराद पूरी हुई अब तो कुटुम मिलाप कराऊँ ॥
बुलाना — ( पिताका काँपते हुये आना )
दोहा — इस बुढ़ियाकी चुटकको, माफ करो सुकुमार ।
हा हा खाया पच्छ, प्राण भीख दो डार ॥
बुधसेन ।
व० — मत पड़ो पैर मेरे वही पुत्र हूँ जो करम योगसे था दुहागी बना। माफ कीजे खता कण्ठ लीजे लगा करके दरशन पिता मैं सुहागी बना ॥ मेरी मैया वही दुधमुंहा लाल हूँ तूने पाला, जिसे प्राण [ ३६ ] रागी बना। काम तुमसे लिया व्रत भावज मेरे माफ कीजे हूँ मैं पाप भागी बना ॥
पिता।
व० — हा मेरे लाल ओ लाल ओ लाड़िले पाप आगी हमी जो निकाला कुंवर। तेरे जाने पै धन सब विलय हो गया फिर पड़ा दुःखसे ही वो पाला कुंवर, दीनतासे गुजारा फिर किया कुंवर दुःख सहने पड़े हैं विशाला कुंवर। घूमते घूमते आये तेरी शरण आज मौका मिला फिर ये लाल कुंवर ॥
बड़ा भाई।
व० — अय मेरे वीर कीजे मुझे माफ अब हैं गुनहगार हमहीं तुम्हारे विरन। हम छछोर्ने ही बाहर कराया तुम्हें बोये कांटे सभी हैं हमारे विरन ॥ उस जनम में मिलै सो मिलै पाय फल इस जनममें सहे दुःख कराये विरन। माफ कीजे हमें माफ कीजे हमें आये अब तो शरणमें तुम्हारे विरन ॥
दोहा — मिला कुटुम परवार सब, विविध भाँति हरषाय पहिने सुन्दर वस्त्र सब, गहने लिये सजाय ॥
चौ० — गहने लिए सजाय जाय फिर नगरीके बागनमें डेरा दिये डराय कुंवरने खबर करी सब जनमें ॥
आया कुटुम हमारा पहुंचे सब मिल कर बागनमें।
लिवा लाये नगरीमें अति उल्लास बढ़ायके मनमें ॥
[ ३७ ]
क० — हुआ तैयार जिन मन्दिर बनी शोभा निराली है कंगूरे अँगुरिया सोहे छटा सुरलोक वाली है ॥
कहीं शीशे जड़े सोहें कहीं मोती चमकते हैं।
कहीं पर है मढ़ा सोना कहीं लालोंकी लाली है ॥
कहीं पत्थर विलोलोकी बनीं वैलें सुहाती हैं।
बनी वेदी मनोनपतिने ही आकर बनाली हैं ॥
दौ० — शिबिरकी शोभा भारी, ध्वजा फहराती प्यारी ॥
काम जब रहा न बाकी।
बुद्धसेनसे उसी समय यों बोली नारी ताकी ॥
सुन्दरी।
दोहा — प्राणनाथ जिन भवनतो, हुआ सभी तैयार।
डील न कीजे अब तनिक, करो प्रतिष्ठा सार ॥
सुकुमार।
दोहा — धन्य २ मैं धन्य हूँ, पायी तुमसी नार।
धर्म प्रेमी धर्मकी, देती शिक्षा सार ॥
चौ० — देती शिक्षा सार करू जा मेलाकी तैयारी।
पाती भेजें सभी जगहके जुरें सकल नरनारी ॥
पण्डितोंको बुलवाय सुबाऊ शुभ मुहूर्त सुखकारी।
और कहो जो करू बातमें, दारू नहीं तुम्हारी ॥
दौ० — नृपतिके दिगमें जाऊं, उन्हें सब हाल सुनाऊं।
करू जल्दी तैयारी।
लोमें जाता अभी नृपदिग करू देर नहीं प्यारी।
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें — मूल दस्तावेज़ (PDF): 2435.pdf
स्रोत — Gyata संग्रह।
