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दशलक्षण महापर्व 2026Dashlakshan Mahaparv 2026

नाटक स्क्रिप्ट · Play script

दूध का दूध, पानी का पानी

Doodh Ka Doodh, Pani Ka Pani

रचयिता Author: एकांकी मञ्जूषा (भाग-२) · ~24 min पढ़ने में

Original PDF

यह पाठ मूल पुस्तक से टाइप किया गया है; मंचन से पहले मूल PDF से मिलान कर लें।Typed from the original book — please check against the original PDF before staging.

‘दूध का दूध, पानी का पानी’ — राजगृही के राजकुमार वारिषेण के जीवन-प्रसंग पर लघु नाटिका: श्मशान में कायोत्सर्ग, विद्युतचोर द्वारा चुराया हार, राजा श्रेणिक का वध-आदेश, महारानी चेलना की श्रद्धा और सत्य की विजय। १३ पृष्ठ, ४ दृश्य।

Doodh ka Doodh, Pani ka Pani — a Jain one-act play on Prince Varishen (son of King Shrenik and Queen Chelna): the stolen necklace, the death sentence and the triumph of truth. Dashlakshan / pathshala stage script.

स्रोत: एकांकी मञ्जूषा (भाग-२) — पाठशाला व दशलक्षण पर्व के सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु मंचन-योग्य एकांकी। पूरी स्क्रिप्ट (पात्र-परिचय, संवाद, मंच-निर्देश) नीचे; मूल PDF सबसे नीचे।


दूध का दूध, पानी का पानी

पात्र - परिचय

१. वारिषेण - राजा श्रेणिक के पुत्र २. श्रेणिक - मगध के राजा

३. चेलना - श्रेणिक की महारानी

४. विद्युतच्चर चोर - राजगृह का एक कुख्यात चोर

५. महामात्य - मुख्यमंत्री ६. सैनिक १ ७. सैनिक २ ८. पहरेदार

भूमिका यह कथा जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र की राजगृही नगरी की है, जहाँ भगवान महावीर स्वामीजी का दिव्य समवशरण सुशोभित है। यहाँ के अधिपति जिनधर्म के शिरोमणि प्रजापालक बाहुबली, न्यायप्रिय महाराजाधिराज श्रेणिक और महाविदुषी जिनधर्म श्रद्धानी महारानी चेलना का प्रशासन चलता है। चेलना के सात पुत्रों में से एक वारिषेण नामक पुत्र के जीवन प्रसंग पर आधारित है, यह लघु नाटिका -

दृश्य - १

स्थान - राजगृह की श्मशान भूमि

समय - रात्रि का अन्तिम प्रहर मगध नरेश राजा श्रेणिक का पुत्र वारिषेण एक महान् धार्मिक एवं तपस्वी ग्रहस्थ है। वे अवसर पाकर श्मशान भूमि पर कायोत्सर्ग अवस्था में तल्लीन रहते हैं। आज रात्रि

रत्नमञ्जूषा (भाग-२)

को भी वे राजगृही की श्मशान भूमि पर कायोत्सर्ग ध्यान में लीन हैं। उसी समय राजधानी में शोर मचता है।

सैनिक : (विद्युतचोर श्रीकीर्ति सेठ के गले से रत्नों का एक सुन्दर हार चुराकर भागता है। रत्नों की जगमगाहट के कारण पहरेदार उसे भागते देख लेते हैं, चोर-चोर की आवाज से राजधानी गूँज उठती है। विद्युतचोर सिर पर पैर रखकर भागने लगता है। सिपाही पीछा करते रहते हैं। वह भागते- भागते श्मशान भूमि पर आता है। यहाँ वारिषेण को ध्यान में खड़ा देखकर वह हार को वारिषेण के समक्ष फेंककर वहीं झाड़ी में छिप जाता है। प्रातःकाल होने को है, कुछ अंधियारा अभी भी शेष है।)

सैनिक १ : (दूर से हार की जगमगाहट देख) अरे, वह रहा, वह रहा, रत्नों का हार, कैसी अद्भुत चमक है ?

सैनिक २ : आप सत्य कह रहे हैं, वह हार ही है और देखो - वहाँ तो चोर भी खड़ा है। चलो चलें।

सैनिक १ : हाँ चलो (पास जाकर हार लेते हुए) यह रहा हार और चोर भी यही है। (वारिषेण को देखकर) अरे ! ये तो राजपुत्र वारिषेण है।

सैनिक २ : (क्रोध से) तो हमें क्या करना है ? चोर तो हमने पकड़ लिया है। अब चाहे कोई भी चोर हो, राजनियम तो सबके लिए एक ही है ना।

सैनिक १ : (आश्चर्य से) कहते तो तुम ठीक हो ! परन्तु राजकुमार महोदय कैसे यह कुकृत्य कर सकते हैं ?

सैनिक २ : क्या ? कोई किसी के मन की बात जान सकता है कि वह बड़ा होकर कुकर्मी निकलेगा या धर्मी ? नहीं हो सकता ना।

सैनिक १ : (वारिषेण को देखकर) अरे! ये तो ध्यान में लीन हैं ? नहीं ये चोर नहीं हो सकते।

सैनिक २ : (दृढ़ता से) अरे भाई, जिसके पास चुराई गई सामग्री मिली है, वह चोर नहीं तो क्या साहूकार होगा, मैं तो…

सैनिक १ : (बीच में ही) पर महाराज श्रेणिक हमें क्या कहेंगे ? यदि हम राजकुमार महोदय को बाँधकर ले चलेंगे तो ?

सैनिक २ : (दृढ़ता से) श्रेणिक महाराज तो महान् न्यायी शासक है। वे तो दूध का दूध और पानी का पानी कर देते हैं। उनकी दृष्टि में सभी समान हैं, चाहे चोर हो या राजकुमार चलो हम अपना कर्त्तव्य करें। यह ध्यान कुछ नहीं कर रहा है मुझे तो लगता है हमसे बचने के लिए ढोंग कर रहा है।

(दोनों वारिषेण को बाँधकर बन्दी बनाकर राजमहल लाते हैं।)

दृश्य - २

समय - दोपहर

स्थान - श्रेणिक का राजदरबार

(महाराजा श्रेणिक राज्य सिंहासन पर विराजमान हैं सभी दरबारी यथायोग्य स्थानों पर बैठे हैं। सिपाही राजकुमार वारिषेण को बन्दी के रूप में राजा के समक्ष प्रस्तुत करते हैं।)

सैनिक २ : महाराज की जय हो ! राजकुमार वारिषेण, सेठ श्रीकीर्ति के बहुमूल्य हार को चुराकर भाग रहे थे। तथा श्मशान भूमि पर हार सहित बन्दी बनाये गए हैं।

श्रेणिक : (आश्चर्य से) राजकुमार वारिषेण… बन्दी …

सैनिक १ : (नम्रता से) महाराज की जय हो ! बन्दी बनाते समय मैं भी था महाराज।

श्रेणिक : (दृढ़ता से) क्या तुम लोग सत्य कह रहे हो ?

दोनों सैनिक : हाँ ! अन्नदाता हम शपथपूर्वक सत्य कह रहे हैं।

श्रेणिक : पहरेदार ! तुम्हारा क्या कथन है ?

पहरेदार : महाराज की जय हो ! जी महाराज ! मैं भी रात्रि के समय चोर के पीछे था, हमने श्मशान भूमि पर ही राजपुत्र को खड़ा पाया और हार उनके सामने पड़ा था।

श्रेणिक : (क्रोध से) तो राजकुमार लोगों को ठगता है, धर्मात्मा होने का बहाना बनाकर चोरी करता है। ऐसे पापी को तो तुरन्त दण्ड मिलना चाहिए, इसके लिए कठोरतम दण्ड ही दिया जायेगा। जाओ ! मेरी आज्ञा है कि राजकुमार को प्राणदण्ड दिया जावे। इसे तुरन्त वध-स्थल पर ले जाया जावे।

महामात्य : महाराज की जय हो ! राजकुमार को अपनी सत्यता व्यक्त करने का एक अवसर प्रदान किया जावे, महाराज हो सकता है कि चोर राजकुमार के समक्ष हार फेंककर भाग गया हो और राजकुमार इस अपराध में पकड़े गए हों क्योंकि राजकुमार तो अधिकांशतः श्मशान भूमि पर ध्यान करते ही रहते हैं।

श्रेणिक : (दृढ़ता से) यह सब संभव नहीं है, महामात्य ! राजकुमार को चोरी के माल सहित पकड़ा गया है, इसके तीन साक्षी भी सामने ही हैं। मैं अब और कोई अवसर नहीं देना चाहता। जब मेरा ही उत्तराधिकारी इस प्रकार के कुकृत्य में तल्लीन है तो मुझे एक क्षण की भी देर नहीं करनी चाहिए, उसे दण्ड अवश्य मिलना चाहिए।

महामात्य : परन्तु महाराज ! दूध का दूध और पानी का पानी होना ही चाहिए। अपराधी को अपराध के बारे में अपनी बात कहने का अधिकार तो मिलना ही चाहिए।

श्रेणिक : (क्रोध से) आप अपराधी का पक्ष लेकर व्यर्थ समय खराब कर रहे हैं, आपकी प्रार्थना के अनुसार मैं राजकुमार को अवसर दे देता हूँ। कहो अपराधी क्या तुम अपने अपराध के विषय में कुछ कहना चाहते हो ?

(वारिषेण मौन रहते हैं, उनके मुख पर अपूर्व शान्ति है, ऐसा प्रतीत होता है मानो वे अभी भी ध्यान कर रहे हों।) शीघ्रता करो, अपराधी कुछ कहना है ?

(क्रोध से) अपराधी मौन है वह कुछ नहीं कहता, अतः मौन को उसकी स्वीकृति ही माना जाता है, यही नीति है।

महामात्य : महाराज ! अपराध क्षमा हो। राजकुमार वारिषेण, अपने ध्यान में उपसर्ग मानकर इस समय मौन हैं। उन्हें समय प्रदान करने की दया की जावे।

श्रेणिक : महामात्य! अपराधी को कोई समय नहीं दिया जावेगा। यही मेरी अन्तिम आज्ञा है। आप कृप्या व्यर्थ समय न गँवायें। (आदेशपूर्वक) अपराधी को पूर्व घोषित दण्ड ही मान्य होगा। उसे नियमानुसार वधस्थल पर ले जाया जावे एवं कल प्रातःकाल राजकुमार को दण्ड दे दिया जावे।

(सारे दरबारी, नागरिक आश्चर्यचकित होकर महाराज श्रेणिक एवं राजकुमार को देखते रह गए, कोई कुछ कहने का साहस नहीं कर पा रहा था। सिपाही बन्दी कुमार को ले जाते हैं, दरबार में सन्नाटा छा गया है, राजा श्रेणिक भी कक्ष में चले जाते हैं। अपूर्व करुण दृश्य है, सभी राजा के न्याय से आश्चर्यचकित हैं पर उन्हें निरपराध राजकुमार को प्राण दण्ड दिये जाने का दुःख भी है, राजा के भय से कुछ कह पाने में असमर्थ हैं।)

दृश्य - ३

स्थान - महारानी चेलना का राजमहल।

समय - रात्रि का प्रथम प्रहर।

(रानी चेलना कक्ष में उदास बैठी हुई राजा का प्रवेश, दुःखी होने से पुत्र के ख्याल में डूबी हैं। श्रेणिक राजा के आने का पता नहीं चलता।)

श्रेणिक : क्यों चेलना ! आज यह मुख कमल मुरझाया क्यों है ?

चेलना : (जैसे-तैसे खड़े होकर) महाराज ! मैं तो पुत्रविहीन होने जा रही हूँ… मेरे दुःख का कोई अन्त नहीं है। आप ही कहिए, मैं क्या करूँ ? (रोती है)

श्रेणिक : महारानी ! क्या कर्त्तव्य पालन करने में हमें दुःख का अनुभव करना चाहिए ?

चेलना : (रोते हुए) महाराज ! केवल सन्देह मात्र में ही किसी को अपराधी घोषित कर दण्ड दे देना, यह कैसा न्याय है ?

श्रेणिक : चेलना ! यह तुम्हारा पुत्र मोह बोल रहा है। मेरे स्थान पर यदि तुम होती तो तुम भी यही न्याय करतीं।

चेलना : नहीं महाराज ! मैं अपराधी को अपने बारे में कहने के लिए पूरा-पूरा समय और अवसर प्रदान करती। आपने अत्यधिक शीघ्रता में निर्णय ले लिया है।

श्रेणिक : न्याय में देर करना उचित नहीं होता चेलना। जब अपराध स्वयं पुत्र हो तो शीघ्रता ही उचित है, कहीं तुम्हारे समान मेरा पुत्र मोह उमड़कर मुझे कर्त्तव्यमार्ग से विचलित न कर दे। न्यायाधीश का कार्य करना तो काँटों की सेज पर सोने जैसा है चेलना। दूध का दूध, पानी का पानी

चेलना : (आँसू पोंछकर) मैं ऐसे राज्यपद को उपयुक्त नहीं मानती जो कि अपने ही पुत्र को समाप्त करने की आज्ञा देता है। ऐसे राजमहल से तो मैं उस झोपड़ी को ही ज्यादा पसंद करूँगी जहाँ पूरा परिवार एक साथ रहता है।

श्रेणिक : कभी-कभी हमें कर्त्तव्य पालन के लिए अपने व्यक्तिगत हितों का बलिदान करना पड़ता है चेलना।

चेलना : (उदास) पर अपने पुत्र का ही बलिदान करना क्या शोभा देता है महाराज ?

श्रेणिक : क्या करूँ ? मैं विवश हूँ। जो होना है वह होकर ही रहता है। चेलना ! हम कर्त्ता-धर्ता नहीं हैं। हम तो ज्ञाता-दृष्टा मात्र हैं। हमें इसमें रागद्वेष नहीं करना चाहिए।

चेलना : आपका कथन उपर्युक्त है महाराज ! हम किसी का कुछ बिगाड़ नहीं सकते, किसी का कुछ बना नहीं सकते किन्तु कुछ सावधानी तो रख सकते हैं। जैनधर्म तो स्याद्वादप्रधान है। आप कुमार को वास्तव में अपराधी भी तो सिद्ध नहीं कर सके। आपने तो अतिशीघ्रता में उसे प्राणदण्ड दे दिया, कुछ समय रुककर सत्य का पता तो लगाते।

श्रेणिक : महारानी ! जो हो गया, उसके लिए मैं क्या करूँ ? आपको धैर्य रखना चाहिए, और राजकुमार ने भी अपने-आपका कोई बचाव नहीं किया, मौन ही रहे।

चेलना : राजकुमार ! उग्र तपस्वी एवं साधु प्रकृति के हैं, वह दरबार में अपने-आपको निरपराधी बताकर एवं आपके न्याय को चुनौती देकर आपकी प्रतिष्ठा को आँच नहीं पहुँचाना चाहता होगा। वह तो विनम्र पुत्र है एवं सदैव की भाँति

उसने आपकी आज्ञा को शिरोधार्य किया है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरा पुत्र अपराधी नहीं है। अपराधी कोई और ही है। राजन् ! आप असली अपराधी की तलाश क्यों नहीं करवाते ?

श्रेणिक : बस करो चेलना ! अब मेरा पितृहृदय भी उमड़ रहा है, मैं मानता हूँ कि पिता मातृ हृदय की तुलना में हमेशा कठोर होता है, किन्तु मैं विवश हूँ…।

चेलना : कोई बात नहीं महाराज ! कल दूध का दूध, पानी का पानी हो जायेगा। मेरा कुमार निर्दोष है, वह आपके बधिकों की तलवार के बार से बच जायेगा ? वह अपराधी नहीं है, पुण्यात्मा है, तपस्वी है, पुण्य की जड़ पाताल तक होती है, तीव्र पुण्य से उसके अशुभ कर्म नष्ट होंगे। देवगण उसकी रक्षा करेंगे। मुझे ऐसा विश्वास है।

श्रेणिक : (आश्चर्य से) तुम्हारी बात सत्य है रानी ! मैं भी बचपन से उसे जानता हूँ, वह ऐसा नहीं है। चलो उससे भेंट करने चलें, हो सकता है कि वह वास्तविक अपराधी का रहस्य खोल दे।

चेलना : नहीं, अब मैं उससे मिलने नहीं जाऊँगी। मैं तो जिनेन्द्र भगवान की प्रार्थना में रात्रि भर यही बैठी रहूँगी। आप चाहें तो जायें, मैं नहीं जाऊँगी।

श्रेणिक : मैं भी तुम्हारा ही साथ दूँगा। हे भगवान् ! कल्याण हो ! निरपराधी दण्डित न हो।

(महल में एक ओर रानी चेलना एवं दूसरी ओर राजा श्रेणिक जिनेन्द्र भगवान् के ध्यान में लीन हो जाते हैं। रात्रि भर वे जिनेन्द्र भक्ति में लीन रहते हैं।) दूध का दूध, पानी का पानी

दृश्य - ४

स्थान - श्मशान भूमि

समय - प्रातःकाल

(बधिकगण राजकुमार वारिषेण का वध करने हेतु उसे श्मशान भूमि पर लाते हैं। साथ ही सैनिक, महामात्य दरबारी, हजारों नागरिकों की भीड़ एकत्र होती है।) सभी के नेत्र अश्रुपूर्ण हैं, कुमार को बन्धन मुक्त कर दिया है।

बधिक १ : अपराधी ! कोई अन्तिम इच्छा है ?

बधिक २ : राजकुमार तो रात्रिभर बन्दीगृह में ध्यानमग्न ही रहे। कब से मौन हैं, उन्होंने न भोजन किया है, और न जल ग्रहण किया है। किसी से मिलने की इच्छा भी उन्होंने प्रगट नहीं की ?

बधिक १ : हमें इससे क्या? हमें तो राजाज्ञा का पालन करना है। अपना कर्त्तव्य पूर्ण करना है।

बधिक २ : हाँ ! राजकुमार कहिए, आपकी क्या इच्छा है ?

वारिषेण : मैं अपना कार्य कर रहा हूँ - आप अपना कार्य कीजिए। मेरी कोई इच्छा नहीं है। मैं तो निरन्तर महामंत्र का जाप कर रहा हूँ, तुम भी सुनो। णमो… एसो पंच …

(पहला बधिक इशारा कर कुमार की गर्दन पर वार करता है, फिर दूसरा बधिक वार पर वार करते हैं, फिर भी कुमार की गर्दन पर कोई चोट नहीं लगती है। दोनों थक जाते हैं, सभी आश्चर्यचकित होकर देखते रह जाते हैं, तभी जय-जयकार के शब्द गूँजने लगते हैं।)

बधिक १ : यह क्या ? राजकुमार की गर्दन क्या लोहे की बनी है ? हमारी खड्ग का जरा भी घाव नहीं होता।

बधिक २ : (दुःखी स्वर) राजकुमार पुण्यात्मा हैं, वे अपराधी नहीं हैं। हमारी तलवारें उनका बध नहीं कर सकतीं (राजकुमार के चरणों पर गिर जाता है।)

बधिक १ : (गद्गद् होकर) राजकुमार हमारा अपराध क्षमा करें। हम विवश थे। हमें तो अपना कर्तव्य करना था। राजाज्ञा जो थी। (कुमार के चरणों को छूकर) आज से मैं यह पद छोड़ दूँगा। अब मैं किसी का बध नहीं करूँगा।

बधिक २ : (आँसू पोंछकर) मैं भी किसी का बध न करने की प्रतिज्ञा करता हूँ। हे भगवान ! हमें क्षमा करें।

वारिषेण : (दोनों से) तुम्हारा कोई दोष नहीं है बधिकगण। तुम तो अपने कर्तव्य मात्र का निर्वाह कर रहे थे। दोष तो मेरे अशुभकर्मों का है, जिनके कारण मुझे निरपराधी होकर भी अपराधी बनना पड़ा।

(चारों ओर जय-जयकार गूँजती है ! महामात्य, राजा- रानी को यह आश्चर्य शुभ संवाद भेजते हैं। दोनों यहाँ पहुँचते हैं।)

खियाँ : महारानी ! जल्दी चलिए - राजकुमार पर तलवार का बार भी प्रभाव नहीं डाल रहा है।

चेलना : क्या कह रही हो ? राजकुमार… चलिए - हमें वहाँ चलना चाहिए…

एक : हाँ रानी ! चलो…

(पहुँचकर) (रोते हुए) कुमार ! मुझे क्षमा करो। मैंने तुम्हें निरपराध होने पर भी दण्डित किया। मैं…

चेलना : महाराज ! मैंने कहा था ना कल दूध का दूध और पानी का पानी हो जावेगा। मेरा पुत्र निरपराध है। वह पुण्यात्मा है। देवता उसकी रक्षा करेंगे। देखिए… आकाश से पुष्पों की वर्षा हो रही है।

(सभी प्रसन्नता पूर्वक जय-जयकार करते हैं।)

वारिषेण : (हाथ जोड़कर) आपने अपने कर्त्तव्य का निर्वाह किया है तात्, यदि मुझे छोड़ देते तो प्रजा आपके बारे में क्या सोचती ? अतः आपको मुझसे क्षमा माँगने की कोई जरूरत नहीं है। यह मेरे ही अशुभकर्मों का फल है। जिसके कारण मुझे यह अपवाद लगा। भोगना पड़ा।

(वारिषेण की आश्चर्यजनक घटना का पता राजगृही में मगधसुन्दरी के घर छिपे विद्युतचोर को लगता है, उसे लगता है कि अब राज्यकर्मचारी उसे ढूँढ़ लेंगे। अतः वह स्वयं आत्मसमर्पण करने के लिए श्मशान भूमि पहुँच जाता है, असंख्य नागरिकों की भीड़ में वह जैसे-जैसे कुमार वारिषेण के पास पहुँचता है। कुमार के चरणों पर गिरकर रोने लगता है।)

वारिषेण : अरे ! तुम कौन हो भाई ? और क्यों मेरे चरणों में गिर पड़े ?

विद्युतचोर : (रोते हुए) राजकुमार ! अपराध क्षमा करो (राजा को हाथ जोड़कर) महाराज की जय है, असली अपराधी मैं हूँ। मुझे दण्ड दीजिए। महाराज ! मैं आत्मसमर्पण कर रहा हूँ।

श्रेणिक : अरे ! तुम हो राजगृही के कुख्यात चोर, अभी तक कहाँ थे ?

विद्युतचोर : (चरणों में गिरकर) महाराज ! मैं मगधसुन्दरी वैश्या के यहाँ पर था। उसी के कहने से मैंने श्रीकीर्ति सेठ का हार चुराया, रात्रि में पहरेदारों ने मेरा पीछा किया और मैं

भागकर श्मशान भूमि पहुँचा, यहाँ कुमार ध्यान में मग्न थे तो मैंने हार कुमार के पास फेंककर, पास ही की झाड़ियों में छिप गया। सिपाहियों ने कुमार को पकड़ लिया।

वारिषेण : पिताजी ! मेरी प्रार्थना है कि अब विद्युतचोर को कोई सजा न दी जाये और उसे अभयदान दिया जावे। उसके दण्ड की सजा मुझे मिल चुकी है और न्याय यह कहता है कि एक अपराध के लिए दो बार दण्ड नहीं दिया जाता। यह मेरा निवेदन है महाराज, आशा है कि आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगे।

श्रेणिक : तुम्हारे सब निवेदन स्वीकार हैं। विद्युतचोर दण्डित नहीं होगा, यही मेरी आज्ञा है। चलो…अब घर चलते हैं।

विद्युतचोर : महाराज की जय हो, महारानी की जय हो, राजकुमार वारिषेण की जय हो। मैं आज से प्रतिज्ञा लेता हूँ कि फिर कभी चोरी नहीं करूँगा।

श्रेणिक : अतिसुन्दर ! तुम्हारी जीविका का प्रबंध राज्य की ओर से होगा, तुम निश्चिन्त रहो।

चोर : महाराज मैं आजन्म आपका आभारी रहूँगा। आपकी कृपा दृष्टि ऐसी बनी रही। मुझे अपनी शरण में ले लो।

श्रेणिक : ठीक ! तुम जा सकते हो ? चलो…कुमार ! घर चलो, सारा परिवार तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।

वारिषेण : पिताश्री ! मुझे क्षमा करें, अब यह वनभूमि ही मेरा घर होगा। मेरा आत्म निकेतन ही मेरा वास्तविक (परिवार) घर होगा, मैं अपनी आत्मा में ही रमण करूँगा अब संसाररूपी घर में पुनः प्रवेश नहीं करूँगा। मुझे क्षमा करें। मैं आपके आदेश का

दूध का दूध, पानी का पानी पालन करने में स्वयं को असमर्थ पा रहा हूँ। मातुश्री ! आप भी मुझे क्षमा करें अब मैं मुक्ति को वरण करने की तैयारी करूँगा। इस संसार में तो अनादिकाल से भ्रमण कर रहा हूँ। इस संसार के प्रपंचों को देखकर मेरे नेत्र खुल गए। मेरे लिए यही कल्याण का पथ होगा कि मैं वन की ओर जाऊँ। योग्य गुरुवर को ढूँढ़कर उनसे जैनेश्वरी मुनिदीक्षा धारण करूँ। अपने कर्मों के नाश का यही सही समय है।

माता : किन्तु, बेटा तुम इतनी कम उम्र में वन के कष्ट कैसे सहोगे ?

श्रेणिक : हाँ पुत्र ! घर में रहकर भी आत्मसाधना की जा सकती है, चलो, घर चलें।

वारिषेण : नहीं ! पिताश्री, मोहजाल में फँसे रहने से मुक्ति कहाँ मिलेगी ? मुक्ति का मार्ग मैंने खोज लिया है। आप दोनों मुझे इस पथ पर बढ़ने की आज्ञा दीजिए।

राजा-रानी : हे पुण्यात्मा ! बढ़ो आत्मकल्याण पथ पर अग्रसर होओ, यही हमारी मंगल कामना है। तुमने हमारे कुल को उज्जवल किया है, तुम धन्य हो।

(अश्रुपूरित नेत्रों से आशीर्वाद देते हैं)

विद्युतचोर : हे गुरुदेव ! ठहरो, मैं भी चल रहा हूँ आपके पथ पर। आपका अनुसरण करके मैं भी कृतार्थ हो जाऊँगा। आप सभी मुझे क्षमा करें। (सबसे हाथ जोड़कर क्षमा माँगते हैं, सभी आशीर्वाद देते हैं)। अतः विद्युतचोर कुमार के साथ कल्याणपथ धारण करने के लिए वनगमन पर चला जाता है।

सभी : णमो…।

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स्रोत · Source: forum.jinswara.com — अनुमति सहित, साभार · shared with permission and thanks.

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