दशलक्षण महापर्व : द्रव्य एवं भावपक्ष
दशलक्षण महापर्व : द्रव्य एवं भावपक्ष
यह महापर्व का सुहावना मौसम है, लेकिन हमारे भीतर हमारी चित्तभूमि में मौसम सुहावना होना चाहिए। चित्त प्रसन्न होना चाहिए, क्योंकि हमें माँ जिनवाणी के माध्यम से वे बातें उपलब्ध होती हैं जिनको एकबार आत्मसात कर लेने पर चित्त कभी बिगड़ता ही नहीं है, हमेशा प्रसन्न रहता है।
यह दशलक्षणी महापर्व है, पर्यूषण पर्व नहीं। दिगम्बर जिनागम में पर्यूषण पर्व नाम की कोई वस्तु नहीं है, इसलिए हमें इस पर्व को सदा दशलक्षण या दशलक्षणी पर्व के नाम से ही पुकारना चाहिए। दशलक्षण पर्व अनादि-अनन्त शाश्वत है।
यह धर्म दश प्रकार के विकारों के अभाव की अपेक्षा आगम में भी दश कहे गये हैं, वास्तव में तो चारित्र की वीतरागता रूप पर्याय ही दश धर्म कही जाती है। पूजा में अर्घ्य चढ़ाते हैं, उस अर्घ्य में भी ‘दशलक्षण धर्मोऽय’ बोलते हैं ‘धर्मेभ्यो’ नहीं। यह शब्द संस्कृत का है, ‘धर्मोय’ एक वचन है, इसलिए धर्म दश नहीं, बल्कि चारित्र की वीतराग पर्याय ही है। (प्रवचनसार गाथा 10 टीका आचार्य जयसेन)
इस महापर्व को वास्तव में तो नग्न दिगम्बर मुनिराज ही निरन्तर मनाते करते हैं। इस समय तो उनकी स्थिति ही निराली होती है। चौबीस घण्टे केवल अपने अनादि-अनन्त, अनन्तशक्ति सम्पन्न अनन्त गुणों से अनन्त गुणों के वैभव से भरा हुआ जो चैतन्य है, उसमें केलियाँ करना – ये महामुनिराज का जीवन होता है और उसमें कष्ट का नामोनिशान नहीं होता। हम कष्ट की बात करते हैं, मुनिराज को दुःखी देखते हैं।
मुनिराज को दुःखी देखने का अर्थ यह हुआ कि हमने आज तक देव-शास्त्र-गुरु की पूजा तो की; लेकिन गुरु का स्वरूप हम नहीं समझ पाये। अरे ! एक सामान्य ज्ञानी भी, जिसे एकबार चैतन्य की अनुभूति हुई है, हम तो उसे भी नहीं समझ पाये।
अरे ! चैतन्य तो है ना, अनादि-अनन्त, यह बात तो सबसे पहले स्थापित होना चाहिए। चैतन्य जैसा देवाधिदेव मेरा निज आत्मद्रव्य, मेरा निज परमात्मा अनादि-अनन्त, सदैव मुक्त सर्व दुःखों से सर्व कलेशों से रहित निरापद, ध्रुव, सदाध्रुव, वही का वही जिसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता, जिसके मौसम नहीं बदलते। कभी प्रसन्नता हो जाए तो कभी दुख हो जाए, इस तरह की घटनाएँ जिसमें घटती नहीं हैं। ऐसी जो चैतन्य सत्ता, आत्मा की सत्ता, हमारी सत्ता, उसकी स्थापना तो हम करें। हम अपने भीतर अपनी स्थापना तो करें, हमें अपना ही परिचय नहीं है तो हम देव-शास्त्र-गुरु की पूजा करके क्या करेंगे? क्या मिलेगा हमें उनसे?
जो देव हैं, साक्षात् उनको देखते ही यह बोध होता है कि वे किसी की तरफ झुकते नहीं, देखते नहीं, निरन्तर अन्तर्मग्न हैं, इनसे मैं क्या सीखूँ? बोलते तक तो नहीं हैं मेरे से। इनसे मैं क्या सीखूँ?
यही तो है सीखने की बात। प्रसन्न रहने का, सुखी रहने का अगर कोई उपाय है तो वह यह है कि सबसे निरपेक्ष होकर एकमात्र चैतन्यतत्त्व में समा जाए। इस विधि से सदा के लिए, अनन्तकाल के लिए दुःख छूट जाते हैं।
यहाँ तो हमें अनन्त पदार्थों का लोक में अवलम्बन लेना पड़ता है, लेकिन अनन्त पदार्थों का अनादि-अनन्तकाल से अवलम्बन हमारी एक भी अभिलाषा को पूरी नहीं कर पाया। सोचने की है बात कि अनन्त पदार्थों का लिया अवलम्बन, वह अनन्त पदार्थों का है, वर्तमान में धन-धान्य हो, सोना-चाँदी हो, हीरे-जवाहरात हों, कुछ भी हो, बहुत कुछ हो; लेकिन इनका अवलम्बन मेरी इच्छा को तृप्त नहीं कर पाया।
केवल एक मेरा जो चैतन्य है उसके पास मैं एकबार गया और उसने मेरी सारी झोली भर दी। इतना है उसके पास, सब कुछ दे देता है एकबार जाने से, फिर सबसे श्रेष्ठ हुआ या नहीं? सारे लोगों से; क्योंकि सारे लोकलोक के पास में गया, भगवान सिद्ध परमात्मा के पास भी गया, लेकिन कुछ बोले नहीं, अरहन्त परमात्मा के पास गया तो बोले क्यों आया है मेरे पास? मेरे से कुछ मिलना नहीं है और मैं तुझे क्या दे सकता हूँ तू तो स्वयं ही अरहन्त है स्वयं ही सिद्ध है, अगर मैं देता हूँ तो पाप है वह, धनवान की झोली कौन भरे? तू तो स्वयं अनन्त धनवाला, अनन्त वैभववाला है। ऐसे आत्मा की सत्ता पहचानना चाहिए।
एक अपनी सत्ता की स्थापना, उसे जानना, कैसा है मेरा सुन्दर स्वरूप? कितना समृद्धिशाली हूँ मैं? इस बात को जब तक नहीं जानेगा। तब तक आत्मा की बात सुनकर प्रसन्नता भी कैसे होगी? इतना हूँ मैं, अरे मैं अरहन्त हूँ, अरबों मेरे पास है। केवल ये एक विकल्प हमें कितनी प्रसन्नता, कितने घंटों तक दे देता है; क्योंकि ये तो निश्चित रूप से ही जाने वाले हैं या तो हम इनको छोड़कर जाने वाले हैं या ये हमको छोड़कर जाने वाले हैं; लेकिन रहनेवाला कोई नहीं है और यह चैतन्य तो, मैं जब चाहूँ तब उपलब्ध है। ये अनादि-अनन्त है, अकृत्रिम है, किसी का बनाया हुआ नहीं। कोई इसके ऊपर नहीं, कोई इसके नीचे नहीं, यह किसी की सापेक्षता नहीं रखता, यह किसी के आधीन नहीं, किसी के अवलम्बन पर नहीं,
चैतन्य की उपासना
इसमें कोई दुःख-दर्द नहीं, सुख ही सुख भरा हुआ है, आनन्द भरा
हुआ है। ऐसे तत्त्व को केवल एकबार, कम से कम इस महापर्व में
ही स्वीकार कर लिया जाये तो बहुत बड़ी खुराक मिल जायेगी।
उस चैतन्य की आराधना मुनिराज निरन्तर करते हैं और हम अभी
तक नहीं कर पाये, सुन तो लेते हैं, कभी सुन लेते हैं, कभी नहीं सुनते
हैं, जैसे कोई किसी दिन खा लेता हो रोटी, किसी दिन नहीं खाता हो,
महीनों भूखों रहता हो ऐसा व्यक्ति होता है क्या कोई ? नहीं होता।
रोजाना भूख लगना और रोजाना भोजन करना जैसे मनुष्य का काम है,
उसी तरह निरन्तर रोजाना – प्रतिदिन इस चैतन्य का आनन्दमय भोजन
करना प्रत्येक दिगम्बर जैन का कर्त्तव्य है।
समय…? बहुत समय है हमारे पास, समय की शिकायत
स्वीकार करने लायक नहीं है, गलत है वह। व्यवसाय से समय नहीं
मिलता, व्यवसाय तुम करते ही कहाँ हो ? व्यवसाय तुमसे होता
ही कहाँ है ? व्यवसाय यदि होता होता, तुम करते होते, तुम उसके
कर्ता होते। तो तुम्हारा उस पर अधिकार होता। कर्त्ता तो वह होता
है, जिसका कर्म पर अधिकार होता है, यदि तुम्हारा उस पर अधिकार
होता, तो आज तुम्हारे पास इतना होता, जो दुनियाँ में किसी के
पास नहीं है। लेकिन एक तिनका भी जीव इधर-उधर नहीं कर पाता
है। ये सारा परिश्रम, सारा पुरुषार्थ सारे व्यवसाय में जितना श्रम होता
है, वह बिल्कुल पानी में जाता है। और आता है तो बिना दिया
हुआ आता है – कई घटनाएँ ऐसी हमारे आस-पास होती हैं कि हम
कल्पना ही नहीं करते हैं और बहुत आ जाता है और हम कल्पना
ही नहीं करते हैं और उस मारवाड़ की रेत की तरह दूसरी जगह जाकर
ढेर हो जाता है, चला जाता है।
दशलक्षण महापर्व : द्रव्य एवं भावपर्व
ये सब होता है रात और दिन, तब हम ठिकाने आ जाते हैं,
आते तो नहीं हैं, पर कहने लगते हैं कि ऐसा ही होना था, हमने
तो बहुत कोशिश की थी। तुम्हारी अगर कोशिश है, तुम इसके
अधिकारी हो वास्तव में, तो वह सफल और सार्थक होना चाहिए;
लेकिन एक अणुमात्र पर भी तुम्हारा हमारा अधिकार नहीं है – यह
बात जानकर केवल एक ही सत्ता मेरी है इस विश्व में, केवल चैतन्य
सत्ता, उस चैतन्य सत्ता के निकट जाकर निरन्तर आनन्द वाटिका में
विहार करते हैं। उसमें से निकलना नहीं चाहते।
जैसे कछुआ होता है ना, कछुआ। वह आलसी होता है, चलना
ही नहीं चाहता, पड़ा रहना चाहता है। उसी तरह उस आनन्द वाटिका
में चैतन्य वाटिका में अगर मुनिराज जाते हैं तो आलसी हो जाते
हैं। उनका जीवन ही यही है, और नहीं है। आठ मूलगुण और
महाव्रत ये वो और ये वो मुनिराज के कर्त्तव्य नहीं है। तो क्या
नहीं पालते हैं ? पलते हैं, कर्त्ता बनकर पालते नहीं; क्योंकि वे भाव
आत्मा से विरुद्ध भाव हैं, पराश्रित भाव हैं, परावलम्बी भाव हैं, पर
से उनका सम्बन्ध है। जिनका सम्बन्ध पर से है, वे हमारे अधिकार
में हो नहीं सकते। और हम उनके कर्त्ता नहीं हो सकते, वे पलते
हैं। लिखा है आचार्य ने प्रवचनसार में कि हे पंच महाव्रत, हे
पंच समिति, हे तीन गुप्ति ! मैं तुम्हारा पालन तब तक करता हूँ, जब
तक मैं अपने चैतन्य में समा न जाऊँ। केवल इतने होते हैं वे।
पापभाव की तो यहाँ पर चर्चा ही नहीं की जाती है; लेकिन
पुण्यभाव की भी कीमत इतनी है। पुण्यभाव की विशुद्धि होने पर अगर
हम अपने ज्ञान को, अन्य को नहीं, और सब गुणों को छोड़ दीजिए।
जो प्रतिसमय ज्ञान चलता है हमारा ये ज्ञान श्रुतज्ञान…मतिज्ञान के
बाद श्रुतज्ञान विशेष ज्ञान होता है। विशेष ताकत वाला केवलज्ञान
चैतन्य की उपासना
जैसी ताकत वाला ज्ञान होता है। आचार्य ने उस भावश्रुतज्ञान को
जो आत्मा का अनुभव कर लेता है। उसको केवलज्ञान के समीप
रखा है – ऐसा जो श्रुतज्ञान है उस श्रुतज्ञान को सारे विकल्पों से
तोड़कर, क्योंकि ये विकल्प चैन नहीं लेने देते हैं। एक आसमान से
उतर आया एक पाताल से आया। विकल्प ही विकल्प, अरे आत्मा
की आराधना करेंगे तो क्या विकल्प से केवल आत्मा का विचार
कर लेंगे ? भोजन का केवल विचार करते हैं या भोजन के साथ हम
आत्मसात् होते हैं। भोजन का ग्रास मुँह में खाकर तत्काल उसके
आनन्द का अनुभव करते हैं या खाली उसके गुण गाया करते हैं ?
तो हम भगवान के गुण गा लें, उससे कुछ होने वाला नहीं है। दूसरे
के गुण गाने से कुछ होने वाला नहीं है। किसी धनपति के दरवाजे
जाकर उसी के गुण गा लो तो क्या ? तुम हम स्वयं वैसे धनपति
बनेंगे।
अरे उसने जो पुरुषार्थ किया है उसी पुरुषार्थ पर यदि हम अग्रसर
होते हैं तो धनपति बन जाते हैं। भगवान की प्रतिमा, साक्षात्
समवसरण के भगवान का संदेश क्या है ? अरे तू स्वयं परमात्मा,
मरा कहाँ है तू ? ‘ज वि उप्पज्जइ ण वि मरइ’ न उत्पन्न होता है
और न कभी मरता है आत्मा। पुण्य और पाप के भाव नहीं हैं उसमें,
रहित है वह। अरे उसमें मोक्ष की पर्याय नहीं है, पुण्य-पाप के भाव
तो कहाँ लगते हैं, नहीं हैं उसमें वे सब। लेकिन ये तो सदा से आते
रहे हैं; आते हैं, आते हैं; लेकिन हम ये बात समझें कि पुण्य और
पाप कतई मेरा स्वरूप नहीं है।
तो इससे क्या पुण्य-पाप छूट जायेंगे ?
छूट जायेंगे तो मोक्ष हो जायेगा, डरते क्यों हो ? छूट नहीं जाते।
जब तक रहता है संसार में, तब भी ज्ञानी को तो किञ्चित् भी पापभाव कहे ही नहीं। पुण्यभाव आते हैं लेकिन उन पुण्यभाव में भी वह कभी अनुरक्त नहीं होता। यह है मेरा स्वरूप। पराधीनभाव है न दया दान पूजा इत्यादि, इनमें दूसरा पदार्थ चाहिए। आत्मा के लिए दूसरे पदार्थ की आवश्यकता ही नहीं। आत्मा का अनुभव करने के लिए किसी को लाना पड़े, किसी का अवलंबन लेना पड़े। अरे, गुरु की भी आवश्यकता नहीं है। जिन गुरु से आत्मा का स्वरूप सुना, उन गुरु की याद नहीं आती। याद आवे तो आत्मा का अनुभव ही न हो।
एक परीक्षा भवन में एक परीक्षार्थी परीक्षा देता है तो प्रोफेसर को याद किया करता है या पेपर करता है ? असली प्रोफेसर भी यह कहता है कि मुझे भूल जाना, मुझे याद मत करना, वरना उतना ही भटक जायेगा, उतना ही तेरा समय नष्ट होगा। इसलिए मुझे याद मत करना, मैंने जो तुझे सिखाया है और तूने जो आत्मसात् किया है। उसमें तू अनुरक्त हो जाना। उसमें लीन हो जाना, तू फर्स्ट क्लास फर्स्ट आने वाला है। इतनी योग्यता है तेरे में।
तो क्या अरहंत भगवान हमको गुमराह करेंगे, हमको भीख मांगना सिखायेंगे ? पर हम तो भीख मांगते हैं।
थुल्लुकजी (धर्मदासजी) ने कहा है कि जीव को आज तक दो वस्तु नहीं मिली। जिनराज स्वामीजी नहीं मिले और अपना शुद्धात्मा…। क्या गजब है बात ! जिनराज स्वामीजी रोजाना दर्शन करने वालों की, लम्बी-लम्बी पूजाएँ करने वालों को नहीं मिले। क्या ये निन्दा नहीं है दर्शन और पूजन की ? ऐसा कहोगे तो फिर हम दर्शन-पूजन करना छोड़ देंगे। चिन्ता मत करो, दर्शन-पूजन तो होगा, करोगे, नहीं करोगे, तो क्या करोगे, घंटाघर जाओगे क्या ? कहाँ जाओगे ? कहाँ मिलेगी यह चीज ? मिलेगी तो केवल यहीं मिलेगी; लेकिन उसके मिलने की जो विधि है, उसके मिलने के जो ज्ञान
चैतन्य की उपासना
चाहिए, उसमें प्रवृत्ति करने से मिलेगी, यहीं आने मात्र से नहीं मिलेगी। यहाँ तो हम आते ही रहे हैं। पर वास्तव में तत्त्वज्ञान गायब हो गया है।
तत्त्व माने शुद्ध चैतन्य। सात तत्त्व तो होते ही हैं, लेकिन सात तत्त्व में सर्वोपरि शुद्ध जीवतत्त्व है, और वह शुद्ध जीवतत्त्व मैं हूँ। इस बात को जिसने जाना, उसने पहली बार अपने भीतर चैतन्य की स्थापना की। वरना वह चैतन्य तो पड़ा ही हुआ था, लेकिन इसके लिए तो वह व्यर्थ गढ़े हुए धन के समान, ये तो दरिद्री था, होटल में जाकर कप साफ करता था, तश्तरियाँ धोता था और धन गढ़ा हुआ था। ये गढ़ा हुआ धन चैतन्य, अनादिकाल से हमारे पास पड़ा हुआ है; लेकिन हमने इसको जानने का प्रयत्न नहीं किया।
हमारे लिए तो बस यही काफी है। थोड़ा बहुत दान कर लेते हैं, पूजा कर लेते हैं। सदाचार पाल लेते हैं। श्रावक के पद कर्म कर लेते हैं। पर तू तो श्रावक भी नहीं है। तत्त्वज्ञान तो यह कहता है श्रावक और मुनि ये वेश नहीं हैं, आत्मा के वेश नहीं होता। आत्मा नाना प्रकार का नहीं होता है, वह तो एक ही प्रकार का है, शुद्ध है, परिशुद्ध है, वही का वही है। और कभी जिसको कोई विपत्ति आती नहीं। जिसका किला वज्र का बना हुआ है। उस वज्र के किले के भीतर यदि कोई प्रविष्ट हो जाये, उस पर यदि गोले भी बरसें, तो उसे छूने वाले नहीं हैं। ऐसे परमात्म तत्त्व की आराधना मुनिराज करते हैं। लेकिन हम अभागे हैं, क्योंकि हमने इन दश धर्मों का शुद्ध स्वरूप ही नहीं समझा।
वास्तविक उत्तम क्षमा क्या होता है ? क्षमा करता हूँ, देता हूँ, लेता हूँ, ये देने-लेने की वस्तु तो है ही नहीं। इससे तो कुछ होता ही नहीं, औपचारिकता है, होती रहेगी औपचारिकता और होती रहनी चाहिए, लेकिन इसमें ये मानना कि मैंने किसी को क्षमा कर दिया है - ये झूठ है। तुम क्षमा करने वाले कौन होते हो ?
उत्तम क्षमा अर्थात् उत्तम शब्द जो है, वह सम्यग्दर्शन के लिए है और क्षमा अर्थात् शुद्ध चैतन्य आत्मतत्त्व। क्षमा जैसा, पृथ्वी जैसा - ऐसा जो आत्मतत्त्व है, उस आत्मतत्त्व में आचरण करना, विचरण करना, उसका नाम उत्तम क्षमा है और उत्तम ब्रह्मचर्य ? उसका भी वही स्वरूप। ब्रह्म माने ज्ञानस्वरूप आत्मतत्त्व, चैतन्य तत्त्व, उसमें चर्या करना, उसका नाम ब्रह्मचर्य। कहाँ भेद हुआ दस धर्मों में ? कहाँ अन्तर है ? लेकिन उनका विचार करना, वह कर्तव्य है हमारा, जबतक उसकी प्राप्ति - चैतन्य की प्राप्ति न हो जाए, तबतक उनका विचार करना, विकारों को कम करने के लिए और चैतन्य की प्राप्ति करने के लिए, उनका विचार करना भी कर्तव्य है। ये एक व्यवहार कर्तव्य है।
मुनिराज की चर्चा आई, आनी भी चाहिए, क्षमादि दशधर्म के धारक मुनिराज कैसे होते हैं ? दिगम्बर मुनि का स्वरूप हमने क्या जाना है ? हम जानते हैं उनको उपसर्गों में दुखी और वे उपसर्गों में आनन्द की घूँट पीते हैं। ऐसे मुनिराज होते हैं। दिगम्बर मुनिराज कोई विलक्षण पुरुष, पाषाण, साक्षात् पाषाण, पत्थर, कुछ भी बरसाओ, जो तुम्हारी इच्छा हो सो बरसाओ, गर्मी पड़ती है, सर्दी पड़ती है, बरसात गिरती है। सब में पाषाण जैसे खड़े हैं। ये वीरता पाई जाएगी किसी में।
अरे ! सीमा पर कोई मिलिट्री का आदमी जाता है, ऐसी वीरता होगी किसी में, ऐसा शौर्य - ऐसा पराक्रम होगा ? ये कोई शरीर का पराक्रम है क्या ? अरे ! अन्तर में उस चैतन्य में प्रवेश कर जाता
चैतन्य की उपासना
है, तो शरीर का पता ही नहीं रहता है। शरीर ही नहीं है। स्वयं आचार्य अमृतचन्द्र ने लिखा – “साधु होने पर भी साक्षात् सिद्ध हूँ मैं, सिद्ध से कोई कम नहीं हूँ मैं।” भले ही साधु कहा जाता हूँ, पर वास्तव में तो मैं सिद्ध हूँ। कैसे सिद्ध हैं? निरन्तर सिद्ध स्वभाव की आराधना करता हूँ न। तब फिर उनमें और मेरे अन्तर कहाँ हैं? ऐसे मुनिराज के निकट तो हम नहीं पहुँच पाये और उनसे काफी नीचे रह गये।
अभी तक चैतन्य का पता तो नहीं तो उसकी स्थापना, परिचय तो एकबार करें। यह तो कहना सीखेंगे कि मैं तो शुद्ध चैतन्य अजर-अमर-अविनाशी तत्त्व हूँ। ध्रुव तत्त्व हूँ, मेरा कभी कुछ होना नहीं है। ये आधियाँ-व्याधियाँ – ये कभी आत्मा को लगती ही नहीं हैं। वहाँ तक पहुँच ही नहीं पाती हैं, छू ही नहीं पाती हैं, और छूती होती, तो इनको साथ लेकर जाता न। किसी को टी.बी. हो गया हो तो फिर उसको साथ लेकर जायेगा कि नहीं, आत्मा को टी.बी. हो जाता हो तो फिर आत्मा टी.बी. को अगले भव में साथ लेकर जायेगा कि नहीं? लेकिन आजतक किसी के साथ टी.बी. गई है क्या? इससे यह तो एकदम स्पष्ट है कि आत्मा को तो यह होता ही नहीं है। हुआ ही नहीं है, ऐसा अनादि-अनन्त अविनाशी ध्रुव ज्ञायक तत्त्व है, वह मैं हूँ।
ऐसी स्थापना एकबार इस दशलक्षण महापर्व के भीतर हो और उसके लिए हमने चर्चा की कि वहाँ तक पहुँचने के लिए जो पहला पहलू है विशुद्धि, वह हमारे जीवन से गायब हो गई है। उस विशुद्धि के बिना – विशुद्धि तो मौसम है, अच्छा मौसम है अर्थात् उसमें गर्मी नहीं, धूप नहीं, ज्यादा सर्दी नहीं, बरसात नहीं। अच्छा मौसम है अर्थात् वह ऐसी भूमिका है कि जिसके आने पर अगर हम अपने ज्ञान
दशलक्षण महापर्व : द्रव्य एवं भावपक्ष
के द्वारा, विशुद्धि के द्वारा नहीं, उसके द्वारा कुछ नहीं होगा। रसोईघर के बिना रसोई नहीं बनती, तो क्या रसोईघर से रसोई बनती है। रसोई के उपादान तत्त्व अलग होते हैं, उसकी चीजें अलग होती हैं। रसोईघर तो केवल होता है। इसी तरह विशुद्ध परिणाम होने चाहिए, लेकिन उन विशुद्ध परिणामों से आत्मा नहीं देखा जाता, क्योंकि विशुद्ध परिणाम स्वयं राग है और राग आत्मा का विरोधी तत्त्व होता है, तिरस्कार करने वाला है, राग तो दूसरे से सम्बन्ध जोड़ता है।
राग क्या करता है? राग तो आकर्षित करता है न। मुझे खाना खाना है – ये भोजन की ओर आकर्षित हुआ न। ये भोजन का राग है न। मुझे ऑफिस जाना है – ये पैसे का राग हुआ या नहीं। पैसा कौन लगता है हमारा कि हम उसकी ओर आकर्षित हों। हमको क्या अधिकार है उसकी और आकर्षित होने का। आत्मा धन की ओर आकर्षित होता है, और उसी समय जो शुद्धात्मा है, वह सदा पर्याय रहित पड़ा हुआ है, जिसमें पर्याय मात्र का निषेध है। ऐसा जो आत्मतत्त्व है, उसके लिए कुछ नहीं चाहिए, न भोजन चाहिए, न उसे ऑफिस चाहिए, कुछ नहीं चाहिए – ऐसा आत्मतत्त्व है। जो राग नाम की वृत्ति है – क्रोध, मान, माया, लोभ की वृत्ति है। ये सारी वृत्तियाँ परावलम्बी, पराधीन बनाने वाली वृत्तियाँ हैं। आत्मा स्वाधीन तत्त्व है, इसलिए ये वृत्तियाँ कभी भी आत्मा नहीं हो सकतीं – ये वृत्तियाँ मुझसे न्यारी हैं।
पिछले दो दिनों से इतनी विशुद्धि की चर्चा की और आज फिर कर रहे हैं, परन्तु विशुद्धि होने पर भी, रसोईघर की तरह, उसका होना अनिवार्य होने पर भी, उससे काम नहीं होता, उससे अलग हमारे पास जो शुद्धात्मतत्त्व है वह ज्ञान उस आत्मा को पहचान कर, आत्मा
चैतन्य की उपासना
निकट जाता है, अपने आपको सारे जगत के विकल्पों से खाली करके। ये तो शर्त है, पूरी शर्त है कि आत्मा का जो शुद्धात्म है, वह पूरे विकल्पों से खाली हो जाना चाहिए, और उसमें केवल एकमात्र चैतन्य ही प्रवर्तित हो। मैं शुद्ध चैतन्य तत्त्व हूँ। मैं अविनाशी, मैं ध्रुव – ऐसा जब विचार करेगा, तो भी प्रसन्नता होगी। जैसे किसी को वरदान मिल जाए और वह कहे कि मैं कोई जगत में मुझे मारने वाला नहीं है, मुझे तो ऋषि का वरदान है। इसी प्रकार अनुभूति के बिना मात्र विचार भी करता है तो प्रसन्नता होती ही होती है।
यदि इन 10 दिनों में भी एकाग्रता से इस बात को ग्रहण कर लिया तो हम निहाल हो जाएंगे। ये जो विशुद्धि है। पूजा के लिए जैसे स्नान करना, शुद्ध कपड़े पहनना जरूरी है, पर शुद्ध कपड़े पहनना, स्नान करना पूजा नहीं है, लेकिन वह होती है, उसके बिना पूजा नहीं होती, पर उससे नहीं होती। उसी तरह ये जो विशुद्धि पुण्य परिणाम – शुभभाव, शुभोपयोग है, सच्चे देव-शास्त्र-गुरु की श्रद्धा…, मिथ्यात्व का त्याग, अन्याय का त्याग, अभक्ष्य का त्याग, निर्दयता का त्याग, करुणाभाव का हृदय में निरन्तर बहना इत्यादि जो भी चर्चाएँ हैं – ये सारी की सारी विशुद्धि अर्थात् शुभोपयोग है। अज्ञानी तो ये मानते हैं कि मैंने इतना कर लिया है, तो ऐसा करते-करते ही मेरा मोक्ष हो जाएगा।
अरे, लेकिन जो मोक्ष के विरुद्ध है और मोक्षदशा के पहले ही जिनका अभाव हो जाता है, तो वह तुझे मोक्ष कैसे लाएँगे। वे तो उस मोक्षमार्ग में पदार्पण ही नहीं करते। वे तो जाते ही नहीं हैं वहाँ, सिद्ध भगवान के पास पाप-पुण्य है क्या? सिद्धदशा में वे छूट गये या नहीं छूटे? छूट गये। छूट इसलिए गये कि वे विकार थे। मोक्ष से उनका मिलान
दशरक्षण महापर्व : द्रव्य एवं भावपक्ष
नहीं था, इसलिए वे छूट गये। तो जो छूट जाता हो और हमारे साथ सदा रहता नहीं हो, तो वह धर्म कैसे हो सकता है, वह मोक्षमार्ग कैसे हो सकता है ? इसलिए ऐसी विशुद्धि को भी हेय जाना जाता है। कैसे हो सकता है मेरा ? इसका नाम हेयबुद्धि है। एक दिन छोड़ना है, लेकिन वर्तमान में नहीं छोड़ देना है।
मुनिराज होते हैं, उनके वस्त्र नहीं होते, हम भी मुनि बनना चाहते हैं। मुनि बनने की भावना भी होती है, लेकिन मुनि होने की योग्यता वर्तमान में नहीं है। योग्यता के अनुसार पद ग्रहण करना चाहिए, वरना पद बदनाम होता है। मुनि बनना चाहें तो क्या वर्तमान में कपड़े खोल दें। कपड़ा क्या ग्रहण करने लायक है, कपड़ा क्या आत्मा की वस्तु है। मुनि बनना चाहते हैं, भावना है, लेकिन इतनी शक्ति अभी नहीं है। इसलिए कपड़े को हेय जानकर रखते हैं। कपड़े को उतारने लायक मानकर रखेंगे, कपड़ा पहनने लायक मानकर नहीं रखेंगे। लेकिन कपड़ा उतारेंगे नहीं। ये बातें हेय-उपादेय की क्या समझ में नहीं आती हैं ?
अरे ! लोक में ऐसे सैकड़ों उदाहरण भरे पड़े हैं। हम दांतों का ब्रश करते हैं, तो उस ब्रश को हम मुँह के भीतर ले जाते हैं, तो काहे के लिए ले जाते हैं ? पेट में उतारने के लिए या बाहर निकालने के लिए ? तो उसको मुँह में हेय जानकर रखा या उपादेय जानकर ? हेय जानकर रखा, छोड़ने लायक जानकर रखा। ये हेय-उपादेय नहीं समझ सकते क्या ? इसी तरह पुण्य और पाप के परिणाम, वे मुक्ति के विरुद्ध परिणाम-पराधीन-पराश्रित परिणाम हैं। और चैतन्यतत्त्व स्वाधीन तत्त्व है, उसे किसी का सहारा नहीं है। इसलिए वे चैतन्यतत्त्व के विरोधी भाव तिरस्कारी भाव होने के कारण, हम उनका अवलम्बन
चैतन्य की उपासना
नहीं ले सकते, लेकिन वे आते हैं और उनके आने पर जो काम होना चाहिए, वह हम कर लेते हैं। भाव बढ़ जायेंगें तो बाजार में माल बेच दो, वरना घट जायेंगें। उसी तरह विशुद्ध परिणाम यदि आते हैं, देव-शास्त्र-गुरु की पूजा के भाव आते हैं। देव-गुरु-धर्म उनको पहचाने, देव कौन हैं ?
अरे, हमारे जैसा देवता इस तीन लोक और तीन काल में नहीं है, एक ही देवता। कितनी सुन्दर है बात। हजारों के पास, करोड़ों के पास नहीं जाना पड़े। जाओ तो व्यवहार देव हमारे भगवान अरहंत सिद्ध और निश्चय देवता हमारा शुद्ध चैतन्य। बस दो ही देवता हैं। वास्तविक देव शुद्ध चैतन्य है, भगवान से भी पराधीनता मिलती है। ऐसे देव का स्वरूप पहचानें। और गुरु का स्वरूप…? गुरु के 28 मूलगुण ही नहीं मालूम, तो गुरु के स्वरूप की पहचान कैसे होगी ?
इसीतरह जिनवाणी को उसको मिली, जिसने जिनवाणी के द्वारा शुद्ध चैतन्य को समझा। शुद्ध चैतन्य पर अपनी स्थापना करके एकबार उसकी अनुभूति की, तो वह सफल हुआ और उसने जिनवाणी को समझा। उसने जिनवाणी खोली, उसके द्वारा जिनवाणी का विमोचन हुआ। अन्य के लिए तो जिनवाणी बन्द है। जिनवाणी तो बहुत विस्तृत है, उसमें निश्चय-व्यवहार की बहुत बातें आती हैं, उसमें तो पुण्य को भी मोक्ष का कारण कहा जाता है, लेकिन बात कुछ और ही है। हम अपने मकान को दूसरे का मकान शिष्टाचार में कहते हैं। उसीतरह पुण्य को भी परम्परा से मोक्ष का कारण कहा जाता है। लेकिन मोक्ष का रंगमात्र कारण नहीं है। पुण्य भी कारण हो और पुण्य के अभाव में होनेवाला वीतराग भाव भी कारण हो - ऐसे दो कारण होते है क्या ? यदि दो हों, तो क्या दो का अवलम्बन लेंगे
दशरक्षण महापर्व : द्रव्य एवं भावपक्ष
हम ? नहीं बनेगी वह बात। इसलिए देव-गुरु-शास्त्र की भक्ति, ज्ञान के द्वारा उनके स्वरूप को जबतक न पहचाने… बात बन नहीं सकती।
चित्त में उछलती हुई भक्ति से अगर जीव भाव-विभोर नहीं होता है, तो उसने वास्तव में भगवान की भक्ति नहीं की। इस जीव का चित्त पाप से इतना मलिन है कि निरन्तर पाप ही पाप के विकल्प होते हैं। पाप के विकल्प में पुण्य के परिणामों का तो सदा अभाव ही रहता है। मन्दिर का तो एक कार्यक्रम बना लिया हमने कि रोजाना मन्दिर जाना है। कार्यक्रम से धर्म नहीं होता, धर्म चौबीसों घण्टे होता है। निद्रा में भी होता है, क्योंकि वह धारा तो स्थाई चलती रहती है। वह कभी बन्द नहीं होती। क्षायिक सम्यक्त्व जब से प्रगट हुआ, तब से वह धारा अनन्त सिद्ध दशाओं तक चलने वाली है। वास्तव में तो यह है मोक्षमार्ग। इसलिए इनके स्वरूप को पहचाने, देव-गुरु-धर्म के स्वरूप को पहचाने।
विशुद्धि में यह भी पहचाने कि हमारे खाने योग्य कौन वस्तु है और कौनसी हमारे खाने लायक नहीं है। हम जैनकुल में हुए है न, हमें जिनवाणी मिली है न, तो क्या यह बात नहीं जानना चाहिए हमें। “जितनी भी चीजें पैदा हुई है, वे सब खाने लायक है।” ऐसा कहते है लोग। तब फिर इतना भेद क्यों करते हो, सीढ़ी पर रखी चप्पल क्यों नहीं खा जाते पराठा समझकर। इसी तरह इसमें बहुत जीवों का घात होता हो, बहुत जीव मरते हों, बहुत जीवों के जो स्थान हों, ऐसी जो चीजें हैं; जमीकन्द, आलू, शकरकन्द, गाजर, मूली, बाजार की जलेबी इत्यादि हैं, द्विदाल है। बाजार की तो सभी चीजें अभक्ष्य ही होती है। सुना ! किसी ने छोड़ा हो तो छोड़ा हो, नहीं छोड़ा हो तो अभी छोड़कर जाना; क्योंकि इनमें अनन्तानन्त जीव
चैतन्य की उपासना
60
होते हैं। आलू, शकरकन्द, गाजर, मूली इसमें एक टुकड़े के सुई
जैसे स्थान में असंख्यात लोक प्रमाण निगोद शरीर होते हैं। शरीर
की बात चल रही है, अभी तो निगोद, जिसको एक श्वाँस में 18
बार जन्म-मरण करनेवाला कहा जाता है। कोई जरूरी नहीं है, पर
इतना करता है, लब्ध्यपर्याप्तक होता है तो ऐसे जीव के असंख्यात
लोक प्रमाण शरीर इतनी-सी जगह में होते हैं और एक शरीर में
अनन्तानन्त जीव होते हैं। कहाँ रहते होंगे? वहाँ तो समाते ही नहीं
होंगे?
जीव में विस्तार-संकोच की शक्ति है न। शरीर के प्रमाण ही
उसका संकोच होता है। इसलिए इतने जीव जिसमें पाये जाएँ, और
उन जीवों जानते हुए भी हम उनको अपने हाथ से उठाकर मुँह में
खा जाएँ, कितनी हत्या होती है। क्या हो जाता है हमारा यह मुँह,
क्या बन जाता होगा?.. इतनी भी दया नहीं है चित्त में।
इसीप्रकार रात्रि भोजन करते हैं, रात्रि में त्रसजीवों का घात…,
सब्जी में गिर रहे हैं, और हम खाते जा रहे हैं। रात को नियम से
जीव पैदा होते हैं और मरते हैं और हम खाते जाते हैं, ट्यूब लाइटों
में खाते हैं।
द्विदल माने जिसकी दो दाल होती हो, मात्र दालें नहीं, वरन्
किसी भी चीज की, जिसकी दो दाल होती हो, उसको दही, छाछ
और दूध में मिलाकर खाने से इस मुँह के भीतर असंख्य त्रसजीव
पैदा हो जाते हैं। त्रसजीव – माँस वाले माँसल जीव।
दहीबड़ा, बड़ी रसोई अर्थात शादी ब्याह की रसोई में बनेगा
कि नहीं? क्यों बनेगा कि नहीं भैया? दहीबड़े के बिना तो रसोई
हो ही नहीं सकती, वह तो बनेगा ही बनेगा। अथवा और किसी तरह
दशरत्न महापर्व : द्रव्य एवं भावपक्ष
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आ जाएगा, दूध आ जाएगा, दही आ जाएगा, बाजार की लदी वाली
मैदा आ जाएगी, कुछ भी आ जाएगा। और रात्रि का भोजन तो
धड़ल्ले से चलता है। जैनियों, दिगम्बर जैनियों की रसोईयों में, जिन
दिगम्बर जैनियों के लिए कहा जाता है कि पानी छानकर पीता है, तो
जैन होगा। पूँछा जाता है उसके कि तुम जैन लगते हो? जैनियों
का लक्षण/चिह्न है ये। आज उन्हीं जैनियों के यहाँ हजारों लोग रात
को खा रहे हैं और हम प्रसन्न हो रहे हैं। इस तरह के अनर्थ जीवन
में जहाँ पर होते हों, रात और दिन मलिन परिणाम, मलिन चीजें ही
देखना, मलिन बातों को ही याद करना। पूर्व के भोगों को याद करना।
आजकल चली है न प्रथा। कौन-सी प्रथा? शादी की वर्षगाँठ।
कितनी बेहूदा पद्धति है ये, जिसमें हम जाकर शामिल होते हैं और
लिफाफे बाँटकर आते हैं। शादी की वर्षगाँठ? अरे तुम मरने चले हो
अस्सी वर्ष के बूढ़े और तुम पुराने भोगों को याद करते हो। तुम्हें शर्म
नहीं आती। तुम्हें शर्म आना चाहिए बूढ़ा बैठने पर। इस तरह के ये नये-
नये जो बेहूदा रिवाज हैं, उनमें हम शामिल होते हैं। अरे! मोक्षार्थी तो
वह होता है जिसका एकक्षण व्यर्थ नहीं जाता। व्यर्थ की बातों में समय
नहीं गमाता है। बात करे तो बहुत संक्षेप में करे, विस्तार से बात न करे।
मतलब की बात करे। दुनियाँ की चीजों को अधिक देखने का मन न
करे। दुनियाँ की चीजों को देखो ही मत।
दूसरों का समय नष्ट न करें। ज्यादा घूमना, फिरना बंद करें।
ज्यादा अधिक लोगों को सुनना बंद करें। कुसंग को छोड़ें!
मिथ्यादृष्टियों का साथ छोड़ें! मिथ्यादृष्टियों से बात करने का मौका
आये तो कम से कम करें। हमें तो दुकान पर बात करना ही पड़ता
है। अरे अधिक बात मत करो। उसको संक्षेप करने की चेष्टा करो।
और उसमें रमो मत ये जो देव-गुरु-धर्म का सत्संग है
चैतन्य की उपासना
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और इसको जानने वाले और इसका अनुभव करने वाले जो ज्ञानी
हैं, जो आचार्य हैं, उनका जो संग है वह हमारे लिए निरन्तर संगति
करने लायक है। शेष जगत में कोई हमारा नहीं है।
इसतरफ ये जो विशुद्धि है परिणामों की। और हम समय नष्ट
करते हैं। कितना समय है हमारे पास, हम टी.वी. देखते हैं, नाटक
देखते हैं, मेलों में जाते हैं – ये मुमुक्षु का कर्तव्य है। वहाँ मलिन
परिणाम लेकर जाते हैं और-और दूने मलिन परिणाम लेकर आते
हैं। अरे! जो मुमुक्षु टी.वी. के दर्शन करता है। जिसमें रात और
दिन स्त्रियाँ नाचती हैं बेहूदा ढंग से, बेहूदा ढंग उसको देखने का
परिणाम ही मलिन और फिर वह परिणाम लेकर उठा तो और मलिन,
और आज तो घर-घर में है मुमुक्षु के। और फिर हम शिकायत करते
हैं कि हमको आत्मानुभूति नहीं होती। उसे आत्मानुभूति!.. अरे,
विशुद्धि ही पैदा नहीं हुई अभी तो सच्चे देव-गुरु-धर्म की श्रद्धा ही
पैदा नहीं हुई। अभक्ष्य का/मोटे अभक्ष्य का जिसमें अनन्तजीवों
की हिंसा होती है, उसका त्याग ही नहीं हुआ, रात्रि भोजन का त्याग
ही नहीं हुआ। क्या विशुद्धि होगी?
ये तो मोटी विशुद्धि मनुष्य के लायक है। तिर्यंच तो नहीं कर
पाता है ये काम, तो भी सम्यग्दर्शन होता है; क्योंकि उसे पता ही
नहीं है वो लाचार है, उसको पराधीनता है, लेकिन फिर भी कर लेता
है। शेर ने किया ना! इसलिए इन सारी वस्तुओं के त्याग की तो
प्रतिज्ञा लेकर जायें। हम परिणामों को जानबूझकर मलिन नहीं करेंगे।
अनादिकाल से मलिन है अब भी यदि सच्चे देव शास्त्र-गुरु का
सान्निध्य मिला है, यहाँ आकर भी देव के दर्शन करके भी यदि परिणाम
में विशुद्धि नहीं आयी तो तुझ जैसा अभागा जीव दूसरा नहीं है।
विवेक एक मशाल है, जो हमें मार्गदर्शन देती है, और तत्त्वज्ञान
दशलक्षण महापर्व : द्रव्य एवं भावपर्व
के बल पर ही विवेक जागता है, इससे नैतिकता आती है और यह तत्त्वज्ञान की नैतिकता, विशुद्धि व्यवहार धर्म में शामिल है। लोक की नैतिकता भिन्न प्रकार की है, सारी विशुद्धता की सीढ़ियाँ हेयदृष्टि से बनानी होगी, इस शुभोपयोग की भूमिका में मैं अपने उपयोग को शुद्धात्मा की ओर ले जाऊँ तो निश्चित मुक्ति होगी। अन्य की महिमा रहे ही नहीं, सिद्ध पर्याय की भी नहीं, आत्मतत्त्व की महिमा सुनकर आवे तो अवश्य ही भव का नाश होकर मुक्ति हो।
मुमुक्षु का एक-एक क्षण रत्नों से भी अधिक कीमती होता है, वह विश्व का सर्वोच्च पुरुष होता है, एक क्षण भी उसका खर्च नहीं जाता। दुनिया के सारे काम ऊपर ही ऊपर चलते रहते हैं और अनन्तर में शुद्धात्मा की धारा बहती रहती है, वह एक दिन अवश्य आत्मानुभूति प्राप्त कर आनन्द की घूँट पीता है।
मुमुक्षु की पहचान, उसकी दया का पहचान एक छोटी-सी क्रिया में, एक चींटी को बचाने में हो जाती है, पवित्र घर व पवित्र परिणाम, जहाँ चैतन्य की चर्चा से घर महकता हो, यहाँ भारतवर्ष में एक विद्वान थे मण्डन मिश्र, बड़े दार्शनिक विद्वान थे। जब कोई व्यक्ति जाकर गाँव में मण्डन मिश्र का मकान पूछता था, तब पनघट पर जो पनिहारियाँ होती थी, वह संस्कृत में यह जवाब देती थीं -
“स्वतः प्रमाणम् परतः प्रमाणम्
वरांगना यत्र गिरन्ति तत्र
द्वारस्थ वीरान्तर तन्निबद्धा
जानहि तं मण्डनमिश्र धामः”
जिसके दरवाजे पर तोते, तोता और मैना यह चर्चा कर रहे हों कि प्रमाण ज्ञान स्वतः होता है या परतः होता है, जहाँ यह चर्चा हो रही हो,
चैतन्य की उपासना
समझना वही मण्डन मिश्र का घर है। हमारे यहाँ भी जिस घर में शुद्धात्म तत्त्व की चर्चा हो रही हो, तो समझना मुमुक्षु का घर है।
आचार्य ने लिखा है परद्रव्यो दुग्गई। हम तो ज्ञेय बनाते हैं। ये जगत मेरा ज्ञेय है, वे लिखते हैं - ‘परद्रव्यो दुग्गई’ परद्रव्य को देखने की जो तुम्हारी इच्छा है, ये दुर्गति है। जहाँ पर को जाना है, वहाँ सब ज्ञेय जाना है, पर और ज्ञेय जानने का अर्थ ही यह है कि वहाँ से तुम सदा के लिए अपना मुँह फेर लो। उसकी ओर झाँको मत ! पर की ओर झाँको मत ! झाँकना नहीं है, इसको कहते हैं ज्ञेय बनना। जिसकी याद न आवे, जिसका विकल्प भी न हो, उसको पर कहते हैं। पर की याद क्यों आवे ? हमें दूसरे ही दूसरे के बंगले की याद क्यों आती है ? अरे ! अपने बंगले की याद क्यों नहीं आती है ! ‘स्वद्रव्यो सुग्गई’ जो स्वद्रव्य है शुद्ध चेतन, उससे सद्गति होती है याने मुक्ति होती है। स्वद्रव्य का जो आश्रय है अवलम्बन है, उसकी जो अनुभूति है वह वास्तव में मुक्ति का कारण है।
परद्रव्य दिखेंगे तो सही। ये सब अभी सभा बैठी है तो नहीं दिखती है क्या ? अरे ! परद्रव्य की बात तो क्या अपनी पर्याय को देखने का निषेध किया गया है। पर्याय को देखना पाप है। मोक्ष की पर्याय को याद करना राग है, उससे मोक्ष नहीं होता। अपनी पर्याय तक को याद नहीं करना। ऐसा कहने से पर्याय की याद नहीं आयेगी क्या ? और ये लोग नहीं दिखाई देंगे, ये दुनियाँ, ये छह द्रव्य है, ये नहीं दिखाई देंगे क्या ? दिखाई तो देंगे, लेकिन शुद्ध चैतन्य पर हमारी निष्ठा हो गई है सदा के लिए, जगत का सर्वोत्कृष्ट तत्त्व मैं हूँ - ऐसी जिसकी निष्ठा हो गई है तो उसके सामने यदि पदार्थ दूसरे आते भी है, अपनी पर्याय का विकल्प भी आ जाता है तो सारा का सारा उपेक्षित कक्षा में चला जाता है। उपेक्षित भाव अर्थात् कुछ
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नहीं है। जिस तरह से हम बाजार में जाते हैं अपने काम से और वहाँ पर बहुत चीजें होती हैं तो सबको एक-एक दुकान पर गिन-गिन कर देखते हैं या उपेक्षितभाव से निकल जाते हैं, होगा कोई, होगी किसी की दुकान, होगा किसी का सामान, हम अपने काम पर चले जाते हैं। इसी तरह मोक्षार्थी इन सबको पर करता हुआ अपने श्रुतज्ञान को चैतन्य पर ले जाता है। ये उसकी क्रिया है। ये उसका जीवन है। हम तो विकल्पों से काम चलाते हैं। रात और दिन विकल्प।
अरे ! वह शुद्ध चैतन्य, जो विकल्प मात्र से रहित है। उसके भी विकल्प। मैं शुद्ध हूँ, मैं बुद्ध हूँ, मैं चैतन्य तत्त्व हूँ, मैं आनन्द तत्त्व हूँ, मैं ज्ञानस्वरूप हूँ - ये विकल्प ही विकल्प। पर साहब ! वह होती ही नहीं है अर्थात् अनुभूति तो होती ही नहीं है। बहुत कोशिश करते हैं।
झूठ मत बोलो ! आजतक जरा-सी भी कोशिश नहीं की, शुद्ध चैतन्य की अनुभूति की। जो कोशिश है उसकी, जो उसकी कोशिश की जाये, जो उसकी विधि है वह, यदि एकबार कर ली जाये और फैल हो जाये तो जगत में से मोक्षमार्ग उठ जायेगा। वह फैल नहीं होती है कभी भी, क्योंकि उसके बीच में कोई आता नहीं है। जिस समय जीव का श्रुतज्ञान शुद्ध चैतन्य की ओर बढ़ता है उस समय आठ कर्म एक तरफ हो जाते हैं। भावकर्म राग-द्वेष-मोह एक तरफ हो जाते हैं। सारी दुनियाँ एक ओर हो जाती है।
अरे ! जगत के हीरे, माणिक्य, मोती से अधिक उपलब्ध हमारे सच्चे देव-शास्त्र-गुरु की और शुद्ध चैतन्य की है। वो एक बार मिल गया तो जीवन धन्य हो जाता है।
स्रोत: Gyata संग्रह।
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