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दशलक्षण महापर्व 2026Dashlakshan Mahaparv 2026

नाटक स्क्रिप्ट · Play script

दशलक्षण इन्द्र सभा

Dashlakshan Indra Sabha

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दशलक्षण महापर्व पर मंचन-योग्य संवाद नाटक ‘दशलक्षण इन्द्र सभा’ — सौधर्म इन्द्र और शची इन्द्राणी के प्रश्नोत्तर द्वारा दस धर्मों (उत्तम क्षमा से ब्रह्मचर्य तक), सम्यग्दर्शन, सच्चे देव-शास्त्र-गुरु और रत्नत्रय का सरल स्वरूप; दो भागों में, हस्तलिखित स्क्रिप्ट (साधना-पत्रिका, 2018) का
Dashlakshan Indra Sabha — a stage dialogue-natak for Paryushan/Dashlakshan where Saudharma Indra answers Shachi Indrani’s questions on the ten dharmas, samyagdarshan and ratnatraya.


भाग - १

सौधर्म इन्द्र - मंगल पावन दशलक्षण यह, निज स्वरुप की याद करो, पंच परम परमेष्ठी सुमिरण, निज ज्ञायक अविराम वरो । उत्तम क्षमा आदि मंगल यह, धर्म हृदय में धारना। मुक्ति मार्ग के पथिक बनो भवि, आतम रूप संवारना।

हे देवों ! हमारे पुण्य योग से दशलक्षण महापर्व का मंगल आगमन हो गया है। दशलक्षण महापर्व शाश्वत पर्व है। यह मंगल आराधना का पर्व हमें निरंतर अपने चैतन्य को जानने की प्रेरणा देता है। हमें ये मंगल क्षण राग रंग में नहीं जिनेन्द्र प्रभु के गुणगान एवं तत्वचर्चा में बिताना चाहिए। इसलिए मैं आप लोगों से निवेदन करता हूँ कि दस दिन तक राग रंग के विषय छोड़कर आत्मा की आराधना करें।

शची इन्द्राणी - हे देव आपका संग पाकर में अपने को धन्य अनुभव कर रही हूँ। आपके साथ मुझे भी इस महान पर्व मे तत्व अभ्यास का अवसर मिलेगा।

(1) देवी प्रश्न - हे स्वामी ! पर्व का क्या अर्थ होता है ?

देव उत्तर - सुनो देवी ! पर्व का अर्थ है मंगल अवसर सनय-सयम पर आने वाले ये प्रसंग हमें अपने आत्म वैभव का ज्ञान कराते हैं इसलिए हमें निरंतर स्वरूप का अभ्यास करना चाहिए।

(2) देवी प्रश्न - हे देव कृपया कर बताइये कर बताइये दसलक्षण पर्व जगत में कब से प्रारंभ हुए ?

देव उत्तर - सुनो प्रिये दशलक्षण पर्व शाश्वत पर्व है। ये अनादि से ही मनाये जा रहे है।

(3) देवी प्रश्न - हे स्वामी दशलक्षण का मतलब आत्मा दस प्रकार का है ?

देव उत्तर - सुनो प्रियतमे आत्मा तो एक ही प्रकार का होता है परंतु उसके अनंत गुणों में से दस धर्मों के मुख्य करके बात कही जाती है।

(4) प्रश्न - हे स्वामी ! क्या आत्मा में दस धर्म ही होते हैं ?

उत्तर - नही वल्लभे आत्मा तो अनंत धर्मो का भंडार है। लेकिन वाणी में ऐसी सामर्थ्य कहां जो अनं धर्मा को कह सके इसलिए मुख्यता से दस धर्म कहे जाते हैं।

(5) देवी प्रश्न - हे देव ये दसधर्म कौन-कौन से होते है ?

देव उत्तर - सुनो धर्म प्रिये उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन, ब्रह्मचर्य यही दसधर्म है।

(6) प्रश्न - हे ज्ञानी उत्तम का अर्थ श्रेष्ठ होता है न ?

उत्तर - सुनो प्रिये उत्तम का अर्थ श्रेष्ठ तो होता ही है परंतु यहाँ उत्तम माने सम्यक्दर्शन।

(7) प्रश्न - हे स्वामी क्या सम्यक्दर्शन के बिना क्षमा आदि धर्म सम्यक् नहीं होते ?

उत्तर - नहीं प्रिये सम्यक् दर्शन के साथ होने वाली क्षमा आदि धर्म ही सम्यक् धर्म है।

(8) प्रश्न - हे स्वामी क्षमा और मार्दव का अर्थ क्या होता है ?

उत्तर - अपनी ज्ञानस्वभावी आत्मा को जानना ही वास्तविक क्षमा और मार्दव धर्म है परंतु व्यवहार में क्रोध का न होना क्षमा और मान का न होना मार्दव कहलाता है।

(9) प्रश्न - हे ज्ञान रसिक आर्जव और शौच धर्म समझाइये न ?

उत्तर - सुनो प्राणप्रिये चित्त में आत्मानुभव के साथ सरलता के परिणाम को आर्जव और कषाय आदि के मंद परिणाम न होने को शौच धर्म कहा जाता है।

(10) प्रश्न - हे तत्वप्रेमी कृपया वताइये सत्य और संयम धर्म का क्या मतलब होता है ?

उत्तर - अंतरंग में अपने सच्चे स्वरूप का निर्णय करना सत्य धर्म है और अपने उपयोग को स्वरूप मे रोकना ही संयम धर्म है।

(11) प्रश्न - हे स्वामी कृपया बताइये तप और त्याग का क्या मतलब है ?

उत्तर - सुनो कोमलांगे स्वरूप में प्रतिपन करना ही तप धर्म है और समस्त बहिरंग वृत्तियों को त्यागना ही त्याग धर्म है।

(12) देवी प्रश्न - हे स्वरूप प्रभु कृपया आकिंचन और ब्रह्मचर्य समझाइए न ?

देव उत्तर - स्वरूप की उपलब्धि पूर्वक ऐसा श्रद्धान होना कि जगत में मेरा कुछ भी नहीं है यह अकिंचन- धर्म है और अपने ब्रहम में रमण करना ब्रह्मचर्य धर्म है।

सौधर्म - वाह महापर्व पर आप लोगों के श्रीमुख से तत्व की बात सुनकर अपूर्व शांति का अनुभव हो रहा है। हमें यह तत्व चर्चा निरंतर ही करना चाहिए।

शची इन्द्राणी - हाँ स्वामी जिनधर्म को पाकर के विषय भोगों में समय गंवाना यह तो महा पागलपन है इस पर्याय का उपयोग तो एकमात्र शुद्धात्मा की प्राप्ति में होना चाहिए।

भाग - २

(द्वितीय भाग - प्रश्नोत्तर क्रमांक पुनः 1 से)

प्रश्न - हे स्वामी ! कृपया यह बताइये कि मनुष्य भव पाकर सर्वश्रेष्ठ कार्य क्या करना चाहिये ?

देव उत्तर - हे प्रिये सम्यक्दर्शन पूर्वक निर्ग्रन्थ मुनिदशा धारण करना सर्वश्रेष्ठ कार्य है क्योंकि मुनिव्रत धारण किये बिना तीन लोक में भी मुक्ति नहीं होती है।

(2) देवी प्रश्न - हे प्राणनाथ ! कृपया यह बताइये कि सम्यकदर्शन का क्या स्वरूप है ?

देव उत्तर - हे देव ! सच्चे देव शास्त्र गुरू की श्रद्धा पूर्वक ज्ञान स्वभावी आत्मा में अपनेपन की प्रतीति को सम्यकदर्शन कहते हैं।

(3) देवी प्रश्न - हे स्वामी ! सच्चे देव शास्त्र गुरू का स्वरूप समझाइये ?

देव उत्तर - सुनो देवी ! मनुष्य गति के जो जीव अपनी आत्मा की परिपूर्ण साधना द्वारा अनंत दर्शन अनंत सुख और अनंत वीर्य प्रगट कर लेते हैं। ऐसे नर श्रेष्ठ को सच्चा देव कहते हैं। इन्हे अरहंत भी कहते हैं। नग्न दिगम्बर वीतरागी मुनिराज सच्चे गुरू कहलाते हैं। सच्चे देव और गुरु की वाणी को शास्त्र कहते हैं।

(4) देवी प्रश्न - हे देव! इस जगत में हमारे लिए क्या सच्चे देव शास्त्र गुरू की शरण हैं क्या ?

देव उत्तर - हे प्रिये ! वास्तव में परमार्थ रूप से अपनी आत्मा की शरण है और व्यवहार से देव, शास्त्र, गुरु शरण होते है ?

(5) देवी प्रश्न - हे नाथ! मरण के समय क्या करना चाहिए तथा उस समय कौन शरण भूत है ?

देव उत्तर - सुनो देवी ! मरण के समय समता भाव पूर्वक शांत परिणाम रखना चाहिए। उस समय अपनी आत्मा ही शरण भूत है।

(6) देवी प्रश्न - हे देव! संकट के समय कौन सहायक होता है ?

देव उत्तर - सुनो प्रिये ! संकट समय धैर्य, धर्म और सात तत्व तथा वारह भावना का चिंतवन ही सहायक होता है।

(7) देवी प्रश्न - हे नाथ ! इस जगत में सर्वश्रेष्ठ रत्न कौन है ?

देव उत्तर - सुनो देवी ! निश्चय सम्यकदर्शन ज्ञान और चारित्र ही सर्व श्रेष्ठ रत्न है।

देवी प्रश्न - हे स्वामी ! रत्नत्रय की इतनी महिमा क्यों गाई जाती हैं ?

देव उत्तर - हे प्रिये ! रत्नत्रय की महिमा इसलिए गाई जाती है कि वह मुक्ति का मार्ग है।

(9) देवी प्रश्न - हे प्राण नाथ ! शुभ राग बंध का कारण क्यों है ?

देव उत्तर - सुनो देवी ! यह शुभ राग परपदार्थों के आश्रय से होता है, इसमें आत्मा का अवलम्ब नहीं होने के कारण यह भी बंध का ही कारण है।

(10) देवी प्रश्न हे देव! इस जीव का परम कर्त्तव्य क्या है ?

(11) देव उत्तर - हे देवी! स्वाध्याय ही इस जीव परम कर्त्तव्य है। स्वाध्याय से सच्चा तत्व निर्णय होता है।
तत्व निर्णय से मोह का उपशय होता है तथा सम्यगदर्शन की प्राप्ति होती है। इसलिए स्वाध्याय तो आत्मार्थी की खुराक है।

(12) देवी प्रश्न - हे प्राण नाथ! कान होते हुए भी वहरा है, वाणी होते हुए भी गूंगा है, भुजाएँ होते हुए भी लूला है तथा पैर होने पर भी लगड़ा कौन हो कता है ?

देव उत्तर - हे प्राणेश्वरी ! जिसने पंचेन्द्रिय संज्ञीपना प्राप्त करके भी जिनवाणी नहीं सुनी वह कान होते हुए भी बहरा है जिसने जिनेन्द्र भगवान का गुण गान नहीं किया वह वाणी होते हुए भी गूंगा है जिसने जिनेन्द्र पूजा एवं पात्र दान नहीं किया वह हाथ होते हुए भी लूला है तथा जिसने तीर्थ क्षेत्र की वंदना नहीं की वह पैर होते हुए भी लगड़ा है।

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स्रोत · Source: forum.jinswara.com — अनुमति सहित, साभार · shared with permission and thanks.

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