चलो पाठशाला : चलो सिनेमा भाग-२ (नाटक)
भाग - 2
(नाटक)
प्रकाशकीय
प्रथम संस्करण : 3 हजार
1 सितम्बर 2005
द्वितीय संस्करण : 1 हजार
26 मार्च 2016
योग : 4 हजार
लेखिका :
डॉ. शुद्धात्मप्रभा टडैया
बी.ए. ऑनर्स (स्वर्णपदक प्राप्त)
एम.ए., पीएच.डी.
प्रकाशक :
पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट
ए-४, बापूनगर, जयपुर ३०२०१५
फोन नं. ०१४१-२७०५५८२, २७०७८५८
Email : ptstjaipur@yahoo.com
मूल्य : Rs. 7/-
चलो पाठशाला : चलो सिनेमा भाग १ का
पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर से प्रकाशन
करते हुए हमें हार्दिक प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।
आपकी जैनदर्शन के मूलभूत तत्वों की A to Z
जानकारी देने वाली अनेक पुस्तकों का प्रकाशन
किया गया है। विभिन्न आयुवर्गों को ध्यान में रखकर
चित्र-कथा ग्रंथ में विदुषी लेखिका डॉ. शुद्धात्मप्रभा
टडैया द्वारा लिखित पुस्तक का अल्पकाल में एक
लाख से अधिक प्रतियों का प्रकाशन ही इसकी
उपयोगिता और लोकप्रियता का प्रमाण है। बालकों
के लिये लिखी गई अस्सी और के.जी. भाग-१, २, ३
पुस्तकों का हिन्दी, गुजराती, मराठी और अंग्रेजी चारों
भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हो चुका है।
आप सभी स्वयं इन पुस्तकों को पढ़ें और अपने
मित्रों को भी पढ़ने की प्रेरणा देकर जैन तीर्थंकरों की
दिव्यध्वनि के प्रचार-प्रसार में सहयोग प्रदान करें -
इसी मंगल भावना के साथ विराम लेते हैं।
- प्र. यशपाल जैन
प्रकाशक मंत्री
क्या / कहाँ
- हम क्या करें ? 1
- गार्डन में 2
- गलती किसकी ? 3
- लिफ्ट में 4
- क्या है धर्म ? 4
- स्टडी में 6
- किसे करें नमस्कार ? 6
- रास्ते में 8
- हमारा संकल्प 9
- पाठशाला में 10
- नई भूल 11
- मंदिर में 12
- मूल में भूल 13
- प्लेग्राउन्ड में 14
- कौन हैं हम ? 15
- प्रेस में 16
मुद्रक : सन् एण्ड सन् प्रेस, तिलकनगर, जयपुर
हम क्या करें ?
माया : मम्मी ! ओ मम्मी !! देखो मैं क्लास में first आई।
मम्मी : अच्छा ! चल, चल। सबको बता दे, पेड़ा खिला दे।
- (कुछ सोचकर) ओ होहोहो first आनेवाली जैनी का क्या हुआ ?
माया : मम्मी ! जैनी जनमने के कारण Second हो गई। टीचर ने पूछा - What are good
food? मैंनेउत्तर बोलती है - Fish, Meat, Egg are bad Food and Milk, Dal,
Rice, Banana etc. are good food.
मम्मी : ठीक ही तो कहा है उसने ? गलत क्या है इसमें ?
माया : मम्मी जो उत्तर हमें सिखाया जाता है, वही देना चाहिए। हमें तो स्कूल में सिखाया गया है -
Fish, Meat, Egg and Milk are good food.
मम्मी : इतना छोटा सा उत्तर उसे याद नहीं था क्या ?
माया : नहीं मम्मी ! इतनी बुद्धू थोड़ी ही है वो। वो तो होशियारी झाड़ रही थी। टीचर को ही समझा
रही थी, कह रही थी - Fish, Meat और Egg खाने में हिंसा है, इसलिए ये Bad Food
हैं good Food नहीं। टीचर को गुस्सा आया और नम्बर काट दिए, मैं first आ गई।
मम्मी : मैंने अच्छा किया बेटा ! तू तो समझदार है। चल उसकी मम्मी को भी बता देते हैं क्योंकि यह
प्रश्न तो प्रत्येक Text में आता ही है।
माया : मम्मी ! आप ही जाओ, मैं तो खेलने जा रही हूँ। - (माया खेलने चली जाती है उसकी मम्मी माया जैनी के घर जाती है।)
माया : गुणवती बहनजी ! लो मुँह मीठा कर लो, काया first आई है। बुरा न मानो तो एक बात कहूँ
बहनजी ! आप जैनी को समझा दीजिए। फालतू में टीचर से क्यों उलझती है ? जान-बूझकर
गलत क्यों बोलती है ? छोटी सी बात के लिए first पोजीशन से रह गई।
गुणवती : बहनजी ! आप ही बताइए, मैं उसे क्या समझाऊँ ? ‘मांसाहार अच्छा है’ क्या उसे यह सिखाऊँ ?
माया : अरे बहनजी ! आप तो किन बातों में उलझ गई। बोलने से कोई मांसाहारी होता है क्या ? वो
तो मात्र परीक्षा में बोलना है, खाना थोड़े ही है ?
गुणवती : नहीं बहनजी, अभी आप समझ नहीं पा रही हैं। परीक्षा में बोलने के लिए उसे वह वाक्य याद
कराना पड़ेगा, लिखाना पड़ेगा। आप तो यह जानती ही हैं कि बाल मन कोरे स्लेट के समान
है, उस पर प्रथम बार जो लिखा जाता है वह जीवन भर के लिए अमिट छाप छोड़ जाता है।
बचपन के संस्कार बड़े होकर फलदायी होते हैं। यदि बचपन में ही ये मांसाहार और हिंसा को
अच्छा समझने लगे तो बड़े होकर वे मांसाहारी और हिंसक प्रवृत्ति के हो जाएंगे। हमें इन्हें अभी
से ही समझाना होगा। सही बात सिखानी होगी।
माया : आपकी बड़ी-बड़ी बातें मेरे समझ में नहीं आती, आप ठहरी ज्ञानी। मैं तो इतना जानती हूँ कि
जो बच्चा क्लास में first आए बस। जब ये बड़े होंगे, समझदार होंगे, तो अच्छा-बुरा वे खुद समझ
लेंगे। अच्छा अब मैं चलती हूँ। सबका मुँह मीठा कराना है। अभी सभी गार्डन में मिल जाएंगे।
1
2
गाईड में
(गाईड में 7-8 महिलाएँ बैठी हैं। दूर से माया को आते देखकर एक कहती है -)
चंचल : देखो ! देखो !! वो आकाशवाणी भली आ रही है, लगता है कुछ नई खबर है।
मीनी : आज तो हाथ में मिठाई का डिब्बा भी है, कुछ कुछ समाचार है।
मीनी : चुप चुप ! वो पास में आ गई है। (सभी चुप हो जाते हैं। माया के पास आने पर)
चंचल : क्यों बहनजी ! बहुत प्रसन्न नजर आ रही हो, आज कुछ खास खबर है क्या ?
माया : लो बहनों आप सब तो मुंह मीठा करो, मेरी गुड़िया first आई है।
छाया : गुणवंती बहनजी को आ जाने दो; फिर सब साथ में खाएंगे, आती ही होगी वे।
माया : मैं उन्हीं के पास से तो आ रही हूँ। जैसी Second आई, उसे तो समझती नहीं, उल्टा मुझ से
ही कहने लगी गुड़िया को समझाओ। अरे बाबा ! जो first आया उसे मैं क्या समझाऊँ
, क्यों समझाऊँ ? अभी जल्दी है, मैं जाती हूँ।
मीनी : (माया के जाने पर) अजी ! ये माया जी है। इनके मन में कुछ होता है, कहती कुछ है, करती
कुछ और ही है। वे अपने नाम के अनुरूप है। सार्थक करती है अपने नाम को।
मीनी : देखो ! देखो !! वो गुणवंतीजी आ रही है, वे ही असली बात बताएंगी।
चंचल : बहनजी, क्या बात है ? मायाजी से आपका कुछ टकरार हो गया क्या ?
गुणवंती : नहीं ऐसी कोई बात नहीं।
छाया : तो फिर…
गुणवंती : देखो ! बात गंभीर है, हम शाकाहारियों के लिए महत्वपूर्ण भी, अतः मैं तुम सभी का ध्यान इस
ओर दिलाना चाहती हूँ। हमारे बच्चों को स्कूल में Egg, fish और Meat को Good food
लिखाया जाता है। …
ध्वनि : (बात बीच में ही रोककर) है ! हमें तो यह पता ही नहीं है। हमें अंग्रेजी आती नहीं। ट्यूशन
टीचर आती है और बच्चों को पढ़ा जाती है। हमें तो कुछ आता नहीं, हम क्या करें ?
मीनी : हम तो खुद पढ़ाते हैं, फिर भी हमारा ध्यान कभी गया ही नहीं।
चंचल : बात तो आपकी सही है, पर स्कूल में जिसे good करें, हम bad करें बच्चे कन्फ्यूज हो
जाएंगे।
गुणवंती : नहीं बहनजी, यही बात तर्कपूर्वक समझाने से बच्चे कन्फ्यूज नहीं होते है बल्कि वे अपनी बात
पर दृढ़ रहते हैं। मेरी बेटी को ही लो, टीचर के तर्क उसको egg, fish और Meat को Good
food नहीं कहला सके। वह उन्हें bad food ही कहती रही।
ध्वनि : आप ज्ञानी है, आपने संस्कार दे दिए, हम क्या करें ?
गुणवंती : आप उन्हें सदाचारी, अहिंसक, शाकाहारी संस्कारों के लिए रात्रिकालीन पाठशाला में भेजें, वहाँ
गुरुजी सब सिखा देंगे।
सभी : (एकसाथ) ठीक है ! ठीक है !! आज से हम सब भी अपने बच्चों को भेजेंगे पाठशाला।
3
गलती किसकी?
(रंग-बिरंगी पोशाकों में 5 से 8 साल तक के बच्चे अपनी-अपनी मम्मी के साथ बस स्टॉप पर खड़े हैं इतने
में प्रेरणा दीदी आकर बच्चों से बातें करने लगती हैं -)
प्रेरणा : क्या बात है ? आज न स्कूल यूनीफार्म न बैग, पिकनिक जा रहे हो क्या ?
बच्चे : नहीं दीदी ! आज क्रिसमस पार्टी है। दीदी, दीपावली पर भी इतना मजा नहीं आता जितना
आज।
मोदू : हाँ, हाँ ! मुझे भी क्रिसमस बहुत अच्छा लगता है। ढेरों-ढाई कुक नहीं, बस मजे ही मजे।
मोदू : आज तो क्रिसमस बाबा आएगा, गिफ्ट मिलेगा, चॉकलेट मिलेगी और…
मीठी : (छोटे बच्चे बीच में ही) केक मिलेगा।
चितवन : अरे मोदू ! मेरी अकल भी मीठी। क्रिसमस बाबा नहीं कहते हैं, उसे तो सांताक्लोज बोलते हैं,
सांताक्लोज। (शांत से) मीठी ! माना तुझे मीठी चीज पसंद है, पर केक मत खाना, उसमें Egg
होता है Egg।
मीठी : तो क्या हुआ ? Milk के समान Egg भी good food है।
चीनी : हाँ, हाँ ! हमें Teacher ने सिखाया है Fish, Meat, Egg and Milk are good food.
दीदी ! लगता है, आप कॉलेज आकर सब भूल गई।
जैनी : ओहो ! मीठी !! तुम दोनों अभी छोटी हो, तुम्हें पता नहीं है। Egg good food नहीं है।
हम उसे नहीं खाते। मम्मी से पूछ लेना।
मीठी : जैनी ! अभी से क्या पूछना ? मम्मी ही तो हमें सब कुछ Learn कराती हैं। देखो, मैंने Book
में 10 Time लिखा भी है, मम्मी ने करेक्शन भी किया है, गलत होता तो मम्मी काट देती।
चीनी : हाँ, हाँ ! मम्मी और टीचर गलत नहीं हो सकती। हम तो खाएंगे केक।
मनन : दीदी ! तुझे मालूम है Egg नॉन वेजेटेरियन है, हम तो वेजेटेरियन है, Egg नहीं खाते हैं। पर
केक तो Eggless भी आते हैं। इसलिए मैं तो स्कूल में पूछकर ही केक खाता हूँ।
प्रेरणा : तो क्या वे कहते हैं कि Eggless है ?
मनन : नहीं, वे कहते हैं - पता नहीं Eggless ही होगा। तुम तो खाओ, बच्चों को सब चलता है।
मैने खाया तो, घर जैसा ही लगता है।
प्रेरणा : मनन ! हमें जिस चीज के बारे में शक हो, वह नहीं खाना चाहिए।
प्रेरणा : दीदी ! क्यों ?
प्रेरणा : मनन लो तुम्हें किसी चीज में शक हो कि इसमें जहर है, तो खा लोगे क्या ?
मनन : नहीं, कभी नहीं।
प्रेरणा : बस यही बात यहाँ भी है।
चितवन : दीदी ! आप सही कह रही है। स्कूल का केक Egg वाला ही होता है, क्योंकि वह पासवाली
बेकरी से ही आता है और Eggless केक तो वहाँ बनता ही नहीं है।
मनन : है ! है ! सही कह रही है। अरे बाबा काम पकड़े। अब स्कूल में केक कभी नहीं खाऊँगा।
4
प्रेरणा : ठीक है, ठीक है। पर तुम जरा चीनी, मीठी की मम्मी को भी कह देना क्योंकि वे दोनों मम्मी
के अलावा किसी की मानने वाली नहीं हैं। अब मैं चलूँ। मेरी बस आ गई।
बच्चे : दीदी ! हमारी भी बस आ गई। (सभी चले जाते हैं)
लिफ्ट में
(सब बच्चों की मम्मी लोटों हुए लिफ्ट में)
टीना : बहनजी सुना आपने बच्चों की बातों की ?
मीना : हाँ, हाँ सुना। कैसे अंडे को शाकाहारी कह रहे थे ?
मीना : हमारे ये नन्हे-मुन्ने हमारी ही छोटी सी भूल के कारण अभी से ही मांसाहार की पैरवी
करने लगे हैं। हमें उन्हें अभी से संस्कार देने ही होंगे।
जीना : गुणवंती बहनजी कल कह रही थी, आज उसका हमें प्रमाण भी मिल गया।
टीना : बच्चों के लिए तो हम माँ-बाप का कहना भगवान से भी बढ़कर होता है। माँ के सामने तो
वे किसी की सुनते ही नहीं हैं। अब हमें सावधान होना चाहिए।
गुंज : अब हमें उन्हें घर में भी संस्कार देने होंगे तथा साथ ही साथ जैनी के साथ उन्हें भेजना होगा
पाठशाला।
5
क्या है धर्म?
(पाठशाला का दृश्य)
गुरुजी : बच्चों ! तुम पाठशाला क्यों आए हो ?
बच्चे : (एक साथ) धर्म पढ़ने।
गुरुजी : धर्म का मतलब जानते हो ?
गरम : हाँ, कर्तव्य को धर्म कहते हैं।
नाम : Relegion को धर्म कहते हैं जैसे - जैन धर्म, बौद्ध धर्म आदि।
देशना : (अभिमान पूर्वक) जैन दर्शन में तो धर्म एक तत्व है।
प्रयोय : गुरुजी ! प्रवचन में तो पंडितजी वस्तु के स्वभाव को धर्म कह रहे थे।
गरम : तुम सब चुप हो। सब उल्था - सीधा कहे जा रहे हैं। गुरुजी ! आप ही बताइए।
गुरुजी : नहीं बेटा ! सबने सही कहा है। अलग-अलग दृष्टिकोण से धर्म शब्द भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयुक्त
होता है।
विवेक : वस्तु का स्वभाव जो है सो है, वह धर्म कैसे होगा ?
गुरुजी : वस्तुस्वरूप समझने से डर समाप्त हो जाता है, निर्भयता आ जाती है और हम सच्चे सुखी हो
सकते हैं।
करण : गुरुजी ! मैंने कल एक Book में पढ़ा था कि - ‘आत्मा का ध्यान ही धर्म है’ - सो कैसे ?
गुरुजी
आज तक जितने जीवों को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई है, सभी को आत्मा का ध्यान करते - करते ही हुई है, अतः आत्मा का ध्यान ही धर्म है।
नम
आत्मा का ध्यान करने के लिए क्या करना चाहिए ?
गुरुजी
आत्मा का ध्यान करने के लिए सबसे पहले आत्मा को जानने - पहिचानने का प्रयास करना चाहिए।
माम
गुरुजी ! आत्मज्ञान और आत्मध्यान ही आत्मा के सहज धर्म हैं, क्योंकि आत्मा का स्वभाव जानना है, ज्ञान है।
गम
जो स्वभाव है उसमें करना क्या है ? वैसे - पानी को शीतल रहने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता, वह तो उसका स्वभाव है।
गुरुजी
देखो बेटा ! ज्ञान का स्वभाव स्व-पर प्रकाशक है। हमारा जो ज्ञान पर को जानने में लगा है उसकी दिशा मोड़ना है, स्व में लगाना है, अपने को जानना है। अपनी आत्मा को जानना ही सहज धर्म है। धर्म की साधना के लिए एक मात्र निज - आत्मा का जानना ही सार्थक है। पर में अपनापन अधर्म है, अपने में अपनापन ही धर्म है।
लब्धि
गुरुजी ! जैन धर्म वीतरागी धर्म कैसे है ?
गुरुजी
जैन धर्म में वीतरागता पर सबसे पहले अधिक बल दिया गया है। जब कोई अरहंत भगवान बनता है, तो सबसे पहले वीतरागी होता है, उसके बाद सर्वज्ञ और हितोपदेशी।
ज्ञान
इसका मतलब तो यह हुआ कि वीतरागी हुए बिना सर्वज्ञता संभव नहीं।
गुरुजी
हाँ, सही समझा तुमने।
अपूर्व
यदि भगवान वीतरागी है तो फिर हमारी इच्छा कैसे पूरी करेंगे ? दुखों से कैसे बचाएँगे ?
विवेक
अरे ! तुझे इतना भी नहीं पता। हमारे भगवान दुखी से बचाते भी नहीं हैं, न ही किसी की इच्छा ही पूरी करते हैं। वे कुछ नहीं करते। वीतरागभाव से मात्र जानते - देखते हैं।
सिद्धि
हमारे भगवान वीतरागी हैं, हम वीतरागता के उपासक हैं। इसीलिए तो हमारा धर्म वीतरागी धर्म है।
सर्वज्ञ
गुरुजी ! माँ कहती थी कि भगवान सच्चे सुखी हैं। पर कैसे ? जब वे पैदा होते हैं, मरते हैं ; तो फिर जन्म - मरण का दुःख उन्हें हुआ न।
लब्धि
माँ तो यह भी कह रही थी कि - उन्हें भूख - प्यास नहीं लगती, वे कुछ खाते - पीते भी नहीं, फिर गणपति ने दूध कैसे पिया ?
गुरुजी
देखो बच्चों ! भगवान जन्मते नहीं, बनते हैं। जैसे - जन्म तो बालक वर्द्धमान का हुआ था, जब उन्होंने पुरुषार्थ किया, तब ही वे भगवान बने। अभी तुम सब सुनी - सुनाई बातें कर रहे हो। कल से हम भगवान के स्वरूप के बारे में समझेंगे। भगवान किसे कहते हैं ? वे कैसे बनते हैं ? … आदि … आदि। जब तुम भगवान का सही स्वरूप समझोगे तो तुम्हारी समस्त शंकाओं का समाधान हो जाएगा। जय जिनेन्द्र।
सभी छात्र
जय जिनेन्द्र।
6
स्टडी में
(पाठशाला से वापिस लौटकर स्टडी रूम में बातें करते हैं -)
लब्धि
भैया ! यह तो ठीक है कि हमारा धर्म वीतरागी धर्म है, पर वीतरागी से मतलब क्या है ?
कंचन
जो राग - द्वेष - मोह से रहित हो उन्हें वीतरागी कहते हैं।
लब्धि
राग - द्वेष - मोह किसे कहते हैं ?
करण
रोज पाठशाला आओगी और के. जी. भाग 1 - 2 - 3 पढ़ोगी तो सब सीख जाओगी।
लब्धि
हाँ बाबा हाँ ! कह दिया ना अब जाऊँगी मैं रोज पाठशाला।
7
किसे करें नमस्कार ?
(सभी उम्र के बच्चे पाठशाला में आते हैं। वे मंदिर के आँगन में मिलते हैं और एक दूसरे को जय - जिनेन्द्र बोलते हैं।)
आत्मन
जय - जिनेन्द्र, सिद्धांत।
सिद्धांत
जय - जिनेन्द्र, आत्मन।
भव्य
चलो, पाठशाला में चलने से पहले हम दर्शन करलें।
(सभी बच्चे दर्शन करने जाते हैं)
जिनेन्द्र
(मस्ती में) जिनेन्द्र की जय हो।
परमात्मा
(गंभीरता से) नहीं, जिनेन्द्र नहीं। वे परमात्मा हैं, अतः परमात्मा की जय हो।
जिनेन्द्र
देखो ! परमात्मा बन गए हैं, सो जिनेन्द्र को ही नमस्कार करते हैं, किसी परमात्मा को नहीं, ईश्वर को भी नहीं। हिन्दुओं में ईश्वर की पूजा की जाती है, जो जगत के कर्ता - धर्ता - हर्ता होते हैं। हम तो अकर्तावादी हैं। हमारे भगवान कुछ नहीं करते हैं, मात्र जानते - देखते हैं।
अंबाला
देखो जिनेन्द्र ! परमात्मा सही कह रहा है। जो परमपद में स्थित होते हैं उन्हें परमात्मा कहते हैं। हमें परमात्मा बनना है, अतः हमें परमात्मा की जय सबसे पहले बोलना चाहिए।
शुद्धात्मा
अध्यात्मजी ! जय तो सबसे पहले अपनी बोलना चाहिए, जिसके कारण परमात्मा बनते हैं, जिसके आश्रय से परमात्मा बनते हैं, जिसके ध्यान से परमात्मा बनते हैं - और वो है शुद्धात्मा, जो है कारण परमात्मा। इसलिए सबसे पहले उस शुद्धात्मा की ही जय बोलो। कहा भी है -
मुह गोहिउ दोऊ खंडे करिऊ लागु पाय।
बलियारी गुरु आपने गोहिउ दियो दिखाय॥
अरहंत
तुम सब व्यर्थ झगड़ रहे हो। तुम्हें कुछ नहीं पता। कल गुरुजी ने पढ़ाया था कि ये सब अरहंतों की मूर्तियाँ हैं। इन्होंने चार घाति कर्मों को नष्ट किया है, अतः अरहंतों की जय हो।
सिद्धांत
हमारा सिद्धांत तो यह है कि जिनके आठों कर्म नष्ट हो गए हैं ऐसे सिद्ध भगवानों की ही सबसे पहले जय बोलना चाहिए।
6
भव्य
(गर्भ के साथ) देखो ! हम जैनों की मूर्तियाँ चिह्नों से पहचानी जाती हैं। इन सभी मूर्तियों में नीचे एक-एक चिह्न होगा; जैसे - यदि बैल का चिह्न है तो वह तीर्थंकर आदिनाथ हैं, शेर का चिह्न है तो तीर्थंकर महावीर। ये धर्मतीर्थों का उपदेश देते हैं, इन्हें भी इनके सामने सिर नमाते हैं अतः सब मिलकर तीर्थंकरों की जय बोलो।
सिद्धि
मेरी मम्मी तो कहती हैं - ‘नहिं जाओ, भगवान के दर्शन करो’ - मम्मी कभी झूठ नहीं बोलती। अतः मैं तो यही मानती हूँ कि सब भगवान हैं, तीर्थंकर - तीर्थंकर कुछ नहीं। अब सब मिलकर भगवान की ही जय बोलो।
सर्वज्ञ
हाँ ! हाँ !! सही कहा सिद्धि तुमने ! सभी भगवान वीतरागी और सर्वज्ञ होते हैं, अतः सब मिलकर सर्वज्ञ की ही जय बोलो।
केवल
जो सर्वज्ञ होते हैं वे केवलज्ञान के धारी केवली कहलाते हैं। अतः सब मिलकर केवलज्ञान के धारी केवली की जय बोलो।
आराध्य
व्यर्थ में झगड़ रहे हो तुम सब। जिसका जो आराध्य देव हो, वह उसे नमस्कार करे। नामों में क्या रखा है ? सब एक से हैं, एक ही हैं।
मुक्ति
सही कहता है आराध्य। जो मुक्त है, वे ही आराध्य हैं।
भक्ति
अरे बाबा ! जिसे जिसकी भक्ति करना हो करे। हमें तो भक्ति से मतलब। क्या फर्क पड़ता है कि कौन है वो ? वह चाहे महेश हो या महावीर।
विवेक
अच्छा ! अपना माथा सड़ा नहियाँ है क्या ? जिसे चाहे जिसके सामने फोड़ दो; चाहे जहाँ नमा दो। तुम अभी नई-नई आई हो अतः तुम्हें कुछ पता नहीं। कुछ दिन पढ़ोगी तो सब समझ जाओगी।
गम
अरे बाबा ! झगड़ा मत करो। गुरुजी आ गए, उनसे ही सब पूछो ना।
अध्यात्म
तुम कौन हो, पहले कभी देखा नहीं।
गम
मेरा नाम गम है। मैं मम के साथ आज पहली बार आया हूँ।
भक्ति
नाम के अनुरूप तुम्हारा मिजाज भी गम है।
(गुरुजी प्रवेश करते हैं, सभी खड़े होकर जय - जिनेन्द्र बोलते हैं।)
सभी छात्र
(एक साथ) जय - जिनेन्द्र गुरुजी !
गुरुजी
जय - जिनेन्द्र (सभी बैठ जाते हैं)
जिनेन्द्र
गुरुजी ! हम सब जिनेन्द्र को मानते हैं न ! इसलिए अभिवादन में भी जय - जिनेन्द्र कहते हैं।
सिद्धि
नहीं, सब भगवान हैं।
अरहंत
नहीं अरहंत।
भव्य
नहीं तीर्थंकर।
परमात्मा
नहीं परमात्मा।
शुद्धात्मा
नहीं शुद्धात्मा।
करण
चुप हो जाओ सब। गुरुजी ! ये किसकी मूर्तियाँ हैं ? ये कौन हैं - तीर्थंकर या अरहंत, जिनेन्द्र या परमात्मा, सिद्ध या शुद्धात्मा ? मुझे तो लगता है कि ये सब अपने - अपने नामों की रैली कर रहे हैं और झगड़ रहे हैं। आप ही कुछ बताइए।
7
गुरुजी
गुरुजी : तुम्हें तो मैंने आज पहली बार देखा है। क्या नाम है तुम्हारा? (चारों तरफ निगाह दौड़ाकर) अरे! आज तो बहुत नए बच्चे हैं।
करम : गुरुजी! मेरा नाम करम है। मैं मरम का दोस्त हूँ। मेरे साथ यह मरम और वह नरम भी आया है। हम अजीब-अजीब बातें कह रहा था। हमें आपसे सब पूछना है।
गुरुजी : तुम्हारी शंकाओं का समाधान कल करेंगे। आज जो सब झगड़ा हो रहा था उसकी चर्चा कर लें। (कुछ सोचकर) अच्छा! तुम सब पहले मेरे सवाल का जवाब दो। बताओ! तुम सब अपनी माँ के क्या हो?
सभी : (एक साथ) बेटे, बच्चे।
गुरुजी : बड़ी बहन के?
सभी : (एक साथ) छोटे भाई - बहन।
गुरुजी : छोटे भाई के?
सभी : (एक साथ) बड़ा भाई, बड़ी बहन।
गुरुजी : दादा - दादी के?
सभी : (एक साथ) पोता - पोती।
गुरुजी : अरे! तुम तो एक हो, फिर अकेले ही तुम बेटा, बहन, भाई, पोता-पोती कैसे हो सकते हो?
सिद्धांत : गुरुजी! हम माँ - पिता के बेटे हैं, दादा - दादी के पोते और बहन के भाई। हम अलग-अलग नहीं हैं, हम तो एक ही हैं लेकिन अपेक्षा जुदी - जुदी है।
गुरुजी : बस, तुम सबके प्रश्न का यही जवाब है। जिनेन्द्र, परमात्मा, भगवान, अरहंत, केवली, सर्वज्ञ आदि सभी नाम अलग-अलग अपेक्षाओं से हैं। सभी तीर्थंकर अरहंत होते हैं, सभी अरहंत बाद में सिद्ध बनते हैं, इंद्रियों को जीतने से उन्हें जिनेन्द्र कहते हैं। वीतरागी, सर्वज्ञ होने से वे ही भगवान कहलाते हैं। परमानंद में स्थित होने से उन्हें ही परमात्मा कहा जाता है। वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी भगवान ही सच्चे देव हैं।
ज्ञान : गुरुजी! क्या देव भी दो प्रकार के होते हैं - सच्चे और झूठे?
गरम : तीर्थंकर कौन होते हैं? वीतरागी सर्वज्ञ किसे कहते हैं?
गुरुजी : बेटा! इन सभी के बारे में तुम कल से अपनी-अपनी क्लास में विस्तार से पढ़ोगे। आज समय बहुत हो गया है। कल से समय पर आना। जय - जिनेन्द्र।
सभी : (एक साथ) जय - जिनेन्द्र। (सभी चले जाते हैं।)
8
हँसी में
चेतन : विवेक! अपनी-अपनी क्लास से गुरुजी का क्या मतलब था? हमारी तो एक ही क्लास है।
विवेक : आज बहुत नए-नए बच्चे आए हैं। हो सकता है कल गुरुजी अलग-अलग क्लास कर दें।
अरहंत : हाँ, हाँ। यही बात है। अभी तक तो हम सभी एक ही उम्र के थे, एक ही भाग पढ़ते थे अब इन सभी को तो प्रारंभ से जैनदर्शन सिखाना होगा।
भव्य : अज्ञान लगाने की क्या जरूरत है? कल जो होगा, वो देख लेना। चलो अभी तो सामने से वास्तव
9
की फौज आ रही है। उसे भी हम अपनी पार्टी में मिलाने की कोशिश करते हैं, जिससे वे भी कल से हमारे साथ आगे पाठशाला।
मरम : ओए हर्ष! कहाँ से आ रहे हो तुम?
हर्ष : और कहाँ से आऊँ हम। सिनेमा गए थे सिनेमा। क्या मस्त कॉमेडी थी। चलो तुम्हें भी दिखा दें।
वास्तव : ये पाजामा - कुर्तावाले तो सब पाठशाला जाएंगे पाठशाला और हमें भी कहेंगे चलो पाठशाला।
हर्ष : और हम कहेंगे चलो सिनेमा। (सब हँसते हैं और चले जाते हैं)
9
हमारा संकल्प
(पाठशाला में छोटे-बड़े सभी उम्र के बच्चे उपस्थित हैं)
गुरुजी : बच्चों! मैं अभी तुम्हारे सामने हमारा संकल्प पढूँगा। अतः सब ध्यान से सुनना।
सभी : (एक साथ) जी गुरुजी।
गुरुजी : ॐ शांति, शांति, शांति। मैं ज्ञान स्वरूपी जीव हूँ, ज्ञान जैसी अनंत शक्तियाँ मुझमें हैं। मेरी शक्तियाँ दिव्य हैं, इन शक्तियों से मैं सुखी हो सकता हूँ। बस मुझे अपनी शक्ति को जानना है, पहचानना है, प्रगट करना है। मैं ज्ञान प्राप्त करने आया हूँ, ज्ञान प्राप्त करके ही उठूँगा। मैं सुख की खोज में आया हूँ, सुख खोजकर ही रहूँगा। अच्छा अब बताओ - हम कौन हैं?
बच्चे : (एक साथ) जीव।
गुरुजी : हम क्या प्राप्त करने आए हैं?
बच्चे : (एक साथ) ज्ञान।
गुरुजी : ज्ञान प्राप्ति के लिए क्या करना है?
बच्चे : (एक साथ) ध्यान।
गुरुजी : मंदिर और पाठशाला में क्या नहीं करना चाहिए?
बच्चे : (एक साथ) सांसारिक काम।
गुरुजी : सांसारिक काम के निषेध को एक शब्द में क्या कहते हैं?
बच्चे : (एक साथ) निःसहि, निःसहि, निःसहि।
गुरुजी : पाठशाला में क्या करेंगे?
बच्चे : (एक साथ) ज्ञान करेंगे, ध्यान करेंगे।
गुरुजी : तो हमारा संकल्प क्या है?
बच्चे : (एक साथ) हम ज्ञान प्राप्त करने आए हैं, ज्ञान प्राप्त करके ही जाएँगे।
गुरुजी : शाबाश बच्चों! बहुत अच्छा बोले। अब आप सभी में जो बच्चा जिस क्लास में पढ़ता है वह उसी नम्बर के रूप में जाएगा - जैसे जो सातवीं में पढ़ता है वह सात नम्बर के कमरे में जाएगा।
करम : (धीरे से) गुरुजी ऐसा करेंगे तो फिर एक क्लास में ४ - ५ बच्चे ही होंगे।
मरम : चार - पाँच बच्चों में क्या मजा आएगा, मस्ती कैसे मारेंगे?
नरम : यार नहीं, अभी गुरुजी ने क्या संकल्प कराया था, हम यही ज्ञान प्राप्त करने आए हैं, मस्ती मारने नहीं। छोटे-छोटे बच्चों के साथ यदि गुरुजी हमें पढ़ाएँगे तो हमारा Time waste होगा।
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गुरुजी : मरम, नरम आपस में बात मत करो। मेरी बात ध्यान से सुनो। कक्षा 8 वालों को जैन नर्सरी पढ़ा पड़ेगी। (सभी हँसने लगते हैं) शांत हो जाओ। मैं तुम्हारी हँसी का कारण समझ रहा हूँ। अच्छा पहले मेरे कुछ सवालों का जवाब दो। अ, आ, इ, ई कब सीखते हो।
बच्चे : (एक साथ) 6 - 7 साल में।
गुरुजी : (हँसते हैं) है न! अ, आ, इ, ई तो छोटे-छोटे सीखते हैं, तुम इतने बड़े होकर …
गरम : गुरुजी! इसमें हँसने की क्या बात है? हमको हिन्दी पढ़ाई ही कक्षा 3 में जाती है। कटिंग में तो यह सब सीखना ही होगा।
गुरुजी : सही कहा है तुमने। जैन दर्शन भी तुम अभी इस उम्र में सीखने आए हो तो जैनदर्शन की A. B. C. D तो तुम्हें सीखनी ही होगी। मैंने इसलिए नए बच्चों का उम्र के हिसाब से विभाजन किया है कि बड़े बच्चे आधुनिक पुस्तक रीति तैयार कर लेंगे और छोटे बच्चों को समय लगेगा। देखो बेटा! हमारा कोर्स निश्चित है, जितने जितने भाग पढ़ लिए हैं, वे आगे के भाग पढ़ेंगे किन्तु जो नए आए हैं वे आरंभ से कोर्स पढ़ेंगे। जो बच्चा जितनी जल्दी झुक याद कर लेगा उसकी परीक्षा लेकर उसे आगे के भाग में भेज दिया जाएगा। नर्सरी, के. जी. भाग - 1, 2, 3 की कक्षा क्रमशः विवेक, ज्ञान और भव्य लेंगे तथा बालवोध भाग - 1, 2, 3 की कक्षा क्रमशः चेतना, भावना।
कालू : (बीच में) है! हमारी ही सहपाठी हमें पढ़ाएँगे।
गुरुजी : देखो बेटा! जैन दर्शन की ये छोटी-छोटी पुस्तकें पढ़ाने की एक विधि है। इसे पढ़ाने को टीचर्स ट्रेनिंग होती है। जो बच्चे उस ट्रेनिंग को पास कर लेते हैं, वे सभी पढ़ा सकते हैं।
गरम : तो क्या मैं भी पढ़ा सकता हूँ?
गुरुजी : हाँ हाँ पढ़ा सकते हो, पर पहले पाठशाला में बालवोध भाग - 3 तक का कोर्स पूरा करो, फिर गर्मी की छुट्टियों में टीचर्स ट्रेनिंग लो।
मरम : हम तो फटाफट बुक तैयार कर लेंगे। अन्य बच्चे नहीं कर पाए तो …
गुरुजी : (बीच में) तुम मेरी बात ध्यान से सुनी नहीं। मैंने कहा है कि यही स्कूल जैसी पढ़ाई नहीं होती। यहाँ तो जो बच्चा जितनी जल्दी बुक तैयार करेगा, उसे उतनी जल्दी परीक्षा लेकर आगे क्लास में भेज दिया जाएगा। विवेक को देखो। उसने 4 किताबें 3 माह में तैयार कर ली थी। नम्बर भी अच्छे आए थे।
सभी : ठीक है गुरुजी! हम भी ऐसा ही करेंगे। पर हमें कुछ पूछना हो तो …
गुरुजी : हर माह में एक बार हम सब साथ-साथ मिलेंगे। सभी अपनी-अपनी शंकाएँ नोट करना और जो कुछ मुझसे पूछना हो पूछ लेना। एक माह में तुम लोगों ने क्या सीखा? उसकी परीक्षा भी हो जाएगी।
सभी : ठीक है गुरुजी! हम सब मन लगाकर पढ़ेंगे और इस बार टीचर्स ट्रेनिंग में बैठ कर ही रहेंगे।
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पाठशाला में
(सब बच्चे अपनी क्लास में पहुँचकर एक-दूसरे से बात करते हैं -)
नरम : ये गुरुजी बहुत सरल ढंग से समझाते हैं। एक बार में याद हो जाता है।
कालू : अच्छा याद हुआ तो बता - इसे भगवान सुखी है …
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प्रश्नोत्तर
नरम : जैसे हमें भी सुखी होना है।
कामु : जैसा ज्ञान भगवान ने ग्राम किया..
नरम : वैसा ज्ञान मुझे भी पाना है।
कामु : एक बात मेरा ज्ञान और ध्यान में क्या अंतर है।
नरम : जानना ज्ञान है और जानते रहना ध्यान है। अच्छा बताओ हम पाठशाला क्यों आए हैं?
सभी : (एक साथ) हम ज्ञान प्राप्त करने आए हैं पाठशाला।
नई भूल
(पाठशाला का दृश्य)
गुरुजी : जो वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी होते हैं उन्हें सच्चा देव कहते हैं।
भव्य : गुरुजी ! स्वर्ग के देव तो झूठे देव हुए क्योंकि वे तो वीतरागी, सर्वज्ञ नहीं हैं।
गुरुजी : बेटा ! देव सच्चे और झूठे नहीं होते। सच्ची और झूठी हमारी मान्यता होती है। स्वर्ग के देव होते
हैं अतः वे सद हैं, रागे के संग के समान असत् नहीं।
भव्य : यह सत् और असत् क्या बला है?
गुरुजी : सत् अर्थात् सच्चा। असत् अर्थात् असच्चा। स्वर्ग के देवों का अस्तित्व है, सत्ता है और रागे के
संग नहीं हैं अतः असत्ता है। स्वर्ग के देवों को सच्चे देव मानना, उन्हें अष्ट द्रव्य से पूजना -
यह हमारी मान्यता का दोष है विपरीत श्रद्धान है, मिथ्यात्व है।
ज्ञान : स्वर्ग के देव को सब देवता मानते हैं, भगवान तो कोई नहीं मानता, सच्चा देव कोई नहीं मानता।
भव्य : तुझे क्या पता कोई मानता है कि नहीं! गुरुजी कह रहे हैं तो कोई - न - कोई मानता ही होगा।
ज्ञान : मैं नहीं मान सकता। इतना बुद्धू कोई नहीं है जो देवता को भगवान माने। सब जानते हैं भगवान
वीतरागी, गुण जीव हैं, देवता तो हम-तुम जैसे रागी-द्वेषी हैं, संसारी हैं। उन्हें कौन भगवान मानेगा?
विवेक : ज्ञान ! तुम कैसी बातें कर रहे हो? अकेले तो सभी भगवान को कर्ता, धर्ता, हर्ता मानते हैं।
ज्ञान : अज्ञानी की बात जाने दो। जैन तो भगवान को अकर्ता मानते हैं, ज्ञाता-दृष्टा मानते हैं, वीतरागी
मानते हैं। वीतरागी को भगवान मानने वाला कोई भी विवेकी रागी - द्वेषी स्वर्ग के देवों को पूज्य
नहीं मान सकता।
गुरुजी : तुम सही कह रहे हो कोई भी विवेकी ऐसा नहीं मान सकता; पर धर्म के मामले में हम जाग्रत
विवेकी वाले कहीं रह गए हैं? धर्म के क्षेत्र में अभी हम अंधविश्वासी, रूढ़िग्रस्त ही हैं। कभी
किसी ने अज्ञानवश कोई गलत परंपरा चला दी तो उसे ही हम आँख बंद कर स्वीकृत कर लेते
हैं। तर्क की तुला पर कहीं कसते हैं और इस तरह ही नई - नई भूलें करते रहते हैं। इस मनुष्य
भव की हमारी नई कमाई है यह। इसे ही गृहीत मिथ्यात्व कहते हैं।
ज्ञान : फिर भी …
गुरुजी : एक काम करो। दो दिन तुम इस पर शांति से विचार करो, अपने आस-पास नजर रखो और
देखो कहीं कोई ऐसी नई भूल तो नहीं कर रहा है? यदि तुम्हें कोई नजर न आए तो मुझसे चर्चा
करना। आज समय हो गया है। जय जिनेंद्र।
मंदिर में मंदिर
(पाठशाला के बाहर आकर ज्ञान मंदिर में दादा - दादी के पास जाता है-)
दादा : बेटा! चलो दर्शन कर लें।
दादी : हाँ, हाँ चल। आज धरणेन्द्र - पद्मावती को माथा नहीं टेका।
ज्ञान : ये धरणेन्द्र - पद्मावती कौन हैं? भगवानों के नामों में तो इनका कहीं नाम नहीं है।
दादी : पगले! धरणेन्द्र - पद्मावती भगवान थोड़े ही हैं। ये तो भगवान के सेवक देवी - देवता हैं। जब पूर्व
भव के वैरी कमठ के जीव संवर नामक देव ने भगवान पार्श्वनाथ पर उपसर्ग किया था, तब धरणेन्द्र
- पद्मावती ने भगवान को उपसर्ग से बचाया था। भगवान के रक्षक थे ये। भगवान करे वे हमारी
भी रक्षा करें।
(बात करते-करते सभी मंदिर में देवी के पास पहुँच जाते हैं) चलो, चलो। ज्ञान पहले माथा
नवाओ, बातें बाद में करेंगे।
ज्ञान : दादी! आपको तो पता है न मैं बिना समझे कुछ नहीं करता, पहले मुझे बताओ! तीन लोक का
नाथ कौन है?
दादी : भगवान।
ज्ञान : भगवान बड़े हैं या स्वर्ग के देव।
दादी : अरे! ये कैसा प्रश्न है? भला भगवान से भी बड़ा कोई होता है?
ज्ञान : तो फिर एक छोटा सा देव भगवान पर उपसर्ग करे, दूसरा बचाए - यह कैसे संभव है।
दादी : तू तो बस बात पकड़ता है, बहस करता है। यह बहस पाठशाला में गुरुजी से करना। यह बात
मुझे नहीं पता। अभी जल्दी दर्शन कर और घर चल।
दादा : देखो! बच्चा जब कुछ समझना चाहता है तो उसे अभी बता दो।
दादी : समझना मुझे नहीं आता, आप ही इसे समझाइए।
दादा : (मन में) अच्छा मौका है। जो बात मैं जिंदगी भर इसे समझा न सका शायद पोता को समझाने
के बहाने वह समझ जाए। (प्रगट में) हाँ, हाँ मैं ही समझा देता हूँ; पर तुम भी ध्यान से सुनना
देखो बेटा! भगवान के ऊपर उपसर्ग नहीं होता। उपसर्ग पार्श्व मुनिराज पर हुआ था। जब पूर्व
भव के वैरी एक देव ने पार्श्व मुनिराज पर उपसर्ग किया तब अन्य दो मित्रों ने उन्हें बचाने का
विकल्प किया था …
ज्ञान : (अपनी धुन में मस्त बात बीच में ही काटकर) पर इससे ये रागी - द्वेषी देव पूज्य कैसे हो गए।
हम तो वीतरागता के ही पूजक हैं।
दादी : (बात टालने के लिए) हम पूजा कहीं कर रहे हैं? दर्शन कर रहे हैं।
ज्ञान : दादी माँ ! पूजन के समान दर्शन भी वीतरागी भगवानों के ही होते हैं, रागियों के नहीं। देखो
दादी! जैसे हम मनुष्य गति के जीव हैं, वैसे ही ये देव गति के। उन देवों के इन्द्र भी जिन
भगवानों के चरणों में मस्तक नवाते हैं - ऐसे वे स्वर्ग के देव भगवान जैसे पूज्य कैसे हो सकते
हैं? (मन में) गुरुजी सही कह रहे थे। स्वर्ग के देव को सच्चादेव मानने की भूल का एक
मूल में भूल
(सोपानबद्ध में बच्चे खेलने के लिए मिलते हैं। सभी एक बच्चा पूछता है-)
अपूर्व : श्रेया! देव के समान शाश्वत भी सच्चे हैं?
लक्ष्य : (शान से) हाँ! हाँ!! होते हैं! गुरुजी प्रतिदिन प्रार्थना कराते हैं, याद नहीं है क्या?
सच्चे देव की जय - जय - जय, सच्चे शास्त्र की जय - जय - जय।
सच्चे गुरु की जय - जय - जय, वीतराग धर्म की …।
अपूर्व : (बीच में ही) बस, बस। यूँ रटने दे। तुझसे किसने पूछा? अच्छा, तुझे सब आता है तो बता
शास्त्र किसे कहते हैं?
चीनी : अरे! यह भी कोई पूछने की बात है। मंदिरजी में एक आला (कपाट) में सजी - धजी एक पोथी
रखी रहती है, जिसे हम रोज प्रणाम करते हैं, वही शास्त्र है।
मनन : यदि मैं अपनी स्कूल की बुक सजा-धजा कर मंदिर में रख दूँ तो क्या वह शास्त्र हो जायेगा?
निद्धि : नहीं, नहीं। तो शास्त्र कैसे होगा? शास्त्र में तो धर्म की बातें होती हैं। पाप - पुण्य की बातें
होती हैं।
मीठी : सीधी सी बात है जिसमें बुरे काम का बुरा फल बताया जाए, वह शास्त्र है।
लक्ष्य : कभी पाठशाला तो आती नहीं और शास्त्र की बात कर रही है। अरे बदलूजी! बुरे काम का तो
बुरा फल तो हमारी किताबों में भी बताया जाता है।
चिंतन : हाँ, हाँ। हिंसा, झूठ, चोरी को तो सभी जगह बुरा ही बताया जाता है।
मनन : चिंतन! ऐसी बात नहीं है, कहीं - कहीं ज्ञान से बातें भी धर्म बताया गया है। क्या तुमने
सुना नहीं बुद्ध में बलि चढ़ाने से धर्म होता है। वह बलि हिंसा नहीं तो और क्या है?
अपूर्व : तुम लोगों ने तो उलझा दिया। ज्ञान भैया! आप ही बताइए कि - शास्त्र का सच्चा स्वरूप क्या है?
ज्ञान : सच्चे देव की वीतरागता की पोषक वाणी को शास्त्र कहते हैं। जिसमें तत्व का उपदेश होता
है।
अपूर्व : और सच्चे गुरु …
(मस्तक उठाते हुए हँसकर) अरे, इतना भी नहीं पता! स्कूल में पढ़ाते हैं वे टीचर और जो
लक्ष्य : पाठशाला में पढ़ाते हैं वे गुरुजी।
नहीं, जो बाहरी दुनिया की जानकारी देते हैं, वे शिक्षक होते हैं और जो हमें इस बात का
अपूर्व : अहसास कराते हैं कि हम कौन हैं? हम कैसे सुखी हो सकते हैं? - वे गुरुजी होते हैं।
(चिढ़कर) लक्ष्य! तो अपना ज्ञान मत झाड़। पाठशाला गए हुए तो दिन हुए नहीं और अपनी
टट्टी (घमंड) मारने लगी। सच्ची देव - शास्त्र के समान सच्चे गुरु भी अलग ही होते होंगे।
ज्ञाता : हाँ, हाँ। अलग ही हैं। पंचपरमेष्ठी में कहे गए आचार्य, उपाध्याय और साधु ही सच्चे गुरु हैं।
माया
(मजाक उड़ाते हुए) हो, हो! भाईयों! सुनो - जो नम्र रहे, वे ही इनके सच्चे गुरु हैं।
विवेक
(समझते हुए) माया! बिना विचारे किसी की मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। पहले अपनी मूल की भूल निकालो। सच्चे गुरु सदा आत्माध्यान, मध्याध्यान में लीन रहते हैं। उन्हें विषय-भोगों की इच्छा नहीं होती, स्वभाव परिग्रह नहीं होता इसलिए वे बाह्य परिग्रह कपड़े आदि से रहित होते हैं। भगवान की वाणी के मर्म को समझने वाले ऐसे तपस्वी आत्माध्यानी ही सच्चे गुरु होते हैं।
छाया
(कान पकड़कर) अच्छा बाबा! सॉरी, सॉरी। अब खेले बातें हो गई।
(सभी खेलने लगते हैं)
प्ले ग्राउन्ड में
(खेलने के पश्चात प्ले ग्राउन्ड में बच्चे आपस में बातें करते हैं -)
चीनी : माया! ये लोग रोज पाठशाला जाते हैं इसलिए हमसे छोटे होकर भी इन्हें बहुत बातें मालूम हैं।
मीठी : हाँ, तुम उनकी मजाक उड़ा रही थी। वही हमारी ही हँसी उड़ गई।
माया : हँसते-हँसते ही सही हमें अपनी मूल की भूल पता चली। अब हम भी आज से उनके साथ पाठशाला जाना चाहते हैं।
छाया : नहीं है, जबतक हम उनकी पूरी बात नहीं सुनेंगे, समझेंगे तो उनकी काट कैसे करेंगे? अभी बच्चों के मुख से थोड़ी - थोड़ी बातें सुनी और उन्हें अपनी तरफ मिलाने की कोशिश की, पर बात बनी नहीं। हमें भी उनके साथ बैठकर उनकी बात समझना चाहिए, तभी हम कुछ कर सकते हैं।
चीनी : ठीक है पर हम पाठशाला कैसे जाएँ? क्या हमारी इन्सल्ट नहीं होगी?
मीठी : वो बात तुम मेरे पर छोड़ दो मैं कोई समाजनायक तरीका निकाल ही लूँगी।
छाया : अच्छा तो यह तय रहा जीत के लिए हमें भी आज होगा पाठशाला।
सहज : हेऽऽम! नहीं, छाँटी जीत के लिए नहीं, अपितु हमें अपनी मूल की भूल निकालने के लिए जाना चाहिए पाठशाला।
छाया : एक ही बात है, जाना तो हमें पाठशाला ही है।
सहज : जी नहीं, एक ही बात नहीं है। उद्देश्य बदल जाने से देखने, जानने, सुनने का दृष्टिकोण बदल जाता है। यदि तुम मात्र जीतने के लिए पाठशाला जाओगी, तो वहाँ मात्र पहिचानों ही ढूँढोगी। पर यदि वहाँ भूल निकालने के लिए जाओगी तो कुछ - न - कुछ नया सीखोगी।
छाया : अच्छा बाबा बस! हम ज्ञान प्राप्त करने ही जाएँगे पाठशाला।
कौन हैं हम ?
(सब बच्चे मैदान में खेल रहे हैं, तभी निमित्त कहता है -)
निमित्त : चलो, विवेक! अब हम क्रिकेट खेलते हैं।
उपायन : अभी अपने पूरे साथी नहीं हैं, इतने कम बच्चों में कैसे खेलेंगे?
निमित्त : वास्तव की पार्टी मौजूद है, उन्हें ही बुला लेते हैं।
उपायन : वो हमारे साथ नहीं खेलेंगे।
निमित्त : कोशिश करने में क्या हर्ज है? पाठशाला भले न आओ हो, पर हमारे साथ खेल तो सकते ही हैं।
उपायन : तुम कहो तो वो चलो एकबार बात कर लेते हैं।
निमित्त : वास्तव! चलो आओ, क्रिकेट खेलते हैं। ( वास्तव कुछ सोचने लगता है )
विवेक : यदि तुम्हारी आत्मा गवाही न देती हो तो रहने दो।
वास्तव : आत्मा - फात्मा नामकी कोई चीज नहीं है। तुम हमेशा उसी की रट लगाए रहते हो। इसलिए हम तुम्हारे साथ खेलना पसंद नहीं करते।
विवेक : भाईसाहब! जिसे आप आत्मा - फात्मा कह रहे हैं वह और नहीं नहीं आप स्वयं हैं। आत्मा को फात्मा कहकर आप अपना ही अनादर कर रहे हैं। अपनी ही सत्ता से इंकार करना तो ऐसा हुआ जैसे कोई कहे कि - मेरी माँ वंध्या है। अजी भाईसाहब! वंध्या कहो तो उसे जिस के संतान न हो। तुम्हारे होते हुए तुम्हारी माँ वंध्या कैसे हो सकती है? इसी प्रकार जिस शक्ति के कारण तुम जानने - देखने हो, सुख - दुःख का अनुभव करते हो; उस शक्तिमय तुम हो। वह शक्ति ही आत्मा है।
वास्तव : भाईजी! कितनी बार कहूँ - मैं आत्मा नहीं, वास्तव हूँ, वास्तव! मैं आँख से देखता हूँ, कान से सुनता हूँ और मेरा शरीर सुख - दुःख का अनुभव करता है।
हर्ष : ( पीछे से उपमा देते हुए ) वाह, भाई वाह! क्या जवाब दिया है! विवेक की तो बोलती बंद हो जाएगी।
विवेक : माना तुम आँख से देखते हो, कान से सुनते हो पर आँख - कान तो सधूप हुए। इनके माध्यम से देखने - सुनने वाला कौन है? क्योंकि मात्र आँख - कान तो चश्मे के समान अपने आप देख - सुन नहीं सकते।
वास्तव : मैं और मेरा ज्ञान बस।
विवेक : जिसे आप मैं कह रहे हैं, मेरा ज्ञान कह रहे हैं - वही आत्मा है, वही जीव है। उसी की वजह से सारे जगत में जीवंतता है। यह सब बातें तुम अभी समझ नहीं सकते। ( अभी तुम्हारा काल नहीं पका है। चलो निमित्त चलो पाठशाला का समय हो गया। (विवेक और उसके सभी साथी चले जाते हैं) )
हर्ष : अरे वास्तव विवेक भी बात में दम तो है। सही तो कह रहा है वह। हम लोगों ने कभी इस दृष्टि से विचार ही नहीं किया।
वास्तव : खाक सही कह रहा है। तुम सब अभी चलो। मैं बाद में तुम्हें समझाऊँगा। विवेक तो बोलने का जादूगर है! तुम सब इसके मायाजाल से मोहित ही जाते हो।
टोनी : देखो वास्तव! वो जो कह रहा है वह सही है। यदि हम आँख से देखते, कान से सुनते तो मुर्दे को भी देखना - सुनना चाहिए।
जॉनी : भले ही हम नाम कुछ भी दें, उन हम आत्मा कहें या शक्ति, पर जो कुछ हमें दिखाई दे रहा है उससे अलग कोई ऐसी दिव्य शक्ति है जिसे हम देख नहीं सकते, महसूस कर सकते हैं।
टोनी : विवेक रहते पर यह शरीर चलता - फिरता, खाता - पीता है; जिसके निकलने पर यह शरीर सड़ेगा गल जाएगा। उस शक्ति के बारे में हम जानना चाहते हैं, पहचानना…
( वास्तव के दोस्त ऐसी चर्चा करने लगे और वास्तव विचारों में खो गया - )
वास्तव : ( मन में ) मैं भी सभी दोस्त विवेक के साथ पाठशाला जाने का विचार करने लगे हैं। विवेक ऐसा क्या कहता है कि सब उसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं। मेरे साथ घूमना - फिरना, मौज - मस्ती होते हुए भी ये सभी पढ़ने के लिए उसके साथ क्यों जाना चाहते हैं। पढ़ने से कतराने वाले मेरे दोस्त पढ़ने की तरफ कैसे आकर्षित हो रहे हैं।
विवेक के घर कटने के लिए विवेक की बात सुनना जरूरी है, उसी बात समझना आवश्यक है। उसकी बात उसके साथ रहकर ही जानी जा सकती है। मुझे भी कुछ दिन पाठशाला जाना ही होगा। कोई भी बात कितनी भी अच्छी क्यों न हो, कुछ - न - कुछ कमी उससे निकाली जा जा सकती है क्योंकि शब्द तो पूरी बात को पूर्णरूपेण व्यक्त करने में समर्थ नहीं हैं। ( प्रकट में ) ठीक है, आप सभी दोस्तों की यही इच्छा है तो मुझे भी तुम्हारा साथ देना ही पड़ेगा। मैं भी किसी दिन तुम्हारे साथ चलूँगा पाठशाला, पर अभी तो हम चलेंगे सिनेमा।
प्रेस में
( प्रेस में एडीटर एक दूसरे से बातें करते हैं - )
पहला : अजी! ये आठवाँ आश्चर्य सुना तुमने?
दूसरा : बोलो! बोलो! क्या नया समाचार है?
पहला : देवनागर के चलो सिनेमा कहने वाले बच्चे, अब चलो पाठशाला कहने लगे हैं।
दूसरा : ऐसा संभव ही नहीं, मैं वास्तव के नेचर को अच्छी तरह समझता हूँ।
पहला : नहीं, ऐसा हो रहा है।
दूसरा : तो जरूर दाल में काला है। अब आप लोग नीचे आश्चर्य की खबर सुनने तैयार रहिए।
पहला : क्यों ऐसी क्या बात है?
दूसरा : वास्तव के पेट में बहुत बात है, वह जरूर कुछ - न - कुछ गुल खिलाएगा।
पहला : भविष्य में क्या होगा? यह तो सर्वज्ञ ने देखा है। फिलहाल तो देवनागर के दोनों ग्रुप कहते हैं
- चलो पाठशाला, चलो पाठशाला
पाठशाला जाकर वास्तव क्या गुल खिलाता है। यह जानने के लिए पढ़िये -
चलो पाठशाला : चलो सिनेमा भाग - 3
लेखिका की अन्य कृतियाँ
१) जैन नर्सरी (हिंदी, गुजराती, मराठी और अंग्रेजी)
२) जैन के. जी. भाग - १ (हिंदी, गुजराती, मराठी और अंग्रेजी)
३) जैन के. जी. भाग - २ (हिंदी, गुजराती, मराठी और अंग्रेजी)
४) जैन के. जी. भाग - ३ (हिंदी, गुजराती, मराठी और अंग्रेजी)
५) मुक्ति की युक्ति
६) विचार के पत्र विचार के नाम
७) जैनदर्शनसार
८) राम कहानी
९) आ. कुन्दकुन्द और उनके टीकाकार (शोधप्रबंध)
१०) आ. अमृतचंद्र और उनका पुरुषार्थसिद्धयुपाय
११) सत्ता का सुख
१२) प्रमाण ज्ञान
१३) तलाश : सुख की
१४) संस्कार का चमत्कार
१५) चलो पाठशाला : चलो जिनेशा भाग -१
डॉ. शुद्धात्मप्रभा टडैया
मैं हूँ नीम
मैं हूँ पिस्ता
मैं हूँ काजू
मैं हूँ मधु
मैं हूँ किशमिश
करण
लक्ष्य
नरम
करम
गरम
मरम
ज्ञान
विवेक
बालक
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है
