भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) के दो पुत्रों — चक्रवर्ती भरत व बाहुबली — की ऐतिहासिक कथा पर आधारित मंचन-योग्य जैन नाटक। चक्ररत्न की उत्पत्ति व दिग्विजय से लेकर दोनों भाइयों के बीच मान-कषाय जनित संघर्ष, तथा बाहुबली द्वारा मान का त्याग, वैराग्य व केवलज्ञान की प्राप्ति तक की कथा — पूरे पात्र-संवाद व मंच निर्देश सहित। उत्तम मार्दव (अहंकार-त्याग) का मर्म समझाती नाटिका; पाठशाला, बाल संस्कार शिविर व दस लक्षण पर्व मंचन हेतु आदर्श।
A ready-to-stage historical Jain natak on Bharat and Bahubali, the two sons of Lord Rishabhdev (Adinath) — from the chakra-ratna and dig-vijay to the mana (pride) conflict between the brothers, and Bahubali’s renunciation of pride leading to kevalgyan (omniscience). Jain natak script on Uttam Mardav (humility) — bharat bahubali drama for pathshala and jain cultural / Dashlakshan programs.
इतिहास के दो सूर्य भरत–बाइबली
दृश्य 01
सूत्रधार–(जिनकी कीर्ति से दशों दिशायें पुष्कित हो रही हैं, जिनकी दिव्यमना से निरंकर की कान्ति भी फीकी हो गई है, जिनके जन्ममात्र से ही तीनों लोकों में आह्लाद फैला हुआ है, देवताओं में भी जिनका निरंतर यशगान हो रहा है ऐसे प्रथम तीर्थेश राजा ऋषभदेव के दो पुत्र भरत–बाइबली मानों चंद्र–सूर्य ही हों, जिनके तेज–सौंदर्य–कीर्ति–बल–वैभव आदि को देखकर जगत की संपूर्ण सद्गुणों स्वतः आश्चर्य एवं पोदानपुर में एकत्रित हो गई हैं, सगार भरत का दरबार लगा हुआ है, और ये प्रजा के सुख समाचार आपने मंत्रियों से पुछ रहे हैं)
भरतराज दरबार में, बैठे थे सानन्द।
पूछ रहे थे सभी से, कुशल क्षेम आनन्द।
प्रजा आपकी कृपा से, यत्र–तत्र–सर्वत्र।
कुशल क्षेम पूरी तरह व्याप रही सर्वत्र।
सूत्रधार– (सभी राजस्तुत आकर तीन संदेश सुनाते हैं)
इधर आसुभगाला से अभी–अभी आया है एक संदेश।
हुई है चकरूल की प्राप्ति अरे रे सुनो सुनो भरेश।।
उधर अन्तापुर से भी मिला अनामक एक सुखद संदेश।
हुई है पुत्ररत्न की प्राप्ति हुआ सबको आनन्द विशेष।
इसी के बीच एक संदेश देवतागण भ लाये है।
श्री वृषभेश बने सर्वज्ञ रमो मन मे हरषाये है।।
भरत जी– हे रमादेवी! आज मेरा मन प्रफुर की भांति नृत्य कर रहा है, मेरे आनंद का आज पार नहीं है, तीनों शुभ समाचारों को सुनकर मेरा रोम–रोम पुलकित हो रहा है, चकरूल एवं पुत्ररत्न की उत्पत्ति की भगवान ऋषभदेव को उत्पन्न हुए केवलज्ञान रत्न के आगे अत्यंत तुच्छ है, अतः हम सभी सर्वप्रथम भगवान ऋषभदेव की वंदना करते समाचरण में चलेंगे, मंत्रीवर संपूर्ण आभूषा नगरी को सज्जन की तरह राजा हो, एवं त्रिभुविक दान की घोषणा संर्वत्र कर दो, एवं अगाल्यर भैया बाइबली से भी समादरण में अभी बुलेने का समाचार भिजवा दो।
अभात्यवर– जो स्वामी!
दृश्य 02
(भरत–बाइबली दोनों भगवान की स्तुती वंदना हेतु समवसरण में प्रवेश करते हैं)
भगवान की स्तुती स्वरूप नृत्यगीत
दक्षिणाक्र– महाराज भगवान श्री आदिनाथ जी की स्तुति व दिव्यदर्शन कर पुत्रोत्सव भी संपन्न हो गया है, अब शीघ्र ही पद्याख्ड विजय का आदेश दीजिए।
दृश्य 03
भरत जी– पुण्य प्रताप से वैसे ही अपार संपदा है, सभी क्षेत्रों के राजा एवं प्रजा पिता श्री के प्रभाव से वैसे ही आज्ञाकारी हैं, फिर पद्याख्ड विजय की क्या आवश्यकता है, किसी को भय विस्तार बल से पराधीन करना सरल है, किंतु लोगों के मन पर प्रेम से सत्य करना कठिन है।
दक्षिणाक्र– महाराज आपकी उदारता का कारण में जान सकता हूँ, आप तत्वज्ञानी एवं आत्मध्यानी हैं, भगवान श्री ऋषभदेव के पुत्र हैं, बीटी मात्र का भी डित्र दुल्वाना आप को साहन नहीं है महाराज। किंतु आपके यहाँ चकरूल उत्पन्न हुआ है उसका कर्तव्य तो आपको निभाना ही होगा महाराज, यही राजनीति का धर्म है, और समय की मांग।
भरत जी–पुत्र कितना भी महान हो मन्त्रीवर, किंतु माँ के आह्वानो को कभी नहीं भूलता, हर सफलता और विफलता का आपने माँ के चरणों मै अर्पित करना है, आज ये अगागा भरत आपने द्रंढे को मिटाने अपनी माँ के चरणों में जाना चाहता है, दक्षिणाक्र, जाना चाहता है
(अचानक से पीछे से माता नंदा पुत्र भरत की पीठ पर हाथ रखती हैं।)
भरत जी– माँ(आश्चर्य भाता के वरण स्पर्श करते हैं।)
माता नंदा– यशस्वी भव! विरजीभ भव! पुत्र मैं कब से तेरी प्रतीक्षा कर रही थी, आज मेरा भरत धरती का सबसे सौभाग्यशाली पुरुष है, तीनों सुखबर समाचारों में मेरे दूध के गौरव को और बढा दिया है, और तू उदास है, बात क्या है?
भरत जी– ममता सत्य को स्वीकार नहीं करती माँ
माता नंदा– भरत की माँ इतनी कायर भी नहीं की ममता के बंधन में आपने बैटे के चेहरे के सत्य को न पढ सकें मैं संभ समभती हूँ, आत्मज्ञानी पुत्र को मेरा इस पदख्याख्ड विजय में क्या रुची हो सकती है, फिर भी बेटा अभी तुम्हारा राजमर्म नहीं है कि उल्लास पूर्वक विभिन्यय के लिए प्रस्थान करो।(माता नंदा उच्च स्वर में) भरत क्षेत्र के भावी भाव्य बिधाता, आदि चकवर्ती समंग नंदा के दुग्ध से पुष्ट सौभाग्य शाली ऋषभ पुत्र की इस कायरता का कारण राजमाता जानना चाहती हैं।
भरत जी– भरत को चाहे जो कुछ कहा माँ, पर मान्यश्वाली नहीं, आज इस अगागा भरत को अपने उन सौ भाइयों एवं उन नागरिकों के गाय्य सो ईर्ष्या हो रही है, जिन्हें आज से ही प्रतिदिन तीन–तीन बार छः छः घड़ी भगवान ऋषभदेव की दिव्यध्वनि सुनने का अवसर प्राप्त होगा, उसी समय तुम्हारा से अगागा भरत शाम–दाम–दण्ड भेद की राजनीति में उलझा हुआ युद्ध का संचालन कर रहा होगा माँ।
माता नंदा– किंतु भरत का भारत अखण्ड होना चाहिए छः खण्डों में विभाजित नहीं।
भरत जी– भरत आपना कर्तव्य पहचानता है, कर्तव्य की ठोकर बुद्धि ही बर्बस कर सकती है, हदय नहीं।
माता नंदा– हे पुत्र चकवर्ती की आँखों में आंसू शोभा नहीं देते।
भरत जी– क्या माँ से भी हदय की पीड़ा को छुपाना होगा, क्योंकि अब ये अगागा भरत अपनी जन्मदात्री माँ के सामने भी पीड़ा के आंसू नहीं बहा सकता माँ।
माता नंदा– पुत्र! बात माता कि नहीं, राजमाता की है।
भरत जी– ठीक है माँ, तेरे आशय और कर्तव्य के बश में, ये चकरूल का भार ढोकर विभिन्यय के लिए जाता हूँ, पर आप सत्य समझना माँ, आपके पुत्र का धर्म पूर्ण कथायों पर ही विजय प्राप्त करना होगा, आपके पुत्र भरत को पदख्याख्ड नहीं एक अखख्ड आत्मा ही व्हाहिए माँ, एक अखण्ड आत्मा ही चाहिए।
माता नंदा– बिजयी भव पुत्र
(घर में ही वैसागी भरत जी भजन के साथ दृश्य परिवर्तन)
दृश्य–04
*(सूत्रधार–और भरत जी करोड़ों सैनिकों को साथ ले साठ हजार वर्ष के लिए दिग्विजय हेतु निकल जाते हैं, रास्ते में भरत जी के मुष्कलय एवं परिचिता से प्रभावित होकर राजामगण स्वयं उनकी अधीनता स्वीकार करते हैं, अपनी उत्तमोत्तम कन्यायें तथा उत्तमोत्तम भेट प्रदान करते है, भरत जी उन्हें यह राज्य बापस रेकर आगे बढ जाते है, महापुरुष पूर्व वस्तु पर अतिक्रमण नहीं करते भरत महाराज की संपूर्ण पदख्याख्ड विजय में एक भी बूंद रक्त की नहीं बहती भरत महाराज निरंतर उरसाह के साथ आगे बढते जा रहे हैं।)
भजन– चक रत्न साथ है, किंतु धर्म साथ है
भरेश की सेना चली, आत्मज्ञानी की सेना चली…
*(चकवर्ती समंग भरत कमशः आगे बढते जा रहे हैं, और
(राजा 01 अपने मंत्री के साथ: भरत जी को मुकुट भेंट करते हैं और भरत जी स्वीकार कर तुरंत वापिस कर देते हैं)
(राजा 02 अपने मंत्री के साथ: भरत जी को मुकुट भेंट करते हैं और भरत जी स्वीकार कर तुरंत वापिस कर देते हैं)
(राजा 03 अपने मंत्री के साथ: भरत जी को मुकुट भेंट करते हैं और भरत जी स्वीकार कर तुरंत वापिस कर देते हैं)
(अचानक से सेनापति दौड़ती हुए घबराये हुए आते हैं)
सेनापति— महाराज!महाराज!महाराज!महाराज! पोदनपुर राज्य में चकरत्न सहसा रुक गया है।
भरत जी— विजयोत्सव से मैं थक गया हूँ, अगल्य इसय विश्राम चाहता है।
अमात्य— जीवन में विश्राम ही कहाँ है समाट, संघर्ष तो क्षत्रिय का सहोदर है, उसका जन्म ही इसके साथ होता है, और.और अभी तो स्वयं चकरत्न यह सूचित कर रहा है चाहता विजय का जो वृत हस लेकर निकला है उसे पूरा करके ही लौटना चाहिए, अभी महाराज बाहुदली भी तो प्रणाम करने नहीं पआरे, इसी से यह चकरत्न रुक गया है महाराज।
भरत जी— विजय का व्रत अरे यह तो हिंसा का ही दूसरा नाम है, पारस्परिक कलह से बढ़ने के लिए, पितार्थी जो सभी सहोदरों में राज्य का विभाजन कर गये थे, आज मैं उनसे संतुष्ट न होकर सभी सहोदरों से मैं का प्रासभी झगटने के लिए तैयार हूँ, क्या सीमा है इस पाप की ही! अब मैं समझ गया कि इस विश्व में क्रांति का सुत्रपात क्यों होता है।
सेनापति— भट्टउष्णआदिपति समाट भरत के विरुद्ध क्रांति करने की सामर्थ्य आज किसमें हैं महाराज।
भरत जी— किंतु अमात्यवर बाहुदली मूढ, पुत्र अकॅक्रांति से भी विप्र है। यदि मेरा संदेश पाकर वो भी अन्य सहादरों की भांति दीक्षा के लिए निकल पड़े तो क्या मैं छोटे मेरे के समक्ष अपना कलंकित रहूँगा महाराज।
दक्षिणाक— महाराज! आप चिंता न कीजिए मैं स्वयं इस कार्य को संपन्न करने का सक्षम करता हूँ, और मुझे विश्वास है कि मैं महाराजा बाहुदली को यहाँ लाने में समर्थ हो सहूँगा आप निश्चिंत रहें महाराज।
भरत जी— दक्षिणाक मेरा हृदय साक्षी नहीं देता बाहुदली को मैं बालसपने से ही जानता हूँ, उसका हठ इस चक्र के हठ से किसी भी प्रकार कम नहीं।
दक्षिणाक— महाराज! आपके चरणों के प्रसाद से अब तक विपमत्तम राजनीतिक चक्रों में पड़कर भी अरफल नहीं हुआ फिर स्नेह आसक्त सहोदरो के हृदय का चितन, भला बताइए इसमें कौन सी बड़ी बात है।
भरत जी—दक्षिणाक तुम अलपत प्रवीण एवं चाकचातुर्य में कुशल ही हमें पूरा विश्वास है, आप प्रस्थान कीजिए।
(सुक्त्तार— और बतुर मंत्री हजारों सपने मन में सजोय पोदनपुर की ओर रवाना हो जाता है, पर यह तो काल ही जानता है कि भविष्य गभे में क्या छिपा है, दुनिया का हर प्राणी सफलता की आशा में स्वाठोत्सास लेता है किंतु होनहार को जो मंजूर हो नहीं होता है चलिए हम बताते हैं बाहुदली के दरबार पोदनपुर में जहाँ पर भरत के मंत्री दक्षिणाक बाहुदली को छल के द्वारा भरत जी के आगे प्रणाम कराना चाहते हैं, लेकिन प्रस्तुत है बाहुदली जी का दरबार)
दृश्य 05
(बाहुदली जी राजदरबार में कुछ चिंता ग्रस्त टहल रहे हैं तभी गुप्तचर का प्रवेश होता है)
बाहुदली जी— अरे! गुप्तचर सुग्रेफ तुम
गुप्तचर सुग्रेफ— क्षमा करें महाराज! मुझे विशेष आवश्यक समाचार हेतु यहाँ आना पड़ा है, महाराज महाराज आपके ज्येष्ठ भ्राता महाराज भरत नगर के बाहर सेना सहित विश्राम
बाहुदली जी— हँ कहो क्या विशेष समाचार है।
गुप्तचर सुग्रेफ— महाराज आपके ज्येष्ठ भ्राता महाराज भरत नगर के बाहर सेना सहित विश्राम कर रहे हैं, महाराज वेष बदलकर घूसते–घुसते उधर जा निकला, तो महाराज की सैनिक आसा में गुप्त बातों कर रहे थे कि उनका एक अत्यंत विश्वस्त अमात्य सेवा में आ रहा है महाराज कि आप वहाँ जाएं और उन्हें प्रणाम करें क्योंकि आपके प्रणाम के बिना चकरत्न आगे नहीं बढ़ सकता है महाराज।
बाहुदली जी— सुग्रेफ हम तुम्हारी कर्तव्यनिष्ठा से अत्यंत प्रसन्न हुए हैं, तुमने हमारे राज्य की सेवा की हैं, तुम्हारी यह सेवा अवश्य पुरस्कृत होगी, जाइये और मृग सुनवाएं एकचित्त कीजिए।
(महाराज बाहुदली पुनः टहलने लगाते हैं, अचानक से दक्षिणाक का प्रवेश)
दक्षिणाक— महाराज की जय हो! महाराज की जय हो!
बाहुदली जी— आओ दक्षिणाक आओ
दक्षिणाक— महाराज में महाराज भरत का दूत दक्षिणाक आपके समक्ष मानसिक संदेश लेकर उपस्थित हुआ हूँ, स्वामी, महाराजा भरत भटदण्ड को विजय करके अयोध्या की ओर लौट रहे हैं, मार्ग में सेना सहित पुन्य तिथार्थो एवं मातु श्री के दर्शन कर नेत्र तुप्त किये अब आपसे मिलने के लिए उनके हृदय में स्नेह की सरिता उमड़ रही है महाराज।
बाहुदली जी— किंतु इस समय तो हम दक्षिणाक आवश्यक राज कार्य के कारण उनसे मिलने में असमर्थ हैं।
दक्षिणाक— नहीं स्वामी नहीं(अत्यंत व्यग्र होकर) मेरी आशा व विश्वास पर पानी न उड़ेलिये महाराज, मैं महाराज भरत को मैं नहीं दिखा सकूँगा, अपने बड़े भाई के दर्शन करना भी जीवन के महत्त्वपूर्ण कार्य का ही एक अंग है महाराज।
बाहुदली जी— दक्षिणाक तुम अपनी कार्य की सिद्धि में अत्यंत निपुण हो, राजनीतिज्ञ भरत का अमात्य भी एक कुशल राजनीतिज्ञ ही होना चाहिए, तुम अपनी बातों में जिस बात को अब तक छिपाते रहे हो उसके रहस्य का उदघाटन तुम्हारे आगमन से पूर्व ही चुका है, क्या तुम्हें इसका ज्ञान है।
दक्षिणाक— आप ये क्या कह रहे हैं महाराज, चकवर्ती की हार्दिक इच्छा यहाँ रुकने की तानिक भी नहीं थी किंतु आपके सद्प्र कामदेव के दर्शन करने की उनकी इच्छा हम रोक नहीं सके महाराज, क्या आप हमें अपनी दया का पात्र नहीं बनायेंगे महाराज, क्या ये हमारे पाप की पराकाष्ठा नहीं होगी।
बाहुदली जी— मेरी दया की भिक्षा लेकर, पुण्यवान बनने का दंभ रखने वाले दक्षिणाक, पाप की परिभाषा अपने हृदय से पूछो मेरे स्वतंत्र राज्य की सीमा में आकर चक सहस्त्र रुक गया है, कि हमें भी अन्य शक्तिहीन राजाओं की भांति परस्पीन बनाया जाए, इसलिए आप जाकर भरत से सेना सहित नगरे के बाहर पडाव डाला है, अपने वाहुबल के बल पर मेरे प्रणाम का प्रयास कर रहे हो बस! बालो क्या इसकी सत्यता में कोई संदेह है।
दक्षिणाक— महाराज! महाराजा भरत के सहोदर को इसका उत्तर देने की क्षमता नहीं, मैं तो आपके चरणों निनम निनती करता हूँ करता हूँ महाराज, निनम निनती करता हूँ।
बाहुदली जी— गुणों के आगे मेरा हृदय स्वयंमेव झुक जाता है, दुनिष कितु मुझे छल पवंग अपने चरणों में झुकाने के तुम्हारे स्वामी का उपेश्र सिद्ध होगा, दोष मातृ के स्मुख को एक किंकर की भांति बुलावा देना, क्या उसका तिरस्कार नहीं।
दक्षिणाक— महाराज हमारे स्वामी, अपने भव्ड़ियों को साधारण व्याक्तियों के पास नही भेजा करते, इसमें स्वयं उनकी प्रतिष्ठा की हानि होती है।
बाहुदली जी— क्या तुम्हारे स्वामी, तुम्हें साधारण व्याक्तियों के समीप नहीं भेजा करते, हाइइइइइ… तो तुम्हारे स्वामी तुम्हें असाधारण व्याक्तियों के पास भेजते हैं, इसलिए मेझते हैं कि तुम उन पर कुंबर्का का जाल फैलाओ, अनेक मयावद संदेश भेजकर छोटे भाइयों को तो ठाल गेन देया, किंतु मेरी शक्ति का विचार करके तुम्हारे सद्प्र एक चतुर अमात्य को मुझे फंसाने के लिए भेजा है, अपनी चाठुकारिता से बाज आओ दक्षिण, मेरी कुशाघानी अधिक प्रज्वलित मत करो, बस यहाँ से वेले जाओ। (दक्षिणाक खाने लगाते हैं) दक्षिण में समझ गया हूँ, कि तुम्हारे स्वामी हम पर आक्रमण किये बिना नहीं रहेंगे, किंतु यृद्ध यहाँ नहीं यृद्ध वहीं होगा, जहाँ तुम्हारी सेना ने पड़ाव डाला है, तुम्हारे स्वामी को भट्टउण्ड जीतने का अभिमान है न, जाकर कह दो कि
इसका निर्णय रणक्षेत्र में होगा, वे अपनी सेनायें सुसज्जित रखें, जाइये(दक्षिणापक यदों जाते हैं) मंत्रीवर, मैया का कार्य भी दुत, गुरुवर या कोई सेवक नगर की सीमा में प्रवेश न करने पायें
मंत्री(बाहुबली जी को)-- जो आज्ञा महाराज
सूत्रधार– और दक्षिण भरत का दूत हुई हुए पत्ते की भांति वापस चला गया, लेकिन बाहुबली उसके छल में नहीं आये, क्यों आये दुनिया का सबसे बड़ा कष्ट है परघोषना एक ही माँ के दो सपूत कोई एक दूसरे के अधीन क्यों रहें, चलो पहुंचते हैं, भरत के दरबार में)
दृश्य 06
(भरत का दरबार लगा हुआ है, आसन में सभी एक–दूसरे से चर्चा कर रहे हैं, तभी दक्षिणापक का प्रवेश)
दक्षिणापक– (नीचे सिर किये हुये प्रवेश करते हैं) महाराज, महाराज, महाराज मैं आपके समक्ष में दिखाने के योग्य भी नहीं हूं, जो संकल्प लेकर मैं पोरबन पुर गया था, वह पूर्ण नहीं हो सका महाराज, पूर्ण नहीं हो सका।
भरत जी– दक्षिणापक इसमें दुःखी होने की कोई बात नहीं, कार्य की सिद्धी पर हमारा कोई अधिकार नहीं किंतु प्रयत्न करना ही हमारा कर्तव्य है।
दक्षिणापक– महाराज! मैंने अतिविनय पूर्वक राजनीति, धर्मनीति एवं लोकनीति से हर प्रकार उन्हें यहां लाने का प्रयत्न किया, जिन लोगों ने मेरी बातों चुनी सबक हदय मोम की भांति पिघल गये, किंतु महाराजा बाहुबली के पाषाड हदय को समझाने में मैं सर्वथा असमर्थ रहा, अतः एक बार पुनर्वया असर्मथो रहा। मेरे सफलता के इतिहास में एकला बात कलंक बनकर मेरे हदय में काई की भांति हमेशा कशक उत्पन्न करती रहेगी महाराज।
भरत जी– दक्षिणापक बाहुबली के हट एवं अभिमान से मैं अक्की तरह से परिचित हूं आज वो बड़े भाई को प्रणाम करने में भी अपना अपमान समझते लगते हैं, एक छोटे से राज्य का इतना अभिमान, हां.. क्षिकार है उसकी बुद्धि की जड़ता को।
दक्षिणापक– महाराज, महाराज बाहुबली ने कहा कि तुम्हरे स्वामी हम पर आक्रमण किये बिना नहीं रहेंगे, किंतु उनसे कह देना इसका निर्णय रणक्षेत्र में होगा तलवारे सेवानी सेनायें सुसज्जित रखें, महाराज इतना कहकर उन्होंने अपने मंत्रियों को आज्ञा दी, कि मैया को कोई भी व्यक्ति मेरी सीमा में पैर न रखने पायें, महाराज।
भरत जी– दक्षिणापक बाहुबली के अभिमान को मैं एक क्षण में मिट्टी के खिलोने की भांति चूर–चूर कर दूंगा जो समझता है कि उसका शरीर मेरे से अधिक ऊंचा है मैं उसे एक अंगुली से ही चक की भांति घुमा दूंगा, किंतु मुझे विचार आता है, दक्षिण, छोटे भाई पर शक्ति का प्रदर्शन धर्मनीति के अनुकूल नहीं है, क्या संसार की दृष्टि में मेरा यह कार्य उचित होगा, हम जानते हैं दक्षिण बाहुबली नादान है, किंतु क्या मैं भी अपने विवेक का परिदामा कर दूं, यदि माई के स्थान पर कोई और होता तो उसे प्राण विहीन कृषेग से यम लोक पहुंचा देता, हम जानते हैं दक्षिण बाहुबली को अपने बल का अभिमान है, किंतु सहोदर के प्रति परीक्षा का इस पड़ी में, हमें बहुत शीलता से निर्णय लेना होगा।
सूत्रधार– और बाहुबली ने भरत की अधीनता स्वीकार नहीं की, और यदा क्यों स्वीकार करे उसकी भुजाओं में भी वही रक्त बहता है, जो भरत जी की भुजाओं में बहता है, भरती का चष्पा–चष्पा स्वतंत्रता की घोषणा करता है, अरे उन्मुक्त ह्वायें यदा किसके अधीन है, समुद्र की लहरों पर पहले किसने विराजा है, चांद और सूर्य की गति को किसने रोका है, इस धरा की गुरुत्वा को किसने खंडित किया है, हिमालय के मस्तक को किसने नीचे किया है, फिर बाहुबली भी किसी चांद और सूर्य से कम नहीं।
दृश्य 07
(भरत जी दरबार)
सेनापति 02(भरत जी)-- महाराज! महाराज बाहुबली युद्ध के लिये आ चुके हैं।
भरत जी– ठीक है।
सेनापति 02(भरत जी)-- महाराज युद्ध लोहास्त्रों से नहीं कुसुमास्त्रों से होगा।
(बाहुबली जी पूर्व से रणक्षेत्र में भरत जी की प्रतीक्षा में तैयार खड़े हैं, )
उद्घोषक— दृष्टि युद्ध प्रारंभ हो
(और दीप—दीप में अपने राजा के प्रदर्शन अनुसार सैनिक गण आपने—अपने महाराज की जय—जय कार बोलते हैं, और समाट भरत दृष्टि युद्ध में पराजय हो जाते हैं, और समाट भरत के सैनिक समूह में शांति का माहौल हो जाता है।)
उद्घोषक— जल युद्ध प्रारंभ हो
(उपरोक्तानुसार समाट भरत जी पुनः जल युद्ध में भी हार जाते हैं)
सैनिक समाट भरत जी की ओर से— अरे! ये क्या महाराज भरत पुनः हार गये।
सैनिक समाट बाहुबली जी की ओर से— महाराज बाहुबली जलयुद्ध में जीत गये।
(और महाराज बाहुबली जी का सैन्य समूह जय—जयकार से गूंजने लगाता है।)
उद्घोषक— मल्ल युद्ध प्रारंभ हो
(उपरोक्तानुसार समाट बाहुबली जी समाट भरत जी को कंधे पर उठाकर चारों दिशाओं में घुमाकर रत्नमान समाट भरत को एक स्थान पर उतार देते हैं, और समाट बाहुबली जी की विजय के साथ मल्ल युद्ध समाप्त हो जाता हैं और समाट बाहुबली युद्धोपरांत समाट भरत के चरणों में झुक जाते हैं)
भरत जी— भाई मुझे इस चकराल की तनिक भी अभिलाषा नहीं, यह स्वतः युद्धशाला में उत्पन्न हो गया, और इसमे मुझे संपूर्ण पृथ्वी पर भटकाया है भाई, भाई तनिक तो मेरी ओर देखो, में तुम्हारा शत्रु नहीं हूं। हां ये संपूर्ण राज्य तुम सम्भालों में बदखण्ड विजय करके आया हूं, तुम ही इसके स्वामी हो, (समाट भरत हतकारते हुए कहते हैं) ओ चक्रीपिशाच!
(और चक्रीपिशाच नृत्य करता हुआ समाट भरत के निकट खड़ा हो जाता है)
भरत जी— मुझे अब तुम्हारी आवश्यकता नहीं है, तुम्हारे स्वामी अब बाहुबली हैं, इनकी आज्ञा में प्रवर्तन करों (और चक् ढीठ सा खडा रहता है) अरे निरेज्ज अपने स्वामी के चरणों में जाकर क्यों नहीं झुकता( इतना कहकर समाट भरत पांच से चक् पर प्रहार करते हैं)*
(और चकराल बाहुबली की प्रदक्षिणा देकर समाट भरत के निकट ही खड़ा हो जाता है)
बाहुबली जी— मुझे जीवनदान देने वाले आत्मचेतता बड़े भैया, मैने आपके ऊपर काटे वर्षाये कितु आपने मुझ पर फूलों की वर्षा की, ओह! मैं कितना अधर्मी हूं, यह मसिस्क आपके विशाल हृदय सागर को नहीं माप सके थैया, नहीं माप सका, मैने घोर अपराध किया है भैया, घोर अपराध किया है, मुझे क्षमा कर दीजिए भैया, क्षमा कर दीजिए।
भरत जी— नहीं भाई नहीं तुमने कोई अपराध नहीं किया।
बाहुबली जी— नहीं भैया! नहीं मुझे अपने पापों का प्रायश्चित करना ही होगा, बस अब तो एक ही अभिलाषा शेष है भैया पुष्पहार।
भरत जी— हांहीं! निःशंकोच कहो प्रिय।
बाहुबली जी— पितातुल्य बड़े भैया, मुझे जैनेश्वरी दिगंबर दीक्षा ग्रहण करने की अनुमति प्रदान कीजिए, अनुमति प्रदान कीजिए।
मैं,मैं तपोवन में जाऊंगा।
भरत जी— नहीं प्रिय, नहीं इस एक बात को छोडकर और भी कोई बात हो तो कहो, क्या संसार के कष्ट भोगने के लिए मुझे अकेले छोड़ जाना चाहते हो, युद्ध में तुम्हारी पराजय नहीं हुई है भाई, तुम तो, तुम तो विजयी हुये हो तुम्हें तो आज प्रत्यन होना चाहिए
बाहुबली जी— आप महान हैं भैया, महान हैं मेरी निष्ठुरता से ये चकराल मेरे सामने न आ सका परंतु अब तो मुझे करनी पतनी को उखाड़ फेंकना ही होगा, भैया, फेंकना ही होगा। मैं इस संसार में नहीं रह सकूंगा भैया।
भरत जी— नहीं अर्जुज नहीं तुमने कोई पाप नहीं किया फिर प्रायश्चित क्यों।
बाहुबली जी— पुन्य भी मैं मोक्षाधर पर आपकी प्रतीक्षा करूंगा, अब तक आपके संरक्षण में था अब पुन्य पितार्थी के संरक्षण में कैलाश में जा रहा हूं, ओह! यह संसार कितना क्षणभंगुर है, मैं अपने निज्जनदेव को भूलकर प्राप्त पदार्थ में तन्मय हो गया था, बस अब मुझे अपना आत्मदेव दीजिए भैया, मुझे अब सांसारिक सुखों की तालाश नहीं रही, मैं अब मोह राग से युद्ध करने तपोवन जाना चाहता हूं भैया।
भरत जी— परंतु बाइ, अभी कुमार महावल भी तो राज्य सम्भालने योग्य नहीं हुआ।
बाहुबली जी— कुमार महावल नहीं तो क्या, कुमार अर्कीकीर्ति तो सर्व प्रकार से शासन के योग्य है, यह मेरा राज्य आप उससे सम्भलवा दीजिए बस, मुझे दीक्षा ग्रहण करने की अनुमति प्रदान कीजिए (दोनों भाई गले मिलकर रोने लगते हैं)
भरत जी— प्रिय वाइ! मेरा ये निवेदन हृदय तुम्हारा वियोग नहीं सहन कर सकेगा। किंतु कल्याण के पथ पर पा रहे हो भाई, जाओ किंतु आज में सहोदर स्नेह से वंचित होकर अब इन राजगाह्यासादों में क्या करूंगा मेरो राज्य लिप्सा के कारण मेरे साथी सहोदर तो बनवास चले गये क्या अब यह चकवर्ती राजा संसार ही दुष्टों में हीन दष्टों से नहीं देखा जायेगा।
(भरत अपना मुकुट समाट भरत के चरणों में अर्पित करते हुए वन की ओर जाने लगते हैं)
भरत जी— भाई बाहुबली
भगवान—अब विधयों में नाही रूलेगें…
दृश्य ०९
सूत्रधार— और विनिन तपोवन में बाहुबली तपस्या कर रहे हैं, एक वर्ष हो गया पैरों के ऊपर भिटठी की मोटी तह जम गई जिनमे सर्पों ने वामियां बना ली, संपूर्ण शरीर पर वन लताएं छा गईं फिर भी तपश्चर्या में रत हैं माना पत्थर की प्रतिमा खडी हो)
भरत जी मुनिराज बाहुबली की स्तुति करते आते हैं
भरत जी— मुजवली योगेश्वराय नमो नमः, मुजवली योगेश्वराय नमो नमः, मुजवली योगेश्वराय नमो नमः
सूत्रधार— हे! यामिराज आपके मन में जिस बात को क्षोभ हैं, वह अभी में त्रिलोकदर्शी भगवान आदिनाथ से जानकर आया हूं यामिराज जिस पुष्टि को अपनेक राजाओं ने मांग लिया है जिस पर अभी मेरा शासन है, भविष्य में किसी अन्य का शासन होगा ऐसी श्रेणा साइना इस की अपना गुरु रवैये धर्म करते पुष्टि का आकांक्षा हैं सारा पर्वत पूर्व चकवर्ती राजाओं ने छोड़ा हैं, बस मुझे तो जान से शासन का भरा हुआ था। हे योगेश्वर! एक राजा का शासन लेख मिटाकर अपना शासन लिखना पड़ा, इस पृथ्वी पर मेरा शासन है हो कहा फिर भी आप इस पृथ्वी को मेरी समझ रहे हैं, इस यूती की तो बात क्या स्वर्ग के रत्नजटित विमान और विबुतियां भी इन्द्रों के लिए नहीं उन्दे की जो सब छोड़ती पड़ती हैं, इस पृष्ठी के मनुष्यों की तो बात ही कहां है आलमंकोक शरीर भी अपना नही तब दुसरे पक्ष में पर नही कहें हरेंगे, शासन को चाहने वाले आपको अपना गुरु स्वीकार करते हैं, इस पृष्ठी को तृण्मल्य समझकर आप छोड़ आए, मैं नहीं छोड़ सका जो मूर्ती मेरो नहीं गुरुदेव आपके समझ मुझे जैसे तुच्छ प्राणी की गिनती क्या है, मुझे ज्ञानसागर में डूबों की अभिलाषा दो।
(और सदसा ही घंटनाद होने लगते हैं, बाहुबली भगवान की जय—जय कार होने लगती और भगवान बाहुबली को केवलज्ञान हो जाता है)
सूत्रधार—और तत्काल ही बाहुबली स्वरूप में लीन हुए और चार धातियां कर्मो का नाश कर उन्होने केवलज्ञान प्राप्त किया तत्काल भरत जी रोना सहित उनकी वंदना करने आए।
(भगवान की स्तुति में एक नृत्य प्रस्तुती)
इसी के साथ नाटिका समाप्त हो जाती है।
श्री १००८ शांतिनाथ पञ्चकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव २०२३-२४ ११ नवाँन्त २०२३ कैलाश जिला दमोह
श्री १००८ शांतिनाथ पद्मावतीपुर ज्ञात्यायिका संकोसराज़ पर्वापर्व ०६ मार्च २०२३ से ११ मार्च २०२३ तक्की जिला दमोह
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