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अर्द्धकथानक नाटिका

Ardhakathanak

रचयिता Author: डॉ. विवेक जैन, छिंदवाड़ा · ~96 min पढ़ने में

Original PDF

हिन्दी के आदि-आत्मकथाकार महाकवि बनारसीदास जी के सम्पूर्ण जीवनवृत्त ‘अर्द्धकथानक’ पर आधारित विशिष्ट मंचन-योग्य जैन नाटिका। जन्म व बाल्यकाल से लेकर व्यापार, संघर्ष व आध्यात्मिक जागरण तक की घटनाओं का नाट्य-रूपान्तरण — पूरे पात्र-संवाद सहित। लेखक — डॉ. विवेक जैन, छिंदवाड़ा। पाठशाला व जैन सांस्कृतिक कार्यक्रम मंचन हेतु।

A ready-to-stage Jain natak based on ‘Ardhakathanak’, the life-story of Mahakavi Banarsidas ji (the first autobiographer in Hindi literature) — dramatizing his birth, childhood, trade, struggles and spiritual awakening, with full characters and dialogue. Written by Dr. Vivek Jain, Chhindwara. Banarsidas ardhakathanak jain natak script for pathshala and cultural programs.


महाकवि बनारसीदासजी के संपूर्ण जीवनवृत्त पर आधारित विशिष्ट नाटिका

अर्द्धकथानक

लेखक – डॉ. विवेक जैन, छिंदवाड़ा

पृष्ठभूमि

16 शताब्दी, राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक परिस्थितियाँ
परिचय विवेक भैया द्वारा

प्रथम दृश्य

बनारसीदास का जन्म
(पात्र–पिता खरगसेन, माता, छिंदियाबाई, झिलमिली, इमरतीदेवी, रज्जो, लक्ष्मी)

(माता पिता गंभीर मुद्रा में चर्चा करते हुये)

पिता खरगसेन – कुछ समझ नहीं आता भगवान भी हमसे क्यों रूठे बैठे है, कुल देवी की पूजा अर्चना में हम तो कोई कमी करर नहीं करते, जिसने जो कहाँ वैसा ही हमने किया फिर भी हमारे यहाँ आज तक संतान का जन्म नहीं हुआ । लगता है इस कुल को आगे बढाने वाली संतान हमारे भाग्य में ही नहीं है ।

माता – बात तो आप सही कहते हो एक तो घर में कुल दीपक के न होने से वैसे ही अंधेरा हो रहा है और उपर से ये गांव गली की मुहिलाओं के मुँह है जो न जाने वेद होने का नाम ही नहीं लेते है समझ नहीं आता ये तरह तरह की बातें करके सच में हमारे दुख की सहभागी बनती है या हमारे दुर्भाग्य का मज़ाक उड़ाती रहती है ।

पिताजी – चुप! ! मेरी बात मानो तो इन सबकी बातों पर ध्यान ही नहीं दिया करो । ऐसी बात करने वाले लोग वास्तव में अपने खानदान की औकात, वचपन में मिले संस्कार, शिक्षा और अपनी निम्न सोच का ही प्रदर्शन ही तो करते है । छोड़ो ये सब बातें हाँ ध्यान आया कल बाजार में कपटपुर वाले दुर्भागीलाल और उनका साला मिल गया था । वो कह रहे थे रोहतकपुर में एक सती माता का मंदिर है जहाँ से आज तक कोई खाली हाथ नहीं लौटा जिसने वहाँ जाकर सच्चे मन से जो माँग है वो पाया है । सोचता हूँ हमें भी वहाँ एक बार चलना चाहिये ।

कामवाली लक्ष्मी(झाड़ जाला निकालते हुये) बाई बाबूजी सही कहवत है बड़ो जरा है सती माता के मंदिर का ।

माता – ठीक ठीक है जरा देख चलहा पर मैंने दाल बनने रखी थी उपन तो नहीं गई …अब इसमें सोचना क्या है चलों चलते है यदि सती माता हम पर प्रसन्न हो गयी तो शायद हमारे यहाँ भी कुल का दीपक जगमगा उठेगा ।

(ठक ठक ठक की आवाज आती है)

माता – कौन है दरवाजा खुला है अंदर आ जाओ ।

छिंदियाबाई – अरे मैं हूँ छिंदिया और झिलमिली ।

झिलमिली – पायो लगौ बाई माँ केसो आओ ।

छिंदियाबाई – रे ई है ! अरे मैं गल्त समय तो न आ गई ना

झिलमिली – नहीं छिंदिया रानी तुम कभी किसी के यहाँ गल्त समय पर थोड़ोई न जाती हो । तुम्हारे आने के बाद आदमी को गल्त समय चालू होता है ।

छिंदिया बाई – का कई झिलमिली ।

झिलमिली – कच्चु नहीं कुछ नहीं । तुम्हारे कान अब बजने लगे है तो कच्चु का कच्चु सुनाई देता है ।

माता – आ जाओ ! आ जाओ बस इन लोगों ही कमी रह गई थी, घर में तो पांव ही नहीं टिकते जब देखो इसकी खिड़की तो उसके दरवाजे पर कान लगा कर चिपकी रहती है ।

छिंदिया बाई – दिन में दरवाजा लगो दिखा तो भड़ो लगो कौ चिंता की बात तो नाहीं । मैं तो बस जान वाली हती कि तुम लोगन की बात कान में पढ़ गई । कौ की सुख दुख की बात सुनु तो म्हारे तो पाँव उदड़ जम जात है । बहिना मुझसे तुमारो ये दुख नहीं देखो जात । आज मंदिर में दुर्भागीलाल की लुगाई मिली हती, वो भी रोहतकपुर वाली सती माँ के गुणगान गावत नहीं थक रही थी । मेरी बात मानो तो देर न करो । कायो तुम्हारी खुशी में तो हमारो खुशी आयो । बहुत दिना हो गये कोई अच्छी बात सुने जहाँ देखो बात रोनो धोना लड़ाई झगड़ा सुन सुन के तो मारे कान पक गये ।

माता – ठीक ठीक है पर एक बात तो बता किसी के घर पर कान लगाकर उनकी बातें सुनना अच्छा है क्या ।

छिंदिया बाई – मुहे बनाते हुयो …जे लो बाई भलाई को तो जमानो ही नाई । भगावान ने कान तो सुनन के लगने दये है । विकन तो तारे घर की दीवाल के कान की है ओको बंद करो भोहे कायो बोलन बाई । चलो मैं चली मैं को का पड़ी कोय की तीन पांच की पंचायत करवे में । (कहते हुये चली जाती है)

माता – अरे बुरा मत मान छिंदिया बाई ।

पिताजी – चुपो छोड़ो ये बातें… और रोहतकपुर चलने की तैयारी करो । कल सुबह ही निकलेंगे । मैं रास्ते का सारा बंदोबस्त करके आता हूँ ।

माता – ठीक है अब देर न करो… है सती माँ अब निराश न करना ।

सूत्रकार – (सन् 1576 में माता पिता सती माता की यात्रा को निकलें हे पाप के उदय में जीव की बुद्धि भी सही गल्त का निर्णय करने में विवेक शुन्य हो जाती है । पिता खरगसेन व माता देवी देवताओं के चक्कर में सारी धन पूँजी लगाते रहें । माँ ने अपने जेवर साहूकार के घर रख दिये पिताजी ने भी बाजार से पैसा उधार लेकर रोहतकपुर को प्रस्थान किया । पर दुर्भाग्य ने पीछा न छोड़ा रास्ते में डाकुओं ने सब कुछ लूट लिया । खाली हाथ सती को माथा ठेकने पहुंचे और साथ में मिथ्यात्व का बोझा लेकर जौनपुर वापिस आ गये ) । आखिरकार जो होना है सो तो निश्चित ही है किन्तु अज्ञानी जीव इसमें भी अपनी खोटी बुद्धि लगाकर मिथ्यात्व को ही पुष्ठ कर लेते है । बहुत प्रयत्नों व प्रतीक्षा के बाद 1586 में रविवार के दिन पिता खरगसेन के घर जौनपुर में एक बालक का जन्म हुआ ।

(छिंदिया बाई झिलमिली, रज्जो, इमरतीदेवी का प्रवेश)

छिंदिया बाई – अरे बधाई हो बाई बधाई हो तुम्हारा घर में बच्चन की किल्कारी सुगो तो म्हारो तो पाँव ही न रूके । दौखो में कहत न थी सती माँ जरूर तुम्हारो मुहत पूरी कर दे है ।

रज्जो – सचमुच बड़ी खुशी की बात आयो री जीजी

इमरती देवी – बाबूजी हम तो मिठाई खाये भी और संग डिब्बा भर ले जाये भी । (एक मुँह में खाकर डिब्बा में भरने लगती है)

अरे में तो फूल ही गई अरे लक्ष्मी सुन वो गुड़ के लड्डू तो लेने है सबका मुँह मीठा करावो।

लक्ष्मी – हाँ बाई ला रही हूँ । (लाओ लाओ सभी लोग लड्डू खाते है)

छिद्यमाई(२ लड़ई पछ्या मैं बाथैनें लगी)

झिलमिल्ली – जे क्या कर रही हो छिदिया बाई

छिद्यमाई – ऐसो है कि मैं बार बार मुंह नहीं झाटता हूं बस ६ बेर को म्हारो खाने को नियम आये।

झिलमिल्ली – जे कैसो नियम आये बाई

रज्जो – कितनो प्यारो लग रही है ये बाबुजी को छिठउआ। सही कह न बाबूजी बिलकुल सस गुछ्या आये ससगुछ्या।

इमरती देवी – कहा आये ससगुछ्या बाई किते दिख गओ तुमे।

रज्जो – डिब्बा भर गओ पर मन ने भरहे ऐ इमरतीदेवी को। लगत है लग टपकताई पैंदा भई हती तभी तो अम्मा ने भरदओ नाम इमरतीदेवी।

इमरती देवी – हमें पचत है तो खात है तेरो काय पेट दुखत है रज्जो ले पकड़ डिब्बा मैंकी नहीं लेने आये।

रज्जो – अरे कछु छोड़ो भी है जो लेने नहीं आये कर दई सबको चूरा।

पिताजी – अरे मनती हो अंदर और लड़ई के लिये कद दो। हमारे लिये आज खुशी का दिन है जितनी चाही ले लो।

माता – अरे लक्ष्मी देख लियो इन लोगन को ……जाओ अंदर भोजनगाळा में चले जाऔ।

लक्ष्मी – आ जाऔ भूमगरियों खिळात हूं तुमहें लड़ई।

माता – धन्य हो प्रभु बड़ी कुपा हुई आपकी … बाई आखिरकार भगवान ने हमारी सुन ही ली।

पिताजी(बालक को गोदी में लेकर) आज मेरा घर भी कुल दीपक के आने से जगमगा उठा है। किन्तु मन ही मन एक भय सताता है कि कही मेरे पाप के उदय का असर इस बालक पर न पड़े।

माता – अब आप भी इस प्रसन्नता घड़ी में मनहुसी की बात न सोचो। सब चिंताये छोड़ भगवान सबका भला ही करेंगे । अच्छा अब बताऔ आपने मेरे पुत्र के लिये क्या नाम सोच रखा है।

पिताजी – हां तुमने अच्छी बात याद दिलाई ये विचार तो मेरे मन में भी बहुत दिनों से चल रहा था और मैंने सोचा है कि हम अपने बालक को विक्रमाजीत कहकर पुकारे तो कैसा रहेगा। कहो ठीक है न नाम

माता – विक्रमाजीत हां हां बहुत प्यारा नाम है जैसा मेरा पुत्रा प्यारा है वैसा ही नाम आपने सोचा।

सूचकार – अज्ञानता और मिथ्यात्व की कलुषित छाया से मुख मोढ़ी अनानी जीवों का बच पाना बड़ा कठिन कार्य है गृह की महिमा भी विचित्र है क्या करे संसार का स्वरूप ही कुछ ऐसा है और इधर समय के साथ विक्रमाजीत भी बड़ा होने लगा। पर आपके मन में ये विचार आ रहा होगा कि आखिरकार विक्रमाजीत का नाम बनारसी दास कैसे पड़ गया ये भी एक रोचक प्रसंग है। बात कुछ ऐसी है कि जब विक्रमाजीत ६-७ माह का हुआ तो खरगसेन सद्गुरूदेव भगवान पाश्र्वनाथ के दर्शन करने बनारस गये। कुगुरूओं की मानने वालों की भी कभी कभी सच्चे भगवान की याद आ ही जाती है। परन्तु क्या यह उनका स्वरूप जानते है। चलो भाई हम भी चलते है बनारसनगरी के पाश्र्वप्रभु के दर्शन को … और देखे फिर आगे क्या हुआ।

दृश्य-२

(विक्रमाजीत से बनारसीदास)

(पात्र – पिता खरगसेन, माता, बालक विक्रमाजीत, पंडा पुजारी, दर्शनार्थी, बैलगाड़ी वाला धापू)

बैक ड्रॉप – बनारसनगरी बाजार व मंदिर का दृश्य

पिताजी – जय हो जय हो जय हो …भगवान आपकी जय हो ! प्रभु, तीन लोक में आप जैसी सुंदर मूरत किसी की नहीं

मातानी – सच कहते है आप इतनी सुंदर मूरत से नजर हटाने का मन ही नहीं करता।

पुनारी – लगाता है कहीं बाहर से आये हो शैया।

पिताजी – हां पुजारी जी हम जौनपुर के रहने वाले है बड़ी प्रतीक्षा व मनत के बाद भगवान ने हमारी सुन ही ली और मेरे घर में इस बालक का जन्म हुआ। तो मन किया बालक को प्रभु चरणों में रखकर प्रभु का आशीर्वाद लें लें।

करजीवं – कीजे यह बाल, तुम सलगत के रखवाल।

पुजारी(ध्यान का नाटक करते हुये)

मातानी – अरे इन्हें क्या हो गया

पिताजी – पुजारी जी … अरे पुजारी जी

पुजारी – भाग्यशाली हो भाई तुम अभी अभी मुझसे भगवान पाश्र्वनाथ के यक्ष ने कहा है कि यदि इस बालक को दीर्घायु व स्वस्थ रखना चाहते हो तो इसका नाम भगवान पाश्र्वनाथ की जन्मनगरी के नाम पर बनारसीदास रख दो भगवान इसकी सदा रक्षा करेंगे।

पिताजी – ऐसा आपसे भगवान ने कहां

मातानी – धन्य है धन्य बनारस के पारस बाबा तो भरतों की कितनी चिंता करते है। सुनौजी अब कुछ मत सोचों में तो आज से ही अपने मुन्ने को बनारसी दास ही कहकर पुकारूंगी।

पुजारी – भगवान भला करें भाई तुम्हारा लो प्रभु की आरती पूजा भक्ति कर लो और प्रसन्नता के साथ कुछ दान दक्षिणा भी कर दो।

सूचकार – इस तरह चीतरागी भगवान के मंदिर में आकर भी भोले लोगों ठग जाते है सच्चे देव के स्वरूप से अनभित्र जनों को ये मिथ्यावादी कथित धर्म के संचालक खोटी युक्ति व उपाय बताकर मानों उनके मिथ्यात्व व अज्ञान पर वज्रलेप कर देते हैं। मोह की महिमा भी विचित्र है पिताजी ने पुजारी के कहने पर विक्रमाजीत से बनारसीदास नाम तो बदल दिया परन्तु ये नहीं सोचा कि अपना भला बुरा होने का कारण तो अपना पूर्वबद्ध कर्म का परिणाम ही है। सत्य है हमें दुनिया की व्यवस्थायें नहीं अपितु दुष्टि को बदलना होगा।

और फिर समय के साथ बनारसी दास बड़े होने लगे मानों कठिनाइयों तो आप चिराग्त में साथ लेकर आये थे। जब पांच वर्ष के हुये तो रुग्णुणी रोग हो गया और लगभग एक वर्ष तक उससे पीड़ित रहे। कुछ ही समय बाद ६-७ वर्ष की उम्र में चेचक से ग्रस्त हो गये। बचपन तो अस्वस्थता में ही व्यतीत हो गया। जब बनारसी दास ८ वर्ष के हुये तो उन्हें चटशाला में पढ़ने को भेजा गया।

दृश्य -३

(पाठशाला का दृश्य)

(पात्र – पिता खरगसेन, शिक्षक, बालक बनारसीदास, ४-५ बच्चे)

शिक्षक – बच्चों आज हम गिनती बोलना सीखेंगे । चलो बोलो १,२,३,४

सभी बच्चें बोलते है १,२,३,४ …१,२,३,४

अच्छा बनारसी यहां आओ और सभी बच्चों को गिनती याद कराऔ

बनारसी – जी गुरूजी १,२,३,४… भैया बनो हांशियार…सबका है कहना… अनपढ न रहना…जाऔं गुरूजी के पास।

(बच्चे दोहराते है)

गुरूजी – अरे बनारसी ये क्या बोल रहे हैं ये मैंने तुम्हें कब सिखाया बैठा

(तभी खरगसेन वहां से निकलते है )

गुरुजी – अरे खरामने जी सुनो कहाँ जा रहे हो

पिताजी – प्रणाम गुरुजी, बस यहीं नेंदा के घर तक जा रहा था

गुरुजी – अरे तुम्हारा बच्चा तो जन्म लेने ही काव्य रचना करने लगा मैं तो इन्हें अंक याद करा रहा था उसने उन्ही अंको के साथ काव्य बनाकर बड़ी रोचक प्रस्तुति की। लगता है तुम्हारा बालक बहुत मतिव्युपन्न है इसे अच्छी शिक्षा देना मुझे लगता है बड़ा होकर ये बहुत प्रतिभाशाली काव्यकार बनेगा।

पिताजी – आप कहते तो सही हो गुरुजी …लेकिन वणिकपुत्र का पढ़ना समाज में अच्छा कहाँ माना जाता है। बिरादरी में तो लोग ऐसा कहते है कि

बहुत पढ़े बामन और भाट, बनिकपुत्र तो बेठे हाट।।

बहुत पढ़े तो मांगे भीख, मानहू प्रत बड़न की सीख।।

गुरुजी – नहीं भाई खरामने यह सोच गलत है। ज्ञान और विद्या से कभी किसी का बुरा नहीं होता है।

पिताजी – ठीक है आपकी बात ध्यान रखूंगा फिर आगे भगवान की मर्जी। देखो भगवान ने बनारसीदास के लिये क्या सोचा है।

(तभी घंटी बजती है और चटशाला की छुट्टी हो जाती है)

पिताजी – चलो बेटा बनारसी तुम्हें घर छोड़ देता हूँ फिर मुझे हाट भी पहुचना है।

(गुरुजी बच्चे सभी चले जाते है)

सूत्रकार –बचपन से ही बनारसी दास को भी अध्ययन पठन की प्रीव लालचा रहती थी। जैसे तैसे अध्ययन करते हुये बनारसी दास ने चौदह वर्ष की उम्र में पहुचते पहुचते पं. देवदत्तजी के समागम में आकर नामाला, ज्योतिष, अलंकार, लघुकोक, व खंड स्फुट के चार सो श्लोको का अध्ययन कर लिया तथा पढ़ते पढ़ते जोधपुर में ही भानुचंद्रमुनि के उपारे में रूहकर आपने पंचसिधि, छंद्रश्लोक, श्रुतबोध, स्नात्रविधि प्रतिक्रमण आदि भी कंठस्त कर लिया। आप 9 वर्ष की अल्पायुर्मे पिताके साथ व्यापार हाट में बैठने लगे थे। सन् 1597 जब वह 12 वर्ष के हुये तो पिता ने इनका विवाह कर दिया लेकिन ये संवेध भी अधिक दिन नहीं चला और शीघ्र ही उनकी पत्नी का देहावसान हो गया।

दृश्य–4

(डगमगाते कदम युवा बनारसीदास के)

(बनारसीदास, गुड्डू रंगीला, चारुदत्त, देवदत्त, ससुर अर्थमलजी)

(एकांत में बैठकर कुछ श्रृंगार रचना लिखते पढ़ते हुये।)

बनारसीदास – सौन्दर्य का अगणित योवन इस धरा पर आ गया है रस सपूर्ति रुप उसका रसिकमन में भा गया है

गुड्डू रंगीला – बनारसी ओ बनारसी अरे मित्र कहाँ हो। आज कल बनारसी किस धुन में कहाँ रहता है पता ही नहीं चलता। लगता है घर पर नहीं है।

देवदत्त – नहीं नहीं घर पर ही होगा मैं तो उपवन की तरफ ही से आ रहा हूँ वहाँ तो मुझे नहीं दिखा।

चारुदत्त – कहीं गोमती के तट पर तो नही बैठे गये…आशिकों के समाट कविराज बनारसी

गुड्डू रंगीला – नहीं यार यो गोमती के तट पर भी नहीं दिखा मैं तो कुछ देर पहले ही वाछू धोबी से कपड़े लेने गोमती तट पर गया था। वहाँ से घर पर कपड़े रखकर आ रहा हूँ बनारसी वहाँ नहीं था

चारुदत्त – जैसे इस समय घर पर ही होना चाहिये जरा दरवाजा की कुंडी तो खटकाओ कोई न कोई तो घर पर होगा ही। (ठक ठक …ठक ठक)

बनारसीदास – कौन है भाई जरा ठहरो आता हूँ। (कलम हाथ में लिये कुछ कवित गुनगुनाते हुये) रुप सुहावना अतिमनभावन…अरे कौन आ गया बढ़ा ही सुंदर शब्दविन्यास मस्तिष्क में निर्मित हों रहा था विचार श्रृंखला को व्यवधान कर दिया। चलो देखना तो पड़ेगा ही आखिर कौन है। (दरवाजा खोलते हुये) अरे..अरे मित्रों तुम लोग आ जाओ भीतर आ जाओ।

देवदत्त – किस गुनधर्म में लगी हो बनारसी भी दोपहर में घर का दरवाजा लगाये हुये कौन सी खिचड़ी पक रही है

बनारसीदास – बस कुछ नहीं मित्र कल्पनाओं के सौन्दर्य को पृष्ठों पर उतार रहा था। श्रृंगार काव्य का रस ही कुछ ऐसा है कि बाहर क्या चल रहा है पता ही नहीं चलता। सच कहूं काव्य रस के आगे सब रस फीके भासित होते है।

चारुदत्त – काव्य व श्रृंगार का आनंद अकेले ही भोगना चाहते हो मित्र। जरा चो चार रसपूरित मुक्तक हमें भी सुना दो। तीक्ष्ण गर्मी में कंदे के साथ हृदय भी शुष्क हो गया है।

गुड्डूरंगीला – हाँ भाई जरा तेरे श्रांगारिक काव्य रस की मसूल धारा तो बरसा दे …ये चाल और देव के सावन भादों नहीं आ रहे है पत्राड़ू की चपटे खाकर चूसे हुये आम बन गये है ये दोनों के दोनों।

देवदत्त – अब तू अधिक मत बता गुड्डू तू तो जन्म से श्रृंगार संसोधर में डुबा रहता है लगता है तेरे माता पिता को पूत की हरकत पालने में ही दिख गई थी तभी तो तेरे नाम के साथ रंगीला जोड़ दिया।

चारुदत्त – सही कहते हो देव। अच्छा चलो बनारसी खोल्लो तो तुम्हारी श्रांगारिक करण्डिका

(सभी बैठ जाते है)

बनारसी दास – हाँ हाँ बैठो मित्रों। आशिकार यह रचना किसके लिये बनाई है। मित्रों के आनंद के लिये ही तो नंदनवन की पुष्प लतायें झूम झूमकर तुम्हे बुलाती।

यादों में तो आ जाती तुम किन्तु सत्य में क्यों न आती ।।

(बैकड्राप – काव्य पाठ , मिमागण झूमते डोलते हुये वाह वाह कर रहे है)

गुड्डू रंगीला – वाह मजा आ गया बनारसी कुछ भी कहो श्रृंगार वर्णन में तुम्हारा कोई जवाब ही नहीं।

चारुदत्त – सत्य में ऐसा लगता है मानों स्वर्ग सुंदरी श्रृंगार सुसज्जित हो स्वयं काव्यरसिया को प्रेम करने धराल पर उतर आई हो।

देवदत्त – इतनी सुंदर रचना सुनकर तो बनारसी लगता है कि यदि समाट को भी ये काव्य सुना दो तो यो भी राज्य पाठ छोडकर कल्पना लोक में जा बसे।

चारुदत्त – वैसे इस कवित रचना का नाम क्या रखा है तुमने और ये तो बहुत पृष्ठों की दिख रही है।

बनारसी – इस कवित रचना का नाम तो मैंने नवरसपदावली रखा है और लगभग 1000 दोहा चौपाई का काव्यग्रंथ है ये।

गुड्डू रंगीला – कुछ भी कहो दिल बाग बाग हो गया मन तो करता है तुम सुनाते ही रहो बनारसी और हम सुनते ही रहे।

चारुदत्त – ऐ रंगीला सुनाते ही रहो सुनाते ही रहो अरे कुछ घर द्वार के काम नहीं है। भुल गया तेरी अम्मा ने बाजार से कुछ लाने को कहाँ था।

गुड्डू रंगीला – हे राम मैं तो भूल ही गया चलो जल्दी चलो।

देवदत्त – हाँ हाँ चलो चलो नहीं तो आज तो इसकी अम्मा इसकी खटिया खड़ी और बिस्तर आड़ा ही कर देंगी। इस रंगिले गुड्डू को।

चारुदत्त – ठीक है मित्र चलते है शाम को मिलो गोमती तट पर वहाँ जमायेंगे काव्यरसिकों की महफिल। गोमती की धार में डूब रस को मिला देंगे फिर देखना सारा का सारा बनारस रंग रसिया बनजायेगा। (मित्र चले जाते है)

(तभी किसी की अंतिम यात्रा निकलने की आवाज आती है राम नाम सत्य है सत्य बोलो गत्य है)

बनारसीदास – अरे ये किसकी शव यात्रा जा रही है अरे ये तो पुण्यकुमार का पुत्र हांडी लिये हुये है तो क्या

पुण्यकुमार नहीं रहे सुबह ही तो मुझे मंदिर के बाहर दिखे थे। जीवन की क्षणभंगुरता भी जल के बुद बुदे के समान है। पता नहीं कब किसके प्रस्थान का समय आ जाये और एक में हूँ की अपनी ही धुन में मस्त चला जा रहा हूँ …न परिवार, न व्यापार न धर्म का विकल्प …धिक्कार है ये भी कोई जीवन है। कुछ करो बनारसी कुछ करो महान जैनकुल में उत्पन्न होकर भी धर्म विष्णु प्रवर्तन क्या ये शोभा देता है।

(तभी अस्थमल ढोर समूर साहब का आना होता है)

बनारसी दास – अरे आइये आइये पिताजी। जयजिनेन्द्र (कहकर पैर पडते है) बैठिये बैठिये।

अस्थमल – बेटा बनारसी आजकल कहाँ रहते हो दिखाई ही नहीं देते अनेक बार घर पर भी आया पर तुमसे मिलना ही नहीं हुआ। पंडित जिनकुमार जी मिले थे उन्होंने मुझे यह आचार्य कुन्दकुन्ददेव कृत समयसार जी दिया बहुत ही महान ग्रंथराज है मैंने इसका स्वाध्याय भी किया जितना भी समझ पाया उतने में ही बहुत आनंद मिला तो लगा कि तुम्हें भी अध्ययन के लिये दे दूँ। तुम तो वैसे ही कविता प्रेमी हो शायद तुम इसकी गहराई में ज्यादा अच्छे से उतर सकोगे।

बनारसीदास – जी धन्यवाद। समयसार… इस ग्रंथ को हाथ में लेने ही कुछ अलग ही अनुभूति हो रही है। ऐसा क्या है इसमें इतना मोटा ग्रंथ होने पर भी कुछ वजन ही महसूस नहीं हो रहा है। लगता है कुछ अदभुत बात है इसमें चलो समय मिला तो अध्ययन करूँगा। (खोलकर देखते है एक पुष्ट श्लोयक का मिलता है) अरे इसमें रखे हुये पुष्ट पर तो कुछ लिखा हुआ है)

राग उदय जब अंध भये सहज सब लोगन लाज गवाई
सीख बिना नर सीख रहे बिषयादिक सेवन की सुगराई
ता में जे जीव रचे रस काव्य कहाँ कहिये इनकी निंदुराई
अंध असुजन की अंधियन में झांकत है रज राम वृहाई ॥

अरे इस ग्रंथ में रखे श्लोयक पुष्ट की बात तो मानो मेरे ही लिये लिखी है। मैं ये कहाँ रचा पचा हूँ ये श्रृंगार रचनायें तो मेरे मन को विकृत कर देती है तो फिर अन्य किसी का क्या हित करेगी। ये कोई आनंद नहीं ये तो विषयों की आसक्ति में होने वाली पागलपन की दशा है। मित्र चाऊदत तुमने कहाँ था कि इस नवरस को गोमती की धार में मिला कर इसके श्रृंगाररस से सारे वाराणसी को रंग रसिया बना देंगे। लेकिन अब ये गोमती की धार में नहीं गोमती के रसातल की भेट चढेगा।

बैंक साउंड (इन्ही विचारों की उथेड बुन करते हुये बनासीदास अपने घर के छत पर पहुँच गये तभी एक घटना और घटी, बनारसीदास का पैर फिसला और वह नीचे गिर पड़े, रत्न की धारा मस्तक को लहुलहान कर वह उठे)

बनारसीदास – आह बडी जोर से चोट लगी है मेरे सिर से रक्त का प्रवाह रुकने का नाम ही नहीं ले रहा …है भोलेनाथ… अरे ये क्या मैंने शिव की इतनी पूजा भक्ति की, कहाँ है वे शिव जो मुझे विपत्तियों से भी बचाने नहीं आते, कैसे है वे भगावान न खोटे मर्गों पर जाने दे रोका और न ही मेरे ठगमगाते कदमों का थामने आये। ऐसे अशरण देव की शरण में जीवन खोने चला था मैं …नहीं बस अब और नहीं आज से इनकी भक्ति के विकल्प का परित्याग करता हूँ, और ये नवरस रचना अब मेरे किसी प्रयोजन की नहीं अब इसका स्थान गोमती की गहराईयाँ ही है।

(गोमती तट पर संध्याकाल मित्र प्रतीक्षा कर रहे है)

गुड्डु रंगीला – बनारसी अरे बनारसी कहाँ जा रहे है हम लोग यहाँ बैठे है।

चाऊदत – बनारसी तो पूरी पोथी ही लेकर आ गया… लगता है आज महफिल देर रात तक चलना है।

देवदत – लेकिन ये नॉव पर सवार होकर कहाँ जाने को आतुर है …अरे बनारसी सुनो क्या हुआ हम भी आ रहे है भाई।

बनारसी – मित्रों बताओं आज तक विषपान से कौन तिरोगी हुआ है मैंने ये रचना अंधों की आंख में धूल झोंकने जैसा काम कर रही है। अब मैंने सोच लिया है इसे गोमती की भेंट चढना ही होगा।

गुड्डु रंगीला – अरे ये क्या करने जा रहे हो बनारसी। दिमाग तो ठीक है ना इतनी मेहनत से सुंदर श्रृंगार काव्य बनाया और उसे गोमती में बहा देना चाहते हो। यदि तुम्हें इसका लाभ नहीं लेना है तो लाओ हमें दे दो। इसका रसपान कर हम ही तुम होते रहेंगे।

बनारसीदास – नहीं मित्रों ये विषय वासनाओं को बढाने वाली रचनाओं से किसी का लाभ नहीं होगा इसका योग्य स्थान गोमती का रसातल ही है (कहकर नवरसपदावली रचना प्रवाहित कर देते है)

देवदत – हे भगावान बनारसी तुमने ये क्या कर दिया।

बनारसीदास – नहीं मित्रों आज मेरा मन कहता है कि

एक झूठ जो बोलें कोई, नरक जाई दुख देखें सोई।
में तो कल्पित वचन अनेक कहे झूठ सब साचू न एक ॥

क्षमा करना मित्रों अब बनारसी को अपनी भूल ख्याल में आ गई है और नीति भी तो यही कहती है कि पाना नहीं जीवन को बदलना है साधना।

सूत्रकार – सत्संगति के समान कोई सच्चा मित्र नहीं होता और कुसंगति जैसा कोई दुतरा शत्रु इस जगत में नहीं है। यद्यपि बनारसीदासजी के यह कृति यदि आज उपलब्ध होती तो हिन्दी साहित्य के श्रृंगरिक काव्यों में उसका सर्वोच्च स्थान होता। बनारसीदास ने न केवल अपनी श्रृंगार रचना नवरस को गोमती नदी में बहाया किन्तु साथ ही अपने उन व्यसनी मित्रों से भी नाता तोड़ दिया। प्रांत: ब्रम्ह मुर्हुत में उठकर प्रभु का ध्यान स्मरण करना प्रारंभ कर दिया। जिनदर्शन के बिना अब दातुन भी नहीं करते थे। व्रत उपवास दिन रात जैन कथा का पठन चितन अब जीवन का अंग बन गया। सच ही कहा है

कहँ तोष कोउ न तर्जै, तर्जै अवस्था पाई। जैसें बालक की दया, तरन भए मिटि जाइ।

उदे होत सुभ करम के, भई असुभ की हानि। तारें तुरित बनारसी, गही धरम की बानि ॥

पिता खगरासेन को अपने पुत्र के जीवन में ऐसा परिवर्तन देख प्रसन्नता होना भी स्वाभाविक था। तब उन्होंने बनारसीदास को व्यापार कर आजीविका सुढ्ढ करने हेतु प्रेरित किया।

दृश्य-5
(बनारसी दास की असफल व्यापार यात्रा)
(पात्र – बनारसीदास, पिता खगरासेन, लछमीनारायण, बखतराम, मलखान, लटका, झटका सुमितारानी, मोनालीराम, रघुनाथ कंजीड़ी वाला)

खगरासेन पिताजी – बेटा बनारसीदास मुझे प्रसन्नता है कि तुमने खोटी मित्र मंडली व कुसंगति से अपने को दूर कर जीवन में बदलाव लाने का प्रयास किया है। मैं तो अब वृद्ध हो चला हूँ इस कुल की जिम्मेदारी अब ये वृद्ध कांधे कब तक संभाल पायेंगे। अतः मैंने विचार किया है कि मेरे पास जो कुछ भी थोडा बहुत जोडा हुआ धन है उसे लेकर तुम आगरा चले जाओ और वहाँ कुछ व्यापार शुरू कर एक जिम्मेदार गृहस्थ का जीवन जीओं।

बनारसीदास – पिताजी आप सही कहते है मुझे भी लगता कुसंगति से अपने को बचाये रखने के लिये उन प्रसंगों से दूरी बना लेना ही उचित है अतः जैसी आपकी आज्ञा पिताजी।

खगरासेन – तो ये लो मेरी स्वर्णो मुद्रायें, चांदी की पायजेब और कुछ रुपये तथा साथ में बीस मन घी, 2 कुपये तेल

और जीनपुरी कपड़े की गांठ। धन की पोटली समहाल के रखना और आगर पहुँचकर पत्र लिखना नहीं भूलना।

वनारसीदास – जी पिताजी! परन्तु मुझे आप सभी की बड़ी चिंता भी होती है।

खरासेन – तुम यहाँ की चिंता मेरे ऊपर छोड़ो वनारसी एवं जाने को तैयारी करो मैं जैसे तैसे परिवार की व्यवस्था चला लूंगा।

वनारसीदास – ठीक है पिताजी मेरे साथ सेठ धनवंत एवं राजनाथजी के पुत्र भी व्यापार को साथ जाने तैयार है।

लक्ष्मीनारायण – मित्र वनारसी तुम्हारी तैयारी हो गई है तो अपन फिर आगरे के लिये प्रस्थान करे बखतारम भी आ गया है।

वनारसीदास – हाँ चलो सारा समान बैलगाड़ी पर लाद लिया है हाँ और ये धन की पोटली साथ रख ली है।

बखतारम – तो मित्रों फिर देर किस बात की चलो चलते है।

(बैक ड्राप म्यूजिक गाँव व जंगले से गुजरते हुये का दृश्य)

माईक से……….. प्रतिदिन पाँच कोस की यात्रा करते वनारसी दास इटावा के पास पहुँचे ही थे कि)

बखतारम – अरे देखो तो मौसम कितना खराब हो चला है काले बादलों में तो सारा आकाश ढक गया है अब तो मार्ग भी स्पष्ट नहीं दिखाई देता है भाई

वनारसीदास – लगता है जोरदार बारिस होने वाली है।

लक्ष्मीनारायण – अब तो जाने बचाने के लिये कही शरण खोजना होगी वनारसी भागो भागो बादल फट रहे है

वनारसीदास – सारे बाजार में कहीं तिल भर भी छिपने की जगह नहीं दिख रही दौड़ो दौड़ते तो पेर हई बन गये है ऊपर से मूसलाधार बारिश के साथ चल रही ठंडी हवा सारा शरीर अकड़ने लगा है।

सुमित्तारानी – सुनो भैया आप लोग यहाँ थोड़ी सी जगह है यहाँ बैठ जाओ।

(हाँ हाँ ठीक है बहन बहुत बहुत धन्यवाद)

मोनालीराम – अरे बड़ी आई समाजसेविका इधर खड़े होने की जगह नहीं तेरा खसम पानी से भीगा जा रहा है और तू चली दूसरों को आसरा देने। चुप चाप मुँह मिल के बैठी रह और तुम लोगों किस भाषा में समझा आयेगा चलो निकलो यहाँ से नहीं लगता हूँ अभी दो दो लटठ।

वनारसीदास – अरे अरे भाई क्या करते हो तुम कहते हो तो चले जाते है परन्तु ……….चलो बारिस तो थम गई लेकिन बैलगाड़ी और सारा समान न जाने कहाँ चला गया।

लक्ष्मीनारायण – वनारसी आओ इस चबूतरे पर थोड़ा आराम कर लें फिर सोचगें की आगे क्या करना है।

मलखान पहलव्वान – अरे ओ राहगीरों इस चबूतरे को देखना भी मत नहीं तो टांग तोड़कर हाथ में रख दूंगा। अपने बाप की मालकियत की जगह है ये कोई धर्मशाला का चबूतरा नहीं।

वनारसीदास – भाई हम बहुत परेशान है तुम कहते हो तो हम चले जाते है पर नगाज तो मत हो।

मलखान पहलव्वान – ऐ सुन लगता है तू किस्मत का मारा है ठीक है कुछ खर्चा पानी हो तो निकाल तेरा बदौलत जमाता हूँ।

वनारसीदास – ये लो भाई कुछ बचा ही नहीं है

मलखान पहलव्वान – हाँ हाँ ठीक है (खून खाँटि विछाकर उसके उपर लेट जाता है) इसके नीचे चुपचाप आरामकर लो और सुनह होते ही अपना रास्ता नाप लेना)

(सोने की एक्टिंग करते हुये)

लक्ष्मीनारायण – अरे मेरे धन की पोटली कहाँ चली गई वनारसी

वनारसीदास – हाँ मित्र मेरी भी गांठ कटी है लगता है चूहे गठन काट कर पोटली ले भागे।

बखतारम – हाँ भाई मैने भी अँधेरे में चूहों की चहलकदमी की आवाज सुनी थी।

लक्ष्मीनारायण – हाय री फूटी किस्मत चले थे कुछ नया बनाने यहाँ तो हाथ की भी चली गई।

वनारसीदास – बीती नहीं बिसार आगे की सुध ले चलो अब जो कुछ समान है उसे समेटो और आगे चलो।

बखतारम – अब और नहीं चला जाता चलते चलते साँझ हो गई न जाने कब आगरे की सीमा दिखाई देगी।

(तभी दो गरीब मजदूर दिखाई देते है)

वनारसीदास – अरे भाई सुनो सुनो तो कौन हो तुम क्या नाम है तुम्हारा

जी हमारो नाम लटका झटका आये हम लोग बोडिया को काम करते है।

वनारसीदास – अच्छे मिल गये भाई हमें आगरा जाना है क्या तुम समान ले जाने में हमारी मदद कर सकते हो तुम्हें मेहनताना भी दे देंगे।

लटका झटका – काय नहीं भैया हम तो काम की ही तलाश मे हते।

बखतारम – तो ये लो पोटली उठा लो और जरा जल्दी चलो रात होने को है।

लटका – काय रे बट्टू इतनी घनघोर रात आये मोये तो डर लग रियो है

झटका – तो मोहे कौन सो मोहे चांदनी रात को मजा आ रियो है। लटका मैंने तो सुनो है कि जा इलाकों रंग गडुउआगंज डाकू अन का है कही रस्ते में दबोच लओ साल में तो जायेगो अपनो राम नाम सत्य। और फिर मेरे छोटे छोटे से टुरुआ टुरुईयाँ सट्ठी गोदे हो जाये अनाथ। मैंको न करते ऐसो काम में तो चला लटका

लटका – अरे बाबूजी समालों अपना समान हमें न जाने मुर्बीबत को बोड्रा लेके। रुक झटका में भी आ रयो हूँ

लक्ष्मीनारायण – अरे सुनो सुनो भाई मद्राधार में छोडकर काहे भाग रहे हो।

वनारसीदास – हमारा मेहनताना न तो भी चलेगा लेकिन कम से कम आगरे का मार्ग तो बताते जाओ।

बखतारम – अब क्या करें वनारसीदास

वनारसीदास – भाई धैर्य रखो पंचपरमेष्ठी प्रणोत्कार मंत्र का स्मरण करो इस जगत में वहीं सच्चे शरणभूत है

(जिस तरह लूट पीटकर आगरा पहुँच जाते है, कुछ दिन अपने एक रिश्तेदार के यहाँ रहकर कुछ व्यापार करने का प्रयास करते है परन्तु असफलता ही हाथ लगती है तब पुनः वनारसीदास अपनी काव्यकला के बल पर दो समय की रोटी का इंतनाम कर पाते है इस तरह ७–८ महीने बीत गये एक दिन बाजार में वनारसीदास कहीं जा रहे थे कि तभी आवाज आई

रघुनाथ कन्जीड़ी वाला – अरे कविराज! कहाँ जा रहे है क्या आज आपका उपवास है आज गरमा गरम कन्जीड़ी नहीं खायेंगे क्या। कहीं हमसे कोई नाराजगी तो नहीं

वनारसीदास – नहीं भाई नाराजगी की क्या बात तुम जैसे मद्रू व्यवहारी और निष्ठ व्यंजन बनाने वाले अच्छे लोग तो हटने से भी नहीं मिलते।

रघुनाथ कन्जीड़ी वाला – तो फिर बात क्या है आज मेरे दुकान में रुके बिना सीधे सीधे कहाँ चले जा रहे थे।

वनारसीदास – बस बाजार में कुछ कार्य करने के लिये स्थान की तलाश में निकला था।

रघुनाथ कन्जीड़ी वाला – ये लो गरमा गरम कन्जीड़ी।

वनारसीदास – अरे कब तक इस तरह मुझा पर भरोसा कर मुफ्त में खिलाते रहोंगे भाई। अभी तो मुझे पहले ही तुम्हें ५–६ माह का पुराना उधार देना बाकी पड़ा है। व्यापार तो कुछ हाथ में जम नहीं रहा ऐसा बोझ बढ़ाकर कैसे काम चलेगा।

रघुनाथ कन्जीड़ी वाला – कविराज आप भी न्यारों का तनाव लेकर बैठे है मुझे पूरा भरोसा है कि आज नहीं तो कल आप मेरा उधार चुका ही देंगे। देखो मैंने ये अच्छे से जानता हूँ कि सच्चा जैन कभी किसी को धोखा नहीं दे सकता। जो लोग प्रतिदिन मंदिर जाते है, छानकर पानी पीते है, छोटे से छोटे जीवों के प्रति दया का परिणाम रखते है वो क्या किसी का पैसा खा जायेंगे। अरे आपके ही तो कारण मैंने अपनी दुकान में भी पानी छानकर ही व्यंजन बनाना चालू किया है।

वनारसीदास – सच में भाई रघुनाथ तुम हृदय के बड़े अच्छे इंसान हो। निश्चित रहना वनारसीदास तुम्हारा एक भी


वनारसीदास – बीती नहीं बिसार आगे की सुध ले चलो अब जो कुछ समान है उसे समेटो और आगे चलो।

बखतारम – अब और नहीं चला जाता चलते चलते साँझ हो गई न जाने कब आगरे की सीमा दिखाई देगी।

(तभी दो गरीब मजदूर दिखाई देते है)

वनारसीदास – अरे भाई सुनो सुनो तो कौन हो तुम क्या नाम है तुम्हारा

जी हमारो नाम लटका झटका आये हम लोग बोडिया को काम करते है।

वनारसीदास – अच्छे मिल गये भाई हमें आगरा जाना है क्या तुम समान ले जाने में हमारी मदद कर सकते हो तुम्हें मेहनताना भी दे देंगे।

लटका झटका – काय नहीं भैया हम तो काम की ही तलाश मे हते।

बखतारम – तो ये लो पोटली उठा लो और जरा जल्दी चलो रात होने को है।

लटका – काय रे बट्टू इतनी घनघोर रात आये मोये तो डर लग रियो है

झटका – तो मोहे कौन सो मोहे चांदनी रात को मजा आ रियो है। लटका मैंने तो सुनो है कि जा इलाकों रंग गडुउआगंज डाकू अन का है कही रस्ते में दबोच लओ साल में तो जायेगो अपनो राम नाम सत्य। और फिर मेरे छोटे छोटे से टुरुआ टुरुईयाँ सट्ठी गोदे हो जाये अनाथ। मैंको न करते ऐसो काम में तो चला लटका

लटका – अरे बाबूजी समालों अपना समान हमें न जाने मुर्बीबत को बोड्रा लेके। रुक झटका में भी आ रयो हूँ

लक्ष्मीनारायण – अरे सुनो सुनो भाई मद्राधार में छोडकर काहे भाग रहे हो।

वनारसीदास – हमारा मेहनताना न तो भी चलेगा लेकिन कम से कम आगरे का मार्ग तो बताते जाओ।

बखतारम – अब क्या करें वनारसीदास

वनारसीदास – भाई धैर्य रखो पंचपरमेष्ठी प्रणोत्कार मंत्र का स्मरण करो इस जगत में वहीं सच्चे शरणभूत है

(जिस तरह लूट पीटकर आगरा पहुँच जाते है, कुछ दिन अपने एक रिश्तेदार के यहाँ रहकर कुछ व्यापार करने का प्रयास करते है परन्तु असफलता ही हाथ लगती है तब पुनः वनारसीदास अपनी काव्यकला के बल पर दो समय की रोटी का इंतनाम कर पाते है इस तरह ७–८ महीने बीत गये एक दिन बाजार में वनारसीदास कहीं जा रहे थे कि तभी आवाज आई

रघुनाथ कन्जीड़ी वाला – अरे कविराज! कहाँ जा रहे है क्या आज आपका उपवास है आज गरमा गरम कन्जीड़ी नहीं खायेंगे क्या। कहीं हमसे कोई नाराजगी तो नहीं

वनारसीदास – नहीं भाई नाराजगी की क्या बात तुम जैसे मद्रू व्यवहारी और निष्ठ व्यंजन बनाने वाले अच्छे लोग तो हटने से भी नहीं मिलते।

रघुनाथ कन्जीड़ी वाला – तो फिर बात क्या है आज मेरे दुकान में रुके बिना सीधे सीधे कहाँ चले जा रहे थे।

वनारसीदास – बस बाजार में कुछ कार्य करने के लिये स्थान की तलाश में निकला था।

रघुनाथ कन्जीड़ी वाला – ये लो गरमा गरम कन्जीड़ी।

वनारसीदास – अरे कब तक इस तरह मुझा पर भरोसा कर मुफ्त में खिलाते रहोंगे भाई। अभी तो मुझे पहले ही तुम्हें ५–६ माह का पुराना उधार देना बाकी पड़ा है। व्यापार तो कुछ हाथ में जम नहीं रहा ऐसा बोझ बढ़ाकर कैसे काम चलेगा।

रघुनाथ कन्जीड़ी वाला – कविराज आप भी न्यारों का तनाव लेकर बैठे है मुझे पूरा भरोसा है कि आज नहीं तो कल आप मेरा उधार चुका ही देंगे। देखो मैंने ये अच्छे से जानता हूँ कि सच्चा जैन कभी किसी को धोखा नहीं दे सकता। जो लोग प्रतिदिन मंदिर जाते है, छानकर पानी पीते है, छोटे से छोटे जीवों के प्रति दया का परिणाम रखते है वो क्या किसी का पैसा खा जायेंगे। अरे आपके ही तो कारण मैंने अपनी दुकान में भी पानी छानकर ही व्यंजन बनाना चालू किया है।

वनारसीदास – सच में भाई रघुनाथ तुम हृदय के बड़े अच्छे इंसान हो। निश्चित रहना वनारसीदास तुम्हारा एक भी

पैसा उधार नहीं रहने देगा ।

सूत्रकार – और फिर बनारसीदासजी ने कड़ी मेहनत से बाजार में काम कर जो कुछ थोड़ा बहुत पैसा जोड़ा उससे रघुनाथ कच्छौड़ी वाले को पूरा उधार चुका दिया । ऐसा करके उन्होंने जैनी के प्रति लोगों के भरोसे को टूटने से बचा लिया । इस विषय मेरा मानना की हम जैनियों का भी ये बड़ा कर्तव्य है कि हमारा लौकिक जीवन इतना पारदर्शी व आदर्श हो कि लोग हमारी किसी गल्ती से सम्पूर्ण जैन समाज, देव शास्त्र गुरु को नीची नजर न देखने पावे । चलिये देखते हैं व्यक्तित्व एक विकास शील प्रक्रिया है व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत उसके जीवन में निरन्तर परिवर्तन व परिवर्धन हो रहता है अध्यात्म रस लगने से पूर्व बनारसीदास का जीवन भी पूर्णतः बहिर्मुखी ही था आड़े देखते मिथ्यात्व के चलते जीव की कैसी कैसी दुर्गा होती है ।

दृश्य—6
(मिथ्यात्व रोग से ग्रस्त बनारसी दास)
(बनारसीदास, ग्राहक, निराशाराम, दुकानदार,)

बनारसीदास – कोड़ी ले कोड़ी ! पैसे की 10 कोड़ी ।

ग्राहक – अरे बहुत महंगी लगाई हो कोड़ खाने की चीज आये तनिक देने के भाव कहो तो ले ले ।

बनारसीदास – सच है भैया खाने की चीज नहीं है तब तो कोड़ी के भाव दे रहे है चलो तुम । पैसे की 12 ले लो ।

ग्राहक – मैं तो पन्द्रह ले हूँ पटना है तो कहो नहीं रहन दो ।

बनारसीदास – चलो ले जाओ भाई तुम भी क्या याद रखोगे ।

निराशाराम(डोगी सधु) अलक निरंजन अलक निरंजन क्या देवे रहे ।

बनारसी दास – कौन हो तुम बाबा

निराशाराम – नादान बालक हम से ही पूछते हो कौन है हम नास्तिक बालक लगता है तुम हमारे मंत्र साधना की महिमा से अपरिचित हो । यहाँ कौन है जो हमको नहीं जानता ।

दुकानदार – ऐ झाङरादास मेरी दुकान से दूर रहे कितने दिन से नहाया तक नहीं दिख रहा है तेरी दुर्गन्ध मेरे कङचे में समा गई तो कोई नहीं खरीदेगा ।

निराशाराम – मूर्ख चुप रह तू नहीं जानता बाबा के क्रोध को …भस्मीभूत कर दूंगा ।

दुकानदार – भस्मो भूत करेगा तू मुझे …भूत कहाँ के चल निकल यहाँ से ।

निराशाराम – अर रररर भूम भाम चूम चाम फकक ।

दुकानदार – निकलता है कि जमाड़ तेरी (लकड़ी से भगाता है ) भूम भाम चूम चाम

(थोड़ी दूर जाकर वापिस बनारसीदास की दुकान के सामने आ जाता है)

निराशाराम – बच्चा ये तूं क्या बेचा रहा हैं तेरी किस्मत की लकीरें तू और कुछ बता रहाँ हैं

बनारसीदास – दिखाई नहीं देता क्या बाबा जिनके बोझ से तुम्हारी गर्दन ठटकी जा रही है वो कोड़िया ही बेच रहा हूँ । तुम भी ले लो बाबा इतनी कम मूल्य में इतनी सुन्दर कोड़िया पूरे हाट में नहीं मिलेगी ।

निराशाराम – बच्चा बाबा को कोड़ियों की क्या जरूरत बाबा के पास तो स्वर्ण की दीनार बनाने वाला मंत्र है ।

बनारसी दास – क्या कहाँ स्वर्ण की दीनार बनाने का मंत्र ।

निराशाराम – हाँ स्वर्ण की दीनार वो तो तेरी किस्मत की रेखा देख में रूक गया बच्चा । अब जल्दी बता क्या तुझे अपनी किस्मत बदलनी है ।

बनारसीदास – ठीक हैं बाबा अब मेरी किस्मत से तुम भिल हो गये हो तो बता ही दो ।

निराशाराम – देख बच्चा बाबा तो निर्मोही है ऐरी महान मंत्र विद्या के होने पर भी मैं इस मंत्र विद्या का प्रयोग स्वयं

अपने लिये नहीं करता । लेकिन तूं भाग्य शाली है बच्चा… तेरी किस्मत स्वर्ण उपर वाली लिख रहा है ।

बनारसीदास – ठीक हैं बाबा अब जरा वो मंत्र तो सिखा दो और उसका पाठ कैसे करना है वह विधि भी बता दो

निराशाराम – सुन बच्चा मैंने बहुत परिश्रम से एकांत साधना द्वारा पाङआने में बैठकर इस मंत्र की सिद्धि की है अतः तुम्हे भी यह ध्यान रखना है कि प्रतिदिन तुम्हे शांत मन से पाङआने में एकांत में बैठकर इस मंत्र का जाप करना है । और यदि एक वर्ष तक तुमने इस मंत्र का पूरी आस्था भक्ति से चिंतन कर लिया तो तुम्हरो घर के दरवाजे पर प्रतिदिन प्रातः एक सोने की दीनार गिरा करेगी ।

बनारसीदास – क्या कहते हो बाबा पाङआने जैसी अपवित्र जगह पर मंत्र साधना ।

निराशाराम – बच्चा तूं नहीं जानता गंदगी तो आदमी के दिमाग व मन में होती हैं मैं तो पाङआने को वो पवित्र स्थान मानता हूँ जहाँ हम अपनी गंदगी को छोड़कर पवित्रता का आनंद भोगते हैं । विकारों के बोझ से हल्के हो जाते हैं ।

बनारसीदास – छी छो बाबा गजब है तुम्हारी पवित्रता की परिभाषा ।

निराशाराम – अब जल्दी बता बच्चा तुझे वो मंत्र चाहिए कि नहीं बाबा की साधना का समय हो रहा है ।

बनारसीदास – चलो ठीक है आपकी साधना इतना जोर मार ही रही है तो अब बता दो ।

निराशाराम – भू भाम छुम छाम सूम साम धनदंतदेवा प्रसन्न भवाः ।। (थोङे में से कागज निकालकर) को बच्चा ये मंत्र इस कागज पर लिखा है इसकी सच्चे मन से साधना करना भगवान तेरी किस्मत का लेखा पलट देगा

बनारसीदास – ठीक हैं बाबा मैं भी अपने भाग्य की परीक्षा करके देख लेता हूँ । धन्यवाद

निराशाराम – धन्यवाद बच्चा ये क्या वस्तु है बाबा ने तुम्हे लक्ष्मीपुत्र बनाने का मंत्र दिया और तू बस धन्यवाद कहकर बाबा को विदा कर देना चाहता है । प्रसन्न चित से जो कुछ तेरे पास धन है बाबा की झोली में डाल दे । बाबा की दुआयें कभी खाली नहीं जाती बच्चा ।

बनारसीदास – ये लो मेरे पास कुछ दीनार है जो मैंने बहुत परिश्रम से जोड़ी थी । लेकिन बाबा मेरे साथ धोखा तो नहीं होगा न, सोने की दीनार तो रोज गिरेगी न ।

निराशाराम – भरोसा रख बाबा का बच्चा बाबा झूठ नहीं बोलता है ।

सूत्रकार – (धन लेकर बाबा चला जाता है…सत्य ही है मिथ्यात्व अज्ञानता से बड़ा इस जीव का कोई दुसरा शत्रु नहीं है जो स्वयं धन में सुख मानकर बैठे है खोटे वेश मान प्रतिष्ठा में अपने जीवन की सफलता मानते है यह स्याथीं क्या किसी का हित करेंगे । वास्तव में तो सच्चे हित का मार्ग बताने वाले एकमात्र वीतरागी देव शास्त्र गुरु ही है जगत में इन जैसा और कोई उपकारी नहीं है भाई …और उधर बनारसीदास उस ढोंगी की बात पर विश्वास कर अपनी जमा पूंजी तो पहले ही गवा बैठे मंत्र साधना भी की तो क्या हाथ आया कुछ नहीं । आता भी कैसे अपने कर्म सिवाय जीव का और न फल देता कुछ भी । आखिरकार यहाँ से भी बनारसीदास का निराशा ही हाथ लगी । यद्यपि बनारसीदास का जीवन असफलता की कहानी का बयान बड़ी सफलता पूर्वक करता है और फिर समय कितके लिये कब ठहरा है संघर्षो की यात्रा आगे की और बढ चली एक असफल व्यापारी बनारसीदास अपने ससुर अस्थमलजी एवं मित्र भानूचंद्र के साथ एक बार फिर पटना की और यात्रा को चल पङे ।

दुश्य—7

जैनेऊ कथा

(पात्र — ससुर, बनारसीदास, भानुचंद, 2 चोर, रामपाल चौधरी चोरों का सरदार

(पटना की ओर जाते हुये)

अस्थमल ससुर – बेटा बनारसी दास क्या तुमने अपनी यात्रा की तैयारी पूर्ण कर ली है ।

बनारसीदास – जो पिताजी मैंने सभी आवश्यक वस्तुयें रख ली है बस मित्र भानुचंद का इंतजार है उसे समय पर आने को कह तो दिया था पता नहीं निलंब क्यों कर रहा है ।

अरथमल – पता नहीं आजकल के युवाओं के जोश को क्या हो गया, बहुत प्रमादी हो गये है, किसी विषय पर परिपक्वता व गंभीरता से विचार नहीं करते ।

भानुचंद – प्रणाम चाचाजी ! हाँ तो मित्र और क्या देरी है अपने चलने में ।

अरथमल – प्रणाम बेटा कहाँ रह गये थे बनारसीदास बना तुम्हें पता तो है ना हमें पटना पहुंचना है और हमारी मंजिल तक पहुंचने का मार्ग दुर्गम व कठिनाइयों से भरा हुआ है । साँझ ढलने के बाद पटना की ओर जाने वाला रास्ता सुरक्षित नहीं रह जाता, रास्तों में चोरों का एक गाँव भी पड़ता है आज तक वहाँ से कोई भी सुरक्षित नहीं निकल पाया है । चलो अब विलंब न करो जल्दी चलो ।

बनारसीदास – हाँ चलो मित्र भानुचंद आइये चाचाजी

(पटना की ओर आगे बढ़ने लगते है )

भानुचंद – चलते चलते पैर जवाब दे लगे है चाचाजी आप कहे तो कुछ देर यहीं विश्राम कर ले थोड़ा जलपान कर फिर चलते है ।

अरथमल – ठीक है उस वृक्ष के नीचे उचित स्थान दिख रहा है । थकान तो मुझे भी बहुत लगने लगी है । लेकिन हमें साँझ होने से पहले कांसीरत ग्राम के जंगलों को पारकर लेना है कहते हैं कि यह ग्राम चोरों लुटेरों की बाबाओं से भरा पड़ा है ।

बनारसीदास – मुझे नहीं लगता है कि हम साँझ के पहले वो ग्राम पार कर पायेंगे, परन्तु मेरे पास एक युक्ति है मैंने सुना है कि चोर ब्राम्हणों को भगवान का प्रतिनिधि जानकर उन्हें परेशान नहीं करते, मेरे थैले में कुछ सूत का धागा पड़ा है इसको हम जनुयें के रूप में धारण कर सकते हैं । मैंने तो पहन भी लिया ये लीजिये पिताजी, लो भानुचंद तुम भी पहन लो ।

भानुचंद – हाँ लाओ मित्र मैं भी पहन लेता हूँ लेकिन तिलक के लिये क्या करेंगे

बनारसीदास – उसका भी उपाय है मेरे पास मैंने हल्दी वाला पीला नमक भोजन के लिये साथ रखा था इसे गीला कर तिलक बना लेते है ।

अरथमल – वाह बेटा बनारसीदास एक बात तो इस विषम समय में भी तुम बड़े शांत चित से युक्तियाँ निकाल लेते हो । लेकिन अब शीघ्रता करो उठाओ अपना समान हम जल्दी आगे बढ़ना चाहिये ।

बनारसीदास – वैसे पिताजी जैन तो उसी को कहते हैं जो कभी विचलन नहीं होते है ।

अरथमल – ठीक कहा लेकिन एक बात ये भी याद रखना बेटा भयभीत कभी नहीं होना परन्तु सावधान सदा रहना

(तभी दो चोर पीछे से भाला टिका देते है)

चोर – कोई हिलेगा नहीं एक दमई सावधान ।

बनारसीदास – कौन हो तुम लोग भाई और हमें इस तरह से क्यो रोककर पकड़ रहे हो ।

चोर – हा हा हा हम है चोरो के सरदार चौधरी रामपाल ठाकुर के सबसे अनुभवी चोर और अपना काम है राहगीरों का वजन हल्का करना । चलो इन तीनों को रस्सी से बाँधकर सरदार के पास ले चलो वहीं करेंगे इनका हिसाब किताब । अब मुँह बंद करके चुपचाप चलो । (चिट्ठाकर) सरदार सरदार जरा यहाँ तो देखो हम आज कितना मोटा माल लाये है चो भी एक नहीं तीन तीन ।

रामपाल ठाकुर – जियो मेरे रंगीले रतनों ! सरदार बहुत खुश हुआ रे जरा इनके थोबडे पे उजाला तो दिखा ।

चोर – ये लीजिए सरदार ! (लालटेन से चेहरा देखते हुये)

रामपाल ठाकुर(चेहरा देखते हुये) तिलक SS जनुयें SS – ना मुग्लों आखे के अंधो नाम नेनसुख ये तुम्हें किन्हे उठा लाये । पकड़ जरा लालटेन पहले तो ये लो तुम्हारी आज की मेहनत का हिस्सा ।(दोनों को तमाचे मारता है)

चोर – सरदार गल्ती तो भई लेकिन का भई ये नहीं समझा आओ ।

रामपाल ठाकुर – ब्राम्हुण महाराज … मूर्खों ये तुम इनको क्यों उठा लाये तुमको पता नहीं 7 पुस्तों से हमारे पूर्वज इनकी पूजा करते आये है । इनके ही आर्शीवाद से तो हमारा ये धन्धा चल रहा है । जल्दी इनकी रस्सी खोलों नालायको

महाराज क्षमा करना ये मुख्य नादान है । आपको बड़ा कष्ट हुआ होगा अब आप कोई चिंता न करें आप सभी कहाँ दूर से चलकर आये हुये मालुम होते हैं मेरे घर पर आप विशिष्टता पूर्वक आराम करें सुबह होते ही में स्वयं आपको सुरक्षित आपकी मंजिल तक छोड़ने का इन्तजाम कर दूंगा । अरे तुम लोग अभी तक यहीं खड़े हो जल्दी से वामन महाराजों के आराम की व्यवस्था करो (जाओ)

चोर – जी सरदार अबै करे देते है ।

रामपाल – और सुनो महाराजन की सेवा में कोई कमी नहीं करना बड़े भाग्य से इनके चरण हमारे ठिकाने पर पड़े हैं

चोर – सुन तो लई दर्दा है । तुम्हारे महाराजन के चक्कर में हमको तो परसाद तो मिलई गओ

सूत्रकार – विधि का विधान भी विचित्र है जहाँ एक ओर विपत्तियाँ आती दिख रही थी और वहाँ अमले ही पल उदय ने करवट ली तो डाकू ही सेवक बनकर सारी व्यवस्थायें करना लगा । जिन्नवाणी में सत्य ही लिखा है कार्य विकल्पों से नहीं होता । उदय अनुकूल हो तो छोटी छोटी युक्तियाँ भी बड़े बड़े काम कर देती हैं । यह बात तो स्पष्ट है के परिस्थितियों व परिवेश के कारण ही कवि का जीवन बहिर्मुखी हो जाना एक सहज प्रक्रिया थी । किन्तु कवित का गुण तो मानो बनारसीदास जन्म से साथ लेकर आये थे यही कारण है कि हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध कवि तुलसीदास का भी बनारसीदास से निकट का परिचय था और दोनों ही मित्रों के मध्य का व्यवहार भी उनकी कविता कलाओं से अछूता नहीं था । आइये देखते हैं दो कवि मित्रों के जीवन की एक झलक …

दृश्य–8
(तुलसीदास व बनारसीदास का मिलन)
(पात्र – तुलसीदास, बनारसीदास, ग्राहक, राहगीर)

हाट का दृश्य (सब्जी ले लो, सब्जी हरी ताजी सब्जी…की आवाज आती है )

तुलसीदास – अरे ये काले उडद की दाल कौन बेच रहा है लगता है कहीं ये मित्र बनारसीदास तो नहीं, पास जाकर देखना पड़ेगा । हूँ SS ये तो बनारसीदास ही हैं ।

(बनारसीदास अन्य ग्राहको से सौदा करने में व्यस्त)

अरे भाई ये क्या श्याम वर्ण की वस्तु है और क्या भाव दे रहे हो (जवाब नहीं मिलता)

अरे सुनते हो चतुर व्यापारी मित्र जरा इधर भी ध्यान दे दो हम भी माल चुकाकर ही वस्तु लेते हैं ।

बनारसीदास – काले उड्दा की दाल है हाट में सबसे कम मुल्य में सिर्फ मेरे पास ही है ले लो (देखते हुये)

तुलसीदास – कृष्ण वरण कहो केते,

बनारसीदास – रावण के मुख जेते

तुलसीदास – पवननुजय करी देहो,

बनारसीदास – नारायण मुख लेहो ।

(सूत्रकार – तुलसीदास अपने कवित के अदाज़ में पुछते है कृष्ण वरण कहो केते – ये श्याम वर्ण की उड्ड की दाल क्या भाव दो तो बनारसीदास कहते रावण के मुख जेते अर्थात् । ऐसे की 10 पाई तब तुलसीदास कहते है पवननुजय करी देहो अर्थात् फटक कर छिलका उतारकर देओगे क्या तब बनारसीदास कहते नारायण

मुख लेही याने यदि फटक कर दुंगा तब । पैसे में ९ पाई दुंगा । इस तरह मध्यकालीन युग के दो महान मित्र कवियों की बातों भी कविता शैली में हुआ करती थी ।

बनारसीदास – अरे मित्र कहो कैसे हो बहुत दिन हुये तुमसे मिले हुये आज कल तो बिलकुल दिखाई नहीं देते,

तुलसीदास – हाँ बात तो तुम सही कह रहे हो बनारसीदास । सांसारिक उठा पटक से चित्त को हटाकर प्रभु राम की भक्ति में रत रहने की कोशिश कर रहा हूँ । और तुम बताओ मित्र तुम्हारा क्या चल रहा है

बनारसीदास – बस जैसा तुम्हारा हाल है वैसा ही हमारा भी मित्र …हम भी घर गृहस्थी की उधेडबुन में रहते हुये अपने आत्माराम की खोज में लगे है ।

तुलसीदास – बहुत दिनों से तुमसे मिलने का भाव चल रहा था । बनारस में आते ही मित्र बनारसीदास का विकल्प तो आ ही जाता है ।

बनारसीदास – चलो भाग्यशाली है हम कि विचारों में ही सही मित्रों के हृदय में स्थान तो सुरक्षित है हमारा ।

तुलसीदास(ठोंढे़ मे हाथ डालकर) वैसे बनारस में रहकर में न तो भगवान पार्श्वनाथ को भूला हूँ और न ही उनके भक्त बनारसीदास को । तुम आज भले मिल गये ये देखो मैंने भगवान पार्श्वनाथ की भक्ति में कुछ रचना की है सुनकर तो बताओ गुणानुकूल काव्य है या नहीं ।

जिहि नाथ पारस जुगल, पंकज चित चरनन जास ।

सिद्धि सिद्धि कमला अजर, राजति भजत तुलसीदास ।

बनारसीदास – वाह मित्र वाह ! सुन्दर काव्य रचना – जिति नाथ पारस जुगल पंकज क्या सुंदर शब्द संयोजन किया । तुम्हारी काव्यवलि सुनके मित्र भगवान पारसनाथ की मुद्रा दृष्टि के सन्मुख आ गयी ।

तुलसीदास – कविच रचना सफल हो गई पारसनाथ के भक्त को काव्य रस भा गया ।

बनारसीदास – मित्र बहुत दिनों में आये चलो इस गरीब की कुटिया में कुछ आराम भोजनपानादि कर लेना ।

तुलसीदास – नहीं मित्र ! मुझे आवश्यक कार्य से अपने नातेदार परिचित के यहाँ आया हूँ और कुछ परिस्थितिवश यहाँ अभी आने जाने का क्रम चलेगा निश्चय ही पुनः मिलने पर तुम्हारे घर अवश्य चलूंगा ।

अरे हां एक बात और याद आई मैंने भगवानराम को समर्पित कर रामायण की रचना की एक प्रति तुम्हें देने का भाव था । इसका अध्ययन कर मुझे अपने विचारों से अवगत अवश्य करना ।

बनारसीदास(ग्रंथ लेते हुये) क्यों नहीं मित्र अवश्य ।

तुलसीदास – तो फिर ठीक है मुझे आज्ञा दो, मांझ की बेला होने को है

बनारसीदास – ठीक है मित्र प्रीझ ही पुनः मिलना होगा, मैं अवश्य तुम्हारी काव्य रचना का अध्ययन कर अपनी सम्मति तुम्हें दूंगा ।

(बैक ड्राप मेटल दिखाना है …कुछ दिनों के बाद रास्ते में जाते हुये बनारसीदास को तुलसीदास दिखाई देते है)

बनारसीदास – अरे मित्र तुलसीदास सुनते हो

तुलसीदास – तुलसीदास की आवाज प्रतीत होती है (मुड़कर) ओ हो बनारसीदास ! कैसे हो मित्र सब कुशल मंगल तो है ना

बनारसीदास – बस मित्र चल रहा है । देखों कैसा सहज संयोग है आज तुमसे मिलना हुआ और तुम्हारे द्वारा दिया गया रामायण को ग्रंथ भी मेरे हाथ में ही रखा है , मैं सोच ही रहा था कि तुमसे मिलना होगा तो तुम्हारी कृति तुम्हें सौंप दूंगा ।

तुलसीदास – प्रथम तो यह बताओ तुमने इसका अध्ययन किया कि नहीं

बनारसीदास – अध्ययन कहते हो मैंने इसका भली प्रकार अध्ययन किया और इसके सार रुप में मैंने भी एक जैन रामायण की काव्य रचना की ।

तुलसीदास – कहाँ है वह ग्रंथ मित्र

बनारसीदास – वो तो सार रुप में बनारसी के हृदय में ही स्थित है कहो तो सुना दूं ।

तुलसीदास – नैकी और पूछ पूछ । उत्कृष्टता और न बढ़ाओ मित्र

बनारसीदास – तो सुनो मित्र तुम्हारी रामायण का सार कुछ पंक्तियों में समटेने का प्रयास किया है मैंने

विराजे रामायण घटमांहि, विराजे रामायण घटमांहि ।

मर्म होय मरम को जाने, मूरख जाने नांहि विराजे रामायण घटमांहि ।

आतम राम म्यान गुन लछमन, सीता सुमति समेत ।

शुभोपयोग बानरदल मंडित, दरविवेक रन खेत ।। विराजे रामायण

इह विधि सकल साधु घट अंतर, होय सहज संग्राम ।

यह विनहार दष्टि रामायण, केवल निश्चय राम ।।। विराजे रामायण

तुलसीदास – वाह मित्र वाह तुमने तो मेरी रचना का सार निकालकर गागर में सागर ही भर दिया । चलों अपनी काव्य धारा के प्रवाह को इसी तरह निरंतर धारावाही रखना यही एक मित्र की भावना है ।

दृश्य–९

(अकबर का राज्य शासन)

(पात्र– अकबर, बनारसीदास, मुल्लासाहब, नागुरदअली, सभासद, द्वारपाल, मुनादीराम)

बनारसीदास व अकबर राजमहल के कक्ष में शंतर्ज खेलते हुये ।

अकबर – ये तो बनारसीदास मेरी शह, कोई मुकम्मल चाल नहीं है तुम्हारे पास अब अपने शंतर्ज के शहंशाह को बचाने के लिये ।

बनारसीदास – नहीं शहंशाह आप वहम में है किस्मत और नीयत कभी भी बदल जाती है, ये लीजिये मेरे वजीर की मात

अकबर – अरे बनारसीदास तुम तो शंतर्ज के बहुत ही उम्दा खिलाड़ी निकले, हमारे लिये कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा

बनारसीदास – बुरा न माने शहंशाह तो एक बात कहूं । जो रास्ते पर पड़ने वाले मील के पत्थरों को ही मंजिल मान लेते है । वो कभी मंजिल को नहीं पा सकते ।

अकबर – क्या कहना चाहते हो बनारसीदास !

बनारसीदास – बस यही कि इस शंतर्ज की तरह ही हम आप जैसे मनुष्य सारा जीवन राज्य वैभव धन स्त्री के कल्पित सुख के संग्रह में ही व्यतीत कर देते है । लेकिन ये विचार नहीं करते कि इन भावों का क्या फल होगा । न जाने कब इस जीवन की ग्राम आ जायेगी यम कब आकर जिंदगी के खेल में मात दे दे । यम की मात से तो क्या शहंशाह क्या पियादे कौन बच पाया है ।

मुलताकर्ता – बनारसीदास तुम अपनी हद पार कर रहे हो, शहंशाह अकबर को तुम सामान्य मनुष्य मे गिन रहे हो

अकबर – शांत रहे मुलताकर्जा आप ! मुझे यकीन है बनारसीदास कोई गंभीर रहस्य की बात को हमारे समक्ष कहना चाहते है ।

बनारसीदास – जो शहंशाह में जीवन की सत्यता के बारे में कहना चाहता हूँ ।

चाहत है धन होय कितीइ विध, तो सब काज सरे जियरा जी ।

गेह चिनाय बनाये गहना कड़ू, ब्याह सुता सुत बांटिये भाजी ।

चिंता थो दिन मांहि चले, तब जाम अचानक देत दगा जी ।

खेलत खेल खिलाड़ी गये, रह जाये रुकी शंतर्ज की बाजी ।।

अकबर – चाहे क्या बात है बनारसीदास एक छंद में ही जीवन की सत्यता को बखूबी बयान कर दिया है । देखिये मुल्ला साहब बनारसीदासजी ने शंतरंज के खेल में ही से ही जिंदगी की सच्चाई को वर्णन की तरह दिखा दिया । हम आपकी काव्य चतुरता से प्रभव हुवे बनारसीदास । हम चाहते है आप हमारे राजदरबार के सभासद के रुप में आसीन हो ।

मुट्ठासाहब – गुस्ताखी माफ हो शहंशाह मात्र एक काव्य की चतुराई से बनारसीदास को राजसभासद का दर्जा देना मुनासीव नहीं है । आप की आज्ञा हो तो हम भरे हुवे राजदरबार में इनका इम्तिहान लेना चाहते हैं और यदि ये इमतिहान में सफल हो गये तो फिर शहंशाह

अकबर – तो फिर क्या मुट्ठा साहब, और यदि ये सफल हो गये तब आप क्या करेंगे

मुट्ठासाहब – तो तो में शंहशाह में इनको सुबह शाम आदाब अर्ज करुंगा शंहशाह

अकबर – तो फिर ये तय रहा कि परसों राजदरबार में बनारसीदास आपके इमतिहान के लिये सभी के समक्ष उपस्थित रहेंगे । बनारसीदासजी अब आप जा सकते हैं ।

मुट्ठासाहब – शहंशाह गुस्ताखी माफ करे हजुर । हमने आपका नमक खाया है मुझे ये बनारसी दास बहुत मानी व दंभी लगता है एक तो ये इस्लाम को नही मानता और दुसरा ये शहंशाह की खिदमत में झुकता भी नहीं है । हाथ कंगन का आरसी क्या शहंशाह आप स्वयं परसों दरबार मे देख लीजियेगा ये अपना सर आपके आगे नहीं झुकाता है । ये आपके शहंशाह पद की तोहीन करता है । यकीन न हो तो नामुरादअली से पूछ लीजिये आप

नामुरादअली – जी नहींपनाह मुट्ठासाहब वाजिब फरमा रहे है । मुझे भी बनारसीदास की नीयत में शंका है ।

अकबर – ठीक है तो परसों राजदरबार में दुध का दूध पानी का पानी हो जायेगा नामुरादअली । अब हम चलते है हमारे आराम का वक्त हो गया है ।

मुट्ठासाहब – आज जाल में फसा बनारसीदास अब देखना कौन किसके आगे आदाब अर्ज करता है ।

नामुरादअली – पर हजुर संभलकर रहना ये बनारसीदास की चतुराई में उलझाकर कही आपकी कमर उनको आदाबअर्ज करते करते झुक न जावे ।

मुट्ठासाहब – नामुरादअली तुमने क्या हमको उछु का पटठा समझा रखा है ।

नामरादअली – इसमें समझने की क्या बात है ।

मुट्ठासाहब – क्या कहां तुमने कुछ कहां

नामुरादअली – नहीं नहीं हजुर ।

(राजदरबार का दृश्य)

शहंशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर जिंदाबाद जिंदाबाद, मुगाल सल्तनत जिंदाबाद
शहंशाह हिन्दुस्तान जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर पधारे रहे है

मुट्ठासाहब – नामुरादअली आज तो बनारसीदास की असलीयत की पोल शहंशाह के सामने मैने खोल के रख देनी है ।

नामुरादअली – पर वो कैसे हजुर मुट्ठासाहब आपका दिमाग कब से सोचने को काम करने लगा । नामुरादअली

मुट्ठासाहब – हमने अपने शातिर दिमाग से एक ऐसी तरकीब बनाई है कि आज तो बनारसीदास को राजमहल में प्रवेश करते ही शहंशाह के सामने झुकना होगा । हमने आज शहंशाह से गुफ्तगु करके उन्हें इस बात में राजी कर लिया है कि आज राजदरबार का मुख्य दरवाजा बंद रखा जावे और जब मात्र छोटा दरवाजा ही खोला जावे । फिर देखते है बनारसीदास अंदर घुसने के लिये झुकता है कि नहीं ।

नामुरादअली – शहंशाह पधारे रहे हजुर शहंशाह

(म्युजिक के साथ अकबर को प्रवेश) राज दरबार के बाहर

बनारसीदास – अरे ये क्या आज राजदरबार के दिन के समय भी मुख्य द्वार बंद कर दिया है जल ये मुट्ठासाहब के

शंतानी दिमाग की कोई चाल है और हां छोटा दरवाजा खोल रखा है चलो इसी में से अंदर जाना होगा ।

(बनारसीदास छोटे दरवाजे में से पहले अपने पैर अंदर डालते है फिर पीछे की तरफ झुककर सिर अंदर करते है )

अकबर – ओऔओ बनारसीदास सब खैरियत तो है मुट्ठासाहब के इंतिहान की बात से आपके जहन में कोई चिंता तो नहीं लग रही है ना

बनारसीदास – नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं शहंशाह, जैन कभी वेचैन नहीं होते ।

अकबर – तो ठीक के मुट्ठासाहब लीजिये आप बनारसीदासजी का क्या इंतिहान लेने की बात कर रहे थे ।

मुट्ठासाहब – जी शहंशाह सलतनत में बनारसीदास से ये जानना चाहता हूँ कि इस समय मेरे दिमाग में क्या चल रहा है और यदि इस बात का जनवाब बनारसीदास दे पावें तो मैं इनको सुबह शाम इनके घर जा जाकर झुक झुक के आदाब अर्ज करुंगा ।

नामुरादअली – देखना हजुस कुछ ज्यादा न हो जावे क्योंकि मैने कहावत सुनी है कि चतुरा की.आ ज्यादातत उउ में बैठता है

मुट्ठासाहब – चुप रे नामुराद तेरे मुंह में उउ

अकबर – किन्तु ये कैसा सवाल है कोई कैसे बता सकता है किसी दुसरे के मन में इस समय क्या चल रहा है फिर भी बनारसीदासजी प्रश्न उठा है तो आपको इसका उत्तर तो देना ही होगा ।

बनारसीदास – जी शहंशाह ! मुट्ठासाहब इस समय अपने भगवान से आपकी दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य की दुआ कर रहे है । ऐसा ही हेना मुट्ठासाहब कही में गलत तो नहीं ।

मुट्ठासाहब – ऐऐऐऐऐ जी शहंशाह बात तो कुछ ऐसी ही है ।

(सभी जोर जोर से हंसने लगते है )

नामुरादअली – पहले ही बोला था बज गई न बैंड अब करते रहना आदाब अर्ज ।

अकबर – किन्तु एक बात समझा नहीं आई बनारसीदास आप हमारे निकटवर्ती जनों में से भी होने पर जहां सारी सलतनत हमारे आगे सिर झुकाती है वहां आपको सिर झुकाने में क्या आपत्ति है । आप राजदरबार में अंदर आये तो पहले आपने अपने पैर अंदर डाले बाद में बिना सिर झुकाये अंदर प्रवेश किया ।

मुट्ठासाहब – अब आया उउ पदाइ के नीचे

बनारसीदास – शंहशाह आप एक सरल हृदय के अच्छे व्यक्ति है लेकिन मेरा ये सिर किसी को प्रसन्न करने या किसी लौकिक वांछा के लिये किसी के भी आगे झुक जावे ये एक जैनधर्मविलंबी का श्रद्धान नहीं कहता । क्योंकि मुझे तो

जिय बहुतुक वेष धरे जग में छवि भावही आज दींगब की ।
चिता मांणि जब प्रगट्यो घट मैं फिर कौन जलत अडंबर की ।।
जिन तारण तरण ही सेव लियो, परवाह करे को जव्बर की ।
जिसे आस नहीं परमेश्वर की मिल आस करो व अकबर की ।।

मुट्ठासाहब – देख लिया शंहशाह इस बनारसीदास की गुस्ताखी को ।

अकबर – नहीं नहीं मुट्ठा साहब मुझे प्रसन्नता है कि मेरे दरबार में ऐसे भी सम्मानीय लोग है तो सत्य व सिद्धांत की रक्षा के लिये अपने प्राणों का भी भय नहीं करते है । बनारसीदासजी मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है आप पूर्व की तरह ही हमारे निकटवर्ती सलाहकार व मित्र की तरह ही रहेंगे ।

बनारसीदास – शहंशाह की आज्ञा हो तो अब मैं चलता हूँ ।

अकबर – चलिये उपवन के पुष्पों की सुगंध हमें भी तेरे की दावत दे रही है ।

सुचकार – कोई बुरा कहे या अच्छा लक्ष्मी आवें या जावें । तो भी न्याय मार्ग से मेरा कभी न पग डिगने पावें ।

जैन सिद्धांत स्वीकृति के लिये होते है समट्टीते के लिये । ये मार्ग प्रसन्न होने के लिये दुनिया का प्रसद करने के

लिये। इस प्रकार बनारसीदास जी एक सत्यप्रिय, स्पष्टवादी, सरलस्वभावी, निर्भिमानी, प्रतिभाशाली, ईमानदार, अध्ययनशील, भावुक, क्रांतिकारी आध्यात्मिक सत्पुरुष तथा लोक प्रिय कवि थे किन्तु किसी के लौकिक जीवन के मात्र नैतिक गुणों की प्रशंसा कर देने से मोक्षमार्ग का पथ तो सिद्ध नहीं हो जाता है। समयसार जैसे महान ग्रंथ के अध्ययन कर लेने पर भी तथा नाटकसमयसार जैसे अध्यात्म रसपूर्ण ग्रंथ की रचना के बाद भी बनारसीदासजी स्वछंदी हो गये वो स्वयं लिखते हैं गुणस्थान प्रमाण जीव के परिणाम व्यवस्था के सम्यक् निर्णय के अभाव में वह एवं उनके 3 मित्रगण कमरे में निवस होकर स्वयं को मुनि के समान मानकर विचरण करते लगते थे । आईये देखते हैं कि वह कौन सा प्रसंग बना जिसने बनारसी दासजी को सच्चा आत्माथी मुमुक्षु के साथ साथ अध्यात्म के मर्मज्ञ कवि के पद पर आरूढ़ित कर दिया।

दृश्य-10
(धर्म मित्रों की चर्चा नाटकसमयसार की रचना)
(पात्र – चन्द्रभान, उदयकरण, थानमछु, रूपचंद, बनारसीदास)
बनारसीदास(अपने घर में नाटक समयसार की रचना कर रहे हैं)
मोख चलिवे को सोन करम को करै दीन, जाके रस भोन बुध लेन ज्यों घुलत है।
गनु को गरथ तिरगुन को सुगाम पंथ, जाके जसु कहत सुरेश अकुलत है।
याही के सु पच्छी तै उड़त ग्यान गगन में, याही के विपक्षी जगजाल में रुलत है।
हाटक सो विमल विराटक सो विसतार, नाटक सुनत हिय फाटक खुलत है।
बनारसीदास – अरे क्या समय हो गया। ओ हो ग्रंथ रचना में समय पता ही नहीं चला, स्वाध्याय गौष्ठी का समय हो गया है साधार्थी मित्र मंदिरजी पहुंच गये होंगे। चलो मुझे भी शीघ्रता करनी चाहिये। (मंदिर जाते हुये)
शोभित तीज अनुभूति युत चितानंद भगवान।
सार पदारथ आत्मा सकल पदारथ जान।।
(सभी मित्र स्वाध्याय गौष्ठी में बैठे हुये हैं)
चन्द्रभान – आज कछु विलंब हो गया भाई बनारसीदास।
बनारसीदास – हां बस उपयोग लेखनकार्य में टिक गया तो समय का ख्याल ही नहीं आ पाया।
उदयकरण – विशेष क्या लेखन में उपयोग लगा है अभी आपका बनारसीदास
बनारसीदास – लगता है आप लोग भी स्वाध्याय के आनंद रस में भूल जाते हैं आप ही मित्रों के संग स्वाध्याय व प्रेरण के फलस्वरूप नाटक समयसार जी ग्रंथ की रचना करने का भाव हुआ।
उदयकरण – ये तो चचमुच प्रशंसनीय व अनुकरणीय कार्य है भाई अपना जीवन आचार्यों भगवंतो के श्रुत संबंधन जिनवाणी की रचना में लगना निश्चय ही अनुभूत कार्य है। तुम्हे दूरा नाटकसमयसार जैसे अध्यात्मकाव्य की रचना कर देने से भविष्य में भव्यजीव भगवतछुन्दकुन्दाचार्य, अमृतचन्द्राचार्य जैसे महान मुनिराजों के अध्यात्म रस से वंचित तो नहीं रहेंगे।
बनारसीदास – नहीं मित्र नाटक समयसार का रचनाकार मैं कहां से हो गया। यदि हमारे पूर्व विद्वान पांडे राजमलजी साहब ने समयसार कलश्यों के मर्म को बाल्याबोधिनी टीका में नहीं खोला होता तो हम जैसे मंदबुद्धि उन कलश्यों के अमृत का पान कैसे कर पाते। श्रुतसागर के अपरिमित विस्तार ज्ञान के आगे में स्वयं को अल्पज्ञ मानता हूं किन्तु फिर भी मेरी दृशा तो ऐसी है
जैसें कोउ मूरख महा समुट तिरिवे कों, भूजानिनों उठत भयो है तज नावरो।
जैसें गिरि ऊपर विरखफल तोरिवे कों, बावनु पुरुष कीऊ उमर्गो उतारली।।12।।

रूपचंदजी – बहुत सुंदर एक आत्मार्थी जीव के जिनश्रुत के रचनाकार होने पर भी स्वयं को उसका कर्तारूप नहीं देखना और अल्पज्ञता का भाव रखकर अपने कार्य का श्रेय भी अग्रणी आचार्यों विद्वानों को दे देना एक सच्चे निकट भव्य जीव के मोक्षार्थी पने के ही लक्षण है भाई।
थानमछु – आप ठीक कहते है पं. रूपचंद जी साहब। जब से हम लोगों ने भी समयसारजी का अध्ययन किया है। तब से हमें भी लगता है कि यदि पर्याय को दृष्टि से हटा दे तो हम भी तो बने बनाये भगावान ही हैं।
चन्द्रभान – सत्य कहते हो मित्र थानमछु! आत्मा तो स्वभाव से अकर्ता अपरिग्रही अपने ज्ञान सुख रस से लबालब भरा हुआ। हमें तो मुझस्थ होने पर भी दिगंबर मुनिराजों की तरह नमता धारण कर लेने से ऐसा लगता है कि मानों हम भी पंचपरमेष्ठी के समान हो गये।
बनारसीदास – बात तो सही हैं हम भले कुछ ही देर को सही लेकिन जब नम दिगंबर हो जाते हैं तो ऐसी प्रतीति होती है कि मानों कर्तापन का तो सारा बोझ ही दिमाग से हट गया। अहो अपूर्व शांति का वेदन होता है उस काल में तो किन्तु पता नहीं सामान्य जन इसे रहस्य को नहीं समझ पाते और हमें खोसारामती कहकर पुकारते हैं।
रूपचंद – एक मिनिट एक मिनिट अभी आपने क्या कहां बनारसीदास कुछ देर के लिये नम दिगंबर हो जाते हैं।
इसका क्या आशय है क्या आप लोग नहीं जानते कि मुनि का वेश कोई धारण करने की वस्तु नहीं है कि जब चाहे मुनि बन गये जब चाहे गृहस्थ। ये तो महज प्रगट होने वाली दृशा का नाम है भाई,… हां और ये तो वह रूप है जिसे एक बार धारण कर न तो कलंकित किया जाता है न ही बदल जाता है।
बनारसीदास – क्या कहते है आप विद्वत्वर हमारा तो यही मानना है कि आत्मा तो निकाली शुद्ध ही है। इसमें राग का तो प्रवेश ही नहीं।
रूपचंद – कथन तो आपका पूर्णत: सत्य है मित्र बनारसीदास किन्तु ग्यानता है कि आप लोगों को गुणस्थान प्रमाण होने वाली जीव के परिणाम को अध्यात्म दृष्टि से समुमेल करना नहीं आता है। मेरा आप सभी को यही परामर्श है कि आप गोम्मटसारजी जैसे करणानुयोग के जीव के परिणामों को बताने वाले ग्रंथों का सर्वप्रथम अभ्यास करें। कहीं भाग्य से मिली अध्यात्म की पूंजी भावकता व अज्ञानता के कारण भदरमछु की गहराई में न खो जावें।
थानमछु – तो हेर किस बात की हो है विद्वत्वर आप ही हमें गोम्मटसार जी का अभ्यास क्यों नहीं करा देते।
बनारसीदास – बिल्कुल सत्य कहते हो थानमछुजी इस जीव का प्रथम कर्तव्य तो यही है कि दृष्टि संबंधी भूल कोई भूल हो तो उस भूल को रखने का नहीं मिटाने का उपाय करना चाहिये
रूपचंद जी – तो फिर ठीक है हम कल से अपनी गौष्ठी में गोम्मटसार जी ग्रंथ विस्तारोंगे।

सूत्रकार – इस तरह बनारसी दासजी व उनके मित्रों को महानभाग्य से पंडित रूपचंद जी साहब के साथ बैठकर आगम व अध्यात्म के समुमेल के साथ वस्तु तत्व समझने का अवसर प्राप्त हुआ जिसका फल स्वयं बनारसी दास ने अपने काव्य में लिखा है।
सुन सुन रूपचंदु के बैन। भयो बानारसी तब दिढ़ जैन।।
तब फिरी ओर कवीपुरी, करी अध्यात्मपाहि, यह वह कथनी एकसी, कहुं विरोध किछु नाहि।।
हदैमाहि कछु कालिमा, हुली सरदहन बीच। सोऊ मिटि समता भई, रही न ऊच न नीच।।
रूपचंद जी के द्वारा विविधत गुणस्थानों की परिपाटी का ज्ञान हो जाने से चारों ही मित्रों की दृष्टि सम्यक् मोक्षमार्ग की बन गई। एक ओर तो बनारसीदास के दृष्टि का परिवर्तन हुआ वहीं दूसरी ओर इस वेद का परिवर्तन भी कहां


रुकने वाला था। वृद्धावस्था में ठंठ रोथने रोप ने उन पर धावा बोल दिया। किन्तु सच्चे आत्मार्थी जीवों को इस देह रूप पड़ोसी के परिवर्तन कहाँ प्रभावित कर सकते थे। अब वह तो सच्चे समयसारी हो गये थे।

दृश्य–11

(रोग अवस्था, तत्त्वचिंतन व अंतिम समाधि)

(पात्र – चन्द्रभान, उदयकरण, रुपचंद, मायावती, चिंताबाई, बनारसीदास)

चन्द्रभान – मित्र बनारसीदास कहो शारीरिक वेदना के चलते कहीं चित विचलित तो नहीं होता।

रुपचंदजी – कैसी बात करते हैं आप चन्द्रभान जी जिस जीव ने आत्मा को शरीर मित्र अपने में परिपूर्ण देखने की दृष्टि प्राप्त कर ली हो उसे वृद्ध की अवस्था क्या प्रभावित करेगी। हमें तो ऐसी चर्चा उनके सन्मुख करें बिना उनके ही तत्त्वचिंतन रसकाव्य से निस्पृत नाटकसमसाचार के छंदों का पठन चिंत करना कराना चाहिये।

आत्मानुभव की दशा का कितना सुंदर चिंतन है भाई

वस्तु विचारत ध्यावते मन पावें विश्राम रस स्वादत सुख उपजें अनुभव याकों नाम।

अनुभव चितामणि रतन अनुभव रैं रसकूप अनुभव मारग मोक्ष को अनुभव मोक्ष स्वरूप॥

उदयकरण – सत्य कथन है आपका आत्मअनुभव का आनंद तो वचन अगोचर वस्तु है। स्वरूप में एक बारी दृष्टि ठिक जाये तो फिर बाहर क्या चल रहा है पता ही नहीं चलता।

चन्द्रभान – है जीव धन्य है यह जिनके देह छूटने से पहले देह दृष्टि छूट जाती है। है जीव आपने निरंतर आचार्यों की अध्यात्म वाणी का अमृत पान किया है अब उस अमृतवाणी के मनन चिंतन कर एकाकी आनंद भोगने का काल चल रहा है।

रुपचंद – देखो मुनिराज किस प्रकार आत्मध्यान में शूरवीर है है जीव तुम भी आत्म आराधना का पुरूषार्थ करो।

मायावती – अरे बाई। ये बनारसीदास जी कछु बोलते क्यों नहीं, किसी भी प्रश्न का न तो कोई जवाब दे रहे हैं और न ही कुछ प्रतिक्रिया करते हैं। मुझे तो लगता है कि कहीं इनके प्राण धन दौलत की माया में तो नहीं अटक गये

चिंताबाई – हुओ बहिन में को भी ऐसो ही लगत है। कि बनारसीदासजी को भी घर गृहस्थी की चिंता सता रही आये ऐसे में प्राण छूट गये तो इनकी आत्मा भटकत रह है।

मायावती – मेरी बात मानो तो इनकी संपत्ति की एक पोटली बनाकर इनके छाती पर धर दो कब से कब इनके प्राण तो ज्ञाति से निकल जाहें।

चिंताबाई – हुओ हुओ तुम सही कहत हो बाई। लगत है बड़ो अनुभव आयो तुमें बाई..किसी के मरन जीवन को। जै लो मैंया धन की पोटली इनके ऊपर घर के उन्हें बात तो कि धन दौलत को अच्छी तरह से देखकर ओ से अपने मन को हटा लें।

मायावती – प्रामो अहिंताण प्रामो सिद्धाणं

रुपचंद – अरे बहिनों कैसी बात कर रही हो। कोई जीव चार गति के परिभ्रमण से अपने उपयोग को हटाकर मुक्ति की यात्रा की तैयारी के लिये समाधि भावना भा रहा है और हम उसके समक्ष अज्ञान भी चर्चायें कर उसके उपयोग को विचलित करने का काम कर रहे।

उदयकरण – अरे अरे देखिये बनारसीदासजी हाथ उठाकर कुछ मॉंग रहे है।

चन्द्रभान – ये लीजिये मित्र कुछ कहना हो तो इस कागज पर लिखकर बता दीजिये। ये लीजिये हां सम्हालों भाई सम्हालों इनको।

(कागज पर कुछ लिखते हैं एवं रुपचंद की तरफ इशारा करते हैं)

रुपचंदजी – इस पृष्ठ पर बनारसीदासजी ने अपने अंतरभाव को लिख दिया है।

ज्ञान कृतका हाथ, मारि अरि मोहता।

प्रगटगौं रुप स्वरूप, अनंत सु सोहता॥

जा परजै को अंत, सत्य कर मानना।

चले बनारसीदास, फर नहिं आवना॥

रुपचंदजी – है जीव अपने शुद्धात्मा एवं पंचपरमेष्ठी के अतिरिक्त इस जगत में कोई भी अपना नहीं है। सर्वे विकल्पों का परित्याग कर अपने निज्ञस्वभाव को देखना उसमे रमना जमना यहीं एक सुखी होने का मार्ग है सभी जीवों के प्रति क्षमाभाव धारण कर मृत्युजंयी होने की दिशा में प्रयाण करो। है जीव तुम्हारा आत्मा तो अमूर्तिक प्रदेशों का पुंज, प्रसिद्ध ज्ञानादि गुणों का धारी अनादि निधन वस्तु स्वयं आप है और यह देह तो नवीन संयोगो है संयोग तो वियोग रूप ही होते हैं जानो जीव तो संयोग वियोग की अवस्था से भित्र अपने को ध्रुव रूप अनुभव करते है। (सभी लोग बारह भावना का चिंतन करे)

हम छोड़ चले ये लोक तभी लौकांत विराजे क्षण में जा निज लोक हमारा वासा हो गौंकता बने फिर हमको क्या।

उदयकरण – लगता है मित्र बनारसीदास जी का देह परिवर्तन हो गया है।

(कुछ लोग रोने धोने विलाप करने लगते हैं)

रुपचंद – सभी धैर्य धारण करे एक साधर्मी आत्मार्थी जीव मुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ा है। राग का कार्य तो रुदने का ही है किन्तु तत्त्वचिंतन से मन को ज्ञाति मिळती है। अब देर न करो हमें अंतिम संस्कार संबंधी कार्य शीघ्र संपन्न करने चाहिये।

– अंतिम उद्बोधन वाक्य उपसंहार
विवेक जैन


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