‘अपराध क्षण भर का’ — भगवान महावीर के काल के मगध नरेश श्रेणिक की कथा: बौद्ध भिक्षुओं का प्रभाव, मुनिराज यशोधर पर उपसर्ग, रानी चेलना का सम्यक्त्व और क्षण भर के अपराध का फल। ११ पृष्ठ, पात्र-परिचय व मंच-निर्देश सहित।
Apradh Kshan Bhar Ka — a one-act Jain natak on King Shrenik, Queen Chelna and Muni Yashodhar: how a moment’s offence binds karma and how right faith redeems. Dashlakshan / pathshala stage script.
स्रोत: एकांकी मञ्जूषा (भाग-२) — पाठशाला व दशलक्षण पर्व के सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु मंचन-योग्य एकांकी। पूरी स्क्रिप्ट (पात्र-परिचय, संवाद, मंच-निर्देश) नीचे; मूल PDF सबसे नीचे।
अपराध क्षण भर का
पात्र - परिचय
१. राजा - श्रेणिक
३. पुत्र - अभय ५. ज्योतिषी
७. राजा - चेटक ९. सैनिक ११. अन्य
२. रानी - चेलना
४. पुत्र - कुणिक ६. मंत्री
८. पुत्री - चंदनबाला
१०. बौद्ध भिक्षु - २ मुनिराज पर उपसर्ग वाला चित्र
अंक - २
भूमिका
यह कथा एक ऐसे राज्यकाल की है, जब इस काल के अन्तिम तीर्थङ्कर भगवान महावीर का शासनकाल चल रहा था, तब चारों ओर हाहाकार मचा था, उस समय तीर्थकाल के उदित होने से चहुँओर सत्यधर्म की अरुणिमा छा गई। कई भोले जीव अन्यमत की असत्यता को जानकर जिनधर्म शरण में आ गए। ऐसे ही वीर, प्रतापी, बुद्धिमान मगध, नरेश राजा श्रेणिक का कथानक आपके समक्ष प्रस्तुत है। राजदरबार लगा है, समीप हैं मंत्रीगण, विचार-विमर्श कर रहे हैं, तभी एक चित्रकार का प्रवेश होता है - तो आइए देखते हैं कि आगे क्या होता है -
दृश्य - १
(तभी एक चित्रकार एक सुन्दरी का चित्र राजा को भेंट देने आता है।)
चित्रकार : महाराज की जय हो।
श्रेणिक : (चित्र देखकर) ये सुन्दरी है ? किस देश के राजा की पुत्री है? और इस महल की रानी कैसे बन सकती है?
चित्रकार : राजन् ! सिन्धु देश के राजा चेटक की सात कन्याओं में यह छठवी है ! परन्तु…
श्रेणिक : परन्तु क्या ?
चित्रकार : वह वीतरागी देव-शास्त्र-गुरु का सच्चा भक्त है तथा राजा सच्चे जैनभक्त को ही अपनी कन्या देंगे।
श्रेणिक : मैं तो बौद्ध हूँ (सोचकर) कुमार अभय ! तुम जैनश्रेष्ठियों को तैयार करके चेटक राजा के यहाँ जाओ और सावधानी पूर्वक जैन होने का नाटक करते रहना।
अभय : पिताजी ! आपकी आज्ञा शिरोधार्य है।
(अभयकुमार सिन्धुदेश पहुँच गया और आज्ञानुसार धर्मध्यान करने लगा। इनके धर्मात्मा होने की खबर राजा चेटक तक पहुँच गई और राजा चेटक ने उन्हें मिलने बुलाया, फिर अभयकुमार राजदरबार पहुँचते हैं।) (प्रवेश)
चेटक : आईए बन्धुवर ! बैठिए। कहाँ से पधारे हैं ?
अभय : (प्रणाम कर) हम जौहरी बच्चे हैं और अनेक देशों में घूमते हुए यहाँ आये हैं। यहाँ कुछ दिन ठहरना चाहते हैं।
चेटक : हाँ ! हाँ ! क्यों नहीं ? आप तो सज्जन हैं, हमारे ही महल में ठहर सकते हैं।
अभय : ठीक है, जैसा आप उचित समझें।
(राजकन्याएँ प्रतिदिन अभय की पूजन-भक्ति देखकर अत्यन्त प्रभावित होती हैं तथा उन्हें कुमार से मिलने की इच्छा होती है, और एक दिन पूजन के बाद) अपराध क्षण भर का
चेलना : आप धन्य हैं ! आप जैसा भक्त हमने आज तक नहीं देखा…
चन्दना : आप किस देश से आए हैं, आपके राजा कौन हैं ?
अभय : हम मगधदेश के जैनधर्म भक्त, रूपवान, गुणवान राजा श्रेणिक की प्रजा हैं। राजा श्रेणिक के ज्ञान-ध्यान की प्रशंसा सुन करके राजकन्याएँ उनसे विवाह के लिए ललचाने लगीं, और वे अभय से कहती हैं -
चेलना : कहाँ तो वे पुरुषोत्तम और कहाँ हम… ? हमारी आँखों में अब नींद कहाँ, जब तक हम उनसे मिल न लें, हमें चैन नहीं आयेगा।
चन्दना : अब तो वे ही हमारे स्वामी बनें, नहीं तो यह जीवन बेकार है।
चेलना : कुमार ! वे महान् श्रेणिक हमारे पति कैसे बनें ? इस हेतु कोई उपाय बताइये।
अभय : (मन ही मन प्रसन्न) ठीक है, यदि आप उनसे मिलना चाहती हैं तो मैं आपकी मदद कर सकता हूँ। मैं एक गुप्त सुरंग बनाता हूँ, जिससे हम राजा श्रेणिक तक पहुँच सकते हैं।
(कुछ ही समय में सुरंग तैयार हो जाती है, इससे अभयकुमार के साथ राजकुमारी चेलना तथा चन्दना प्रवेश करती हैं, किन्तु सुरंग के बाहर अभयकुमार और चेलना ही आते हैं, चन्दना बीच से ही लौट जाती है। अभय चेलना को रथ पर बैठाकर राजगृह ले आते हैं तथा सेठ इन्द्रदत्त के यहाँ चेलना को ठहरा देते हैं। कुछ ही समय पश्चात् राजा श्रेणिक व राजकुमारी चेलना का विवाह होता है तथा कुणिक नामक पुत्र उत्पन्न होता है, राजपुत्र के जन्म का प्रसंग है, तभी एक ज्योतिषी कहते हैं।)
दृश्य - ५
ज्योतिषी : महारानी ! आप जिस पुत्र को इतना प्यार कर रही हो, जानती हो, यही अपने पिता की मृत्यु का कारण बनेगा।
चेलना : (भय से) क्या कह रहे हो ? मेरा पुत्र, मेरे स्वामी की मृत्यु का कारण बनेगा। नहीं-नहीं यह कैसे हो सकता है ? किन्तु यदि आपका कथन सत्य है तो मुझे यह पुत्र प्यारा नहीं सैनिको ! लो इस बालक को जंगल में फेंक आओ।
(रुदन करते हुए हे प्रभो यह कैसी विचित्र लीला है कर्मों की, मैंने ऐसा क्या पाप किया ? जिसका फल ऐसा प्राप्त हो रहा है। हे प्रभो, मुझे मार्गदर्शन दो।)
सैनिक : जी ! महारानी जी !
श्रेणिक : (प्रवेश) चेलना मैं यह क्या सुन रहा हूँ ? तुमने अपने प्रिय पुत्र को जंगल में फिंकवा दिया।
चेलना : हाँ स्वामी! लेकिन वह आपकी मृत्यु का कारण बनने वाला है।
श्रेणिक : मैं कुछ नहीं सुनना चाहता, वह जो भी हो किन्तु वह हमारा ही पुत्र है ऐसा हरगिज नहीं होगा, उसे वापस ले आओ।
चेलना : ठीक है स्वामी ! आप कहते हैं तो उसे वापस ले आते हैं।
(चेलना पुत्र को वापस बुलवा लेती है। फिर एक दिन बौद्ध साधुओं के राजमहल में आने पर उसे अचानक ध्यान आता है)
चेलना : अरे ! यहाँ तो कभी जैन साधु नहीं आते। जिन-पूजन भी नहीं होती, यहाँ तो सभी विधर्मी हैं। ओह ! अपने को जैन बताकर पुत्र अभय ने हमें ठग लिया। मुझसे ये कैसा अपराध हो गया, जो मैं जैनधर्म से विमुख हो गई।
(दुःखी चेलना ने अन्न-जल छोड़ दिया और ध्यान में बैठ गई जब राजा श्रेणिक को पता चला तो वे बहुत दुःखी हुए और अपने प्राणप्यारी चेलना को बहुत समझाया उन्हें खुश करने के सभी प्रयत्न किए किन्तु वे हार गए।)
श्रेणिक : मैं यह क्या सुन रहा हूँ कि तुमने अन्न-जल त्याग दिया है ? चेलना कुछ तो बोलो ? तुमने अन्न-जल क्यों छोड़ दिया ?
चेलना : स्वामी ! जैनधर्म व जैन साधु ही श्रेष्ठ हैं। ये जीव-जन्तुओं पर दया भी करते हैं। तो आप ही बतायें कि हम इस सुखकारी धर्म को कैसे छोड़ दें ?
श्रेणिक : ठीक है रानी ! तुम्हें जो उचित लगे वही करो। बस इस तरह दुःखी न रहो। हम तुम्हें ऐसे हाल में नहीं देख सकते।
चेलना : आप धन्य हैं। (प्रसन्नता से)
(तत्पश्चात् चेलना धर्माराधना करते हुए महल में ही सभी को जैनागम पढ़ाने लगी। यह समाचार सुन बौद्ध साधु अपना प्रभाव कम होता देख भयभीत होकर राजा श्रेणिक के पास आते हैं।)
भिक्षु २ : महाराज ! (श्रेणिक प्रणाम करते हैं) सुना है रानी… जैनागम महल में पढ़ा रही हैं। इससे तो बौद्ध धर्म नष्ट हो जायेगा।
श्रेणिक : गुरुदेव ! मैंने बहुत समझाया… पर वह नहीं मानीं अतः उन्हें जो अच्छा लगे करने देना ही उत्तम है।
भिक्षु १ : ऐसा नहीं होना चाहिए राजन् ! एक बार हम रानी चेलना को समझाना चाहते हैं। (रानी का प्रवेश)
(रानी गुरुओं को प्रणाम नहीं करती हैं, इसलिए क्रोधित होकर…)
देखो रानी ! तेरा जैनधर्म कदापि श्रेष्ठ नहीं है। वह तो भूखे व नंगों का धर्म है, ज्ञान-विज्ञान रहित है।
भिक्षु २ : अरे ! इन दीन-दरिद्रों की सेवा करोगी, तो ऐसा ही फल पाओगी। यह सब हमने अपनी सर्वज्ञता से जाना है।
चेलना : आपका यह कथन सर्वथा असत्य है। जैन साधु तो महान् शूरवीर, निर्विकारी व विद्वान होते हैं। तुम लोग डरपोक व कायर हो इसलिए शहर में रहते हो, और अपने पापों को ढकने के लिए वस्त्र पहिनते हो…
भिक्षु : अरे ! मूर्ख रानी, तुम हमारा अपमान कर रही हो।
चेलना : नहीं-नहीं! मैं कौन होती हूँ ? आपका अपमान करने वाली। आपके लिए जल-पान का प्रबंध कर लिया है कृपया आप क्रोध छोड़कर भोजनशाला में चलें।
श्रेणिक : हाँ गुरुवर ! मैं क्षमा चाहता हूँ, चलिए भोजन ग्रहण कीजिए, आइए, बैठिए।
(भिक्षुओं ने बिना विचार आनंदपूर्वक भोजन ग्रहण किया खाने के उपरान्त जूता छुपाना, तदुपरान्त चेलना एक जूता उठाकर ले जाती है तथा चतुराई से भोजन में मिला देती है।)
भिक्षु : बड़ा स्वादिष्ट भोजन था। अब हम चलते हैं (इधर-उधर देखकर) मेरा एक जूता कहाँ है ? यहीं तो रखा था।
श्रेणिक : यहीं होंगे। कहाँ जा सकते हैं ? रानी ! आपने गुरुदेव के जूते देखे।
चेलना : मुझे क्या पता ? आप अपने गुरुदेव से ही पूँछें, वे तो सर्वज्ञ हैं ना, क्या उन्हें इतना भी नहीं मालूम कि जूते उनके पेट में हैं। जब वे इतना नहीं जान सकते तो मेरे अगले जन्म का क्या बता सकेंगे ?
भिक्षु २ : यह क्या कह रही हो ? हम सर्वज्ञ हैं, लेकिन…
चेलना : लेकिन क्या ? आप वमन करके देख लें आपको प्रमाण भी मिल जायेगा।
(अनुत्तरित होकर साधु बहुत अपमानित हुए)
भिक्षु : राजा श्रेणिक, रानी जान-बूझकर हमें अपमानित कर नीचा दिखाना चाहती हैं, हम जा रहे हैं।
दूसरा : तुमने हमारा अपमान किया अब हम एक पल भी नहीं रुक सकते। तुम्हें क्या पता है कि क्षपणक (जैनगुरु) मरकर बौद्ध भिक्षु बनते हैं।
(कुछ दिन बीतने पर एक बार भिक्षुओं के साथ श्रेणिक वनगमन कर रहे, तब उनकी दृष्टि ध्यानस्थ दिगम्बर मुनिराज पर पड़ी)
श्रेणिक : गुरुदेव ! देखो वो नग्न पुरुष कौन बैठा है ?
भिक्षु : राजन् ! यही तो हैं नग्न, गंदे, मूर्ख व अभिमानी जो चेलना का गुरु है।
श्रेणिक : अच्छा (क्रोध से तमतमाये) अब देखता हूँ चेलना के गुरु को ! मंत्री, इन पर ३-४ शिकारी कुत्ते छोड़ दो।
(ओह ! कैसी अद्भुत महिमा है जैनधर्म की, जिनकी परम शांत मुद्रा देखकर तो पशु पक्षी भी बैर-भाव भूल जाते हैं। फिर ये शिकारी कुत्ते… यह भी धर्म प्रभावना से पास आते ही शान्तभाव से मुनिराज के चरणों में नतमस्तक हो जाते हैं। इस दृश्य को देख राजा बहुत क्रोधित हुआ।)
श्रेणिक : लगता है यह तांत्रिक है, जिससे कुत्तों को वश में कर लिया किन्तु (मरे हुए सांप को देख व गले में डालकर) तो ये लो, अब देखता हूँ, तुम क्या करते हो।
(महातपस्वी दिगम्बर मुनिराज यशोधर के गले में सर्प डाल राजा श्रेणिक महल की ओर चल देते हैं, उधर मुनिराज उपसर्ग जानकर ध्यानमग्न हो जाते हैं) राजा श्रेणिक ने तीसरे दिन यह घटना चेलना को सुनायी।
श्रेणिक : तुमने मेरे गुरु का अपमान किया था। मैंने भी तुम्हारे गुरु के गले में मरा सर्प डालकर अपने अपमान का बदला ले लिया।
चेलना : हाय ! यह तो बहुत बुरा किया आपने। मुझे किस अपराध की सजा मिल रही है ? काश! मैं कुँवारी ही रहती। हे भगवान !
श्रेणिक : अब मैं क्या करूँ ? अरी ! बावली क्यों होती है ? वह पाखण्डी तो अब तक सांप फेंककर भाग गया होगा।
चेलना : नहीं… नहीं… वे मेरे गुरु हैं, हे नाथ! दिगम्बर साधु तो उपसर्ग समझकर पर्वत की तरह अचल रहकर ध्यान में लीन हो गए होंगे।
श्रेणिक : ऐसी बात है ? तो चलो अभी चलकर देख लेते हैं, सत्य सामने आ जायेगा। दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा।
(मुट्ठी में खाण्ड (शक्कर) भरकर रानी, राजा, अभयकुमार तुरन्त जंगल पहुँचते हैं, रात्रि काल हो गया है। मुनिराज ध्यान में लीन हैं, सारा शरीर चींटियों से भरा है।)
• चेलना - हे स्वामी ! आह ! भयंकर उपसर्ग… चींटियों ने शरीर को काट लिया, ओह ! कितनी सूजन आ गई… कोई उपाय कीजिए, नाथ…। पुत्र अभय तुम मुनिराज की वैयावृत्ति कर दो।
(जमीन पर चारों ओर चेलना खाण्ड (मिठास युक्त वस्तु)
अपराध क्षण भर का डाल देती है, चींटियाँ शरीर से उतरने लगीं, राजा श्रेणिक ने गीले कपड़े से मुनिराज का शरीर पोछकर वहीं सुबह होने की प्रतीक्षा में बैठकर प्रभु स्मरण करने लगे। इस तरह सुबह मुनिराज ने ध्यान तोड़कर दोनों को धर्मवृद्धि आशीर्वाद दिया।)
श्रेणिक : (अरे ! ये क्या ? आश्चर्य, मैंने तो इनका अहित किया, फिर भी मुझे धर्मवृद्धि का आशीर्वाद ? ये कितने महान् हैं, और मैं सचमुच में निन्दा का पात्र हूँ…) मुझे क्षमा करें प्रभु !
मुनिराज : अरे ! भव्यप्राणी ! अपनी भूल पर इतना खेद क्यों ? यही तुम्हारी शिक्षा है। इससे शिक्षा ग्रहण करके अपनी भूल सुधार लो, भूले हुए भगवान को याद करो। भगवान बनने की सामर्थ्य को जानो, पहिचानो, स्वीकार करो…
श्रेणिक : हे कृपालु ! मेरी सुप्त सामर्थ्य को जगाने वाले… आपने मेरे मन की बात कैसे जान ली ? आप तो अन्तर्यामी हैं।
(तीनों प्रणाम कर राजमहल लौट जाते हैं, अब से श्रेणिक राजा भी जिनधर्म का सच्चा भक्त बनकर नित्य पूजन- पाठ-स्वाध्याय आदि करने लगा। एक बार विपुलाचल पर्वत पर भगवान महावीर स्वामी का समवशरण आया राजा श्रेणिक ने भी वहाँ जाकर हजारों प्रश्न पूँछे और मुख्य श्रोता बन गए।)
श्रेणिक : हे वीतरागी, सर्वज्ञ भगवन्! मेरे मुनि बनने के भाव क्यों नहीं होते ? शाश्वत सिद्धभूमि सम्मेदशिखरजी के दर्शन क्यों नहीं हो रहे हैं ?
दिव्यध्वनी : वत्स ! क्योंकि तुमने नरक का बन्ध कर लिया है, परन्तु पुण्यकर्म के प्रताप से वहाँ से निकलकर उत्सर्पिणी काल
के प्रथम काल में महापद्म नामक पहिले तीर्थंकर बनकर धर्म प्रवर्तन करोगे।
श्रेणिक : ओह ! यह तो अति हर्ष की बात है। इस तुच्छ राज-पाट में क्या रखा है, मुझे तो धर्मसाधना में रत रहना चाहिए।
(महल में आकर)
मंत्रिवर ! मैं अपना राज्यभार अपने पुत्र कुणिक को सौंपना चाहता हूँ। आप राजतिलक की तैयारी करें।
(राजा श्रेणिक आत्मसाधना में रत हैं, उधर राजा बने कुणिक सोचने लगा।)
कुणिक : पिता ने बाल्यकाल में मुझे जंगल में फिंकवा दिया था न, तो मुझे भी बदला लेना चाहिए। मंत्रीजी ! जाओ…उस दुष्ट को बंदी बनाकर घोर यातना दो।
मंत्री : महाराज ! क्षमा करें, मैं यह दुस्साहस कैसे कर सकता हूँ ?
कुणिक : ये हमारा आदेश है।
(मंत्री विवश हैं राजाज्ञा मानने को। कर्म की यही गति है। एक दिन कुणिक भोजन कर रहा था तो उसके पुत्र ने भोजन में लघुशंका कर दी, किन्तु कुणिक ने पुत्र मोह में कुछ ध्यान नहीं दिया… तथा)
कुणिक : माँ ! मेरे समान इस जगत् में पुत्र मोही और कोई नहीं हो सकता।
चेलना : अरे ! तू ही क्या, सभी का पुत्र मोह ऐसा ही होता है। याद है, बचपन में जब तेरी अंगुली में फोड़ा हुआ था, तब दुर्गन्ध की परवाह न करते हुए तुम्हारे पिता ने ही मुँह में तेरी अंगुली डालकर मवाद चूसकर फेंका था। तब तुम्हें आराम मिला था। जिसने तुझे पढ़ाया-लिखाया, राज्य-
अपराध क्षण भर का सम्पदा दी। उनके साथ ही तूने ऐसा क्रूर व्यवहार किया, धिक्कार है तुझे। अरे पापी! कृतघ्नी! उन्हें मुक्त कर और उनके चरणों को छूकर माँफी माँगो।
कुणिक : हे माँ! मैं बड़ा नीच हूँ, पशुतुल्य हूँ, मैं भ्रमवश पिता से द्वेष करता रहा हूँ। मुझे क्षमा दो। मैं अभी जाकर पिताजी को मुक्तकर क्षमा याचना करता हूँ।
(इधर शीघ्रता से कुणिक काराग्रह की ओर बढ़ रहे हैं उधर राजा श्रेणिक कुणिक को अपनी ओर आते देख सोचते हैं।) इतने दिनों से भूखा-प्यासा रखकर मेरा इतना अपमान किया। हे भगवान! अब और नहीं सहा जाता… अरे! शायद यही… मेरी गति होना थी अब और दुःख देने आ रहा है। यह सोचते हुए घबराहट में उनका सिर पैनी सलाखों से टकरा जाता है और वे जमीन पर गिर पड़ते है।
श्रेणिक : आह! मैं अपराधी क्षणभर का…
कुणिक : पिताजी! पिताजी! पिताजी…
(पिता की मृत्यु देखकर कुणिक के तो होश ही उड़ जाते हैं। चेलना भी बेहोश हो गई। सम्पूर्ण देश में हा-हाकार मच गया।)
कुणिक : हे भगवान! अपराधी मैं क्षणभर का…
चेलना : (रोते हुए) अपराधिनी मैं क्षणभर की… यह संसार असार है, इसमें क्षणिक भी सुख नहीं है। मुझे अब जिनदीक्षा ग्रहण करनी चाहिए।
(ऐसी पवित्र वैराग्यभावना की लहरें चेलना के अन्तर्मन में उछलने लगीं और वह संसार स्वरूप को पहिचान कर सर्वथा उदासीन होकर आर्यिका रत्न चंदनामति से दीक्षा ग्रहण कर आत्मकल्याण के मार्ग का अनुसरण करने लगीं।) ✣
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