पात्रानुक्रमणिकाः
महाराज रामसिंह — एक छोटी रियासत के नरेश
महारानी कनक श्री — रामसिंह की रानी
गेंदासिंह — निर्धन स्वाभिमानी युवक
गुलाब — गेंदासिंह की नवविवाहिता पत्नी
सुभामा — गेंदासिंह की बुआ
(सत्या, मंगला, सुमति, मनोरमा इत्यादि नारियाँ)
दृश्य-प्रथम
(गेंदासिंह का विवाह हो चुका है। वधू आगमन पर बधाई स्वरूप गीत हो रहे हैं। महिलाएँ दादरें गा रही हैं। घर छोटा है। कोने में एक पलंग बिछा हुआ है। निकट ही नवपरिणीता गुलाब घूँघट काढ़े सजी सजाई सकुचाई-सी बैठी है। मनोरमा ढोलक बजा रही है। शेष महिलायें गा रही हैं।) गीत समाप्ति पर-
सुमति — बहिन सुभामा ! अब मैं जा रही हूँ।
सुभामा — थोड़ी देर और गाओ न सुमति !
सुमति — नहीं बहिन ! रात्रि अधिक हो गयी है, सभी जाने की धुन में हैं।
सत्या — ठंड भी बहुत है, आज्ञा दो।
सुभामा — हाँ शीत का प्रकोप तो भयंकर है, जाओ बहिनों! तुम
सुभामा — सब को वहुत-बहुत धन्यवाद ! बिना बुलावा लिए कोई जाना मत बहिन !
(बताशा की टोकरी लेकर सुभामा आ जाती है)
सुभामा — लो मंगला ! बाँटो बुलावा।
मंगला — तुम बाँटो न जीजी ।
सुभामा — नहीं, तुम बाँटो, मैं तो परेशान हूँ।
(मंगला सबको बारी-बारी से आँचल में बताशा देती है। चंद बहिनें वधू का घूँघट खोल-खोलकर मुख देख उसके हाथ में चाँदी के सिक्के देती जाती हैं)
सत्या — बहू तो खूबसूरत है जीजी !
सुमति — सुन्दरता के साथ गुणवती भी हुई तो सोने में सुगन्ध आ जायेगी ।
मनोरमा — वाह ! यह भी कोई कहने की बात है। भाभी की सभी प्रशंसा करते हैं। कामकाज में बहुत निपुण हैं वे ।
सत्या — (हँसते हुए) मनो ने भाभी का पक्ष अभी से लेना शुरू कर दिया।
मनोरमा — पक्ष की क्या बात ? सच कहा है।
सुमति — ऐसा ही हो। हम सबकी भी यही शुभ कामना है।
मंगला — जीजी ने पीहर को फिर हरा-भरा कर दिया।
सुमति — बहुत परिश्रम किया है सुभामा बहिन ने। गेंदा को कोख जाये बालक से अधिक माना ।
सुभामा — मानती क्यों नहीं बहिन ! तीन भाईयों के परिवार में बस एक यही तो कुल का दीपक है। गेंदा है तो मेरा पीहर तो बना है।
सत्या — तुमने अपना कर्त्तव्य निवाहा। अब गेंदासिंह की बारी है।
सुभामा — मेरा गेंदा भी मुझे बहुत मान सम्मान देता है बहिन !
बिना सम्मति के कोई कार्य नहीं करता।
(बुलावा लेकर सब चलने लगती हैं)
सुभामा — अच्छा बहिनों ! नमस्कार । आती रहना।
सुमति — अभी तुम रहोगी ना जीजी !
सत्या — नहीं, कल चली जाऊँगी।
सुभामा — इतनी जल्दी ।
सुमति — एक माह होने को आ गया है। तुम्हारे जीजाजी की अस्वस्थता के समाचार आ रहे हैं, जाना ही होगा।
वैसे मेरा आना — जाना तो लगा ही रहता है। मनो ! तू समय निकाल कर भाभी के पास आ जाया करना।
अकेली घबराएगी।
मनोरमा — मैं तो आऊँगी ही मौसी ! तुम नहीं कहतीं, तब भी मैं आती ।
सुभामा — चल तूने मुझे निश्चित कर दिया।
(सबका प्रस्थान )
सुभामा — (स्वतः ही) अभी तक गेंदा नहीं आया गुलाब ! उठ,
गुलाब- पानी — आनी पीले । जब से बैठी है सिमटी-सी।
पानी नहीं पीना बुआ जी ! (रुपए देते हुए) ये रुपये रख लें आप।
सुभामा — ये तुम्हारे रुपए हैं बहू ! तुम ही रखो। मैं नहीं लूँगी, अब इस घर की सार सँभाल तुम्हारे हाथ में है। कुल की मर्यादा रखना बस इतना ही तुमसे कहना है।
गुलाब — आप निश्चित रहें बुआजी ! कोई भी ऐसा कार्य नहीं करूँगी जिससे कुल पर आँच आये। फिर मार्ग दर्शन तो आप का रहेगा।
सुभामा — मेरा क्या मार्गदर्शन ? यहाँ रहूँगी ही नहीं। तुम स्वयं सयानी हो, तुम्हारे आस-पास सास-ससुर नहीं हैं, इसलिए मुझे विशेष चिंता है।
गुलाब — सो तो है ही बुआजी ! आप के अतिरिक्त हमारा है ही कौन ?
सुभामा — तेरे आने से मेरा भी पीहर बन गया बहू ! भाईभावज के निधन से तो इस घर के पट बंद हो चुके थे, तेरे पैर पड़ते ही फिर खुल गये हैं। कभी आई तो
बनी — बनाई रसोई तो मिलेगी जीमने को।
गुलाब — क्यों नहीं बुआ जी, ये तो मेरा कर्त्तव्य है।
सुभामा — दस वर्ष से सूना घर गेंदा के विवाह से हरा भरा हो गया। तेरा आगमन उसके जीवन को सुखमय बना
गुलाब — दे, बस यही मेरी मंगल कामना है आपका आशीर्वाद ही हमारे जीवन का सहारा होगा बुआजी !
गेंदासिंह — (प्रवेश कर हँसते हुए) कहने से नहीं, चरण छूने से आशीर्वाद मिलता है।
गुलाब — उठकर बुआ के चरण छूती है।
सुभामा — तू बैठ बहू ! गेंदा की बात में मत आ, मेरा तो सदैव आशीर्वाद है तुम दोनों को।
गेंदासिंह — बुआजी ! सेवा करने से मेवा मिलती है।
गुलाब — बुआजी का ही पुण्य प्रताप है, जो इस घर का अस्तित्व टिका हुआ है। इसे संवारने में पन्द्रह दिन
तक रात — दिन परिश्रम किया है।
सुभामा — यह तो मेरा कर्त्तव्य था बेटा ! अब भाई-भावज की धरोहर गुलाब को सौंपते हैं। मुझे हर्ष हो रहा है।
गुलाब — वही मर्यादा का निर्वाह करेगी।
भगवान मुझे ऐसी शक्ति दे कि भारतीय गृहिणी के उत्तरदायित्व को निभा सकूँ ।
सुभामा — मुझे विश्वास है गुलाब ! गेंदा अब मुझे विदा कर दे।
कल मुँह अँधेरे निकल जाऊँ तो संध्या तक पहुँच जाऊँगी।
गेंदासिंह — इतनी जल्दी बुआ !
गुलाबकुछ दिन मेरे पास रह ले बुआ !
(आग्रह भरे स्वर में) अभी नहीं जाने दूगीं आपको।
सुभामा — तू जानता है रे ! तेरे फूफाजी अपने मन से औषधि नहीं खाना चाहते। बहुयें बेचारी क्या करें ? मैं कड़ाई न करूँ तो काम नहीं चलता। औषधि मैं ही नियमित दे पाती हूँ।
गेंदासिंह — (अत्यन्त आग्रह भरे स्वर में) दो-चार दिन और रह लो न बुआ !
सुभामा — अभी मत कह बेटे ! अब मेरा मन नहीं लगता।
गेंदासिंह — तो आप क्या अकेली जायेंगी। मैं साथ का पता तो लगा लूँ।
सुभामा — मैंने पता लगा लिया है। धीरज चाचा जा रहे हैं।
उनका साथ अच्छा रहेगा। दिन छिपते-छिपते गाँव पहुँच जाऊँगी।
गेंदासिंह — तो आप पहले ही सब निश्चित कर चुकी हैं।
अभी तक तो काम में व्यस्त रहीं। अब कुछ दिन आराम से रह लेती किन्तु आपने जाने का ही पक्का कर लिया है। मेरी याद मत भूलना बुआ !
सुविधानुसार आती रहना।
सुभामा — (हँसते हुए) पागल । मैं तुझे भुलाऊँगी ?
मुझे बुलामी ही मुझे मत भुलाना, अब तो तेरी और तू लेने आएगा, तब आऊँगी।
गेंदासिंह — हाँ! हाँ। मैं ही आऊँगा लेगे। माँ कही तो पिताकही तो, तुम्हीं सब कुछ हो। तुम्हीं ने मुझे बड़ा किया है।
क्या इतना कृतघ्न हो जाऊँगा कि तुम्हें भूल जाऊँ?
सुभामा — कृतघ्नता की कोई बात नहीं है गेंदा। अपने कोख जाये बच्चे पराए हो जाते हैं, तू तो गोद खिलाया भतीजा है।
गेंदासिंह — (रूठते हुए) देख बुआ ! मुझसे ऐसा मत कहना। मैं तो तुझे अपनी माँ ही मानता हूँ।
सुभामा — तुझसे नहीं कह रही रे। जगत की रीति ऐसी ही है अब मैं सोऊँगी। तुम लोग भी सोओ। सुबह जल्दी उठना है।
(प्रस्थान )
गेंदासिंह — (गेंदासिंह उठकर किवाड़ लगा लेता है। घूँघट सिमटी गुलाब और अधिक सिमट जाती है)
गुलाब — भला अब घूँघट क्यों ? बुआ तो चली गई। यहाँ और तुम । (कहते हुए गुलाब का घूँघट उलट देता गुलाब का सिर खुल जाता है। वह सिर ढक लेती है
(सिर ढकते हुए) ये क्या ?
गेंदासिंह — इतनी जल्दी बुआ !
गुलाब — कुछ दिन मेरे पास रह ले बुआ !
(आग्रह भरे स्वर में) अभी नहीं जाने दूगीं आपको।
सुभामा — तू जानता है रे ! तेरे फूफाजी अपने मन से औषधि नहीं खाना चाहते। बहुयें बेचारी क्या करें ? मैं कड़ाई न करूँ तो काम नहीं चलता। औषधि मैं ही नियमित दे पाती हूँ।
सुभामा — (हँसते हुए) पागल ! मैं तुझे भुलाऊँगी ? अरे अब तू ही मुझे मत भुलाना, अब तो तेरी बहू मुझे बुलाएगी और तू लेने आएगा, तब आऊँगी।
गेंदासिंह — (अत्यन्त आग्रह भरे स्वर में) दो-चार दिन और रह लो न बुआ !
गेंदासिंह — हाँ! हाँ ! मैं ही आऊँगा लेने। माँ कहो तो पिता कहो तो, तुम्हीं सब कुछ हो । तुम्हीं ने मुझे बड़ा किया है।
क्या इतना कृतघ्न हो जाऊँगा कि तुम्हें भूल जाऊँ ?
सुभामा — कृतघ्नता की कोई बात नहीं है गेंदा ! अपने कोख जाये बच्चे पराए हो जाते हैं, तू तो गोद खिलाया भतीजा है।
सुभामा — अभी मत कह बेटे ! अब मेरा मन नहीं लगता।
गेंदासिंह — तो आप क्या अकेली जायेंगी। मैं साथ का पता तो लगा लूँ।
गेंदासिंह — (रूठते हुए) देख बुआ ! मुझसे ऐसा मत कहना। मैं तो तुझे अपनी माँ ही मानता हूँ।
सुभामा — मैंने पता लगा लिया है। धीरज चाचा जा रहे हैं।
उनका साथ अच्छा रहेगा। दिन छिपते-छिपते गाँव पहुँच जाऊँगी।
सुभामा — तुझसे नहीं कह रही रे । जगत की रीति ऐसी ही है।
अब मैं सोऊँगी। तुम लोग भी सोओ। सुबह जल्दी उठना है।
गेंदासिंह — तो आप पहले ही सब निश्चित कर चुकी हैं।
अभी तक तो काम में व्यस्त रहीं। अब कुछ दिन आराम से रह लेती किन्तु आपने जाने का ही पक्का कर लिया है। मेरी याद मत भूलना बुआ !
सुविधानुसार आती रहना।
(प्रस्थान )
गेंदासिंह — (गेंदासिंह उठकर किवाड़ लगा लेता है। घूँघट में सिमटी गुलाब और अधिक सिमट जाती है)
गुलाब — भला अब घूँघट क्यों ? बुआ तो चली गई। यहाँ मैं हूँ और तुम । (कहते हुए गुलाब का घूँघट उलट देता है। गुलाब का सिर खुल जाता है। वह सिर ढक लेती है)
(सिर ढकते हुए) ये क्या ?
[ अनुकन्य
गेंद्रसिंह — क्यों? मुझे यह अधिकार नहीं है क्या?
(गुलाब प्रत्युत्तर में मुस्कान बिखेर देती है)
गुलाब। आज अपनी मधुरात है। पर मैं एक ऐसी उलझन में फंस गया हूँ कि विवाह का हर्ष मना भुतका आनन्दन लूट सकेंगे।
(घबराकर) क्यों ऐसी कौनसी विषम समस्या आ गई है कि हर्ष में विषाद की रेखा खिंच गई ?
गेंद्रसिंह — इस समस्या को सुलझाने में मुझे तुम्हारे सहयोग की अत्यन्त आवश्यकता है।
गुलाब — अद्धांगिनी सहयोग न देगी तो कौन देगा? बतलायें मैं क्या सेवा कर सकती हूँ?
गेंद्रसिंह — कदाचित् तुम्हें ज्ञान न होगा कि ये विवाह कैसे हुआ ?
गुलाब — अपना अभिप्राय स्पष्ट करें। मैं समझी नहीं। क्या विवाह में भी प्रकार होते हैं? अरे! बारात आई, भाँवर पड़ी और विवाह हो गया ?
गेंद्रसिंह — यह तो बाहरी बातें हैं जो सबकी समान होती हैं पर अन्तर में अन्तर है।
गुलाब — अन्तर में अन्तर ! पहेलियाँ-सी न बुझायें। जल्दी से बता दें कैसे हुआ ?
गेंद्रसिंह — तो सुनी, हम दोनों के पिता परस्पर अभिन्न मित्र थे।
गुलाब — उन्होंने अपनी मैत्रीभाव को मंगनी कर ली थी।
गेंद्रसिंह — (हँसते हुए) जन्म के पूर्व ही।
गुलाब — सौभाग्य से उनकी आत्माएँ मिलीं। मैं तो मेरा और तुम्हारे के तु के बाद फलदान की सम्मति भी दे दी।
गेंद्रसिंह — यह तो बहुत अच्छा हुआ। फिर यह कैसे होता ?
गुलाब — (व्यथित हृदय से) साथ ही यह भी बत भाग्य की यह स्वीकार नहीं था।
गेंद्रसिंह- कौन — सा विघ्न आ पड़ा ?
गुलाब — सौभाग्य ने पीठ फेर दी और दुर्भाग्य ने अपना जमाया। पाँच वर्ष का मेरा था।
पन्द्रहवाँ वर्ष पूरा होते-होते पिता स्वर्ग सिधा गये। बुआ ने मुझे साथ रखा। जब मैं बड़ा हुआ ही बुआ के पास रहने लगा-क पिता के पास आ जाता था।
गेंद्रसिंह — फिर ती काठिन दुःख का सामना करना पड़ा।
गुलाब — (व्यथित हो) हाँ पर बुआ के प्यार से सब लिया। जब मैं बड़ा हुआ तो बुआ ने मुझे व भेजा।
पास विवाह का प्रस्ताव रखा।
गेंदासिंह — क्यों ? मुझे यह अधिकार नहीं है क्या ?
(गुलाब प्रत्युत्तर में मुस्कान बिखेर देती है)
गेंदासिंह — गुलाब ! आज अपनी मधुरात है। पर मैं एक ऐसी उलझन में फँस गया हूँ कि विवाह का हर्ष मना मधुरात का आनन्द न लूट सकेंगे।
गुलाब — (घबराकर) क्यों ऐसी कौनसी विषम समस्या आ गई है कि हर्ष में विषाद की रेखा खिंच गई ?
गेंदासिंह — इस समस्या को सुलझाने में मुझे तुम्हारे सहयोग की अत्यन्त आवश्यकता है।
गुलाब — अर्द्धांगिनी सहयोग न देगी तो कौन देगा ? बतलायें मैं क्या सेवा कर सकती हूँ ?
गेंदासिंह — कदाचित् तुम्हें ज्ञान न होगा कि ये विवाह कैसे हुआ ?
गुलाब — अपना अभिप्राय स्पष्ट करें। मैं समझी नहीं। क्या विवाह में भी प्रकार होते हैं? अरे ! बारात आई, भाँवर पड़ी और विवाह हो गया ?
गेंदासिंह — यह तो बाहरी बातें हैं जो सबकी समान होती हैं पर अन्तर में अन्तर है।
गुलाब — अन्तर में अन्तर ! पहेलियाँ-सी न बुझायें। जल्दी से बता दें कैसे हुआ ?
गेंदासिंह — तो सुनो, हम दोनों के पिता परस्पर अभिन्न मित्र थे।
गुलाब — (हँसते हुए) जन्म के पूर्व ही ?
गेंदासिंह — उन्होंने अपनी मैत्रीस्वरूप हमारे जन्म के पूर्व ही मंगनी कर ली थी।
सौभाग्य से उनकी आकांक्षा पूरी हुई। एक के घर में मेरा और दूसरे के घर में तुम्हारा जन्म हो गया। जन्मोत्सव के बाद फलदान की रस्म भी पूरी कर ली गई।
गुलाब — यह तो बहुत अच्छा हुआ वरन् मेरा आपका साथ कैसे होता ?
गेंदासिंह — (व्यथित हृदय से) साथ तो छूट ही गया था पर भाग्य को यह स्वीकार नहीं था ।
गुलाब- कौन — सा विघ्न आ पड़ा ?
गेंदासिंह — सौभाग्य ने पीठ फेरी और दुर्भाग्य ने आसन जमाया। पाँच वर्ष का छोड़ माँ का निधन हो गया।
पन्द्रहवाँ वर्ष पूरा होते-होते पिता परलोक सिधार गये। बुआ ने मुझे सहारा दिया। वैसे तो पाँच वर्ष से ही बुआ के पास रहने लगा था परन्तु कभी-कभी पिता के पास आ जाता था।
गुलाब — फिर तो कठिन दुःख का सामना करना पड़ा होगा।
गेंदासिंह — (व्यथित हो) हाँ ! पर बुआ के प्यार ने सारा दुख हर लिया। जब मैं बड़ा हुआ तो बुआ ने तुम्हारे पिता के पास विवाह का प्रस्ताव भेजा।
मेरे पिता तो तैयार होंगे ही। उन्हें तो अपार हर्ष हुआ होगा।
गगेंदा सिंह — कहाँ का हर्ष ? उन्होंने अस्वीकार कर दिया।
गुलाब — जब सगाई हो गई थी तब अस्वीकार करने का कारण क्या था ?
गेंदासिंह — बड़ा भारी कारण था गुलाब ! तुम क्या समझो, मैं
माता — पिता विहीन निर्धन युवक था। धन पिता की बीमारी में समाप्त हो गया। बुआ ने इस घर को बचा लिया वरन् पूर्वजों की निशानी भी नष्ट हो जाती।
गुलाब — मेरे पिता ने यह उचित नहीं किया। मेरे भाग्य में जो होना होता वही होता। उन्हें वचन भंग नहीं करना था फिर विवाह कैसे हुआ ?
गेंदासिंह — मुझे व्यथित हो बुआ ने सारी बातें बतलाई। ये मान मर्यादा का प्रश्न बन गया। मेरे पास फूटी कौड़ी नहीं और तुम्हारे पिता ने बीस हजार रुपयों की माँग की।
रुपया दो तो कन्या का विवाह तुम्हारे साथ हो सकता है।
गुलाब — छिः कितनी घृणित बात है। धन के सामने वचन का कोई मूल्यांकन नहीं ?
गेंदासिंह — बात तो ठीक है उनकी, कोई भी पिता अपनी कन्या निर्धन के पल्ले क्यों बाँधे ?
गुलाब — पर नए सिरे से सम्बन्ध थोड़े ही हुआ था। मैं तुम्हारी वाग्दत्ता पत्नी थी। केवल विवाह का संस्कार ही तो करना था।
गेंदासिंह — ऐसा उन्होंने नहीं, मैंने विचार किया कि मेरी पत्नी का वर कोई अन्य बने, यह मेरे क्षत्रिय धर्म पर कलंक है। बीस हजार देने का मैंने संकल्प किया और जुटाने में लग गया।
गुलाब — इतनी बड़ी राशि आप कैसे जुटा पाए ?
गेंदासिंह — मैंने घर बेचना चाहा तो तीन हजार से अधिक मूल्य नहीं आँका गया। समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती और घर भी चला जाता।
गुलाब — घर बेचकर बड़ी भूल हो जाती। खड़े होने को भी कहीं स्थान न रहता।
गेंदासिंह — तब पिता के एक मित्र मोदी चाचा से ऋण माँगा।
‘जहाँ चाह वहाँ राह’ आशा फलवती हुई, ऋण मिल गया।
गुलाब — (आश्चर्य से आँख फाड़कर) बीस हजार की इतनी बड़ी रकम, पिता की मित्रता के नाम पर दे दी उन्होंने ! ऐसे मित्र बिरले ही होते हैं।
गेंदासिंह — (गंभीर स्वर में) पर कठोर अनुबंध है मेरे और उनके बीच।
गुलाब — कैसा अनुबंध ?
गुलाब — मेरे पिता तो तैयार होंगे ही। उन्हें तो अपार हर्ष हुआ होगा।
गेंदा सिंह — कहाँ का हर्ष ? उन्होंने अस्वीकार कर दिया।
गुलाब — जब सगाई हो गई थी तब अस्वीकार करने का कारण क्या था ?
गेंदासिंह — बड़ा भारी कारण था गुलाब ! तुम क्या समझो, मैं
माता — पिता विहीन निर्धन युवक था। धन पिता की बीमारी में समाप्त हो गया। बुआ ने इस घर को बचा लिया वरन् पूर्वजों की निशानी भी नष्ट हो जाती।
मेरे पिता ने यह उचित नहीं किया। मेरे भाग्य में जो होना होता वही होता। उन्हें वचन भंग नहीं करना था फिर विवाह कैसे हुआ ?
गेंदासिंह — मुझे व्यथित हो बुआ ने सारी बातें बतलाई। ये मान मर्यादा का प्रश्न बन गया। मेरे पास फूटी कौड़ी नहीं और तुम्हारे पिता ने बीस हजार रुपयों की माँग की।
रुपया दो तो कन्या का विवाह तुम्हारे साथ हो सकता है।
गुलाब — छिः कितनी घृणित बात है। धन के सामने वचन का कोई मूल्यांकन नहीं ?
गेंदासिंह — बात तो ठीक है उनकी, कोई भी पिता अपनी कन्या निर्धन के पल्ले क्यों बाँधे ?
गुलाब — पर नए सिरे से सम्बन्ध थोड़े ही हुआ था। मैं तुम्हारी वाग्दत्ता पत्नी थी। केवल विवाह का संस्कार ही तो करना था।
गेंदासिंह — ऐसा उन्होंने नहीं, मैंने विचार किया कि मेरी पत्नी का वर कोई अन्य बने, यह मेरे क्षत्रिय धर्म पर कलंक है। बीस हजार देने का मैंने संकल्प किया और जुटाने में लग गया।
गुलाब — इतनी बड़ी राशि आप कैसे जुटा पाए ?
गेंदासिंह — मैंने घर बेचना चाहा तो तीन हजार से अधिक मूल्य नहीं आँका गया। समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती और घर भी चला जाता।
गुलाब — घर बेचकर बड़ी भूल हो जाती। खड़े होने को भी कहीं स्थान न रहता।
गेंदासिंह — तब पिता के एक मित्र मोदी चाचा से ऋण माँगा।
‘जहाँ चाह वहाँ राह’ आशा फलवती हुई, ऋण मिल गया।
गुलाब — (आश्चर्य से आँख फाड़कर) बीस हजार की इतनी बड़ी रकम, पिता की मित्रता के नाम पर दे दी उन्होंने ! ऐसे मित्र बिरले ही होते हैं।
गेंदासिंह — (गंभीर स्वर में) पर कठोर अनुबंध है मेरे और उनके बीच।
गुलाब — कैसा अनुबंध ?
गेंदासिंह — क्या करूँ ? इसके बिना मैं तुम्हें अपनी अर्द्धांगिनी नहीं बना सकता था।
गुलाब — बतलायें तो वह कौन-सा अनुबंध है ? अब तो मैं इस घर की अभिन्न अंग और आप की सहगामिनी हूँ। मुझसे यह अलगाव कैसा ?
गेंदासिंह — अलगाव और तुमसे ?
गुलाब — फिर संकोच क्यों ?
गेंदासिंह — सच बात यह हैं कि मैं तुम्हारे प्रति अपराधी हूँ रानी।
गुलाब — किन्तु मैं आपको अपराधी स्वीकार करूँ तब न !
आप निस्संकोच कहें। अब तो हम दोनों को मिलकर समस्या का समाधान खोजना होगा।
गेंदासिंह — तो सुनो गुलाब ! साहूकार की शर्त है कि जब तक उसका ऋण न चुका दूँ, तब तक ब्रह्मचर्य से रहूँ।
(अत्यन्त उद्विग्न हो) मैं दोषी हूँगुलाब, मैं दोषी हूँ।
गुलाब — (दृढ़तापूर्वक) कौन कहता है आप दोषी हैं? क्षत्रिय धर्म का उचित रूप से निर्वाह कर आपने अनपेक्षित लगने वाले दोष का प्रक्षालन किया है। मेरा पूर्ण समर्थन है।
गेंदासिंह — धन्य हो गुलाब ! धन्य हो (विह्वल हो अंक में भरने को उद्यत है)
गुलाब — (किंचित् कठोर हो पीछे हटते हुए) नहीं, नहीं!
गुलाब — आप यह न भूलें कि हम व्रती हैं। ऋण चुकाने तक इसका अखण्ड रूप से पालन करना होगा।
गेंदासिंह — तुमने मेरी आशा और विश्वास को बल दिया है गुलाब ! भय था कि तुम मुझे कोसोगी, अपशब्द कहोगी पर तुम तो साक्षात् देवी हो।
गुलाब — सती सीता का रक्त मेरी धमनियों में प्रवाहित है स्वामी ! भारतीय पतिव्रता नारी कुल या धर्म की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करती। आप धन प्राप्ति के लिए जो भी कार्य करेंगे, उसमें मेरा भी सहयोग होगा। आपने भविष्य की क्या योजना बनाई है ?
गेंदासिंह — मैंने यही विचार किया है कि तुम्हें तुम्हारे पीहर में छोड़कर मैं राजमहल में नौकरी कर लूँ। सुना है वहाँ प्रहरी की आवश्यकता है।
गुलाब — (आवेश में) मैं क्यों पीहर में रहूँ ? पिता ने हमारे साथ अन्याय किया है। वहाँ मेरा रहना क्या उचित
गेंदासिंह — उचित क्या है, इसे छोड़ो गुलाब ! अभी हमारी परिस्थिति ऐसी ही है।
गुलाब — परिस्थिति कैसी भी क्यों न हो, स्वाभिमान गिरवी नहीं रखा जा सकता। मैं भी परिश्रमी हूँ, आराम से नहीं रह सकती। मेरे लिए भी वहीं कोई कार्य पूछ लें।
गेंदासिंह — क्या करूँ ? इसके बिना मैं तुम्हें अपनी अद्धांगिनी नहीं बना सकता था।
गुलाब — बतलायें तो वह कौन-सा अनुबंध है ? अब तो मैं इस घर की अभिन्न अंग और आप की सहगामिनी
गेंदासिंह — हूँ। मुझसे यह अलगाव कैसा ?
गुलाब — अलगाव और तुमसे ?
गेंदासिंह — फिर संकोच क्यों ?
गुलाब — सच बात यह हैं कि मैं तुम्हारे प्रति अपराधी हूँ रानी।
किन्तु मैं आपको अपराधी स्वीकार करूँ तब न !
गेंदासिंह — आप निस्संकोच कहें। अब तो हम दोनों को मिलकर समस्या का समाधान खोजना होगा।
गुलाब — तो सुनो गुलाब ! साहूकार की शर्त है कि जब तक उसका ऋण न चुका दूँ, तब तक ब्रह्मचर्य से रहूँ।
(अत्यन्त उद्विग्न हो) मैं दोषी हूँ गुलाब, मैं दोषी हूँ।
गेंदासिंह — (दृढ़तापूर्वक) कौन कहता है आप दोषी हैं? क्षत्रिय धर्म का उचित रूप से निर्वाह कर आपने अनपेक्षित लगने वाले दोष का प्रक्षालन किया है। मेरा पूर्ण समर्थन है।
गुलाब — धन्य हो गुलाब ! धन्य हो (विह्वल हो अंक में भरने को उद्यत है)
गेंदासिंह — (किंचित् कठोर हो पीछे हटते हुए) नहीं, नहीं!
आप यह न भूलें कि हम व्रती हैं। ऋण चुकाने तक इसका अखण्ड रूप से पालन करना होगा।
गुलाब — तुमने मेरी आशा और विश्वास को बल दिया है गुलाब ! भय था कि तुम मुझे कोसोगी, अपशब्द कहोगी पर तुम तो साक्षात् देवी हो।
सती सीता का रक्त मेरी धमनियों में प्रवाहित है स्वामी! भारतीय पतिव्रता नारी कुल या धर्म की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करती। आप धन प्राप्ति के लिए जो भी कार्य करेंगे, उसमें मेरा भी सहयोग होगा। आपने भविष्य की क्या योजना बनाई है ?
गेंदासिंह — मैंने यही विचार किया है कि तुम्हें तुम्हारे पीहर में छोड़कर मैं राजमहल में नौकरी कर लूँ। सुना है वहाँ प्रहरी की आवश्यकता है।
गुलाब — (आवेश में) मैं क्यों पीहर में रहूँ ? पिता ने हमारे साथ अन्याय किया है। वहाँ मेरा रहना क्या उचित
गेंदासिंह — उचित क्या है, इसे छोड़ो गुलाब ! अभी हमारी परिस्थिति ऐसी ही है।
गुलाब — परिस्थिति कैसी भी क्यों न हो, स्वाभिमान गिरवी नहीं रखा जा सकता। मैं भी परिश्रमी हूँ, आराम से नहीं रह सकती। मेरे लिए भी वहीं कोई कार्य पूछ लें।
गेंदासिंह — तुम क्यों कुछ करोगी ? कमाने के लिए मैं अकेला ही बहुत हूँ ।
गुलाब — नहीं, मेरी बात मानें आप। यदि प्रहरी का कार्य आपको मिलता है तो राजा साहब से निवेदन कर रात्रि जागरण का कार्य ले लें। मैं भी वहीं आपके साथ रहूँगी। साथ भी रहेगा और व्रत भी पलता रहेगा।
गेंदासिंह — कहीं स्त्रियाँ भी प्रहरी का कार्य करती है।
गुलाब — क्यों नहीं ? और यदि ऐसा न हो तो मैं पुरुष का वेश धारण कर लूँगी।
गेंदासिंह — (हँसते हुए) तुम पुरुष बनोगी।
गुलाब — क्यों नहीं बन सकती ? आप राजा साहब से कहें कि यह मेरा छोटा भाई है। घर में अकेला नहीं रह सकता। राजा को दो सेवक मिल जायेंगे।
गेंदासिंह — पर वेतन दो को थोड़े ही मिलेगा।
गुलाब — न दें, वेतन का प्रश्न नहीं है। हा! एक बात और राजा साहब से यह प्रार्थना अवश्य कर लेना कि कार्य दिन का नहीं रात्रि का हो।
गेंदासिंह — सब तुम्हारे मन का ही करेंगे क्या महाराज ?
गुलाब — अवश्य करेंगे, यदि हमारा भाग्य अनुकूल हुआ तो।
में क्या हानि ?
भगवत्स्वरूप जैन ‘भगवत्’ पूर्णिमा
गेंदासिंह — तुम्हारी बात मान्य है, जैसा कहोगी वैसा ही करूँगा।
रात्रि बहुत हो गई है। विवाह की प्रथम रात्रि सभी की प्यार और मनुहारों की सरसता में अनायास बीत जाती है, हम ऐसे अभागे हैं कि हमारी मधुरात समय की कठोर छाया में समस्या को सुलझाने में नीरस बन समाप्त हो गई।
गुलाब — हम अभागे क्यों ? अरे ! ऐसे भाग्यवान बिरले ही होंगे। अग्नि का संयोग पाकर भी घृत विकृत न हो, यह क्या छोटी बात है ? प्रियवर! ऐसी विलक्षणता भारतीय जीवन में ही परिलक्षित होती है, अन्यत्र नहीं। हम दोनों जब अभिन्न मित्र बनकर रहेंगे तब उस आनन्द को पाने के लिए देवता भी तरसेंगे।
गेंदासिंह — सचमुच हम भाग्यवान हैं गुलाब ! हम दोनों के विचार कितने मेल खाते हैं ? अब हम सो जाएँ।
गुलाब — प्रातः बुआजी को जाना है, शीघ्र उठना पड़ेगा।
आप चिंता न करें। मैं सुबह ही कलेवा बनाकर उनके साथ रख दूँगी, मुझे बचपन से अभ्यास है।
खेत पर जाने के लिए पिता का सारा प्रबंध मैं करती आ रही हूँ। आप निश्चिंत हो कर सोएँ ।
गेंदासिंह — तुम क्यों कुछ करोगी ? कमाने के लिए मैं अकेला ही बहुत हूँ ।
गुलाब — नहीं, मेरी बात मानें आप। यदि प्रहरी का कार्य आपको मिलता है तो राजा साहब से निवेदन कर रात्रि जागरण का कार्य ले लें। मैं भी वहीं आपके साथ रहूँगी। साथ भी रहेगा और व्रत भी पलता रहेगा।
गेंदासिंह — कहीं स्त्रियाँ भी प्रहरी का कार्य करती है।
गुलाब — क्यों नहीं ? और यदि ऐसा न हो तो मैं पुरुष का वेश धारण कर लूँगी।
गेंदासिंह — (हँसते हुए) तुम पुरुष बनोगी।
गुलाब — क्यों नहीं बन सकती ? आप राजा साहब से कहें कि यह मेरा छोटा भाई है। घर में अकेला नहीं रह सकता। राजा को दो सेवक मिल जायेंगे।
गेंदासिंह — पर वेतन दो को थोड़े ही मिलेगा।
गुलाब — न दें, वेतन का प्रश्न नहीं है । हाँ ! एक बात और राजा साहब से यह प्रार्थना अवश्य कर लेना कि कार्य दिन का नहीं रात्रि का हो।
गेंदासिंह — सब तुम्हारे मन का ही करेंगे क्या महाराज ?
गुलाब — अवश्य करेंगे, यदि हमारा भाग्य अनुकूल हुआ तो ।
परीक्षा करने में क्या हानि ?
गेंदासिंह — तुम्हारी बात मान्य है, जैसा कहोगी वैसा ही करूँगा।
रात्रि बहुत हो गई है। विवाह की प्रथम रात्रि सभी की प्यार और मनुहारों की सरसता में अनायास बीत जाती है, हम ऐसे अभागे हैं कि हमारी मधुरात समय की कठोर छाया में समस्या को सुलझाने में नीरस बन समाप्त हो गई।
गुलाब — हम अभागे क्यों ? अरे ! ऐसे भाग्यवान बिरले ही होंगे। अग्नि का संयोग पाकर भी घृत विकृत न हो, यह क्या छोटी बात है ? प्रियवर ! ऐसी विलक्षणता भारतीय जीवन में ही परिलक्षित होती है, अन्यत्र नहीं। हम दोनों जब अभिन्न मित्र बनकर रहेंगे तब उस आनन्द को पाने के लिए देवता भी तरसेंगे।
गेंदासिंह — सचमुच हम भाग्यवान हैं गुलाब ! हम दोनों के विचार कितने मेल खाते हैं ? अब हम सो जाएँ।
प्रातः बुआजी को जाना है, शीघ्र उठना पड़ेगा।
गुलाब — आप चिंता न करें। मैं सुबह ही कलेवा बनाकर उनके साथ रख दूँगी, मुझे बचपन से अभ्यास है।
खेत पर जाने के लिए पिता का सारा प्रबंध मैं ही करती आ रही हूँ। आप निश्चिंत हो कर सोएँ ।
दृश्य-द्वितीय
समय — संध्याकाल
स्थान — राजप्रासाद का कक्ष
(महाराज रामसिंह एवं उनकी पत्नी महारानी
कनकश्री — कक्ष में वार्तालाप कर रहे हैं)
रामसिंह — हाँ तो तुम क्या कह रहीं थी महारानी ! उस समय हम बराबर सुन नहीं पाए थे।
कनकश्री — यही कि आपके प्रहरी दोनों पुरुष नहीं हैं।
रामसिंह — क्या कह रही हो ? पुरुष नहीं है तो क्या नारी हैं ?
कनक श्री — हाँ राजन् ! उनमें एक नारी है।
रामसिंह — तुम्हें ये शंका कैसे हो गई ?
कनक श्री — शंका निर्मूल नहीं है महाराज ! गेंदासिंह पुरुष है और उसका छोटा भाई गुलाब नारी है।
रामसिंह — तुमने ये निर्णय कैसे ले लिया ?
कनक श्री — स्वर को परखकर । उसमें परस्पर होने वाली बातों में एक नारी का कंठ स्वर प्रतीत होता है।
रामसिंह — यह बताओ कि नारी को पुरुष बनने की क्या
कनक श्री — कारण बताना मेरी सामर्थ्य के बाहर है परन्तु यह सुनिश्चित है कि गुलाब नारी है। उनकी प्रतिदिन की बात सुन मेरा अनुमान प्रबल होता जा रहा है।
रामसिंह — क्या तुम सोती नहीं ? उनकी बातें सुना करती हो।
निश्चित ही मैं चार रातों से सो नहीं पा रही हूँ। परसों नारी स्वर सुनाई पड़ते ही झाँककर देखा तो दोनों भाइयों के अतिरिक्त कोई नहीं दिखा। शंका ने जिज्ञासा का रूप ले लिया। समाधान के अर्थ रोज ही ध्यान से सुन रही हूँ। शंका सत्य है।
कनकश्री — क्या बातें करते हैं वे ?
रामसिंह — वे रात भर बातें करते हैं। आवाज सुनाई पड़ती है, पर बोल स्पष्ट समझ में नही आते ।
कनकश्री — वे ऐसा क्यों करेंगे महारानी ! यदि वे पति-पत्नी होते तो रात्रि जागरण की नौकरी ही क्यों करते ?
रामसिंह — और यह कार्य तो उन्होंने स्वेच्छा से ही लिया है। हो सकता है भाई बहिन हों अथवा अवैध प्यार हो।
कनकश्री — दो माह हो गए उन्हें करते, अभी तक कोई भूल पकड़ में नहीं आई।
रामसिंह — हैं तो विश्वस्त सेवक । पर राजन् ! कारण जो भी हो मेरा अनुमान अन्यथा नहीं है। न जाने उनकी कौनसी विवशता है। जानकारी करने में हानि ही क्या है ?
कनक श्री — हानि क्या लाभ ही है। संभव है कोई षड्यंत्र हो । राज्य के शत्रुओं का अभाव नहीं है।
रामसिंह — षड्यंत्र की गन्ध तो नहीं आती राजन् ! फिर भी
रामसिंह — किसी कार्य में अनावश्यक विलम्ब क्यों ? आज अभी पूछ लेंगे।
(गेंदासिंह एवं गुलाब का प्रवेश। दोनों महाराज रामसिंह एवं महारानी कनक श्री को अभिवादन
कनकश्री — ड्यूटी पर आ गए गेंदासिंह।
गेंदासिंह — जी महारानी ! आज्ञा ?
रामसिंह — तुम्हारी गतिविधि संदिग्ध नहीं हैं तथापि हम जानना चाहते हैं कि तुम कौन हो ? और यहाँ क्यों आये हो ?
गेंदासिंह — महाराज ! मैं गेंदासिंह लालसिंह का पुत्र और कर्णसिंह का प्रपौत्र हूँ।
रामसिंह — (आश्चर्य से) कर्णसिंह राठौर ? मेरे पिता महा प्रताप सिंह के समय में वे अत्यन्त प्रभावशाली व्यक्ति माने जाते थे।
गेंदासिंह — जी महाराज ! वे मेरे दादा थे। दैव का प्रकोप परिवार में मैं ही एक बालक बचा था। बारह वां की मेरी आयु थी। मातृ-पितृ विहीन देख मुझे बुआ अपने गाँव ले गईं। उन्हीं की छत्र-छाया में अब तक रहा।
रामसिंह — तुम्हारी बुआ कहाँ रहती हैं ?
गेंदासिंह — यहाँ से तेरह कोस दूर गंगापुर में रहती हैं महाराज।
रामसिंह — वहाँ से क्यों चले आये? तुम्हारा कर्तव्य था वहीं रहते।
गेंदासिंह — बड़ा हो गया हूँ महाराज। कब तक उन पर भार बनकर रहता ? यह कर्तव्य नहीं अन्याय होता।
कनकश्री — क्यों नहीं? पीहर के नाम पर मैं ही एक मात्र भतीजा था महारानी ! उनके स्नेह ने मुझे कभी माता-पिता का अभाव नहीं खटकने दिया। वे परिश्रमी हैं। गृह कार्य करते हुए उन्होंने मेरे घर की सार-संभालकर उसे सुरक्षित बनाये रखा, जिसमें रहकर मैं अपना सिर छुपा सका हूँ।
रामसिंह — गुलाब कौन है तुम्हारा ?
गेंदासिंह — छोटा भाई है महाराज।
रामसिंह — तुम्हारी बुआ क्या इसे नहीं ले गई थी ?
गेंदासिंह — ले गई थी महाराज !
रामसिंह — तुम्हारी सब बातें अपने ही विषय में रहीं। गुलाब की तुमने चर्चा भी नहीं की ?
गेंदासिंह — (क्षणिक विचार कर) श्रीमान् ने मेरे ही विषय में खोजबीन करना परमावश्यक है। उनके आने का
रामसिंह — समय भी हो गया है। चाहें तो पूछ लें ।
गेंदासिंह — किसी कार्य में अनावश्यक विलम्ब क्यों ? आज
रामसिंह — अभी पूछ लेंगे।
(गेंदासिंह एवं गुलाब का प्रवेश। दोनों महाराज रामसिंह एवं महारानी कनक श्री को अभिवादन
कनकश्री — ड्यूटी पर आ गए गेंदासिंह !
गेंदासिंह — जी महारानी ! आज्ञा ?
रामसिंह — तुम्हारी गतिविधि संदिग्ध नहीं हैं तथापि हम जानना चाहते हैं कि तुम कौन हो ? और यहाँ क्यों आये हो ?
गेंदासिंह — महाराज ! मैं गेंदासिंह लालसिंह का पुत्र और कर्णसिंह का प्रपौत्र हूँ।
रामसिंह — (आश्चर्य से) कर्णसिंह राठौर ? मेरे पिता महा प्रताप सिंह के समय में वे अत्यन्त प्रभावशाली व्यक्ति माने जाते थे।
गेंदासिंह — जी महाराज! वे मेरे दादा थे। दैव का प्रकोप परिवार में मैं ही एक बालक बचा था। बारह वर्ष की मेरी आयु थी। मातृ-पितृ विहीन देख मुझे बुआ अपने गाँव ले गईं। उन्हीं की छत्र-छाया में अब तक रहा।
तुम्हारी बुआ कहाँ रहती हैं ?
यहाँ से तेरह कोस दूर गंगापुर में रहती हैं महाराज !
वहाँ से क्यों चले आये ? तुम्हारा कर्त्तव्य था वहीं रहते ।
बड़ा हो गया हूँ महाराज ! कब तक उन पर भार बनकर रहता ? यह कर्त्तव्य नहीं अन्याय होता।
कनकश्री — बुआ का स्नेह तो होगा ही।
गेंदासिंह — क्यों नहीं ? पीहर के नाम पर मैं ही एक मात्र भतीजा था महारानी ! उनके स्नेह ने मुझे कभी माता-पिता का अभाव नहीं खटकने दिया। वे परिश्रमी हैं। गृह कार्य करते हुए उन्होंने मेरे घर की सार-संभालकर उसे सुरक्षित बनाये रखा, जिसमें रहकर मैं अपना सिर छुपा सका हूँ।
रामसिंह — गुलाब कौन है तुम्हारा ?
गेंदासिंह — छोटा भाई है महाराज ।
रामसिंह — तुम्हारी बुआ क्या इसे नहीं ले गई थी ?
गेंदासिंह — ले गई थी महाराज !
रामसिंह — तुम्हारी सब बातें अपने ही विषय में रहीं। गुलाब की तुमने चर्चा भी नहीं की ?
गेंदासिंह — (क्षणिक विचार कर) श्रीमान् ने मेरे ही विषय में जानकारी चाही थी।
रामसिंह — नहीं यह स्पष्ट झूठ है गेंदासिंह ! सच बोलो गुलाब !
तुम कौन हो ? और कब से गेंदासिंह के साथ हो ?
गुलाब — (घबराकर) जी, मैं गुलाब हूँ अन्नदाता ।
कनकश्री — (स्नेह पूर्वक) यह तो हमें विदित है। महाराज यह जानना चाहते हैं कि तुम गेंदासिंह के कौन हो और
गेंदासिंह — महाराज ! हम दोनों दो माह से आपकी सेवा में हैं और आपके प्रति निष्ठावान हैं फिर भी यदि कोई अपराध अनजाने हो गया हो तो हम क्षमा चाहते हैं।
रामसिंह — ऐसी कोई बात नहीं हैं पर कोई रहस्य अवश्य है जो
कनकश्री — और छिपाना ही तुम्हारा महान अपराध है।
गेंदासिंह — परन्तु इससे सेवा के कार्य में कोई व्यवधान नहीं आया। मैं भगवान की साक्षीपूर्वक कहता हूँ कि हमारी स्वामी भक्ति अक्षुण्ण है। कभी भी किसी प्रकार का अंतर नहीं आया एवं प्रण करता हूँ कि
रामसिंह — हमें तुमसे कोई शिकायत नहीं हैं किन्तु यह तो तुम स्वीकार कर रहे हो कि कुछ रहस्य अवश्य हैं।
कनकश्री — हमें बतलाने में तुम्हारी हानि नहीं होगी गेंदासिंह !
गेंदासिंह — सम्भव है, पर निश्चित ही आपको लाभ भी नहीं
रामसिंह — वह हमारे विचारने की बात है। तुम क्यों अपराधी
कनकश्री — अरे ! यह गुलाब तो रुआँसा हो थर-थर काँप रहा है।
गेंदासिंह — क्षमा करें महारानी ! यह हमारी व्यक्तिगत बात है, हमारी विवशता है। राज्य से या किसी भी अन्य
रामसिंह — फिर छिपाने जैसी क्या बात है ?
कनकश्री — (प्रेम से निकट बुलाकर) यहाँ आओ गुलाब ! मैं वचन देती हूँ, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। महाराज
गेंदासिंह — गुलाब नहीं, मैं बतलाऊँगा महाराज ! गुलाब मेरी
कनकश्री — गुलाब पत्नी है? मैंने कहा था न महाराज ! कि एक नारी स्वर है। बस इसी से मेरे मन में शंका हो गई थी।
रामसिंह — पर यह कोई छिपाने जैसी बात तो है नहीं। सभी के
गेंदासिंह — पर मेरा विवाह विचित्र परिस्थिति में हुआ है महाराज ! हम दोनों के जन्मोत्सव में ही हमारे माता-
रामसिंह — नहीं यह स्पष्ट झूठ है गेंदासिंह। सच बोली गुलाब।
तुम कौन हो ? और कब से गेंदासिंह के साथ हो ?
गुलाब — (घबराकर) जी, मैं गुलाब हूँ अन्नदाता ।
कनकश्री — (स्नेह पूर्वक) यह तो हमें विदित है। महाराज यह जानना चाहते हैं कि तुम गेंदासिंह के कौन हो और
गेंदासिंह — महाराज ! हम दोनों दो माह से आपकी सेवा में हैं और आपके प्रति निष्ठावान हैं फिर भी यदि कोई अपराध अनजाने हो गया हो तो हम क्षमा चाहते हैं।
रामसिंह — ऐसी कोई बात नहीं हैं पर कोई रहस्य अवश्य है जो
कनकश्री — और छिपाना ही तुम्हारा महान अपराध है।
गेंदासिंह — परन्तु इससे सेवा के कार्य में कोई व्यवधान नहीं आया। मैं भगवान की साक्षीपूर्वक कहता हूँ कि हमारी स्वामी भक्ति अक्षुण्ण है। कभी भी किसी प्रकार का अंतर नहीं आया एवं प्रण करता हूँ कि
रामसिंह — हमें तुमसे कोई शिकायत नहीं हैं किन्तु यह तो तुम स्वीकार कर रहे हो कि कुछ रहस्य अवश्य हैं।
कनकश्री — हमें बतलाने में तुम्हारी हानि नहीं होगी गेंदासिंह।
गेंदासिंह — सम्भव है, पर निश्चित ही आपकी लाभ भी नहीं
रामसिंह — वह हमारे विचारने की बात है। तुम क्यों अपराधी
कनकश्री — अरे ! यह गुलाब तो रुआँसा ही थर-थर काँप रहा है।
गेंदासिंह — क्षमा करें महारानी! यह हमारी व्यक्तिगत बात है, हमारी विवशता है। राज्य से या किसी भी अन्य
रामसिंह — फिर छिपाने जैसी क्या बात है ?
कनकश्री — (प्रेम से निकट बुलाकर) यहाँ आओ गुलाब ! मैं वचन देती हूँ, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। महाराज
गेंदासिंह — गुलाब नहीं, मैं बतलाऊँगा महाराज ! गुलाब मेरी
कनक श्री — गुलाब पत्नी है? मैंने कहा था न महाराज ! कि एक नारी स्वर है। बस इसी से मेरे मन में शंका हो गई थी।
पर यह कोई छिपाने जैसी बात तो है नहीं। सभी के
गेंदासिंह — पर मेरा विवाह विचित्र परिस्थिति में हुआ है महाराज ! हम दोनों के जन्मोत्सव में ही हमारे माताचाही थी।
रामसिंह — नहीं यह स्पष्ट झूठ है गेंदासिंह! सच बोलो गुलाब तुम कौन हो? और कब से गेंदासिंह के साथ हो?
गुलाब — (घबराकर) जी, मैं गुलाब हूँ अन्नदाता।
कनकश्री — (स्नेह पूर्वक) यह तो हमें विदित है। महाराज यह जानना चाहते हैं कि तुम गेंदासिंह के कौन हो और
गेंदासिंह — महाराज! हम दोनों दो माह से आपकी सेवा में हैं और आपके प्रति निष्ठावान हैं फिर भी यदि कोई अपराध अनजान हो गया हो तो हम क्षमा चाहते हैं।
रामसिंह — ऐसी कोई बात नहीं है पर कोई रहस्य अवश्य है जो
कनकश्री — और छिपाना ही तुम्हारा महान अपराध है।
गेंदासिंह — परन्तु इससे सेवा के कार्य में कोई व्यवधान नहीं आया। मैं भगवान को साक्षी पूर्वक कहता हूँ कि हमारी स्वामि भक्ति अक्षुण्ण है। कभी भी किसी प्रकार का अंतर नहीं आया एवं प्रण करता हूँ कि
रामसिंह — कोई शिकायत नहीं है किन्तु यह तो तुम स्वीकार कर रहे हो कि कुछ रहस्य अवश्य है।
[अनुबन्ध]
कनकश्री — हमें बतलाने में तुम्हारी हानि नहीं होगी गेंदासिंह!
गेंदासिंह — सम्भव है, पर निश्चित ही आपको लाभ भी नहीं
रामसिंह — वह हमारे विचारने की बात है। तुम क्यों अपराधी
कनकश्री — अरे! यह गुलाब तो रुआँसा हो थर-थर काँप रहा है।
गेंदासिंह — क्षमा करें महारानी ! यह हमारी व्यक्तिगत बात है, हमारी विवशता है। राज्य से या किसी भी अन्य
रामसिंह — फिर छिपाने जैसी क्या बात है ?
कनकश्री — (प्रेम से निकट बुलाकर) यहाँ आओ गुलाब ! मैं वचन देती हूँ, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। महाराज
गेंदासिंह — गुलाब नहीं, मैं बतलाऊँगा महाराज ! गुलाब मेरी
कनक श्री — गुलाब पत्नी है? मैंने कहा था न महाराज ! कि एक नारी स्वर है। बस इसी से मेरे मन में शंका हो गई थी।
रामसिंह — पर यह कोई छिपाने जैसी बात तो है नहीं। सभी के
गेंदासिंह — पर मेरा विवाह विचित्र परिस्थिति में हुआ है महाराज ! हम दोनों के जन्मोत्सव में ही हमारे माताजानकारी चाही थी।
रामसिंह — नहीं यह स्पष्ट झूठ है गेंदासिंह ! सच बोलो गुलाब !
तुम कौन हो ? और कब से गेंदासिंह के साथ हो ?
गुलाब — (घबराकर) जी, मैं गुलाब हूँ अन्नदाता ।
कनकश्री — (स्नेह पूर्वक) यह तो हमें विदित है। महाराज यह जानना चाहते हैं कि तुम गेंदासिंह के कौन हो और
गेंदासिंह — महाराज ! हम दोनों दो माह से आपकी सेवा में हैं और आपके प्रति निष्ठावान हैं फिर भी यदि कोई अपराध अनजाने हो गया हो तो हम क्षमा चाहते हैं।
रामसिंह — ऐसी कोई बात नहीं हैं पर कोई रहस्य अवश्य है जो
कनकश्री — और छिपाना ही तुम्हारा महान अपराध है।
गेंदासिंह — परन्तु इससे सेवा के कार्य में कोई व्यवधान नहीं आया। मैं भगवान की साक्षीपूर्वक कहता हूँ कि हमारी स्वामी भक्ति अक्षुण्ण है। कभी भी किस प्रकार का अंतर नहीं आया एवं प्रण करता हूँ कि
रामसिंह — हमें तुमसे कोई शिकायत नहीं हैं किन्तु यह तो तुम स्वीकार कर रहे हो कि कुछ रहस्य अवश्य हैं।
गेंदासिंह — हमें बतलाने में तुम्हारी हानि नहीं होगी गेंदासिंह !
सम्भव है, पर निश्चित ही आपको लाभ भी नहीं
रामसिंह — वह हमारे विचारने की बात है। तुम क्यों अपराधी
कनकश्री — अरे ! यह गुलाब तो रुआँसा हो थर-थर काँप रहा है।
गेंदासिंह — क्षमा करें महारानी ! यह हमारी व्यक्तिगत बात है, हमारी विवशता है। राज्य से या किसी भी अन्य
रामसिंह — फिर छिपाने जैसी क्या बात है ?
कनकश्री — (प्रेम से निकट बुलाकर) यहाँ आओ गुलाब ! मैं वचन देती हूँ, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। महाराज
गेंदासिंह — गुलाब नहीं, मैं बतलाऊँगा महाराज ! गुलाब मेरी
कनक श्री — गुलाब पत्नी है? मैंने कहा था न महाराज ! कि एक नारी स्वर है। बस इसी से मेरे मन में शंका हो गई थी।
रामसिंह — पर यह कोई छिपाने जैसी बात तो है नहीं। सभी के
गेंदासिंह — पर मेरा विवाह विचित्र परिस्थिति में हुआ है महाराज ! हम दोनों के जन्मोत्सव में ही हमारे माता-
रामसिंह — जानकारी चाही थी।
गुलाब — नहीं यह स्पष्ट झूठ है गेंदासिह ! सच बोला गुलाब !
तुम कौन हो ? और कब से गेंदासिंह के साथ हो ?
कनकश्री — (घबराकर) जी, मैं गुलाब हूँ अन्नदाता ।
(स्नेह पूर्वक) यह तो हमें विदित है। महाराज यह जानना चाहते हैं कि तुम गेंदासिंह के कौन हो और
गेंदासिंह — महाराज ! हम दोनों दो माह से आपकी सेवा में हैं और आपके प्रति निष्ठावान हैं फिर भी यदि कोई अपराध अनजाने हो गया हो तो हम क्षमा चाहते हैं।
रामसिंह — ऐसी कोई बात नहीं हैं पर कोई रहस्य अवश्य है जो
कनकश्री — और छिपाना ही तुम्हारा महान अपराध है।
गेंदासिंह — परन्तु इससे सेवा के कार्य में कोई व्यवधान नहीं आया। मैं भगवान की साक्षीपूर्वक कहता हूँ कि हमारी स्वामी भक्ति अक्षुण्ण है। कभी भी किसी प्रकार का अंतर नहीं आया एवं प्रण करता हूँ कि
रामसिंह — हमें तुमसे कोई शिकायत नहीं हैं किन्तु यह तो तुम स्वीकार कर रहे हो कि कुछ रहस्य अवश्य हैं।
कनकश्री — हमें बतलाने में तुम्हारी हानि नहीं होगी गेंदासिंह !
गेंदासिंह — सम्भव है, पर निश्चित ही आपको लाभ भी नहीं
रामसिंह — वह हमारे विचारने की बात है। तुम क्यों अपराधी
कनकश्री — अरे ! यह गुलाब तो रुआँसा हो थर-थर काँप रहा है।
गेंदासिंह — क्षमा करें महारानी ! यह हमारी व्यक्तिगत बात है, हमारी विवशता है। राज्य से या किसी भी अन्य
रामसिंह — फिर छिपाने जैसी क्या बात है ?
कनकश्री — (प्रेम से निकट बुलाकर) यहाँ आओ गुलाब ! मैं वचन देती हूँ, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। महाराज
गेंदासिंह — गुलाब नहीं, मैं बतलाऊँगा महाराज ! गुलाब मेरी
कनकश्री — गुलाब पत्नी है? मैंने कहा था न महाराज ! कि एक नारी स्वर है। बस इसी से मेरे मन में शंका हो गई थी।
रामसिंह — पर यह कोई छिपाने जैसी बात तो है नहीं। सभी के
गेंदासिंह — पर मेरा विवाह विचित्र परिस्थिति में हुआ है महाराज ! हम दोनों के जन्मोत्सव में ही हमारे मातापिता ने पारस्परिक मित्रता के फलस्वरूप सगाई पक्की कर समधी बनने का प्रण कर लिया था।
कनक श्री — यह तो बहुत अच्छा किया तुम्हारे माता-पिता ने भविष्य में दोनों को वर-वधू को खोजने की आवश्यकता ही नहीं रही।
गेंदासिंह — पर दैव को यह कहाँ स्वीकार था। मेरे माता-पिता का स्वर्गवास हो गया। मुझे निर्धनता ने घेर लिया।
गुलाब के पिता ने बुआ द्वारा भेजे गये विवाह के प्रस्ताव को अमान्य कर दिया। इससे मुझे अपने घोर अपमान का अनुभव हुआ।
कनकश्री — अपमान जैसी बात ही है एवं अपनी भारतीय संस्कृति के भी विरुद्ध है फिर विवाह कैसे हुआ ?
गेंदासिंह — गुलाब के पिता ने मुझसे बीस हजार रुपये की माँग की। मैंने ऋण लेना चाहा पर मुझे निर्धन अनाथ को ऋण देता कौन ?
रामसिंह — ऋण के लिए साख होना आवश्यक है।
गेंदासिंह — प्रयत्न करने पर ऋण तो मिल गया परन्तु कठोर अनुबंध के साथ ।
कनकश्री — कठोर अनुबंध ?
गेंदासिंह — हाँ महारानी ! वह यह कि जब तक मैं ऋण न चुकाऊँ तक तक ब्रह्मचर्य का पालन करूँ।
रामसिंह — अहो ! साहूकार भी कितने क्रूर होते हैं।
गेंदासिंह — अनुबंध उचित ही है महाराज ! गृहस्थी बढ़ने के पूर्व ऋण सुविधा से चुकाया जा सकता है। सौभाग्य से आपके यहाँ प्रहरी का कार्य मिल गया। पत्नी ने कहा कि हम दोनों कार्य करें तो अच्छा हो। पैसा भी अधिक मिलेगा और साथ भी सदैव बना रहेगा।
रामसिंह — (प्रसन्नता से ) अच्छा तो ये तुम्हारी पत्नी की योजना थी। गुलाब भी बुद्धिमती है।
गेंदासिंह — आपका आशीर्वाद और अनुकंपा है श्रीमान् ! पत्नी का विशेष आग्रह था कि हम रात्रि जागरण का ही कार्य करेंगे। आपने निवेदन स्वीकार कर मेरा महान उपकार किया महाराज !
रामसिंह — पर तुम इस अल्प वेतन में कब तक ऋण चुकाओगे गेंदासिंह !
गेंदासिंह — महाराज ! चुकाने का संकल्प किया है तो कभी न कभी उऋण हो ही जायेंगे । ऋणदाता ने समय का प्रतिबन्ध तो लगाया नहीं है। प्रभु से बस यही प्रार्थना है कि ऋण मुक्ति तक व्रत का अखण्ड रूप से पालन कर सकूँ ।
रामसिंह — धन्य है गेंदासिंह ! तुम और तुम्हारी पत्नी । हम तुम्हारे ऋण को आज ही चुका कर तुम्हें ऋण मुक्त कर देते हैं। ऐसे विश्वस्त सेवकों की हमें
कनकश्री — सुन्दर निर्णय लिया राजन् ! आप व्यक्ति के पारखी हैं।
रामसिंह — महारानी ! हम गेंदासिंह की पदोन्नति कर राज महल की अंतरंग व्यवस्था का कार्य सोंपते हैं एवं गुलाब को अपनी घर गृहस्थी सम्भालने के लिए सेवा मुक्त करते हैं।
गुलाब — महाराज ! मुझे भी सेवा का अवसर दें। महारानी के सान्निध्य में रहकर अपना अहो भाग्य मानूँगी।
रामसिंह — स्वेच्छा से तुम कभी-भी यहाँ आ सकती हो। पर गृहस्थी को सुचारु रूपेण चलाना तुम्हारा प्रमुख कार्य है और गेंदासिंह ! तुम भविष्य में भी इसीप्रकार उत्तरदायित्व का निर्वाह करोगे ऐसी आशा है।
गेंदासिंह — (हर्षातिरेक से आँखों में आँसू आ जाते हैं) ओह !
सचमुच मैं ऋण — मुक्त हो गया महाराज ! आप नरदेह में साक्षात् देवता स्वरूप हैं। आपकी प्रसन्नता मुझे वरदान बन गई। जन्म-जन्म आपका कृतज्ञ रहूँगा महाराज ! आपकी सेवा में मैं अपना जीवन समर्पित करता हूँ।
रामसिंह — तुम जैसा निष्ठावान सेवक पाकर हम अत्यन्त प्रसन्न हैं।
मृगावती
पात्रानुक्रमणिकाः
महारानी मृगावती — कौशाम्बी की महारानी
सुभद — कौशाम्बी के मन्त्री
विजयसेन — कौशाम्बी के सेनापति
चण्डप्रद्योत — उज्जयिनी के राजा
प्रतिहार — सेवक
इन्द्रभूति गणधर — भगवान महावीर के गणधर
उदयन — महारानी मृगावती का पुत्र
कौशा — अंबिका की दासी
अंबिका — श्रेष्ठि की विधवा पत्नी
दृश्य-प्रथम
समय- प्रातः काल — प्रथम प्रहर
स्थान — कौशाम्बी नगर का राज प्रसाद
(कौशाम्बी नगरी की शासिका विधवा महारानी मृगावती हैं। उनके पति महाराज शतानीक का चन्द दिनों पूर्व स्वर्गवास हो गया है। पुत्र उदयन अभी बालक है; अतः वे ही राज्य संचालन कर रही हैं। उज्जयिनी नरेश चण्डप्रद्योत ने कौशाम्बी पर आक्रमण हेतु उसे चारों ओर से घेर लिया है। महारानी मृगावती चिन्तित अपने मंत्रणागृह में मुक्त कर देते हैं। ऐसे विश्वस्त सेवकों की हमें
कनकश्री — सुन्दर निर्णय लिया राजन् ! आप व्यक्ति के पारखी हैं।
रामसिंह — महारानी ! हम गेंदासिंह की पदोन्नति कर राज महल की अंतरंग व्यवस्था का कार्य सोंपते हैं एवं गुलाब को अपनी घर गृहस्थी सम्भालने के लिए सेवा मुक्त करते हैं।
गुलाब — महाराज ! मुझे भी सेवा का अवसर दें। महारानी के सान्निध्य में रहकर अपना अहो भाग्य मानूँगी।
रामसिंह — स्वेच्छा से तुम कभी-भी यहाँ आ सकती हो। पर गृहस्थी को सुचारु रूपेण चलाना तुम्हारा प्रमुख कार्य है और गेंदासिंह ! तुम भविष्य में भी इसीप्रकार उत्तरदायित्व का निर्वाह करोगे ऐसी आशा है।
गेंदासिंह — (हर्षातिरेक से आँखों में आँसू आ जाते हैं) ओह !
सचमुच मैं ऋण — मुक्त हो गया महाराज ! आप नरदेह में साक्षात् देवता स्वरूप हैं। आपकी प्रसन्नता मुझे वरदान बन गई। जन्म-जन्म आपका कृतज्ञ रहूँगा महाराज ! आपकी सेवा में मैं अपना जीवन समर्पित करता हूँ।
रामसिंह — तुम जैसा निष्ठावान सेवक पाकर हम अत्यन्त प्रसन्न हैं।
मृगावती
पात्रानुक्रमणिकाः
मृगावती — कौशाम्बी की महारानी
सुभद्र — कौशाम्बी के मन्त्री
विजयसेन — कौशाम्बी के सेनापति
चण्डप्रद्योत — उज्जयिनी के राजा
प्रतिहार — सेवक
इन्द्रभूति गणधर — भगवान महावीर के गणधर
उदयन — महारानी मृगावती का पुत्र
कौशा — अंबिका की दासी
अंबिका — श्रेष्ठि की विधवा पत्नी
दृश्य-प्रथम
समय- प्रातःकाल — प्रथम प्रहर
स्थान — कौशाम्बी नगर का राज प्रसाद
(कौशाम्बी नगरी की शासिका विधवा महारानी मृगावती हैं। उनके पति महाराज शतानीक का चन्द दिनों पूर्व स्वर्गवास हो गया है। पुत्र उदयन अभी बालक है; अतः वे ही राज्य संचालन कर रही हैं। उज्जयिनी नरेश चण्डप्रद्योत ने कौशाम्बी पर आक्रमण हेतु उसे चारों ओर से घेर लिया है। महारानी मृगावती चिन्तित अपने मंत्रणागृह में
मृगावती — (अमात्य आर्य सुभद्र से विचार विमर्श कर रही हैं)
हमारी आशंका सत्य हो गयी आर्य। रातों रात शत्रु ने क्यरी को घेर लिया।
सुभद्र — हमारे गुप्तचरों ने यथावत् सन्देश संप्रेषित किए महाराणी। वे लोग अपने कार्य में निपुण हैं, उनके
सम्पर्क सूत्र दूर — दूर तक फैले हुए हैं।
मृगावती — इसी से हम आने वाली विपत्ति से पहिले ही सतर्क हो गए। अनायास जैसी स्थिति नहीं आने पाई।
विजयसेन — (प्रवेश कर) हमारा सैन्यपरिकर अपने खड्गों पर फिर से पानी चढ़ा युद्ध के लिए अविलम्ब प्रस्तुत है। सैन्य शिविरों में समयभेद किए बिना अहर्निशि युद्ध का अभ्यास किया जा रहा है महारानी !
मृगावती — मुझे आपसे ऐसी ही आशा है आर्य विजयसेन। हम आपकी ही बाट जोह रहे थे।
विजयसेन — आज्ञा दें महारानी। आदेश पाते ही मैं तत्काल सेवा में उपस्थित हुआ हूँ। हमारा सैन्यदल भी आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहा है।
सुभद्र — सेनाध्यक्ष ! क्या हम यह विश्वास करें कि युद्ध में विजयश्री हमें वरेगी ?
विजयसेन — कठिन अवश्य है आर्य अमात्य ! परन्तु हम प्रयत्न करेंगे।
अनुबन्ध
मृगावती — मेरा अनुमान है कि हमारा सैन्यपरिकर चण्डप्रद्योत की सेना के सम्मुख नहीं टिक सकेगा।
विजयसेन — यह निर्णय तो युद्ध क्षेत्र ही देगा। धृष्टता क्षमा करें महारानी। योद्धा बल पौरुष को तोलने में समय नष्ट नहीं करता। वह तो आक्रांता के दाँत खट्टे करने के लिए सदैव कटिबद्ध रहता है।
मृगावती — बिना बिचारे सेना को युद्ध में झोंक देना क्या उचित
विजयसेन — नहीं परन्तु जब युद्ध अनिवार्य हो तब ? (गर्व से)
महारानी। हमारी सेना भले ही अल्प हो परन्तु हमें अपनी व्यूह रचना पर गौरव है। इसीकारण हम शत्रु सेना से लोहा लेने में स्वयं को समर्थ पाते हैं।
सुभद्र — निस्सन्देह, आपकी व्यूह रचना अद्वितीय है सेनाध्यक्ष। इसी के बल पर हमारी सेना विजयी होती आई है और इसी युक्ति से विशाल सेना को पराजित किया जा सकता है।
विजयसेन — सुना है प्रद्योत अपने प्रचण्ड क्रोध के कारण चण्डप्रद्योत कहलाने लगा है।
मृगावती — हाँ, वह बहुत क्रोधी और दुष्ट प्रकृति है, अकारण ही
बैर — विरोध ठान लेता है।
सुभद्र — आपकी बुद्धि चातुर्य से ही अब तक युद्ध टलता रहा अमात्य आर्य सुभद्र से विचार विमर्श कर रही हैं)
मृगावती — हमारी आशंका सत्य हो गयी आर्य ! रातों रात शत्रु ने नगरी को घेर लिया।
सुभद्र — हमारे गुप्तचरों ने यथावत् सन्देश संप्रेषित किए महारानी ! वे लोग अपने कार्य में निपुण हैं, उनके
सम्पर्क सूत्र दूर — दूर तक फैले हुए हैं।
मृगावती — इसी से हम आने वाली विपत्ति से पहिले ही सतर्क हो गए। अनायास जैसी स्थिति नहीं आने पाई ।
विजयसेन — (प्रवेश कर) हमारा सैन्यपरिकर अपने खडगों पर फिर से पानी चढ़ा युद्ध के लिए अविलम्ब प्रस्तुत है। सैन्य शिविरों में समयभेद किए बिना अहर्निशि युद्ध का अभ्यास किया जा रहा है महारानी !
मृगावती — मुझे आपसे ऐसी ही आशा है आर्य विजयसेन ! हम आपकी ही बाट जोह रहे थे।
विजयसेन — आज्ञा दें महारानी ! आदेश पाते ही मैं तत्काल सेवा में उपस्थित हुआ हूँ। हमारा सैन्यदल भी आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहा है।
सुभद्र — सेनाध्यक्ष ! क्या हम यह विश्वास करें कि युद्ध में विजयश्री हमें वरेगी ?
विजयसेन — कठिन अवश्य है आर्य अमात्य ! परन्तु हम प्रयत्न करेंगे।
मृगावती — मेरा अनुमान है कि हमारा सैन्यपरिकर चण्डप्रद्योत की सेना के सम्मुख नहीं टिक सकेगा।
विजयसेन — यह निर्णय तो युद्ध क्षेत्र ही देगा। धृष्टता क्षमा करें महारानी ! योद्धा बल पौरुष को तोलने में समय नष्ट नहीं करता। वह तो आक्रांता के दाँत खट्टे करने के लिए सदैव कटिबद्ध रहता है।
मृगावती — बिना बिचारे सेना को युद्ध में झोंक देना क्या उचित
विजयसेन — नहीं परन्तु जब युद्ध अनिवार्य हो तव ? (गर्व से)
महारानी ! हमारी सेना भले ही अल्प हो परन्तु हमें अपनी व्यूह रचना पर गौरव है । इसीकारण हम शत्रु सेना से लोहा लेने में स्वयं को समर्थ पाते हैं।
सुभद्र — निस्सन्देह, आपकी व्यूह रचना अद्वितीय है सेनाध्यक्ष ! इसी के बल पर हमारी सेना विजयी होती आई है और इसी युक्ति से विशाल सेना को पराजित किया जा सकता है।
विजयसेन — सुना है प्रद्योत अपने प्रचण्ड क्रोध के कारण चण्डप्रद्योत कहलाने लगा है।
मृगावती — हाँ, वह बहुत क्रोधी और दुष्ट प्रकृति है, अकारण ही
बैर — विरोध ठान लेता है।
सुभद्र — आपकी बुद्धि चातुर्य से ही अब तक युद्ध टलता रहा है महारानी, वरन् वह तो… ।
विजयसेन — (व्यंग्य से) कब का स्वर्ग सिधार गया होता।
सुभद्र — (स्मित हास्य-सा बिखेरते हुए) यह कथन मिथ्या है आर्य विजयसेन ! क्योंकि वह अभी जीवित है।
विजयसेन — (उसी स्वर में) आप यह क्यों भूल रहें है कि उसने युद्ध नहीं किया। युद्ध करता तो अवश्य मैं उसे जीवित नहीं छोड़ता।
मृगावती — संभव है पर अकारण प्रजा का रक्त बहाने में कष्ट होता है आर्य ! अब कोई बहाना नहीं खोजा जा सकता। महाराज होते तो प्रद्योत आक्रमण करने का
सुभद्र — दुस्साहस न करता ।
काल को प्रतिबंधित करना असम्भव है; अतः हम महाराज का निधन विवश हो देखते रहे किन्तु जब तक मैं जीवित हूँ महारानी ! तब तक आपका कोई बालबांका नहीं कर सकता । प्रजा आपके व युवराज उदयन के प्रति निष्ठावान है।
मृगावती — आर्य ! आप वृद्ध हैं! श्वसुरजी भी आपकी मंत्रणा को प्रश्रय देते रहे हैं। मुझे भी आप सबका पूर्ण विश्वास है। राज्य के सर्वप्रथम शुभ चिंतक आप ही हैं।
विजयसेन — राज्य पर कुदृष्टि रखने वाले की हम आँख निकालने की सामर्थ्य रखते हैं। महारानी ! सत्य का पक्ष अपनाने वाला आत्म विश्वासी वीर होता है, असत्य के पक्षी कायर में बल कितना ? वह तो प्रतिक्षण मृत्यु का आलिंगन करता है।
(प्रतिहार का प्रवेश)
प्रतिहार — महारानी ! उज्जयिनी नरेश चण्डप्रद्योत का दूत आया है। आपसे भेंट का आकाँक्षी है।
मृगावती — चण्डप्रद्योत का दूत ? आर्य अमात्य हमारी परीक्षा का अवसर सन्निकट है। हमें तुरन्त निर्णय लेना होगा।
सुभद्र — हमारा निर्णय ही है। अब एकमेव युद्ध का ही विकल्प शेष है महारानी ! क्योंकि चण्डप्रद्योत शांति से मानने वाला नहीं है। अविवेकी, अंधे व हठाग्रही को राह पर लाने का एक मात्र यही उपाय है।
मृगावती — दूत को भेज दो प्रतिहार !
प्रतिहार — जी महारानी !
(प्रतिहार का प्रस्थान। दूत का प्रवेश। वह आकर महारानी को अभिवादन करता है)
सुभद्र — (आसंदी की ओर संकेत कर) विराजो, कहो, किस अभिप्राय आगमन हुआ है ?
दूत — (बैठ कर) उज्जयिनी नरेश महाराजाधिराज चण्ड प्रद्योत का संदेश लेकर महारानी की सेवा में उपस्थित हुआ हूँ।
[अनुकंप]
मृगावती — (गंभीर स्वर में) क्या संदेश है?
सुभद्र — आपकी कुशल क्षेम के समाचार ज्ञात करने की अति उत्सुक हैं महाराजाधिराज।
दूत — (व्यंग्य से) कुशल क्षेम जानने का अति सुन्दर ढंग है तुम्हारी महारानी का।
मृगावती — जो भी हो, हम शिवकाम महाराज के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करते। उन्होंने कहा कि महाराज शतानीक का मृत्यु शोक अब आपके हृदय पटल से च्युत होना चाहिए?
दूत — तुम अपनी बात कहो दूत ! हमारी अंतरंगा बातों से तुम्हें क्या प्रयोजन? स्पष्ट कहो क्या कहना चाहते हो?
मृगावती — सहस्रमान का संदेश है कि आपका पुत्र उदयन अब वयस्क हो चला है, अतः आपने जो वचन दिया था, उसकी अविलम्ब पूर्ति करें।
दूत — (क्रोध पूर्वक) कैसा वचन?
मृगावती — क्षमा करें महारानी! क्या आपने यह नहीं कहा था कि महाराज की अभिलाषा पूर्ति में उदयन का बचपन एवं पति की तात्कालिक मृत्यु बाधक है।
विजयसेन — (उत्तेजित हो म्यान से तलवार निकाल कर खड़े हो जाते हैं) प्रलाप बंद करो दूत ! वरना तुम्हारा शीश
मृगावती — क्षण भर में धूल में लोटने लगेगा।
विजयसेन — शांत रहो सेनाध्यक्ष! संयम रखें। दूत अवध्य होता है।
(बैठ जाते हैं) संयम की अपनी मर्यादा है महारानी।
सुभद्र — दूत सीमा उल्लंघन करे क्या वह अनुचित नहीं?
मृगावती — है, पर सज्जन अपनी मर्यादा का पालन करते हुए निष्कंटक रहते हैं।
दूत — ‘यथा राजा तथा प्रजा’ जिसका स्वामी ही मर्यादा खो बैठा हो उसके सेवक से मर्यादा की आशा रखना बालू से तेल निकालने के सदृश है।
विजयसेन — मेरी हत्या से आपकी कठिनाइयाँ अधिक बढ़ जायेंगी सेनाध्यक्ष !
दूत — कठिनाइयों से भयभीत कायर होते हैं। (तिरस्कार के स्वर में)
मृगावती — महारानी! मुझे क्या आज्ञा है? क्या कहें अपने स्वामी से?
दूत — कह देना एक गुफा दो सिंहों का निवासस्थल नहीं बन सकती। जो मृत्यु महाराज शतानीक को ले जा चुकी है वह अब तुम्हारी खोज में व्यग्र है।
सुभद्र — क्षत्रिय अपने वचन की रक्षा करते हैं। दुःख है कि आप अपना वचन भंग कर रहीं हैं।
दूत — म्यान से अधिक बढ़ी हुई तलवार अशोभनीय हो
मृगावती — (गंभीर स्वर में) क्या संदेश है?
दूत — आपकी कुशल क्षेम के समाचार ज्ञात करने को अति उत्सुक हैं महाराजाधिराज ।
सुभद्र — (व्यंग्य से) कुशल क्षेम जानने का अति सुन्दर ढंग है तुम्हारे महाराज का।
दूत — जो भी हो, हम सेवकगण महाराज के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करते। उन्होंने कहा कि महाराज शतानीक का मृत्यु शोक अब आपके हृदय पटल से धुल गया होगा ?
सुभद्र — तुम अपनी बात कहो दूत ! हमारी अंतरंग बातों से तुम्हें क्या प्रयोजन ? स्पष्ट कहो क्या कहना चाहते हो ?
दूत — महाराज का संदेश है कि आपका पुत्र उदयन अब वयस्क हो चला है; अतः आपने जो वचन दिया था, उसकी अविलम्ब पूर्ति करें।
मृगावती — (रोष पूर्वक) कैसा वचन ?
दूत — क्षमा करें महारानी ! क्या आपने यह नहीं कहा था कि महाराज की अभिलाषा पूर्ति में उदयन का बचपन एवं पति की तात्कालिक मृत्यु बाधक है।
विजयसेन — (उत्तेजित हो म्यान से तलवार निकाल कर खड़े हो जाते हैं) प्रलाप बंद करो दूत ! वरना तुम्हारा शीश क्षण भर में धूल में लोटने लगेगा।
मृगावती — शांत हो सेनाध्यक्ष ! संयम रखें! दूत अवध्य होता है।
विजयसेन — (बैठ जाते हैं) संयम की अपनी मर्यादा है महारानी !
दूत सीमा उल्लंघन करे क्या अनुचित नहीं ?
सुभद्र — है, पर सज्जन अपनी मर्यादा का पालन करते हुए निष्कलंक रहते हैं।
मृगावती — ‘यथा राजा तथा प्रजा’ जिसका स्वामी ही मर्यादा खो बैठा हो उसके सेवक से मर्यादा की आशा रखना बालू से तेल निकालने के सदृश है।
दूत — मेरी हत्या से आपकी कठिनाइयाँ अधिक बढ़ जायेंगी सेनाध्यक्ष !
विजयसेन — कठिनाइयों से भयभीत कायर होते हैं। (तिरस्कार के स्वर में)
दूत — महारानी ! मुझे क्या आज्ञा है? क्या कहें अपने स्वामी से ?
मृगावती — कह देना एक गुफा दो सिहों का निवासस्थल नहीं बन सकती। जो मृत्यु महाराज शतानीक को ले जा चुकी है वह अब तुम्हारी खोज में व्यग्र है।
दूत — क्षत्रिय अपने वचन की रक्षा करते हैं। दुःख है कि आप अपना वचन भंग कर रहीं हैं।
सुभद्र — म्यान से अधिक बढ़ी हुई तलवार अशोभनीय हो
दूत — जाती है दूत ! अपनी स्थिति का ध्यान रखो।
आर्य अमात्य ! आप यह क्यों भूल रहे हैं कि इस समय में अपने महाराज का प्रतिनिधि हैं, मेरा अपना व्यक्तित्व उसी में विलीन हो चुका है। महारानी !
शोक की ओट में आपने हमारे महाराज से छल किया है।
विजयसेन — सावधान दूत ! वचन पर नियंत्रण अनिवार्य है।
दूत — सत्य कथन में नियंत्रण कैसा ? हमारे महाराज की सरलता का आपने अनुचित लाभ लिया। वे महारानी के निमंत्रण की प्रतीक्षा करते रहे और यही प्रवंचना।
सुभद्र — ऐसे निकृष्ट पामर को निमंत्रण ? ऐसा घृणित निंद्य प्रस्ताव रखते हुए तुम्हारे महाराज को शर्म आनी चाहिए दूत !
दूत — इसका परिणाम भयंकर होगा।
विजयसेन — विदित है हमें।
दूत — मैं अपने महाराज के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता।
विजयसेन — मूर्ख ! तुम इतना भी नहीं समझते कि हम कैसे अपनी महारानी के विरुद्ध सह सकेंगे।
दूत — तब यह स्मरण रखें कि इसप्रकार आप अपने राज्य
दूत — को भी विनाश से न बचा सकेंगे।
विजयसेन — (उपहास के स्वर में) अरे जा जा ! अपनी चिन्ता कर।
अहंकार में मत फूलें सेनाध्यक्ष ! आपकी मुट्ठी भर सेना हमारी सैन्यवाहिनी में डूबकर अस्तित्वहीन हो जायेगी।
सुभद्र- शृगाल — समूह के लिए एक सिंह ही पर्याप्त है।
नैतिकता एवं आत्मविश्वास के प्रबल बल से
ओत — प्रोत हमारा हृदय है, हम निर्भय हैं।
मृगावती — प्रतीत होता है कि तुम्हारे महाराज को अभी तक ऐसा दिव्य दर्पण नहीं मिला, जिसमें वे अपना वह बिंब देख सकते, जिसमें उनके हृदय की कुटिलता ही कुटिलता झाँक रही है।
दूत — ये सब व्यर्थ की बातें हैं। मैं अब अधिक कुछ नहीं कहना चाहता किन्तु आप पुनः विचार अवश्य कर लें।
अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा। बुद्धिमान समय रहते चेत जाते हैं।
मृगावती — धृष्ट दूत ! बहुत हो चुका। अनुचित सीमोल्लंघन असह्य होता जा रहा है।
दूत — अच्छा होता यदि आप अपनी स्वीकृति देकर युद्ध अवरुद्ध कर देतीं। निरपराध व्यक्तियों के रक्त की नदी बहाने के लिए हमें विवश न करें।
मृगावती — वाचाल दूत ! यह उपदेश चण्डप्रद्योत को देना। तुम तत्काल हमारी राज्य सीमा से बाहर हो जाओ।
दूत — मैं जा रहा हूँ। महाराज के लिए आप का अंतिम संदेश क्या मैं जान सकता हूँ ?
मृगावती — कह देना आलोक बिखेरती हुई दीपशिखा की चमक दूर से ही सुन्दर लगती है। पकड़ने पर वह हाथ जलाये बिना नहीं रहती।
दूत — कहते हैं दीप बुझने के पूर्व दूत आवेश से जल उठना है। (तीव्रगति से प्रस्थान )
मृगावती — प्रतिहार !
प्रतिहार — (उपस्थिति हो) आज्ञा महारानी।
मृगावती — दूत को सुरक्षित नगर सीमा से बाहर पहुँचा दो।
प्रतिहार — जी तत्काल आज्ञा का पालन होगा। (क्षणिक सर्भ विचार मग्न मौन हैं। उस मौन को तोड़ती हैं महारानं मृगावती उनके स्वर में वेदना है)
मृगावती — आर्यवर ! देखा चण्डप्रद्योत का साहस !
सुभद्र — पहाड़ की तलहटी में जाने के पूर्व ऊँट भी गर्व करत है। महारानी ! वासना के घिनावने पथ पर शॉर्ट कितने क्षण साथ दे सकेगा ?
मृगावती — अकारण हिंसा की कल्पना कर मन काँप उठता है।
यह सब क्यों ? एक मात्र मेरे ही कारण न ? इस रूप यौवन से जब जीवन की यातना बन गया तब जीने का क्या अर्थ ?
सुभद्र — ओह ! आप इतनी निराश क्यों होती हैं महारानी।
मृगावती — इस विशाल विश्व में मेरे लिए कुछ भी नहीं रहा है आर्य अमात्य ! पर जीवन की गति अवरुद्ध करने को कौन पसंद करने का साहस कर रहा है ? जितनी साँसे चलना है, वे चलकर ही रुकेंगी।
सुभद्र — यही चरम सत्य है। इस बात का यथावत् ग्रहण करना ही तो वीरता है।
विजयसेन — हम बलात् किसी से बैर-विरोध नहीं करते या कोई हमें छेड़े तो पीछे भी नहीं हटते, उसका यथोचित
सुभद्र — निर्जीव काष्ठ भी राख बनने तक निरन्तर आग से जूझता है फिर हम क्यों शीश झुकाकर अत्याचार सहँ ?
मृगावती — जानती हूँ आर्य ! सतीत्व लुटाने की नहीं सुरक्षित रखने की वस्तु है और इसकी सुरक्षा में जनधन ही नहीं अपने प्राण भी दाँव पर लगा दिए जाते हैं।
विजयसेन — वीरता के अनुरूप आपके वचन हैं महारानी। नश्वर
तन — धन का व्यामोह वीरों को नहीं होता।
सुभद्र — यह उचित ही है। आर्य नारी सतीत्व पर आँच आने पर आँसू बहा कर करुण विलाप नहीं करती, प्रत्युत प्रतिपक्ष लुटेरे को उसके किये का फल चखाने का साहस रखती है।
मृगावती — चिंता तो यही है कि हमारी सेना अल्प है।
विजयसेन — तब भी क्या हुआ ? हमारे एक-एक योद्धा सौ-सौ को मारकर मरेंगे। शत्रु की विजय भी उपहास करेगी। (अनायास दूर से आए जय-जयकार के स्वर अस्पष्ट कर्णगत होते हैं। सब ध्यान से सुनने का यत्न करते हैं। निकट आते हुए समवेत स्वर सुनाई पड़ते हैं)
समवेत स्वर — परम भट्टारक भगवान महावीर की जय ! देवाधिदेव महावीर की जय ! अहिंसा धर्म की जय ! जय ! जय !
भगवान के समवशरण की जय।
मृगावती- जय — जयकार के स्वरों से वायुमंडल मुखरित हो उठा है।
विजयसेन — प्रतीत होता है भगवान महावीर का समवशरण आया है हमारी कौशाम्बी में।
सुभद्र — स्वर स्पष्ट होने लगे हैं। सुनें महारानी !
नेपथ्य — भगवान महावीर की जय।
मृगावती — अहोभाग्य हमारे। भगवान चतुर्विध संघ सहित पधारकर हमें कृतार्थ करने स्वयं आ गए।
पर हमारा दुर्भाग्य कि हम शत्रुओं से घिरे हुए हैं।
अङ्क १]
मृगावती — आर्य विजयसेन ! भगवान के समीप दुर्भाग्य भी सौभाग्य में परिवर्तित हो जाता है।
विजयसेन — इतनी विशाल धर्म सभा के लिए नगर के मध्य उपयुक्त स्थान के अभाव में समवशरण नगर के बाहर रहेगा, तब हम कैसे प्रभु दर्शन का लाभ ले सकेंगे ?
मृगावती — क्या बाधा है ? जहाँ वीतराग भगवान विराजमान हैं, वहाँ भय कैसा ? नगर के समस्त द्वार खोल दिये जाएँ। हम सब आनंद पूर्वक दर्शन, प्रवचन का लाभ उठाएँ।
सुभद्र — क्या कह रही हैं महारानी ? शत्रु को क्या स्वेच्छा से राज्य समर्पित कर देना है ?
विजयसेन — अभी हम समर के लिए कटिबद्ध थे और चंद क्षणों पश्चात् आत्मसमर्पण के लिए स्वयं को प्रस्तुत कर रहे हैं ? यह क्या उचित होगा ?
सुभद्र — हमारी प्रजा त्रस्त हो हाहाकार कर उठेगी महारानी !
नगर द्वार उन्मुक्त कर देना आत्मघात के सदृश होगा।
मृगावती — नहीं, समवशरण के निकट अनर्थ असम्भव है।
वीतरागता के प्रभाव से दूर-दूर तक शांति स्वयमेव स्थापित हो जाती है।
विजयसेन — (आश्चर्य पूर्वक) सच !
मृगावती — हां, आप गुप्तचरों से पता लगवा सकते हैं। आर्य अमात्य कृपया आप उद्घोषक से घोषणा प्रसारित कराने का कष्ट करें ताकि नागरिक निर्भीक हो प्रभु की वन्दना, अर्चना कर सकें।
सुभद्र — तथास्तु !
मृगावती — और उदयन को भी बुलायें। मैं उसे अपने साथ अभी ले जाऊँगी।
सुभद्र — वे कहीं वीणा वादन में तन्मय होगें।
उदयन — (प्रवेश कर) नहीं, ऐसा ज्ञात होता है माँ श्री ! जैसे प्रभु वीर पधारे हैं। देखो न अभी-भी जय-जयकार के स्वर गूँज रहे हैं।
मृगावती — तुम्हारा अनुमान यथार्थ है वत्स !
उदयन — तो वहाँ चलेंगी नहीं आप ? मैं वीणा वादन छोड़ कर आया हूँ।
मृगावती — चलो, चलो। मैं वहीं जा रहीं हूँ। हम भगवान महावीर का धर्मोपदेश सुनेंगे।
विजयसेन — चलें महारानी ! सेवक आपके साथ है।
सुभद्र — उद्घोषक को सूचना संप्रेषित कर हम भी वहीं चलेंगे।
मृगावती — सहर्ष चलें आर्य ! मैं यहीं आपकी प्रतीक्षा करूँगी।
दृश्य-द्वितीय
समय — तृतीय प्रहर
स्थान — भगवान महावीर का समवशरण
(भगवान महावीर का समवशरण कौशाम्बी नगरी के बाहर वन में है। समवशरण के मध्य कमलासन पर प्रभु विराजमान हैं। वहाँ अनेक नर-नारी धर्मोपदेश श्रवण कर रहे हैं। महारानी मृगावती, पुत्र उदयन, अमात्य सुभद्र एवं सेनाध्यक्ष आर्य विजयसेन आकर भगवान को भूप्रणत हो नमस्कार कर निर्दिष्ट कक्षों में बैठ जाते हैं। चण्डप्रद्योत वहाँ पहले से ही बैठा है। दिव्यदेशना अनवरत चल रही है)
( भगवान महावीर स्वामी की ओंकारमयी दिव्यध्वनि खिर रही है)
( भव्यजनों ! भगवान की वाणी संसार के उस रहस्य को खोल रही है जिस पर संसारी मुग्ध हो आत्म वैभव लुटा रहे हैं)
इन्द्रभूति — राजन् ! चित्ताकर्षक ये कामभोग क्षण भर सुख का प्रतिभास देकर चिरकाल तक दुःख देते हैं एवं अनेक अनर्थों के जनक हैं। इनमें फँस कर प्राणी मुक्ति चाहकर भी मुक्त नहीं हो सकता। संसार सुख
राई — सा क्षुद्रतम व दुःख मेरू- सा महान है।
प्रद्योत — सत्य है, वासना की मृगमरीचिका ने मुझसे मेरी मानवता भी छीन ली। मैं अन्धा अविवेकी हो अनर्थ करने पर तुल गया था देव !
इन्द्रभूति — प्रद्योत ! भोगासक्ति और अनर्थ सिक्के के दो पक्ष हैं। मक्खी कफ में आसक्तिवश ही फँसती और
ज्यों — ज्यों कष्ट से छटपटाती है, त्यों-त्यों अधिक अधिक फँसती हुई प्राण तक गँवा बैठती है।
प्रद्योत — बस यही दशा मेरी हो रही है भंते ! अपने दुष्कृत्यों पर मुझे पश्चाताप हो रहा है।
इन्द्रभूति — भगवान का उपदेश है राजन् ! कि जैसे दुःख तुम्हें प्रिय नहीं, वैसे ही सब जीवों को दुख प्रिय नहीं हैं; अतः समस्त प्राणियों को आत्मसदृश समझकर सावधान हो, स्व पर दया करो।
(महिला कक्ष में एक श्रेष्ठी की विधवा पत्नी अंबिका ध्यान मग्न हो देशना सुन रही है। उसकी दासी कौशा घबराई हुई आती है। उन दोनों का वार्तालाप सबका मन आकर्षित कर लेता)
कौशा — (घबराए स्वर में) स्वामिनी !
(अंबिका कौशा की ओर बिना देखे हाथ से मौन रहने का संकेत करती है)
अनुवन्ध]
कौशा — (अधिक तीव्र स्वर में) प्रासाद में तस्करों ने प्रवेश कर लिया था स्वामिनी !
अंबिका — शांत बैठ जा कौशा ! सुन कैसी दुर्लभ देशना हो रही है।
कौशा — (अनसुनी कर कंधे झकझोरते हुए) आप मेरी बात सुन रही हैं या नहीं ? मैं कह रही हूँ महलों में चोर आ गये थे।
अंबिका — आ जाने दे कौशा ! उन्हें जिस वस्तु की आवश्यकता होगी ले जाएँगे पर तू जड़-संपत्ति के पीछे मेरे अमूल्य क्षण नष्ट क्यों कर रही है ?
कौशा — मेरी पूरी बात तो सुनें। मुझे हर्ष है कि चोर कुछ भी नहीं ले जा सके।
अंबिका — फिर इतनी व्यग्रता क्यों ? जा! आज से उस संपत्ति की स्वामिनी तू है।
कौशा — (विस्फारित नेत्रों से देखते हुए) क्या कह रही हैं आप ? स्वस्थ तो हैं न ?
अंबिका — (हँस पड़ती है) तुझे अस्वस्थ दीख रही हूँ क्या ?
(स्नेहासिक्त स्वर में) प्रभु अपनी नगरी में पधारे हैं कौशा! मैं उनसे मंगलमयी शिवकारिणी अत्यन्त दुर्लभ प्रवृज्या लूँगी।
मृगावती — धन्य हो अंबिका ! तुम्हारी निर्लिप्तता अनुकरणीय है।
तुमने वासना पर विजय प्राप्त कर ली है।
अंबिका — अभी कहाँ महारानी ! साधना के बिना वासना का उच्छेद सम्भव नहीं। अतएव अब प्रभु के मार्ग का अनुसरण करूँगी ताकि दुःख से मुक्ति मिल सके।
प्रद्योत — हे प्रभो ! जीवों को दुःख प्राप्ति क्यों होती है ?
इन्द्रभूति — समझे राजन् ! जन्म-मरण ही दुःख दाता है। इनका प्रमुख कारण एक मात्र मोहजन्य परिणाम है एवं मोह को उत्पन्न करने वाले बीज राग-द्वेषमय विकार हैं।
मृगावती — भंते ! जन्म-मरण को नष्ट कर दें तो दुःख नहीं होगा ?
इन्द्रभूति — नहीं, परन्तु सर्वप्रथम राग-द्वेष को नष्ट करना होगा।
जैसे बीज के अभाव से वृक्ष की उत्पत्ति नहीं होती,
वैसे ही राग — द्वेष के अभाव में जन्म-मरण की प्रक्रिया नहीं होती ।
मृगावती — तब वह युक्ति मुझे बतला दें प्रभु ! मैं उसी राह जाने को उत्सुक हूँ। मेरा मन अत्यधिक अशांत है।
इन्द्रभूति — हे मृगावती ! भगवान का कथन है कि जो भव सागर के पार जाने का इच्छुक हैं, वही शीघ्र ही तप संयमरूपी नाव में आरूढ़ हो किनारा पा जाता है।
मृगावती — तब मुझे आर्यिका दीक्षा दें प्रभु ! मैं भी अब आराधना की शरण ग्रहण करूँगी। (प्रद्योत की ओर भयभीत हो कातर दृष्टि से देखती है)
इन्द्रभूति — मृगावती ! वीतराग के समीप बैठकर भी भय क्यों ?
दीक्षित होने के पूर्व आत्मविश्वास अनिवार्य है।
प्रद्योत — मेरी ओर से निर्भय हों महारानी ! मैंने अपनी दुर्दमनीय वासना से स्वतः अपना पतन कर लिया था। मैं लज्जित हूँ, आपसे किस मुख से क्षमा याचना करूँ ।
मृगावती — (आश्चर्य तथा हर्ष मिश्रित स्वर में) तो मैं यह आशा करूँ कि आपने मुझसे शत्रुभाव त्याग दिया है ?
प्रद्योत — (दृढ़तापूर्वक) निस्संदेह महारानी ! मेरी ओर से आप पूर्णतः निश्चिन्त हों । साक्षात् वीतराग देव की वाणी सुनकर मूर्च्छा न टूटी तो मुझ-सा अभागा और कौन होगा ?
सुभद्र — वीतरागता के अप्रतिम प्रभाव की महिमा आज ज्ञात हुई। बालरवि के आगमन का संदेश पाकर प्राची के साथ प्रतीची में भी लालिमा छा जाती है तो फिर निरंजन निर्विकार परमात्मा के सानिध्य में क्यों न मन में पवित्रता आएगी ?
विजयसेन — मुझे तो घोर आश्चर्य हो रहा है।
मृगावती — परम प्रसन्नता हुई राजन् ! मुझे आपकी अनुमति की अपेक्षा थी, जो आपने सहर्ष प्रदान कर दी। अब मैं
प्रद्योत — शांति पूर्वक आत्म आराधना कर सकूँगी।
महारानी ! आप निर्द्वन्द्व हो प्रवृज्या स्वीकार करें, मुझसे महत् भूल हुई है। विश्वास है आप मुझे अवश्य क्षमादान करेंगी।
मृगावती — राजन् ! प्रवृज्या से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बैर का विसर्जन है। निश्चित ही हम एक-दूसरे को क्षमा कर चुके हैं। मेरा एक आग्रह है, क्या आप उसे स्वीकार करेंगे ?
प्रद्योत — एक नहीं सौ। आप निःसंकोच कहें।
मृगावती — पितृहीन बालक उदयन अभी अबोध है; अतएव आप से निवेदन है कि आप उसे राजोचित शिक्षा-दीक्षा से अलंकृत करें एवं उसके वयस्क होने तक राज्य संचालन का उत्तरदायित्व भी आप ही वहन करें।
प्रद्योत — तथास्तु, मैं वचन देता हूँ महारानी ! कि आज से बालक उदयन आपका नहीं मेरा पुत्र होगा। मैं प्राणपण से उसे सर्व प्रकार से योग्य बनाने का प्रयत्न करूँगा।
मृगावती — कृतज्ञ हूँ राजन् !
उदयन — माँ श्री ! यह निर्णय आपने कैसे ले लिया ? (उदास हो जाता है, कण्ठ अवरुद्ध हो जाता है)
मृगावती — वत्स ! (गंभीर स्वर में) इन मंगलमय क्षणों में उदास क्यों ? तुम भी ऐसी भावना करो कि ऐसा शुभ दिवस शीघ्र ही आए जब मैं आत्म पुरुषार्थी बन आत्मसिद्धि करूँ।
उदयन — आशीर्वाद दें माँ श्री ! कि ऐसा सप्रयत्न कर उपयुक्त
पात्र बन सकूँ।
मृगावती — मेरी शुभ कामनाएँ तुम्हारे साथ हैं।
काश ! मेरा हृदय भी ऐसा ही शांत समथर हो पाता।
प्रद्योत — महारानी ! आपकी समता से मैं पराजित हो गया।
धन्य है आपका जीवन ।
मृगावती — मानव जीवन की सार्थकता संयम में ही है राजन् !
करुणा कर मुझे प्रवृज्या देने की कृपा करें। जय श्री ॐ णमो अरहंताणं ।
अम्बिका — महारानी ! अकेले नहीं, मुझे भी साथ ले लें। देव !
मुझे भी आर्यिका पद प्रदान करें।
इन्द्रभूति — कल्याण हो आर्ये ! कल्याण हो ! प्रभु संघ में सबका निर्विरोध प्रवेश है।
खुला मुक्ति का द्वार
पात्रालुकामाणिकाः
उज्नायिनी नरेश नागधर्म की पत्नी (महारानी)
सामाधर्म का पुत्र नागधर्म की पुत्री राजकुमारी स्वर्ग निवासी देव दस्यु नात्यक दस्यु दल निर्विष कर देता था। राजा-रानी अपने इकलौते लाड़ले की इस ध्यकर रुचि से भयभीत रहते थे। नागकुमार को समझाया, प्रताड़ित किया किन्तु सब निरर्थक रहा। राजकुमार की रुचि उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई। वह सर्प क्रीड़ा में निरंतर मग्न रहने लगा। बचपन, किशोरावस्था पार कर यौवन काल भी आ गया परन्तु नागकुमार के व्यसन में कोई अंतर नहीं आया। मित्र देव ने अपने विशिष्ट ज्ञान से ज्ञात किया कि नागकुमार अपना जीवन अज्ञानता में खो रहा है, यह उचित नहीं। उसने अपने मित्र को शिक्षा देने की योजना बनाई)
दृश्य-प्रथम
समय — मध्याह्न
स्थान — राजप्रासाद प्रीगण
(नागकुमार नागों के साथ क्रीड़ा कर रहे हैं। उन्हें द्वार पर प्रहरी के साथ किसी का वार्तालाप सुनाई पड़ता है। वे दत्तचित हो सुनने लगते हैं)
प्रहरीसपेरा-
(दो देवकुमारों ने स्वर्ग में निर्णय लिया कि हम लोक में अवतरण ले अपने दुर्लभ मानव जीवन को विषय बसनाओं में व्यर्थ न खी, साधु होकर तपश्चरण पूर्वक आत्म साधना करेंगे। जो पहिले मनुष्यभव धारण कर ऐसा न करे तो स्वर्गस्थ देव उसे पूर्व जन्म में लिए इस निर्णय को स्मरण कराकर प्रतिज्ञा पालने के लिए बाध्य करेगा। ऐसा ही हुआ। एक देव आयु पूर्ण कर उन्नविनी नरेश नागाधर्म की रानी नागदत्त का पुत्र सपेरानागकुमार हुआ। अद्भुत था यह राजकुमार, विलक्षण थी इसकी साँच। नामों से क्रीड़ा करता और बाद में उनके विषदन्त उखाड़ उन्हें प्रहरीभला इसी में हैं कि आप चले जायें।
(दृढ़तापूर्वक) असभंव, मैं राजकुमार से मिलकर ही जाऊँगा।
यह तुम्हारी धृष्टता होगी। इसका फल तुम्हें अपने प्राणों से भी हाथ धोना पड़ेगा।
ऐसा क्यों ? मैं सुदूर नाग देश का वासी, नागों का अधिपति। उज्जयिनी नगरी के राजपुत्र नागकुमार को नागक्रीड़ा में सिद्धहस्त जानकर उनसे भेंट करने खुला मुक्ति का द्वार
पात्रानुक्रमणिकाः
नागधर्म — उज्जयिनी नरेश
नागदत्ता — नागधर्म की पत्नी (महारानी)
नागकुमार — नागधर्म का पुत्र
ज्योत्स्ना — नागधर्म की पुत्री राजकुमारी
सपेरा — स्वर्ग निवासी देव
सूरदत्त — दस्यु नायक मोहनसिंह ┐ लालसिंह ├ दस्यु दल हरिसिंह ┘
(दो देवकुमारों ने स्वर्ग में निर्णय लिया कि हम मर्त्यलोक में अवतरण ले अपने दुर्लभ मानव जीवन को विषय वासनाओं में व्यर्थ न खो, साधु होकर तपश्चरण पूर्वक आत्म साधना करेंगे। जो पहिले मनुष्यभव धारण कर ऐसा न करे तो स्वर्गस्थ देव उसे पूर्व जन्म में लिए इस निर्णय को स्मरण कराकर प्रतिज्ञा पालने के लिए बाध्य करेगा। ऐसा ही हुआ। एक देव आयु पूर्ण कर उज्जयिनी नरेश नागधर्म की रानी नागदत्त का पुत्र नागकुमार हुआ। अद्भुत था यह राजकुमार, विलक्षण थी इसकी रुचि। नागों से क्रीड़ा करता और बाद में उनके विषदन्त उखाड़ उन्हें निर्विष कर देता था। राजा-रानी अपने इकलौते लाड़ले की इस भंयकर रुचि से भयभीत रहते थे। नागकुमार को समझाया, प्रताड़ित किया किन्तु सब निरर्थक रहा। राजकुमार की रुचि उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई। वह सर्प क्रीड़ा में निरंतर मग्न रहने लगा। बचपन, किशोरावस्था पार कर यौवन काल भी आ गया परन्तु नागकुमार के व्यसन में कोई अंतर नहीं आया। मित्र देव ने अपने विशिष्ट ज्ञान से ज्ञात किया कि नागकुमार अपना जीवन अज्ञानता में खो रहा है, यह उचित नहीं। उसने अपने मित्र को शिक्षा देने की योजना बनाई)
दृश्य-प्रथम
समय — मध्याह्न
स्थान — राजप्रासाद प्रांगण
(नागकुमार नागों के साथ क्रीड़ा कर रहे हैं। उन्हें द्वार पर प्रहरी के साथ किसी का वार्तालाप सुनाई पड़ता है। वे दत्तचित्त हो सुनने लगते हैं)
प्रहरी — भला इसी में हैं कि आप चले जायें।
सपेरा — (दृढ़तापूर्वक) असभंव, मैं राजकुमार से मिलकर ही जाऊँगा।
प्रहरी — यह तुम्हारी धृष्टता होगी। इसका फल तुम्हें अपने प्राणों से भी हाथ धोना पड़ेगा।
सपेरा — ऐसा क्यों ? मैं सुदूर नाग देश का वासी, नागों का अधिपति। उज्जयिनी नगरी के राजपुत्र नागकुमार को नागक्रीड़ा में सिद्धहस्त जानकर उनसे भेंट करने आया है और तुम कहते हो लौट जाओ। प्यासा जलाशय के निकट आकर बिना जलपान किए लौट जाए ?
प्रहरी — (किंचित् नम्र हो समझाते हुए) अच्छा, ऐसा करो, तुम ये नागों का पिटारा यहीं बाहर छोड़ दो और कुमार से भेंट कर अपना पिटारा लेते हुए चले जाना।
सपेरा — (व्यंग्य से) अति सुन्दर ! सम्मति के लिए धन्यवाद।
क्यों बंधु ! कोई अपने प्राण छोड़कर भी कहीं गया है।
प्रहरी — (खिसियाकर) क्या पिटारा छोड़ने से तुम निष्प्राण हो जाओगे ? फिर एक ही पिटारा क्यों ? दस बीस पिटारे सिर पर रख लो।
सपेरा — (स्नेह पूर्वक) बंधु ! नाग मेरे प्राणों से कम नहीं हैं। ले ये पाँच रतन मुद्राएँ और मुझे राजकुमार से मिलवा दो।
प्रहरी — उत्कोच! न न न न मुझे नहीं चाहिए। मुझे अपने प्राण प्यारे हैं। कदाचित् तुम्हें ज्ञान नहीं हैं-राजाज्ञा है कि कोई भी सपेरा राजप्रासाद में प्रवेश नहीं पा सकता।
सपेरा — ओह! तो ये बात है। (प्रार्थना के स्वर में) बंधु ! दस मुद्रायें ले लो। बस एक बार भेंट करवा दो। अपने नागों का खेल दिखला कर मैं चुपचाप चला जाऊँगा। मैं वचन देता हूँ कि जो भी पुरस्कार स्वरूप मिलेगा, आधा तुम्हें भी दूँगा।
नागकुमार — (नागकुमार सब बातें सुनकर उच्च स्वर से सपेरे को बुलवाते हैं)
प्रहरी ! सपेरे को यहाँ आने दो।
प्रहरी — (प्रवेश कर) कुमार ! राजाज्ञा के उल्लंघन करने से मुझे अपराधी न बनायें।
नागकुमार — इसकी चिन्ता तुम मत करो । मैं क्षमादान दिला दूँगा।
प्रहरी — फिर भी यह कार्य उचित नहीं है। (सपेरा चुपचाप वहाँ आ जाता है)
नागकुमार — (सपेरे को देख) आओ, भय मत करो। दिखलाओ अपने नाग। प्रहरी ! तुम जा सकते हो ।
सपेरा — (बैठकर) आपसे भेंट करने की प्रबल उत्कंठा थी कुमार।
नागकुमार — मुझे नागों से क्रीड़ा करने में आनंद आता है सपेरे !
निकालो अपने नाग, मैं उनसे क्रीड़ा करूँगा।
सपेरा — कुमार! मेरे नाग महा विषैले साक्षात् काल सदृश असाधारण हैं। मैं ही उनका खेल दिखलाकर आपका मनोरंजन कर दूँगा।
नागकुमार — इससे मुझे संतुष्टि नहीं होगी। मैं स्वयं खेलूँगा, मैं भी तो देखूँ वे कैसे विषैले हैं।
सपेरा — आप इतने हठी हैं। मुझे ज्ञान न था वरन् मैं यहाँ आता ही नहीं ।
नागकुमार — मेरी दक्षता से तुम परिचित नहीं हो, इसीलिए ऐसा कह रहे हो। (पिटारे से नाग निकालने का उपक्रम
सपेरा — (घबराकर) अरे! अरे! कृपया रुको कुमार ! मैं स्वयं निकाल देता हूँ। (एक नाग निकालकर बाहर छोड़ देता है) सावधान रहें कुमार !
नागकुमार — (नाग को पकड़कर) ओह! इस साधारण से कीड़े का तुम्हें इतना अभिमान ? ये तो स्वयं भयभीत है।
कोई विषैला भयंकर नाग दिखाओ तो मेरी दक्षता का परीक्षण हो। सिंह के बल का अनुमान गीदड़ को भगाने से नहीं किया जा सकता।
सपेरा — क्षमा करें कुमार ! आपकी चुनौती मुझे स्वीकार नहीं। विषैले नाग को मैं कदापि नहीं निकालूंगा।
उसकी फुंकार से ही मूर्छा आने लगती है। दंशन के पश्चात् तो कोई उपचार भी नहीं है।
(महाराज नागधर्म का प्रवेश)
नागधर्म — आयुष्मान् ! तुम्हें कितना समझाया कि नागों से खेलना कोई बुद्धिमानी नहीं है पर तुम मानते ही नहीं हो। इन क्रूर जीवों का क्या विश्वास ?
नागकुमार — पिताश्री ! मैं नाग क्रीड़ा में दक्ष हो गया हूँ फिर किस बात का भय ? नाग तो मुझे साधारण कीड़ो से अधिक प्रतीत नहीं होते ।
नागधर्म — फिर भी जो स्वभावतः दुष्ट हैं, उनसे दूर रहना ही श्रेष्ठ है।
नागकुमार — ममता के धुंधले दर्पण में यथार्थ के दर्शन नहीं हो पाते तात् !
सपेरा — यह उक्ति तो आप पर भी घटित होती है कुमार !
उपदेश देना जितना सरल है, आचरण उतना ही कठिन है।
नागकुमार — तुम्हारे कथन का क्या अभिप्राय है सपेरे ?
सपेरा — बुद्धिमान को संकेत ही पर्याप्त होते हैं कुमार !
नागकुमार — तुम व्यर्थ ही समय नष्ट कर रहे हो। पिताश्री आप से एक तुच्छ निवेदन है, पूर्ण करने हेतु वचन दें तो कहूँ।
नागधर्म — तुम्हारी बात कभी टाली है ?
नागकुमार — (आग्रह भरे स्वर में) इस सपेरे को समझायें न आप कि यह अपना दूसरा नाग भी दिखाए।
सपेरा — राजन् ! वह नाग अत्यन्त विषैला है। तनिक-सी चूक प्राण घातक हो सकती है।
नागकुमार — तुम मेरी अद्भुत शक्ति से अपरिचित हो सपेरे !
(आदेश देने के स्वर में) निकालो नाग।
सपेरा — (विवश हो) राजन् !
नागधर्म — तुम बहुत हठी हो नागकुमार ! नए नागों से तुम प्रतिदिन ही क्रीड़ा करते हो. एक नाग न सही।
नागकुमार — (अनुनय-विनय करते हुए) नहीं पिताश्री। सपेरा उनकी भयंकरता को बार-बार घोषणा कर रहा है।
मैं भी तो देखें वह कितना भयंकर है।
सपेरा — मैं भी तो देखें वह कितना भयंकर है।
आप साक्षी हैं महाभाग ! दैववश कुछ हो गया तो उपचार न हो सकेगा। मैं सर्वथा असमर्थ हूँ। बिना आपकी आज्ञा के नाग बाहर नहीं निकालूंगा।
नागकुमार — पर मैं समर्थ हूँ। तुम चिन्ता न करो।
नागधर्म — निकाल दो नाग। राजकुमार अपनी निर्भयता के लिए प्रसिद्ध है।
नागकुमार — आप कितने अच्छे हैं पिताश्री !
(सपेरा पिटारे से नाग निकालता है। नाग आग्नेय नेत्रों से अपने प्रतिद्वन्द्वी को देखता है)
नागकुमार — (नाग को पकड़ते हुए) ओह! तुम्हारा यह रौद्र रूप ?
देखो अभी तुम्हें।
(नागकुमार अभिमान से बढ़कर उसे पकड़ लेते हैं। नाग रुष्ट हो हाथ में दंशन देता है। तत्काल नागकुमार मूर्छित हो जाता है। महाराज नागधर्म चीख उठते हैं। सपेरा नाग को शीघ्रता से पिटारे में रख लेता है)
सपेरा — (सहमे हुए) राजन् ! मैंने तो पहिले ही कहा था।
अब मैं क्या करूँ ?
(नागकुमार के मूर्छित होने का समाचार विद्युत गति से महल में फैल जाता है। सेवकों के साथ महारानी नागदत्ता, ज्योत्स्ना आ जाती हैं)
नागदत्ता — आह! क्या हो गया मेरे लाल को ? कितनी बार मना किया कि नागों से मत खेलाकर। नाग भी कोई खेलने की वस्तु है? परन्तु उसे तो जैसे व्यसन पड़ गया है।
शीघ्र उपचार करें आर्य ! (रुआंसी हो जाती है)
नागधर्म — (दीर्घ उच्छवास लेते हुए) अब क्या उपचार सम्भव है महिषी ! सपेरे ने पहले ही आगाह कर दिया था।
(सपेरे से) तुम हमारे प्रतिबन्धित क्षेत्र में आये ही क्यों ? किसने निमंत्रित किया था।
सपेरा — क्षमा करें राजमाता ! मुझे ज्ञात नही था। मैं राजकुमार के विशेष आग्रह पर ही यहाँ आया था।
नागदत्ता — तो फिर इसका विष उतारो ।
सपेरा — मैं मन्त्रों से अनभिज्ञ हूँ। मैंने आते ही राजकुमार से प्रार्थना की थी कि इस विषधर से क्रीड़ा की आकाँक्षा न करें। महाराज साक्षी हैं।
नागदत्ता — तुम्हारा ही नाग और तुम्हीं अनभिज्ञ। क्या सबके प्राण लेने को उसे लिए-लिए फिरते हो ?
नागधर्म — सपेरे ने तो मना किया था देवी ! वह निर्दोष है।
नागदत्ता — (क्रुद्ध हो) निर्दोष ? नहीं, महान् अपराधी है। क्या यह अपराध नहीं कि जिसका विषहरण करने में असमर्थ है, उस विषधर को सार्वजनिक स्थानों में प्रतिदिन ही कीड़ा करते हो, एक नाग न सही।
नागकुमार — (अनुनय-विनय करते हुए) नहीं पिताश्री ! सपेरा उनकी भयंकरता की बार-बार घोषणा कर रहा है।
मैं भी तो देखें वह कितना भयंकर है।
सपेरा — आप साक्षी हैं महाभाग ! दैववश कुछ हो गया तो उपचार न हो सकेगा। मैं सर्वथा असमर्थ हूँ। बिना आपकी आज्ञा के नाग बाहर नहीं निकालूंगा।
नागकुमार — पर मैं समर्थ हूँ। तुम चिन्ता न करो।
नागधर्म — निकाल दो नाग। राजकुमार अपनी निर्भयता के लिए प्रसिद्ध है।
नागकुमार — आप कितने अच्छे हैं पिताश्री !
(सपेरा पिटारे से नाग निकालता है। नाग आग्नेय नेत्रों से अपने प्रतिद्वन्द्वी को देखता है)
नागकुमार — (नाग को पकड़ते हुए) ओह! तुम्हारा यह रौद्र रूप ?
सपेरा — देखो अभी तुम्हें।
(नागकुमार अभिमान से बढ़कर उसे पकड़ लेते हैं। नाग तुरन्त ही हाथ में दंशन देता है। तत्काल नागकुमार मूर्छित हो जाता है। महाराज नागधर्म चीख उठते हैं। सपेरा नाग को शीघ्रता से पिटारे में रख लेता है)
नागधर्म — (सहमे हुए) राजन् ! मैंने तो पहिले ही कहा था।
अब मैं क्या करूँ ?
(नागकुमार के मूर्छित होने का समाचार विद्युत गति से महल में फैल जाता है। सेवकों के साथ महारानी नागदत्ता, ज्योत्स्ना आ जाती हैं)
नागदत्ता — आह ! क्या हो गया मेरे लाल को ? कितनी बार मना किया कि नागों से मत खेलाकर। नाग भी कोई खेलने की वस्तु है ? परन्तु उसे तो जैसे व्यसन पड़ गया है।
शीघ्र उपचार करें आर्य ! (रुआंसी हो जाती है)
नागधर्म — (दीर्घ उच्छवास लेते हुए) अब क्या उपचार सम्भव है महिषी ! सपेरे ने पहले ही आगाह कर दिया था।
(सपेरे से) तुम हमारे प्रतिबन्धित क्षेत्र में आये ही क्यों ? किसने निमंत्रित किया था।
सपेरा — क्षमा करें राजमाता ! मुझे ज्ञात नही था। मैं राजकुमार के विशेष आग्रह पर ही यहाँ आया था।
नागदत्ता — तो फिर इसका विष उतारो।
सपेरा — मैं मन्त्रों से अनभिज्ञ हूँ। मैंने आते ही राजकुमार से प्रार्थना की थी कि इस विषधर से क्रीड़ा की आकाँक्षा न करें। महाराज साक्षी हैं।
नागदत्ता — तुम्हारा ही नाग और तुम्हीं अनभिज्ञ। क्या सबके प्राण लेने को उसे लिए-लिए फिरते हो ?
नागधर्म — सपेरे ने तो मना किया था देवी! वह निर्दोष है।
नागदत्ता — (क्रुद्ध हो) निर्दोष? नहीं, महान् अपराधी है। क्या यह अपराध नहीं कि जिसका विषहरण करने में असमर्थ है, उस विषधर को सार्वजनिक स्थानों में
नागधर्म — ले जाना क्या उपयुक्त है ?
सपेरा — तुम्हारी भी बात सत्य है देवी ! सपेरे ! दण्ड स्वरूप क्यों न तुम्हारे प्राण हर लिए जाएँ।
नागधर्म — (भयभीत होने का अभिनय करते हुए) महाराज !
नाग को निकालने के पूर्व ही मैंने अपनी स्थिति स्पष्ट निवेदन कर दी थी। क्या यह न्याय है ? कि आप अपने पुत्र की हठ का प्रतिशोध मुझसे लें ? आपके आदेश पर ही मैंने नाग को बाहर निकाला था।
नागदत्ता — तुम धृष्ट हो सपेरे ! एक मात्र पुत्र के प्राण हरण करके भी तुम्हें पश्चात्ताप नहीं होता ! निर्लज्ज हो विवाद कर रहे हो ?
सपेरा — विवाद नहीं महारानी ! इस नाग का मैंने कभी-भी प्रदर्शन नहीं किया। कुमार के मूर्छित होने का मुझे भी संताप है फिर भी आप जो दण्ड देंगी मुझे स्वीकार है।
ज्योत्स्ना — माँ श्री ! स्थिति गम्भीर है। सपेरे को दण्ड देने से ज्येष्ठ भ्रात निर्विष तो होंगे नहीं; अतः क्रोध करना व्यर्थ है। यदि ये यत्न करें और सफल हो जाए तो मेरे भ्रात मुझे मिल जायेंगे।
नागधर्म — ज्योत्स्ना की सम्मति आदरणीय है। सपेरे ! प्रयत्न कर देखो। नागकुमार के सचेत होने पर तुम्हें मन
सपेरा — चाहा पुरस्कार देकर हम तुम्हें सन्तुष्ट कर देंगे।
यद्यपि मुझे विश्वास नहीं है तथापि प्रयास अवश्य करूँगा परन्तु आप अपने वचनों पर दृढ़ रहेंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।
नागधर्म — जीवन से अधिक बहुमूल्य और क्या है ? हमें तो अपने प्रिय पुत्र की सुरक्षा, उसका जीवन ही इष्ट है।
सपेरा — (सपेरा मन ही मन मन्त्र वचन कहता है। उसके केवल
अंग — प्रत्यंगों का संचालन हो रहा है। तत्पश्चात दंशन के स्थान पर चुटकी भर भस्म मलता है)
राजकुमार ! उठें ! आप स्वस्थ हो चुके हैं। मातापिता के प्राणाधार ! भगिनी के प्यारे भ्रात ! आँखें खोलो। (किंचित् उच्च स्वर से) नागकुमार !
(नागकुमार भूमि पर लेटे ही आँखें खोलकर चारों ओर देखते हैं। सबमें हर्ष की लहर फैल जाती है)
नागदत्ता — (वक्ष से लगाते हुए) आयुष्मान ! कुशल तो हैं ?
नागकुमार — (उठकर बैठते हुए) माँ श्री ! क्या मुझे नाग ने डस लिया था ?
नागदत्ता — हाँ वत्स ! सपेरे ने तुम्हें नव-जीवन प्रदान किया है।
नागकुमार- लाख — लाख बार धन्यवाद महोदय !
सपेरा — केवल धन्यवाद पर्याप्त नहीं है।
नागधर्म — हम वचनानुसार पुरस्कार भी देंगे। बोलो क्या चाहते हो ?
सपेरा — (हँसकर) आपसे नहीं प्रजापालक ! पुरस्कार
नागकुमार — राजकुमार से ही लेंगे।
नागकुमार- कौन — सी बड़ी बात है। तुमने नव जीवन ही नहीं दिया वरन् चुनौती दे दंभ को गलित किया है। तुम मेरे परम उपकारी हो।
सपेरा — तुमने अपनी प्रतिज्ञा विस्मृत कर दी प्रियमित्र !
नागक्रीड़ा में व्यस्त हो स्वर्णिम जीवन के अमूल्य क्षण खो रहे हो।
नागकुमार — (प्रिय मित्र सम्बोधन सुनकर पूर्व स्मरण करने की चेष्टा करते हुए) आह! तुम मित्र प्रियदत्त ! सचमुच ही मैं भूल गया था। मैं उपकृत हुआ मित्र ! इसका प्रतिदान किसी भी रूप में देना सर्वथा असम्भव है।
नागधर्म — निश्चित ही तुम सपेरे नहीं हो तो फिर कौन हो ? तुम दोनों का वार्तालाप विचित्र-सा प्रतीत हो रहा है।
कहीं तुम नागकुमार को भ्रमित तो नहीं कर रहे ?
नागकुमार — नहीं पिताश्री ! हम दोनों पूर्व जन्म के युगल भ्रात स्वर्ग में परम मित्र थे। पूर्व प्रतिज्ञानुसार मुझे अपने कर्त्तव्य का स्मरण कराने आये हैं स्वर्ग से ।
नागदत्ता — (आश्चर्य युक्त हो) स्वर्ग के देव हैं !
नागकुमार — मित्र प्रियदत्त ! दिखा दो न वह अपना प्रियदर्शी रूप।
सपेरा — (सपेरे का परिधान त्याग कर सुन्दर सलोना रूप प्रकट करते हुए) माँ श्री! यह प्राणी जन्म-
नागधर्म — जन्मान्तरों से विविध वेशों को धारण करता हुआ कृत्रिम सौन्दर्य में मुग्ध हो आत्म सौन्दर्य को परखने की शक्ति भी खो बैठा है।
नागधर्म — सत्य कह रहे हो पर यह तो बताओ कि वह कौनसी प्रतिज्ञा थी, जिसको स्मरण कराने के लिए आपको स्वर्ग से आने का कष्ट करना पड़ा ?
नागकुमार — पिताश्री ! हम दोनों ने प्रतिज्ञा की थी कि मानव जीवन धारणकर आत्म साधना करेंगे।
सपेरा — नागकुमार ! अब मैं जाऊँगा। विश्वास है कि तुम प्रतिज्ञा को अविलम्ब मूर्त रूप दे अपने कार्य में संलग्न हो जाओगे ।
नागकुमार — निस्संदेह ऐसा ही करूँगा। मुझे अपने कर्त्तव्य का बोध हो गया है। मैं तुम्हारा कृतज्ञ हूँ कि तुम भी शीघ्र मत्युलोक में मानव बनकर अवतरण करो ताकि संसार दुःखों की परिसमाप्ति हो सके। तुम निश्चित हो अमरपुरी को लौटो ।
सपेरा — शुभस्य शीघ्रं नागकुमार ! तुम्हारी साधना निरन्तर प्रगति पथ पर अग्रसर हो। (प्रस्थान)
नागकुमार- माँ — पिताश्री ! मुझे घर-त्याग की अनुमति दें।
नागदत्ता — (चौधार आँसू बरसाती हुई) नहीं-नहीं प्रिय पुत्र !
तुम अभी नहीं जा सकते। तुम्हारे विवाह के सुखद स्वप्न हमें साकार करना है।
ज्योत्स्ना — बंधू ! माँ श्री की आशाओं पर तुषारापात मत करो ।
नागकुमार — ज्योत्स्ना ! इस मिथ्या ममता का फल अनंत दुःख है। यथार्थ को पहिचानो। आत्म सिद्धि हो चरम लक्ष्य है। मुझे अपना कार्य करने दो।
नागदत्ता — यौवनकाल की समाप्ति के पश्चात् वनवास शोभा देता है।
नागकुमार — नहीं, अनुकूलता तो अभी है। मंगल कार्य में व्यवधान उचित नहीं है। यौवन व ज्ञान का अभी तक भयंकर अपव्यय हुआ है। समय रहते सतर्क हो जाना श्रेष्ठ है।
सबसे अपने कृत्यों की क्षमा चाहता हूँ। (नागकुमार
गृह — त्याग देते हैं। सब व्यथित हैं)
(पटाक्षेप)
दृश्य-द्वितीय
स्थान — सघन वृक्षों से घिरा वन का एक भाग।
(वन प्रान्त में दस्युदल लूटी हुई पूँजी का बँटवारा कर रहा है। दल का प्रमुख सूरदत्त है। शेष सहयोगी हैं-मोहनसिंह, हरीसिंह, लालसिंह, सुन्दरसिंह। सब शस्त्रों से सुसज्जित हैं)
सूरदत्त — लालसिंह ! लूट में मिली स्वर्ण मुद्राओं की गणना हो गई?
लालसिंह — हो गई प्रधान जी ! पाँच सौ हैं। लम्बी रकम हाथ लगी है।
सूरदत्त — हम पाँच व्यक्ति हैं। सौ-सौ हिस्से में आयेगी।
आभूषण भी तो हैं सोने चाँदी के।
सुन्दरसिंह — स्वर्णाभूषण डेढसौ तोले के हैं। चाँदी अवश्य मन भर होगी।
सूरदत्त — इनके भी बराबर हिस्से बना लो। अरे ! मोहनसिंह कहाँ है ?
हरीसिंह — लघुशका के लिए गया था, न जाने अभी तक क्यों नहीं लौटा !
सूरदत्त — (इसी समय मोहनसिंह नागकुमार मुनि को पकड़ कर लाता है। उनकी आँख पर पट्टी बंधी है। सूरदत्त उन्हें देखते ही नमस्कार करता है)
मोहनसिंह — ये क्या किया मोहन ? इनको क्यों पकड़ लाया ?
सूरदत्त — (क्रुद्ध हो) खोल पट्टी।
मोहनसिंह — हमारी कुशल नहीं है और आप इसे नमस्कार कर रहे हैं?
सूरदत्त — तू पहिले पट्टी खोल फिर बात कर।
मोहनसिंह — (पट्टी खोलते हुए) मुझे क्या ? मैं खोल देता हूँ पर कान खोलकर सुन लो जी ! ये इसी मार्ग से जा रहा था। इसने हमारी सारी बातें सुन ली हैं।
सूरदत्त — सुनने से क्या होता है पगले ! ये भला अपनी क्या हानि करेंगे ?
मोहनसिंह — नगर में हमारा गुप्त स्थान प्रगट हो गया तो क्या हम सुरक्षित रह पायेंगे ?
सूरदत्त — इन्हें तुम्हारी बातों से कोई प्रयोजन नहीं। इन्हें इनके गंतव्य मार्ग पर छोड़ दो।
मोहनसिंह — छोड़ना मँहगा पड़ेगा प्रधान ! इनको जीवन दान देना अपने समस्त सदस्यों के जीवन से खिलवाड़ करना है।
सूरदत्त — तुम भ्रम में हो मोहनसिंह !
हरिसिंह — मोहन का कथन सत्य है। आपकी यह सद्भावना
लालसिंह — मैं भी मोहनसिंह से सहमत हूँ।
सूरदत्त — (आवेश में) क्या तुम सब यह चाहते हो कि इनकी हत्या कर दूँ ? स्मरण रखो साधु की हत्या घोर पाप
सुन्दरसिंह — हत्या करना तो हमारा व्यवसाय है।
सूरदत्त — अरे मूर्खो! ये साधु हैं। इन्हें अपने तन से भी ममत्व नहीं तो अन्य से क्या प्रयोजन रखेंगे ? इनकी ओर से आपत्ति की संभावना नहीं है। हत्या करने से केवल
लालसिंह — तो आज आप पाप की परिभाषा बता रहे हैं। जैसे अभी तक हम पुण्य ही करते आ रहे हैं। सरदार जी !
केवल आपके वचनों की श्रद्धा पर हम सब अपने
सूरदत्त — तब तुम मेरी बलि चढ़ाओ। यह स्मरण रखो कि मेरे निर्जीव होने के पश्चात् ही तुम इन पर हाथ उठा सकोगे।
लालसिंह — सरदार हठ बुरी होती है।
सूरदत्त — हठ नहीं, अनुचित हठ बुरी होती है। इनके द्वारा यदि तनिक भी क्षति हुई तो उसका अपराधी मैं होऊँगा और उसका प्रतिकार भी मैं ही करूँगा। क्या तुम्हें
मोहनसिंह — हमें पूर्ण आस्था है तब तो आपको प्रमुख मानते हैं।
सूरदत्त — तो फिर जाओ, इन्हें नगर-पथ पर सादर पहुँचा दो।
(साधुराज से हाथ जोड़कर) साधु महाराज ! हम अज्ञानियों से जो आपकी अवहेलना हो गई है, उसे
(मोहनसिंह आँख में पट्टी बाँधने लगता है।)
सूरदत्त — इसकी कोई आवश्यकता नहीं।
(मोहनसिंह साधु को लेकर चला जाता है। बँटवारे का कार्य पुनः प्रारम्भ हो जाता है। चंद समय पश्चात् अश्वों के चलने की आवाज आती है। सब चौकन्ने
हरिसिंह — हो शीघ्रता से सामग्री छुपाने का प्रयास करते हैं)
नायक! साधु पर दया दिखलाने का तत्काल फल मिल गया। अवश्य कोई गुप्तचर विभाग का कर्मचारी होगा। उसके जाते ही कार्यवाही प्रारम्भ हो गई।
लालसिंह — यहाँ तो वह एक दम मौन रहा।
सुन्दरसिंह — भावुकता में किया गया कार्य कभी भी आपत्ति को
लालसिंह — सरदार हठ बुरी होती है।
सूरदत्त — हठ नहीं, अनुचित हठ बुरी होती है। इनके द्वारा यदि तनिक भी क्षति हुई तो उसका अपराधी में होऊँगा और उसका प्रतिकार भी मैं ही करूँगा। क्या तुम्हें
मोहनसिंह — हमें पूर्ण आस्था है तब तो आपको प्रमुख मानते हैं।
सूरदत्त — तो फिर जाओ, इन्हें नगर-पथ पर सादर पहुँचा दो।
अज्ञानियों से जो आपकी अवहेलना हो गई है, उसे
मोहनसिंह — छोड़ना मँहगा पड़ेगा प्रधान! इनको जीवन दान देन अपने समस्त सदस्यों के जीवन से खिलवाड़ करना है।
सूरदत्त — तुम भ्रम में ही मोहनसिंह!
हरिसिंह — मोहन का कथन सत्य है। आपकी यह सद्भावना
लालसिंह — मैं भी मोहनसिंह से सहमत हूँ।
सूरदत्त — (आवेश में) क्या तुम सब यह चाहते हो कि इनकी हत्या कर दूँ? स्मरण रखो साधु की हत्या घोर पाप
सुन्दरसिंह — हत्या करना तो हमारा व्यवसाय है।
सूरदत्त — अरे मूखौँ! ये साधु हैं। इन्हें अपने तन से भी ममत्व नहीं तो अन्य से क्या प्रयोजन रखेंगे ? इनकी ओर से आपत्ति की संभावना नहीं है। हत्या करने से केवल
लालसिंह — तो आज आप पाप की परिभाषा बता रहे हैं। जैसे अभी तक हम पुण्य ही करते आ रहे हैं। सरदार जी !
केवल आपके वचनों की श्रद्धा पर हम सब अपने
सूरदत्त — तब तुम मेरी बलि चढ़ाओ। यह स्मरण रखो कि मेरे निर्जीव होने के पश्चात् ही तुम इन पर हाथ उठा सकोगे।
हरिसिंह — (मोहनसिंह आँख में पट्टी बाँधने लगता है।)
इसकी कोई आवश्यकता नहीं।
(मोहनसिंह साधु को लेकर चला जाता है। बँटवारे का कार्य पुनः प्रारम्भ हो जाता है। चंद समय पश्चात् अश्वों के चलने की आवाज आती है। सब चौकन्ने हो शीघ्रता से सामग्री छुपाने का प्रयास करते हैं)
नायक! साधु पर दया दिखलाने का तत्काल फल मिल गया। अवश्य कोई गुप्तचर विभाग का कर्मचारी होगा। उसके जाते ही कार्यवाही प्रारम्भ हो गई।
लालसिंह — यहाँ तो वह एक दम मौन रहा।
सुन्दरसिंह — भावुकता में किया गया कार्य कभी भी आपत्ति को
मोहनसिंह — छोड़ना मँहगा पड़ेगा प्रधान ! इनको जीवन दान देना अपने समस्त सदस्यों के जीवन से खिलवाड़ करना है।
सूरदत्त — तुम भ्रम में हो मोहनसिंह !
हरिसिंह — मोहन का कथन सत्य है। आपकी यह सद्भावना
लालसिंह — मैं भी मोहनसिंह से सहमत हूँ।
सूरदत्त — (आवेश में) क्या तुम सब यह चाहते हो कि इनकी हत्या कर दूँ ? स्मरण रखो साधु की हत्या घोर पाप
सुन्दरसिंह — हत्या करना तो हमारा व्यवसाय है।
सूरदत्त — अरे मूर्खो ! ये साधु हैं। इन्हें अपने तन से भी ममत्व नहीं तो अन्य से क्या प्रयोजन रखेंगे ? इनकी ओर से आपत्ति की संभावना नहीं है। हत्या करने से केवल
लालसिंह — तो आज आप पाप की परिभाषा बता रहे हैं। जैसे अभी तक हम पुण्य ही करते आ रहे हैं। सरदार जी !
केवल आपके वचनों की श्रद्धा पर हम सब अपने
सूरदत्त — तब तुम मेरी बलि चढ़ाओ। यह स्मरण रखो कि मेरे निर्जीव होने के पश्चात् ही तुम इन पर हाथ उठा सकोगे।
लालसिंह — सरदार हठ बुरी होती है।
सूरदत्त — हठ नहीं, अनुचित हठ बुरी होती है। इनके द्वारा यदि तनिक भी क्षति हुई तो उसका अपराधी मैं होऊँगा और उसका प्रतिकार भी मैं ही करूँगा। क्या तुम्हें
मोहनसिंह — हमें पूर्ण आस्था है तब तो आपको प्रमुख मानते हैं।
तो फिर जाओ, इन्हें नगर-पथ पर सादर पहुँचा दो।
(साधुराज से हाथ जोड़कर) साधु महाराज ! हम अज्ञानियों से जो आपकी अवहेलना हो गई है, उसे
सूरदत्त — (मोहनसिंह आँख में पट्टी बाँधने लगता है।)
इसकी कोई आवश्यकता नहीं।
(मोहनसिंह साधु को लेकर चला जाता है। बँटवारे का कार्य पुनः प्रारम्भ हो जाता है। चंद समय पश्चात् अश्वों के चलने की आवाज आती है। सब चौकन्ने हो शीघ्रता से सामग्री छुपाने का प्रयास करते हैं)
हरिसिंह — नायक! साधु पर दया दिखलाने का तत्काल फल मिल गया। अवश्य कोई गुप्तचर विभाग का कर्मचारी होगा। उसके जाते ही कार्यवाही प्रारम्भ हो गई।
लालसिंह — यहाँ तो वह एक दम मौन रहा।
सुन्दरसिंह — भावुकता में किया गया कार्य कभी भी आपत्ति को
सूरदत्त — आमंत्रण दे देता है।
साधु महाराज के प्रति आशंका निर्मूल है। विविध वेशों को धारण करना सरल है पर साधू वेश धारण नहीं किया जाता, हो जाता है। अंतरंग की निर्मल ज्योति का प्रकाश है वह । साधु की अपनी गरिमा,
सुन्दरसिंह — नग्न ही तो होना है। बालक तो यूँ ही नग्न फिरा करते हैं।
सूरदत्त — साधु तो अंतर से भी नग्न होते हैं, इसीलिए तो बाहर भी उन्हें परिधान की आवश्यकता नहीं रह जाती।
बालक नग्न रहते हैं किन्तु बालकवत् बड़े नग्न नहीं
हरिसिंह — विवाद समाप्त कर शत्रु का सामना करने के लिए
सूरदत्त — आप लोग शांत हो बैठें। आगंतुकों से मैं अकेला ही निपटूंगा। सौगन्ध है मुझे अपने बाहुबल की। जब तक तन में प्राण रहेंगे तब तक आप सबका बाल भी
लालसिंह — प्रधान जी ! आप हमें अन्यथा न समझें। हम सब
परस्पर सुख — दुःख के साथी हैं। साथ जियेंगे, साथ मरेंगे।
सूरदत्त — (जाते हुए संयत व आदेशात्मक स्वर में) नहीं, तुम
हरिसिंह — सब प्रतीक्षा करो।
प्रधान जी अपने प्राणों से खेल गए।
लालसिंह — वे किसी को साथ नहीं ले जाना चाहते। उन्होंने न
सुन्दरसिंह — आदेश का उल्लंघन भी भीषण अपराध है। एक बार उन्हीं की रक्षा के अर्थ उनके मना करने पर मैं साथ चला गया; अतः हमारा सम्पूर्ण दस्युदल विपत्ति में
हरिसिंह — तभी उनकी आज्ञा टालने का साहस नहीं होता, उस
लालसिंह — नहीं तो उसी दिन ‘राम नाम सत्य’ हो जाता।
सूरदत्त — (सूरदत्त राजमाता नागदत्ता एवं राजपुत्री को साथ लेकर आता है। उनके दो अंगरक्षक भी साथ में है।
हरिसिंह — हरिसिंह ! शीघ्रता करो। रथ पर रखी सामग्री ले आओ।
(हरिसिंह, लालसिंह तत्काल कार्य में व्यस्त हो
सुन्दरसिंह — (ज्योत्स्ना की ओर वासना युक्त दृष्टि से देखते हुए)
नायक ! (ऐसे वचन सुनते ही महारानी नागदत्ता व आमंत्रणा दे देता है। साधु महाराज के प्रति आशांका निर्मूल है। विविध उष्ण को धारणा करना सरल है पर साधु वेश धारण नहीं किया जाता, हो जाता है। अंतरंग की निर्मल ज्योति का प्रकाश है वाह । साधु की अपनी गरिमा,
सुन्दरसिंह — नम्नही तो होना है। बालक तो यूँही नग्न फिरा करते हैं।
साधु तो अंतर से भी नग्न होते हैं, इसीलिए तो बाहर भी उन्हें परिधान की आवश्यकता नहीं रह जाती।
बालक नग्न रहते हैं किन्तु बालकवत् बड़े नग्न नहीं
हरिसिंह — विवाद समाप्त कर शत्रु का सामना करने के लिए
सूरदत्त — आप लोग शांत हो बैठें। आगंतुकों से मैं अकेला ही निषदूँगा। सौगन्ध है मुझे अपने बाहुबल की। जब तक तन में प्राण रहेंगे तब तक आप सबका बाल भी
लालसिंह — प्रधान जी ! आप हमें अन्यथा न समझें। हम सब
परस्पर सुख — दुःख के साथी हैं। साथ जियेंगे, साथ मरेंगे।
सूरदत्त — (जाते हुए संयत व आदेशात्मक स्वर में) नहीं, तुम
हरिसिंह — सब प्रतीक्षा करो।
लालसिंह — प्रधान जी अपने प्राणों से खेल गए।
सुन्दरसिंह — वे किसी को साथ नहीं ले जाना चाहते। उन्होंने न
हरिसिंह — आदेश का उल्लंघन भी भीषण अपराध है। एक बार उन्हीं की रक्षा के अर्थ उनके मना करने पर मैं साथ चला गया; अतः हमारा सम्पूर्ण दस्युदल विपत्ति में तभी उनकी आज्ञा टालने का साहस नहीं होता, उस
लालसिंह — नहीं तो उसी दिन ‘राम नाम सत्य’ हो जाता।
सूरदत्त — (सूरदत्त राजमाता नागदत्ता एवं राजपुत्री को साथ लेकर आता है। उनके दो अंगरक्षक भी साथ में है। हरिसिंह ! शीघ्रता करो। रथ पर रखी सामग्री ले
(हरिसिंह, लालसिंह तत्काल कार्य में व्यस्त हो
सुन्दरसिंह — (ज्योत्स्ना की ओर वासना युक्त दृष्टि से देखते हुए)
अहा ! कितनी सुन्दर सलोनी चिड़िया फंसी है नायक ! (ऐसे वचन सुनते ही महारानी नागदत्ता व आमंत्रण दे देता है।
सूरदत्त — साधु महाराज के प्रति आशंका निर्मूल है। विविध वेशों को धारण करना सरल है पर साधु वेश धारण नहीं किया जाता, हो जाता है। अंतरंग की निर्मल ज्योति का प्रकाश है वह । साधू की अपनी गरिमा,
सुन्दरसिंह — नग्न ही तो होना है। बालक तो यूँ ही नग्न फिरा करते हैं।
साधु तो अंतर से भी नग्न होते हैं, इसीलिए तो बाहर भी उन्हें परिधान की आवश्यकता नहीं रह जाती।
बालक नग्न रहते हैं किन्तु बालकवत् बड़े नग्न नहीं
हरिसिंह — विवाद समाप्त कर शत्रु का सामना करने के लिए प्रस्तुत हो जाओ । पदचाप तीव्र हो चली है।
सूरदत्त — आप लोग शांत हो बैठें। आगंतुकों से मैं अकेला ही निपटूंगा। सौगन्ध है मुझे अपने बाहुबल की। जब तक तन में प्राण रहेंगे तब तक आप सबका बाल भी
लालसिंह — प्रधान जी ! आप हमें अन्यथा न समझें। हम सब
परस्पर सुख — दुःख के साथी हैं। साथ जियेंगे, साथ मरेंगे।
सूरदत्त — (जाते हुए संयत व आदेशात्मक स्वर में) नहीं, तुम सब प्रतीक्षा करो।
हरिसिंह — प्रधान जी अपने प्राणों से खेल गए।
लालसिंह — वे किसी को साथ नहीं ले जाना चाहते। उन्होंने न
सुन्दरसिंह — आदेश का उल्लंघन भी भीषण अपराध है। एक बार उन्हीं की रक्षा के अर्थ उनके मना करने पर मैं साथ चला गया; अतः हमारा सम्पूर्ण दस्युदल विपत्ति में
हरिसिंह — तभी उनकी आज्ञा टालने का साहस नहीं होता, उस
लालसिंह — नहीं तो उसी दिन ‘राम नाम सत्य’ हो जाता।
सूरदत्त — (सूरदत्त राजमाता नागदत्ता एवं राजपुत्री को साथ लेकर आता है। उनके दो अंगरक्षक भी साथ में है। हरिसिंह ! शीघ्रता करो। रथ पर रखी सामग्री ले
(हरिसिंह, लालसिंह तत्काल कार्य में व्यस्त हो
सुन्दरसिंह — (ज्योत्स्ना की ओर वासना युक्त दृष्टि से देखते हुए)
अहा ! कितनी सुन्दर सलोनी चिड़िया फंसी है नायक ! (ऐसे वचन सुनते ही महारानी नागदत्ता व
राजकुमारी ज्योत्स्ना थर — थर काँपने लगती हैं)
सूरदत्त — (अत्यंत क्रुद्ध हो) सुन्दर! सावधान जिह्वा छेद देंगा।
तुम्हारी जिन आँखों में दर्दमनीय वासना छलक आयी है, उन आँखों की कुशलता नहीं। क्या तुम अभी तक हमारे स्वभाव को नहीं पहचान सके ?
सुन्दरसिंह — क्षमा करें नायक ! भूल हुई ।
सूरदत्त — फिर कभी ऐसी भूल न करना। हम दस्यु हैं। लुटेरे हैं, फिर भी चरित्र के धनी हैं। चिरसंचित पूँजी को तुम सहज ही लुटा देना चाहते हो । नारी मात्र में हमने पवित्र मातृत्व के ही दर्शन किये हैं। घृणित वासना से हम कोसों दूर हैं।
नागदत्ता — धन्य है बंधु ! तुम्हें धन्य है! मुझे प्रसन्नता हुई कि तुम सतीत्व का सम्मान करते हो।
सूरदत्त — माता ! हमें अपने शील पर भी गर्व है। आप अपने को घर की भाँति यहाँ भी सुरक्षित समझें। आपकी कोई क्षति नहीं होगी।
मोहनसिंह — माँ श्री ! हमें सम्पत्ति से प्रयोजन है। अपने समस्त आभूषणों को दे दें।
नागदत्ता — आभूषण ले लो किन्तु अंधेरा घिरने के पूर्व कृपया नगर में लौट जाने देना। आयुष्मती ज्योत्स्ना ! तुम भी आभूषण उतार दो।
सूरदत्त — नहीं, कन्या के आभरण हम स्पर्श नहीं करते।
ज्योत्स्ना — (दीर्घ उच्छवास लेते हुए) माँ श्री! आज का दिवस कितना अशुभ है।
नागदत्ता — आयुष्मती ! किसे ज्ञात था कि हमारी सुखद यात्रा विपत्ति में परिवर्तित हो शोकग्रस्त हो जायेगी।
ज्योत्स्ना — माँ श्री ! साधुराज तो इसी मार्ग से गये हैं। उन्होंने कोई संकेत नहीं दिया। नहीं तो हम इस आकस्मिक संकट से निश्चित ही बच जाते ।
नागदत्ता — उन्हें ज्ञात न होगा पुत्री ! वरन् वे अवश्य सावधान कर देते।
सूरदत्त — तुमने उनसे पूछा होता तो वे बतला देते।
नागदत्ता — मैंने उन्हें बतलाया था कि मैं ज्योत्स्ना का विवाह करने कौशाम्बी नगरी जा रही हूँ। वन निरापद तो है?
सूरदत्त — तब उन्होंने क्या कहा ?
नागदत्ता — प्रत्युत्तर में वे मौन रहे। उनके मौन को स्वीकृति समझ मैं बिना किसी आशंका के पुनः चल पड़ी।
यहाँ तो आपत्ति मेरी प्रतीक्षा कर रही थी।
सूरदत्त — तो उन्होंने कुछ नहीं कहा ?
ज्योत्स्ना — धर्मवृद्धि का आशीर्वाद दिया था।
सूरदत्त — देखा मोहनसिंह! हम बाँधने वालों से जिसप्रकार साधु महाराज निस्पृह थे, भक्ति करने वालों से भी उसीप्रकार उदासीन रहे। सत्य बात तो यह है कि सूरदत्त-
राजकुमारी ज्योत्स्ना थर — थर काँपने लगती हैं)
(अत्यंत क्रुद्ध हो) सुन्दर ! सावधान जिह्वा छेद दूँगा।
तुम्हारी जिन आँखों में दुर्दमनीय वासना छलक आयी है, उन आँखों की कुशलता नहीं। क्या तुम अभी तक हमारे स्वभाव को नहीं पहचान सके?
सुन्दरसिंह — क्षमा करें नायक ! भूल हुई ।
सूरदत्तफिर कभी ऐसी भूल न करना। हम दस्यु हैं। लुटेरे हैं, फिर भी चरित्र के धनी हैं। चिरसंचित पूँजी को तुम सहज ही लुटा देना चाहते हो। नारी मात्र में हमने पवित्र मातृत्व के ही दर्शन किये हैं। घृणित वासना से हम कोसों दूर हैं।
नागदत्ताधन्य है बंधु ! तुम्हें धन्य है ! मुझे प्रसन्नता हुई कि तुम सतीत्व का सम्मान करते हो।
सूरदत्तमाता ! हमें अपने शील पर भी गर्व है। आप अपने को घर की भाँति यहाँ भी सुरक्षित समझें। आपकी कोई क्षति नहीं होगी।
मोहनसिंह — माँ श्री ! हमें सम्पत्ति से प्रयोजन है। अपने समस्त आभूषणों को दे दें।
नागदत्ताआभूषण ले लो किन्तु अंधेरा घिरने के पूर्व कृपया नगर में लौट जाने देना। आयुष्मती ज्योत्स्ना ! तुम भी आभूषण उतार दो।
सूरदत्तनहीं, कन्या के आभरण हम स्पर्श नहीं करते।
ज्योत्स्ना-
(दीर्घ उच्छ्वास लेते हुए) माँ श्री ! आज का दिवस कितना अशुभ है।
नागदत्ताआयुष्मती ! किसे ज्ञात था कि हमारी सुखद यात्रा विपत्ति में परिवर्तित हो शोकग्रस्त हो जायेगी।
ज्योत्स्नामाँ श्री ! साधुराज तो इसी मार्ग से गये हैं। उन्होंने कोई संकेत नहीं दिया। नहीं तो हम इस आकस्मिक संकट से निश्चित ही बच जाते।
नागदत्ताउन्हें ज्ञात न होगा पुत्री ! वरन् वे अवश्य सावधान कर देते।
सूरदत्ततुमने उनसे पूछा होता तो वे बतला देते।
नागदत्तमैंने उन्हें बतलाया था कि मैं ज्योत्स्ना का विवाह करने कौशाम्बी नगरी जा रही हूँ। वन निरापद तो है?
सूरदत्ततब उन्होंने क्या कहा ?
नागदत्ताप्रत्युत्तर में वे मौन रहे। उनके मौन को स्वीकृति समझ मैं बिना किसी आशंका के पुनः चल पड़ी।
यहाँ तो आपत्ति मेरी प्रतीक्षा कर रही थी।
सूरदत्ततो उन्होंने कुछ नहीं कहा ?
ज्योत्स्नाधर्मवृद्धि का आशीर्वाद दिया था।
सूरदत्तदेखा मोहनसिंह ! हम बाँधने वालों से जिसप्रकार साधु महाराज निस्पृह थे, भक्ति करने वालों से भी उसीप्रकार उदासीन रहे। सत्य बात तो यह है कि
नागदत्ता — उन्हें न किसी से बैर है, न प्रीति।
नागदत्ता — तो क्या तुमने उन्हें पकड़ लिया था ?
सूरदत्त — हाँ, यह मोहनसिंह की अज्ञानता थी किन्तु हमने उन्हें ससम्मान छोड़ दिया और क्षमा याचना भी कर ली।
ज्योत्स्ना — तब तो उन्हें यह सब ज्ञात था माँ श्री ! फिर भी उन्होंने हमें सचेत नहीं किया।
नागदत्ता — न जाने उस दुष्ट ने किस जन्म की शत्रुता भंजाई है।
तुम्हारा ज्येष्ठ भ्रात होते हुए भी वह कर्त्तव्य से विमुख हो गया। धिक्कार है मेरे मातृत्व को जो मेरी कुक्षि से ऐसा कुपुत्र उत्पन्न हुआ।
सूरदत्त — क्या साधु महाराज आपके पुत्र हैं ?
नागदत्ता — इकलौता लाड़ला था यह नागकुमार। जिसे गोद में लेकर मैं गर्व का अनुभव करती थी, आज उसको पुत्र कहते लज्जा आ रही है। उसने अपनी भगिनी का भी विचार नहीं किया।
सूरदत्त — ऐसा न कहे माँ श्री ! समस्त संबंध तन के हैं, आत्मा के नहीं। साधु तो महान तत्त्वदर्शी वीतरागी संत हैं।
वे आत्मा को सुसंस्कृत बनाने में संलग्न कल्याणमय हैं। उन्हें तन और तन के कथित सम्बन्धियों से क्या प्रयोजन ?
नागदत्ता — नहीं, मैं उसे कभी क्षमा नहीं करूँगी।
सूरदत्त — तब आप अपने प्रति घोर अन्याय करेंगी। मैं तो कहता हूँ कि ऐसे पुत्र को जन्म देकर आप धन्य हो गयी हैं। (सामग्री लाते हुए लालसिंह व हरिसिंह से) तुम दोनों माँ श्री की सामग्री ज्यों की त्यों रथ में रखवा दो और ये जहाँ जाना चाहें वहाँ सुरक्षित पहुँचा दो। (महारानी नागदत्ता के पक्ष में हर्ष की लहर आ जाती है)
मोहनसिंह — क्या कह रहें हैं आप ? स्वस्थ तो हैं न ?
सूरदत्त — स्वस्थ होता तो ये निकृष्ट कर्म न होते, पर अब अवश्य होने जा रहा हूँ।
मोहनसिंह — आपकी बात हमारी बुद्धि से परे है। कृपया स्पष्ट करने का कष्ट करें।
सूरदत्त — तो सुनो मोहनसिंह ! जीवन भर किये गए अनर्थों का मैं प्रायश्चित्त करूँगा। साधु महाराज की माता हमारी भी पूज्य हैं; अतएव मेरा अनुरोध है इनकी सामग्री लौटा दो।
नागदत्ता — (हर्ष और आश्चर्य युक्त मुद्रा में) मैं ये क्या देख सुन रही हूँ ? क्या अग्नि भी शीतल हो जाती है ?
सूरदत्त — नहीं, जल में जो उष्णता आ गई थी, वह निकलने लगी है, इसमें क्या आश्चर्य ? आश्चर्य तो यह था कि अक्षय संपत्ति का स्वामी इन प्रपंचों में फंसा था।
साधु महाराज की वीतरागता का प्रभाव है कि मेरी आँखें खुल गईं। आपके साथ किये गये दुर्व्यवहार के लिए हृदय से क्षमाप्रार्थी हूँ।
सुन्दरसिंह — प्रधानजी ! आपके आदेश का पालन हो ही रहा है।
फिर आप कहाँ चले ?
सूरदत्त — अमूल्य मानव जीवन को सार्थक करने। अभी साधु महाराज अधिक दूर नहीं गए होंगे ! नव जीवन का प्रारम्भ करने के लिए गुरुमंत्र उन्हीं से लूँगा।
मोहनसिंह — हम सबको छोड़कर चले जायेंगे ?
सूरदत्त — संसार का विसर्जन करना है तो सबसे मुक्त होना पड़ेगा। जन-धन से मुक्त, क्रोधादि विकारों से मुक्त, सबसे मुक्त, बंधन सर्वथा हेय हैं।
मोहनसिंह — दस्युदल के लिए क्या आदेश है ?
सूरदत्त — अब क्या आदेश ? तुम स्वतंत्र हो। बन सके तो पूर्ण स्वतंत्रता की आराधना करो, सुख शांति तभी उपलब्ध होगी।
सुन्दरसिंह — अभी तक के सभी अभियानों में हम सब साथ रहे, क्या इस अभियान में साथ न ले चलोगे ?
सूरदत्त — मुक्ति का द्वार सबके लिए खुला है। सहर्ष चल सकते हो परन्तु यह अभिमान समस्त अभिमानों से निराला और अपूर्व है। खड्ग की तीक्ष्ण धार पर चलना है।
सुन्दरसिंह — अभ्यास असंभव को भी संभव बना देता है नायक !
रुचि दिशा को तत्क्षण बदल देती है। दृष्टि के अनुसार सृष्टि की संरचना होने लगती है।
सूरदत्त — (प्रसन्न हो) अति सुन्दर, सुन्दरसिंह ! ‘यथा नाम तथा गुण’ आओ चलें, आत्मा की सृष्टि बसायें, जो अनादिकाल से उजड़ी पड़ी थी।
लालसिंह — और यह लोगों की निधि क्या यों ही पड़ी रहेगी नायक !
सूरदत्त — अब इस नश्वर सम्पत्ति से क्या प्रयोजन लालसिंह !
हमें तो अपनी उस शाश्वत निधि की सहसा सुधि आई है जो अब तक हमारे ही द्वारा उपेक्षित थी, आओ उसे सहेज लें।
सुन्दरसिंह — चलो नायक ! अब इस जड़ द्रव्य से क्या मोह ?
‘राजा छोड़ी झोंपड़ी, जो चाहे सो लेय।’
(सबका प्रस्थान। महारानी नागदत्ता, ज्योत्स्ना विस्मित हो देखती रह जाती हैं)
…
(पटाक्षेप)
अवसान
पात्रानुक्रमणिकाः
सम्राट बिंबसार श्रेणिक — मगध के प्रतापी नरेश
कुणिक — श्रेणिक का पुत्र
महारानी चेलना — श्रेणिक की रानी एवं कुणिक की माता
दृश्य-प्रथम
समय — दिन का तृतीय प्रहर
स्थान — कारागृह का कक्ष
(सम्राट श्रेणिक कारागृह में बंदी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। द्वार पर प्रहरी सतर्क खड़ा है किन्तु सम्राट की शोचनीय अवस्था से वह भी दुःखी है)
श्रेणिक — (शोकाकुल हो) भाग्य का खेल ! जिसकी वैजयंती दिग्दिगंत में फहरा रही थी, जिसके राज्य में सूर्य कभी अस्त नहीं हुआ (दीर्घ उच्छवास ले) आज उसी व्यक्ति को कारागृह में बंद कर समय चक्र मृत्यु की घड़ियाँ गिनने को बाध्य कर रहा है।
प्रहरी — (दुःखित हो) महाराज ! दोपहरी इसी उधेड़ बुन में बीत गयी। आपने तनिक भी विश्राम नहीं किया।
श्रेणिक — (व्यंग से हँसते हुए) अब तो अहर्निश विश्राम है
प्रहरी — आज तो आपने भोजन की थाली का भी स्पर्श नहीं किया महाराज। जल की कटोरी भी ज्यों की त्यों रखी है।
श्रेणिक- अब अन्न — जल का भी त्याग कर दिया। इस जीवन से कोई मोह नहीं रहा।
प्रहरी — नहीं, नहीं ऐसा न कहें महाराज। मुझे दुःख होता है।
हृदय फटा जाता है। क्या करूँ दासता है मेरे पास, कुंजी भी नहीं है, वरना प्राणों की बाजी लगाकर भी आपको यहाँ से मुक्त कर सुरक्षित स्थान पर पहुँचा देता।
श्रेणिक — उत्तेजित न बनो प्रहरी ! किसकी सुरक्षा ? आत्मा तो सदैव सर्वत्र सुरक्षित ही है और उसका क्या हो सकता है? (नेपथ्य में कुणिक का अट्टहास सुनाई पड़ता है। प्रहरी भयभीत-सा सावधान हो खड़ा हो जाता है। कुणिक के आते ही वह सैनिक अभिवादन
कुणिक — (श्रेणिक से) क्यों प्रहरी से मिलकर क्या भागने की योजना बनाई जा रही है ? (कड़क कर प्रहरी से)
किसकी आज्ञा से बंदी से संभाषण कर रहे हो?
(प्रहरी को नतमस्तक मौन देख) प्रहरी ! हम जानना चाहते हैं कि तुम्हारी कौन-सी गुप्त वार्ता हो रही थी ?
अवसान
पात्रानुक्रमणिकाः
सम्राट बिंबसार श्रेणिक कुणिक महारानी चेलना मगध के प्रतापी नरेश श्रेणिक का पुत्र श्रेणिक की रानी एवं कुणिक की माता
दृश्य-प्रथम
समय — दिन का तृतीय प्रहर
स्थान — कारागृह का कक्ष
(सम्राट श्रेणिक कारागृह में बंदी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। द्वार पर प्रहरी सतर्क खड़ा है किन्तु सम्राट की शोचनीय अवस्था से वह भी दुःखी है)
श्रेणिक — (शोकाकुल हो) भाग्य का खेल ! जिसकी वैजयंती दिग्दिगंत में फहरा रही थी, जिसके राज्य में सूर्य कभी अस्त नहीं हुआ (दीर्घ उच्छवास ले) आज उसी व्यक्ति को कारागृह में बंद कर समय चक्र मृत्यु की घड़ियाँ गिनने को बाध्य कर रहा है।
प्रहरी — (दुःखित हो) महाराज ! दोपहरी इसी उधेड़ बुन में बीत गयी। आपने तनिक भी विश्राम नहीं किया।
श्रेणिक — (व्यंग से हँसते हुए) अब तो अहर्निश विश्राम है
प्रहरी — आज तो आपने भोजन की थाली का भी स्पर्श नहीं किया महाराज ! जल की कलशी भी ज्यों की त्यों रखी है।
श्रेणिक- अब अन्न — जल का भी त्याग कर दिया प्रहरी ! इस जीवन से कोई मोह नहीं रहा।
प्रहरी — नहीं, नहीं ऐसा न कहें महाराज ! मुझे दुःख होता है।
हृदय फटा जाता है। क्या करूँ दासता है मेरे पास, कुंजी भी नहीं है, वरना प्राणों की बाजी लगाकर भी आपको यहाँ से मुक्त कर सुरक्षित स्थान पर पहुँचा देता।
श्रेणिक — उत्तेजित न बनो प्रहरी ! किसकी सुरक्षा ? आत्मा तो सदैव सर्वत्र सुरक्षित ही है और उसका क्या हो सकता है ? (नेपथ्य में कुणिक का अट्टहास सुनाई पड़ता है। प्रहरी भयभीत-सा सावधान हो खड़ा हो जाता है। कुणिक के आते ही वह सैनिक अभिवादन
कुणिक — (श्रेणिक से) क्यों प्रहरी से मिलकर क्या भागने की योजना बनाई जा रही है ? (कड़क कर प्रहरी से)
किसकी आज्ञा से बंदी से संभाषण कर रहे हो ?
(प्रहरी को नतमस्तक मौन देख) प्रहरी ! हम जानना चाहते हैं कि तुम्हारी कौन-सी गुप्त वार्ता हो रही थी ?
[ यहाँ तक का अंश ऊपर दिया गया है; शेष पाठ के लिए कृपया नीचे संलग्न PDF देखें ] — अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें — मूल दस्तावेज़ (PDF): 1883.pdf
स्रोत — Gyata संग्रह।
