आचार्य कुंदकुंद के बाल-रूप पद्मनंदी के जन्म से लेकर ग्वाला कोंडेश प्रसंग व मुनिराज के उपदेश (सभी जीव भगवान हैं, आत्मा चेतन स्वरूप है) तक की प्रेरक कथा को प्रस्तुत करता मंचन योग्य नाटक। दाई माँ, नगर सेठ, सेठानी, पण्डित जी, मुनिराज आदि पात्रों के संवाद सहित एक आधुनिक नाट्य-स्क्रिप्ट।
A staged drama on the life of Acharya Kundkund — from the birth of the boy Padmanandi to the episode of the cowherd Kondesh and the muniraj’s teaching (all souls are divine, the self is pure consciousness). A modern play script with dialogues of the midwife, city merchant, his wife, the pandit and the muniraj.
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पूरा नाटक / Full Script
कुंदकुंद का जन्म
दाई मां - बधाई हो बधाई हो, पुत्र रत्न हुआ है
(पुत्र रत्न की प्राप्ति पर नगर सेठ बहुत प्रसन्न हुआ)
पण्डित जी - ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पद्मनंदी नाम सर्व श्रेष्ठ है
नगर सेठ - जाओ सारे नगर में जन्मोत्सव की तैयारी करो
(सेठ ने नगर में धार्मिक उत्सव करवाए)
धार्मिक उत्सव (ढोल बाजा, खुशी का माहौल)
(नगर में सानंद उत्सव मनाया गया)
कुछ महिला रंगोली डालते हुए.
महिला 1 - सुना है नगर सेठ का पुत्र बहुत सुंदर है
महिला 2 - क्या तुमने देखा नहीं
(एक दिन पद्मनंदी बहुत रो रहा था, परीवार के सभी लोगों ने हर प्रकार से उसे चुप करवाने का प्रयत्न किया, [बच्चे के रोने की आवाज] किंतु व्यर्थ रहा, तब ही मन्दिर से लौटी सेठानी ने उसे गोद में ले लिया)
सेठानी मां - सुट्ढोसी बुट्ढोसी निरंजनों सी, संसार माया परिवार अौतोनों x 2
सेठानी के हाथ वाली - आर्यूं, मां के ढाल लागो तुगाने पर यह चुप क्यो हो जाता है
मां - मेरा बेटा चुप क्यो होता, वह तो जगापति के गीत ही सुनना चाहता है
साथ वाली - असय ही इस बच्चे में कोई असामान्य बात है, बेटा भी तो तुमसा है, तो मगनिया और विवेक शील ही होगा
मां - तुम्हारा कथन सत्य हो बहन!
(पद्मनंदी बड़ा होता है, रेर तक जगता है, मां दे जोरिया सुनाता है।)
लोरी … (लोरी के बीच राजा जिह entry)
(पद्मनंदी हंसता है खेलता है, तह तक के प्रेम कूलता है, इस बात से सेठानी चिंतित होती हैं, दैनी दिन उनकी चिंता बढ़ती जाती है और एक दिन. राजि को सोचे समग्र अपने मति से कहती है)
सेठानी मां - देखो जी मुझे पप बीमार लग रहा है
सेठ - ठीक है अभी तुम आराम करो, सुबह रेदेगो
(सेठ ने प्राः निपुण चिकित्सकों और ज्योतिषी को आमंत्रित कर समस्या से अवगत कराया, तथा उर्ह परिक्षण हेतु कहा। परिक्षण के बाद उन्होंने अपने अपने मत्तमे दिए।)
सेठानी माँ - सुद्धोसी बुद्धोसी निरंजनों सी, संसार माया परिवार जीतोसी × 2
सेठानी के साथ वाली - आश्चर्य, माँ के द्वारा लोरी सुनाने पर यह चुप क्यों हो जाता है
माँ - मेरा बेटा चुप क्यों होता, वह तो जागृति के गीत ही सुनना चाहता है
साथ वाली - अवश्य ही इस बच्चे में कोई असाधारण बात है, बेटा भी तो तुम्हारा है, तो धर्मात्मा और विवेक शील ही होगा
माँ - तुम्हारा कथन सत्य ही बहन !
(पच्चानंदी कम सोता है, देर तक जागता है, माँ से लोरियाँ सुनता हैं।)
लोरी … (लोरी के बीच राजा कि entry)
(पच्चनंदी हस्ता है खेलता है, तरह तरह के प्रश्न करता है, इस बात से सेठानी चिंतित होती है, दिनों दिन उनकी चिंता बढ़ती जाती है और एक दिन. रात्रि को सोते समय अपने पति से कहती हैं)
सेठानी माँ - देखो जी मुझे पद्म बीमार लग रहा है
सेठ - ठीक है अभी तुम आराम करो, सुबह देखेंगे
(सेठ ने प्रातः निपुण चिकित्सकों और ज्योतिषों को आमंत्रित कर समस्या से अवगत कराया, तथा उन्हें परीक्षण हेतु कहा। परीक्षण के बाद उन्होंने अपने अपने सुझाव दिए)
ज्योतिष - ज्यादा थकान से निद्रा आती है, तीक्ष्ण एवम जागृत बुद्धि होने से ये बालक निद्रा नहीं लेता, किंतु इसमें चिंतित होने का कारण नहीं है
चिकित्सक - सेठ जी आपने हम लोगो को बुलाकर बहुत उपकार किया है ऐसे बालक के दर्शन कर के हम सब कृत -कृत्य हुए
ज्योतिष - यह बालक तेजवान महा पुरुष होगा सेठ !
सेठ - आप लोगों का कहना सत्य है किंतु…
ज्योतिष - किंतु परंतु कुछ नहीं इतनी आयु में ऐसे शुभ लक्षणों से युक्त बालक को नहीं देखा, तुम धन्य हो सेठ
(आशीर्वादि एवम् शुभ वचन दे कर सभी जाने लगे और तब)
सेठ - पंडित जी दक्षिणा तो लेते जाइए ..
ज्योतिष - हमे दक्षिणा मिल गई है सेठ जी , बालक का दर्शन कर हम कृतार्थ हुए
(पुष्प की तरह प्रसन्नता के खेलते हुए पत्नार्दी 4 वर्ष का हो गया , माँ ने प्रारंभिक शिक्षा देने के साथ धार्मिक शिक्षा देना भी आरंभ किया और एक दिन …
माँ - बेटा पद्य कुछ समय आकर पड़ लो
पद्य - नहीं माँ मैं तुमसे नहीं पड़ूंगा ,अब तुम नई बात नहीं सिखाती हो मुझे
माँ (मन में) - अब इस पद्य को क्या पढ़ाऊं जो कुछ मुझे ज्ञान था वह इसने कुछ महीनो में ही सीख लिया, अब इसकी जिज्ञासा कैसे शांत करूं । हा एक रास्ता अवश्य है रात को मैं पहूंगी और सुबह वही पद्य को पढ़ाउंगी ,यही ठीक रहेगा।
सेठ - प्रिय आज कल दिन रात पुस्तकों में ही खोई रहती हो।
माँ - कुछ देर और पड़ लू, सुबह पद्य को भी पढ़ाना है, माँ बनना सरल है माँ का कर्तव्य निभाना बहुत कठिन हैं। शीघ्र ही पद्य के लिए योग्य गुरु की व्यवस्था करनी चाहिए ,जिससे वो भी बड़ा हो कर सूर्य के समान प्रकाशवान बने
(एक दिन प्रातः काल से ही कांड कुंड पुर में बहुत हल चल थी, लोग प्रसन्न थे, आपस में कुछ बातें करते और जंगल की ओर बढ़ जाते)
व्यक्ति 1 - अरे भाई सुबह सुबह कहा भागे चले जा रहे हो, क्या कोई संकट आ गया है
व्यक्ति 2 - यहां तुम अब तक सो रहे हो अब तो जागने का समय आ गया है
व्यक्ति 1 - तुम साफ साफ बात क्यों नहीं करते, क्या बात है
व्यक्ति 2 - तो सुनो संकट तो अब जाने वाला है, क्यूंकी आचार्य श्रेष्ठ जिनवंद्र को जंगल के समीप देखा गया है
महल का scene
पद्म - सुनो धुवेश,आज ही क्या रहा है तुम सबको ,सुबह सुबह ही कहा
धुवेश - अरे तुम्हे नहीं मालूम,कल शाम क्योंवृद्ध आचार्य श्री जिनचंद्र जी को नगर के समीप जंगल में देखा गया है
(विश्राम कर रही माँ के पास पद्म आता है और कहता है )
पद्म - माँ जल्दी उठो,देखो आज सूर्य का उदय हुआ है
माँ - उठ रही हूँ बेटे पद्म परंतु तुम्हे क्या हुआ सूर्योदय तो रोज ही होता है नया क्या है
पद्म - हाँ माँ मैं ही क्या आज तो पूरा नगर ही धन्य होगा ,क्युकी आज के सूर्य का उदय ही ऐसा है , जिससे अज्ञान का नाश होगा, पाप गलेगे ,ज्ञान के प्रकाश से सबको मुक्ति का मार्ग मिलेगा
माँ - पहेलिया क्यों बुझाते हो पुत्र , पद्म तुम तो मुझ से ही पांडित्य करने लगे , सीधी बात बताओ ना
पद्म - बात यह है माँ की आचार्य जिनचंद्र के रूप मे सूर्योदय हुआ है , वे पास के जंगल के विराजमान है , सारा नगर उनके दर्शन करने जा रहा है माँ , और मैं भी
माँ - सुनो पद्म मैं भी चल रही हूँ
(पद्म माँ की प्रतीक्षा किए बिना ही चला गया इस बात से माँ सोचती है की इसे मुनिराज के प्रति इतनी श्रद्धा और निष्ठा हैं की पद्म मेरा पुत्र हो कर भी तनिक प्रतीक्षा न कर सका , सेठानी की सोच का बादल घना होने लगा,और उनके मस्तिष्क रूपी आकाश पर छा गया ,उनको अचानक पद्म के मुनि बनने का ख्याल आया और वह स्वयं कहने लगी )
माँ - नहीं नहीं मैं ऐसा नहीं होने दूंगी ,मेरा तो एक ही पुत्र है,मैं उसे मुनि नहीं बनने दूंगी ,मेरा पुत्र तो भावी नगर सेठ है और ज्ञानी भी है पद्म
(जंगल के पास सही एकत्रित होने लगे वृक्ष के नीचे ही आचार्य श्री ध्यान मग्न है , सभी आचार्य श्री के वचनामृत पान करने की प्रतीक्षा में हैं )
व्यक्ति 1 - सभा में से - अरे भाई हम तो प्रवचन सुनने आए थे,परंतु मुनिराज तो ध्यान में लीन है और मुझे देर हो रही है
व्यक्ति 2 - हां तुम सत्य कहते हो साधु जनों या सज्जनों की संगति को धन व्यय करके भी प्राप्त करना चाहिए
व्यक्ति 3 - हा भैया प्रवचन से हमे ज्ञान प्राप्त होगा ,सुख का मार्ग मिलेगा
व्यक्ति 4 - भाई तुम कुछ भी कहो अब मै और अधिक समय व्यर्थ नहीं करना चाहता , आचार्य का भी कोई कर्तव्य है ना की इतने लोग अपना कार्य छोरे कर यहां है
व्यक्ति 5 - तुम्हे जाना हो तो जाओ परंतु वे मुनि है ,किसी के आधीन नहीं जो किसी के आने पर उपदेश देंगे हीं वास्तव में हमारे पुण्य का उदय अभी नहीं हुआ है
व्यक्ति 3 - भैया सांसारिक कार्य तो चलते ही रहते है ,रुकते नहीं,फिर क्यों मुनिराज के वचनों को सुनने से वंचित रहू कितना भी समय हो मैं प्रवचन सुन कर ही जाऊंगा
पद्म - थोड़ा धीरे बोलिए आदरणीय कही बात चीत से मुनिराज का ध्यान भंग न हो ,अभी ये सिद्धों से बाते कर रहे है
(तब ही मुनिराज का ध्यान भंग होता है वे जन समूह को सन्मुख देख कर उपदेश देने लगते है )
सभा - मुनिराज की जय !× 3
मुनिराज - शुभात्मा को जाने बिना दुख ही दुख है सुख के लिए अहिंसा दया , सत आचरण करना चाहिए ,यदि संभव हो तो मुनि धर्म धारण करना चाहिए
मुनि भक्त - अरे यह बात मैंने आज तक नहीं सुनी अपूर्व बात है , धन्य है मुनि दशा , मेरे जीवन में ऐसी दशा कब होगी
(विचार मगन पद्म उठ कर आचार्य के सम्मुख पहुंचा )
पद्म - पूज्यवर आपके उपदेश सुन के मैं संसार का स्वरूप जान गया हूं , है नाथ मुझे जिन दीक्षा प्रदान कीजिए
मुनिराज - है भव्य ,तुम्हारे विचार विचार तो उत्तम है किंतु परिजनों की अनुमति आवश्यक है
पद्म विचार करते हुए जाते है
संत साथ बन के विच म्यज़िक
पद्म विचार करते हुए जाते है
संत साधु बन के विन्दु … म्यूजिक
पद्म - मां के पास पहुंच कर - मां क्या तुम मुझे अच्छा पुत्र मानती हो ,मेरा हित चाहती हो ,और अनंत काल तक मेरी ही मां बनी रहना चाहती हो
मां - हां पद्म क्या बात है आज तुम ऐसी गंभीर बातें क्यों कर रहे हो
पद्म - मां मैंने मुनि होने का निश्चय किया है , मैं सांसारिक बंधनों से मुक्त होना चाहता हु ,तुमसे दीक्षा की आज्ञा चाहता हु ,तुम मुझे आज्ञा दोगी ना ?
Emotional
मां - नहीं नहीं ऐसा नहीं बोलो पद्म , अभी तुम्हारी पड़ने - खेलने की आयु है
(अचानक पुत्र से मुनि बनने की बात सुन कर मां का हृदय वियोग की कल्पना से तड़प उठा , उसने तरह तरह से पद्म को समझाने का प्रयत्न किया ,किंतु सब व्यर्थ ,पद्म ने दरुण निश्चय कर लिया था , जब मां का प्रयास भी विफल रहा तो उनके नेत्रों से अश्रु धारा फूट निकली )
हट तजो बेटा… ( मां और बेटा का संवाद )
मां - रोते हुए!!!
( सभी सेठानी को देखने लगे )
पद्म - नहीं मां मैं अपने जन्म के लिए लज्जित हु , अब अनंत काल तक जन्म न लूंगा , किसी को कष्ट न दूंगा ,इतने वर्ष संयम बिना व्यर्थ गवाएं ,परंतु अब न गवाऊंगा
मां - तुम जानते हो पद्म की मैं तुम्हे कितना प्यार करती हु तुम ही मेरी एक मात्र संतान हो मैं अपनी ममता को कैसे तजु नहीं नहीं पद्म मैं ऐसा नहीं होने दूंगी तुम ही अनंत काल तक मेरे पुत्र कहलाओगे
पद्म - मैं जानता हूं मां,इसीलिए तुमसे दीक्षा की आज्ञा चाहता हु अब मै इस ही जन्म तक तम्हारा पुत्र कहलाऊंगा मैं प्रतिज्ञा
पहल दृश्य
प्रवचनकार द्वारा समयसार एवं कुंदकुंद आचार्य का परिचय
(इसी बीच लाइट ऑफ)
(लाइट ऑन के साथ)… ग्वाला अपनी गायों को चराने जंगल ले जा रहा है।
एक तरफ कुछ ग्रामीण कौंडेश की प्रशंसा करते हुए उसे निहार रहे है। कौंडेश यहां बहा घूम कर आनंदित मन से गायों से बाते करता हुआ एक पेड़ के नीचे बैठकर भजन गुनगुनाता है ।
( Bg music)
कुछ दिनों बाद…
जंगल की ओर बड़े बड़े सेठ जाते देख ग्वाला बोलता है
कौंडेश - मैने जीवन में तो इन्हे यहां नही देखा ये यहां क्यों आए है । चलकर देखना चाहिए।
कोमल शरीर वाले यह धनवान लोग नंगे पैर गर्मी सहते जा रहे है कोई बात अवश्य है, अरे वह नन्नावस्था में कौन तपस्वी बैठा है ।
मनिराज - सभी जीव भगवान है जगत के जड़ चेतन सभी
अब तुम अपनी ममता को मेरी राहों में न लाओ ,तुम्हीं ने तो मुझे शिक्षा दी है
माँ - पर ऐसा संभव कैसे के बाद पद्म का निश्चय गलत तो नहि पर माँ का मोह पद्म को रोक रहा है वियोग के डर से मैं स्वार्थी बन रही हूं , विवेकार है मेरा मोह जो सन्मार्ग पर चलने वाले पुत्र के सुख में ही बाधा बन रहा है , कौन कहता है की मैं रोती हूं,अरे मैं मोहि पुत्र के सिंह गर्जना से मोहि माँ का मोह नेत्र पथ से बह कर पुत्र के पथ को प्रक्षासित कर रहा है
सेठ - फिर ये आसू क्यों गिर रहे है ?
माँ - ये आसू नही है जन्म मृत्यु को जीतने वाले पुत्र पर दोनो नेत्रों से जल भर कर महा मस्तकाभिषेक कर रही हूं ,और सुनो पद्म तुम्हे मेरी ममता को सौंगंध तुम अनंत काल तक मेरे ही पुत्र रहोगे जाओ मैं तुम्हे भवनाशनी जैनेश्वरी दीक्षा की सहस अनुमति प्रदान करती हूं
पद्म - ठीक है माँ मैं जानता था तुम अवश्य अनुमति दोगी ,तत्व ज्ञानी जो हो ,और मेरी गुरु भी
संसार लगने लगा म्यूजिक ( इस ही बीच दीक्षा होगी )
मुनिराज - सभी जीव भगवान है जगत के जड़ चेतन सभी का परिणामन स्वतंत्र है, तुम चेतन स्वरूप भगवान हो जो कभी जलता नहीं गलता नही sasvat अमर है स्वयं को पहिचान कर स्वयं में लीन हो जाए तो सभी सुखी हो जाएं। कोई दुखी नहीं होगा।
(कोंदेश उपदेश समझने का प्रयास करने लगा)
कोंदेश - लेकिन मैं दुखी गवाला भगवान कैसे हो सकता हुं।
(साम तक सोचता रहा की सभी तो मुझे मूर्ख कहते है इन मुनिराज ने मुझे भगवान कहा। लौटे समय बारिश में बह भीग गया। बिस्तर पर लेटे लेटे उपदेश में विषय में सोचता रहा।
कोंदेश (मन में) - यदि मैं भगवान बन गया तो गाएं कौन चरायेगा अरे गाएं भी तो भगवान बन सकती है,
(सुबह कोंदेश के न उठने पर उसकी मां उसे जगाने आती है)
मां - अरे इसे तो बहुत तेज बुखार है। (मां बेटा को बुलाती है
(एक सप्ताह में बुखार तो उतर गया परंतु गवाला जंगल न जा सका।
(एक सप्ताह में बुखार तो उतर गया परंतु गवाला जंगल न जा सका।
कोंदेश - मां गाय…(घबरा कर)
मां - रहने दे, अभी और कुछ दिन आर कर।
*(पंद्रह दिन बाद जब कोंदेहस जंगल गया उनसे देखा जंगल में चारो ओर आग लगी। भी परंतु उस भीषण आग में उसे एक हरा भरा पेड़ मिला बह आग के बीच से उसके पास गया।
तभी उसे मुनिराज के उपदेश का स्मरण हुआ)
कोंदेश - विश्व के जड़ चेतन का परिणामण स्वतंत्र है कोई किसी का करता धर्ता नहीं है
अचानक से उसकी नजर पेड़ के कोठार पर पड़ी है।
अरे! यह क्या! है अरे वाह यहां तो कोई धार्मिक ग्रंथ मालूम पड़ता है। पर मैं। तो पड़ना ही नहीं जानता। शायद इस ग्रंथ के कारण यह वृक्ष जला नहीं। यदि मैं पड़ा लिखा होता तो पद लेता
परंतु अब मैं इसका क्या करूं।
ठीक है। यह ताड़ पत्र में उन मुनिराज को ही दे दूंगा।
ठीक है । यह ताड़ पत्र में उन मुनिराज को ही दे दूंगा।
(ग्वाला मुनिराज को खोजने जंगल में निकल पड़ा)
(भजन) वे मुनिवर … l…
IIIIIIIIIIII
(मुनिराज को देख ग्वाला प्रसन्न होकर मुनिराज के पास जाता है )
- हे मुनिवार! यह ताड़ पत्र स्वीकार कर मुझ पर उपकार कीजिए
(ग्वाला मुनिराज को शास्त्र मिलने की संपूर्ण घटना सुनाता है
मुनिराज उसे देख मुस्कुराते है)
(ग्वाला पूछता है) हे मुनिवर क्या यह कोई आत्म है क्योंकि यह जला व गला नहीं है ।
मुनीराज - हे भव्य! यह आत्म नहीं है परंतु इसमें हमारी तुम्हारी आत्मा की बात लिखी है ।तुम्हे आत्म गया अवश्य ही होगा और तुम सुखी भी होगे। तुम्हे हजारों वर्षों तक लोग याद करेंगे
