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दशलक्षण महापर्व 2026Dashlakshan Mahaparv 2026

नाटक स्क्रिप्ट · Play script

अब नहीं — बाल लघु नाटक संग्रह

Ab Nahi (Children's Short Plays)

~49 min पढ़ने में

बच्चों के लिए मंचन-योग्य जैन लघु नाटकों का संग्रह — (१) अब नहीं माँगूँगी (भक्ति के प्रसंग से — वीतरागी जिनेन्द्र भगवान से सांसारिक मांगें क्यों नहीं मांगनी चाहिए, देवदर्शन का सच्चा प्रयोजन), (२) अब नहीं फोड़ूँगा (पटाखों की जिद व अहिंसा का बोध) आदि। सरल संवादों में जैन संस्कार सिखाते नाटक — पाठशाला व बाल कार्यक्रम हेतु आदर्श।

A collection of short staged Jain natak for children — teaching the true purpose of dev-darshan (why one shouldn’t ask the Vitragi Jinendra for worldly favours), ahimsa (giving up firecrackers) and everyday sanskaar through simple dialogue. Ideal for pathshala & children’s programs.


1. अब नहीं माँगूँगी

भक्ति प्रतिदिन नियम से मंदिर जी जाती थी पर उसे नहीं पता था मंदिर क्यों जाना चाहिये? जिनमंदिर जाने से क्या लाभ है? बस… वह तो मम्मी की बात मानती थी। मम्मी ने एक बार कहा था कि रोज मंदिर जाना चाहिये तो मंदिर चली जाती थी। भक्ति पढ़ाई में बहुत लापरवाह थी। खेलते ज्यादा और पढ़ती कम और जब परीक्षा का समय आता तो घबरा जाती थी। कई बार बीमार भी हो जाती थी। इस बार भी ऐसा ही हुआ। जब परीक्षा का समय आया तो उसे बहुत डर लगने लगा। उसने ज्यादा पढ़ाई ही नहीं की थी। उसे लगा कि इस बार यदि फेल हो गई तो क्या होगा? परीक्षा वाले दिन खाते दिन वह सुबह-सुबह मंदिर पहुँची और जिनेन्द्र भगवान के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गई और बोली - हे भगवान! मैंने पढ़ाई बिल्कुल नहीं की। मुझे बहुत डर लग रहा है यदि मैं फेल हो गई तो मम्मी मुझे मारेंगी। प्लीज भगवान! इस बार मुझे पास करवा देना।

यदि आपने मुझे पास नहीं करवाया तो मैं कभी आपके पास नहीं आऊँगी। भक्ति को मम्मी पीछे आकर खड़ी होकर उसकी सारी बातें सुनकर मुस्करा रही थी। उन्होंने पीछे से बहुत प्यार से भक्ति के सिर पर हाथ फेरा। भक्ति ने पीछे मुड़कर देखा तो मम्मी को देखकर वह घबरा गई। मम्मी ने पूछा - भक्ति! भगवान से क्या मांग रही हो? भक्ति मासूमियत से बोली - भगवान से परीक्षा पास करवाने के लिये कह रही थी।

पागल कहीं की…। मम्मी ने प्रेम से गाल पर हाथ रखते हुये कहा। भक्ति! जिनेन्द्र भगवान तो वीतरागी होते हैं, वे किसी का भला-बुरा नहीं करते। किसी से राग-द्वेष नहीं करते। अच्छा और बुरा तो अपने कर्म के उदय के अनुसार होता है। जैसा कर्म करोगी, वैसा ही फल मिलेगा। पेपर में कुछ नहीं लिखोगी या गलत लिखोगी तो परीक्षा पास कैसे करोगी? इसलिये पढ़ाई तो तुम्हें स्वयं ही करना होगी।

मम्मी! जब भगवान कुछ नहीं करते तो हम मंदिर क्यों आते हैं? - भक्ति ने भोलेपन से पूछा।

मम्मी ने कहा - जिनेन्द्र भगवान का दर्शन तो मन की शांति के लिये होता है। इनके दर्शन से मोक्षमार्ग की प्रेरणा मिलती है। हम पापों से बचते हैं और उन जैसे बनने की प्रेरणा मिलती है। जब उन्होंने समस्त धन, घर, परिवार को छोड़कर दिगम्बर दीक्षा ले ली और सभी कर्मों का नाशकर संसार को भी छोड़ दिया तो उनसे संसार का सुख, लौकिक सामग्री मांगना तो उनका अविनय ही है।

मम्मी! आपकी बातें सुनकर बहुत अच्छा लग रहा है। मैं अब भगवान से कुछ नहीं मांगूगी और पढ़ाई भी समय पर करूँगी। मम्मी! और कुछ बताओ ना…।

जरूर बताऊँगी, पर परीक्षा के बाद। अभी तुम स्कूल जाओ और परीक्षा शांत मन से देना और चिन्ता मत करना, नम्बर कम आयेंगे तो डाँटूंगी नहीं।

थैंक्यू मम्मी। इतना कहकर भक्ति प्रसन्न मन से स्कूल जाने की तैयारी करने लगी।

2. अब नहीं फोड़ूँगा

उत्सव: अरे सम्यक् भाई! सुबह-सुबह कहाँ चल दिये?
सम्यक्: क्या बताऊँ उत्सव! मेरा बेटा दीप कल से पटाखे लाने की जिद कर रहा है। कल शाम से उसने भोजन भी नहीं किया। बस बाजार जा रहा हूँ पटाखे लेने।
उत्सव: अरे! यह क्या बात हुई.. तुमने समझाया नहीं।
सम्यक्: (बीच में टोककर) अरे भाई! कितना समझाया, लेकिन मानता ही नहीं।
उत्सव: तो तुम हमें समझाकर होकर उसकी जिद पूरी करने चल पड़े और और अब पटाखे लाकर उसे दोगे.. तो फिर क्या करूँ…? मग तो नहीं मानता लेकिन दीप भोजन तो नहीं कर रहा …
सम्यक्: आजकल के बच्चे तो बस… इनकी सारी इच्छायें पूरी करो और जब वे बड़े हो जायेंगे तो कहेंगे आपने हमारे लिये किया ही क्या ? तुम रूको… मैं समझाकर देखता हूँ।
उत्सव: (दीप के घर पहुँचकर) दीप! क्या कर रहे हो?
दीप: बस अंकल! बोर हो रहा हूँ। आइये न.. अंकल, बैठिये।
उत्सव: तुम बोर हो रहे हो तो तुम्हें एक जादू दिखाता हूँ।
दीप: कैसा जादू अंकल! और आप कब से जादू दिखाने लगे?
उत्सव: देखो तो जरा। मैं जलती हुई मोमबत्ती पर तुम्हारा हाथ रखूँगा और हाथ जलेगा भी नहीं।
दीप: ऐसा कैसे हो सकता है अंकल..। मोमबत्ती पर हाथ जलेगा ही। मैं अपना हाथ मोमबत्ती पर नहीं रखूँगा।
उत्सव: क्यों बेटा?
दीप: मेरा हाथ जल जायेगा अंकल!
उत्सव: वाह बेटा! तुम्हें अपने जलने का तो डर है पर उन छोटे-छोटे जीवों को जलाकर मार डालना चाहते हो…
दीप: मैं कुछ समझा नहीं अंकल…!
उत्सव: अरे! तुमने अपने पापा से पटाखे लाने की जिद की और कल शाम से भोजन भी नहीं किया।
दीप: हाँ …। लेकिन मैं तो दीपावली एन्जॉय करना चाहता हूँ। मेरे सारे दोस्त ढेर सारे पटाखे लाते हैं।
उत्सव: किसी की हत्या करके, डराकर, किसी को तकलीफ पहुँचा कर आनन्द लेना चाहते हो। तुम्हारे थोड़े से आनन्द के लिये जलाये गये पटाखों की आग और आवाज असंख्यात जीवों की मौत बनकर आयेगी और तुम्हारे दोस्त बातें करेंगे तो क्या तुम भी वैसे करोगे?
दीप: नहीं अंकल। लेकिन दीपावली का पर्व हमारे भगवान महावीर का निर्वाण महोत्सव है तो हम क्या खुशियाँ भी नहीं मनायें?
उत्सव: मैंने कब मना किया? निर्वाण पर्व दीपावली मनाओ पर दूसरे तरीके से। जैसे गौतम गणधर ने मनाई थी। हम इस दिन भगवान महावीर की पूजन करें, उनकी शिक्षाओं को अध्ययन करें। तुम्हारा नाम तो दीप है तो ऐसा कार्य करो कि जिससे लोगों को प्रकाश मिले, अंधेरा नहीं। तुम्हारा पटाखों का आनन्द अनन्त निर्दोष जीवों के घात का कारण क्यों बने?
उत्सव: अच्छा! यह बताओ कि तुम दीपावली पर पूरे मोहल्ले को मिठाई खिलाओगे तो सभी तुम्हारी प्रशंसा करेंगे या गाली देंगे?
दीप: प्रशंसा करेंगे।
उत्सव: और तुम रात को पटाखे फोड़कर उनकी नींद खराब करोगे तो वे तुम्हें गालियाँ देंगे कि प्रशंसा करेंगे?
दीप: गालियाँ देंगे।
उत्सव: अच्छा! मुझे पटाखे फोड़ने से होने वाला कोई एक लाभ बताओ।
दीप: एक भी लाभ नहीं।
उत्सव: जिस कार्य में लाभ नहीं ऐसा कार्य क्यों करना और जिस काम में नुकसान ही वह काम तो कभी नहीं करना। पटाखों से लोग जल जाते हैं, घरों में आग लग जाती है, बच्चे-बड़े अपंग हो जाते हैं और प्रदूषण होता, कचरा होता जैसे न जाने कितने नुकसान हैं और तुम्हें पता ही होगा कि पटाखे से होने वाले भयंकर प्रदूषण के कारण सुप्रीम कोर्ट ने पटाखे फोड़ने का समय मात्र दो घंटे निश्चित कर दिया है।
दीप: बस अंकल! मैं समझ गया। अब मैं पटाखे कभी नहीं जलाऊँगा। वाह! ये हुई न बात। हम ज्ञान और भक्ति की दीपावली मनायेंगे।

3 अब नहीं नाचूँगी

संस्कृति: अरे विधि! कहाँ जा रही हो?
विधि: बस मंदिर जा रही हूँ।
संस्कृति: तुम्हें तो पता ही होगा कि अपने मंदिर में सिद्धचक्र मण्डल विधान होने वाला है।
विधि: अरे वाह! ये तो बहुत खुशी की बात है।
संस्कृति: खुशी की बात तो है ही विधि। अपने जिनमंदिर में भक्ति होगी, पूजन-विधान का लाभ मिलेगा और अनेक विद्वानों के प्रवचन होंगे। मेरे पति और मैं इन्द्र-इन्द्राणी बनकर इस विधान का लाभ लेने वाले हैं। तुम भी हमारे साथ इन्द्र-इन्द्राणी बनकर विधान में बैठो ना विधि।
विधि: न बाबा ना। मैं नहीं बनती इन्द्र-इन्द्राणी। एक तो मेरे पति को टाइम नहीं और भक्ति में मुझे सब नृत्य करने को कहते हैं। मंदिर में सबके सामने नृत्य करने में मुझे शर्म आती है।
संस्कृति: अरे विधि! इन्द्र-इन्द्राणी बनकर पूजा करने में विशेष आनन्द आता है, विशेष नियमों के पालन से विशुद्धि भी बढ़ती है और पूरे विधान का लाभ भी मिलता है और जब हम अपने परिवार के जन्मदिन, विवाह, बीमारी में टाइम निकाल सकते हैं तो जिनेन्द्र भगवान के गुणगान में समय का बहाना क्यों… और इन समस्याओं को लेकर बैठेंगे तो जीवन में कभी समय मिल ही नहीं पायेगा।
विधि: बात तो तुम सही कह रही हो संस्कृति।
संस्कृति: और रही बात नृत्य करने की… तो यह तो अपनी इच्छा की बात है। करना हो करो वरना मत करो। पर मुझे याद है कि 5 महीने पहले शादी में सड़क पर बहुत नाची थीं। तब तुम्हें शर्म नहीं आई।
विधि: वो तो मेरे देवर की शादी थी, परिवार की खुशी का अवसर था।
संस्कृति: तो क्या जिनेन्द्र भगवान की पूजन दुःख का कार्य है … क्या, तुम्हें नहीं मालूम.. अच्छे कुल की स्त्रियों को सड़कों पर नाचना शोभा नहीं देता। इसमें कुलशील का दोष लगता है और सड़क पर चलते हुये लोग न जाने कैसे गन्दे परिणामों से घूरते हैं, हमें तो अपनी मर्यादा में रहना चाहिये।
विधि: लेकिन..
संस्कृति: लेकिन-वेकिन कुछ नहीं। यह अपने जैन शासन की मर्यादा है और हमें जिनशासन का गौरव बढ़ाना चाहिये, उस पर कलंक नहीं लगाना चाहिये।
विधि: हाँ! तुम सही कह रही हो। मैं नियम लेती हूँ कि अब मैं सड़कों पर कभी भी नहीं नाचूँगी और अपने पति से इन्द्र-इन्द्राणी बनकर विधान में बैठने के लिये कहूँगी। यदि उनको टाइम नहीं होगा तो मैं तो अकेले ही इन्द्राणी बनकर विधान करूँगी।
संस्कृति: ये हुई न बात। सहेली हो तो तुम्हारे जैसी।

4 अब नहीं बढ़ाऊँगी

चहक! तुम्हे तो मैं समझाकर थक गई हूँ। लेकिन तुम हो कि मानती ही नहीं। चहक की माँ ने चहक को समझाते हुये कहा। तुम इतने बड़े-बड़े नाखून रखती हो, कहीं तुम्हें चोट लग जायेगी तो फिर बैठे रहना रोते हुये। चहक ने पैर पटकते हुये कहा- मम्मी! आप हमेशा मेरे नाखूनों के पीछे पड़ी रहती हो। मैंने भी आपसे कितनी बार कहा है कि नाखून बढ़ाना आजकल का फैशन है और सभी लड़कियाँ नाखून बढ़ाती हैं।
लेकिन बेटी! फैशन में तो कई गंदे बातें भी आ गई है तो क्या उनको भी तुम मानोगी…? ये फैशन करने से मना नहीं करती पर ऐसा फैशन भी क्या करना.. जिससे स्वयं को या दूसरों को तकलीफ हो। मम्मी ने फिर समझाने का प्रयास किया। चहक अपने कमरे में जाते हुये बोली-मम्मी! आप भी ना… हमेशा उपदेश देती रहती हो। जमाना बदल गया है।
मम्मी हमेशा समझाती और चहक हमेशा लापरवाही से उनकी बात को टाल देती थी।

एक दिन मंदिर में संस्कार शिविर लगा। बाहर से पधारे युवा विद्वान जीवन के संस्कार और सदाचार की कक्षा ले रहे थे। उन्होंने बताया कि नाखून बढ़ाना पशुओं की निशानी है। अधिकांश शाकाहारी जानवरों के नाखून नहीं होते और जिनके होते हैं वे छोटे-छोटे होते हैं। लेकिन मांसाहारी जानवरों के नाखून बड़े और पैने होते हैं जिससे वे जंगल में अपना शिकार पकड़कर उसे खा सकें। हमारे शरीर के अंगों में नाखून भी है। जब वे प्राकृतिक रूप से बढ़ जाते हैं तो उन्हें काट लेना चाहिये। बढ़े हुये नाखून से स्वयं को अथवा दूसरे को चोट लगने का डर होता है। साथ ही बड़े नाखूनों में मैल जम जाता है जिससे स्वास्थ्य को खतरा रहता है और इन्फेक्शन भी हो सकता है।
चहक ने युवा विद्वान की प्रभावशाली शैली में सारी बातें सुनी तो वह सोचने पर मजबूर हो गई। पर कुछ समय के बाद चहक सारी बातें भूल गई। एक दिन वह अपने 5 वर्ष के छोटे भाई को कपड़े पहना रही थी तो उसके नाखून से भाई का गाल कट गया और उससे खून निकलने लगा। चहक यह देखकर घबरा गई। उसने घर पर ही दवाई लगा दी। परन्तु दो दिन बाद भाई के गाल में इन्फेक्शन हो गया। भाई को तुरन्त डॉक्टर के पास ले जाया गया। चहक घबरा रही थी और उसे बार-बार युवा विद्वान और मम्मी बात याद आ रही थी। भाई का गाल देखकर उसे रोना आ रहा था। काश! उसने मम्मी और उन विद्वान की बात मान ली होती। अच्छे इलाज से भाई के गाल का घाव तो भर गया परन्तु एक दाग सदा के लिये रह गया।
चहक ने नाखून न बढ़ाने की प्रतिज्ञा तो ले ली पर जब भी वह उनने भाई के गाल पर नाखून का निशान देखती है तो उसे बहुत दुःख होता है।

5 अब नहीं पहनूँगा

अरे पारस! तुमने ये गले में क्या पहन लिया?
पारस: भैया! ये पार्श्वनाथ की फोटो वाला लॉकेट है।
और ये हाथ में क्या पहनता है?
पारस: ये तो णमोकार मंत्र का कड़ा है। मैं अपनी मम्मी के साथ महावीरजी दर्शन करने गया था। वहीं से लेकर आया हूँ।
इसे पहनने से क्या होता है?
पारस: इसको पहनने से मन शांत रहता है और बुरे विचार नहीं आते।
अच्छा पारस! ये बताओ जो लोग ये कड़ा या लॉकेट नहीं पहनते उनका मन तो सदा अशांत रहता होगा और हमेशा गंदे विचार रहते होंगे?
पारस: नहीं! ऐसा कैसे हो सकता है?
और अब ये बताओ ये पहनने के पहले तुम्हारा मन हमेशा अशांत रहता था और हमेशा गंदे विचार आते थे क्या?
पारस: नहीं ऐसा नहीं।
फिर तुमने ऐसा कैसे मान लिया कि इन चीजों को पहनने से ऐसा होता है?
पारस: वो भैया! सब लोग पहनते हैं इसलिये पहन लिया।

पारस: हर कार्य सोच समझकर करना चाहिये, किसी की देखा देखी नहीं और तुम अपने जिनेन्द्र भगवान और णमोकार महामंत्र का अपमान करना चाहते हो क्या?
नहीं भैया! मुझे नरक निगोद जाना है क्या… जो मैं इनका अपमान करूँगा। इसमें तो सुना है कि णमोकार मंत्र के अपमान से सुभौम चक्रवर्ती नरक चला गया था। लेकिन आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? मैंने तो किसी का अपमान नहीं किया।
पारस: तुमने अपमान किया नहीं, कर रहे हो।
वो कैसे?
पारस: तुमने ये णमोकार मंत्र का कड़ा और पार्श्वनाथ का लॉकेट गले में पहना है। इसे पहने हुये तुम बाथरूम और टॉयलेट में जाते हो, पसीने भरे हाथों से इसे छूते हो, इसे पहने हुये अशुद्ध बिस्तर पर सो जाते हो, टीवी देखना आदि न जाने कितने काम करते होगे…!
हाँ भैया! जो तो होता है।
पारस: पारस! इन सबसे हमारे पंचपरमेष्ठियों का अपमान होता है और सबसे बड़ी बात इससे गृहीत मिथ्यात्व के पाप का बंध होता है।
भैया! ये तो मैंने सोचा ही नहीं।
पारस: पारस! मन के अच्छे विचार तो अच्छी संगति से होते हैं। हमारी अच्छी संगति ही अच्छे विचार पैदा करती है। हम अच्छी पुस्तकें पढ़ें, अच्छे दोस्तों के साथ रहें, जिनवाणी का अध्ययन करें, पाठशाला जायें तो हमारे विचार अच्छे हो रहेंगे।
वाह भैया! आपने तो अच्छी तरह समझा दिया। अब मैं कभी भी ये नहीं पहनूँगा और अपने दोस्तों को भी समझाऊँगा।
पारस: ये हुई ना बात।

6 अब नहीं मनाऊँगा

नवीन: हैप्पी न्यू ईयर चिन्तन!
चिन्तन: किस बात का हैप्पी न्यू ईयर नवीन? पागल हो गये हो या मजाक कर रहे हो।
नवीन: न हो पागल हुआ हूँ और न ही मजाक कर रहा हूँ।
चिन्तन: तो क्या तुम्हें मालूम नहीं कि आज 1 जनवरी है और आज से नया वर्ष प्रारम्भ हुआ है?
नवीन: मुझे सब मालूम है नव। यदि दुनिया पागलपन कर रही है तो क्या हम भी पागलपन करें?
चिन्तन: क्या बात कर रहे हो मुझे तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। मुझे तो तुम पागल लग रहे हो। पागलखाने से आये हो क्या?
नवीन: पागल मैं नहीं। नया वर्ष मनाने वाले लोग हैं। जो हमारा पर्व न हो उसे मनाना पागलपन नहीं तो और क्या है? नये वर्ष के नाम पर विवेकशून्य होकर नाचना, पटाखे फोड़ना, होटलों में जाना, पूरी रात जागना - ये कहाँ के संस्कार हैं और कैसी बुद्धिमानी है?

मैं कुछ समझा नहीं…। अरे भाई। हम जैनों का नया वर्ष तो भगवान महावीर के निर्वाण दिन मतलब दीपावली के दूसरे दिन प्रारम्भ हो गया था। ।। 1 जनवरी का नया वर्ष तो अंग्रेजी सभ्यता की देन है।
चिन्तन: तो क्या हुआ? हम उनका नववर्ष नहीं मना सकते क्या?
नवीन: मैंने कब मना किया? मैं तो बस यह पूछ रहा हूँ कि नया वर्ष में आज क्या हुआ जो इतना उत्साह दिखा रहे हो?
चिन्तन: अरे! आज से नया वर्ष प्रारंभ हो रहा है और हम नये और अच्छे कार्य करने की प्रतिज्ञा लें।
नवीन: चिन्तन! मुझे समझ में नहीं आता कि 31 दिसंबर और 1 जनवरी में क्या अंतर आ गया है। चारों तरफ हिंसा, भ्रष्टाचार, अनाचार और झूठ है। हममें भी क्या अंतर आया है? वही व्यापार, वही पाप और कषाय की बातें।
चिन्तन: हाँ! ये बात तो है। कोई नया काम हो तो बधाई देने का अवसर मिले। न हमारे पाप कम होते हैं न ही कषाय। नया काम तो महावीर स्वामी ने किया था मोक्षलक्ष्मी पाकर, गौतम स्वामी ने केवलज्ञान पाकर। तभी तो हमें खुशियाँ मनाने का अवसर मिला और तुम्हें जानकर खुशी होगी कि वीर निर्वाण संवत् विश्व का सबसे प्राचीन संवत् है।
नवीन: तो हमें क्या करना चाहिये?
चिन्तन: चिन्तन! यदि हमें नया वर्ष मनाना ही है तो सबसे पहले जिनमंदिर जाकर पूजन-आराधना करना चाहिये और प्रतिज्ञा करना चाहिये कि हम अपनी कषायों और पापों में कमी लाने का प्रयास करेंगे। जितना बन सके उतना असहायों की सहायता, योग्य पात्रों को दान आदि देंगे। अपना मन अधिक से अधिक जिनधर्म के अध्ययन में, जिनेन्द्र भगवान की पूजन भक्ति में और अपनी विशुद्धि बढ़ाने में लगायेंगे। अभक्ष्य भक्षण और रात्रि भोजन का त्याग करेंगे।
नवीन: हाँ भाई। मैं हो पागल था। अब मैं भी तुम्हारी तरह नया वर्ष मनाऊँगा।

7 मैं भी चलूँगी

शोभा: तुम कल जल्दी आ जाना।
स्तुति: अरे यार! सुबह मैं थोड़ा देर से उठती हूँ। कुछ खास काम है तो बोलो।
शोभा: अरे मेरी बहन! कल अपने अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी की जन्म जयंती है। कल सुबह मंदिर में पूजन है और पूजन के बाद विशाल जिनेन्द्र शोभायात्रा भी निकाली जावेगी।
स्तुति: अरे इसमें मेरा क्या काम?
शोभा: शोभा! इसमें काम की क्या बात है? ये तो हमारा कर्तव्य है। हमारे भगवान महावीर स्वामी का जन्म जयंती महोत्सव है और इससे बड़ी और क्या बात हो सकती है..
स्तुति: लेकिन स्तुति! कल कॉलेज की भी छुट्टी है, कल तो आराम करने का दिन है और वैसे भी पूजन में मुझे बहुत सोर लगता है और शोभायात्रा में जाने से क्या फायदा? कितनी भीड़ होती है, पसीना-पसीना और सारे कपड़े खराब हो जाते हैं। बस चलते रहो, चलते रहो, बहुत थकान हो जाती है।

शोभा: अरे शोभा! तुम ये कैसी बातें कर रही हो? ये तो हमारा सौभाग्य है कि हमें इस जन्मजयंती के कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर प्राप्त हो रहा है।
स्तुति: छोड़ो ये बेकार की बातें…।
शोभा: अच्छा शोभा! ये बताओ कि तुम पढ़ाई करके क्या करना चाहती हो?
स्तुति: मैं बहुत बड़ी डॉक्टर बनना चाहती हूँ और अपने पिता का नाम रोशन करना चाहती हूँ।
शोभा: क्यों?
स्तुति: अरे! मेरे पिता ने मुझे जन्म दिया और मेरा बहुत ध्यान रखते हैं। मेरी हर इच्छा पूरी करते हैं और मेरी पढ़ाई के लिये बहुत खर्च करते हैं।
शोभा: तुम्हें अपने पिता की बहुत महिमा आ रही है ना। ऐसे ही भगवान महावीर हमारे धर्मपिता हैं। उन्होंने हमें सच्चे धर्म की शिक्षा दी। तुम डॉक्टर बन जाओगी तो इस जन्म में सुख-सुविधायें भोग पाओगी लेकिन भगवान महावीर ने हमें अनंत काल तक सुखी होने का मार्ग बताया। जन्म-मरण का अंत करने की विधि बताई है। हम सब पर उनका अनंत उपकार है। कुछ समझ में आया।
स्तुति: हाँ! कुछ-कुछ आ रहा है।
शोभा: तुम डॉक्टर बनने के लिये और पापा का नाम रोशन करने के लिये हर संघर्ष करने के लिये तैयार हो परन्तु जिनधर्म की प्रभावना के लिये जन्म जयंती की एक दिन की शोभायात्रा में जाने के लिये तुम मना कर रही हो।
स्तुति: पर स्तुति! शोभायात्रा में इतना खर्च करना ठीक है क्या?

अब नहीं ढिलऊँगा

देखो चर्षित! कितने सारे खिलौने है। बोलो ! तुम्हें क्या चाहिये?

चर्षित: मुझे तो वो बड़ी वाली बन्दूक चाहिये पापा !

हाँ। अभी लो यह कहकर सुलभ ने बेटे के लिये दुकान वाले से बड़ी बन्दूक निकलवाने के लिये कहा और रुपये देकर बन्दूक ले ली। बन्दूक लेकर चर्षित बहुत खुश हुआ और मुँह से धांय-धांय कहकर आवाज निकालकर बन्दूक से खेलना शुरु कर दिया।

घर पहुँचकर चर्षित ने अपनी मम्मी को खुश होकर बन्दूक दिखाई और बन्दूक मम्मी की ओर करके बोला -

चर्षित: देखो मम्मी ! मेरी बन्दूक की गोली आ रही है धांय-धांय।

दृष्टि: (सुलभ से) ये बन्दूक क्यों लेकर आये आप?

सुलभ: अरे..! ये बहुत जिद्द कर रहा था खिलौने के लिये, इसलिये इसे बन्दूक दिला दी।

इसके बाद दृष्टि ने मौन धारण कर लिया। दृष्टि ने शाम तक न सुलभ से बात की और न चर्षित से। चर्षित मम्मी की नाराजगी से अनजान दिन भर बन्दूक से खेलता रहा। कभी दादा को बन्दूक दिखाता तो कभी दादी को… और जोर से कहता -

चर्षित: दादाजी ! आपको मेरी गोली लग गई। अब दादी को गोली मारूँगा।

ये देखकर मम्मी का गुस्सा और बढ़ गया, बस चुपचाप काम करती रही

सुलभ: इतनी सी बात पर इतना नाराज हो क्या..? शाम को सुलभ ने दृष्टि से पूछा ही लिया। आखिर खिलौने दिलाकर मैंने कोई अपराध किया है क्या?

दृष्टि: (गंभीर होकर) मैंने खिलौने दिलाने के लिये कभी मना नहीं किया । खिलौने तो बच्चों का अधिकार हैं। मैं तो बन्दूक दिलाने के लिये नाराज हूँ।

सुलभ: बन्दूक खिलौना नहीं है क्या?

दृष्टि: खिलौना है पर चर्षित के लिये नहीं। जबसे वह बन्दूक लाया है तबसे वह धांय-धांय, ये मारा, वो मारा ही कर रहा है। आप समझते हैं इसमें कितना पाप लगता है?

सुलभ: (ताल ठोकते हुये) अरे वो बच्चा है ..। इसे क्या पता पुण्य-पाप का मतलब.. और कौनसी असली बन्दूक है ? खिलौना ही तो है..।

दृष्टि: (तेज आवाज में) खिलौना होगा आपके लिये- पुण्य-पाप चर्षित नहीं समझता, पर आप तो समझते हैं ना। बन्दूक नकली है पर भाव तो असली हैं और फिर हम चर्षित को हिंसा के संस्कार देंगे क्या? हमें तो हिंसा के खिलौनों, हिंसा वाले वीडियो गेम से दूर रहने की शिक्षा देना चाहिये और हम ही उसे हिंसा सिखा रहे हैं।

सुलभ: (बात समाप्त करने की कोशिश करते हुये) छोड़ो ना छोटी सी बात को। तुम तो उसके पीछे ही पड़ गई।

दृष्टि: (दृढ़ता से) छोटी बात होगी आपके लिये। बच्चों को संस्कार देने का पहला कार्य माँ-बाप का है। यदि हम अपने ही बच्चों को संस्कार नहीं दे सकते तो हमें संतान को जन्म देने का कोई अधिकार नहीं है।

दृष्टि की गंभीर बात सुनकर सुलभ गम्भीर हो गया, पर दृष्टि अपनी बात कहे जा रही थी।

दृष्टि: यहीं उम्र है उसके सीखने की। अभी हम उसे जो सिखायेंगे वह वही बात सीखेगा। आज खिलौने में हिंसा करेगा और कल साक्षात् किसी को मारेगा। इसकी सारी जिम्मेदारी हमारी होगी। यदि बच्चा जिद्द करता है तो हम उसे समझायें, न कि उसकी हर जिद्द पूरी करें।

इतना सुनकर सुलभ बोला -

सुलभ: दृष्टि ! तुम सही कह रही हो। बच्चों के मोह में हम उनकी हर अच्छी-बुरी जिद्द पूरी करने लगते हैं। हमें बच्चों की जिम्मेदारी विवेकपूर्वक निभानी चाहिये, अंधे होकर नहीं। सॉरी दृष्टि ! आज के बाद मैं चर्षित को ऐसी कोई भी चीज नहीं दिलाऊँगा जिससे उसे गलत संस्कार मिले।

दृष्टि: (मुस्कराकर) आप मेरी बात समझ गये, यहीं मेरे लिये बहुत है। थैंक्स।

आओ खेलें प्यारा खेल …
ऐसा खेल खिलाओ भैया, न रोना न पिटना
न हिंसा की बातें जिसमें नहीं हार कर रोना
सीखें बातें ज्ञान-धर्म की, ऐसा खेल खिलायें
नहीं राग हो, नहीं द्वेष हो, हर पल ही मुस्कायें।

अब नहीं तोडूँगा

चंचल छठवी कक्षा में पढ़ता था। वह बचपन से बहुत शैतानी करता था। वह स्कूल से आते-जाते समय रास्ते के पेड़ों की टहनियाँ तोड़ता तो कभी फूल तोड़ता। कभी घर के आँगन में रखे गमलों के पौधों की पत्तियाँ तोड़ता । उसकी माँ ने ऐसा न करने के लिये उसे कई बार समझाया और डांटा भी.. पर चंचल हमेशा माँ की बात को हँसी में टाल देता।

एक बार वह रात में गहरी नींद में सोया था अचानक वह नींद में ही चिल्लाने लगा -

चंचल: मुझे मत मारो.. मेरे हाथ मत तोड़ो.. अब कभी नहीं करूँगा …।

माँ: (चंचल को नींद में चिल्लाते देखा तो तुरन्त उसे जगाकर) क्या हुआ बेटा ?

इतने में चंचल उठकर बैठ गया और जोर-जोर से रोने लगा। उसके माथे और चेहरे पर पसीना आ रहा था। माँ ने उसके सिर को सहलाते हुये पूछा

माँ: चंचल ! क्या हुआ? कोई बुरा सपना देखा क्या…?

चंचल ने घबराकर माँ की गोद में सिर रख लिया। कुछ देर बाद जब चंचल शांत हुआ तो उसने माँ से रोते हुये कहा -

चंचल: माँ ! अब मैं कभी फूल नहीं तोडूँगा और न ही पक्षियों को नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।

आखिर हुआ क्या बेटा?

माँ ने फिर चंचल से पूछा तो चंचल ने आँसू पोंछते हुये कहा -

चंचल: माँ ! मैंने अभी बहुत भयानक सपना देखा। सपने में मैंने देखा कि कुछ राक्षस जैसे लोग मुझे पकड़कर मेरे हाथ-पैर बांधकर ले गये और एक अंधेरी गुफा में एक सरदार के सामने खड़ा कर दिया। सरदार ने कड़कती आवाज में पूछा - इस बालक ने क्या अपराध किया है ? तो एक राक्षस बोला - सरदार ! इस बालक ने कई पेड़ों की टहनियाँ तोड़ी हैं। सरदार ने कड़कती आवाज में कहा - सजा के रूप में इस बालक के हाथों की उंगलियाँ तोड़ दी जायें। दूसरा राक्षस बोला - सरदार ! इसने कई फूलों को तोड़कर मसल दिया। सरदार गुस्से में बोला - इसके पैर तोड़कर इसे अपंग बना दिया जाये। सरदार का आदेश पाकर दो राक्षस चाक़ू लेकर मेरी ओर बढ़ने लगे और दो राक्षसों ने मुझे जोर से पकड़ लिया। मैं डर गया कि ये लोग मेरे हाथ-पैर तोड़ देंगे। मैं घबरा गया बस माँ ! फिर … आपने मुझे जगा दिया। माँ ! अब मैं कभी पेड़-पौधों को नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा। ये मेरा वादा है माँ !

इतना कहकर वह फिर जोर - जोर से रोने लगा। माँ ने उसे स्नेह से सहलाते हुये कहा -

माँ: मैंने तो तुझे कई बार समझाया कि पेड़-पौधे भी हमारे जैसे जीव हैं। उन्हें भी दुख का अनुभव होता है। बिना कारण पेड़-पौधों को तोड़ना महापाप है।

चंचल: हाँ माँ ! पर आज के बाद मैं किसी भी जीव को दुःख नहीं पहुँचाऊँगा।

चंचल की बात सुनकर माँ का चेहरे पर मुस्कान आ गई।

पुकार

एक फूल बच्चों से बोला
अपने भीतर का दुख खोला
मुझको कभी भी तोड़ो न
पत्ती, टहनी मोड़ो न
जैसे तुम एक जीव हो
वैसे हम भी जीव हैं ।

अब नहीं खाऊँगा

अनय: आगम ! आओ आओ… बहुत दिन बाद आये। कहो क्या हाल है? कहाँ रहे इतने दिन…?

आगम: बस यार ! मेरे दादाजी गाँव से आये थे। उनके साथ टाइम का पता ही नहीं चलता था।

अनय: अच्छा…।

आगम: हाँ ! … और दादाजी जैन धर्म के अच्छे विद्वान भी है। उन्होंने मुझे जैनधर्म की बहुत सारी कहानियाँ सुनाई और बहुत सारी अनोखी जानकारियाँ भी बताईं।

अनय: (हंसकर) अच्छा …। फिर तो तुम पण्डित बन गये होगे।

आगम: ये मजाक की बात नहीं अनय। हमें तो अपने जैनधर्म के गौरव का पता ही नहीं है।

अनय: अच्छा! ये धर्म की बातें छोड़। आज भोजन साथ में करेंगे।

आगम: हाँ हाँ चलो .. !

अनय: माँ ! आगम आया है और यहीं भोजन करेगा..।

माँ: ठीक है बेटा। तुम दोनों बैठो। मैं अभी भोजन लगाती हूँ।

अनय: और माँ ! एक ही थाली लगाना। हम दोनों एक ही थाली में एक साथ ही भोजन करेंगे।

आगम: नहीं अनय ! हम दोनों भोजन तो साथ में ही करेंगे लेकिन एक थाली में नहीं, अलग-अलग थाली में..

अनय: अरे ! कैसी बातें कर रहे हो..हमने तो हमेशा भोजन एक साथ एक थाली में ही किया है।

आगम: किया है.. पर अब नहीं करेंगे।

अनय: अरे आगम ! साथ में भोजन करने से प्यार बढ़ता है और आखिर हम दोनों पक्के दोस्त हैं।

आगम: प्यार नहीं, पाप बढ़ता है।

अनय: वो कैसे…?

आगम: देखो ! जब हम साथ में एक थाली में भोजन करते हैं तब अपने मुह की लार भोजन में मिल जाती है। एक दूसरे की लार मिलने से अनंत जीव उत्पन्न हो जाते है और भोजन में उनकी हिंसा हो जाने से भयंकर पाप लगता है।

अनय: तुम्हें ये सब किसने बताया?

आगम: मेरे दादाजी ने …और दादाजी ने ये बातें अपने मन से नहीं कही बल्कि सर्वज्ञ और दिगम्बर मुनिराजों द्वारा कही जिनवाणी के आधार से कही है। हम तो अनजाने में भयंकर पाप कर रहे थे।

अनय: भाई आगम ! मैं भी आज से प्रतिज्ञा लेता हूँ कि अब मैं किसी के भी साथ एक थाली में भोजन नहीं करूँगा।

आगम: ये हुई ना बात.. चलो ! फिर भोजन करते हैं।

अनय: हाँ हाँ ! क्यों नहीं.. पर अलग-अलग थाली में..

इतना कहकर दोनों मसकराने लगे।

अब नहीं फेकुंगी

कृति अपने भाई-बहिनों में सबसे बड़ी थी। दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली कृति अपनों माँ के साथ रसोई में काम करके उनका सहयोग भी करती थी। माँ रोटी बनाती और कृति सब्ज़ी और फल् बनाने में सहयोग करती। उसे काम करने में बहुत आनन्द आता था । सब्ज़ी और फल के छिलके पॉलिथीन में रखकर बाहर फेंक देती। एक दिन उसे माँ ने पॉलिथीन में कचरा रखकर फेंकते हुये देखा तो उन्होंने कृति से ऐसा करने के लिये मना किया और कहा -

माँ: कृति ! तुम पॉलिथीन में कचरा बांधकर मत फेंका करो। कोई गाय-भैंस भोजन के साथ पॉलिथीन भी खा सकती है और उसके गले में फंस सकती है।

कृति: (बुद्धिमान बनते हुये मम्मी को समझाते हुए) अरे माँ ! आप भी कैसी बातें करती हो? सभी पशु बहुत समझदार होते हैं। वे पहले पॉलिथीन फाड़ते हैं, फिर अपने काम की चीज खा लेते हैं। मैंने कई बार देखा है और माँ ! पॉलिथीन में कचरा फेंकने से सुविधा होती है। इसमें कचरा यहाँ-वहाँ नहीं बिखरता।

माँ: (फिर समझाते हुये) कृति! भले ही पशु समझदार होते हैं परन्तु इतने भी समझदार नहीं होते कि उन्हें पॉलीथिन पेट में जाने का नुकसान पता हो। बेचारे भूखे होते हैं। कभी पॉलीथिन खुलती है कभी नहीं खुलती और तुम ये काम नहीं कर सकती तो मैं कचरा फेंक दिया करूँगी।

कृति: (मम्मी की बात को अनसुना करते हुये) आप भी प्रवचन देने लगी। छोड़ो ना इस बात को। ठीक है ध्यान रखूँगी।

पर कृति ने अपनी आदत नहीं छोड़ी और प्रतिदिन पॉलिथीन में ही कचरा फेंकती रही। एक दिन जब वह स्कूल से लौट रही थी तो उसने देखा कि रास्ते में कुछ लोगों की भीड़ लगी थी। उसने एक बच्चे से पूछा- यहाँ इतनी भीड़ क्यों लगी है? उस बच्चे ने बताया - यहाँ एक गाय मर गई है तो उसे म्युनिसिपलिटी वाले उसे उठाकर ले जा रहे हैं।

कृति पास की एक दुकान में खड़ी होकर देखने लगी। दुकान वाला अपने ग्राहक से कह रहा था - इन महिलाओं को पता नहीं कब अक्ल आयेगी.. पॉलिथीन में कचरा भरकर फेंकती हैं। आखिर फिर एक गाय मर गई।

कृति ने दुकानदार बात सुनी तो उसे मम्मी की बातें याद आने लगीं। उसने देखा कि गाय के मुंह से प्लास्टिक पॉलिथीन के टुकड़े निकल रहे थे। दुकानदार कहे जा रहा था - बेचारी गाय… पॉलीथिन गले में फंस गई और सांस रुकने के कारण तड़प-तड़पकर मर गई।

कृति की आंख में आंसू आ गये। उसे अपने किये पर पछतावा होने लगा। वह आंख में आंसू लिये घर वापस आ गई। मम्मी ने उसे उदास और रोते हुये देखा तो वे घबरा गई और पूछा -

मम्मी: कृति ! क्या बात है, क्या हुआ जो रो रही हो?

इतना सुनकर कृति मम्मी के गले से लिपट गई और जोर-जोर से रोने लगी और बोली

कृति: मम्मी ! अब मैं हमेशा आपकी बात मानूँगी। कभी कोई सामान पॉलिथीन में नहीं फेकुंगी।

फिर कृति ने पूरा घटना मम्मी को सुनाई तो मम्मी ने उसे गले से लगा लिया और कहा

मम्मी: कृति ! देर से ही सही, बात तुम्हारी समझ में आ गई।

पर कृति के आंसू बहे जा रहे थे।

अब नहीं सोचूंगा

ज्ञायक: भोजन करने के बाद अपना होमवर्क पूरा कर लेना। - मम्मी ने ज्ञायक से कहा।

मम्मी..। अभी नहीं खेलने के बाद कर लूँगा।

बाद में नहीं अभी करो। खेलने के बाद तुम थक जाते हो फिर तुम्हें नींद आने लगती है। प्लीज मम्मी..! मैं खाने के पहले पूरा होमवर्क कर लूँगा। प्रॉमिस मम्मी।

ज़िद्द नहीं करते बेटा! पहले होमवर्क करो फिर निश्चिंत होकर खेलना।

मम्मी। मुझसे तो अच्छे ये पशु पक्षी हैं। कितने सुखी…।

क्या मतलब …? मैं कुछ समझी नहीं।

मम्मी। ये पशु-पक्षी किसी स्कूल में नहीं जाते तो इन्हें होमवर्क भी नहीं करना पड़ता। अपनी इच्छा से कहीं भी घूमो, खाओ, कोई टोकने वाला नहीं। न ही कमाने की चिंता, कितना आज़ाद जीवन है इनका।

अच्छा…! तो यह बात है… और क्या सोचता है मेरा ज्ञायक बेटा..

काश! मैं भी पक्षी होता तो जो मन में आता वह काम करता और खूब घूमता। अनेक देशों की सैर करता और यदि बन्दर होता तो एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग लगाता। बहुत सारे फल खाता और अपने दोस्तों के साथ बहुत खेलता। न होमवर्क की चिन्ता, न पढ़ने का डर।

वाह! क्या बुद्धि लगाई है तुमने - मम्मी ने जोर से हंसते हुये कहा।

मम्मी! ये सब कह रहा हूँ। - ज्ञायक ने मासूम बनते हुये कहा।

बेटा! तुम एक ओर से देख रहे हो परन्तु पशु-पक्षियों के भयंकर दुःखों को नहीं जानते इसलिये ऐसी बातें कर रहे हो और तुम उत्तम कुल वाले मनुष्य होकर भी तिर्यञ्च होने की भावना भा रहे हो।

इसमें क्या गलत है मम्मी ?

तुम जानते हो कि कितने दुःख हैं इन पशु-पक्षियों के। पशुओं को कभी भी भरपेट भोजन नहीं मिलता। रस्सियों से बंधे रहना पड़ता है। इन पशु-पक्षियों का कोई घर नहीं होता। गर्मी-ठंड सब सहन करना पड़ता है। लोग इन्हें डंडों से बांध देते हैं। बेचारे जानवरों को कोई भी मारता रहता है। यदि कोई तकलीफ़ हो तो किसी से कह नहीं सकते। यहाँ तो तुम्हें ज़रा सा दर्द होने पर तुम डॉक्टर के पास चले जाते हो। इन पशु-पक्षियों के दुःख का कोई पार नहीं है।

मम्मी! ये तो मैंने सोचा ही नहीं।

और तुम पक्षियों के सुखी जीवन की बात कर रहे हो। मांसाहारी लोग पक्षियों को मारकर उनका मांस खा जाते हैं। कई लोग अपने शौक के लिये पक्षियों को बन्द रखते हैं और हमें यह मनुष्य पर्याय बहुत पुण्य योग से मिली है। हमारा महासौभाग्य है कि हमें जैनधर्म और वीतरागी देव-शास्त्र-गुरु का समागम मिला। न तो पशुओं को देव दर्शन मिलता है, न ही आत्मकल्याणक के निमित्त मिलते हैं।

मम्मी! आप सही कह रही हैं। - ज्ञायक गंभीर होकर बोला

और पशु-पक्षी बनने की भावना कभी नहीं करना। ऐसी भावना भाना कि हम इस पर्याय में वीतरागी जिनेन्द्र भगवान की सेवा करें, मुनिराजों द्वारा इस पर्याय का सदुपयोग करें।


अब नहीं नहाऊँगा

चिन्मय। घर तो बहुत सुन्दर बनाया है।

थैंक्स अंकल! बस आपका ही आशीर्वाद है। आप जल्दी से नहा लीजिये। जिनमन्दिर पास में ही है। श्रीजी के अभिषेक का समय हो रहा है। हम साथ में चलकर अभिषेक पूजन करेंगे।

वाह! ये तो बहुत अच्छी बात है कि मंदिर पास में है। मैं अभी नहाकर आता हूँ।

और अंकल ठंड बहुत है। अंदर गरम पानी रखा है आप उससे ही नહાઇयेगा।

ठीक है चिन्मय। (10 मिनिट बाद)

चिन्मय। क्या तुम गीज़र से पानी गरम करते हो..

हाँ अंकल। जब घर बनवाया था तब ही गीज़र फिट करवा दिया था।

लेकिन चिन्मय! गीज़र से पानी गरम करने पर तो बहुत जीवों की हिंसा होती है।

वो कैसे अंकल ?

अरे बेटा! गीज़र में बिना छना पानी सीधे छत की टंकी से आता है और गरम होता है। अनछने पानी में तो असंख्यात जीवों की हिंसा हो जाती है।

अकल! हम तो गृहस्थ हैं, इतनी हिंसा तो चलती है..

तुम गलत सोच रहे हो चिन्मय। हिंसा चाहे गृहस्थ करे या मुनिराज के निमित्त से हो, हिंसा तो हिंसा ही है और घर के कार्य में जिस हिंसा से बचना असंभव है उस हिंसा को आरंभी हिंसा कहते हैं। पर ये तो संकल्पी हिंसा है, जानते हुये हुये हिंसा कर रहे हो और संकल्पी हिंसा का तो महापाप लगता है।

ठीक है अंकल! मैं सोचूंगा। अभी मंदिर चलते हैं।

तुम बात को टालने का प्रयास कर रहे हो चिन्मय। जब जिनेन्द्र भगवान की बात ही नहीं मानना तो उनके अभिषेक और पूजन का क्या लाभ?

बात टालने की बात नहीं अंकल। गीज़र में पानी गरम करने से सुविधा होती है और कष्ट का भी डर नहीं रहता।

मात्र अपनी छोटीसी सुविधा के लिये असंख्यात जीवों की हिंसा करना सही है क्या ? चिन्मय! अब तो बहुत सारे उपाय हैं जिससे पानी भी गरम हो जायेगा और कष्ट का डर भी नहीं है। पर पानी तो छानकर ही गरम करना चाहिये।

हमारा जैनधर्म अहिंसा प्रधान है। हम दिन भर हिंसा से बच नहीं पाते, पर इस गीज़र की हिंसा से से तो बच सकते हैं। वरना हम जैन कैसे…?

अंकल! आपकी बात तो सही है।

चिन्मय! हमारे गृहस्थ जीवन में हम जितना हिंसा से बच सकें उतना प्रयास करना चाहिये। यही सच्ची नीति है।

ठीक है अंकल! मैं आज ही मैकेनिक को बुलाकर गीज़र निकलवा देता हूँ। न रहेगा बांस और न बजे बांसुरी और कल से पानी छानकर ही गरम करूँगा।

ये हुई ना बात। बोलो अहिंसामयी जैन धर्म की जय।

अब नहीं सोचूंगा पेज नं. … का बोध भाग।

लिखित जिनवाणी का स्वाध्याय करें और अपनी आत्मा को पहचानकर आत्मकल्याण करें। यदि हमने इस पर्याय का उपयोग नहीं किया तो हम जरूर तिर्यंच गति में चले जायेंगे। कुछ समझ में आया।

हाँ माँ! सब समझ में आ गया। मैं वादा करता हूँ कि पशु-पक्षी बनने की भावना कभी नहीं करूँगा।


अब नहीं उड़ाऊँगा

यो काटी पतंग… हू… - खुशाल भाई जोर से चिल्लाये।

कानु ! जरा ढंग से चरखी पकड़ना। अभी देखना.. मैं कितनी सारी पतंग काटता हूँ।

हाँ दादा ! मैं सरखी पकड़ा हूँ।

अब ये गई, ये गई… ये गई… करमशी की पतंग। वो काटी…। हूँ…

खुशाल भाई ने करमशी भाई की पतंग काट दी और करमशी भाई की पतंग कटकर दूर जाने लगी। अपनी पतंग को दूर जाता देख करमशी भाई रोने लगा। करमशी भाई को रोता देखकर खुशाल भाई जोर से हंसने लगा। उसे रोता देखकर कानु अपने बड़े भाई खुशाल से बोले -

कानु: दादा! अपनी यह पतंग और धागा करमशी भाई को दे दो।

खुशाल भाई: रहने दो कानु.. पतंग उड़ाने में तो ऐसा होता रहता है। रहने दो, रोने दो उसे।

कानु: भाई ! हम पतंग उड़ाते आते हैं, किसी को रुलाते नहीं।

खुशाल भाई: देख कानु ! पतंग उड़ेगी तो कटेगी भी, इसमें रोने की क्या बात है। ये तो खेल है कानु..।

कानु: (ने कठोर शब्दों में पूछा) दादा! यदि हमारी पतंग कटती तो आपको कैसा लगता..?

खुशाल भाई: (तुरन्त बोला) बुरा लगता।

कानु: तो ऐसे खेल से दूर ही रहना चाहिये जिसमें किसी को दुःख पहुँचे और पतंग के भागे से पक्षियों की गर्दन कट सकती है, उनको चोट भी पहुँच सकती है।

खुशाल भाई: (ने कानु के कंधे पर हाथ रखकर कहा) वाह कानु ! तुम तो बहुत समझदार हो गये हो।

कानु: करमशी भाई ! यह लो मेरी पतंग और धागा और मैं आज से प्रतिज्ञा लेता हूँ कि अब मैं कभी पतंग नहीं उड़ाऊँगा।

यह कहते हुये कानु ने अपनी पतंग और धागा करमशी भाई को दे दी और वहाँ से घर चला आया।


स्रोत: दस लक्षण सांस्कृतिक कार्यक्रम संग्रह — मंचन-योग्य नाटक (जैन समुदाय पांडुलिपि)

प्रूफरीडिंग बाकी है

स्रोत · Source: forum.jinswara.com — अनुमति सहित, साभार · shared with permission and thanks.

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