आओ चलें सतियों के देश — जैन सतियों (ब्राह्मी-सुन्दरी, सुलोचना, अनंतमती, मैनासुन्दरी, राजुल, अनंगधरा, मनोवती, चन्दनबाला, सीता आदि) पर आधारित लघु नाटिकाओं/संवादों का संग्रह, साथ में गायन, प्रश्नोत्तरी और श्राविका तत्त्वबोधिनी।
Aao Chalen Satiyon Ke Desh — a collection of short skits/dialogues on the Jain satis, with songs and a quiz.
आओ चले सतियों के देश
1. ब्राह्मी और सुन्दरी
ब्राह्मी : बहन ! क्या माताश्री ने तुमसे कुछ कहा ?
सुन्दरी : हाँ बहन ! माताश्री कह रही थी पिताश्री हमारे विवाह के लिए योग्य वर की खोज करवा रहे हैं।
ब्राह्मी : परन्तु बहन हमें तो विवाह करने का भाव ही नहीं है।
सुन्दरी : हाँ बहन ! मुझे भी ऐसा ही भाव है हम तो ब्रह्मचर्य व्रत धारण करेंगे।
ब्राह्मी : बहन ! यही उचित होगा। हमारे पिताश्री त्रैलोक्य पूज्य तीर्थंकर पद को प्राप्त करेंगे, और हमारे कारण उन्हें किसी के सामने झुकना पड़े, ये हमें इष्ट नहीं।
सुन्दरी : बहन ! हमारे पिताश्री ने स्वयं हमें शिक्षा प्रदान की, मोक्षमार्ग के उत्तम संस्कार दिये, हम उनकी दी हुई शिक्षा को सार्थक करेंगे और जब उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति होगी, तब हम समवशरण में आर्यिका दीक्षा धारण करेंगे और स्त्रीलिंग का छेद कर शीघ्र ही अगले भवों में निर्वाण की प्राप्ति करेंगे।
पश्चात गायन : ब्राह्मी और सुन्दरी जी की निज परिणति को प्रणाम । 2 महलों की वासी, वन को करेंगी प्रयाण 2।।
7. सती सुलोचना और गंगादेवी
सती सुलोचना : हे देवी ! आप कौन हैं जिसने इस संकट के समय हमारी सहायता की, और मेरे पति को मगर के मुख से बचाया ?
गंगादेवी : हे महाभागे ! मैं गंगादेवी हूँ, तुम्हारे णमोकार मंत्र के स्मरण से मेरा आसन कम्पायमान हो गया और तुमने जो मेरा उपकार किया था, उसी उसका ही स्मरण होते में तुम्हारी सहायता को आई हूँ।
सती सुलोचना : मैंने आपका क्या उपकार किया था ?
गंगादेवी : हे शुभे ! मैं तुम्हारी सखी विन्ध्यश्री का जीव हूँ सर्प के काटने पर तुमने ही मुझे पंचनमस्कार मंत्र सुनाया था, जिसके फल में मैं गंगा नामक देवी बनी हूँ और पूर्वभव के स्नेह के कारण यहाँ आई हूँ।
पश्चात गायन : हाथी पे चढ़ी जाती थी सुलोचना सती, गंगा में ग्राहने गही गजराज की गती, उस वक्त में पुकार किया था तुम्हें सती, भय टार के उबार लिया है कृपापती । हे दीनबन्धु श्रीपति करुणानिधान जी । यह मेरी व्यथा क्यों न हरो बेर क्या लगी ।।
सेठानी सुभद्रा और चन्दनबाला
सेठानी : बेटी ! मुझे क्षमा करो, मैंने तुम्हें बहुत कष्ट दिये, न जाने इन पापों का प्रायश्चित कैसे होगा ? (और चन्दनवाला के पैरों को छूने की मुद्रा)
चन्दनबाला : (बीच में सम्हालते हुए) माताजी ! ये आप क्या कर रही हैं, इसमें कष्ट कैसा? ये प्रतिकूलतायें तो जीवन में पूर्व कर्मों की निर्जरा के लिए आती हैं; इन्हें समता से सहन करने में ही हमारी विजय है और ये सब बनाव नहीं बनता, तो, महाश्रमण वीर प्रभु की ये अटपटी प्रतिज्ञा कैसी पूरी होती ? मुनिराज महावीर का आहार कैसे होता ?
सेठानी : धन्य हो बेटी, तुम धन्य हो !
सखी द्वय : (एक साथ कहना) - सेठानी जी ! हमारे महल में महाराज व महारानी पधारे हैं वे उस कन्या से मिलना चाहते हैं जिनके हाथों मुनिराज का पारणा हुआ है।
( इतने में महारानी का प्रवेश )
महारानी : सेठानी ! कौन है वह कन्या ? (इतने में चन्दना पर दृष्टि पड़ते ही चौंकते हुए) बहन ! बहन चन्दना तुम ! यहाँ कैसे ? बहन ! तुम कहाँ चली गई थी, सभी परिजन तुम्हें कितना खोज रहे थे, क्या, तुम्हारे ही हाथों मुनिराज का पारणा हुआ ?
चन्दनबाला : हाँ, जीजी !
महारानी : चलो बहन ! अब महलों में चलो ।
चन्दनबाला : नहीं जीजी ! अब मुझे कहीं नहीं जाना, मैंने संसार देख लिया, अब तो
मोह : माया को त्याग आर्यिका जी बनूँगी ।
सभी एक साथ : धन्य हो सती, तुम धन्य हो ।
पश्चात गायन : चन्दना की ये कहानी, सदियों से भी पुरानी । है शील की ये गंगा, सतियों की अमर बानी ॥
2. सती अनंतमती और सेठ प्रियदत्त
सेठ प्रियदत्त : अरे ! इतनी सुन्दर रांगोली, ऐसी रांगोली तो मेरी बेटी ही बनाती थी ।
(एक महिला से) क्यों बहन ! यह रांगोली किसने बनाई है ? मुझे उससे जल्दी मिला दो ।
महिला : श्रेष्ठी ! यहाँ नगर के समीप उपवन में आर्यिका संघ पधारा हुआ है। उन्हीं के साथ एक अत्यन्त सुकुमार राजकुमारी जैसी कन्या है, उसी ने यह बनाया है, वह अभी आती ही होगी ।
(अनंतमती का आगमन)
सेठ प्रियदत्त : अरे ! ये तो मेरी पुत्री है, बेटी²
अनंतमती : पिताश्री !
सेठ प्रियदत्त : बेटी ! हमने तुम्हें कहाँ-कहाँ नहीं खोजा, तुमने बहुत कष्ट सहे, चलो पुत्री अब घर चलें, तुम्हारे वियोग में तुम्हारी माता की अवस्था अच्छी नहीं है। अब तुम्हारे विवाह के उत्सव की तैयारियाँ कर पुनः उसमें प्राण आ जायेंगे ।
अनंतमती : पिताश्री ! ये आप कैसी बातें कर रहे हैं मैंने तो आप दोनों के साथ आठ वर्ष में ही ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर लिया था । अब मुझे कहीं नहीं जाना, चैतन्य सदन ही मेरा घर है । मुझे तो आप दीक्षा लेने की अनुमति प्रदान करें ।
पश्चात् गायन : ब्रह्मचर्य की अद्भुत महिमा, सुनो भव्यजन ध्यान से । सती शिरोमणि अनंतमती की, गाथा जैन पुराण से ॥ मगन हुई निज में ही ऐसी, मैं स्त्री हूँ भूल गयी । छूटी देह समाधि सहित, द्वादशम स्वर्ग में देव हुयी ॥
पढ़ो : सुनो ब्रह्मवर्य धरो, सुख पाओ आतमज्ञान से
सती शिरोमणि : –
4. महासती मैनासुन्दरी और माता निपुणसुन्दरी
निपुणसुन्दरी : बेटी ! हठ क्यों करती हो, अपने पिता की बात क्यों नहीं मान लेती, तुम भी अपनी बहन की तरह मनपसन्द वर की याचना कर लो ।
मैनासुन्दरी : माता ! मेरी शिक्षा आर्यिकाओं के सानिध्य में हुई है और उन्होंने मुझे यही सिखाया है कि कुलीन कन्याएँ स्वेच्छा पूर्वक अपने मन से वर पसन्द नहीं करती,
ये तो माता : पिता का कर्तव्य है और फिर जो मेरे भाग्य में होगा, उसे आप भी नहीं टाल सकते ।
निपुणसुन्दरी : यदि तुम्हारे भाग्य में कोढ़ी हुआ तो ?
मैनासुन्दरी : माता मेरे भाग्य में यदि कामदेव हुआ तो वह कोढ़ी ही कामदेव हो जायेगा । जो जो देखी वीतराग ने सो सो होसी वीरा रे । अनहोनी कबहुँ नहीं होसी, काहे होत अधीरा रे ॥
पश्चात गायन : तीरथ करने चली सखी, निज पति का कुष्ठ मिटाने को । अशुभ करम का उदय हुआ है करम बन्ध मिटाने को ॥ विनाशाय
5 राजुल व उनकी माता
माता : (कठोरता पूर्वक) उन्होंने हमारे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है बेटी ! तोरण द्वार तक आकर बिना व्याह ही वापस लौट जाना, कहाँ की बुद्धिमत्ता है ? तुझमें क्या कमी है, मैं तुम्हारे लिए दूजे वर का प्रबन्ध करती हूँ ।
राजुल : माताश्री ये आप क्या कह रही हैं - वर दूजा होता नहीं, यही धरम की सीख । छोडूँगी हरगिज नहीं, मैं सतियों की लीक ॥
माता : फेरे जब तक नहीं पड़े, कन्या कँवारी होय । वर सकती वर दूसरा, इसमें दोष न कोय ॥
राजुल : दूल्हा बनकर आ गये, जो दुल्हन के द्वार । तब से वे पति बन गये, जान गया संसार ॥
माता : बेटी ! ये पहाड़ सी जिन्दगी क्या तू एकाकी बितायेगी ?
राजुल : नहीं माता ! मैं भी उनकी अनुगामिनी बनूँगी और आर्यिका दीक्षा धारण करूँगी ।
माता : धन्य हो बेटी, तुम धन्य हो । / जहाँ नेमि के चरण पड़े गिरनार वो धरती है । वो प्रेममूर्ति राजुल, उस पथ पर चलती है ।
पश्चात गायन : जोगी बनके दुल्हन गिरनार चली, हो जोगी बनके । कोई सतियों के मार्ग पर चलो तो सही ॥
6 अंजना व सखी बसन्तमाला
अंजना जी : अरे रे ! जिन माता-पिता ने मुझे जन्म दिया, जब उन्होंने ही मुझे शरण नहीं दी तो अन्य की क्या बात ? ये सब तो राजा के अधीन हैं । हे सखी ! यहाँ अपना कोई नहीं है । अपने वास्तविक माता-पिता एवं रक्षक तो
देव : गुरु और धर्म ही हैं सदा उन्हीं की शरण हैं । यहाँ तो सब ही पाषाणचित्त हैं यहाँ अपना वास सम्भव नहीं है चलो ! अब तो हम वन ही चलें, जहाँ वीतरागी सन्तों का वास है । चलो सखी अब वहाँ चलें, जहाँ मुनियों का वास । आतम का अनुभव करें, वन में करें निवास ॥
बसन्तमाला : हे देवी ! आप धन्य हैं जो इतने संकट में भी समता धारण किये हुए हो ।
पश्चात गायन : कोई सहारा है नहीं ये सोच मत लाना, चत्तारि शरणं पाठ पढ़ निज की शरण आना । निज भावना भाते हुए वैराग्य बढ़ाओ सर्वत्र सुन्दर एक की ही भावना भाओ ॥
अनंगधरा
लब्धिदास विद्याधर : हे पुत्री ! तुम कौन हो, इस निर्जन वन में इस प्रकार अकेली क्या कर रही हो ?
अनंगधरा : हे तात ! मैं चक्रवर्ती की पुत्री, विद्याधर ने मेरा हरण किया और मुझे यहाँ छोड़ दिया, तब से आज तक तीन हजार वर्षों से यहाँ एकाकी जीवन व्यतीत कर रही हूँ, हे तात ! आप कौन हैं, इस भयंकर वन में किसलिए आये हैं ?
लब्धिदास : हे पुत्री ! मैं लब्धिदास नामक विद्याधर हूँ, मैं सुमेरु पर्वत के जिनालयों की वंदना कर लौट रहा था, अचानक मैंने तुम्हें यहाँ देखा, चलो बेटी, चलो मैं तुम्हें, तुम्हारे पिताश्री के पास पहुंचा देता हूँ।
अनंगधरा : हे तात ! अब मैं कहीं नहीं जा सकती, मैंने सल्लेखना व्रत लिया है और सौ गज भूमि के आगे नहीं जाने का नियम लिया है।
पश्चात्त गायन : सुनो जी मंगल जैन पुराण, यासों जीवन बनें महान सती अनंगधरा की मैंगल गाथा गाते हैं अभयदान की महिमा को हम बताते हैं
सुनो जी : - - -
मंदोदरी और सीता जी
मंदोदरी : हे सुन्दरी ! वह स्त्री धन्य है जिसे मेरा पति चाहता है, मेरा पति तीन खण्ड का अधिपति, महापराक्रमी, सर्वांग सुन्दर विद्याधर है, उसे स्वीकार कर सुख से भोग भोगो ।
सीताजी : धिक्कार है तुझे ! पतिव्रता स्त्रियों के मुख से ऐसे अनीतिपूर्ण वचन शोभा नहीं देते । अरे, मेरी ये काया छिन्न-भिन्न होकर नष्ट भी हो जाये तो भी मैं पर पुरुष को स्वीकार नहीं कर सकती । तुम्हें तो अपने पति को कुशील के मार्ग से हटाना चाहिए, जबकि उल्टा तुम उनका समर्थन कर रही हो ।
मनोवती और सासु
मनोवती : माताजी ! आज जब आप सुबह मेरे बाल गूँथ रही थी, तब रो क्यों रही थी ?
सासु : हे सुन्दरी, तुम्हारा मस्तक देखते ही मुझे अपनी पुरानी बाँते याद आने लगी थी। परन्तु यदि में आज उसे कहूँगी तो भी, उस पर कोई विश्वास नहीं करेगा ।
मनोवती : माता ! तुम भय छोड़कर जो बात है सो कहो ।
सासु : हे देवी, सुनो ! हम पहले ऐसे दरिद्र नहीं थे। हम बल्लभीपुर के बड़े जौहरी, 56 करोड़ दीनार के अधिपति थे। हमारे कोठार रत्नों से भरे रहते थे । मेरे सबसे छोटे पुत्र का विवाह बड़ी ही सुशील कन्या से हुआ था, उसकी प्रतिज्ञा थी कि गजमोती चढ़ा कर ही भगवान के दर्शन करेंगी । हम सबने मिलकर उसे घर से निकाल दिया और धर्म की निन्दा की, जिसके फल में आज हमारा ये हाल हो गया, हम सब दर-दर के भिखारी हो गये । महारानी ! क्या कहूँ, आज तुम्हें देख मुझे मेरी बहू की याद आ गई. इसलिए मेरी आँखे भर आई। - जिनदर्शन के हेतु मनोवती ने, कष्ट अनेकों झेले ।
भूख : प्यास अरु देश निकाले, में भी धर्म नहीं छोड़े ॥ सत्रहने में ही उसने राज - रतनगढ़ पाया । और अन्त समय तक अपना नाम चलाया ।। सब कुटुम्बी मिल गये, धर्म प्रताप से आकर । इसलिए हे भव्य सुनो! धर्म नहीं छोड़ो धन को पाकर ।
गायन
- ब्राह्मी और सुन्दरी - ब्राह्मी और सुन्दरी जी की निज परिणति को, प्रणाम²। महलों की वासी, वन को करेंगी, प्रयाण²
महलों की वासी : - ।
2. सती सुलोचना और गंगा देवी
हाथी पे चढ़ी जाती थी सुलोचना सती। गंगा में ग्राह ने गही गजराज की गती ॥ उस वक्त में पुकार किया था तुम्हें सती। भय टार के उबार लिया है कृपापती ॥ हे दीनबन्धु श्रीपति करुणानिधान जी। यह मेरी विथा क्यों न हरो बेर क्या लगी ॥
3. सेठानी सुभद्रा और चन्दनबाला
चन्दना की ये कहानी, सदियों से भी पुरानी। है शील की ये गंगा, सतियों की अमर कहानी ॥
4. महासती मैनासुंदरी और माता निपुणसुन्दरी
तीरथ करने चली सखी, निज पति का कुष्ठ मिटाने को । अशुभ करम का उदय हुआ है करम बन्ध मिटाने को ।।
5. राजुल व उनकी माता
जोगी बनके दुल्हन गिरनार चली, हो जोगी बनके । कोई सतियों के मार्ग पर चलो तो सही ॥
- अंजना व सखी बसन्तमाला - कोई सहारा है नहीं ये सोच मत लाना । चत्तारि शरणं पाठ पढ़ निज की शरण आना ॥ निज भावना भाते हुए वैराग्य बढ़ाओ । सर्वत्र सुन्दर एक की ही भावना भाओ ॥
7. मनोवती और सास
जिनदर्शन के हेतु मनोवती ने, कष्ट अनेकों झेले ।
भूख : प्यास अरु देश निकाले, में भी धर्म नहीं छोड़े ।
सत् रहने में ही उसने राज : रतनगढ़ पाया । और अन्त समय तक अपना नाम चलाया । सब कुटुम्बी मिल गये, धर्म प्रताप से आकर । इसलिये हे भव्य ! सुनो धर्म न छोड़ो धन को पाकर ।
8. पिसनहारी व एक सखी
- रेवती रानी - कापथे पथि दुःखानां, कापथेऽथऽप्यसम्मतिः ।
असंपृक्ति रनुत्कीर्ति : रमूढा दृष्टि रुच्यते ॥
-
मंदोदरी और सीता जी - निष्कम्प मेरु सम चित्त, काम विकार न हो । लहूँ परम शील निर्दोष, सीतादर्श (सीता आदर्श) रहो ॥
-
सती अनंतमती और सेठ प्रियदत्त - ब्रह्मचर्य की अद्भुत महिमा, सुनो भव्यजन ध्यान से । सती शिरोमणि अनन्तमती, की गाथा जैन पुराण से ॥ मगन हुयी निज में ही ऐसी में स्त्री हूँ भूल गयी । छूटी देह समाधि सहित, द्वादशम स्वर्ग में देव हुयी ॥
पढ़ा : सुनो ब्रह्मचर्य धरो, सुख पाओ आतमज्ञान से ।
सती शिरोमणि : - - - ।
- महारानी चेलना - लहर - लहर लहराये, केशरिया झण्डा जिनमत का
होजी : होजी, ये सबका मन हरषाये - - -
13. श्री विजय सेठ और विजया सेठानी
ब्रह्मचर्य की अद्भुत महिमा, सुनो भव्य कल्याणमयी ।
जिससे करती भव की संतति दु : खमयी अज्ञानमयी ॥
- सती मनोरमा - शील धरम की महिमा गाते आज सभी नर-नारी है देवलोक में शीलवती की हुई प्रशंसा भारी है कीलित द्वार खुले नगरी के चहुँ दिशि जय-जयकार हुआ देवों ने की पुष्पवृष्टि सबको हर्ष अपार हुआ है मनोरमा शीलवती पतिव्रता सभी ने पहचाना विजय धर्म की होती आखिर, सबने यों मन में जाना ।
15. अनंगधरा
प्रश्न : 1 - इन पात्रों के नाम व इनकी माताओं के नाम भी बताइये ?
उत्तर : ब्राह्मी - माता नन्दा
सुन्दरी : माता सुनन्दा ।
प्रश्न : 2 - पहिचानिए ये कौन सी सती है ?
उत्तर : सती सुलोचना (भरत चक्रवर्ती के सेनापति जयकुमार की धर्मपत्नी)
प्रश्न : 3 - पहिचानिए ये कौन सी सती है, व इनके पिता का नाम भी बताइये ?
उत्तर : सती चंदबाला, पिता का नाम राजा चेटक ।
प्रश्न : 4 - पहिचानिए ये कौन है ?
उत्तर : सती मैनासुंदरी ।
प्रश्न : 5 - पहिचानिए ये कौन सी सती है ?
उत्तर : राजुल जी ।
प्रश्न : 6 - इन पात्रों के नाम बताइये ?
उत्तर : अंजना जी व सखी बसन्तमाला ।
प्रश्न : 7 - पहिचानिए ये कौन है व इनको क्या किस नाम से प्रसिद्ध है ?
उत्तर : मनोवती जी व दशनकथा के नाम से
प्रश्न : 8 - पहिचानिए ये कौन हैं व इनके नाम से कौन सा तीर्थ क्षेत्र प्रसिद्ध है ?
उत्तर : पिसनहारी, मढिया जी ।
प्रश्न : 9 - पहिचानिए ये कौन हैं और सम्यकत्व के किस अंग में प्रसिद्ध हुई ?
उत्तर : रेवती रानी, अस्थितिकरण अंग में ।
प्रश्न : 10 - पहिचानिए ये संवाद किन पात्रों के बीच हो रहा था ?
उत्तर : महासती सीता जी व मंदोदरी ।
प्रश्न : 11 - पहिचानिए ये कौन सी सती है ?
उत्तर : अनंतमती जी
प्रश्न : 12 - पहिचानिए ये कौन हैं व इनके पति का नाम भी बताइये ?
उत्तर : रानी चेलना वं राजा श्रेणिक ।
प्रश्न : 13 - पात्रों को पहिचानिए ?
उत्तर : विजय सेठ व विजया सेठानी ।
प्रश्न : 14 - पहिचानिए ये कौन हैं व ऐसी ही घटना अन्य सती के साथ हुई उसका भी नाम बताइये ?
उत्तर : सती मनोरमा, नीली जी ।
प्रश्न : 15 - पहिचानिए ये कौन है ?
उत्तर : अनंगधरा जी
पिसनहारी व एक सखी : मढ़िया जी के प्रांगण में, हमने यह सुनी कहानी थी । वह पिसनारी ने जिनमन्दिर बनवाने की ठानी थी ।। कभी न वह थकती थी, मानों उसके तन पर उतरी श्रम की रानी थी, वह पिसनारी ने जिनमन्दिर बनवाने की ठानी थी ।
- हम याद करें सती ब्राह्मी को सुन्दरी और चन्दनबाला राजुल द्रोपदी कौशल्या अंजना, मनोरमा, सीता
" श्राविका तत्त्वबोधिनी "
भगवन सदा सुशीला, श्रद्धावती बनें हम,। दोनों कुलों की शोभा, लज्जावती बनें हम ॥ वनवास में पति का, जिसने न साथ छोड़ा । सत् शील की विधाता, सीता सती बनें हम ॥ कुष्ठी पति को पाकर सेवा से मुँह न मोड़ा। वह धर्म कर्म ज्ञाता, मैना सती बनें हम ॥ संकट सहें हजारों, छोड़ा न शील लेकिन । वह मनोरमा सुभद्रा, अंजना सती बनें हम ॥ अपने पति को जिसने जिन धर्म पर लगाया। वह धर्म शास्त्र ज्ञाता, चेलना सती बनें हम ॥ ‘शिवराम’ भेष धरकर, क्षुल्लक करी परीक्षा । सम्यकत्व से डिगी ना, वह रेवती बनें हम ॥
चेतावनी जागोरी जैन बहिनों, कुछ तो भला कमाओ । मानुष जनम को पाके, मत व्यर्थ ही गमाओ ॥1॥ चौरासी पार करके, आई कहीं ये बारी । भाग्यों से मिल गया है, सार्थक इसे बनाओ ॥2॥ कुछ पाप के उदय से, नारी का जन्म पाया। उसको समाज हित कर, सब भाँति से बनाओ ॥3॥ प्राचीन जैनियों का साहस चराया तुमने । इस उच्च जाति को तुम, नीचा न कर दिखाओ ॥4॥ किस नींद सो रही हो, निज धन को खो रही हो । संसार की सरां में, मत ज्ञान धन लुटाओ ॥5॥
माता : पिता कुटुम्बी, सम्बन्धी लोग जितने । भरतार से भी विनती, कर जोड़ के सुनाओ ॥6॥ विद्या दो हमको माता, शिक्षा दो हमको भाई। बिन ज्ञान हमको मूर्खा, मत जानकर बनाओ ॥ 7॥ निज स्वार्थ में कमी का, कुछ डर न दिल में करना । कन्या भी होवें विदुषी, यह ख्याल दिल में लाओ ॥8॥ धर्मज्ञ विदुषी होकर, हम भी करेंगी सेवा । संसार-यात्री पद को, जल्दी सफल बनाओ ॥ 9॥
प्रार्थना भक्ति से जिनवर के दर्शन करेंगे, अपना प्रभु अपने में देखेंगे हम ॥ गुरुवर की उत्तम संगति करेंगे। अपना गुरु अपने में देखेंगे हम ॥ जिनवाणी साँची माता हमारी । पढ़ेंगे और सबको पढ़ायेंगे हम ॥ परम पुरुष जो हुए अलौकिक । आदर्श उनको बनायेंगे हम ॥ अन्तर्मुख होकर अनुभव करेंगे। अपने को आत्मा देखेंगे हम ॥ परभावों से न्यारा सहज अकर्ता । अपने को ज्ञाता देखेंगे हम ॥
जन्मते : मरते, मिलते बिछुड़ते । देहादि को न्यारा देखेंगे हम ॥
मोहादि दुर्भाव दु : ख के हैं कारण । स्वाश्रय से इनको छोड़ेंगे हम ॥ परमार्थ रत्नत्रय शिवसुख का कारण। अन्तर में स्वाश्रय से पायेंगे हम ॥ अवसर न चूकें पुरुषार्थ करके । मुक्तिपुरी को जायेंगे हम ॥
बिटिया : प्रसन्न रहो और प्रसन्न रखो । आश्चर्य है कि ✓ सूर्य पूर्व से तो उगता है पश्चिम में तो डूबता है और तू उत्थान के लिए पश्चिम की ओर देखता है । ✓ हे माता ! यदि तेरा पुत्र सभासदों में हंस की भाँति शोभायमान नहीं होता तो तू क्यों अपना नूर खराब करती है। अर्थात् अपने पुत्र को उत्तम संस्कार देना ।
अहो! शील की महिमा को तो देव स्वर्ग में गावें । अहो! शील की रक्षा को तो देव स्वर्ग से आवें ॥
अपनी मीठी बोली से, कोयल प्यारी जान । सज्जन रूप न देखते, गुण पर रखते ध्यान ॥
" स्याने का कहा हुआ और आँवले का खाया हुआ कालान्तर में गुण दिखाता है इसलिए बिटिया! बुजुर्गों की सीख को ध्यान से सुन । ✓ बिटिया ! प्रसन्न रहो और प्रसन्न रखो । हम जिस देश, संस्था, समाज, परिवार में रहते हैं वहाँ का वातावरण अपनी ओर से प्रसन्न व स्वस्थ बनाये रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।
✓ भोजन करना माँ के हाथ से चाहे जहर हो, सलाह लेना भाई से चाहे बैर हो । रास्ता चलना साफ चाहे देर हो, पत्नी लाना शीलवान चाहे बेनूर हो ॥
✓ तुम्हारा भाई राम हो न हो, तुम लक्ष्मण बनना । तुम्हारा भाई लक्ष्मण हो न हो, तुम राम बनना । परन्तु रावण कोई मत बनना ।
(कभी)
✓ शील ही श्रृंगार है बाह्य श्रृंगार तो विकार है ।
लघु नाटिका : पात्र - सीताजी, सेनापति
महासती सीता और सेनापति संवाद
सीता : सुन ! सेनापति भैया, क्या तुम भूल गए इस जंगल का रास्ता ।
सेनापति : नहीं भूला मैं रास्ता, है प्रिय मात सिये कहते हुए हिय फरता ।
सीता : क्या बात है बतलाओ, शीघ्र मेरे भैय्या मत देर तनिक लगाओ ।
सेनापति : हे मात ! क्या बतलाऊं; नहीं कुछ कह सकता कहते हुए दुख पाऊं ।
सीता : क्या बात है शीघ्र कहो, मन में न सोच करो सच बतलाओ भैया ।
सेनापति : श्री राम की है आज्ञा, इस भीम विकट वन में तुम छोड़ आओ सीता ।
सीता : कुछ समझ नहीं आता, श्री राम का मेरे प्रति कैसे ये हृदय पलटा ।
सेनापति : मैं रुदन किया भारी, नहीं मेरी एक सुनी हुआ अंत में लाचारी ।
सीता : भैया किसने बहकाया, क्या कुछ दोष किए नहीं समझ में कुछ आए ।
सेनापति : है नौकरी काम बुरा, भूलें के नहीं करना चाहे भूखों ही मर जाना ।
सीता : मेरा दोष बता देते, सबर तो आ जाता निर्णय तो करा देते ।
सेनापति : कुछ दोष नहीं तुझमें, तू ही है परम सती कोई संशय नहीं इसमें ।
सीता : तुम छोड़ मुझे जाओ, तनिक न खेद करो पति आज्ञा बता जाओ ।
सेनापति : यहाँ सिंह दहाड़े हैं, कैसे मैं तजूँ तुमको गजराज चिंघाडे हैं ।
सीता : जो कर्म लिखा मेरे, खुद ही मैं भोगूँगी । नहीं हाथ में है तेरे ।
सेनापति : मैं कैसे तजूँ तुमको, इस भीम विकट वन में । यह पाप लगे मुझको ।
सीता : तुम जाओ मेरे भैया, यहाँ रहना ठीक नही । संदेह करे दुनिया ।
सेनापति : दिल मेरा नहीं चाहता, कुछ संदेश करो । ले जाता हूँ मैं माता ।
सीता : श्री राम से यह कहना, लोगों के बहकाये तुम धर्म न तज देना ।
सेनापति : धन्य-धन्य है सीता सती, धर्म नहीं भूली । ऐसी विपदा में भी ।
शिक्षा : जब निर्दोष राज्य शासन परम्परा चलाने के लिये श्री राम ने निर्दोष सीता का परित्याग कर दिया तो क्या हम निर्दोष जिनशासन की निर्दोष परम्परा चलाने के लिये हम अपने दोषों का त्याग नहीं कर सकते ।
जयवंत वर्त्ते सर्वज्ञ शासन जयवंत वर्त्ते निग्रन्थ शासन यही भाव अविच्छिन्न रहता है मन में जयवंत वर्त्ते
प्रूफरीडिंग बाकी है
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